जगदीश स्वामीनाथन की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 25: | Vinod Bhardwaj on Jagdish Swaminathan


जगदीश स्वामीनाथन की यादें 

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

स्वामीनाथन सत्तर के दशक में दिल्ली की कला दुनिया के महानायक थे, साठ के दशक में भी उनकी धाक थी, पर मैं जब दिल्ली आया, 1974 की शुरुआत में, तो स्वामी के ग्लैमर और गरिमा दोनों का कोई मुक़ाबला नहीं था। अस्सी के दशक की शुरुआत में वह भोपाल चले गए, दिल्ली से उनका रिश्ता बना रहा, पर आठ नौ साल जो मैंने ख़ुद देखे उस समय में वह कला की सबसे सक्रिय हस्ती थे। हुसेन, सूजा बड़े नाम थे पर हुसेन ख़ास तौर पर दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, हैदराबाद , इंदौर आदि सभी शहरों से जुड़े थे। दिल्ली में उनकी आवाजाही थी। स्वामी का जन्म शिमला में हुआ, वहाँ उनके स्कूल के साथी राम कुमार और निर्मल वर्मा थे, छोटी उम्र में ही वह दिल्ली आ गए, युवावस्था में कॉम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े, पार्टी से मोहभंग भी हो गया पर वामपंथी अपने लेफ़्टी होने से कभी पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकता है। 

मुझे उन दिनों स्वामी को थोड़ा बहुत नज़दीक से देखने का मौक़ा धूमीमल गैलरी और दिनमान के सहयोगी वरिष्ठ कवि मित्र प्रयाग शुक्ल के कारण भी यह मौक़ा मिला। रवि जैन उन दिनों धूमीमल में स्वामी की सलाह से काम करते थे। 74 से 80 तक मैंने देश के अधिकांश बड़े और प्रतिभाशाली कलाकारों की महत्वपूर्ण प्रदर्शनियाँ धूमीमल में ही देखी थीं। कृष्ण खन्ना, जोगेन, अर्पिता सिंह, परमजीत , बिकाश भट्टाचार्य, मनु पारेख, मनजीत बावा, की प्रदर्शनियाँ जब वहाँ होती थीं, तो उद्घाटन के बाद की पार्टियों का भी एक अलग ग्लैमर था। इन पार्टियों में आपसी संवाद बहुत महत्वपूर्ण था। कॉक्टेल पार्टियाँ सिर्फ़ टुन्न हो जाने के लिए नहीं होती थीं, बौद्धिक विमर्श अधिक महत्वपूर्ण था। उन दिनों किसी भी शाम कनाट प्लेस धूमीमल जाने का मतलब था कि समोसे और चाय के साथ स्वामी से कोई सार्थक संवाद ज़रूर होगा। 

रवि जैन ज़्यादा उत्साही थे, उनके बड़े भाई महेंद्र शांत रहते थे और जब दोनों के और भी बड़े भाई (सेठ जी) आ जाते थे, तो माहौल में सन्नाटा छा जाता था। एक बार कृष्ण खन्ना ने बताया, मैं और स्वामी रवि के साथ समोसे ठूँस रहे थे, कि अचानक सेठ जी आ गए। सब के सब अपने समोसे ठीक से निगल भी नहीं पा रहे थे। सेठ जी को लगता था कि रवि इन आवारा कलाकारों के साथ बैठ कर अपने बिजनेस पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। 

सूजा भी न्यूयॉर्क से काफ़ी आने लगे थे, वहाँ उन्हें पचास के दशक के लंदन जैसा सम्मान नहीं मिल पा रहा था। न्यूयॉर्क में वह कलाकारों की भीड़ में खो से गए थे। स्वामी पिकासो विरोधी थे, सूजा पिकासो समर्थक। रवि जैन दो दुनियाओं को संभाल लेते थे। स्वामी और सूजा के बीच एक ख़ास तरह का लव-हेट रिश्ता भी था। 

उन दिनों स्वामी ललित कला अकादमी की राजनीति में भी सक्रिय थे। बॉयकॉट अकादमी आंदोलन भी सक्रिय था। स्वामी पुराने कॉम्युनिस्ट थे, राजनीति करना भी जानते थे। लेकिन अंत में डिमॉक्रेसी के नाम से अकादमी में मीडीयाकर अध्यापक कलाकारों ने अकादमी पर क़ब्ज़ा कर लिया, स्वामी उससे अलग हो गए। विवान सुंदरम जैसे सशक्त और प्रतिबद्ध कलाकार भी कुछ समय तक अकादमी बहिष्कार कार्यक्रम में स्वामी के साथ सक्रिय थे। पर वह भी इस ठस होती चली जा रही संस्था के प्रति उदासीन हो गए। 

स्वामी ने रविवार पत्रिका के एक प्रसिद्ध इंटर्व्यू में मुझसे कहा था, एक कलाकार को कुशल छापामार योद्धा की तरह कला बाज़ार पर नज़र रखनी होती है। वह शायद कलाकार की रोमांटिक और स्लगिश (ढिल्लड़) क़िस्म की छवि के ख़िलाफ़ थे। वह कलाकार से राजनीतिक जागरूकता की भी उम्मीद करते थे। गैलरी सिस्टम बस कलाकार को अपना क़ैदी न बना ले। 

स्वामी ज़बरदस्त कविता प्रेमी थे। नोबेल पुरस्कार विजेता मेक्सिकी कवि आक्टेवियो पाज से उनकी मित्रता प्रसिद्ध है। पाज ने स्वामी पर एक अद्भुत कविता भी लिखी है। 1979 में धूमीमल में स्वामी की एकल प्रदर्शनी में एक शाम हिंदी कवियों के कविता पाठ की रखी गयी। स्वामी ने हिंदी में ख़ुद कुछ अच्छी कविताएँ लिखी थीं, उनका एक छोटा सा संग्रह छाप कर हिंदी कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के 51वें जन्मदिन को समर्पित किया गया था। इस कार्यक्रम की कोई विडीओ रिकॉर्डिंग होती, तो वह अद्भुत होती। स्वामी कविता को बहुत ध्यान से सुनते थे। मैंने एक लोटे पर कविता वहाँ पढ़ी थी। स्वामी ने बाद में मुझसे कहा, मैं सोच रहा था कि आप इस कविता का अंत किस तरह से करेंगे। इस कविता का अंत आसान नहीं था, वह बोले। 

मैं शांति निकेतन में जोगेन चौधरी के आयोजन में मंच से कह चुका हूँ, स्वामी के साथ अकेले रम पीने का स्वाद भी अलग था, नशा भी अलग था। एक बार मैं साउथ इक्स्टेन्शन में घूम रहा था, सोचा स्वामी को भी मिल लिया जाए। स्वामी बतियाने के मूड में थे, रम का नशा तो अनोखा था उस दिन। स्वामी बेस्मेंट गए, काफ़ी देर बाद ग्रूप 1890 के कैटलॉग की प्रति मेरे लिए खोज कर लाए। 

जगदीश स्वामीनाथन


मनजीत बावा मानते थे, भारत भवन, भोपाल में रूपंकर वीथी स्वामी का बड़ा योगदान है, ग्रूप 1890 से भी कहीं ज़्यादा। मुझे लगता हैं दोनों अलग अलग समय के बड़े काम हैं। 

स्वामी अंत में भोपाल लंबे समय रह कर दिल्ली वापस आ गए। उनके आकस्मिक निधन से क़रीब चार महीने पहले जाड़े की एक सुबह के बिक्रम सिंह के साथ यू जी सी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में इंटर्व्यू के लिए मैं स्वामी के घर गया था। उनकी सेहत अच्छी नहीं लग रही थी। वह इंटर्व्यू के बीच बार बार बीड़ी पीना चाह रहे थे। इंटर्व्यू छात्रों के लिए था, हम कैमरा बंद कर देते थे। 

अभी एक और उनके साथ कविता पाठ बाक़ी था। उनके निधन से कुछ ही दिन पहले गैलरी इस्पास ने आइफैक्स गैलरी में ड्रॉइंग 94 प्रदर्शनी में यह कविता पाठ रखा था। प्रदर्शनी के क्यूरेटर प्रयाग शुक्ल थे। बाद में अमिताभ दास के घर एक बड़ी पार्टी हुई थी। कोई नहीं जानता था, स्वामी के साथ आख़िरी पार्टी थी। 

नरेंद्रपाल सिंह ने इस पार्टी को याद करते हुए एक पेंटिंग बनायी है जिसमें मैं और प्रयाग जी भी हैं। मैंने ही इस चित्र को नाम दिया था, द लास्ट पार्टी। 

वह मेरे लिए एक दूसरे अर्थ में भी लास्ट पार्टी थी। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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