'विश्व कविता समारोह' का पुरस्कार वापसी से कोई संबंध नहीं है — अशोक वाजपेयी


इस आयोजन का पुरस्कार-वापसी से कोई संबंध नहीं है। वापसी विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों का एक स्वतःस्फूर्त अभियान था जिसका न कोई नेता था न उत्प्रेरक।




विश्व कविता समारोह

— अशोक वाजपेयी


भारत में विश्व कविता का अनुभव अधिक जीवन्त और व्यापक हो और भारतीय कविता की विश्व कविता में जगह बने इस उद्देश्य से प्रेरित विश्व कविता समारोह कराने का मेरा अभियान और अनुभव जब लगभग तीस वर्ष के हैं: मेरे कवि-जीवन के आधे । भारत भवन में ‘कविभारती’ और ‘एशियाई कविता समारोह’ आयोजित करने के बाद नेहरूशती के अवसर पर 1989 में जो विश्व कविता समारोह आयोजित किया था वह अब तक का सबसे बड़ा ऐसा समारोह भारत में रहा है। सप्ताह भर के आयोजन में जितने बड़े कवि उस समारोह में आये किसी और समारोह में उसके पहले या बाद कभी नहीं एकत्र हुए। 1989 में ही राजकमल प्रकाशन से ‘पुनर्वसु’ विश्व कविता संचयन छपा था जिसमें विदेशी और भारतीय कवियों की कविताओं के हिन्दी अनुवाद संग्रहीत हैं। उसकी पहली आवृत्ति 2007 में हुई। अनुवादकों में कुंवर नारायण, कृष्ण बलदेव वैद, रमेशच्रदं शाह, विष्णु खरे, चन्द्रकान्त देवताले, गिरधर राठी, प्रयाग शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी, गगन गिल, मदन सोनी आदि शामिल थे।



1992 में दिल्ली आने के बाद कोशिश करता रहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर-150 के लिए गठित राष्ट्रीय समिति ने विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव मान लिया जिसे तब ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में मैंने प्रस्तावित किया था। करना साहित्य अकादेमी को था जिसे पर्याप्त वित्तीय प्रावधान नहीं मिल पाया। रवीन्द्रनाथ को नोबेल पुरस्कार मिलने की शताब्दी होने पर मैं रज़ा फ़ाउण्डेशन के प्रबन्ध-न्यासी के रूप में तबके प्रधानमंत्री से मिला और उन्होंने विश्व कविता समारोह के आयोजन का प्रस्ताव और उसके लिए दो करोड़ रुपये से अधिक की राशि अनुमोदित भी कर दी। फाउण्डेशन की सहमति से ज़िम्मा साहित्य अकादेमी को सौंपा गया जिसने ऐसा समारोह फ़ाउण्डेशन के साथ मिलकर करने को अपनी स्वायत्तता से बेमेल बताया: फ़ाउण्डेशन समारोह के आयोजन से अलग हो गया। इस अनैतिकता के बाद अकादेमी ने आयोजन-समिति के छः सदस्यों को समारोह में कवि के रूप में शामिल होने का निर्णय किया। उसमें मेरा नाम भी था- मैंने इनकार किया और बाकी को शामिल करने की अनैतिकता पर आपत्ति भी की। बहरहाल, समारोह 2014 में हो गया: अधिकांश मीडिया ने उसका नोटिस तक नहीं लिया। उसी अकादेमी ने हाल ही में अपना हिन्दी दिवस ज़ी एण्टरट्नमेण्ड एण्टरप्राइजेज के साथ मिलकर मनाया और उसके मालिक को चर्चित विद्वान् के रूप में आमंत्रित कर अपनी स्वायत्तता का अभूतपूर्व इज़हार कर दिया है जिस पर कोई हाहाकार नहीं मचा ।

बिहार, हिन्दी अंचल में, साहित्य पढ़ने-सराहनेवाला सबसे बड़ा राज्य है। वहाँ दशकों से मित्रों, ग़ैरसरकारी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों आदि ने न्यौते पर आता रहा हूँ। 3 वर्ष पहले बिहार सरकार के भारतीय कविता समारोह में गया और उसके उद्घाटन सत्र में मैंने तबके मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार से सार्वजनिक आग्रह किया कि वे इस समारोह को वार्षिक आयोजन कर दें। उन्होंने तुरन्त ही इसे मान लिया। तभी विश्व कविता समारोह का सुझाव भी दिया। अगले भारतीय कविता समारोह में दूसरे सज्जन मुख्यमंत्री थे: विश्व कविता समारोह की बात तब भी हुई। अब यह समारोह करने की ठोस कार्रवाई चल निकली है।

इस आयोजन का पुरस्कार-वापसी से कोई संबंध नहीं है। वापसी विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों का एक स्वतःस्फूर्त अभियान था जिसका न कोई नेता था न उत्प्रेरक। दिल्ली में यथासमय विश्व कविता समारोह करने के लिए रज़ा फ़ाउण्डेशन ने अपने साधनों से वित्तीय प्रावधान कर रखा है: उसकी स्थायी नीति अब केन्द्र या राज्य सरकारें से कोई वित्तीय सहायता न लेने की है।
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