मुझे हमेशा से इस बात का गर्व था कि भारतीय मीडिया का नज़रिया काफी हद तक सेक्युलर है।
अब ज़रा आज के
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इस हेड लाइन को देखिये. "Mistaken as Muslims" … “गलती से मुसलमान समझे गए”। इसका अर्थ यह हुआ कि गौ आतंकवादियों (cow terrorists [sic]) द्वारा बुरी तरह पीटे गए वो दो आदमी अगर सच में मुस्लिम होते, तो हमारे समझ की वर्तमान स्थिति के हिसाब से यह पिटाई जायज होती?
क्या हम मीडियाकर्मियों को इस बात का अहसास है कि आम इंसान की तरह हम भी ऐसी घटनाओं को ‘सामान्य’ बना रहे हैं ? हम साथ-साथ हैं ?
क्या मीडिया होने के नाते हमें इसकी कड़े से कड़े शब्दों में घोर भर्त्सना नहीं करनी चाहिए? (indian media is misusing its freedom) आख़िर कैसे हम सत्ताधारी पार्टी बीजेपी द्वारा बढ़ावा दिये जाने वाले इन गुंडों के द्वारा अपने-ही देशवासियों, चाहे दलित या मुसलमान को ‘बस-एक-सामान’ बनाने दे सकते हैं?
ये आख़िर हम किस तरह के राक्षस बनते जा रहे हैं ?
मुझे बस राहत इन्दौरी का यह शेर याद आ रहा है –
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
अगर आप उनके मकानों को जलने देंगे तो भूल जाइये कि अपना घर बचा पाएंगे.
प्लीज...
(
अभिसार शर्मा के फेसबुक स्टेटस का हिंदी अनुवाद (c) : भरत तिवारी )
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