रंगीन होते ख़्वाब — रीता दास राम की कहानी | Reeta Das Ram ki Kahani

रीता दास राम अपनी इस ईमानदार कहानी ‘रंगीन होते ख़्वाब’ में लिखती हैं: 
कोई झेल पाता है कोई नहीं। बस आत्म-सम्मान ज़िंदा रहे। उसके बिना चलना ज़िंदा मौत है। झेलना तो अपनी ख़ुद की ईमानदार तैयारी पर निर्भर है। रुकावटें कहाँ नहीं आती। व्यक्ति पार पाने की कम से कम कोशिश तो करे। समय अपने आप सामने-सामने रास्ता बताता चलता है।
रीताजी को शब्दांकन के लिए कहानी लिखने का आभार और शुक्रिया। ~ सं०  


Reeta Das Ram ki Kahani


रंगीन होते ख़्वाब

~ रीता दास राम

कवि / लेखिका /  एम.ए., एम फिल, पी.एच.डी. (हिन्दी) मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई 
प्रकाशित पुस्तक: “हिंदी उपन्यासों में मुंबई” 2023 (अनंग प्रकाशन, दिल्ली), / उपन्यास : “पच्चीकारियों के दरकते अक्स” 2023, (वैभव प्रकाशन, रायपुर) / कहानी संग्रह: “समय जो रुकता नहीं” 2021 (वैभव प्रकाशन, रायपुर)  / कविता संग्रह: 1 “गीली मिट्टी के रूपाकार” 2016 (हिन्द युग्म प्रकाशन)  2. “तृष्णा” 2012 (अनंग प्रकाशन). विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित: ‘हंस’, कृति बहुमत, नया ज्ञानोदय, साहित्य सरस्वती, ‘दस्तावेज़’, ‘आजकल’, ‘वागर्थ’, ‘पाखी’, ‘शुक्रवार’, ‘निकट’, ‘लमही’ वेब-पत्रिका/ई-मैगज़ीन/ब्लॉग/पोर्टल- ‘पहचान’ 2021, ‘मृदंग’ अगस्त 2020 ई पत्रिका, ‘मिडियावाला’ पोर्टल ‘बिजूका’ ब्लॉग व वाट्सप, ‘शब्दांकन’ ई मैगजीन, ‘रचनाकार’ व ‘साहित्य रागिनी’ वेब पत्रिका, ‘नव प्रभात टाइम्स.कॉम’ एवं ‘स्टोरी मिरर’ पोर्टल, समूह आदि में कविताएँ प्रकाशित। / रेडिओ : वेब रेडिओ ‘रेडिओ सिटी (Radio City)’ के कार्यक्रम ‘ओपेन माइक’ में कई बार काव्यपाठ एवं अमृतलाल नागरजी की व्यंग्य रचना का पाठ। प्रपत्र प्रस्तुति : एस.आर.एम. यूनिवर्सिटी चेन्नई, बनारस यूनिवर्सिटी, मुंबई यूनिवर्सिटी एवं कॉलेज में इंटेरनेशनल एवं नेशनल सेमिनार में प्रपत्र प्रस्तुति एवं पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित। / सम्मान:- 1. ‘शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान’ 2013, तृतीय स्थान ‘तृष्णा’ को उज्जैन, 2. ‘अभिव्यक्ति गौरव सम्मान’ – 2016 नागदा में ‘अभिव्यक्ति विचार मंच’ 2015-16, 3. ‘हेमंत स्मृति सम्मान’ 2017 ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को ‘हेमंत फाउंडेशन’ की ओर से, 4. ‘शब्द मधुकर सम्मान-2018’ मधुकर शोध संस्थान दतिया, मध्यप्रदेश, द्वारा ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को राष्ट्र स्तरीय सम्मान, 5. साहित्य के लिए ‘आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान’ 2019, मुंगेर, बिहार, 6. ‘हिंदी अकादमी, मुंबई’ द्वारा ‘महिला रचनाकार सम्मान’ 2021 / पता: 34/603, एच॰ पी॰ नगर पूर्व, वासीनाका, चेंबूर, मुंबई – 400074. / मो: 09619209272. ई मेल: reeta.r.ram@gmail.com 


मूसलाधार बरसते पानी में दस कदम दूर की चीज भी जब देखनी मुश्किल हो रही है, मयूरी ने क्लास से बाहर निकलना उचित नहीं समझा और विद्यार्थी रिक्त क्लास में एक दृष्टि दौड़ाते हुए पुनः अपनी जगह पर आकर बैठ गई। वह क्लास ख़त्म होते ही निकल जाती तो उसे बारिश के कारण इस तरह अकेले रुकना नहीं पड़ता। ऑटो लेने भी उसे यूनिवर्सिटी के गेट तक तो जाना ही पड़ेगा। छाता होने के बावजूद उसके भीग जाने की संभावना ज़रूरत से ज्यादा है सो वह रुक गई हिन्दी साहित्य के इतिहास पर दृष्टि गढ़ाए। कई दिनों से वह पढ़ने की कोशिश कर रही है। जब भी रुचिकर लगने लगता है ज़रूर कोई ना कोई काम याद आ जाता है और वह पृष्ठ पर बुकमार्क लगा दूसरे काम में लग जाती है। इसी तरह उसने इसे काफी पढ़ लिया है पर इतना पढ़ना ही काफी नहीं। अभी तो और भी कई पुस्तकें बची है जिसे पढ़ना, नोट्स निकालना, संदर्भ हेतु तैयारी करनी है। दो साल हो गए पीएचडी में रजिस्ट्रेशन हुए पर वही ढाक के तीन पात वह जस की तस। जहाँ से निकली थी अब भी वहीं पर अटकी हूँ। कई पुस्तकें इकट्ठी कर रखी हैं। लायब्रेरी में रोज ही आकर बैठती हूँ। बैठती ही नहीं अच्छी खासी मशक्कत करती हूँ पर वाकई पीएचडी नाक से पानी निकालता है। वह सोच कर हँसने लगी। उसने बाहर आकर इधर उधर का जायज़ा लिया। बारिश बारिश बारिश। बारिश का शोर और कोई नहीं। लायब्रेरी में होती तो ज्यादा अच्छा होता। क्यों ना वहीं जाया जाए! कुछ और किताबें वह छाँट पाएगी। मयूरी क्लास से निकलने के लिए अपनी पुस्तकें समेटने लगी। ठीक उसी समय दूसरे लेक्चर रूम से कुछ आवाज आई। वह रूम के दरवाजे पर ही थी कि दूसरे रूम के दरवाजे पर एक विद्यार्थी दिखाई दी। मयूरी अपनी चाल में चलती वहाँ तक पहुँची उसे देख अपना नाम बताते हुए पूछ बैठी। “मैं मयूरी ... तुम भी अकेली हो?”

“देविका .... हाँ बारिश ही ऐसी है। कुछ देर में बंद हो जाए या कम, तो निकलते है यही सोच कर रुकी हूँ।” देविका ने भी अपना नाम बताया और बात की। भीतर आकर अपना पर्स लैपटॉप के साथ कुछ पुस्तकें समेटती बैगपैक में भरने लगी। 

बारिश ने जोर पकड़ा और मयूरी वहीं ठिठक गई, बारिश में भीगने की कल्पना से कसमसाने लगी। 

“अंदर आ जाओ यार ... अब तो बारिश ने और ज़ोर पकड़ लिया है।” देविका ने उसे लेक्चर रूम के भीतर बुलाते हुए कहा। 

“मैं सोच रही थी लायब्रेरी चली जाऊँ। कुछ टाइम पास हो जाएगा। पर अब ये बेतरतीब हो बरस रहा है।” मयूरी कहते-कहते रूम के अंदर चली आई जहाँ देविका अपना बैगपैक पैक कर रही थी। उसने देविका के बैग को देखा और पूछ बैठी। “अरे ... तुम लैपटॉप साथ रखती हो? काम तो मैं भी अपना लैपटॉप पर ही करती हूँ पर यूनिवर्सिटी नहीं लाती। घर जाकर ही काम करती हूँ। यहाँ तो बस नोट्स ले लेती हूँ, उसी के लिए लायब्रेरी जाने का विचार था और तुम ...?” पूछते हुए मयूरी देविका के लैपटॉप को देखने लगी। 

“ये ... लैपटॉप ... इसे तो साथ रखना ही होता है। ऑफ़िस जॉब में हूँ ना। हर तरह के काम। यहाँ सर से मिलने आई थी। कई दिनों से मुलाक़ात नहीं हुईं है। आज ऑफ़िस जल्दी छूट गया तो सोचा सर से मिलती चलूँ ... पर ... आई तो यहाँ कोई नहीं है। शायद लेक्चर कैंसल हो गया है।” देविका ने बातों को विस्तार दिया। 

“ओह .... तो तुम यहाँ ... इस यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ती?” 

“ना ...!!” 

“मैं समझ रही थी ... तुम एमए की विद्यार्थी होगी या पीएचडी की शोधछात्रा, मेरी तरह।” मयूरी आश्चर्य मिश्रित शब्दों में कह उठी। 

“अच्छा ... तो तुम शोध छात्रा हो। बढ़िया। गद्य या पद्य?” देविका ने एक भरपूर दृष्टि डाली। 

“पद्य ... समकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ ... ” मयूरी ने उत्तर दिया। 

“बढ़िया है। कितना कर चुकी हो? मतलब ... कुछ अध्याय लिखना शुरू किया भी है ... या अटकी पड़ी हो? अटकना बहुत आसान जो है पीएचडी में ... ” देविका ने स्मित मुस्कान से मयूरी को देखते हुए कहा। 

“सेनोप्सिस के अनुसार पुस्तकें तो ले ली है। पढ़ना भी जारी है। लिखना शुरू तो किया था पर फिर नोट्स लेना ज़रूरी लगा। इन दिनों कुछ पुस्तकें लायब्रेरी से निकलवाए हैं। कुछ आलोचनात्मक पुस्तकों के नोट्स वहाँ बैठ कर ले लेती हूँ। लायब्रेरी में एक लंबा व्यक्त गुज़ारे बिना मुश्किल है।” 

“गुरुजी कौन है किसके अंडर में रजिस्ट्रेशन किया है?”

“प्रो सिद्धार्थ द्विवेदी ... ” 

“अरे ... मैं उन्हीं से तो मिलने आई हूँ। ओह ... तो वही है तुम्हारे गुरुजी?” 

“हाँ ... यही। मैं तो देवयानी मेम के अंडर करना चाहती थी। पर उनकी सीट फुल थी। वेटिंग लिस्ट में रहना पड़ता इसलिए सर के अंडर ही ले लिया। सोचा जल्दी काम शुरू हो जाए तो ख़त्म भी जल्द होगा। वरना पीएचडी में लोगों को सालों साल जमें, सुना क्या .... देखा भी है। … एक है विद्यार्थी है केतकी शर्मा। सात साल हो गए उसे यूनिवर्सिटी में। अब भी कहती है दो-एक साल और लगेंगे। मुझे इतने दिन यहाँ नहीं रहना। ... एक ही काम में फँस कर नहीं रह सकती मैं ... कुछ नया आकर्षण भी बना ही रहता है।” 

“तो और क्या करना चाहोगी? क्या करना चाहती हो!!” देविका ने पूछा। 

“तुम्हारी तरह कहीं न कहीं जॉब ... और क्या? ... तुमने क्या किया? मेरा मतलब पढ़ाई? कोई डिप्लोमा कोर्स? क्या इसी यूनिवर्सिटी से?” मयूरी जिज्ञासावश पूछती चली गई। 

“यहाँ मुंबई में तो मैं जॉब कर रही हूँ। सर से मिलने यहाँ यूनिवर्सिटी में आती रहती हूँ। अपनी पढ़ाई मैंने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से की। वहीं कॉलेज में बीएड किया। एम.ए. किया। पीएचडी जॉइन कर तीन साल होते होते ... (एक बड़ा सा पॉज दे गहरी साँस छोड़) अधूरा छोड़ दिया। फिर जॉब ढूँढी। मिलते ही यहाँ आ गई। जॉब में सब ठीक ठाक रहा। तब से अब यहीं हूँ।” देविका पीएचडी के बारे में कहते कुछ उदास हुईं। उदासी की रेखा थी उसके चेहरे पर। मयूरी ने गहराई जाँची। पूछना सही भी होगा ... या सोचते ... न सोचते ही वाक्य जुबान से निकल पड़े। 

“क्यूँ!... पीएचडी क्यों अधूरी!.... किसलिए? ... क्या ख़ास कोई ... घरेलू प्रॉब्लेम...?... ये औरतों के साथ होता रहता है। सीमा है ना! पिछले साल उसका भी यही हश्र हुआ। तीन अध्याय कर चुकी थी। पर शादी तय हो गई। बोली शादी के बाद कर लूँगी। पर ना ... । भरा पूरा परिवार। अपने लिए समय निकालना मुश्किल। नहीं कर पाई। छोड़ दी। उससे अच्छी तो ... याशिका निकली। जॉब कर रही है। शादी भी कर चुकी। अब थीसिस सबमिट करने वाली है। कभी-कभी लगता है सब अपने ऊपर है। कोई झेल पाता है कोई नहीं।” मयूरी कहती चली गई जिसे देविका की ठंडी लंबी साँस ने आकर्षित किया। मयूरी एकाएक चुप होती हुईं देविका का ख़ामोश चेहरा टोहने लगी। 

“सही कहा तुमने ... कोई झेल पाता है कोई नहीं। बस आत्म-सम्मान ज़िंदा रहे। उसके बिना चलना ज़िंदा मौत है। झेलना तो अपनी ख़ुद की ईमानदार तैयारी पर निर्भर है। रुकावटें कहाँ नहीं आती। व्यक्ति पार पाने की कम से कम कोशिश तो करे। समय अपने आप सामने-सामने रास्ता बताता चलता है। हाँ, ... हमें आँख खुली रखना ज़रूरी है।” 

“इतनी ज्ञानवर्धक बातें करती हो ... फिर तुम क्यों नहीं कर पाई अपनी पीएचडी पूरी?”

“कर नहीं पाई नहीं, .... छोड़ दी। ... नहीं करना था। ... तो छोड़ना उचित था। वो मेरा अपना फैसला था।” 

“क्यों छोड़ना उचित लगा? ... वही तो पूछ रही हूँ। ... बिना हर्ट हुए बता सकती हो!! तो बताओ ... वरना रहने दो। यार! जो बातें दुख दें उसे ना ही दोहराएँ तो अच्छा है।” 

“बताती हूँ ... ” देविका ने ख़ामोश लहजे में कहा। 

“क्या घर से परेशानी थी? अब तो तुम यहाँ मुंबई में अकेली हो यहाँ अपनी पीएचडी पूरी कर सकती हो ना!!” मयूरी ने उसे एक बेहतर सोच की ओर संकेत दिया। 

“बात तो तुम सही कह रही हो। ... पर अब मन नहीं। उस बारे में सोचते ही स्वाद कड़वा हो जाता है। अच्छा एक बात बताओ ...! तुम्हारे गुरुजी कैसे हैं? जिनके अंडर तुम अपना शोध कार्य कर रही हो?” 

“अच्छे हैं। हमें विषयानुसार सारी जानकारी उपलब्ध करने और कराने की संभावना तलाशने में मदद करते है। तरीके सुझाते हैं। पहले पुस्तकें पढ़ने की फेहरिस्त दी। फिर आगे की चेतावनियाँ। सलाह। मार्गदर्शन सभी महत्वपूर्ण, देते हैं।” 

“क्या प्रोफेसर्स कुछ अन्य कार्य भी करने के लिए कहते है? 

“कहते हैं ना। संगोष्ठी में केवल उपस्थित ही नहीं रहना है। ध्यान से सुनो, गुनो भी। सहभागी बनो। कुछ पेपरवर्क। लेख लिखना। लिखे हुए की वर्ड और पीडीएफ़ फ़ाइल बनाना। नई आती पुस्तकों से जुड़ना। मेम तो ... सेमीनार अटेंड ना करो तो पूछ बैठती हैं! ... कहाँ थी? क्यों नहीं आई? आया करो? बैठा करो। कुछ प्रश्न पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, मस्तिष्क में कुछ चीज़े अपने आप साफ़ हो जाएगी। सभी प्रोफेसर विद्यार्थियों से अच्छे से बात करते हैं। सभी के मार्गदर्शन के अपने-अपने अलग तरीके होते हैं। अमूमन सेमीनार में वो विद्यार्थी जो साहित्य से जुड़े हैं, वे रुचि लेते हैं। बाकी जो अपनी जॉब के लिए आते हैं उनका ध्यान नेट, सेट, बीएड पर ज्यादा रहता है। मुझे सेमीनार में रुचि है तो हमेशा ही जाती रही। सुनती रही हूँ। तुम भी आया करो ना ... इस बहाने मिलना भी होता रहेगा।” ख़ामोश सुनती रही देविका ... कोई जवाब दिए बिना, फिर कहा। 

“नहीं अब इन सब में रुचि नहीं रह गई ... यूँ कहो मन उखड़ गया। सेमीनार, कॉलेज यह सब पुरानी याद दिला देते हैं। मन उदास हो जाता है। चार साल हो चुके मुझे पीएचडी छोड़े हुए ... लेकिन अब भी ज़ख्म हरा है। साथ-साथ उस सभी विद्यार्थियों के लिए भी बुरा लगता है जिन्होंने परेशानियाँ भुगती या भुगतने पर मजबूर होते हैं।” इतना कहकर देविका चुप सी हो गई। 

“क्या हुआ था ...?” मयूरी ने देविका का हाथ अपने हाथ में लेकर आहिस्ते से पूछा। देविका ध्यानमग्न थी। मन ही मन वाक्यांशों और शब्दों को तोलती हुईं ... कहने लगी। 

“मैं किसी की बुराई नहीं करना चाहती ... पर कहे बिना रहा भी नहीं जाता। मेरी शोध निर्देशक ... एक लेडी प्रोफेसर थी। ‘थोड़ी गुस्सैल है’ मैं सुना करती थी। पहले साल मुझे कई विद्यार्थियों ने कुछ ऊपरी तौर पर बातें बताई। मुझे विश्वास नहीं हुआ। धीरे-धीरे मेरा और उनका सामना होने लगा। जैसे-जैसे मैं मेरे शोध कार्य के अध्याय पूरा करने लगी। मेम को दिखाने जाती थी। मेम कभी-कभी चैक ही नहीं करती। कभी चैक करने में देर लगाती। टालमटोल करती। कभी लिखे पन्नों को उठाकर सरसरी निगाह डाल ज़मीन पर फेंक देती। नोट्स देने के लिए कॉलेज के बदले घर बुलाती। एक दो बार मैं घर गई तो देखा और भी लड़कियाँ जो उनकी शोध विद्यार्थी है वहाँ पहले से ही मौजूद हैं। कुछ लड़कियाँ नोट्स लेने में व्यस्त थीं। अक्सर कोई कुछ ना कुछ काम करता दिखाई देता। कोई सब्जी ले आता। कोई सिलेंडर। कोई टेलीफोन बिल भर देता। लड़कियाँ उनके ओहदेदार सम्मान की खातिर चुप रहती। कुछ अपने पीएचडी ना रुक जाए इस डर से उनके आगे-पीछे करते रहते। ये उनका विद्यार्थियों से डील करने का तरीका था! या अपमान करने का! या ज़लील करना रहा हो मंसूबा कहा नहीं जा सकता। किसी भी अतिरिक्त सहायता के लिए वे विद्यार्थियों का सहारा लेती। विद्यार्थी कर भी देते। अमूमन कोई बुरा नहीं मानता। सभी डर कर मेम का सम्मान करते और अपने पढ़ाई को जल्द से जल्द पूरा करने के चक्कर में ऐसी बातों को छोटा समझते। मैंने उनके घर आने से मना किया। वे घर बुलाती। मैं मना कर देती। ये बात उनके भीतर मेरे लिए चिढ़ पैदा करती रही हो ... मैं नहीं जानती। मैं अपनी शोध निर्देशिका से महाविद्यालय के प्रांगण में मिलना चाहती ताकि अपने कार्य दिखा सकूँ। अक्सर वे व्यस्त होती। जब कार्य समाप्त होता वे घर चली जाती। यह कहकर कि ‘कल देख लेंगी’। मेरे कई बार कोशिश करने पर कहती, ‘मेरे घर आ जाओ’। तीन से चार महीने गुजर गए। मैं अपनी पीएचडी जल्द से जल्द पूरा करना चाहती थी। पर इस वजह से काम आगे नहीं बढ़ रहा था। आखिर मैंने मजबूर होकर उनके घर ही जाने का फैसला किया। 

“अच्छा .... ” मयूरी ने आश्चर्य युक्त फैली आँखों से देखा। 

“मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मेरी थीसिस डिले होती जा रही थी। कुछ दिन और इंतजार भी किया। शायद काम बन जाए पर मैं विफल रही। एक दिन उनसे फोन पर समय तय कर मैं उनके घर पहुँची। कोई विद्यार्थी नहीं था। मैं अकेली थी। मैंने अपने कुछ अध्याय जो लिख लिए थे उनके सामने रख दिए। वे पन्ने पलटाकर देखने लगी। मैं उनके सामने बैठी रही। कुछ पन्ने पलटकर देखने के बाद उन्होंने पूछा “पानी पियोगी?” मेरे उत्तर देने के पहले ही मुझसे अपने और मेरे लिए पानी ले आने कहा। मैं उनके किचन जाकर पानी ले आई। उन्होंने कुछ अध्याय देखे कुछ और अतिरिक्त कार्य करने की सलाह दी। कुछ पुस्तकों के नाम सुझाए और उपलब्ध करा देने की बात भी कही। और दूसरे दिन फिर घर आने के लिए कहा। मैं दूसरे दिन नहीं जा पाई। कुछ दिनों बाद अपने कार्य को विस्तार दे उनसे आज्ञा लेकर ही उनके घर गई। वे बहुत गुस्से में लगी जैसे मैं उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रही हूँ। पहले तो वे नाराज हुईं। मुझे मेरे ‘पीएचडी की परवाह नहीं’ कहा। फिर कहा ‘आज मूड नहीं हो रहा है पर जब तुम आ ही गई हो तो देख लेती हूँ’ और वे देखने लगी। मेम नाश्ता कर रहीं थीं तो मुझे भी नाश्ते के लिए पूछा। मैंने मना कर दिया। तो मेरे लिए चाय उनकी मेड आकर रख गई। वे नाश्ता करते-करते भी चैक करती रही। मेड उनसे, जाने के लिए कहकर चली गई। नाश्ता कर लेने के बाद उन्होंने मुझे नाश्ते की प्लेट उठाकर रखने को कहा। मैं रख आई। वे कहने लगी ‘तुम्हारा कुछ ही काम बचा है बहुत जल्द ही तुम थीसिस सबमिट कर दोगी। लगकर करो’, मैं खुश हुईं। धन्यवाद कहा और कुछ कॉलेज से जुड़ी बातें करने के बाद जाने की आज्ञा चाही। मेम ने कुछ सोचते हुए मेरी ओर देखा और कहा, “देविका एक काम था तुमसे”। मैंने तुरंत कहा, ‘कहिए मेम’। उन्होंने कहा ‘मेरी मेड चली गई है। जाने कब आएगी। बर्तन साफ कर दो और चूल्हा भी साफ कर देना’। मैं मेम को देखती रह गई। वो मुझे देखकर बोली ‘देख क्या रही हो, किचन जाकर जल्दी से काम निपटा दो। तब तक मैं तुम्हारे अध्यायों में कुछ अतिरिक्त शीर्षक जोड़ देती हूँ जिसमें तुम्हें लिखना होगा’। और वे बिना मेरी सहमति जाने पन्नों पर नजरें गढ़ा कर देखने लगी। मैं समझ नहीं पा रही थी क्या करूँ? क्या नहीं करूँ ... काम करूँ? या .... । 

“फिर ....!!! ” मयूरी अचंभित उसे देखने लगी। 

“मैंने उनके हाथ के नीचे से अपने शोध प्रबंध की हस्तलिखित फ़ाइल निकाली। उसने बीच में पकड़ ली और घूर कर देखा। बोला ‘फ़ाइल क्यों ले रही हो?’, तुम जानती नहीं हो तुम क्या करने जा रही हो!!” मैंने कहा ‘जानती हूँ मेम मैं क्या करने जा रही हूँ। अब इस फ़ाइल देखने और चैक करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। आपने अपनी हद सामने रख दी। अपनी हद मुकर्रर करना मेरा अपना फैसला होगा। उन्होंने पीएचडी अटकाने की धमकी दी। फिर कहा ‘दूसरे निर्देशक के पास जाओगी तो भी मैं तुम्हें देख लूँगी’। मेरा साफ जवाब था, ‘आप अपना काम कीजिए मेम। मैं अपना कर रही हूँ।’ मैंने फ़ाइल और पेपर्स लिए, अपना समान उठाया और उनके घर से निकल गई।” सूनी निगाहों से देविका खुले दरवाजे को देखने लगी। भीगते पेड़, तरबतर घास, कीचड़ बनी मिट्टी, तेज बौछारों वाली हवा दिखाई दे रहे थे जिन्होंने मयूरी और देविका को साथ मिलने बैठने बतियाने का मौका दिया था। 

“छोड़ो ना उन बातों को ... देविका तुम इस यूनिवर्सिटी से पीएचडी की कोशिश क्यों नहीं करती?” 

“कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं होती मयूरी .... मैंने अपनी जॉब द्वारा उन ख़्वाबों को रंगीन कर लिया है।” 

धीरे-धीरे कम होती बारिश में दोनों ने कैंटीन जाकर साथ चाय समोसा खाया और घर के लिए निकल पड़ीं। 
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