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आम भारतीय को मेरा खुला ख़त — अभिसार शर्मा #AbhisarSharma #OpenLetter

मई 6, 2017

जैसे Good Taliban Bad Taliban, वैसे ही ये हैं Good गुंडे। दाग अच्छे हैं। ये गुंडे अच्छे हैं

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

— अभिसार शर्मा


तुम्हे अंदाजा है तुमने क्या सामान्य बना दिया है? ग्रेटर नॉएडा में दो हिन्दुओं को गाय ले जाते वक़्त धुन दिया जाता है और अखबार की सुर्खियाँ कहती हैं, “उन्हें मुसलमान समझ कर पीट दिया गया”? मुसलमान समझ कर? वाकई? तुम्हारी घटिया सोच के किस कोने में यह तार्किक या सही है? तुमने अपने ही देश के नागरिकों को बेरहमी से पीटे जाने, जिसमें बहुतों की जान चली गयी को, सामान्य बना दिया है? हमने एक स्वतंत्र, प्रजातांत्रिक देश के नागरिकों को एक वस्तु बना दिया है, जिसकी कोई गरिमा नहीं, जिसके कोई अधिकार नहीं? यानी मुसलमान है तो मारने सही है?

अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी चुनाव जीतने की एक मशीन बन गयी है। उसे किसी भी कीमत पर जीत चाहिए, किसी भी कीमत पर सरकार बनानी है

जब "दिवंगत " गाय की चमड़ी दलित निकालता है तो उसे देश के मॉडल राज्य गुजरात के ऊना में जलील किया जाता है? क्या देश का दलित, उसका मुसलमान अब ऐसे ही सत्ताधारी बीजेपी द्वारा समर्थित गुटों द्वारा शोषित होता रहेगा, और राष्ट्रऋषि ख़ामोशी से सब कुछ होते रहने देंगे?

क्यों राष्ट्रऋषिजी? ऋषि-मुनियों की तरह आपने भी शायद मौन धारण कर लिया है। सुविधावादी मौन। सियासी मौन। बहुत गज़ब का मौन है ये। माना आप तुष्टिकरण की राजनीति में विश्वास नहीं करते, मगर गौ के नाम पर आतंक फैलाने वालों का तुष्टिकरण क्यों?

नए वाले गुंडे

उत्तर प्रदेश में योगिराज के आने के बाद देखिये सहारनपुर में क्या हो रहा है। सहारनपुर में दो बार अराजकता के ऐसे नज़ारे दिखे, जो सिहरन पैदा करने वाले हैं...नहीं मैं दलितों के घरों को ठाकुरों और राजपूतों द्वारा जलाये जाने से नाराज़ नहीं हूँ। ना ही मैं उससे पहली वाले घटने में बीजेपी सांसद लखनपाल द्वारा कानून की धज्जियाँ उडाये जाने से चिंतित हूँ, जिसमें उन्होंने स्थानीय पुलिसकर्मी के घर पे धावा बोल दिया। आपने देखा कैसे पुलिस दोनों ही घटनाओं में या तो कमज़ोर और मूक दर्शक बनी रही, या फिर पिटी ! आगरा में भी यही हुआ। पुलिस को दौड़ा-दौड़ा के पीटा गया। और ये सब इन राष्ट्रवादी गुंडों, गाय के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले लोगों की करतूत है। ये सब हम सामान्य बना रहे हैं। ये सब शायद आप लोगों को पीड़ा नहीं देता। आपको ये चिंतित नहीं करता। और यह “नए वाले गुंडे”? ये सब अचानक इतने प्रभावशाली और ताक़तवर कैसे हो गए? यह हमारे लिए कानून व्यवस्था का सवाल क्यों नहीं है? माना योगीजी मेहनत कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में जी जान से लगे हुए हैं। मगर आप लोग एक बात नहीं देख रहे। उनका सारा ध्यान 2019 पर है। किसी भी कीमत पर लोकसभा के चुनाव में मोदीजी को 70 प्लस सीटों की सौगात देनी है, बस। यानी सारा ध्यान सियासत पर। अक्सर सियासत और “सबका साथ सबका विकास” के उद्देश्यों में राई भर का अंतर होता है। क्योंकि अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी चुनाव जीतने की एक मशीन बन गयी है। उसे किसी भी कीमत पर जीत चाहिए, किसी भी कीमत पर सरकार बनानी है। गोवा मणिपुर, अरुणाचल, ये सारी मिसालें आपके सामने हैं। लिहाज़ा सब कुछ चलेगा।

मोदीजी के करिश्मे में बेहोश जनता को ये सब दिखाई नहीं दे रहा...और मीडिया भी...खैर छोडो!

क्या मस्त मौन करते हैं राष्ट्रऋषि  


बीजेपी की -- जीत किसी भी कीमत पर -- फलसफे ने सब कुछ बदल दिया है। हमने आँखें मूँद ली हैं। हम अपने देश के दूसरे नागरिकों के खिलाफ अन्याय बर्दाश्त कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि हमारे ज़हन के किसी हिस्से में यह बात पल रही है, कि देशद्रोहियों को यही सरकार सबक सिखा सकती है। इन मुल्लों की अकल सिर्फ बीजेपी ठिकाने लगा सकती है। लिहाज़ा गाय के नाम पर पिटाई, दंगा, खून सब बर्दाश्त है। बीजेपी के नेता का अपने ही राज्यों में पुलिस के घरों को घेर लेना, वो हमें विचलित नहीं करता। क्योंकि रामदेवजी ने दरअसल हमारे दिलकी बात कही है। वो वाकई राष्ट्रऋषि हैं। क्या मस्त मौन करते हैं राष्ट्रऋषि ।

लिहाज़ा तुम भी मूँह फेर लो। अब तुम्हें कोई अत्याचार विचलित नहीं करता। क्या हुआ अगर यह दंगा करें, किसी की हत्या करें। अरे ये तो हमारे वाले हैं न? हमारे वाले गुंडे...जैसे Good Taliban Bad Taliban, वैसे ही ये हैं Good गुंडे। दाग अच्छे हैं। ये गुंडे अच्छे हैं।

अब विपक्ष को कटघरे में रखने को ही नयी दिलेर पत्रकारिता का नाम दिया जा रहा है

हम कैसे राक्षस बन रहे हैं या बन गए हैं? अंदाजा है? क्या आम इंसान और क्या पत्रकार। अब विपक्ष को कटघरे में रखने को ही नयी दिलेर पत्रकारिता का नाम दिया जा रहा है। और छाती ठोंक के बोलते हैं ये। सरकार की चाटुकारिता कर लो, मगर देश के नागरिकों के एक वर्ग को तो मत भूलो। उसके अधिकार भी आखिर अधिकार हैं। उसकी आवाज़ भी एक आवाज़ है। या वो आवाज़ अब मायने भी नहीं रखती?

राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल याद आती है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है।
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है॥

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में।
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है॥ 

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन।
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है॥

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है।
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है॥

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे।
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है॥

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में।
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है॥

— अभिसार शर्मा

Abhisar Sharma
Journalist , ABP News, Author, A hundred lives for you, Edge of the machete and Eye of the Predator. Winner of the Ramnath Goenka Indian Express award.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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