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होली: सतरंगी उत्सव — ओशो | Happy Holi with #Osho

मार्च 12, 2017


हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं — ओशो

प्रह्लाद कभी हुए, न हुए, प्रह्लाद जानें। लेकिन इतना मुझे पता है, कि पुराण में जिस तरफ इशारा है, वह रोज होता है, प्रतिपल होता है, तुम्हारे भीतर हुआ है, तुम्हारे भीतर हो रहा है।

Happy Holi with #Osho
होली जैसा उत्सव पृथ्वी पर खोजने से न मिलेगा। रंग गुलाल है। आनंद उत्सव है। तल्लीनता का, मदहोशी का, मस्ती का, नृत्य का, नाच  का—बड़ा सतरंगी  उत्सव है। हंसी के फव्वारों का, उल्लास का, एक महोत्सव है। ऐसा नृत्य करता उत्सव पृथ्वी पर कहीं भी नहीं है।




प्रश्न: पुराण-कथा है, प्रह्लाद नास्तिक राजा हिरण्यकश्यप के यहां जन्म लेता है, और फिर हिरण्यकश्यप अपनी नास्तिकता सिद्ध करने के लिए प्रह्लाद को नदी में डुबोता है, पहाड़ से गिरवाता है, और अन्त में अपनी बहन होलिका से पूर्णिमा के दिन जलवाता है। और आश्चर्य तो यही है कि वह सभी जगह बच जाता है, और प्रभु के गुणगान गाता है। और तब से इस देश में होली जलाकर होली का उत्सव मनाते हैं, रंग गुलाल डालते हैं, आनंद मनाते हैं। कृपा करके इस पुराण-कथा का मर्म हमें समझाइये। 

पुराण इतिहास नहीं है। पुराण महाकाव्य है। पुराण में जो हुआ है, वह कभी हुआ है ऐसा नहीं, वरन सदा होता रहता है। तो पुराण में किन्हीं घटनाओं का अंकन नहीं है, वरन किन्हीं सत्यों की ओर इंगित है। पुराण शाश्वत है। ऐसा कभी हुआ था कि नास्तिक के घर आस्तिक का जन्म हुआ? ऐसा नहीं; सदा ही नास्तिकता में ही आस्तिकता का जन्म होता है। सदा ही; और होने का उपाय ही नहीं है। आस्तिक की तरह तो कोई पैदा हो ही नहीं सकता; पैदा तो सभी नास्तिक की तरह होते हैं। फिर उसी नास्तिकता में आस्तिकता का फूल लगता है। तो नास्तिकता आस्तिकता की मां है, पिता है। नास्तिकता के गर्भ से ही आस्तिकता का आविर्भाव होता है।

हर बाप बेटे से लड़ता है। हर बेटा बाप के खिलाफ बगावत करता है। 

हिरण्यकश्यप कभी हुआ या नहीं, मुझे प्रयोजन नहीं है। व्यर्थ की बातों में मुझे रस नहीं है। प्रह्लाद कभी हुए, न हुए, प्रह्लाद जानें। लेकिन इतना मुझे पता है, कि पुराण में जिस तरफ इशारा है, वह रोज होता है, प्रतिपल होता है, तुम्हारे भीतर हुआ है, तुम्हारे भीतर हो रहा है। और जब भी कभी मनुष्य होगा, कहीं भी मनुष्य होगा, पुराण का सत्य दोहराया जाएगा। पुराण सार—निचोड़ है; घटनाएं नहीं, इतिहास नहीं, मनुष्य के जीवन का अन्तर्निहित सत्य है।

बीता कल जा चुका, फिर भी उसकी पकड़ गहरी है; विदा हो चुका, फिर भी तुम्हारी गर्दन पर उसकी फांस है।

समझो। पहली बात—
साधारणतः तुम समझते हो कि नास्तिक आस्तिक का विरोधी है। वह गलत है। नास्तिक बेचारा विरोधी होगा कैसे! नास्तिकता को आस्तिकता का पता नहीं है। नास्तिकता आस्तिकता से अपरिचित है, मिलन नहीं हुआ। लेकिन आस्तिकता के विरोध में नहीं हो सकती नास्तिकता, क्योंकि आस्तिकता तो नास्तिकता के भीतर से ही आविर्भूत होती है। नास्तिकता जैसे बीज है और आस्तिकता उसी का अंकुरण है। बीज का अभी अपने अंकुर से मिलना नहीं हुआ। हो भी कैसे सकता है? बीज अंकुर से मिलेगा भी कैसे? क्योंकि जब अंकुर होगा तो बीज न होगा। जब तक बीज है तब तक अंकुर नहीं है। अंकुर तो तभी होगा जब बीज टूटेगा और मिटेगा और भूमि में खो जाएगा। तब अंकुर होगा। जब तक बीज है तब तक अंकुर हो नहीं सकता। यह विरोधाभासी बात समझ लेनी चाहिए।

बीज से ही अंकुर पैदा होता है, लेकिन बीज के विसर्जन से, बीज के खो जाने से, बीज के तिरोहित हो जाने से। बीज अंकुर का विरोधी कैसे हो सकता है! बीज तो अंकुर की सुरक्षा है। वह जो खोल बीज की है, वह भीतर अंकुर को ही सम्हाले हुए है—ठीक समय के लिए, ठीक ऋतु के लिए, ठीक अवसर की तलाश में। लेकिन, बीज को अंकुर का कुछ पता नहीं है। अंकुर का पता हो भी नहीं सकता। और इसी अज्ञान में बीज संघर्ष भी कर सकता है अपने को बचाने का—डरेगा, टूट न जाऊं, खो न जाऊं, मिट न जाऊं! भयभीत होगा। उसे पता नहीं कि उसी की मृत्यु से महाजीवन का सूत्र उठेगा। उसे पता नहीं, उसी की राख से फूल उठने वाले हैं। पता ही नहीं है। इसलिए बीज क्षमायोग्य है, उस पर नाराज मत होना। दयायोग्य है। बीज बचाने की कोशिश करता है। यह स्वाभाविक है अज्ञान में। हिरण्यकश्यप पिता है। पिता से ही पुत्र आता है। पुत्र पिता में ही छिपा है। पिता बीज है। पुत्र उसी का अंकुर है। हिरण्यकश्यप को भी पता नहीं कि मेरे घर भक्त पैदा होगा। मेरे घर और भक्त! सोच भी नहीं सकता। मेरे प्राणों से आस्तिकता जन्मेगी—इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन प्रह्लाद जन्मा हिरण्यकश्यप से। हिरण्यकश्यप ने अपने को बचाने की चेष्टा शुरू कर दी। घबड़ा गया होगा। डरा होगा। यह छोटा-सा अंकुर था प्रह्लाद, इससे डर भी क्या था? फिर यह अपना ही था, इससे भय क्या था! लेकिन जीवनभर की मान्यताएं, जीवनभर की धारणाएं दांव पर लग गयी होंगी।

इसलिए मैं कहता हूं, पुराण तथ्य नहीं है, सत्य है। तुम अगर यह सिद्ध करने निकल जाओ कि आग जला न पायी प्रह्लाद को, तो तुम गलती में पड़ जाओगे, तो तुम भूल में पड़ जाओगे, तो तुम्हारी दृष्टि भ्रान्त हो जाएगी। तुम अगर यह समझो कि पहाड़ से फेंका और चोट न खायी, तो तुम गलती में पड़ जाओगे। नहीं, बात गहरी है, इससे कहीं बहुत गहरी है। यह कोई ऊपर की चोटों की बात नहीं है। 

हर बाप बेटे से लड़ता है। हर बेटा बाप के खिलाफ बगावत करता है। और ऐसा बाप और बेटे का ही सवाल नहीं है—हर आज कल के खिलाफ बगावत है, बीते कल के खिलाफ बगावत है। वर्तमान अतीत से छुटकारे की चेष्टा है। अतीत पिता है, वर्तमान पुत्र है। बीते कल से तुम्हारा आज पैदा हुआ है। बीता कल जा चुका, फिर भी उसकी पकड़ गहरी है; विदा हो चुका, फिर भी तुम्हारी गर्दन पर उसकी फांस है। तुम उससे छूटना चाहते हो: अतीत भूल जाए, विस्मृत हो जाए। पर अतीत तुम्हें ग्रसता है, पकड़ता है।

वर्तमान अतीत के प्रति विद्रोह है। अतीत से ही आता है वर्तमान; लेकिन अतीत से मुक्त न हो तो दब जाएगा, मर जाएगा। हर बेटा बाप से पार जाने की कोशिश है। तुम प्रतिपल अपने अतीत से लड़ रहे हो—वह पिता से संघर्ष है।

ऐसा समझो—
सम्प्रदाय अतीत है, धर्म वर्तमान है। इसलिए जब भी कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होगा, सम्प्रदाय से संघर्ष निश्चित है। होगा ही। सम्प्रदाय यानी हिरण्यकश्यप; धर्म यानी प्रह्लाद। निश्चित ही हिरण्यकश्यप शक्तिशाली है, प्रतिष्ठित है। सब ताकत उसके हाथ में है। प्रह्लाद की सामर्थ्य क्या है? नया-नया उगा अंकुर है। कोमल अंकुर है। सारी शक्ति तो अतीत की है, वर्तमान तो अभी-अभी आया है, ताजा-ताजा है। बल क्या है वर्तमान का? पर मजा यही है कि वर्तमान जीतेगा और अतीत हारेगा; क्योंकि वर्तमान जीवन्तता है और अतीत मौत है।

हिरण्यकश्यप के पास सब था—फौज-फांटे थे, पहाड़-पर्वत थे। वह जो चाहता, करता। जो चाहा उसने करने की कोशिश भी की, फिर भी हारता गया। शक्ति नहीं जीतती, जीवन जीतता है। प्रतिष्ठा नहीं जीतती, सत्य जीतता है। सम्प्रदाय पुराने हैं।

जीसस पैदा हुए, यहूदियों का सम्प्रदाय बहुत पुराना था, सूली लगा दी जीसस को। लेकिन मार कर भी मार पाए? इसीलिए पुराण की कथा है कि फेंका प्रह्लाद को पहाड़ से, डुबाया नदी में—नहीं डुबा पाए, नहीं मार पाए। जलाया आग में—नहीं जला पाए। इससे तुम यह मत समझ लेना कि किसी को तुम आग में जलाओगे तो वह न जलेगा। नहीं, बड़ा प्रतीक है। जीसस को मारा, मर गये। लेकिन मर पाए? मारकर भी तुम मार पाए?

इसलिए मैं कहता हूं, पुराण तथ्य नहीं है, सत्य है। तुम अगर यह सिद्ध करने निकल जाओ कि आग जला न पायी प्रह्लाद को, तो तुम गलती में पड़ जाओगे, तो तुम भूल में पड़ जाओगे, तो तुम्हारी दृष्टि भ्रान्त हो जाएगी। तुम अगर यह समझो कि पहाड़ से फेंका और चोट न खायी, तो तुम गलती में पड़ जाओगे। नहीं, बात गहरी है, इससे कहीं बहुत गहरी है। यह कोई ऊपर की चोटों की बात नहीं है। क्योंकि हम जानते हैं, जीसस को सूली लगी, जीसस मर गये। सुकरात को जहर दिया, सुकरात मर गये। मंसूर को काटा, मंसूर मर गया। लेकिन मरा सच में या प्रतीत हुआ कि मर गये? जीसस अब भी जिंदा है—मारनेवाले मर गये। सुकरात अभी भी जिंदा है—जहर पिलानेवालों का कोई पता नहीं। सुकरात ने कहा था—जिन्होंने उसे जहर दिया—कि ध्यान रखो कि तुम मुझे मारकर भी न मार पाओगे; और तुम्हारे नाम की अगर कोई याद रहेगी तो सिर्फ मेरे साथ, कि तुमने मुझे जहर दिया था, तुम जियोगे भी तो मेरे नाम के साथ। निश्चित ही आज सुकरात के मारनेवालों का अगर कहीं कोई नाम है तो बस इतना ही कि सुकरात को उन्होंने मारा था।

थोड़ा सोचो! हिरण्यकश्यप का नाम होता, प्रह्लाद के बिना? प्रह्लाद के कारण ही। अन्यथा कितने हिरण्यकश्यप होते हैं, होते रहते हैं! आज हम जानते हैं, किसकी आज्ञा से जीसस को सूली लगी थी। उस वाइसराय का नाम याद है। हजारों वाइसराय होते रहे हैं दुनिया में, सब के नाम खो गये, लेकिन पायलट का नाम याद है; बस इतना ही याद है कि उसका नाम था; जीसस को सूली दी थी, जीसस के साथ अमर हो गया।

जीसस को हम मारकर भी मार न पाए-इतना ही अर्थ है। जीवन को मिटाकर भी तुम मिटा नहीं सकते। सत्य को तुम छिपाकर भी छिपा नहीं सकते, दबाकर भी दबा नहीं सकते। उभरेगा, हजार-हजार रूपों में वह उभरेगा; हजार-हजार गुना बलशाली होकर उभरेगा। लेकिन सदा यह भ्रांति होती है कि ताकत किनके हाथ में है। ताकत तो अतीत के हाथ में होती है। समाज के हाथ में होती है, सम्प्रदाय के हाथ में होती है, राज्य के हाथ में होती है। जब कोई धार्मिक व्यक्ति पैदा होता है तो कोंपल-सा कोमल होता है; लगता है जरा-सा धक्का दे देंगे, मिट जाएगा, लेकिन आखिर में वही जीतता है। उस कोमल-सी कोंपल की चोट से महासाम्राज्य गिर जाते हैं। क्या बल है निर्बल का? निर्बल के बल राम! कुछ एक शक्ति है, जो व्यक्ति की नहीं है, परमात्मा की है। वही तो भक्त का अर्थ है। भक्त का अर्थ है: जिसने कहा, ‘मैं नहीं हूं, तू है!’ भक्त ने कहा, ‘अब जले तो तू जलेगा; मरे तो तू मरेगा; हारे तो तू हारेगा; जीते तो तू जीतेगा। हम बीच से हट जाते हैं।’

भक्त का इतना ही अर्थ है कि भक्त बांस की पोंगरी की भांति हो गया; भगवान से कहता है, ‘गाना हो गा लो, न गाना हो न गाओ-गीत तुम्हारे हैं! मैं सिर्फ बांस की पोंगरी हूं। तुम गाओगे तो बांसुरी जैसा मालूम होऊंगा; तुम न गाओगे तो बांस की पोंगरी रह जाऊंगा। गीत तुम्हारे हैं, मेरा कुछ भी नहीं। हां, अगर गीत में कहीं कोई बाधा पड़े, सुर भंग हो, तो मेरी भूल समझ लेना—बांस की पोंगरी कहीं इरछी-तिरछी है; जो मिला था उसे ठीक-ठीक बाहर न ला पायी; जो पाया था उसे अभिव्यक्त न कर पायी। भूल अगर हो जाए तो मेरी समझ लेना। लेकिन अगर कुछ और हो, सब तुम्हारा है।’

भक्त का इतना ही अर्थ है।

नास्तिकता में ही आस्तिक पैदा होगा। तुम सभी नास्तिक हो। हिरण्यकश्यप बाहर नहीं है, न ही प्रह्लाद बाहर है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं—प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटनेवाली दो घटनाएं हैं। जब तक तुम्हारे मन में सन्देह है—हिरण्यकश्यप है—तब तक तुम्हारे भीतर उठते श्रद्धा के अंकुरों को तुम पहाड़ों से गिराओगे, पत्थरों से दबाओगे, पानी में डुबाओगे, आग में जलाओगे—लेकिन तुम जला न पाओगे। उनको जलाने की कोशिश में तुम्हारे ही हाथ जल जाएंगे।

—ओशो
भक्ति—सूत्र, प्रवचन 16 से संकलित

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