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धीरे-धीरे” की क्या परिभाषा है मोदीजी ? - अभिसार शर्मा

दिस॰ 11, 2016


भड़ास

Abhisar Sharma

Cartoonscape ? December 10, 2016 . The Hindu



जो देशभक्त 1 जनवरी के बाद प्रधानमंत्रीजी को घेरने की सोच रहे थे, वो अब अपनी सोच को “शौचालय” मे प्रवाहित कर दें। फ्लश कर दें। जो कहीं बेहतर और राष्ट्रवादी विकल्प है। 
मैं बेईमानी लिखना चाहता था… मगर फिर शिकायती टट्टू पीछे पड़ जाते… परेशान करने लगते… मुझे अनाप शनाप व्हाट्सएप्प ग्रुपों में डाल कर गाली देते। फ़ोन कर करके गरियाते। मुझे फिर पुलिस में शिकायत करनी पड़ती और FIR दर्ज करनी पड़ती। और पुलिस फिर कुछ नहीं करती। कैसे करे भाई? जब राहुल गाँधी के मामले में कुछ नहीं हुआ,  तो मेरे जैसे देशद्रोही पत्रकार की क्या औकात? आज दरअसल इस ब्लॉग में ज़रिये मैं दो मुद्दे उठाना चाहता हूँ। दोनों में कोई तार नहीं है। मगर कोई बात नहीं। बर्दाश्त कर लेना। आजकल माहौल में वैसे भी जो कुछ चल रहा है,  उसका कोई सिरपैर नहीं है। इसे महज भड़ास समझ लेना। मोदीजी ने शनिवार को कहा कि 50 दिन बाद हालात धीरे-धीरे सुधरने लगेंगे। भोली-भाली जनता मे किसी को आभास तक नहीं हुआ कि कुछ दिनों पहले मोदीजी ने कहा था कि,  भाइयों और बहनों मुझे सिर्फ 50 दिन दीजियेगा। पचास दिन की सीमा अब बढ़ गयी है। अब कहा जा रहा है कि पचास दिन ‘बाद’ हालात धीरे धीरे सामान्य होंगे। गज़ब सोच है। कायल हो गया हूँ मैं आपका मोदीजी। “धीरे-धीरे” की क्या परिभाषा है सर? धीरे-धीरे तो 50 और दिन हो सकते हैं,  और 6 महीने और भी। यानी कि मोदीजी ने बचने का रास्ता ढूंढ लिया है। बताइए,  ऐसी सोच किसी विपक्षी नेता की हो सकती है भला? क्यों राहुलजी? आप तो भूकंप लाते रह गए और मोदीजी ने तो धमाका कर दिया। केजरीवालजी,  सीखिए,  सियासत इसे कहते हैं। ऐसे होती है सियासत। मुद्दों और लक्ष्यों को कैसे बदला जाता है,  मोदीजी का कोई सानी नहीं। पहले काला धन और भ्रष्टाचार,  फिर डिजिटल,  फिर कैशलेस उसमें बीच बीच में सेना और राष्ट्रवादिता का तड़का। मतलब,  कमाल है शर्माजी!

यानी कि जो देशभक्त 1 जनवरी के बाद प्रधानमंत्रीजी को घेरने की सोच रहे थे,  वो अब अपनी सोच को “शौचालय” मे प्रवाहित कर दें। फ्लश कर दें। जो कहीं बेहतर और राष्ट्रवादी विकल्प है। सच तो ये है जनता में किसी को ये समझ नहीं आ रहा। कोई नहीं देख रहा कि सत्तापक्ष के नेता किस तरह से मुद्दे को हमेशा पलट रहे हैं, बदल रहे हैं और हम, यानी मासूम जनता अच्छे दिन की चरस में मस्त हैं। देश की जनता नहीं देख रही है कि खुद मोदीजी बार-बार अपनी राय बदलते हैं, कभी रुदाली, कभी हास्य का सहारा लेते हैं। और उस रुदाली के पीछे कोई ज़मीन नहीं होती। इंदिरा गाँधी के बाद देश के इतिहास में सबसे ताक़तवर प्रधानमंत्री इतना बेबस? कि उन्हें कोई लोकसभा में बोलने नहीं देता ? कि उन्हें इस बात का खौफ,  कि उन्हें कोई ख़त्म कर देगा ? कोई नहीं देख रहा कि प्रधानमंत्रीजी को कोई गलत जानकारी दे रहा है और वो उसे सार्वजनिक भी कर रहे हैं। मसलन उस भिखारी की मिसाल जिसके पास स्वाइप मशीन थी। जो सिर्फ एक विज्ञापन था। मगर प्रधानमंत्री ने उसे भी एक सार्वजनिक मंच से साझा कर दिया,  ये कहकर कि देश बदल रहा है... जनता के समक्ष मुद्दों को रखने की कोई गरिमा है कि नहीं? या सोशल मीडिया में जो चल रहा है, उसे अब सच के नाम पर ठेल दिया जाए ? कुछ दिनों पहले, मोदीजी ने एक और बात कही थी। वोह भी कुछ दिनों से व्हाट्सएप पे चल रहा लतीफा था। कि कांग्रेस ने अपनी हैसियत के हिसाब से 25 पैसे हटाये थे,  मगर मोदी ने 500 और 1000 के नोट का सफाया कर दिया। पूरी बहस और विचार को क्या दिशा दे रहे हैं मोदीजी? और क्या प्रेरणा दे रहे हैं आप अपने भक्तों को… जिनकी भाषा,  सोच,  आक्रामकता की अनगिनत मिसालें पिछले कुछ दिनों में हम देख चुके हैं । मेरी मानिए, आप भी सोशल मीडिया और व्हाट्सएप से कुछ दूर रहिये, मेरी तरह। मैं तो व्हाट्सएप पर आने वाली किसी भी तस्वीर को बगैर देखे डिलीट कर देता हूँ, मोदीजी। इसलिए इसका असर नहीं पड़ता मुझपर। आप भी ट्राई कीजिये। सब मोहमाया... और अगर ये सब भक्तों के लिए है, तो उनका ऐसा है कि आप जो भी कहेंगे, वो उसका अनुसरण करेंगे।

मंदबुद्धि भक्तों की छोडिये,  भक्त पत्रकार तो दो कदम आगे हैं। मैं आपके सामने एक पत्रकार जो प्रधानमंत्री कार्यालय कवर करते हैं, उनके विचार साझा करना चाहता हूँ। गौर कीजिये :

“पत्रकार का काम सरकार के अच्छे कामों को आगे बढ़ाना होता है। सरकार पर सवाल करना पुराने किस्म की वामपंथी सोच की पत्रकारिता है”

कसम से,  इसमें एक शब्द भी अतिशयोक्ति या झूठ नहीं है। दिक्कत ये है जब आपकी रोज़ी रोटी सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों पे चलने लगे,  तब आप भूल जाते हैं कि पत्रकार और जनसंपर्क विभाग में ज़मीन आसमान का फर्क है। जब ये बात उस शख़्स ने कही थी, तब मेरे ज़हन में दो बातें आई। पहला मोदी सरकार द्वारा कुछ पत्रकारों का ब्रेनवाश संपूर्ण है। इन्हें सरकार के किसी काम में कोई गलती दिखाई नहीं देती। दूसरा,  वो अपनी सोच की पत्रकारिता को ही अगर असल पत्रकारिता मानते हैं, तो ये जनता के साथ कितना बड़ा विश्वासघात है? क्योंकि सरकारें तो गलतियाँ करती है न ? अगर आप उसे जनता के समक्ष नहीं लायेंगे तो वो कितना बड़ा गुनाह है? मगर बकौल इन महानुभावों के, अब रामराज्य आ गया है। मोदी सरकार कोई गलती नहीं कर सकती।

और अब इसी बात पर मैं दूसरे मुद्दे पर आता हूँ, जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया था। जब पत्रकारिता की ऐसी प्रभावशाली सोच काम कर रही हो, तब उन पत्रकारों पे निशाना साधा जाना स्वाभाविक है,  जो सत्ता पक्ष के लिए असहजता पैदा करते हैं। अपने विचारों से, अपनी रिपोर्ट्स से। रवीश और बरखा का twitter account हैक किया जाना इसका प्रमाण है। इतनी असहजता पत्रकारों से? इसके पीछे जो भी है, मैं दावा कर सकता हूँ कि अगर इनका ताल्लुक किसी भी सूरत में बीजेपी या उसकी सोच से जुड़े संगठन से है,  तो इनके खिलाफ कार्यवाही नहीं होगी। सवाल ही पैदा नहीं होता। मिसाल हैं पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी। स्वाति को एक twitter हैंडल @LUTYENSINSIDER के ज़रिये गंदे तरीके से निशाना बनाया गया था। स्वाति ने मामला मे पुलिस केस दर्ज करवाया। बकौल स्वाति,  पुलिस ने twitter हैंडल का IP एड्रेस यानी पता भी ढूंढ लिया है, मगर प्रभावशाली होने की वजह से कोई कार्यवाही नहीं की जा रही। इसे दो साल से ज्यादा का वक़्त हो गया है। यानी कि जो पत्रकार इस सरकार से सवाल करेगा, उसे निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। हर लक्ष्मण रेखा को पार किया जाएगा।
ये हैं हमारे देशभक्त नेता — अभिसार

मैं पहले भी अपने ब्लॉग्स के ज़रिये आपको बता चूका हूँ कि किस तरह मुझे न सिर्फ पुलिस सुरक्षा, अलबत्ता पुलिस केस भी दर्ज करना पड़ा है, क्योंकि मेरी रिपोर्ट्स और ब्लॉग्स कुछ लोगों के हितों को असहज करती थीं। और निशाना सिर्फ मुझपर नहीं,  मेरे परिवार को भी बख्शा नहीं जा रहा। उसका भी ज़िक्र मैं पहले कर चुका हूँ। तथ्यों,  सुबूतों और अदालती फैसलों के बावजूद,  सोशल मीडिया और बाहर एक गन्दा प्रोपगंडा चलाया गया। ऐसे गंदे और वाहियात शख्स का समर्थन सीधे प्रधानमंत्री के कार्यालय के एक अधिकारी द्वारा किया गया, जिन्हें अदालत जेल की सजा सुना चुकी है, क्या मोदीजी इस बात से अंजान थे।

क्योंकि ये ताक़तें नहीं चाहती कि मोदीजी के बयानों और नीतियों पर कोई भी विवेचना करे और  प्रधानमन्त्री के बयानों में घोर विरोधाभास और अस्थायित्व की आलोचना हो। और जो करे उसकी बखिया उधेड़ दो। सोशल मीडिया पर। उसके परिवार तक को निशाने पर लाकर।

अरे नादानों, एक लक्ष्मण रेखा तो माफिया की भी होती है, कि कुछ भी हो, आपके परिवार को निशाना नहीं बनाया जाएगा। मगर तुम तो उससे भी आगे निकल गए।

ज्यादा हो गया क्या ?? क्या करें ! भड़ास है। निकाल जाती है कभी कभी।

Abhisar Sharma

Journalist , ABP News, Author, A hundred lives for you, Edge of the machete and Eye of the Predator. Winner of the Ramnath Goenka Indian Express award.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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