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भारत-पाक और महादेश की मजहबी कड़वाहट के बीच गांधी — नलिन चौहान

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भारत-पाक और महादेश की मजहबी कड़वाहट के बीच गांधी — नलिन चौहान
Mahatma Gandhi talking to a delegation of Rashtriya Sevak Sangh RSS; 1944; Pyarelal Nayar - 1944 | Photo credit: www.alamy.com

भारत-पाक और महादेश की मजहबी कड़वाहट के बीच गांधी 

— नलिन चौहान

अगस्त 1947 में मजहब के आधार पर खंडित राष्ट्र का परिणाम भारत और पाकिस्तान नामक दो राज्यों के दुनिया के नक़्शे पर उभरने के रूप में सामने आया। सांप्रदायिकता और अलगाववाद के जहर को बेअसर करने की महात्मा गांधी ने भरसक कोशिश की।





9 सितंबर 1947 को दिल्ली में प्रेस को जारी एक वक्तव्य में उन्होंने कहा कि जब मैंने पिछले इतवार को कलकत्ता छोड़ा तो मैं दिल्ली की अशांत हालत के बारे में कुछ नहीं जानता था। दिल्ली आने के बाद मैंने सारे दिन यहां मौजूद दर्दभरी कहानी सुनता रहा हूं। जितना मैंने सुना, वह मुझे यह चेतावनी देने के लिए काफी है कि जब तक दिल्ली की हालत पहले जैसी शांत न हो जाय तब तक उसे छोड़ मुझे पंजाब नहीं जाना चाहिए। इस गरम वातावरण को शांत करने के लिए मुझे अपनी कुछ कोशिश करनी चाहिए और हिंदुस्तान की राजधानी के लिए मुझे "करो या मरो" वाला अपना पुराना सूत्र काम से लेना ही चाहिए। मैं उन शरणार्थियों के गुस्से को समझता हूं, जिन्हें दुर्भाग्य ने पश्चिम पंजाब से खदेड़ दिया है।

जबकि 16 सितंबर 1947 को दिल्ली की बाल्मीकि बस्ती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा कि अगर हिंदुओं को लगता है कि भारत में हिंदुओं के अलावा किसी और के लिए कोई स्थान नहीं है और अगर गैर-हिंदू, विशेष रूप से मुस्लिम, यहां रहना चाहते हैं, तो उन्हें गुलाम के रूप में रहना होगा तो ऐसे में वे (हिंदू) हिंदू धर्म को समाप्त कर देंगे। इसी तरह, अगर पाकिस्तान यह सोचता है कि पाकिस्तान में केवल मुसलमानों को रहने का अधिकार है और गैर-मुसलमानों को वहां पीड़ित होकर और उनके गुलाम के रूप में वहाँ रहना पड़ेगा तो यह भारत में इस्लाम का अंत होगा।

मुल्क के टुकड़े तो हो चुके। अब उसे दुरुस्त करने का तरीका क्या है? एक हिस्सा गंदा बने तो क्या दूसरा भी वैसा ही करे? हिंदुस्तान की रक्षा का, उसकी उन्नति का यह रास्ता नहीं कि जो बुराई पाकिस्तान में हुई उसका हम अनुकरण करे। अनुकरण हम सिर्फ भलाई का ही करें।

उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान बुराई ही करता रहा तो आखिर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में लड़ाई होनी ही हैं मेरी बात कोई सुने तो यह संकट टल सकता है। अगर मेरी चले तो न तो मैं फौज रखूं और न पुलिस। मगर ये सब हवाई बातें हैं। मैं हुकूमत नहीं चलाता।




आज जो चल रहा है, उससे तो लड़ाई का ही सामान भरा है। क्यों पाकिस्तान से हिंदू और सिक्ख भाग रहे हैं? पाकिस्तान वाले उन्हें क्यों नहीं मनाते कि यही रहो। अपना घर न छोड़ो। आपकी इज्जत और जान-माल की हम हिफाजत करेंगे? क्यों पाकिस्तान में एक छोटी-सी लड़की की तरफ भी कोई बदनजर से देखे? इसी तरह क्यों न एक-एक मुसलमान हिंद-यूनियन में पूरी तरह सुरक्षित रहे?

वहीं 18 सितंबर 1947 को दरियागंज मस्जिद में महात्मा गांधी ने मुसलमानों के बीच में भाषण देते हुए कहा कि मैं जिस तरह हिंदुओं और दूसरों का दोस्त और सेवक हूं उसी तरह मुसलमानों का भी हूं। मैं तब तक चैन नहीं लूंगा जब तक हिंद-यूनियन का हर एक मुसलमान, जो यूनियन का वफादार नागरिक बनकर रहना चाहता है, अपने घर वापिस आकर शांति और हिफाजत से नहीं रहने लगता और इसी तरह हिंदू और सिक्ख भी अपने-अपने घरों को नहीं लौटते।

मैं यह देखने के लिए पंजाब जा रहा था कि जो हिंदू-सिक्ख पाकिस्तान से खदेड़ दिए गए हैं, वे अपने-अपने घरों को वापिस लौट सके और वहां हिफाजत और इज्जत से रह सकें। मगर रास्ते में मैं दिल्ली में रोक लिया गया और जब तक हिंदुस्तान की इस राजधानी में शांति कायम नहीं होती तब तक मैं यही रहूंगा। मैं मुसलमानों को यह सलाह कभी नहीं दूंगा कि वे लोग अपने घर छोड़कर चले जाय, भले ही ऐसी बात कहने वाला मैं अकेला ही क्यों न होऊं। अगर मुसलमान लोग हिंदुस्तान के कानून मानने वाले और वफादार नागरिक बनकर रहे तो उन्हें कोई भी नहीं छू सकता।

उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने कहा है कि सरदार पटेल ने मुसलमानों के पाकिस्तान में जाने की बात की ताकीद की है। जब सरदार से मैंने यह बात कही तो वे गुस्सा हुए। मगर साथ ही उन्होंने मुझसे कहा कि इस शक के लिए मेरे पास कारण हैं कि हिंदुस्तान के मुसलमानों की बहुत बड़ी तादाद हिंदुस्तान के प्रति वफादार नहीं है। ऐसे लोगों का पाकिस्तान में चले जाना ही ठीक है। मगर अपने इस शक का असर सरदार ने अपने कामों पर नहीं पड़ने दिया।

मैं पूरी तरह मानता हूं कि जो मुसलमान भारतीय यूनियन के नागरिक बनना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले यूनियन के प्रति वफादार होना ही चाहिए और उन्हें अपने देश के लिए सारी दुनिया से लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। जो लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं, वे ऐसा करने के लिए आजाद हैं। मैं सिर्फ यही चाहता हूं कि एक भी मुसलमान, हिंदुओं या सिक्खों के डर से यूनियन न छोड़े। मगर पाकिस्तान रवाना होने से पहले मुझे दिल्ली की आग बुझाने में मदद करनी ही होगी। अगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान हमेशा के लिए एक दूसरे के दुश्मन बन जाएं और आपस में जंग छेड़ दें, तो ये दोनों ही उपनिवेश नष्ट हो जायेंगे और बड़ी मुश्किलों से हासिल की हुई अपनी आजादी को बहुत जल्दी खो देंगे। वह दिन देखने के लिए मैं जिंदा नहीं रहना चाहता।

गांधी ने अपने भाषण के अंत में मुसलमानों को सलाह देते हुए कहा कि भारतीय यूनियन के प्रति अपनी वफादारी को दर्शाते हुए उन्हें पाकिस्तान में मुसलमानों द्वारा अगवा की गई सभी हिंदू महिलाओं को उनके अपने परिवारों को सौंपे जाने को लेकर एक सार्वजनिक बयान जारी करना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्हें पाकिस्तान सरकार के सभ्य आचरण को छोड़ने की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तान में बेघर हुए उन सभी हिंदुओं और सिखों को उनकी सुरक्षा और आत्म-सम्मान का पूरा भरोसा देने के साथ वापस लौटने का आमंत्रण देने की मांग करनी चाहिए।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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