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Hindi Story "स्वप्नगति" — प्रतिमा सिन्हा की सामाजिक कहानी

अप्रैल 25, 2020

हमारे समाज में भरपूर घट रही वह कहानी जिसमें स्त्री माँ बनती है और पुरुष? क्या हमारा पुरुष पिता बनने के बाद माँ बन चुकी पत्नी को समझता है? पढ़िए प्रतिमा सिन्हा की सामाजिक कहानी 'स्वप्नगति'।  ... भरत  एस तिवारी/शब्दांकन संपादक



स्वप्नगति

— प्रतिमा सिन्हा

कस्बानुमा शहर के व्यस्त बाज़ार के बीचो-बीच उस छोटे से कमरे में आबाद ‘माँ जगतजननी कुरियर सर्विसेज़’ का ऑफिस उन दिनों ‘लव इन द एयर’ साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था। कुल जमा पाँच लोगों के ऑफिस में ‘असिस्टेंट मैनेजर’ का पद संभाल रहे दीनबंधु गुप्ता उर्फ़ डी.बी. गुप्ता की अभी-अभी बीती लगन में शादी हुई थी। हथेली के कुछ ऊपर तक लगी चटख मेहंदी अभी छूटी नहीं थी। पैर में महावर का रंग भी नाखूनों पर गहरा चढ़ा हुआ थी। ध्यान से देखा जाता तो चेहरा अभी भी हल्दियाया सा दिखता। शादी के बस चौदह दिन मतलब दो हफ़्ते हुए थे। यूँ कहें कि दो हफ़्ते से दीनबंधु के जीवन में बहार आई हुई थी और वो बहार के साए तले पड़े हुए थे। ये दफ़्तर वगैरह तो बस अम्मां की ज़बरदस्ती में आना पड़ा था वरना वो तो उसी बहार की ज़ुल्फ़ के साये में ही शाम नहीं बल्कि साल करने वाले थे। शादी के बाद चौथी की विदा और पाँव फेरी की रसम भी बस उनके ही चलते एक ही दिन में निपटा दी गई थी।

दीनबंधु गुप्ता उर्फ़ डी.बी. गुप्ता बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनके नयी-नयी पत्नी मायके में एक  दिन से  ज़्यादा रुके। रात भर रूकने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता। अपने मंझले जीजा को एक बार उन्होंने कहते सुना था, “शादीशुदा आदमी को रात में अकेले सोना पड़े तो उस पर धिक्कार है।” ये धिक्कार दीनबन्धु अपने आप पर नहीं ले सकते थे इसलिए पहले ही शर्त रखी जा चुकी थी। बस सुबह जाना है और शाम को अंधेरा होने से पहले वापस आ जाना है। इतनी प्रतीक्षा के बाद जो सुख मिला था, उसमें कोई ख़लल वो कैसे बर्दाश्त करते? वो तो विवाहोपरांत ख़ुद भी ऑफ़िस में ‘देर से आना, जल्दी जाना’ का स्वनिर्मित नियम पालन कर रहे थे।

पहली बार यह पता चला था कि किसी को अपने आदेश के अनुसार कैसे संचालित किया जाता है और उसका सुख क्या होता है? आह्हा... क्या महाराजा जैसा फील होता है। उसका आनन्द शब्दातीत है।

अब तक के जीवन में तो वह स्वयं ही संचालित होते रहे। कभी पिता, कभी बड़े भाई, कभी शिक्षक, समाज में हर कोई उन्हें संचालित करता रहा। पहली बार किसी पर मालिकाना हक़ मिलने का अद्भुत अनुभव उन्हें इन दिनों दिन-रात एक अजब सी खुशी से सराबोर किये हुए था। वह गदगद थे और उनकी ये खुशी अबीर-गुलाल बन कर उनके ऑफिस में बरस रही थी जहाँ उन्हें मिलाकर कुल जमा पाँच लोग काम करते थे।

दो चपरासी लेवल के लोग, जिनका काम था चाय-पानी लाना, ऑफिस खोलना-बंद करना, किसी विशेष के आने पर नाश्ते-नमकीन का इंतज़ाम करना और किसी के ना होने पर आने वाले ग्राहक से कुरियर लेना। यह दोनों यानी बबलू और गोपाल। यही दोनों दीनबंधु की ख़ुशी के प्रत्यक्ष साझीदार थे।

मालिक के आने पर दीनबंधु कम्प्यूटर में घुस जाते और मैनेजर तिवारी से सब कुछ साझा करना उचित नहीं समझते तो ले-दे कर यही दोनों बचते जो उनकी पल-पल की खुशी से वाकिफ़ थे और उनके राज़दार भी।

मुश्किल से एक महीने पहले उनकी ज़िन्दगी में सफेद और काले के अलावा कोई तीसरा रंग नहीं था। उमर तैंतीस के पार हो चली थी। अकेली अम्मा और बड़े भईया सहित चार जोड़ा बहनें और जीजा उनकी शादी के लिए परेशान थे। बेटी की शादी के लिए परेशान होना तो आम सी बात है लेकिन बेटे की शादी के लिए परेशान होना पड़ेगा यह अंदाज़ा तो अम्मा को भी नहीं था। अपने ‘छुटकऊ’ के जन्म पर उन्होंने जी भर के सब देवी-देवता को आभार भेजा था। बड़े बेटे के बाद एक-एक कर चार लडकियों के आ जाने से जो मन पर बोझ था वो उतर गया था। वैसे भी, लड़के तो दो ही होने `चाहिये ऐसा पिता जी का विचार था। मगर पच्चीस बरस में शादी का मसला उठते ही जब यह गम्भीर स्थिति सामने आई तो सभी चिन्तित मुद्रा में आ गए।

आगे पूरे आठ साल उनकी शादी के प्रयास अनवरत अनुष्ठान की तरह चलते रहे। बड़े भाई रेलवे में थे सो उनकी शादी तो घर बैठे ही लग गई थी। बहनें अपना भाग्य लेकर आती हैं सो उन्हें भी ‘पहले आओ-पहले पाओ’ की तर्ज पर आने वाले रिश्तों के साथ यथा समय उनके घर भेज दिया गया। बच गये थे दीनबंधु जो पढ़ने में औसत थे और देखने में औसत से भी कम।

पिता एक बेटे और दो बेटियों को ब्याह कर दुनिया से विदा हो गए थे। दीनबन्धु के रिश्ते के लिए अम्मा का चिन्तित होना स्वाभाविक था। हालाँकि उनके लिए तो छोटा बेटा हर हाल में सर्वश्रेष्ठ और लाडला था। घी का लड्डू टेढ़ा भी भला। फिर शादी के लिए लड़के को कौन रिजेक्ट करता है। सो बहू की तलाश में वो ज़ोर-शोर से लगीं लेकिन पच्चीस बरस में पहली बार जब शादी के प्रस्ताव पर दीनबंधु को रिजेक्ट किया गया तो अम्मा गुस्से से आग बबूला हो उठीं।

“ऐसा भी क्या बुरा है हमारे लड़के में? थोड़ा रंग ही तो दबा हुआ है और लड़के का रंग कौन देखता है जी? पढ़ा-लिखा है, घर-बार है, समझदार है, और क्या चाहिए लड़की वालों को?”

अम्मा बमकी थीं लेकिन लड़की वालों को सचमुच और भी कुछ चाहिए था।

देखने-दिखाने की बात विशेष ना भी हो तो भी नौकरी कम से कम सरकारी होनी ज़रूरी थी। बड़े भाई पहले से सरकारी नौकरी में आ कर दीनबंधु के लिए रास्ते मुश्किल कर चुके थे। फिर पच्चीस बरस में तो उनके पास प्राइवेट नौकरी भी नहीं थी। इसलिए हर बार बात बनते-बनते रह गयी। अम्मा को भले ही अपने बेटे में कोई खामी ना दिखती हो लेकिन लड़की वालों की कसौटी पर दीनबंधु खरे नहीं उतरते थे।


शुरू में यह बात उतनी गंभीरता से नहीं ली गई क्योंकि सबको यही लग रहा था एक-दो जगह यह सब चलता है लेकिन फिर लगातार सालों साल बनी रही इसी स्थिति ने सबके हौसले पस्त कर दिये, ख़ासतौर पर दीनबंधु के। हालाँकि बावजूद  इसके, उनका जीवनसंगिनी को लेकर देखा गया एक स्वप्न भंग नहीं हुआ। वो था गौरवर्णा पत्नी पाने का स्वप्न।

पच्चीस साल से तैंतीस साल यानी लगभग आठ बरस तक उनके लिए रिश्ता ढूंढने में जुटे अम्मा और बड़के भईया इसलिए भी कामयाब न हो सके क्योंकि बाकी किसी भी बात पर समझौते को तैयार दीनबंधु रंग के मामले में कुछ सुनने को राज़ी न थे। उन्हें गोरी पत्नी चाहिए थी। इस मामले में नो कंप्रोमाइज़। बाकी छोटी-लम्बी, मोटी-पतली, कम पढ़ी-लिखी, ऐसे वैसे नैननक्श वाली कोई भी, कुछ भी चल जाती मगर रंग दूध सा होना चाहिए।

अब दूध जैसी लड़की  भी  जामुनी रंग के दीनबन्धु  से शादी करने को तैयार हो जाये, यही तो वो पेंच था  जहाँ सारी बात आकर अटक जाती थी।  मगर लाड़ले बेटे की पहली और आखिरी शर्त का मान रखते हुए अम्मा तब तक लड़कियां देखती रहीं जब तक उन्हें दूध सी गोरी ऐसी लड़की नहीं मिल गई जिसे दीनबंधु से शादी करने में कोई एतराज़ नहीं था।

इस लड़की के पास एतराज़ करने लायक कोई आधार भी नहीं था। बिना पिता की, तिस पर घर की छठी बेटी, उसकी शादी की सबको जल्दी थी। देखने में भी ठीक-ठाक। पढाई कुछ ख़ास नहीं, बस बारहवीं पास लेकिन माँ ने चाचियों और रिश्ते की बुआओं के सहारे गृहकार्य में निपुण बना दिया था ताकि विवाह में कोई अड़चन न आये फिर भी छह-सात साल निकल ही गए थे क्योंकि दहेज की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में दीनबंधु गुप्ता का रिश्ता उनके लिए साक्षात ईश्वर का संदेश बनकर आया।

लड़का ठीक-ठाक था। काला रंग था तो क्या आख़िर प्राइवेट नौकरी में था और 12,000 कमा लेता था। किसी बुरी लत का शिकार नहीं था और सबसे बड़ी बात कि सिवाय गोरे रंग के ऐसी कोई माँग नहीं थी और विमला बिल्कुल सफेद रंग की थी। माँ का रंग पाया था उसने। दीनबंधु गुप्ता ने सुना तो फोटो देखे बगैर ही हाँ कर दी। मालूम था कि अम्मा ‘हाँ’ करके आई हैं, इसका मतलब ही यही है कि लड़की गोरी है। दोनों की उम्र में दस साल का अन्तर भी कोई ख़ास अड़चन नहीं बना। जब सब कुछ मनचाहा मिल ही गया तो देर क्यों करनी थी? चट मंगनी पट ब्याह भी तय हो गया।

मकर संक्रांति पर मंगनी और बसंत पंचमी पर विवाह।

इस तरह दो हफ़्ते के भीतर विमला ब्याह कर दीनबंधु के घर आ गई और विमला कुमारी से श्रीमती विमला गुप्ता हो गई। विमला नाम दीनबंधु को कुछ ख़ास पसंद नहीं था इसलिए शादी के बाद उन्होंने पत्नी को ‘प्रीति’ नाम दिया और सब को ताकीद भी कर दी कि अब घर में उनकी नयी दुल्हन को प्रीति ही बुलाया जाएगा। पति की आज्ञा को परमेश्वर की आज्ञा समझने की सीख भाभी ने दे कर भेजा था इसलिए बचपन से अपना नाम विमला सुनने की आदी नई दुल्हन ने भी इस सिलसिले में कोई प्रश्न नहीं उठाया। बस इतना हुआ कि पाँच बार प्रीति पुकारने पर एक बार चिहुंकती वो भी किसी के टोकने पर लेकिन ये तो कोई बड़ी समस्या नहीं थी। वक्त के साथ ठीक हो जानी थी तो इसे बिना ज़्यादा तूल दिये हुए दीनबंधु ने जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया जिसमें वह स्वयं नायक थे और उनकी मनचाही गौरवर्णा नायिका उनके जीवन में आ चुकी थी। वो भी पूरे प्रेम और समर्पण के साथ। शादी से पहले फ़िल्में देखने के शौकीन दीनबंधु पर्दे पर रोमांस देखकर अक्सर अपने जीवन को निरर्थक समझा करते थे। जीवन में ‘आई लव यू’ कहना तो दूर, कोई मुस्कुरा कर देखने लायक भी नहीं था। उम्र बड़ी सूखी-सूखी बीत रही थी लेकिन विमला उर्फ़ प्रीति के आते ही सब कुछ बदल गया।

अब न सिर्फ़ दीनबंधु गुप्ता की निजी ज़िन्दगी में बल्कि कस्बानुमा शहर के व्यस्त बाज़ार के बीचो-बीच उस छोटे से कमरे में आबाद ‘माँ जगतजननी कुरियर सर्विसेज़’ के ऑफिस में भी उनकी रोमांटिक ज़िन्दगी का छलकता हुआ रोमांस नए रंग पैदा करने लगा।

दो हफ़्ते बाद स्थिति ये थी कि दीनबंधु गुप्ता दिन भर फोन पर लगे रहते। वीडियो कॉल का जमाना आ गया था सो ज़्यादातर कॉल ‘दृश्य-श्रव्य’ ही होतीं।  फ़ोन की स्क्रीन पर झक लाल रंग की साड़ी में सिमटी विमला यानी प्रीति की झलक देख कर दीनू तो निहाल होते ही, अगल-बगल बैठे बबलू और गोपाल भी खींसे निकाल कर एक-दूसरे की ओर देखने लगते।

प्रीति से बात करते हुए दीनू की आवाज़ ज़रूरत से अधिक ऊँची हो जाती। दरअसल वो सबको यह जता देना चाहते थे कि उनकी ज़िन्दगी में भी सिनेमा वाला ‘अमर प्रेम’  आ चुका है। घर पर एक गौरवर्णा नायिका उनकी राह देख रही है। वह तेज़ आवाज़ में पत्नी का हाल-चाल पूछते। प्यार का इज़हार करते। ‘खाना खाया या नहीं’, ‘नहाई कि नहीं’, ‘याद आ रही है कि नहीं’, ‘सोई क्यों हो’, ‘बीमार हो क्या’, ‘चिन्ता मत करो हम जल्दी ही आ जाएंगे’ आदि – इत्यादि। यह बातें कहते हुए उन्हें बड़ा गुड-गुड फील होता। ज़िन्दगी अब रोमांस, रोमांच और सेक्स से भरपूर रंगीन फ़िल्म बन गयी थी और यह ऐलान वो  सारी दुनिया के सामने करना चाहते थे।

कभी अचानक मालिक आ भी जाता तो मालिक को नमस्ते करने के बाद भी फोन पर लगे रहते। ‘नई नई शादी हुई है’ यह सोचकर कोई भी कुछ ना कहता। दीनबंधु की ज़िन्दगी में विवाह जीने की वजह बन कर आया था और वह मालिक होने के एहसास को बड़ी  शिद्दत से जी रहे थे, बिन्दास।

धीरे-धीरे शादी के छः  महीने बीत गये। इसी के साथ दीनबंधु गुप्ता की ज़िन्दगी की फ़िल्म का दृश्य भी कुछ बदल सा गया। अब वो दिन में सिर्फ़ दो बार वीडियो चैट करते। एक दोपहर में, एक शाम को। कोई आ जाये तो फ़ौरन फ़ोन बंद कर देते यह कहकर कि अभी थोड़ी देर बाद बात करेंगे। बातचीत के विषय में अब प्रेम के अलावा घरेलू बातों का कंटेंट भी आ  जुड़ा था जिसमें दीनबंधु की ओर से अधिकतर सवाल ‘घर में सब्जी है या नहीं’, ‘दूध लाना है कि नहीं’ और ‘माँ को दवाई दी या नहीं से संबंधित होते। पिछले एक हफ़्ते से विमला उर्फ प्रीति को बुखार आ रहा था। वो वीडियो कॉल में भी निढाल सी पड़ी दिखाई देती। फिर एक दिन ऑफ़िस में बाहर से समोसा मंगा कर खाते दीनबंधु शुक्ला ने समाचार सुनाया कि पत्नी मायके चली गयी है। उसके चाचा ख़ुद आ कर लिवा गए थे। कुछ समय से तबीयत ख़राब रहती थी। दस दिन पहले डॉक्टर को दिखाया तो मालूम चला दो महीने चढ़ गए हैं। विमला उर्फ़ प्रीति को अब नौ महीने आराम करना होगा। कुछ कॉम्प्लीकेशंस हैं। डॉक्टर ने ऐसा कुछ कहा। बड़े भाई तो बीवी को लेकर पहले ही बाहर नौकरी पर चले गये थे। माँ कितना संभालती? सो उसने ऐलान किया कि हमारे यहाँ पहला बच्चा मायके में होता है। पितृविहीन मायके में चाची लोगों ने पहले तो बड़ी आनाकानी करने की कोशिश की लेकिन ससुराल की बात कोई कितना टालता? आख़िरकार एक सप्ताह की कहा-सुनी के बाद बहू जचगी के लिए मायके पठा दी गयी। इस पूरे प्रकरण में एक सिरा यूँ ढीला रह गया कि दीनबंधु की मर्ज़ी इसमें शामिल नहीं थी। वो कतई नहीं चाहते थे कि बीवी मायके जाये लेकिन ये बात वो खुल कर कह नहीं सके। विमला से कोई उम्मीद करना बेकार था। उसे तो वही करना था जो उसके लिए तय किया जाता। बस दीनबंधु  कसमसाते रह गये।

इधर जिसने सुना उसने बधाई दी। मगर दीनबंधु गुप्ता न जाने क्यों ‘फ़ील गुड’ नहीं कर पा रहे थे। वैसे पिता बनना अपने ‘पौरुष’ और ‘काबिलियत’ को सिद्ध करने का एक ऐसा  मध्यमवर्गीय अवसर है जिस पर हर पुरुष ख़ुश होता ही है। फिर दीनबंधु पर तो यह दायित्व कुछ ज़्यादा ही था।  मगर परेशानी तो कुछ और थी जिसके विषय में वो किसी से कुछ कह भी नहीं पा रहे थे। दिन तो किसी तरह कट जाता लेकिन जब रात में बिस्तर पर जाते तो बदन कसमसाने लगता। बगल में विमला के लेटे होने की आदत पड़ चुकी थी। छः महीने में यह धारणा मज़बूत हो चुकी थी कि बीमार ही सही बगल में बीवी तो होनी ही चाहिए। उन्हें बार-बार पायल की छन-छन और चूड़ियों की खन-खन सुनाई देती। बिस्तर पर चादर की सलवटें देख उन्हें झुनझुनी सी चढ़ जाती। ख़ाली बिस्तर दुश्मन बन गया था। विमला के बिना वो रह नहीं पा रहे थे और किसी से कह भी नहीं पा रहे थे। कभी-कभी उन्हें विमला पर गुस्सा भी आता कि माँ बनने की ऐसी भी क्या जल्दी मची थी। अभी तो उन्होंने जीवनबगिया में देर से ही सही, बौराई रस-मंजरी का भरपूर रसास्वादन भी नहीं किया था। तभी उन्हें अचानक याद आता कि ‘इसमें’ विमला से अधिक तो उनका दोष था। वो बेचारी कब उनकी इच्छापूर्ति में कभी बाधा बनती थी। वो तो जैसे कपड़े की गुड़िया थी। न अपनी ‘ना’ बताती, न ‘हाँ’। सब कुछ दीनबंधु को ख़ुद ही समझना पड़ता था जिसके लिए वह उस ज्ञान का उपयोग करते थे जो फ़िल्में देख-देख कर पाया था। उनका प्रिय फ़िल्मी डॉयलाग था, ‘लड़की की ना का मतलब हाँ होता है।’ ऐसे में अगर कोई ‘सावधानी’ बरती जानी थी तो उसका ज़िम्मा उन पर ही था लेकिन फिर विमला पर गुस्सा यह सोच कर आता था कि मान लो यह सब हो ही गया तो मायके जाने का रिवाज़ गलत है। उसे इसका विरोध करना चाहिए था। पत्नी का कर्तव्य है कि वो शादी के बाद पति के साथ ही रहे। आवाज़ को भरसक संयत रखते हुए अम्मां से पूछ बैठते। “कब तक लौटेगी बहू तुम्हारी?”

“अब रहने दो उसे माँ के पास। मायके वाले भी कुछ करें। जचगी के बाद भी कुछ महीने तक तो हम नहीं बुलाने वाले। कौन बैठा है यहाँ सम्भालने वाला। बच्चा तीन-चार महीने का हो जाये तब आराम से लायेंगे।”

ये ऐलान सुनते ही दीनू की हालत बिगड़ जाती। हिसाब लगाते। अभी तीसरा महीना चल रहा है। छः महीना और...फिर अम्मां के हिसाब से चार महीना और...बाप रे, पूरे दस महीने। दस महीने कौन अपनी बीवी से दूर रहता है। कभी–कभी चिड़चिड़ापन इतना बढ़ जाता कि अम्मां पर निकल जाता।  “पता नहीं इतनी जल्दी क्यों भेज दिया? आठवें महीने में भेजना था।”

“डॉक्टर ने क्या बोला, सुना था न? बिस्तर पर आराम बताया है। ससुराल में कोई करता है बिस्तर पर आराम? कुछ उल्टा-सीधा हो जाता तो हमको ही सुनना पड़ता। हमसे तो उसकी सेवा होनी नहीं थी।”

“अम्मां तुम समझती नहीं हो। हमें दिक्कत होती है।”

“काहें? हम मर गये क्या? कौन सी दिक्कत हो रही तुमको? छः महीने में लुगाई ने ऐसी कौन सी सेवा कर दी कि उसके बिना रहा नहीं जा रहा?”

अम्मां फट पड़तीं। ज़ाहिर है उनको बेटे का यूँ बिसूरना बिलकुल ही रास नहीं आ रहा था। अम्मां दीनबन्धु की दिक्कत सीधे-सीधे समझती नहीं थी या समझना चाहती नहीं थीं, कहना मुश्किल था। घर में कोई मर्द होता तो समझता-समझाता। बहरहाल दिन कट रहे थे। जाने-अनजाने आने वाला नया सदस्य दीनबंधु को अपनी ख़ुशी का दुश्मन लगने लगा था जो उनके जीवन सा सबसे बड़ा सुख उनसे छीन रहा था। उनकी ज़िन्दगी में जो फ़िल्मी इन्द्रधनुष खिला था उसका रंग साल बीतते न बीतते हल्का पड़ने लगा था।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा।

अम्मां के हिसाब के अगले छः महीने पूरे हुए। विमला अस्पताल में भर्ती हुई। दीनबन्धु ऑपरेशन से जन्मे बेटे के बाप बन गए। घर पर बधाइयों का तांता लग गया। मिठाई लाने और मिठाई माँगने वालों ने जी खोल कर शुभकामनायें दीं। मायके वालों ने धूम से छठी और बरही का निमन्त्रण भेजा। काजल की रस्म पूरी करने के लिए इसी शहर में रहने वाली दीनू की सबसे छोटी बहन पति और बच्चे समेत भाई की ससुराल पहुँची। बाक़ियों ने बच्चों की परीक्षा का बता कर बाद में आने को कह दिया। विमला के चाचा-चाची ने अपनी हैसियत के अनुसार उत्सव मनाया। सब कुछ ठीक ठाक निपट गया। डॉक्टर ने भी ऑपरेशन के टाँके कांटने के बाद थोड़े बहुत एहतियात के साथ ‘सब ठीक है’ की घोषणा कर दी।

अम्मां के ऐलान के अनुसार बच्चे के जन्म के चार महीने बाद विमला को आना था लेकिन अब तक दीनबंधु के सबर का बाँध टूट गया था तो उनकी ज़िद पर विमला दो महीने के भीतर गोद में बच्चा लिए मायके से विदा हो गयी। वो ससुराल लौटी तो लगा कि दीनबंधु गुप्ता के नीरस हो चुके जीवन में अब ‘रसमंजरी’ फिर बौराएगी लेकिन अब की बार के मौसम में वो पहले सी बात नहीं रही। जीवन चल रहा है। रंग बदल गया है।

‘माँ जगतजननी कुरियर सर्विसेज़’ का ऑफिस अब ‘प्रेम की सुगंध’ से सर्वथा ख़ाली है। दीनबंधु गुप्ता समय से भी पहले ऑफ़िस आते हैं और देर से घर जाते हैं। स्वभाव रुखा हो गया है। जीवन की मौज नदारद हो चुकी है। ऑफ़िस से घर में अब ना के बराबर बात होती है। घर से कभी फ़ोन आता भी है तो दूध, सब्ज़ी, हगीज़ नैपकिन्स या कोई दवा लाने की याद दिलाने के लिए। पत्नी के नाम या ज़िक्र पर अब वो न शरमाते हैं। न मुस्काते हैं। ना ही पहले की तरह कुछ गुनगुनाते हैं। अब उनके जीवन में आये फ़िल्मी इन्द्र्धनुष का रंग पूरी तरह फ़ेड हो चुका है। पूरे आठ-नौ महीने पत्नी-वियोग में काटने के बाद सोचा था कि पत्नी मायके से लौटेगी तो फिर वही पुरानी रंगीनियाँ बहाल होंगी। वही गुलाबी शामें, नशीली रातें। लेकिन पत्नी रंगीन प्रेम का पर्याय नहीं बल्कि टेंशन का विषय हो कर लौटी है। शादी के बाद दीनबंधु की एक–एक फ़रमाइश पर कैसी फ़िरकी सी नाचती थी। रेशमी गलीचे सी बिछी रहती थी लेकिन अब पति की जैसे कोई फ़िक्र ही नहीं। जब मुँह खोलती है, विषय सिर्फ़ बच्चा होता है। शरीर में भी वो आकर्षण नहीं रहा। भारी सा हो गया है। जब देखो, इधर-उधर दर्द की शिकायत। बनाव-सिंगार भी ख़त्म। पहनने-ओढ़ने का सलीक़ा बहुत ख़ास तो पहले ही नहीं था अब तो बिलकुल ही नष्ट हो गया है। उसके कपड़ों से या तो बच्चे की उल्टी और दस्त की बास आती है या प्याज़, लहसुन की। लाख समझाने की कोशिश करो, सब बेअसर। न बात समझती है, न इशारा।

रात पूरी तरह नर्क हो चुकी है। हर पत्नी के लिए यह सामान्य ज्ञान की बात है कि ऑफ़िस से घर लौटे पति की कोई इच्छा-कामना होती  है जिसके लिए उसे तैयार रहना चाहिए। मगर यहाँ तो गज़ब हाल है। पत्नी बिस्तर पर आती है और ‘आटे की बोरी’ से ढह जाती है। पहले वाली नाज़ोअदा ही नहीं रह गयी। रात भर बच्चा के बहाने दीवार की ओर मुँह किये पड़ी रहती है। बच्चा सारी रात कें-कें करता रहता है। बिस्तर, फूलों की सेज की जगह ‘जेल का बैरक’ हो गया है जहाँ से दीनबंधु का भाग जाने का मन करता है। अब तो कुछ दिनों से जानबूझ कर दूर रहने की भी कोशिश कर रही है। दिमाग ख़राब हो गया है। जीवन की सारी रंगीनियाँ काफ़ूर हो चुकी हैं। क्या इसे ही शादी का मज़ा कहते हैं? दीनबंधु को तो ये पता था कि शादी के बाद आदमी की मौज होती है। अपने घर में अपनी एक औरत, प्यार चाहिए या सेवा, हर इच्छापूर्ति के लिए उपलब्ध रहती है। फिर प्यार और सेवा का भी अर्थ उनके लिए एक ही था, ‘बिस्तर’।  उन्होंने सुना था कि जो पत्नी पति को बिस्तर पर ख़ुश न कर सके, वो किसी काम की नहीं होती और दीनबंधु को हार्दिक कष्ट है कि विमला जिसे वह बड़े प्यार से प्रीति कहते थे, अब उनके ‘किसी काम की नहीं रही।’

उधर घर विमला के अनकहे दुःख से सील रहा है।

डॉक्टर ने ‘सब ठीक है’ कहा तो ससुराल में भी ‘सब ठीक है’ ही मान लिया गया। अम्मां के जोड़ों का दर्द जो पिछले लगभग एक साल से दबा हुआ था फिर उभर आया है। उनसे अब कोई काम नहीं होता। विमला को भी तो एक साल किये गये आराम की क्षतिपूर्ति करनी थी  सो ससुराल लौटते ही वो ऑपरेशन का शरीर और दो महीने का बच्चा गोद में लिए नये सिरे से गृहस्थी सम्भालने में लग गयी है। हालाँकि शरीर अब पहले सा नहीं रहा। कमज़ोर हो गया है। जल्दी ही थकान हो जाती है। नाभि के नीचे ऑपरेशन के बाद की सिलाई के निशान देख कर अपनी ही देह पराई सी लगने लगती है। यहीं कहीं कभी-कभी दर्द उठता है तो कुछ देर लेट कर ही आराम होता है। इन सबके बीच दुधमुंहे बच्चे को सम्भालना, दूध पिलाना, पोतड़े साफ़ करना, रात-रात भर उसे लिए जागना और सुबह ही नहा-धो कर रसोई करने का अम्मां का नियम पूरा करना। दोपहर में कभी बच्चे के ही बहाने आधे घन्टे सुस्ताने लेट जाये तो अम्मां की आवाज़ आती है, “दिन में लेट, सो कर आदत मत बिगाड़ो। हमने छः बच्चे पैदा किये और बड़े किये। घड़ी-घड़ी आराम करने से देह और ढीली होती है। अभी तो पहलौठी का बच्चा है। आगे क्या करोगी? अभी से ये हाल है।” विमला बिना कुछ कहे उठकर फिर काम में लग जाती है।

चाची ने भी कुछ ऐसा ही कहा था कि बच्चा पैदा करने के बाद औरत और मज़बूत होती है। पता नहीं वो ही इस मज़बूती को क्यों महसूस नहीं कर पा रही।

जब से ससुराल लौटी है पति नाराज़ से चल रहे हैं। कारण वो कुछ समझ रही है, कुछ नहीं समझ पा रही। बात ही कहाँ होती है उनमें, जो अपनी भी समझा सके। चौबीस घन्टे नींद और थकावट से बोझिल शरीर रात में बिस्तर पर पति की इच्छा और इशारे समझने से इंकार कर दे तो कैसा आश्चर्य? मगर प्रतिक्रिया में पति की नाराज़गी उसे अजीब लगती है। आखिर बच्चा सिर्फ़ उसका तो नहीं। ना वो इसे सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से लायी है। इतनी पीड़ा सह कर उन्हीं के घर का चिराग़ तो जलाया है। चाची तो कहती थीं कि ‘बेटा लेकर जा रही हो। अब सिर पर बिठाई जाओगी’ लेकिन यहाँ सिर पर बैठाना तो दूर कोई सीधे मुँह बात भी नहीं करता। कभी-कभी अन्दर तक कसक जाती है। शादी के बाद उसकी एक छींक पर भी चिन्ता जताने वाले पति अब उसके इतने कष्ट को कैसे नहीं जान पाते? रात बिस्तर पर पहुँचते-पहुँचते थकान से चूर देह फोड़े सी टपकने लगती है। पति चाहते हैं कि वो प्यार-मोहब्बत की बात करे और वो... बिस्तर छूते ही जी चाहता है कि सीता मैया जैसे धरती में समाई थीं, वैसे ही वो बिस्तर में समा जाये। जी तो कभी-कभी ये भी चाहता है कि काश पति दो घड़ी को ही सही, थकान से गरमाये माथे पर हाथ रख कर हाल-चाल पूछ लें लेकिन वो तुनक कर सिर तक चादर खींच लेते हैं। विमला चाह कर भी सो नहीं पाती। ढाई महीने का बच्चा सारी-सारी रात जागता है। कभी खेलता। कभी रोता। उसकी रात तो बच्चे को गोद में उठाये, लेटते, बैठते, जागते ही कट जाती है। सुबह जब नींद आने लगती है तो बिस्तर छोड़ने का अल्टीमेटम मिल जाता है। इधर कुछ दिनों से अपने आप में ही सिमटने लगी है विमला। अन्दर उपजता आक्रोश चुप्पी में तब्दील होने लगा है। जाने कितना कुछ कहना चाहती थी पति से मगर अब वो चाह झुरा गयी है। देह पर पड़ा चीरे का निशान मानो आत्मा में उतर रहा है। उसने तो सोचा था कि शादी का मतलब शरीर के सुख से अलग एक ऐसा ठौर भी होता है जहाँ सब स्थिर हो सके। कुछ देर देह टिका कर मन का बोझ बाँटा जा सके... लेकिन जिसमें सारा दर्द अकेला पड़ जाये, अनकहा रह जाये, वो रिश्ता किस काम का?


सुबह–शाम अब भी हो रही है। रौशनी के किवाड़ बन्द होते जा रहे हैं। दीनबंधु की फैंटेसी आख़िरी साँस ले रही है। विमला की आस आँगन में सांझ की धूप सी ढल गयी है। दो जने एक ही रिश्ते में रह कर एक-दूसरे के काम के नहीं रहे हैं। घर के भीतर बिना आवाज़ कुछ चिटक गया है।

ये नुकसान तो है...कम या ज़्यादा...? पता नहीं।

नुकसान है भी किसका...? क्या पता?

कौन है हिसाब लगाने वाला...? शायद कोई नहीं।


प्रतिमा सिन्हा
वाराणसी
मो. 9721452507 ईमेल: iam.pratima7@gmail.com
स्नातकोत्तर - राजनीति शास्त्र एवं  पत्रकारिता एवं जनसंचार। National Council for Promotion of Urdu Language (N.C..P.U.L) New Delhi से उर्दू भाषा में  एकवर्षीय डिप्लोमा। 1996 में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह’ द्वारा आयोजित “ऑनस्पॉट कहानी लेखन" के व्यस्क वर्ग में कहानी ‘अस्मिता का प्रश्न’ को प्रथम पुरस्कार। मुंशी प्रेमचंद की दर्जन भर रचनाओं (कहानी और उपन्यास) का नाट्यरूपांतर।  'उत्तर प्रदेश', ‘अहा ज़िन्दगी’, सोच-विचार' सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आल इण्डिया रेडियो और दूरदर्शन द्वारा उत्तीर्ण 'वाणी’ प्रमाणपत्र प्राप्त उद्घोषिका। कविता संग्रह 'दिल दरवेश' और   उर्दू भाषा में नज़्मों का संग्रह 'सदा-ए-सहर' प्रकाशित। नाटक संग्रह ‘एकल-युगल', 'पांच मौलिक नाटक' शीघ्र प्रकाश्य। कहानियों, कविताओं, ग़ज़लों और नज़्मों का निरंतर लेखन. हिन्दी-उर्दू अख़बारों, वेब पोर्टलों और ब्लॉग्स में लगातार प्रकाशन। 
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