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परशुराम जयंती: आनर्त — आचार्य चतुरसेन शास्त्री कृत 'वयं रक्षामः' | Hindi Novel



जमदग्नि का विवाह इक्ष्वाकु वंश की राजकुमारी रेणुका के साथ हुआ था। उनके पांच पुत्र हुए, सबसे छोटे परशुराम थे...

आनर्त 

— आचार्य चतुरसेन शास्त्री कृत 'वयं रक्षामः' से


वैवस्वत मनु के इस पुत्र शर्याति थे। इन्होंने गुजरात प्रान्त में खम्भात की खाड़ी के पास अपना आनर्त राज्य स्थापित किया था। शर्याति बड़े भारी सम्राट् हुए। पीछे इनका ऐन्द्राभिषेक हुआ। शर्याति के पुत्र का नाम आनर्त था, उसी के नाम पर इस राज्य का नाम भी आनर्त रखा गया था। शर्याति की एक पुत्री सुकन्या नाम की थी, जिसे भूगुपुत्र च्यवन ऋषि को ब्याहा गया था। भृगु ऋषि अति प्रतिष्ठित, देव-असुर-पूजित थे। उनके तीनों पुत्र शुक्र, अत्रि और च्यवन विख्यात पुरोहित याजक हुए। शुक्र और अत्रि असुर-याजक थे, शुक्र हिरण्यकशिपु और बलि के पुरोहित थे, जिनके पुत्र सुन्द और मकरन्द को दैत्यपति हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद का शिक्षक नियत किया था। शुक्र वृषपर्वा दानव के भी पुरोहित थे। शुक्र और वृषपर्वा दोनों की कन्याएं देवयानी और शर्मिष्ठा यताति को ब्याही थीं। शर्याति ने च्यवन को अपनी पुत्री सुकन्या ब्याह दी, उन्हें अपना पुरोहित भी बना लिया। च्यवन आनर्त राज्य के दामाद और गुरु बनकर राजसी ठाठ से रहने लगे। शर्याति की गणना वेदर्षियों में थी। च्यवन और सुकन्या की सन्तानों ही में दधीचि, और्व, ऋचीक, जमदग्नि और परशुराम उत्पन्न हए।


कुछ काल बाद पुण्यजन राक्षसों के राजा मधु ने इस राज्य पर अधिकार कर लिया। मधु यादवों की शाखा में कुन्तराज्य का स्वामी था। मधुपुरी उसी ने बसाई, पीछे जिसका नाम मथुरा प्रसिद्ध हुआ। मधु साहस करके लंका से रावण के रंगमहल में से रावण के नाना सुमाली के बड़े भाई माल्यवान् की पुत्री कुम्भीनसी को चुरा लाया था। पीछे रावण के क्रोध से बचने के लिए उसने राक्षस-धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर मधु ने हैहयों से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। अन्त में यह राज्य हैहयों के राज्यों में मिल गया। भार्गव लोग भी शर्याति की भांति हैहयों के पुरोहित बने रहे। हैहयों ने उन्हें खूब सम्मानित किया तथा धन भी खूब दिया। पीछे हैहयों को निरन्तर की चढ़ाइयों और युद्ध के कारण धन की बड़ी आवश्यकता पड़ी। उन्होंने प्रजा से धन मांगा। इसी भांति भार्गवों से भी मांगा। परन्तु भार्गवों ने धन देने से इन्कार कर दिया। प्रथम तो उन्होंने आनर्त के राज्य पर अपने दायाद होने का अधिकार प्रदर्शित किया, पुरोहित और गुरुपद का भी अधिकार मांगा। बहुत हठ करने पर कहा —“ धन हमारे पास नहीं है।” इस प्रश्न पर भार्गवों और हैहयों में झगड़ा हो गया, भार्गवों ने अपना धन भूमि में छिपा दिया। हैहयों ने उनके घर खोद डाले। फिर उन्हें लूट लिया। घरों को खोदने से बहुत धन मिला। इस पर क्रुद्ध होकर उन्होंने भार्गवों को मार डाला। उनकी स्त्रियों के गर्भ फाड़ डाले। उनमें केवल एक और्व बचकर निकल भागे और सुमेरु-भूमि में काव्यशुक्र के आश्रय में रहने लगे। पीछे और्व ही के नाम पर सुमेरु-भूमि का नाम अरब पड़ा।

उनके साथ ही उनकी सगर्भा पत्नी भी थी। कालान्तर में उसने पुत्र प्रसव किया,  और समय पाकर वह उसी भूमि में बढ़कर गुप्तवास में ही युवा हुआ। उसका नाम ऋचीक रखा गया। युवा होने पर और्व ने उसे सब ऊंच-नीच समझाकर माहिष्मतों के राज्य से दूर सरस्वती-तीर पर आश्रम बनाकर रहने की आज्ञा दी। सरस्वती-तट पर बस जाने के कुछ काल ही बाद कान्यकुब्ज के राजा गाधि ने उन्हें अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी। समय पाकर जिस समय सत्यवती ने पुत्र प्रसव किया, उसी समय उसकी माता ने भी किया। सत्यवती के पुत्र का नाम जन्मदग्नि हुआ और गाधिपुत्र का विश्वामित्र। दोनों मामा-भांजे सरस्वती-तट पर ऋचीक ऋषि के आश्रम में पलने और शिक्षण पाने लगे। और्व ने अपने पुत्र ऋचीक को वेदज्ञ बनाया था। ऋचीक ने भी अपने पुत्र और साले को वेदविद् बनाया। फलत: जमदग्नि और विश्वामित्र उसी समय ख्यातनामा पुरुष हो गए थे। आगे चलकर दोनों मामा-भांजों ने मिलकर वेद की ऋचाएं बनाईं और वेदर्षि प्रसिद्ध हुए।

यह वह काल था जब आर्यों के राज्यों ने गंगा और यमुना के तट छू लिए थे। दैत्य और असुर अनार्य मधुपुरी (मथुरा) से पीछे हटते और नर्मदा-तट पर अपने आवास बनाते जाते थे। सरस्वती और दृषद्वती का मध्यवर्ती प्रदेश आर्यों का केन्द्रस्थल बनता जा रहा था। सूर्य और चन्द्रवंश के खण्डराज्यों के अतिरिक्त यहां यदु, पुरु, भरत, तृत्सु, तुर्वशु, द्रुह्यु, जह्यु जातियों के जनपद स्थापित हो चुके थे। उधर वाराणसी के गंगा-तट से नर्मदा तक आर्यों के योद्धा आगे बढ़ते जा रहे थे। नए-नए राज्यों की स्थापना हो रही थी।

विश्वामित्र के पिता गाधिन् जह्यु वंश के राजा थे। एक बार ऋचीक उनके यहां आए और एक सहस्र श्यामकर्म घोड़े गाधि को देकर उनकी पुत्री सत्यवती मांग ली। इस प्रकार गाधिपुत्री से उनका विवाह हुआ।

उस युग में भृगुवंश महामहिमावान् था ही। च्यवन के सौतेले भाई उशनस शुक्र जहां सब दैत्यों के याजक गुरु थे, वहां महामहिमावान् ययाति के श्वसुर भी थे। ये ययाति भी साधारण राजा न थे, अपितु, पुरु, यदु, अनु, द्रुह्यु और तुर्वशु इन पांच वंशों के मूल पुरुष थे। यद्यपि उनके आचार आर्यों से भिन्न थे, परन्तु इससे उनकी प्रतिष्ठा में कमी नहीं आती थी। हैहयों से विग्रह होने पर उन्होंने यदु, तुर्वशु और द्रुह्युओं का आश्रय लिया। ऋचीक ऋषि का असुर याजकवंशी होने से आर्यावर्त के बाहर दूसरी जातियों पर भी भारी प्रभाव था।

जमदग्नि का विवाह इक्ष्वाकु वंश की राजकुमारी रेणुका के साथ हुआ था। उनके पांच पुत्र हुए, सबसे छोटे परशुराम थे। परशुराम उदग्र प्रकृति के थे। ऋचीक ऋषि ने हैहयों द्वारा अपने कुलनाश और अपमान की इतनी भावना उनके मन में भर दी कि तरुण परशुराम का रक्त खौलने लगा और उसने शास्त्रों के साथ शस्त्रों की भी संपूर्ण शिक्षा प्राप्त की। संयोग से ही एक दुर्घटना के कारण परशुराम का उग्र स्वभाव प्रकट हो गया। परशुराम की माता रेणुका का मृत्तिकावती के राजा चित्ररथ के साथ गुप्त संबंध अकस्मात् प्रकट हो गया। जमदग्नि यों शान्त पुरुष थे, पर इस घटना से वे इतने उत्तेजित हुए कि उन्होंने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि वे तुरन्त ही अपनी माता का सिर काट लें। सभी पुत्र इस जघन्य कार्य को न कर सके। किन्तु परशुराम ने परशु उठा खट से माता का सिर काट लिया।

जब सरस्वती-तीर पर जमदग्नि के आश्रम में यह खेदजनक घटना घट रही थी, हैहयों का प्रबल प्रताप भारत पर छा रहा था। उनका राज्य मथुरा से नर्मदा-तट के प्रदेशों  में फैल गया था। उधर खम्भात से काशी तक उनका विस्तार था। कोई भी अकेला आर्य राजा उनके सम्मुख आने का साहस न कर सकता था। इस प्रकार से समूचे मध्य प्रदेश का स्वामी हैहय कार्तवीर्य सहस्रार्जुन था। इसके राज्य का विस्तार पूर्व में चर्मण्वती (चम्बल) नदी, पश्चिम में समुद्र, दक्षिण में नर्मदा और उत्तर में आनर्त तक था। उसकी विपुल पोतवाहिनी सेना थी और उसका हयदल अजेय था। वह प्रतापी, साहसी और मानी था। फिर शर्याति भी उसके साथ थे।

हैहयों से हारकर यादव ज्यामद्य अपना पैतृक राज्य छोड़कर मृत्तिकावती में विदर्भ के निकट जा छिपा। सूर्यवंशी राजा बाहु और्व ऋषि के आश्रम में आ छिपा। विश्वामित्र के पुत्र लौहि का कान्यकुब्ज राज्य उन्होंने नष्ट कर दिया। केवल अयोध्या का सूर्यवंशी राज्य इनके उत्पात से बचा रहा।

परन्तु परशुराम विश्वामित्र की बहिन के पौत्र और इक्ष्वाकु राजा के दौहित्र तथा गरिमामय भृगुवंश के उत्तराधिकारी थे। वे हैहयों को अपना चिरशत्रु समझते थे और ज्यों ज्यों वे सहस्रार्जुन की ख्याति तथा शौर्य-चर्चा सुनते जाते थे, उनके मन में उससे मुठभेड़ करने की इच्छा प्रबल होती जाती थी। उन्होंने यादवों को अपना साथी बना लिया था। ये दोनों ज्वलन्त पुरुष इन दिनों परस्पर टकराने के लिए शक्ति-संचय कर रहे थे।

संयोगवश जगदग्नि की स्त्री रेणुका की बहिन सहस्रार्जुन को ब्याही थी। इस प्रकार यद्यपि जमदग्नि सहस्रार्जुन के साढू थे, फिर भी प्राचीन वंश-वैर तो था ही। अब जो उन्होंने अपनी पत्नी का वध कर डाला, तो इससे क्रुद्ध होकर सहस्रार्जुन ने चढ़ाई करके जमदग्नि का आश्रम जला डाला, गौएं लूट लीं और मनुष्यों को मार डाला। इस पर पिता की आज्ञा से परशुराम ने अपने मौसा — इस विख्यात योद्धा सहस्रार्जुन को सम्मुख युद्ध में मार डाला। कुपित होकर सहस्रार्जुन के उत्तराधिकारी हैहयों ने परशुराम की अनुपस्थिति में निरस्त्र जमदग्नि को मार डाला। इस पर क्रुद्ध हो हैहयों का बीजनाश करने का संकल्प कर परशुराम ने निरन्तर कठिन युद्ध करके हैहय वंश का समूल उच्छेद करके समन्तक तीर्थ में उनके रक्त से पांच कुण्ड भरे।

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