काश! कोई सरकार कर देती आदेश प्रेम की गलियों के चौड़ीकरण का — प्रतिभा चौहान की कविताएँ



प्रतिभा चौहान की कविताएँ

Poems : Pratibha Chauhan


युवा न्यायाधीश प्रतिभा चौहान की कविताओं में ताजगी है। व्यवस्था की कमियों को पास से देखने के बाद हुए अनुभवों को कवि की नज़र से देखने की क्षमता रखने वाली प्रतिभा चौहान की कविताओं का प्रेम से परहेज न रखना सुखद है । 10 जुलाई को हैदराबाद में जन्मीं प्रतिभा एल एल बी व इतिहास में परास्नातक हैं। उनके लेख और कवितायेँ विभिन्न अख़बारों, पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।

संप्रति- न्यायाधीश, बिहार न्यायिक सेवा
ईमेल: cjpratibha.singh@gmail.com



कविता ...... 1

तुम्हारा गंभीर समय पर चुप्पी लगा जाना
समय की आपदा है
आपदा है मानवीय सभ्यता की
आपदा है संसार की
शायद साकार निराकार के बीच
पतली सी नस में बहता संसार है ये
शायद अनेक मंगल मस्तिष्क और हृदय के मध्य
किसी निलय के बीच तैर रहे होंगे
काश! कोई सरकार कर देती आदेश
प्रेम की गलियों के चौड़ीकरण का
क्योंकि, वह इस गली में बह रही संभावना है
औरतें सदियों से इन गलियों की बासिंदा
शायद,
रेंगती स्मृतियाँ हमारे ऊपर आच्छादित गुलाल हैं
या
भावनाओं का ब्लैक ट्यूलिप है
शायद
यही हमारे समय की क्विलटिंग है !



कविता ...... 2

मैं हारा हुआ वक्त नहीं
जो ठहर सा जाऊँ
मैं गिरा हुआ राह का पत्थर भी नहीं
जो ठुकराया जाऊँ
मैं उस पड़ाव की उम्र हूँ
जो देख रहा है
जीवन की कठोर सच्चाई को
आना -जाना
जीवन का रिसता हुआ अर्क हूँ
इूब रहे हैं
हम सब अपने वज़ूद की अन्तर्चेतना में....
चश्मे के नुक्कड़ पे उगा दरख़्त सा
झूलता हुआ ,अडिग
सदियों से
मैं न ताप हूँ ,
न वेसुध शीत
मैं उम्र के हर पड़ाव के हर शख्स की नव्ज़
जवान स्वप्न हूँ
मैं प्रेम हूँ।



कविता ...... 3

भरी दोपहरी में
भूखे पेट का पहला निवाला है
तुम्हारा जोश
ताकत भरता हुआ
अदम्य साहस भरा
धागे पर चलता नट का खेल है
समु्द्र की नीली गहराई में सिकुड़न भरा ठंडा लेप है
धूल की ढेरी में
दुबका पड़ा अनाज का बीज है
अब वक्त है
तुम्हारे समुद्र से खामोश सीपियों को चुराने का
हे आकाश ! चुप ना रहो
हे धरती ! मत सहो
हजार हजार अपराधों का बोझ
हे नदी ! मत बहो सीमाओं में
तोड़ दो सारी चुप्पियाँ
वक्त के खिलाफ
दो सजा इतिहास के अपराधियों को
निरन्तर , आजीवन
जव तक धरा का बोझ हल्का न हो जाये
जब तक हमारी बगिया के फूलों का रंग श्वेत ना हो जाये ।



कविता ...... 4

सोना चाहती हूँ बहुत
ताकि ख्वाब पूरे हो जायें
पर मेरी निश्चिन्तता की तकिया कहीं खो गयी है
माँ ने बताया
जन्म के वक्त बनाये गये थे वे तकिये
जिनका उधेड़ना बुना जाना नीले आकाश में होता है
और सहेजकर रखना सबसे नायाब हुनर
आजकल बुनने में लगी हूँ अपने सपने
और सहेजने की कोशिश में अपना तकिया
हे नीले आकाश
प्रार्थना है
मुझे सलीका दो बेमानी का
चुरा लूँ थोड़ा वक्त – वक्त से
मुझे तब तक सुकूँ का तकिया मत देना
जब तक मेरी चिन्ता हद से पार न हो जाये
तुम्हारी नाराजगी मेरी कोहनी में लगी चोट है
झटके में सिहर जाता है वजूद
मेरे मस्तिष्क ने खड़े किये हैं बाँध
रूक जाते हैं ख्वाब बहने से
अब तुम ही कहो
किस ताराह होता है आदमी निश्चिंत
तुम मेरे प्रेम की तरफ मत देखो
वह तो इस ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी बेचैनी है
तुम मत ताको - मेरे त्याग की ओर
वह तो स्वयं के सुकून पर छुरी है
तुम मत ललचाओ - मेरे समर्पण पर
वह तो मेरा दूसरों के लिये दान है
तुम मत खोलो - मेरे विश्वास के पिटारे को
मैंने तो उसमें अपनी आँखें बन्द कीं हैं
माँ
तुम सच नहीं कहतीं हो
उनके लिये निश्चिन्तता के तकिये नहीं बनाये जाते
जिनमें होती है मानवीय संवेदनाओं की पराकाष्ठा ।



कविता ...... 5

रिफ्रेश जिरॉक्स है तुम्हारी मुस्कुराहट
काँच के कोरों सी चमकीली
ओस की बूँदों सी शीतल
सूनी दास्तानों में जल रहे हैं
सूखे जंगल वादों के
कब तक नहीं आओगे
बता दो पगडंडी की हरियाली को
जो चाँद की करवटें
घने जंगलों की नम कहानियाँ
जो अब सूखी हो चली हैं
शायद अपने गुनाहों का कोट
उतार दिया होगा तुमने अब तक
ताजी बारहसिंही दुनिया के लिये
श्वेत फुहारों के चित्र
रंगीन हो रहे हैं जंगलों की काई से
यकीनन तुमहारे आने का खुशनुमा संकेत है ।



कविता ...... 6

राष्ट्र की कोख में
तुम्हारा वर्तमान शब्द
आने वाले इतिहास का नया कल है
गूँज है सदियों की
प्रकृति का विस्तार है
आक्रोश है धरा के वीरों का
इस ब्रह्माण्ड की तलहटी से निकली
तुम्हारे शब्दों की आवाज
सदी की सबलिमिटी है ।



कविता ...... 7

तुम्हारी धड़कनों की
हर लफ़्ज की पहली
और आखिरी कहानी हूँ मैं,

नींद में घुले चेहरे सी
कोई तस्वीर उभर आए हर पन्ने पर
इस तरह मुझे तुम्हारी
जिंदगी की किताब बनने की चाहत है....

समय रेत बन कर
मुट्ठियों से फिसल जाएगा
पर, इस खुले आकाश में
सितारों की आंखों में हमेशा ,
रहे हमारी ही कहानी,
जो शुरु होकर कभी खत्म न हो
ऐसा ख्वाब बनने की चाहत है,

खूबसूरत परछाइयां यादों से बनाती हैं
अरमानों के महल
चमकती आंखों ने देखा है
कोई सपना ….

तुम कहते हो मैं सुनती हूं
तुम गुजरते हो मैं चलती हूं
तुम हंसते हो मैं जीती हूं ,

हमारे रिश्ते की रूबाइयों की
संगीत की धुन
गुनगुना रहा है सारा आसमान
अब,
हमारे सुकून के दरिया से
अब इस समुंदर का दायरा भी कम है ।



कविता ...... 8

मन की किताबें पढ़ती हूँ
सन्नाटे में,
खुरची सूखी स्याही में
मिलाती हूँ उम्मीद की बूँदें
बूँद रिसता है जख्म
यादें
मरहम को भरने
समुद्र की लहरें लिपट जातीं है
साँसों की हिचकियों से
बर्दाशत से बाहर है
रोशनी की चाबुक
लहुलुहान है अंधेरे की चौखट
थम जाने दो
उफान पर है नदी
बह जाने दो रेत का महल
न कदमों की आहट से बनते दिल की झीलों में छल्ले
न होती हवाओं में हलचल
दिल पर पत्थर की सिलों पर
सलवटें पड़ गई बरसों से
पलकों से करती टुकडे़ टुकडे.
न मिटती हकीकत
न पलकों में बूँदें ही गिरेंगी
ग्लेशियर सी
न मुझमें है अब पिघलने की चाहत...
रोज़ ग्लेशियर पिघल रहा है
रोज़ देख रही हूँ ......



कविता ...... 9

धरा का गीत
मेरे दायरे में
सूरज की रोशनी
मेरे दायरे में
चांद की शीतलता
मेरे दायरे में
शब्दों की ठिठोली
मेरे दायरे में
अथाह समंदर
मेरे दायरे में
लहलहाती किसानों की मेहनत
मेरे दायरे में रात दिन का होना....

उठाती हूँ कलम
तो रात सिमट जाती है स्याही सी, बोतल में
चाहती हूँ लिखना धरा के गीत
चिड़ियों की चहचहाहट
बादलों का भारी आँचल
समुंदर की परियों के रंग
कोंपलों के नृत्य
लहरों की झंकार
पर !
लिख जाता है
फूलों का जलना
पहाड़ों का गिरना
झरनों का जम जाना
पेड़ों का उखड़ना
दिलों की उबासी
मानवता की बिलबिलाती पीठ
और उन जख्मों से रिसता लहू
व्यथा-वेदना....
तुमने जरूर मिट्टी के लोंदों से
कुछ विनाश की पुतलियाँ तैयार की हैं
जो धरा की ग़ज़ल को शोकगीत में परिवर्तित करने की साजिश रच रही हैं ।



कविता ...... 10

इस देश के चेहरे में उदासी
नहीं भाती मुझे
वजू़द की विरासत बंद रहती है
तहखानों में जैसे कोई राजा अपना स्वर्ण बंद रखता है,

पेड़ों पर उगने दो पत्ते नए
गीत गुनगुनाने दो हमें
हमारे गीतों की झंकार से
उन की नींद में आएगी शिकन....

मेरी वज़ूद की मिट्टी कर्जदार है
मेरे देश की
अपनी परछाई की भी,

इन चमकती आंखो में
खुद को साबित करने का हौसला
नसों में दौड़ता करंट जैसा लहू

नई धूप के आगोश में
बनेंगे नए विचार
जिनकी तहों में लिखा हुआ हमारा प्रेम
रेत सा नहीं फिसलेगा,
हमारी विरासत की प्रार्थनाओं में विराजमान हैं
हमारे वर्तमान के संरक्षक
हमारे डाले गए बीज
प्रस्फुटित होने लगे हैं
धरा ला रही है बसंत
देखो
फिर से गौरव-अतीत लौट रहा है ।

००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

दिनेश कुमार शुक्ल की तीन कवितायें | Poems - Dinesh Kumar Shukla (hindi kavita sangrah)
सुंदर बदन सुख सदन श्याम को - मनमोहक - सूरदास का भजन / अश्विनी भिड़े-देशपांडे का गायन
हाशिम अंसारी — सियासत न करिए बरख़ुरदार | Hashim Ansari - Siyasat Na Kariye Barkhurdar
एक पराधीन राष्ट्र की सबसे बड़ी और आधुनिक चेतना राष्ट्रवाद ही होगी - प्रियंवद | Renaissance - Priyamvad
एक पेड़ की मौत: अलका सरावगी की हिंदी कहानी | 2025 पर्यावरण चेतना
विनोद कुमार शुक्ल, रॉयल्टी विवाद और लेखक-प्रकाशक संबंध ~ विनोद तिवारी
उपन्यास समीक्षा: नए कबीर की खोज में - डॉ. रमा | Hindi Novel Review NBT
कहानी: सन्नाटे की गंध - रूपा सिंह
माउथ ऑर्गन - नरेश सक्सेना (hindi kavita sangrah)
ये वो अपने वाला किताबों का मेला नहीं है — राजिन्दर अरोड़ा |  Vishwa Pustak Mela 2023 - Rajinder Arora