बाबू ! अब और क्या ? — प्रत्यक्षा #YeJoDil #येजोदिल


प्रत्यक्षा को मैंने बहुत देर में पढ़ा लेकिन जब पढ़ा तो ऊपर वाले को शुक्रिया ज़रूर कहा. प्रत्यक्षा की कहानियां सूफी कव्वाली की तरह भीतर उतरती जाती हैं, और शब्द तो ऐसे खूबसूरती से प्रगट होते हैं कि लगता है मानो ये शब्द अभी पहली दफा पढ़ा हो. 

'ये जो दिल है दर्द है कि दवा है' ... हुआ ऐसे कि प्रत्यक्षा से बात होते- होते यह निकली, कि एक पूरा संग्रह है अलग रंग की कहानियों का ... अप्रकाशित. मैंने पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर की... पढ़ना शुरू किया और आधी कहानी पर रुक - प्रत्यक्षा को फ़ोन पर बधाई दी ... दरअसल वह चंद पंक्तियां है ही इतनी खूबसूरत कि कहानीकार की रचना-मातृत्व क्षमता बिलकुल सामने आ कर खड़ी हो जाती है. आपमें से जिन्होंने इनके लेखन को पढ़ा होगा वह मेरी इस बाद की तस्दीक करेंगे ... देखिये क्या लाइन है - 

रसूल कान पर फँसाई बीड़ी एहतियात से निकालते, सुलगाते और हथेली की ओट में भरके सुट्टा खींचते । सारा दिन दोपहर होता । सुबह फट से दोपहर हो जाती और साँझ जाने कब आता नहीं कि रात हो जाती । 

ऐसे होते थे दिन जब हाथपँखा हौंकते चित्त लेटे जाने क्या सोचते दिन निकलता । एक दिन के बाद दूसरा फिर तीसरा फिर जाने और कितना । सब दिन एक दूसरे में गड्डमड्ड् सब एक जैसे कि तफसील से कोई पूछे कि फलाँ दिन क्या तो खूब खूब सोचना पड़े कि अच्छा ? 

...और प्रत्यक्षा से कहा कि इन्हें शब्दांकन पर प्रकाशित करना है, बड़े दिल वाली रचनाकार हैं प्रत्यक्षा , हाँ कह दी उन्होंने.... उनका बहुत शुक्रिया. अब आप सब से निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें ताकि हौसले बने रहें और सिरीज़ चलती रहे ... ... ...

भरत तिवारी
संपादक




बाबू ! अब और क्या ? — प्रत्यक्षा


बाबू ! अब और क्या ? 

— प्रत्यक्षा

सिरीज़ 'ये जो दिल है दर्द है कि दवा है' की पहली कहानी 


हुस्नआरा का हुस्न देखने लायक था । रसूल यों ही नहीं जाँनिसार हुये जाते थे । हुक्का गुड़गुड़ाते अपनी नमाज़ी टोपी सिरहाने सहेजते मिची आँखों से नीम के पत्तों का सहन में गिरना देखते । लम्बी दोपहरी होती, बहुत बहुत लम्बी । इतनी कि साँझ का इंतज़ार करना पड़ता । इतनी कि ऊब छतों की बल्लियों से चमगादड़ जैसी उलटी लटकती पूछती, बाबू अब और क्या ?

लम्बी और ऊब उकताहट भरी दोपहरी जिसका एक एक लमहा इतना खिंचता कि एक साँस फिर दूसरी गिननी पड़ती । वक्त जब बीतता तब न बीतता हुआ दिखता और बीत जाने के बाद एक अजब से स्वाद के साथ वापस आता ।

रसूल कहते, उन दिनों की बात है जब दिन लम्बे हुआ करते थे, खूब लम्बे, भूतिया कहानी वाले लम्बे हाथ की तरह लम्बे हुस्नआरा तिनक कर कहतीं  …, तुम्हारी बात जितनी लम्बी ? हाथी के पूँछ जितनी लम्बी ? या फूलगेंदवा के हनुमान जी की पूँछ जैसी ?

रसूल अपनी दाढ़ी खुजाते हँस पड़ते । पर होता था एक वक्त दिन ऐसा । कूँये के पास वाली मिट्टी में पुदीना हरहरा कर उगता। मेंहदी की झाड़ के साये में गौरेया फुदकती, लोटे की टपकती टोंटी से चोंच सटाये दो बून्द पानी तर गला करती...ऐसी लम्बी बेकाम की दोपहरी ।

छत पर चढ़े कोंहड़े के बेल से सुगन्ध फूटती, नम मिट्टी के गंध से घुलती धीमे से दीवार के साये सुस्ताती बैठ जाती । पिछले बरामदे से सिलाई मशीन की आवाज़ गड़गड़ निकलती रुकती फिर शुरु होती । हुस्नआरा के पैर मशीन की भाती पर एक लय में चलते । कपड़ों की कतरन, धागे का बंडल, तरह तरह के बॉबिन और सूई, गट्ठर के गटठर । इसी सबके के बीच चूल्हे पर अदहन खदबदाता, सूप में चावल और राहड़ की दाल चुन कर रखी होती ।

रसूल कान पर फँसाई बीड़ी एहतियात से निकालते, सुलगाते और हथेली की ओट में भरके सुट्टा खींचते । सारा दिन दोपहर होता । सुबह फट से दोपहर हो जाती और साँझ जाने कब आता नहीं कि रात हो जाती ।



ऐसे होते थे दिन जब हाथपँखा हौंकते चित्त लेटे जाने क्या सोचते दिन निकलता । एक दिन के बाद दूसरा फिर तीसरा फिर जाने और कितना । सब दिन एक दूसरे में गड्डमड्ड् सब एक जैसे कि तफसील से कोई पूछे कि फलाँ दिन क्या तो खूब खूब सोचना पड़े कि अच्छा ? उँगली पर जोड़ें और कहें अच्छा अच्छा उस दिन जब प्याज़ लाल मिर्चा का कबूतरी खाके ऐसा झाँस पड़ा था कि खाँसते खाँसते बेदम हो गये थे ?

मुड़ के देखो तो मालूम पड़े कि एक कतार से सब दिन जाने कितने साल में बदल गये । मटियामेट कर देने वाली उदासी छाती में गहरे धँस गई है । कैसा हौल समा गया है कि चलते भी हैं तो लगता है उलटा चलें और पाँव के निशान बुहारते चलें ।

बाहर गली में आटा चक्की के मशीन की फटफट फटफट फटफट गूँजती है, मोटी बेसुरी और बेहया । जबसे रसूल का हाथ कटा है हुस्नआरा सिलाई करती है । रसूल खटिया पर लेटे देखते हैं और खूब सोचते हैं । जीवन के मायने और मौत के भी । फिर सोचते हैं यहीं है सब जन्नत भी और दोज़ख भी । फिर सोचते हैं उन दिनों के बारे जो कितने लम्बे होते थे । कितनी ज़िंदगी थी तब । दिन जैसी ही लम्बी । आँख के सामने धुँधलका छा जाता है ।

सहन में अरअरा कर नीम की पत्ती गिर रही है । हुस्नआरा के चेचक भरे चेहरे पर पसीने की धार है । टूटे कमानी के मोटे चश्मे से भी अब इतना नहीं दिखता कि धागा पिरोया जा सके । हताश सर दीवार से टिकाये चुप बैठ जाती है । अब नहीं होता, अब नहीं ।

चुप्पी दबे पाँव आती है फिर ढीठ बच्चे सी फैल जाती है । कितने दिन बीतते हैं जब दीवारों से कोई आवाज़ नहीं टकराती । रसूल चौंक कर देखते हैं किस बात पर जाँनिसार हुये थे ? जाना था इस औरत को ? और उसने मुझे ? किस ज़माने की बात है । कोई और रहा होगा, कोई और समय, कोई और भूगोल । मैं नहीं, मैं नहीं, मैं नहीं ..

मुड़ कर देखते हैं चारों ओर हैरत से, बेगानेपन से । काँपते घुटनो को थामे अचानक उठ खडे होते हैं फिर डगमग बाहर । हुस्नआरा एक बार चौंक कर देखती है, फिर मशीन के पास ही सिमट कर ढुलक जाती है ।

समय की फितरत ऐसी ही होती है, बेवफा !

००००००००००००००००

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1 टिप्पणियाँ

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल सोमवार (26-09-2016) के चर्चा मंच "मिटा देंगे पल भर में भूगोल सारा" (चर्चा अंक-2477) पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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