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असग़र वजाहत का नाटक 'ईश्वर-अल्लाह' | Asghar Wajahat's Play 'Ishwar-Allah'

असग़र वजाहत का नाटक 'ईश्वर-अल्लाह'  | Asghar Wajahat's Play 'Ishwar-Allah'

 

ईश्वर-अल्लाह

(नाटक)

असग़र वजाहत


हिंदुस्तान की जीती-जागती गंगा जमुनी संस्कृति पर अनेकों काल्पनिक फ्रंटों से हमला हो रहा है। साहित्य का धर्म सत्य के साथ खड़े होना है, और असग़र वजाहत अपने नाटक 'ईश्वर-अल्लाह' के माध्यम से इस धर्म को आगे बढ़ा रहे हैं। हज़रत ग़ौस अली शाह क़लन्दर पर आधारित यह नाटक तब और संजीदा हो जाता है जब उनके समकालीन मिर्ज़ा ग़ालिब का पदार्पण होता है। ग़ालिब की इस मुलाक़ात का ज़िक्र रज़ा मीर के अंग्रेज़ी उपन्यास 'मर्डर एट द मुशायरा' (प्रकाशक: अलिफ़ बुक कंपनी) में भी आया है। 
    छपे हुए नाटक में हमें पात्रों के नाम को पन्ने में बायीं तरफ़ और संवाद को दाहिनी तरफ़ पढ़ने की आदत है  इंटरनेट पर ऐसा प्रकाशित करना तनिक मुश्किल होता है लेकिन, मैंने ठान लिया था। उम्मीद है पाठकों को सुविधा होगी।   ~ सं० 

 
भूमिका
 
‘ईश्वर-अल्लाह’ नाटक 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध सूफी हज़रत ग़ौस अली शाह क़लन्दर (Hazrat Ghouse 'Ali Shah Qalandar Panipati) (1804 1880) के जीवन से प्रेरित है। सूफी परम्पराओं में एक परम्परा ‘तज़किरा’ लिखने की भी रही हैं। सूफी अपने जीवन के अनके महत्वपूर्ण पक्षों जैसे परिवार का इतिहास, वंशावली, शिक्षा-दीक्षा, गुरु परम्परा, जीवन की अन्य घटनाएं, अपनी मान्यताओं और अपने अनुभवों का बख़ान अपनी शिष्य मण्डली में किया करते थे। शिष्य उनकी बताई हुई बातों, जानकारियों आदि को लिख लेते थे। यह एक तरह से सूफी गुरु के जीवन और विचारों पर केन्द्रित सामग्री बन जाती थी जिसे प्रायः प्रकाशित किया जाता था। इसी प्रकार की एक पुस्तक ‘तज़किर-ए-ग़ौसिया’ है। यह 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध सूफी हज़रत ग़ौस अली शाह क़लन्दर क़ादरी के बयानों का संकलन है जो उनके शिष्य मौलाना गुल हसन शाह क़ादरी ने किया है। इस पुस्तक को ख़ज़ान-ए-इल्मो-अदब, अल्करीम मार्केट, उर्दू बाज़ार, लाहौर ने सन् 2000 में प्रकाशित किया था। प्रस्तुत नाटक ‘ईश्वर अल्लाह’, ‘तज़किर-ए-ग़ौसिया’ से प्रेरित अवश्य है पर कुछ प्रसंग ऐसे भी लिए गये हैं जिन्हें दूसरे सूफी संतों के जीवन से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि नाटक में मुख्य पात्र का नाम एक काल्पनिक नाम रखा गया है। दूसरे ऐतिहासिक पात्रों के नाम भी बदल दिये गये हैं। नाटक की संरचना कुछ अलग तरह से की गई है। कुछ दृश्य केवल एकालाप के ही दृश्य हैं। प्रयास यह किया कि नाटक एक सूफी द्वारा उसकी कहानी सुनाई जाने का आभास देता रहे। कुछ ऐतिहासिक पात्रों के नाम जैसे— मिर्ज़ा ग़ालिब और उनके शिष्य हरगोपाल तुफ़्ता अपने मूल नाम से ही नाटक में आते हैं। हज़रत ग़ौस और मिर्ज़ा ग़ालिब की मुलाक़ात एक ऐतिहासिक तथ्य है। उनके जीवन के दूसरों प्रसंगों को थोड़ा विस्तार दिया गया है पर वे सब वास्तविक घटनाओं से प्रेरित हैं।
 
पात्र
 
1. सूफ़ी बरक़तउल्ला— सूफ़ी
 
2. दया राम पाण्डेय— सूफ़ी बरक़तउल्ला का हिन्दू नाम
 
3. अलीमुल्लाह— सूफ़ी बरक़तउल्ला के पिता
 
4. अहमद— अलीमुल्लाह के मित्र
 
4. पंडित गनेशी राम पाण्डे— सूफ़ी बरक़तउल्ला के हिन्दू पिता
 
6. पंडिताइन— सूफ़ी बरक़तउल्ला की हिन्दू माँ
 
7. सावित्री— पंडित गनेशी राम पाण्डे की लड़की
 
8. शहर काज़ी— शहर का काज़ी
 
9. महंत श्रीनाथ महाराज— मठ के महंत
 
10. घाट का पण्डा
 
11. तथा अन्य
 
नाटक का सार
 
1. नाटक एक कव्वाली से प्रारंभ होता है। कव्वाली के समाप्त होते ही सूफी बरक़तउल्ला मंच पर आते हैं और दर्शकों को बताते हैं कि नाटक में जो कुछ होने जा रहा है वह सब उनके जीवन की सच्ची घटनाओं पर केन्द्रित है।
 
2. मौलवी अलीमुल्लाह के घर एक पुत्र का जन्म होता है लेकिन उसे जन्म देने वाली मां मर जाती है। समस्या ये सामने आती है कि शिशु को दूध कौन पिलायेगा और वह जीवित कैसे रहेगा। अलीमुल्लाह के मित्र अहमद सुझाव देते हैं कि गांव में पंडित गनेशी राम पाण्डेय के घर एक लड़की का जन्म हुआ है। पंडिताइन यदि नव जात शिशु को दूध पिला दे तो वह बच सकता है।
 
3. अलीमुल्लाह और अहमद पंडित गनेशी राम पाण्डेय के घर जाकर यह अनुरोध करते हैं कि पंडिताइन नवजात शिशु को दूध पीला दे ताकि वह बच सके। पंडिताइन कहती है कि वह दूध पिला देगी पर बालक पर उनका क्या अधिकार होगा। अलीमुल्लाह कहते हैं कि बालक पर पंडित जी और पंडिताइन का वही अधिकार होगा जो उनका होगा।
 
4. सूफी बरक़तउल्ला मंच पर आकर बताते हैं कि नवजात शिशु बड़ा होने लगा उसकी शिक्षा-दीक्षा उसके पिता अलीमुल्लाह इस्लामिक ढंग से करने लगे और उसके हिन्दू पिता पंडित गनेशी राम पाण्डेय उसकी शिक्षा-दीक्षा हिन्दू रीति-रिवाज़ और परम्पराओं के अनुसार करने लगे। पंडित जी ने बरक़तउल्ला का नाम दया राम पाण्डेय रखा।
 
5. दोनों धर्मों के सिद्धांतों तथा दोनों धर्मों की भाषाओं की पूरी जानकारी हो जाने के बाद बरक़तउल्ला इस नतीजे पर पहुंचे है कि वास्तव में हिन्दू और मुस्लिम धर्म मूलरूप में एक ही हैं। वह यह संदेश गाँव के अन्य लोगों को भी देते हैं। उनकी बात को मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।
 
6. बरक़तउल्ला के विचारों के कारण शहर काज़ी उनसे नाराज हो जाता है लेकिन तर्क नहीं कर पाता क्योंकि उसका ज्ञान दोनों धर्मों के बारे में उतना नहीं है जितना बरक़तउल्ला का है। शहर काज़ी जानता है कि बरक़तउल्ला के विचार हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अंतर को मिटा देंगे और इस कारण वह चाहता है कि बरक़तउल्ला गाँव में न रहे। शहर काज़ी उन्हें गाँव से चला जाने का हुक्म देता है।
 
7. बरक़तउल्ला शहर काज़ी का हुक्म नहीं मानते और गाँव में उनके विचारों को मानने वाली की संख्या बढ़ती चली जाती है।
 
8. शहर के काज़ी और महंत श्रीनाथ महाराज अलीमुल्लाह और पंडित गनेशी राम पाण्डेय को समझाते और डराते हैं कि अगर उनके पुत्र बरक़तउल्ला ने गाँव न छोड़ा तो उसे कड़ी सज़ा दी जायेगी। वह दोनों धर्मों का अपमान कर रहा है।
 
9. बरक़तउल्ला मंच पर आकर बताते हैं कि किस प्रकार विवश होकर उन्हें गाँव छोड़ना पड़ा और वे फ़कीर बन गये। फ़कीरी जीवन में उन्हें कैसे-कैसे अनुभव हुए। एक दिन उन्होंने किसी से मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल सुनी। ग़ज़ल उन्हें इतनी पसंद आयी कि उन्होंने तय किया कि इस ग़ज़ल को वे मिर्ज़ा ग़ालिब के मुंह से सुनेंगे।
 
10. बरक़तउल्ला मिर्ज़ा ग़ालिब के घर जाते हैं और उनके मुंह से ग़ज़ल सुनते हैं। बातचीत से पता चलता है कि सूफी बरक़तउल्ला दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद में ठहरें हैं। ग़ालिब कहते हैं कि उनसे मिलने आयेंगे।
 
11. मिर्ज़ा ग़ालिब सूफी बरक़तउल्ला के लिए खाना लेकर फतेहपुरी मस्जिद आते हैं। लेकिन सूफी साहब के साथ खाना खाने में हिचकिचाते हैं। कहते हैं कि वे गुनेहगार हैं, शराब पीते हैं इसलिए एक बुजुर्ग सूफी के साथ खाना खाने में शर्म आती है। सूफी बरक़तउल्ला के बहुत आग्रह करने पर ग़ालिब एक अलग प्लेट में अपने लिए खाना निकाल लेते हैं और खाते हैं। ग़ालिब उन्हें अपने घर आने का न्यौता भी देते हैं।
 
12. इस सीन में बरक़तउल्ला शिष्यों को अपने जीवन के कुछ बहुत रोचक अनुभवों के बारे में बताते हैं।
 
13. सूफी बरक़तउल्ला को उनके एक शिष्य ने अपने घर खाने पर बुलाया है। बरक़तउल्ला उससे पूछते हैं तुमने मेरे लिए क्या-क्या पकवाया है। शिष्य बताता है कि क्या-क्या खाना तैयार हुआ है। बरक़तउल्ला उससे पूछते हैं कि तुमने शराब का बंदोबस्त किया है? शिष्य घबरा जाता है और कहता है कि शराब तो हराम है। बरक़तउल्ला कहते हैं कि मैं तो शराब पीता हूँ। मेरे लिए शराब लाओ। शिष्य बड़ी कठिनाई से शराब लाता है। बरक़तउल्ला खाना खाते हैं लेकिन शराब नहीं पीते। जब शिष्य पूछता है कि आप शराब क्यों नहीं पी रहे तब वे कहते हैं कि मैं शराब नहीं पीता लेकिन अगर तुमने शराब न मंगाई होती और यहाँ शराब न रखी होती तो मैं तुम्हारे घर खाना नहीं खाता क्योंकि उससे यह सिद्ध होता कि तुम्हारे दिल में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं हैं जो तुमसे बिल्कुल विपरीत हैं।
 
14. सूफी बरक़तउल्ला को सूचना मिलती है कि उनके हिन्दू पिता गुज़र गये हैं। पंडिताइन माँ ने उन्हें घर बुलाया है। सूफी बरक़तउल्ला घर के लिए रवाना हो जाते हैं।
 
15. सूफी बरक़तउल्ला घर पहुंचते हैं। पंडिताइन माँ और बहन उससे मिलते हैं। पंडिताइन माँ कहती हैं कि तुम्हीं हमारे बेटे हो और तुम्हीं को अपने पिताजी का अंतिम संस्कार करना है। मतलब यह कि तुम्हें उनकी आत्मा की शांति के लिए पिण्ड दान करना होगा। सूफी बरक़तउल्ला पूरी तैयारी करके पिण्ड दान करने हरिद्वार रवाना हो जाते हैं।
 
16. सूफी बरक़तउल्ला पिण्ड दान करने गंगा जी में उतरते हैं। वे उसी तरह के कपड़े पहनते हैं जैसे पिण्ड दान करते समय लोग पहनते हैं। लेकिन उन्हें उनके गाँव का एक आदमी पहचान लेता है और कहता है कि मियाँ जी तुम यहाँ कैसे आ गये ? सूफी बरक़तउल्ला उसे बताते हैं कि वे अपने हिन्दू पिता पंडित गनेशी राम पाण्डेय का श्राद्ध करने आये हैं। बरक़तउल्ला के मुसलमान होने की बात दूसरे लोग भी सुन लेते हैं और वे कहते हैं कि एक मुसलमान ने गंगा जी में आकर उसे अपवित्र कर दिया। उनके सारे अनुष्ठान भंग हो गये। कुछ लोग बरक़तउल्ला को खींचकर बाहर लाते हैं। काफी शोर-शराबा और हंगामा होता है। यह विवाद भी होता है कि बरक़तउल्ला मुसलमान हैं या हिन्दू हैं। इसी बीच घाट का बड़ा पण्डा बाहर निकल आता है। वह बरक़तउल्ला से बातचीत करता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि बरक़तउल्ला वास्तव में हिन्दू धर्म और आचार व्यवहार के ज्ञानी हैं। बरक़तउल्ला के ज्ञान से प्रभावित होकर बड़ा पण्डा कहता है कि ज्ञानी के अंदर आने से गंगा अपवित्र नहीं होती।
 
बड़ा पण्डा बरक़तउल्ला को अपने साथ गंगा जी में ले जाता है और वे अनुष्ठान पूरा करते हैं।
 
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दृश्य-1

 
(मंच पर अंधेरा है। रोशनी की एक किरण आती है जिसमें सूफी नृत्य करने वाले सूफी की टोपी दिखाई पड़ती है...रौशनी बढ़ती है...नृत्य करते सूफी मंच पर आ जाते हैं...पारम्परिक संगीत और गायन के साथ नृत्य जारी हो जाता है जो क्रमशः चरम उत्कर्ष पर पहुंचता है...मंच पर अंधेरा हो जाता है...कुछ क्षण बाद प्रकाश आता है...मंच पर सूफी बरक़तउल्ला खड़े हैं...)
 
सूफ़ी बरकत: बिस्मिल्लाहिर्रमानिर्रहीम। ओम गणेशाय नमः...मैं बरक़तउल्ला वल्द अलीमुल्लाह वल्द बरक़तउल्लाल्लाह जो कुछ कहने जा रहा हूँ जो कुछ बताने जा रहा हूँ यह मेरे जीवन की सच्ची घटनाएं हैं। बिजनौर जिले के रूपाला गाँव में मेरा जन्म हुआ था। ठीक-ठीक सन् और तारीख़ को किसी को पता नहीं लेकिन कहा जाता है मैं उस साल पैदा हुआ था जब फ़िरगियों ने दिल्ली पर क़ब्जा किया था। मतलब यह कोई सन् अट्ठारह सौ चार की बात है।
 
(मंच के पीछे से बच्चे की रोने की आवाज़ आती है, सूफ़ी बरक़त मंच से चले जाते हैं।)
 
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दृश्य-2

 
(मंच पर सूफ़ी बरकत के पिता अलीमुल्लाह का प्रवेश होता है। बच्चे के रोने की आवाज़ बढ़ जाती है। अलीमुल्लाह मंच पर बेचैनी से टहलने लगते हैं। कुछ ही क्षण बाद दाई का प्रवेश होता है और दाई उनके सामने चुपचाप सिर झुका कर खड़ी हो जाती है। दाई कुछ नहीं बोलती)
 
अलीमुल्लाह: क्या खुशखबरी दे रही हो।
 
दाई: खुशखबरी ज़रूर होती अगर।
 
(बोलते-बोलते रूक जाती है।)
 
अलीमुल्लाह: क्या हुआ सब ठीक तो है न?
 
दाई: बच्चा तो बिल्कुल ठीक है लेकिन चच्ची नहीं रहीं।
 
अलीमुल्लाह: ये क्या कह रही हो... क्या कह रही हो...
 
दाई: हाँ चच्चा...चच्ची नहीं बचीं।
 
अलीमुल्लाह: ओफ...ये क्या हो गया।
 
दाई: आई को कौन टाल सकता है चच्चा।
 
अलीमुल्लाह: पर होगा अब क्या ?
 
दाई: चच्चा बच्चे को दूध कौन पिलाएगा और बिना दूध के बच्चा कब तक ज़िन्दा रहेगा।
 
(अलीमुल्लाह घबरा जाते हैं उसी समय अहमद का प्रवेश।)
 
अहमद: क्या ख़बर है भाई साहब क्या हुआ? दाई तो आज सुबह से ही आपके घर आ गई थी।
 
अलीमुल्लाह: ऊपर वाले ने अजीब रंग दिखाया है।
 
अहमद: क्यों क्या हो गया?
 
अलीमुल्लाह: लड़का हुआ है लेकिन।
 
(चुप हो जाते हैं।)
 
अहमद: यह तो खुशी की बात है अलीम भाई।
 
अलीमुल्लाह: नहीं खुशी की बात नहीं है। तुम्हारी भाभी जान नहीं रही।
 
अहमद: अरे यह क्या कह रहे हैं।
 
अलीमुल्लाह: (ठण्डी साँस लेकर) दाई ने यही बताया है भाई।
 
अहमद: अफ़सोस सद् अफ़सोस। बेटे का मुँह भी न देख सकी।
 
अलीमुल्लाह: भाई अब सबसे बड़ी परेशानी तो ये है कि बच्चे की जान कैसे बचाई जाये… उसे दूध कौन पिलायेगा...और दूध के बगै़र वह कितने दिन ज़िन्दा रहेगा।
 
अहमद: जी हाँ...ये तो...
 
अलीमुल्लाह: कुछ समझ में नहीं आता क्या किया जाये।
 
अहमद: (कुछ सोचते हुए,) एक बात समझ में आ रही है लेकिन...
 
अलीमुल्लाह: क्या बात?
 
अहमद: मेरे मोहल्ले में एक किसी के यहाँ कल एक लड़की पैदा हुई है...अगर।
 
अलीमुल्लाह: (आँखें चमकने लगती हैं) हाँ... ये तो...
 
अहमद: लेकिन वो हिन्दू हैं...ब्राह्मण हैं।
 
अलीमुल्लाह: मियाँ जान बचानी है...इंसान की जान इंसान न बचायेगा तो कौन बचायेगा… इसमें मज़हब कहाँ से आ गया।
 
अहमद: अब सवाल ये है कि पंडित जी तैयार होंगे या नहीं।
 
अलीमुल्लाह: बात तो की जा सकती है...मुझे यक़ीन है अल्लाह उनके दिल में नेकी डाल देगा।
 
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दृश्य-3

 
(पंडित गनेशी राम अपने घर के सामने बैठे हैं। रामचरितमानस का पाठ रहे हैं। अलीमुल्लाह और अहमद आते हैं।)
 
अहमद: राम...राम पंडित जी...
 
गनेशी: राम...राम अहमद भाई...अरे मौलवी साहब भी पधारे हैं...अहो भाग्य...
 
अहमद: हाँ...मौलवी साहब आये हैं।
 
अलीमुल्लाह: आया ही नहीं हूँ...एक दरखास्त लेकर आया हूँ...एक बिनती करने आया
 
गनेशी: मौलवी साहब काहे को शर्मिंदा करते हैं...आप तो आदेश करें...
 
अलीमुल्लाह: मेरे ऊपर बड़ा सख़्त वक़्त पड़ा है गनेशी भाई।
 
गनेशी: अरे क्या हुआ।
 
अलीमुल्लाह: एक बच्चे को जनम देकर...हमारी घर वाली गुज़र गयीं।
 
गनेशी: अरे ये तो बड़ा बुरा हुआ।
 
अहमद: बिना माँ का बच्चा कब तक ज़िन्दा रहेगा गनेशी भाई...
 
गनेशी: हाँ ये तो है।
 
अलीमुल्लाह: (गिड़गिड़ा कर) गनेशी भाई आप चाहें तो मेरा बच्चा बच सकता है।
 
गनेशी: आप हुकुम दें...जो बन पड़ेगा करूँगा।
 
अहमद: हमने सुना है कि कल आपके यहाँ भी विलादत हुई है।
 
गनेशी: ऊपर वाले ने बेटी दी है अहमद भाई।
 
अलीमुल्लाह: (हाथ जोड़कर) गनेशी भाई...एक इल्तिजा...
 
(बोलते-बोलते रूक जाता है।)
 
गनेशी: कहें भाई साहब कहें...आपकी बात पूरे गाँव में कोई नहीं टाल सकता...
 
अलीमुल्लाह: पंडिताइन मेरे बच्चे को दूध पिला दें तो वो बच सकता है।
 
(गनेशी सोच में डूब जाते हैं।)
 
अलीमुल्लाह: (गिड़गिड़ा कर) मना न करना गनेशी भाई...
 
गनेशी: मौलवी साहब....ये पंडिताइन का अधिकार क्षेत्र है...उनसे ही पूछना पड़ेगा।
 
अहमद: भौजाई को बुलाओ गनेशी भाई...बात करते हैं।
 
गनेशी: (आवाज़ लगाता है) अरे सुनती हो...अरे सुनती हो...तनिक यहाँ आओ...मौलाना और अहमद भाई आये हैं...
 
(मंच पर पंडिताइन आती है।)
 
पंडिताइन: राम-राम अहमद भाई...राम-राम मौलवी जी...
 
(दोनों राम-राम का जवाब राम-राम से देते हैं।)
 
गनेशी: मौलवी साहब के यहाँ लड़के का जन्म हुआ है...
 
पंडिताइन: बधाई होवे मौलवी जी...
 
अलीमुल्लाह: अरे बहन बधाई क्या दे रही हो...बड़ी मुसीबत में पड़ गया हूँ।
 
पंडिताइन: क्या मुसीबत है ?
 
अहमद: बच्चे को जनम देकर भाभी जी गुज़र गयीं... पंडिताइन: राम-राम...कैसे ?
 
अलीमुल्लाह: मौत तो किसी भी बहाने आ जाती है...अब क्या बताऊँ।
 
अहमद: मौलवी साहब एक ग़रज लेकर तुम्हारे पास आये हैं भाभी।
 
पंडिताइन: हमसे जो सकेगा करेंगे....बताओ भईया...क्या बात है ?
 
अलीमुल्लाह: (हाथ जोड़कर) मेरे बच्चे की जान बचा लो बहन।
 
पंडिताइन: जान बचा ले? कैसे?
 
अलीमुल्लाह: उसे तुम्हारा दूध मिल जाए...तो बच जायेगा।
 
पंडिताइन: हमारे दूध पर तो हमारी बेटी का अधिकार है मौलवी साहब।
 
अलीमुल्लाह: हाँ बेशक सही कह रही हैं...लेकिन...एक रोटी गाय के लिए भी डाली जाती है बहन।
 
अहमद: किसी को जीवन देने से बड़ा काम क्या हो सकता है भाभी।
 
गनेशी: अब सोच लेव।
 
पंडिताइन: ये तो बड़े धर्म-संकट में डाल दिया मौलवी साहब।
 
अहमद: संकट क्या है भाभी...बच्चे की जीवन का सवाल है।
 
पंडिताइन: (सोचते हुए) चलो ठीक है अहमद भाई...दूध पिला देंगे...पर ये बताओ कि बच्चे पर हमारा क्या अधिकार होगा ?
 
अलीमुल्लाह: वही अधिकार होगा जो मेरा होगा...जिस तरह मैं उसका पिता हूँ...उसी तरह पंडित जी उसके पिता होंगे और आप माता होंगी।
 
अहमद: (बहुत घबराकर) ये क्या कह रहे हैं भाई साहब...क्या कह रहे हैं।
 
अलीमुल्लाह: अहमद मियां मैं जो कुछ कह रहा हूँ....न सिर्फ सोच-विचार कर कह रहा हूँ बल्कि मैं पूरी ज़िंदगी उसका पाबंद रहूंगा।
 
गनेशी: बहुत बड़ी बात कह रहे हैं....मौलाना साहब....
 
अलीमुल्लाह: मुझे मालूम है...इंसान की जान बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं है पंडित जी...
 
गनेशी: (खुश होकर) तो वह हमारा भी बेटा होगा ...
 
पंडिताइन: हमारे कोई लड़का है भी नहीं।
 
अलीमुल्लाह: वही तुम्हारा लड़का होगा बहन...लड़का होगा।
 
अहमद: तो तुम तैयार हो भाभी।
 
पंडिताइन: हाँ चलो...तुम्हारे साथ चलती हूँ।
 
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दृश्य-4

 
(मंच पर बरक़तउल्ला सूफ़ी आते हैं।)
 
बरक़तउल्ला: अब्बा जान ने जो पंडित जी से वायदा किया था उसे पूरा किया...मैं अब्बा के घर से पंड़ित जी के घर आ गया। पंडिताइन माई ने मुझे बचा लिया...मेरे अब्बा ने मेरा नाम बरक़तउल्ला रखा तो पिताजी ने मेरा नाम दया राम पाण्डे रखा है। मैं अब्बा के साथ सुबह की नमाज़ पढ़ने के बाद पिता जी के घर चला जाता था और वहाँ पूजा करता था। इस बात पर न तो अब्बा ने कभी एतराज़ किया और न मेरे नमाज़ पढ़ने पर पिताजी ने कभी उंगुली उठायी।
 
(मंच पर अंधेरा हो जाता है बरक़तउल्ला चले जाते हैं। मंच पर फिर प्रकाश आता है। मंच के एक कोने में अलीमुल्लाह बैठे हैं और दूसरे कोने में गनेशी और पंडिताइन बैठे हैं। मंच के बीच में एक लड़का(बरक़तउल्ला) और लड़की(सावित्री) खेल रहे हैं। दोनों की उम्र 7 साल की करीब है। मंच पर प्रकाश केवल अलीमुल्लाह पर पड़ता है। वे अपने सामने कु़रान शरीफ रखे बैठे हैं। पास में ही एक तख़्ती और क़लम-दवात रखा है।)
 
अलीमुल्लाह: (आवाज़ देते हुए) बरक़तउल्ला इधर आओ...
 
(बरक़तउल्ला अलीमुल्लाह के पास जाता है।)
 
अलीमुल्लाह: बेटा आज तुम्हारी बिस्मिल्लाह है...आओ बैठो...देखो ये तख़्ती है न...ये क़लम है...ये क़ुराने पाक है...बेटा अपने हाथों से तख़्ती पर अल्लाह लिखो...
 
बरक़तउल्ला: लिखना तो मुझे नहीं आता अब्बा...
 
अलीमुल्लाह: मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर लिखवा दूँगा... आज से तुम्हारी तालीम शुरू हो जायेगी...तुम जल्दी ही लिखना-पढ़ना सीख जाओगे...
 
(अलीमुल्लाह बरक़तउल्ला के सिर पर एक टोपी लगा देते हैं।)
 
अलीमुल्लाह: बेटा कहो बिस्मिल्लाहे रहमाने रहीम...
 
बरक़तउल्ला: बिस्मिल्लाहे रहमाने रहीम...इसका क्या मतलब हुआ अब्बाजान...
 
अलीमुल्लाह: बेटा इसका मतलब हुआ... शूरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से जो रहम और करम करने वाला है।
 
बरक़तउल्ला: रहम का क्या मतलब हुआ अब्बाजान...
 
अलीमुल्लाह: रहम...मतलब दयालु...दया करने वाला...लोगों पर दया करने वाला...सब पर दया करने वाला...अच्छा अब क़लम हाथ में पकड़ो और लिखो अल्लाह।
 
(अलीमुल्लाह बरक़तउल्ला का हाथ पकड़कर तख़्ती पर उससे लिखवाते हैं।)
 
अलीमुल्लाह: वाह! बहुत अच्छा लिखा है तुमने... अलीफ़ से अल्लाह...
 
बरक़तउल्ला: अल्लाह का क्या मतलब है अब्बा...
 
अलीमुल्लाह: बेटा जिसने हम सबको बनाया है...जो सब पर रहम करता है ...जो सबका पालन हार है...जो न तो दिखाई देता है...और न उसे छू सकते हैं...वो जो चाहे वह कर सकता है...
 
(प्रकाश गनेशी और उनकी पत्नी पर पड़ता है। उनके सामने सरस्वती और गणेश के दो चित्र रखे हैं। आरती उतारने की थाली रखी है। एक तख़्ती और क़लम आदि रखा है।)
 
गनेशी: (आवाज़ देते हैं) दया राम...दया राम इधर आओ।
 
(बरक़तउल्ला उनके पास जाता है।)
 
गनेशी: आज तुम्हारा विद्यारंभ संस्कार होगा.... अपना हाथ इधर लाओ...
 
(बरक़तउल्ला के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली देकर मंत्र के साथ गणपति के चित्र के सामने अर्पित कराते हैं।)
 
गनेशी: (मंत्र उच्चारित करते हैं।)
 
ऊँ गणानां त्वा गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति हवामहे, वसोमम। आहमजानि गभर्धमात्वमजासि गभर्धम्। ऊँ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।।
 
(गनेशी बरक़तउल्ला के हाथ में कल़म दे कर कहते हैं। )
 
गनेशी: पाटी पर ऊँ लिखो बेटा दया राम।
 
(गनेशी दया राम का हाथ पकड़ कर पाटी पर ऊँ लिखवाते हैं।)
 
बरक़तउल्ला: ऊँ का क्या मतलब है पिताजी।
 
गनेशी: बेटा जिसने हम सबको बनाया है...जो सब पर कृपा करता है...जो सबका पालन हार है...जो न तो दिखाई देता है...और न उसे छू सकते हैं...वो जो चाहे वह कर सकता है...
 
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दृश्य-5

 
(मंच पर एक चौकी पर बरक़तउल्ला बैठे हैं। उनके दाएं-बाएं उनके शिष्य बैठे हैं। उनकी बातचीत हो रही है।)
 
बरक़तउल्ला: अब्बाजान और पिताजी को पढ़ाने का शौक था और हमें पढ़ने का जुनून था। अरबी पढ़ाने के बाद अब्बा ने कु़रान शरीफ पढ़ाया। पिताजी ने संस्कृत पढ़ाई और गीता का पाठ दिया। हमने 16वें साल में ही दोनों को कंठस्थ कर लिया। हमें अब्बा ने सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम और सुन्ना अबू दाऊद पढ़ाया। अबूसीना और अल बुख़ारी को पढ़ाया। पिताजी ने वेद और उपनिषद की शिक्षा दी। भागवत् महापुराण और महाभारत पढ़ाया। सिद्धांत कौमूदी और महाभाष्य बड़ी मेहनत से पढ़ाया। अब्बा ने फ़ारसी की तालीम शुरू की। गुलिस्ता बोस्तां के बाद हमने शाहनाम पढ़ा। अत्तार, रूमी और शीराज़ी के दीवान पढ़े। पिताजी ने रामचरितमानस पढ़ने को दी। फिर हमने पद्मावत पढ़ी। अब्बा ने अमीर खु़सरो को पढ़ाया। सिराज औरंगावादी और मीर का क़लाम हमने खु़द पढ़ा। शायरी में हमारी दिलचस्पी पैदा हो गयी...ये तो नहीं कह सकता कि दोनों धर्मों के बारे में मुझे पूरी जानकारी हो गयी थी लेकिन कुछ बातें ज़रूर समझ में आ गई थीं...सच्ची बात ज़बान पर आती है। साफ-साफ बोलने में ही भलाई है। और फिर जिससे कुछ छिपाने की ज़रूरत है उससे तो कुछ छिपता नहीं। वो तो हमारे आप के बारे में इतना जानता है कि हम भी नहीं जानते। कु़रान शरीफ में उसे नूरन अल नूर मतलब रौशनियों की रौशनी कहा गया है। गीता में उसे ज्योतिषामपितज्ज्योति मतलब रौशनियों की रौशनी कहा गया। कु़रान और गीता दोनों ही कहते हैं कि वह लोगों को अंधेरे से रौशनी की तरफ लाता है। क्यों न लायेगा, क्योंकि वही सत्य है, वही अल्लाहावल हक़को— यानी सत्य है। और ये भी है कि सारा जगत् उससे घिरा हुआ है। ये गीता भी मानती है और कु़रान शरीफ भी कहता है-इन्नहू-बेकुल्ले शै इम्मुहीत।
 
शिष्य-1: ये बातें तो वही समझ सकता है जिसने दोनों धर्मों के बारे में पढ़ा हो...और कौन समझ सकता है।
 
बरक़तउल्ला: भईया देखो सच्ची बात बताने वाले तो हर देश और काल में आते रहे हैं। गीता तो कहती है कि जब-जब अधर्म बढ़ जाता है तो धर्म की रक्षा करने के लिए अवतार आते हैं। कु़रान कहता है हर कौम के लिए अल्लाह ने संदेशवाहक भेजे हैं। कु़रान के अल माइदा सूरे में ये बात साफ है— अल्ला ने हर एक के लिए एक धर्म विधान और एक कर्म पथ निश्चित किया है और अगर अल्लाह चाहता है तो तुम सबको एक गिरोह बना देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। ताकि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इम्तिहान ले। तो भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करो। तुम सबको अल्लाह की तरफ लौटना है।
 
शिष्य-2: यह तो बहुत बड़ी बात कही गई है हुजूर...
 
बरक़तउल्ला: यही बात पुश्य दत्ताचार्य ने भी महिम्न स्त्रोत में कही है— लोगों की अलग-अलग तबीयतों के मुताबिक ईश्वर की खोज और सेवा करने वाले टेढे अलग रास्तों से चलते हैं। पर सब एक ही ईश्वर की तरफ जा रहे हैं। जैसे अलग-अलग रास्तों से चल कर नदियाँ एक ही समुद्र में जा कर गिरती हैं। और फिर उससे कहाँ तक भागोगे।
 
शिष्य-3: और लोग इधर-उधर भागते रहते हैं...सब अपने धर्म को बड़ा बताते हैं। बरक़तउल्ला: गीता में बार-बार कहा गया है। ईश्वर सब प्राणियों के दिल में रहता है
 
और हदीस शरीफ़ है कि आदमी का दिल ईश्वर की रहने की जगह है तो उससे भाग कर कौन कहाँ जायेगा।
 
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दृश्य-6

 
(मंच पर शहर काज़ी बैठे कुछ पढ़ रहे हैं। एक नौकर पैर दबा रहा है। दूसरा पंखा झल रहा है। तीसरा चिलम भर कर लाता है। हुक्का तैयार करता है। शहर काज़ी हुक्का पीना शुरू करते हैं। एक सेवक आता है।)
 
सेवक: हुज़ूर...कुछ लोग क़दम दोसी के लिए हाज़िर होना चाहते हैं...
 
शहर क़ाजी: (चिढक़र) जब देखो ऊंट की तरह मुंह उठायें चले आते है...कह दो मुलाक़ात नहीं हो सकती...मैं काम कर रहा हूं।
 
सेवक: हुजू़र मैंने तो ये पहले ही कहा था...मुझे पता था सरकार काम कर रहे हैं... शहर क़ाजी: तो फिर ?
 
सेवक: वो लोग गये नहीं...
 
शहर क़ाजी: (चिढक़र) गये नहीं...तो सिपाहियों से कह कर डण्डे लगवाते...
 
सेवक: जी बात उन्होंने...ऐसी बताई जो बहुत जो...(रूक जाता है।)
 
शहर क़ाजी: क्या बात बताई?
 
सेवक: वो लोग बरकतउल्ला के बारे में बता रहे थे...
 
शहर क़ाजी: उस शैतान के बच्चे के बारे में...
 
सेवक: जी हां...
 
शहर क़ाजी: वो क्या कर रहा है?
 
सेवक: अब तो वो लोगों को जमा करके...गुमराह कर रहा है...
 
शहर क़ाजी: क्या कहता है?
 
सेवक: यही बताने ये लोग आये हैं...
 
शहर क़ाजी: भेजो...
 
(सेवक चला जाता है। शहर काज़ी हुक्के के लम्बे-लम्बे कश लगाता है।)
 
शहर क़ाजी: (पैर दबाने वाले से) अरे क्या पैर तोड़ डालेगा...धीरे-धीरे दबा...
 
(पैर खींचकर दूसरा पैर बढ़ा देता है। कुछ लोग अंदर आते हैं और झुक कर काज़ी को सलाम करते हैं।)
 
शहर क़ाजी: क्या हुआ...वो शैतान का बच्चा क्या कहता है...क्या कर रहा है?
 
आदमी-1: कहता है ईश्वर, अल्लाह, भगवान सब एक हैं...
 
शहर क़ाजी: लाहौलविला कु़व्वत...
 
आदमी-2: कहता है कु़रान शरीफ में उसे ‘नूरन अलानूर’ रोशनियों की रौशनी कहा गया है...गीता में उसे ‘ज्योतिशामपित ज्योति; कहा गया है...मतलब वही है...रौशनियों की रौशनी....
 
शहर क़ाजी: बिल्कुल ग़लत...बक़वास है...दो-चार लफ़्ज सीख लिए हैं और अपने को अफलातून समझने...लगा...
 
आदमी-3: कहता है गीता और कु़रान दोनों कहते हैं कि वह अंधेरे से रौशनी की तरफ ले जाता है।
 
शहर क़ाजी: बकवास है...
 
आदमी-4: (हाथ जोड़कर) जनाब मैं मदरसे का मुर्दर्रिस हूं...मैं अर्ज़ करना चाहता हूं कि वह हम लोगों से बहस करता है...उसे अरवी, फारसी और संस्कृत आती है...
 
शहर क़ाजी: (गुस्से में) उसे कुछ नहीं आता...
 
आदमी-4: उसने हमारे दिल में जो शक पैदा किए हैं...उन्हें दूर करने के लिए...
 
शहर क़ाजी: क्या शक पैदा किया है?
 
आदमी-4: कहता अल्लाह की जो सिफ़ात हैं...जैसे अल्लाह-होवल हक्को...वही सच्चाई है और सारी दुनिया में वही वो ही...यही बात गीता...
 
शहर क़ाजी: (बात काटकर) उसकी बातों पर बिल्कुल यकीन न करो...तुम्हारे घरों के पास आये तो पत्थर मार कर दूर भगाओ...
 
आदमी-4: लोगों के दिलों में शक रह जायेगा...
 
शहर क़ाजी: क्या शक?
 
आदमी-4: यही कि वह उसकी बातों का जवाब नहीं दे पा रहे तो उसे भगा रहे हैं...
 
शहर क़ाजी: ऐसे मरदूद ओ-मल्ऊन का और क्या किया जाये...
 
आदमी-4: आप उसे क़ायल कर दें...वो क़ायल हो जाये तो ये साबित हो जायेगा कि वो ग़लत है...
 
शहर क़ाजी: तुम ठीक कहते हो। मैं तो उसे चंद लम्हों में क़ायल कर सकता हूं...मेरे सामने उसकी एक नहीं चलेगी...अरे जाहिल जपट्टों पर रोब झाड़ना दूसरी बात है और किसी आलिम से बहस करना...मुझसे बहस करे तो खून उगल देगा...समझे...लेकिन तुम लोग जानते हो...मुझे दिल का मर्ज़ है...मैं ऊंची आवाज़ में बोल नहीं सकता...मैं...ऐसा करता हूं...एक बहुत बड़े लायक और क़ाबिल जय्यद आलिम मौलाना फज़्ले इलाही बख़्श को बुलाता हूं...उनके साथ...मोनाज़रा हो जायेगा...वो उसे ऐसा क़ायल कर देंगे कि मुंह दिखाने लायक़ न रहेगा।
 
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दृश्य-7

 
(अलाव जल रहा है बरक़तउल्ला, महेश, ताहिर और गाँव के लोग बैठ कर ताप रहे हैं।)
 
महेश: ये बताओ बरक़त भाई कि आप कहते हैं ईश्वर और अल्लाह एक ही है...ये बात हमारी समझ में तो आती ही नहीं...आप इतनी ऊॅंची बातें करते हैं कि हम समझ ही नहीं पाते...
 
बरक़तउल्ला: बात बहुत आसान है...समझना बिल्कुल कठिन नहीं है...ये बताओ महेश भाई ब्रह्म को देख और छू सकते हो?
 
महेश: नहीं...
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ ताहिर भाई अल्लाह को देख और छू सकते हो।
 
आदमी-1: नहीं...
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ ये सबकुछ किसने बनाया है...
 
ताहिर: अल्लाह ने...
 
महेश: ब्रह्म ने...
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ कौन है जो सबकुछ कर सकता है।
 
ताहिर: अल्लाह...
 
महेश: ब्रह्म...
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ क्या अल्लाह और ब्रह्म रहीम हैं। कृपा करते हैं।
 
महेश: हाँ...
 
ताहिर: हाँ...
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ अल्लाह और ब्रह्म में क्या फर्क है..
 
(सब चुप हो जाते हैं।)
 
ताहिर: अल्लाह अल्लाह है और ब्रह्म ब्रह्म है।
 
बरक़तउल्ला: क्या सिर्फ नाम का फर्क है।
 
(सब चुप हो जाते हैं।)
 
बरक़तउल्ला: (पानी का लोटा निकाल कर दिखाता है) इसमें क्या है भरा है ताहिर भाई।
 
ताहिर: पानी है...
 
बरक़तउल्ला: ये क्या है महेश भाई...
 
महेश: पानी है...
 
बरक़तउल्ला: पानी को जल भी कहते हैं।
 
ताहिर: हाँ कहते हैं...
 
बरक़तउल्ला: तो क्या पानी को जल कहने से जल जल न रहेगा।
 
(बरक़तउल्ला सबको एक आम दिखाता है।)
 
बरक़तउल्ला: ये क्या है...
 
महेश: आम है...
 
बरक़तउल्ला: तुम बताओ ताहिर भाई...
 
ताहिर: आम है।
 
बरक़तउल्ला: मैं कहता हूँ यह आम्र है। इसे आम्र भी कहा जाता है। क्या आम को आम्र कहने से आम बदल जायेगा।
 
सब लोग: नहीं बदलेगा।
 
बरक़तउल्ला: बस यही समझो...नाम दो हैं...पर है एक। जिस नाम से चाहो उसे याद कर लो...और फिर पाप और पुण्य दोनों धर्मों में एक ही बताये गये हैं...स्वर्ग और नरक भी दोनों धर्मों में एक ही है...अब बताओ...अंतर कहां है?
 
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दृश्य-8

 
(मंच पर बरक़तउल्ला और उनके कुछ साथी आते हैं। उनके पास एक मोढ़ा है। मोढ़ा रख दिया जाता है।)
 
आदमी: बैठो बरक़त भाई...
 
बरक़तउल्ला: (हंस कर) अभी से क्यों बिठा रहे हो...मौलाना फ़ज़्ले इलाही बख़्श को तो आने दो...
 
आदमी-2: जगह तो यही तय हुई है...
 
बरक़तउल्ला: हां, ईदगाह की ही बात हुई थी...
 
(धीरे-धीरे और लोग भी आ जाते हैं। मंच पर काफी भीड़ हो जाती है।)
 
आदमी-3: कहते हैं बहुत बड़े मौलवी है...
 
आदमी-4: काजियों के क़ाज़ी हैं...लाल किले तक उनकी पहुंच है...पूरी दिल्ली उनकी बात मानती है...
 
(मंच पर एक तरफ से पालकी आती है। पालकी के आगे पीछे सिपाही हैं। पालकी मंच पर रख दी जाती है।)
 
सिपाही-1: हुजूर मौलाना फ़ज़्ले इलाही बख़्श तशरीफ ले आये हैं...
 
(दो सिपाही पालकी का पर्दा हटाकर मौलाना का हाथ पकड़ कर उन्हें बाहर निकलने में मदद देते हैं। कुछ सिपाही मंच पर एक तख़्त बिछाते हैं उस पर गद्दे और कीमती कपड़े डालते हैं। मौलाना के बैठने के लिए आसन बन जाता है। मौलाना धीरे-धीरे चलते आसन तक आते हैं और बैठ कर उधर-इधर देखते हैं।)
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: बरक़त उल्ला कौन है जो औल-फौल बकता रहता है?
 
(बरक़तउल्ला सामने आता है।)
 
बरक़तउल्ला: मैं हूं बरकत...
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: (ध्यान से देखकर) कम उम्र और ना समझ लगते हो...दो-चार किताबें पढ़ ली होंगी...उन्हीं से तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया...
 
बरक़तउल्ला: मैंने इस्लाम और हिन्दू मज़हब को पढ़ा है...मैंने उपनिषद् वेद और पुराण पढ़े हैं...कु़रान शरीफ़ हदीस शरा और फ़िक़ह का मुताला किया है...और मैं उस बुनियाद पर बात करता हूं...क्या आपने उपनिषद् वेद और पुराण पढ़ा है...
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: लाहौल विला कु़व्वत...मैं क्यों पढ़ूंगा काफिरों की मज़हबी किताबें... बरक़तउल्ला: तब आप मुझसे बहस कैसे करेंगे...
 
(मौलाना फ़ज़्ले इलाही घबरा जाता है लेकिन फिर संभल कर कहता है।)
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: मैंने सुना है तुम इस्लाम के बारे में कुफ्र बकते हो...तुम मुसलमान हो?
 
बरक़तउल्ला: हां...मैं मुलसमान हूं...मैं अल्लाह एक है, रसूल खुदा मुहम्मद बिन...उसके पैग़म्बर हैं...कु़रान आसमानी किताब है...यह मेरा मानना है इसमें कुफ्र कहां से आ गया?
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: कहा जाता है तुम इस्लाम और हिन्दू मज़हब को एक मानते हो?
 
बरक़तउल्ला: सब उसी के बंदे हैं...
 
सब लोग: बेशक...
 
बरक़तउल्ला: सबको उसने बनाया है...
 
सब लोग: बेशक...
 
बरक़तउल्ला: हर क़ौम के लिए पैग़म्बर भेजे गये हैं...
 
सब लोग: बेशक...
 
बरक़तउल्ला: क्या ये कुफ्र है...
 
(घबरा जाता है। संभल कर)
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: तुम हदीस पर यक़ीन करते हो?
 
बरक़तउल्ला: हुजू़र आप जो मानते हैं हम भी वहीं मानते हैं...फर्क ये है कि आप डर कर मानते हैं...हम प्रेम करके मानते हैं...आप उसूलों में फंसे रहते हैं हम उसूलों को इंसान से जोड़कर उनके मॉनी पेश करते हैं...आप...
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: खामोश हो जाओ...कुफ्र बक रहे हो...
 
बरक़तउल्ला: आप ‘जिस्म’ तक महदूद रह जाते हैं हम ‘रूह’ तक पहुंचते हैं...आप हक़ीक़त की मंज़िल तक आना ही नहीं चाहते और बहदत को समझना चाहते हैं जो नामुमकिन है...आप...
 
मौलाना फ़ज़्ले इलाही: (सिपाहियों से) गिरफ़्तार कर लो इसे...
 
(सिपाही बरक़तउल्ला को गिरफ़्तार कर लेते हैं।)
 
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दृश्य-9

 
(मंच पर शहर के काज़ी और महंत श्रीनाथ महाराज बैठे हैं। वे अलीमुल्लाह और पंडित गनेशी राम पाण्डे से बातचीत कर रहे हैं’।)
 
शहर काज़ी: अलीमुल्लाह हमने तुम्हारे बेटे को बहुत समझाया...लेकिन वह किसी की बात मानने को तैयार ही नहीं है।
 
अलीमुल्लाह: अगर उसकी समझ में आ जायेगा कि वह जो कुछ कह रहा है वह गलत है तो मान जायेगा।
 
शहर काज़ी: (बिगड़ कर) तो तुम्हारा कहना है कि बरक़त जो कुछ कहता है वह सच है।
 
अलीमुल्लाह: काज़ी जी बरक़त वही कहता है जिसे सच समझता है।
 
गनेशी: हाँ काजी़ जी...झूठ तो वह बिल्कुल नहीं बोलता...
 
महंत: तो वह जो कुछ बोलता है...लोगों को जो कुछ समझाता है...उसे वैसे ही छोड़ दिया जाए ?
 
शहर काज़ी: ऐसा कैसे हो सकता है महंत जी...आप तो जानते ही हैं वो लोगों को क्या समझाता है...मैं तो सब देख और सुन चुका हूँ।
 
महंत: सुना तो हमने भी है काज़ी जी...
 
शहर काज़ी: अगर उसको छूट मिलती रही तो जानते हैं आप क्या होगा...
 
अलीमुल्लाह: काज़ी जी वह क्या बुरा कहता है...सिर्फ हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के बारे में लोगों को बताता है...
 
शहर काज़ी: सिर्फ बताता ही नहीं...वो कहता है कि दोनों धर्म एक हैं...
 
गनेशी: बहुत-सी समानताएं तो हैं ही...
 
महंत: पाण्डे जी उन समानताओं को हम-आप समझें तो ठीक है...लेकिन पूरा समाज समझ ले...ये ठीक न होगा।
 
शहर काज़ी: महंत जी...मैं तो बिल्कुल नहीं मानता कि हिन्दू और मुस्लिम धर्म में समानताएं हैं...आपका धर्म...आपका धर्म है और मेरा धर्म...मेरा धर्म है। आप हिन्दू हैं बड़ी खुशी से हिन्दू रहिये...मैं मुसलमान हूँ मुझे मुसलमान रहने दीजिए...अगर आपने हिन्दू को हिन्दू न रहने दिया और मुसलमान को मुसलमान न रहने दिया तो मस्ज़िदें और मंदिर विरान हो जायेंगे...और बरक़त यही काम कर रहा है।
 
महंत: ये तो बहुत अनुचित है...उसे धर्मों का ज्ञान है...हम मानते हैं...लेकिन धर्मों के ज्ञान का यह अर्थ तो नहीं है कि धर्मों की पहचान ही खत्म कर दी जाए...
 
शहर काज़ी: मुझे बताया गया है कि मस्जिद में आने वालों की तादाद घट रही है...बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने जो नमाज़-रोजे़ का माहौल बनाया था...वो खत्म हो रहा है।
 
महंत: आपकी बात ठीक है काज़ी जी...हिन्दू हिन्दू रहें और मुसलमान मुसलमान रहें इसी में दोनों की भलाई है।
 
गनेशी: महतं जी बरक़त कब कहता है कि कोई अपना धर्म छोड़ दे।
 
शहर काज़ी: वो जो कुछ कर रहा है...उसका नतीजा यही निकलेगा पाण्डे जी। अलीमुल्लाह: मैं पक्का मुसलमान हूँ काज़ी जी...और मुझे कोई...
 
शहर काज़ी: (बात काट कर) बेकार की बहस करने से कोई फायदा नहीं...मैंने और महंत जी ने एक फैसला किया है जो आप लोगों को मानना पडे़गा...अभी तक तो यह बात दूर तक नहीं गयी है कि बरक़त हिन्दू और मुसलमान दोनों मजहबों को एक बताने का काम कर रहा है...अगर ये बात ऊपर तक पहुँच गई तो जानते हैं क्या होगा...आप दोनों और बरक़त की भलाई इसी में है कि हम लोगों की बात मान लें।
 
गनेशी: क्या बात काजी़ जी...
 
शहर काज़ी: बरक़त को कहीं भेज दीजिए...उसका गाँव में रहना ठीक नहीं है।
 
अलीमुल्लाह: (हैरत से) भेज दें...कहाँ भेज दें...उसका यहीं घर है...कहाँ जायेगा।
 
शहर काज़ी: मौलवी साहब...मैंने आपसे पहले ही कह दिया है कि अभी बात गाँव तक महदूद है...आगे बढ़ गई तो बरक़त का क्या होगा...ये कोई नहीं कह सकता... कुफ्र बकने की क्या सज़ा होती है? ये आपको अच्छी तरह मालूम है।
 
महंत: काज़ी जी जो कुछ कह रहे हैं...उसे आप लोग मान लो...इसी में भलाई है... जवान आदमी है पढ़ा-लिखा है...कहीं जाकर कुछ कर लेगा...यहाँ रहा तो...
 
शहर काज़ी: (महंत की बात काट कर) पता नहीं रहे भी या न रहे।
 
(गनेशी और अलीमुल्लाह दोनों घबरा जाते हैं।)
 
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दृश्य-10

 
(मंच पर बरक़तउल्ला खड़े हैं। दर्शकों से कह रहे हैं।)
 
बरक़तउल्ला: धीरे-धीरे जब हमारी बातें फैलने लगीं तो दोनों धर्मों के बड़े लोग हमें धमकियां देने लगे...जान से मार डालने की धमकी भी मिलने लगी...अब्बा जान और पिताजी को भी लोग डराने लगे...इन हालात में मेरे लिए फकीरी लेने के अलावा और कोई रास्ता न था। दिल में ख़्वाहिश भी थी कि फ़क़ीरों, साधु सन्यासियों की संगत करूँगा और अपने इल्म की प्यास को बुझाऊँगा। घर से निकला तो हिमालय की सिम्त चल पड़ा। जहाँ पता चलता कि कोई पहुँचा हुआ फ़क़ीर रहता है उसी तरफ चल देता था। उनकी खि़दमत करता था। कभी कोई ‘मोती’ मिल जाता था। कोई मंत्र दे देता था। किसी से कोई दुआ मिल जाती थी। कभी मायूसी ही हाथ लगती थी। एक बार बड़ा अजीब हुआ...सुनोगे तो उसे सबक़ लोगे...
 
दर्शक-1: क्या हुआ था हूजुर...
 
बरक़तउल्ला: एक रोज़ श्मसाबाद के करीब जंगल में एक फ़कीर अहमद शाह साहब थे। उनकी शोहरत सुन कर हम भी गये। देखा कि एक बहुत पुरानी और बड़ी मस्ज़िद बादशाहों के ज़माने की है। इसी में वे रहते हैं। हमको देखकर बहुत बेरुख़ी से पेश आये...
 
(मंच से प्रकाश चला जाता है कुछ ही क्षण बाद प्रकाश फिर आता है। बरक़तउल्ला मस्जिद के दरवाजे पर खड़े हैं। उनके सामने अहमद शाह हैं।)
 
अहमद शाह: कौन हो तुम कहां से आये हो... बरक़तउल्ला: मुसाफिर हूँ...
 
अहमद शाह: मुसाफिर हो तो आगे बढ़ो यहाँ क्यों आ गये...
 
बरक़तउल्ला: हुजूर रात हो गई है...जंगल का मामला है...मैं तो मस्जिद देख कर चला आया कि रात यहाँ गुज़ार लूंगा...
 
अहमद शाह: नहीं-नहीं तुम मस्जिद के अंदर नहीं आ सकते...और रात में सोने का सवाल ही नहीं है...
 
बरक़तउल्लाह: क्यों हुजूर...रात भर की बात है...सुबह होते ही निकल जाऊंगा...
 
अहमद शाह: बिल्कुल नहीं...मैंने कह दिया कि तुम मस्जिद के अंदर नहीं सो सकते...और मस्जिद के बाहर भी न ठहरना...यहाँ शेर लगता है...ऐसा न रात में तुम्हें फाड़ खाये ..
 
बरक़तउल्ला: फिर मैं क्या करूं हुजूर...कहां जाऊं...
 
अहमद शाह: ऐसा करो...मस्जिद की छत पर चले जाओ...
 
(मंच से प्रकाश चला जाता है। कुछ क्षण बाद प्रकाश फिर आता है। मंच पर बरक़तउल्ला खड़े हैं।)
 
बरक़तउल्ला: मस्जिद की छत पर गया तो वहां देखा कि एक बड़ा लम्बा और मोटा काला नाग पड़ा हुआ है...उतर आया... हमने नमाज़ इशा पढ़ी और फिर दो रोटियाँ जो हमारे पास थीं खा कर पानी पिया...खैर नींद तो नहीं आई मगर हम सारी रात चबूतरे पर बैठे रहे...सुबह मियाँ साहब निकले और पूछा की शेर आया था कि नहीं। हमने कहा कि साहब या तो आप शेर है या हम शेर हैं और तो कोई नज़र नहीं आया। थोड़ी देर बाद बस्ती से एक आदमी अपने बच्चे को लेकर आया। दम कराया और ताबिज़ लिखा कर ले गया...उनके पास बहुत से लोग ताबीज़ गण्डे वाले आया करते थे और इस तरीके से उन्होंने बहुत-सा रुपया जमा कर लिया था। इसी वास्ते किसी मुसाफ़िर को अपने पास ठहरने नहीं देते थे...हम तो वहाँ से चल दिये। फिर सुना कि उनका इंतकाल हो गया और कई मटके रुपया और अशर्फियाँ निकली। तब मैंने सोचा साँप मस्जिद की छत पर नहीं दरअसल मस्जिद के अंदर था। 

बहुत दिनों से सुन रहे थे कि बिजनौर में कोई पहुँचे हुए फ़कीर बंदा नवाज़ रहते हैं। उनकी खिदमत में हाज़िर हुए। बाबा साहब बड़ी मुहब्बत से पेश आये। उनके एक शागिर्द ने मिर्ज़ा असदउल्ला खाँ ग़ालिब की ग़ज़ल सुनाई:
 
 
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही।
 
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही।।
 
ग़ज़ल सुनी और बहुत पसंद आयी। उसी वक़्त तय कर लिया कि यह ग़ज़ल मिर्ज़ा ग़ालिब के मुंह से सुनूँगा।
 
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दृश्य-11

 
(ग़ालिब बैठे हैं, हुक्का पी रहे हैं और कुछ पढ़ रहे हैं। उसी समय हरगोपाल तुफ़्ता अंदर आते हैं।)
 
तुफ्ता: आदाब बजा लाता हूँ...कैसे मिजाज़ हैं हुजूर...
 
(ग़ालिब काग़ज़ नीचे रख कर तुफ़्ता को देखते हैं और कहते हैं।)
 
ग़ालिब: आओ मियां, तुफ्ता कहाँ रहे इतने दिन...मुझ पर न सही दिल्ली पर तो करम कर दिया करो..इस तरह गायब हो जाते हो कि शव्वुर में भी हाथ नहीं आते...
 
तुफ्ता: आली जनाब...बस कुछ कामों में ऐसा फंसा रहा कि हाज़िर न हो सका... आज आपके खिदमत में चार ग़ज़लें पेश करूंगा...अब तो दूसरे दीवान मुकम्मल हो जायेगा।
 
ग़ालिब: मियाँ तुफ़्ता मेरी मानो तो दीवान अभी छपने को न दो...इसमें कुछ और ग़ज़लें और क़ते शामिल करो...ये तुम्हारे पहले दीवान जैसा तो हो जाये...नहीं तो रुपया क्यों बर्बाद करते हो।
 
(नौकर आता है।)
 
नौकर: हुजूर जनाब सूफी सैयद बरक़तउल्ला साहब तशरीफ लाये हैं।
 
ग़ालिब: बहुत खू़ब।
 
(ग़ालिब उठ कर दरवाजे तक जाते हैं। दोनों में सलाम दुआ होती है और सूफ़ी बरक़तउल्ला को साथ लेकर मंच पर आते हैं।)
 
ग़ालिब: ज़हे नसीब के आप गरीब खाने पर तशरीफ लाये...हुजूर का नाम तो बहुत सुना था आज दीदार भी हो गये।
 
बरक़तउल्ला: मिर्ज़ा आपने मेरा नाम ही सुना था...मैंने आपका क़लाम भी सुना है...क्या खूब कहते हैं आप...शे’र दिल के अंदर उतरते चले जाते हैं।
 
ग़ालिब: जनाब मेरे ऊपर इल्ज़ाम तो ये लगता है कि मेरे अश्आर में मानी ही नहीं होते।
 
बरक़तउल्ला: जनाबे जहेलां वाशद ख़ामोशी।
 
तुफ्ता: लेकिन हुजूर भी उन लोगों को छेड़ते रहते हैं।
 
फरमाया है—
 
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा
 
गर नहीं हैं मिरे अशआर में मअ'नी न सही
 
बरक़तउल्ला: (तुफ़्ता को देखकर) आपकी तारीफ़ ?
 
ग़ालिब: हुजूर ये हैं जनाब हरगोपाल ‘तुफ़्ता’ साहब...साहिबे दीवान शायर हैं और मेरे बड़े करमा फरमा हैं।
 
तुफ़्ता: आदाब बजा लगता हूँ जनाब...ये मेरे लिए इज़्ज़त की बात है कि उस्ताद-ए-मोहतरम का एक अदना-सा शार्गिद हूँ...
 
ग़ालिब: मियां तुफ़्ता अदना कौन है और आला कौन है...ये किसे मालूम...
 
बरक़तउल्ला: मिर्ज़ा आपकी एक ग़ज़ल सुनी थी बहुत पंसद आयी।
 
ग़ालिब: कौन-सी ग़ज़ल।
 
बरक़तउल्ला: इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही...और ख़ासतौर पर उसका ये शे’र- तू न क़ातिल हुआ तो और ही हो।
 
तेरे कूचे की शहादत ही सही।।
 
ग़ालिब: हुजू़र ये शे’र तो मेरा नहीं है— किसी उस्ताद का है लेकिन खूब शे’र हैं।
 
बरक़तउल्ला: ख़ैर तो सोचा था कि आपकी ये ग़ज़ल आपकी ज़बानी सुनूँगा।
 
ग़ालिब: ये तो आपकी बड़ी कद्रदानी है।
 
बरक़तउल्ला: अगर ज़हमत न हो मिर्ज़ा तो यही ग़ज़ल सुनाइये।
 
ग़ालिब: अर्ज है।
 
ग़ज़ल:
 
इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही
 
मेरी वहशत, तेरी शोहरत ही सही
 
क़ता कीजिए न ताल्लुक़ हम से
 
कुछ नहीं है, तो अदावत ही सही
 
मेरे होने में है क्या रुसवाई
 
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
 
ग़ैर को तुझसे मोहब्बत ही सही
 
हम कोई तर्के वफ़ा करते हैं
 
न सही इश्क़, मुसीबत ही सही
 
यार से छेड़ चली जाए असद
 
गर नहीं वस्ल, तो हसरत ही सही।
 
बरक़तउल्ला: बहुत खू़ब मिर्ज़ा बहुत खू़ब।
 
ग़ालिब: नवाज़िश है जनाब...दिल्ली में आप कहाँ ठहरे हैं।
 
बरक़तउल्ला: फतेहपुरी की मस्ज़िद में रुका हुआ हूँ।
 
ग़ालिब: मैं आज शाम हाज़िर होना चाहता हूँ।
 
बरक़तउल्ला: हाँ-हाँ ज़रूर आइये।
 
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दृश्य-12

 
(मस्ज़िद में बरक़तउल्ला बैठे हैं। ग़ालिब एक आदमी के साथ आते हैं जिसके सिर पर एक बड़ी-सी सीनी रखी है।)
 
ग़ालिब: आदाब बजा लाता हूँ...जनाबे वाला।
 
बरक़तउल्ला: आइये...आइये मिर्ज़ा नौशा...
 
ग़ालिब: हूजुर के मिज़ाज कैसे हैं ?
 
बरक़तउल्ला: मिर्ज़ा साहब फकीर के क्या मिज़ाज और क्या हाल...आप ने सुना ही होगा कि क़हरे दरवेश बज़ाने दरवेश...हम लोगों के मिज़ाज तो हर हाल में एक से ही रहते हैं।
 
ग़ालिब: जी हाँ...फकीरी कोई मामूली चीज़ नहीं है...हम जैसे दुनियादार उसे क्या जाने...आपके लिए नमक और रोटी का बंदोबस्त किया है...खि़दमत में हाज़िर करने की इज़ाजत दीजिए...
 
बरक़तउल्ला: अरे मिर्ज़ा साहब...आप ने बेकार इतना तक्कलुफ किया।
 
(नौकर खाना निकाल कर बरक़तउल्ला के सामने रख देता है।)
 
बरक़तउल्ला: बहुत खूब...आज तो फकीर की ईद हो गयी...
 
ग़ालिब: नौश फ़रमाइये...
 
बरक़तउल्ला: आइये...आप भी आइये...
 
ग़ालिब: मुझे माफ करें हूजुर...
 
बरक़तउल्ला: क्यों आप न खायेंगे...
 
ग़ालिब: आप के साथ खाते शर्म आयेगी...
 
बरक़तउल्ला: शर्म कैसी मिर्ज़ा साहब...
 
ग़ालिब: हूजुर मैं गुनाहगार बंदा हूँ...
 
बरक़तउल्ला: गुनाहगार तो हम सब हैं मिर्ज़ा साहब।
 
ग़ालिब: नहीं-नहीं...आप जैसे बुजुर्ग के साथ मैं नहीं खा सकता।
 
बरक़तउल्ला: आखिर वजह क्या है ?
 
ग़ालिब: मैं शराब पीता हूँ...आप के साथ किस मुंह से खाना खाऊॅंगा।
 
बरक़तउल्ला: आप भी क़माल करते हैं...अरे जनाब...आप कुछ खाते-पीते होंगे...हमें उससे क्या मतलब?
 
ग़ालिब: नहीं-नहीं...मुझे शर्म आती है।
 
बरक़तउल्ला: आप जब तक मेरे साथ खाना न खायेंगे तब तक मैं भी न खाऊॅंगा।
 
ग़ालिब: ऐसा ग़जब न कीजिए हूजुर...
 
बरक़तउल्ला: मैं आपको हुक्म तो नहीं दे सकता...बस मेरी इल्तिज़ा है कि आप मेरे साथ खाना खाइये।
 
ग़ालिब: अब आपकी बात को टालने की हिम्मत तो मुझ में है नहीं...खाता हूँ।
 
(ग़ालिब एक अलग प्लेट में खाना निकालते हैं।)
 
बरक़तउल्ला: अरे ये आप क्या कर रहे हैं...अलग रकाबी में क्यों खा रहे हैं...
 
ग़ालिब: आपका हुक्म बज़ा ला रहा हूँ...
 
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दृश्य-13

 
(बरक़तउल्ला अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए हैं और बातचीत हो रही है।)
 
बरक़तउल्ला: एक दिन का ज़िक्र है...मैं मिर्ज़ा की हवेली में मौजूद था। शायर और दूसरे अहबाब बैठे थे। महफिल जमी हुई थी। उन दिनों मिर्ज़ा रजब अली सुरूर की किताब ‘फसान-ए-अजायब’ छपी थी। किताब का ज़िक्र निकल आया। किसी ने मिर्ज़ा से पूछा कि उर्दू जु़बान की कौन-सी किताब बेहतरीन है। मिर्ज़ा ने कहा— ‘क़िस्सा चहार दरवेश’। किसी साहब ने पूछा और ‘फसान-ए-अजायब’ के बारे में क्या राय है? मिर्ज़ा तुनक कर बोले— ‘अजी लाहौलविलाकुत्वत इसमें जबान का मज़ा कहाँ...एक तुकबंदी और भटियारखाना जमा है।’ मिर्ज़ा के ये कहते ही वो साहब उठ खड़े हुए और बाहर निकल गये। उनके जाने के बाद लोगों ने मिर्ज़ा से कहा कि जनाब आपने ये क्या ग़ज़ब किया? जो साहब अभी उठ कर चले गये वो मिर्ज़ा रजब अली सुरूर थे और उन्होंने ही ‘फसान-ए-अजायब’ लिखी है। ये सुन कर मिर्ज़ा को बड़ा अफसोस हुआ। कहने लगे मुझे पता न था वो मिर्ज़ा रजब अली सुरूर थे। बहरहाल बड़ी सख़्त ग़लती हो गयी है। अब इसकी भरपाई करना ज़रूरी है।
 
शिष्य-1: भरपाई कैसे की गई ?
 
बरक़तउल्ला: अग़ले दिन ग़ालिब मेरे साथ मिर्ज़ा रजव अली सुरूर से मिलने गये। बातों ही बातों में उनकी किताब ‘फसान-ए-अजायब’ का ज़िक्र छेड़ा और हमारी तरफ मुखातिब होकर बोले के मौलवी साहब हमने रात ‘फसान-ए- अजायब’ को फिर से खोल कर देखा और बग़ौर पढ़ा और दिल खुश हो गया। बहुत अच्छी तहरीर है। ज़बान और बयान की बेहिसाब ख़ूबियाँ हैं। मेरे ख्याल से इतनी उम्दा और बेहतरीन किताब उर्दू में कोई दूसरी नहीं है। मिर्ज़ा ने किताब की देर तक तारीफ की और मियाँ सुरूर को बहुत मसरूर किया। अगले दिन उन्होंने मुझे और सुरूर को खाने पर बुलाया और फिर उनकी किताब की तारीफे़ करते रहे।
 
दरअसल मिर्ज़ा का मज़हब ये था कि दूसरों का दिल न दुखाया जाये।
 
शिष्य-2: वाह...यही धर्म है...यही मज़हब है कि किसी का दिल न दुखाया जाए।
 
(एक शिष्य बरक़तउल्ला के लिए गिलास में दूध लाता है। बरक़तउल्ला दूध लेकर पीते हैं और गिलास रख देते हैं।)
 
शिष्य-3: हूजुर और कोई ऐसा वाक्या सुनाइये...जिससे हमें सबक़ मिले।
 
बरक़तउल्ला: सबक़ लेने वाले के लिए तो एक-एक तिनका सबक़ है...जिधर देखो उधर एक ऐसी बात नज़र आती है जिसे कुछ समझा या सीखा जा सकता है...लेकिन फिर भी सुनो। एक बार का ज़िक्र है। हम लखनऊ की एक मस्जिद में ठहरे हुए थे। वहाँ का एक वाक्या बताता हूँ। एक अमीर आदमी सैर को जाता था कि उसने देखा सामने से स्लीमन साहब अंग्रेज़ चला आता है। इस खयाल से की अंग्रेज़ को सलाम करना पड़ेगा। वह अमीर आदमी झटपट मस्जिद में चला आया जहाँ हम ठहरे हुए थे। स्लीमन साहब इस बात को ताड़ गए और वे भी उसके पीछे-पीछे मस्जिद में आ गए और झुक कर अमीर आदमी को सलाम किया और कहा कि देखो सलाम करने से क्या मेरा रुतबा घट गया या आपका दीन इस्लाम कुछ बढ़ गया? आपने क्यों मुझे पराया समझा? क्या हम खुदा के बंदे नहीं हैं? इस बात पर वह अमीर बहुत शर्मिंदा हुआ। इसके बाद स्लीमन साहब हमारी तरफ को आया तो हमने उठकर सलाम किया। उसने फिर अमीर आदमी से कहा यह मुसाफ़िर क्या सलाम करने से काफ़िर हो गया? फिर मेरी तरफ देख कर बोले और पूछा, आप कौन हैं? मैंने कहा, कि साहब यह तो मुझको भी ख़बर नहीं कि मैं कौन हूँ।
 
कुछ नहीं खुलता मुझे मैं कौन हूँ।
 
सूरते हैरत हूँ या शक्ले जुनून।
 
उन्होंने फिर पूछा कि आपकी क़ौम क्या है? मैंने कहा, साहब जो आदम की क़ौम है। उन्होंने पूछा, आदम की क्या क़ौम है? मैंने कहा, मुझको नहीं मालूम। यह आदम से पूछिए। फिर उन्होंने कहा, आप कहाँ से आए हैं। मैंने कहा, जहाँ से सब आए हैं। वे बहुत हैरान हुए और बोले कि साहब जो बात हम पूछते हैं उसका उल्टा ही जवाब देते हो। लेकिन फिर तो उनको उल्फत हो गई। कभी-कभी हमारे पास आने लगे। एक रोज बड़ी दावत की। किस्सा मुख़्तासिर यह कि फकीर को चाहिए कि हर रंग का तमाशा देखे और किसी को बुरा न जाने—
 
ख़ुदा हर शै के अंदर यू नेहा है
 
के जूं बू गुल की गुल के दरमियाँ हैं।
 
शिष्य-1: हूजुर एक बात समझ में नहीं आती...आपसे पूछना चाहता हूँ।
 
बरक़तउल्ला: हाँ-हाँ... बताओ क्या बात है?
 
शिष्य-1: बहराइश के एक फकीर हैं...उन्हें सब तंगे शाह कहते हैं...वो हमेशा अपने साथ घरदारी का पूरा सामान लेकर निकलते हैं...उनके शार्गिद उनका कुल सामान उठाये...उनके साथ रहते हैं...ऐसी फकीरी समझ में नहीं आयी...
 
बरक़तउल्ला: (हॅंसते हैं।) फकीरी न हुई ये तो शाही हो गई...तुमने एक बात याद दिला दी...मुझे एक वाक्य याद आ गया। एक आदमी घर के कारोबार से तंग आ गया था। उसने यह तय किया कि वह ‘दुनिया’ छोड़ देगा। सन्यास ले लेगा। उसकी एक बीवी थी। अपनी बीवी को अकेला छोड़ कर वह फकीर बन कर निकल पड़ा। गले में कण्ठी डाल, हाथ में कासा लेकर दर-ब-दर भीख मांगनी शुरू कर दी। एक दिन फिरता-फिरता फिर उसी बस्ती में आ निकला जहाँ उसकी बीवी रहती थी। आदत के मुताबिक आवाज़ लगाई, भला हो माई कुछ भेजो फकीर को। उसकी बीवी ने उसकी आवाज़ को पहचान लिया झांक कर देखा तो वही जाते शरीफ हैं। ख़ैर उनको चंगुल भरा आटा दिया और कहा कि शाह जी अब तो हमारे तुम्हारे बीच मियाँ बीवी का रिश्ता नहीं रहा। लाव मैं तुम्हारी रोटी तो पका दूं फ़कीर ने कहा आटा, दाल, नमक, मिर्च, लोटा, कुण्डा, तवा, चूल्हा, चिमटा और कुछ लकड़ियां सब ज़रूरी सामान मेरी झोली में मौजूद है। यह सामान लो और पका दो। तब तो उस औरत ने ज़ोर दोहथ्थड़ मारा और कहा, भड़वे सारा सामान ए दुनिया तो अपनी बगल में दबाए फिरता है। फिर क्या ज़ोरू ही ‘दुनिया’ होती है कि मुझ गरीब को छोड़कर चला गया था।
 
तो भाई दुनिया में तरह-तरह के लोग होते हैं...लेकिन आदमी वही है जो आदमी से प्रेम करे...एक बार हुआ ये कि मेरे एक पुराने शार्गिद अब्दुल रफ़ीक ने मुझे खाने पर बुलाया...मैं उनके घर गया।
 
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दृश्य-14

 
(अब्दुल रफ़ीक अपने घर में खाने की तैयारी कर रहा है। दस्तरख़ान बिछा हुआ है। उस पर अब्दुल रफ़ीक खाना ला-लाकर रख रहा है।)
 
अब्दुल रफ़ीक: (आवाज़ देकर पत्नी से पूछता है) अरे दाल गोश्त तैयार हो गया या नहीं... उन्हें दाल गोश्त बहुत पसंद है।
 
पत्नी: (मंच के पीछे से पत्नी की आवाज़) बस अभी तैयार हुआ जाता है...उनके आने में तो अभी वक़्त है...तुम बेकार इतना परेशान हो रहे हो...
 
अब्दुल रफ़ीक: अरे परेशान नहीं हो रहा...ये मेरे लिए कितनी इज्ज़त की बात हैं कि हज़रत मेरे घर तशरीफ़ ला रहे हैं।
 
पत्नी: (पीछे से आवाज़) हाँ ऐसे बुज़ुर्गों के आने से घर में बड़ी बरक़त होती है।
 
अब्दुल रफ़ीक: खीर तैयार हो गई हो तो बताओ।
 
पत्नी: अभी हुई जाती है...मैं लेकर आजाऊॅंगी...तुम अंदर-बाहर के इतने चक्कर क्यों लगा रहे हैं ?
 
अब्दुल रफ़ीक: अरे नेक बख़्त मैं बहुत खुश हूँ...
 
(बरक़तउल्ला मंच पर आते हैं और अब्दुल रफ़ीक उन्हें झुक कर सलाम करता है।)
 
बरक़तउल्ला: कैसे हो रफ़ीक ?
 
अब्दुल रफ़ीक: हुजू़र की दुवाएं हैं...ऊपर वाले की मेहरबानी है।
 
बरक़तउल्ला: खाने का तो तुमने लगता है अच्छा इंतज़ाम किया है।
 
अब्दुल रफ़ीक: (खुश होकर) जी हाँ हुजूर...दाल गोश्त बना है, कबाब बने हैं...लौकी आपको बहुत पसंद हैं ना...तो लौकी की सब्जी बनी है...और खीर बनायी गयी है।
 
बरक़तउल्ला: ये बताओ शराब है ?
 
अब्दुल रफ़ीक: (हैरानी से) शराब...
 
बरक़तउल्ला: हाँ...हाँ...हाँ भई शराब।
 
अब्दुल रफ़ीक: (हकलाते हुए) श...श...शराब तो हुजूर हराम है।
 
बरक़तउल्ला: मैं शराब पीता हूँ...शराब का इंतज़ाम करो।
 
अब्दुल रफ़ीक: (बहुत हैरान होकर) शराब का इंतज़ाम...हुजूर मैं तो जानता भी नहीं शराब कहाँ मिलती है।
 
बरक़तउल्ला: कहीं से भी शराब का इंतज़ाम करो...मैं उसके बगैर खाना नहीं खाऊॅंगा।
 
अब्दुल रफ़ीक: मैं तो...मैं तो...
 
बरक़तउल्ला: कहीं से भी लाओ...शराब लेकर आओ।
 
(अब्दुल रफ़ीक मंच से बाहर निकल जाता है और उसकी पत्नी खाना लेकर मंच पर आती है और बरक़तउल्ला को सलाम करती है।)
 
बरक़तउल्ला: खुश रहो...रफ़ीक ने आज तुम्हें काफी परेशान कर दिया...हमने उसे बहुत समझाया था कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है लेकिन वो माना ही नहीं...बच्चों जैसी ज़िद करने लगा...(हॅंस कर) और जब कोई बच्चा बन जाता है तो उसकी बात माननी ही पड़ती है।
 
पत्नी: हुजूर हमारी तो आज किस्मत खुल गई...आप हमारे यहाँ आये।
 
बरक़तउल्ला: देखो क़िस्मत तो अमल से खुलती है...रफ़ीक अच्छा इंसान है...मैंने अभी उसके लिए एक परेशानी खड़ी कर दी।
 
पत्नी: परेशानी क्या हुजूर...आपकी खि़दमत करके...तो हमें खुशी होती है।
 
(अब्दुल रफ़ीक हाथ में शराब की बोतल लेकर मंच पर आता है और खाने के साथ रख देता है। दोनों खाना खाने बैठ जाते हैं। पत्नी पंखा झलने लगती है। दोनों खाना खाने लगते हैं।)
 
अब्दुल रफ़ीक: हुजूर...जैसा आपने हुक्म दिया था शराब आ गई है...
 
बरक़तउल्ला: (लापरवाही से) हाँ...हाँ ठीक है...
 
(दोनों खाना खाते रहते हैं लेकिन बरक़तउल्ला शराब की बोतल में हाथ भी नहीं लगाते।)
 
अब्दुल रफ़ीक: हुजूर...गिलास सामने रखा है।
 
बरक़तउल्ला: हाँ...हाँ देख रहा हूँ।
 
अब्दुल रफ़ीक: शराब लीजिए हुजूर।
 
बरक़तउल्ला: शराब तो मैं नहीं पीता।
 
अब्दुल रफ़ीक: (हैरानी से) अरे हुजूर कुछ ही देर पहले आप ने फ़रमाया था कि शराब लाओ मैं शराब पीता हूँ।
 
बरक़तउल्ला: नहीं मैं शराब नहीं पीता।
 
अब्दुल रफ़ीक: तब आपने मंगवाई क्यों ?
 
बरक़तउल्ला: उसकी एक वजह थी।
 
अब्दुल रफ़ीक: क्या वजह थी ?
 
बरक़तउल्ला: अगर यहाँ शराब न रखी होती तो मैं खाना न खाता।
 
अब्दुल रफ़ीक: (हैरानी से) क्यों ?
 
बरक़तउल्ला: इसलिए कि अगर तुम शराब न लाते तो इससे साबित होता कि तुम्हारे दिल में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं है जो तुमसे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ हैं।
 
अब्दुल रफ़ीक: मैं समझा नहीं हुजूर।
 
बरक़तउल्ला: तुम शराब को हराम और बुरा समझते हो।
 
अब्दुल रफ़ीक: जी हाँ।
 
बरक़तउल्ला: लेकिन कुछ लोग ऐसा नहीं मानते।
 
अब्दुल रफ़ीक: जी हाँ।
 
बरक़तउल्ला: अगर उन लोगों में से कोई आदमी तुमसे शराब माँगेगा तो उसे दोगे।
 
अब्दुल रफ़ीक: पहले तो न देता हुजूर...लेकिन इस वाक़्ये के बाद दूंगा।
 
बरक़तउल्ला: हाँ मैं यही चाहता हूँ कि हमारे दिलों में उन लोगों के लिए भी जगह हो... जो हमारे जैसे नहीं हैं...यहाँ तक कि हमसे बिल्कुल उलट हैं...बिल्कुल मुख़्तलिफ़ हैं...
 
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दृश्य-15

 
(मंच पर बरक़तउल्ला आता है। दर्शकों को संबोधित करता है।)
 
बरक़तउल्ला: एक दिन अजीब घटना घटी...मैं अयोध्या में और आज़म अली खां के यहां ठहरा हुआ था पता चला शहर में एक आदमी आया है जो अपने आपको ख़ुदा कहता है...ये सुन कर सब बड़े नाराज़ हो गये...मैंने कहा आप लोग फिक्र न करें...मैं ‘इन’, ‘ख़ुदा’ से निपट लूंगा...मैंने अहमद से बात की और हम लोगों ख़ुदा साहब को सबक़ सिखाने मंसूबा बना लिया...
 
(मंच पर कुछ क्षण के लिए अंधेरा फिर रौशनी आती है। बरक़तउल्ला और अहमद बैठे हैं। एक अजनबी आदमी आता है। उसे देखकर बरक़तउल्ला उठ जाते हैं।)
 
बरक़तउल्ला: आइये...तशरीफ लाइये...आप ही अपने का ख़ुदा कहते हैं?
 
अजनबी: कहता नहीं हूं...मैं खुदा हूं...
 
बरक़तउल्ला: आइये बैठिये....ये पूरी कायनात आपने ही बनाई है...सूरज, चांद, ज़मीन, समन्दर, जंगल, पहाड़, नदियां...
 
अजनबी: हां ये सब मैंने बनाया है...
 
अहमद: आप ही की मर्जी से हवा चलती है, पेड़ में फल आते हैं...खेतों में अनाज पकता है, लकड़ी जलती है और बारिश से आग बुझती है...आप आप जो चाहे कर सकते हैं?
 
अजनबी: जी हां...ये सब सच है...
 
बरक़तउल्ला: ये तो हम लोगों की बड़ी खुशनसीबी है कि आप यहां तशरीफ लाये...आपको पाने के लिए क्या-क्या नहीं किया...घर छोड़ा, वतन छोड़ा...आपके लिए दर-बदर भटकते रहे, पूरी-पूरी रातें इबादत में गुज़ार दीं और पूरे-पूरे दिन ‘खि़दमते खल्क़’ करते रहे...ताकि आपको खुश कर सके....वाह री क़िस्मत कि आप आपके दीदार हुए... तो आप किसी की कामना भी पूरी कर सकते...
 
अजनबी: हां...अगर चाहूं...
 
अहमद: ओहो...अगर चाहूं....ये आपने बड़ा अच्छा कहा....
 
अजनबी: हम किसी के पाबंद नहीं है...
 
अहमद: जी हां जाहिर है...हुजू़र आप हमारे मेहमान हैं...आपकी खातिरदारी हमारा फर्ज़ है....मैं आपके लिए खाना लाया हूं....
 
(अहमद खाना सामने रखते हैं। अजनबी देखता है और बुरा-सा मुंह बनाता है।)
 
अजनबी: पहले पानी मंगाइये...
 
बरक़तउल्ला: पानी...पानी तो यहां नहीं है...आसपास कोई कुआं भी नहीं है...पर आपके लिए क्या...आप तो मंगा ही सकते हैं...
 
(अजनबी कुछ नहीं बोलता। खाना शुरू होता है।)
 
अजनबी: ये सूखी-सूखी जौचने की रोटियां....नमक और प्याज़ तक नहीं है...और फिर..
 
अहमद: मंगा लीजिए....आप तो जो चाहें आ सकता है...हुक्म देने की देर है...
 
(अजनबी कुछ नहीं बोलता। बड़ी मुश्किल से रोटी निगल रहा है। अहमद उठ कर चला जाता है।)
 
बरक़तउल्ला: माफ करें हम आपकी ख़ातिर नहीं कर पा रहे हैं...
 
(अजनबी घूर कर देखता है। अहमद पीछे से आता है, एक काला कपड़ा अजनबी के सिर पर डाल कर पीछे से बांध देता है।)
 
अनजबी: अरे ये कौन है...कौन है...
 
बरक़तउल्ला: आप नहीं जानते...आप तो अपने को ख़ुदा कहते हैं...
 
अजनबी: अरे मेरा दम घुटा जा रहा है...
 
बरक़तउल्ला: आप खुदा हैं आपका दम कैसे घुट सकता है...
 
अजनबी: अरे मैं मर जाऊंगा....छोड़ दो मुझे छोड़ दो...
 
बरक़तउल्ला: आप जो चाहें कर सकते हैं...आपसे ज्यादा ताकतवर कौन हैं....
 
(अहमद अजनबी की गर्दन पकड़ कर फटके देता है। अजनबी चिल्लाता है।)
 
अजनबी: अरे मार डाला... मार डाला...
 
(अहमद कपड़ा हटा लेता है। अजनबी लम्बी-लम्बी सांसें लेता है। बहुत डरा और घबराया हुआ है।)
 
बरक़तउल्ला: तो तुम अपने को ख़ुदा कहते हो...
 
(अजनबी चुप रहता है)
 
अहमद: अपने आपको न छुड़ा सके...कायनात चलाते हो?
 
(अजनबी लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा है)
 
बरक़तउल्ला: अब तो न कहोगे कि तुम ख़ुदा हो?
 
अजनबी: मैं....मैं...हाथ जोड़ता हूं....मुझे जाने दो...मैं कभी न कहूंगा कि मैं खुदा हूं....
 
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दृश्य-16

 
(बरक़तउल्ला अपने आसान पर बैठे कुछ लिख रहे हैं। महेश अंदर आता है।)
 
महेश: राम-राम बरक़त भाई...
 
बरक़तउल्ला: अरे तुम महेश...
 
महेश: हाँ बरक़त भाई हम ही हैं...आप के बचपन के साथी...गाँव के साथी...
 
बरक़तउल्ला: तुम यहाँ कैसे आ गये...कहीं जा रहे हो क्या?
 
महेश: जा कहीं न रहे हैं...हम तो आपको ही खोजने निकले थे।
 
बरक़तउल्ला: मुझे खोजने...इतने सालों के बाद...मुझे तो गाँव छोड़े 24-25 साल हो गये।
 
महेश: हाँ वो तो है...हमें याद है आप जब एक दिन गाँव से लापता हो गये थे।
 
बरक़तउल्ला: हम क्या करते...कोई और रास्ता ही नहीं था...गाँव में सब कैसे हैं...
 
महेश: यहीं बताने आपको आये हैं...एक बुरा समाचार है।
 
बरक़तउल्ला: क्या बुरा समाचार है...
 
महेश: पंडित जी नहीं रहे...
 
बरक़तउल्ला: कौन पिताजी...
 
महेश: हाँ...पंडित गनेशी राम पाण्डे।
 
बरक़तउल्ला: कब स्वर्गवास हुआ।
 
महेश: अभी 10 ही दिन पहले तो उनकी 13वीं हुई है।
 
बरक़तउल्ला: हमें पता न चल सका...जान पाते कि बीमार हैं...तो उनकी सेवा करके कुछ पुण्य कमा लेते।
 
महेश: आपको बहुत खोजा गया भईया...पर आप मिले ही नहीं।
 
बरक़तउल्ला: हमें तो अपने ही नहीं पता कि हम कल कहाँ होंगे...वो तो कहो बड़ा अच्छा हुआ कि हम यहाँ रुक गये और तुमसे भेंट हो गयी।
 
महेश: आपके लिए एक संदेशा है भईया...
 
बरक़तउल्ला: क्या संदेशा है ?
 
महेश: पंडिताइन ने आपको बुलाया है।
 
बरक़तउल्ला: माताजी ने।
 
महेश: हाँ...कहा है जहाँ भी हो जल्दी आ जाओ।
 
बरक़तउल्ला: चलो हम तुम्हारे साथ ही चलते हैं...अब हमसे और कुछ न होगा।
 
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दृश्य-17

 
(पंडिताइन कोई घरेलू काम कर रही हैं। शरीर पर कोई आभूषण नहीं है। बरक़तउल्ला का प्रवेश। बरक़तउल्ला का सिर मुडा हुआ है। जनेऊ पड़ी है। धोती बाँधे हैं। पीठ पर एक गठरी है। बरक़तउल्ला पंडिताइन को देखकर हाथ जोड़ता है फिर पैर छूता है। पंडिताइन उसे गले से लगा कर जोर-जोर से रोने लगती है। बरक़तउल्ला उनका कंधा थपथपा कर सांत्वना देता है।)
 
पंडिताइन: अरे तुम कहाँ रहे....बच्चा हम तो लुट गये...हमार सोहाग उजड़ गया...अब कैसे ज़िन्दा रहबे...अरे पहले हमका काहे न उठा लिया... मरने से पहले पंडित जी तुमका कितना याद करते थे...मरते समय भी तुम्हारा नाम।
 
(रोने लगती है। सावित्री मंच पर आती है और बरक़तउल्ला से लिपटकर रोने लगती है।)
 
सावित्री: (रोते हुए) हाय मेरे भइया...तुम कहाँ रहे...(हिचकियाँ लेते हुए) बाबू तुम्हें याद करते-करते प्राण त्यागे हैं।
 
पंडिताइन: दरवाज़े की ओर निहारा करते थे...समझते थे कि तुम अब आए...अब आए...अब आए।
 
बरक़तउल्ला: हमें संदेसा मिल गया होता अम्मा...तो हम ज़रूर आते...हमें भी हसरत रह गयी...पिताजी की थोड़ी सेवा कर लेते...तो बड़ा पुण्य होता।
 
सावित्री: बाबू जी...अपनी सब पोथी छोड़ गये हैं...कह गये हैं...बस तुम्हें दी जाए भईया।
 
(बरक़तउल्ला आँखों से आँसू पोछता है।)
 
पंडिताइन: अरे सबकुछ तो तुम्हारा ही है बेटुवा।
 
सावित्री: तो तुम कहाँ रहे भईया...तुम्हें संदेसा काहे नहीं मिला।
 
बरक़तउल्ला: अरे बहनी...अब हम क्या बताएं...एक जगह होते तो संदेसा मिलता...बहता पानी रमता जोगी।
 
सावित्री: अम्मा की हालत देख रहे हो क्या हो गई...
 
बरक़तउल्ला: अम्मा...ये तुम सूख कर काँटा कैसे हो गयी हो।
 
पंडिताइन: खाना-पिया नहीं जाता...हमका भी अपने भगवान उठा ही ले तो नीक है।
 
बरक़तउल्ला: नहीं अम्माँ...ये न कहो...
 
पंडिताइन: बेटुवा...मुख अग्नि तो तुम दे नहीं...पाये ..कपाल क्रिया भी न कर सके...अब पिण्ड दान तो कर लेव...अरे तुम्हारे पिता रहें...और कौन बैठा है हमारा...
 
बरक़तउल्ला: हाँ अम्मा...मैं पिण्ड दान करूँगा....मुझे आशीर्वाद दो...
 
पंडिताइन: हमार आशीर्वाद तो सदा तुम्हारे साथ है बच्चा...जाओ...भगवान सब ठीकै ठाक करेंगे...बच्चा कहाँ करोगे पिण्ड दान।
 
बरक़तउल्ला: अम्मा...हरिद्वार जाऊँगा...वहीं उत्तम जगह है।
 
पंडिताइन: पिण्ड बनाने की सामग्री बिटिया तुम्हें दे देगी।
 
(सावित्री मंच से बाहर चली जाती है।)
 
पंडिताइन: पिण्ड दान के बाद ब्राह्मण भोज भी तो करना है।
 
बरक़तउल्ला: अब तुम कोई चिंता न करो अम्मा...हम आ गये हैं सब काम हो जायेगा। दान में क्या देना है यह बताओ।
 
पंडिताइन: गोदान हो जाए तो उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।
 
बरक़तउल्ला: लौट कर आ जाऊँ...तो गोदान करा देंगे।
 
(सावित्री लौट कर मंच पर आती है उसके हाथ में एक पोटली।)
 
सावित्री: भईया...इसमें चावल है...काली तिल है...जौ है...इसके पिण्ड बना लेना...चंदन का टीका लगेगा और शहद चढ़ेगा...उसके ऊपर फूल भी पडेंगे।
 
बरक़तउल्ला: अरे मुझे सब मालूम है...तू चिंता न कर।
 
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दृश्य-18

 
(हरिद्वार में घाट पर बरक़तउल्ला पिण्ड बना रहा है। पिण्ड बनाने के बाद वह उन पिण्डों को पत्तल पर रखता है और गंगा में उतरता है। उसे एक आदमी पहचान लेता है। यह उसी के गाँव का चिंतामणि है।)
 
चिंतामणि: अरे मियाँ जी...आप यहाँ।
 
बरक़तउल्ला: कौन चिंतामणि भाई।
 
चिंतामणि: मियाँ जी आप यहाँ कैसे आ गये ?
 
बरक़तउल्ला: चिंतामणि भाई...पता है न...पिताजी का स्वर्गवास हो गया है...उन्हीं का पिण्डदान करने आया हूँ।
 
चिंतामणि: मियाँ जी आपको इधर आना नहीं था।
 
बरक़तउल्ला: मैं अपने लिए नहीं आया हूँ...पिताजी के लिए आया हूँ...मुझे चुपचाप पिण्ड दान कर लेने दो भाई।
 
(इन दोनों की बातचीत दूसरे लोग सुन लेते हैं और वे बरक़तउल्ला के पास आते हैं।)
 
आदमी-1: तुम मियाँ हो...यहाँ कैसे आ गये।
 
आदमी-2: सब अपवित्र कर दिया।
 
आदमी-3: निकालो इसे यहाँ से।
 
बरक़तउल्ला: मैं अपने पिताजी का पिण्ड दान करने आया हूँ।
 
आदमी-2: क्या झूठ बोल रहे हो...मुसलमानों के यहाँ कहाँ होता है पिण्ड दान।
 
बरक़तउल्ला: मेरे पिता हिन्दू थे।
 
आदमी-3: अरे बाहर निकालो इसे।
 
(सब लोग बरक़तउल्ला को खींच कर बाहर निकालते हैं। वह लगातार यह कहता रहता है कि मुझे अपने पिता का पिण्ड दान करना है मुझे छोड़ दो...। शोर मच जाता है कुछ लोग गुस्से में आकर बरक़तउल्ला को मारने पीटने लगते हैं वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है उसी समय बड़ा पण्डा आ जाता है।)
 
बड़ा पण्डा: क्या बात है? क्या हुआ?
 
आदमी-1: ये मियाँ है...गंगाजी में आ गया था।
 
आदमी-2: सब अपवित्र कर दिया।
 
आदमी-3: वो तो कहो हमने सुन लिया...नहीं तो ये अपना काम करके निकल जाता।
 
बड़ा पण्डा: (बरक़तउल्ला से) तुम हिन्दू हो।
 
बरक़तउल्ला: हाँ हूँ।
 
बड़ा पण्डा: क्या मानते हो।
 
बरक़तउल्ला: सनातन धर्म।
 
बड़ा पण्डा: तुम्हारी जाति क्या है?
 
बरक़तउल्ला: ब्रह्मण।
 
बड़ा पण्डा: कौन से ब्रह्मण।
 
बरक़तउल्ला: पाण्डे।
 
बड़ा पण्डा: कौन से पाण्डे।
 
बरक़तउल्ला: सरयू पारी।
 
बड़ा पण्डा: तुम्हारा गोत्र क्या है?
 
बरक़तउल्ला: गौतम।
 
लोग 1-2: ये झूठ बोल रहा है...ये मियाँ है...हमने अपने कान से सुना है...चिंतामणि कह रहा था।
 
बड़ा पण्डा: चिंतामणि कहाँ है ?
 
लोग-3: इधर ही था अभी कहीं चला गया।
 
बड़ा पण्डा: जाओ उसे ढूँढ़ कर लाओ...(बरक़तउल्ला से) तुम यहाँ आये कैसे ?
 
बरक़तउल्ला: हमारे पिताजी पंडित गनेशी राम पाण्डे का स्वर्गवास हो गया है...हम श्राद्ध करने यहाँ आये हैं।
 
बड़ा पण्डा: श्राद्ध करने आये हो...गरुण पुराण पढ़ा है।
 
बरक़तउल्ला: (गरुण पुराण का एक अंश सुनाता है।)
 
क्षुत्तृट्परीतोऽर्कदावानलानिलैः सन्तप्यमानः।
 
कृच्छे्ण पृष्ठे कशया च ताडितश्रच्लत्यषक्तोऽपि निराश्रमोदके।।
 
तत्र तत्र पत छूान्तो मूर्चिछतः पुनरुत्यितः।
 
(बड़ा पण्डा हाथ उठाकर बरक़तउल्ला को पढ़ने से रोक देता है।)
 
बड़ा पण्डा: पिण्ड दान में कौन से श्लोक पढ़े जाते हैं।
 
बरक़तउल्ला: रात्रिं त्रिभागां कुर्यात् तु द्वौ भागौ पूर्व एव तु।
 
उत्तरांशः प्रभातेन युज्यते ऋतुसूतके।।
 
(बड़ा पण्डा हाथ उठाकर बरक़तउल्ला को पढ़ने से रोक देता है।)
 
(कुछ लोग चिंतामणि को लेकर आ जाते हैं।)
 
आदमी-1: चिंतामणि आ गया महाराज...इसी ने बताया है कि ये मुसलमान है।
 
बड़ा पण्डा: (चिंतामणि से) क्यों ये कौन है?
 
चिंतामणि: ये मुसलमान है...इनका नाम सैयद बरक़तउल्ला है...इनके पिता का नाम अलीमुल्लाह है...इनका गाँव हमारे गाँव के पास ही है।
 
बड़ा पण्डा: (बरक़तउल्ला से) क्यों जी ये गलत कह रहा है।
 
बरक़तउल्ला: नहीं यह सही कह रहा है।
 
बड़ा पण्डा: फिर जो तुमने कहा था वह गलत था?
 
बरक़तउल्ला: नहीं वो भी सही था।
 
बड़ा पण्डा: तो क्या तुम हिन्दू भी हो मुसलमान भी हो?
 
बरक़तउल्ला: हाँ।
 
बड़ा पण्डा: कैसे ?
 
बरक़तउल्ला: जैसे तुम आदमी भी हो और मनुष्य भी हो।
 
बड़ा पण्डा: क्या मतलब?
 
बरक़तउल्ला: अल्लाह और ब्रह्म में वही अंतर है जो आदमी और मनुष्य में है।
 
बड़ा पण्डा: क्या मतलब?
 
बरक़तउल्ला: मतलब ये है कि कोई अंतर नहीं है...जब अल्लाह और ब्रह्म एक हैं तो हिन्दू और मुसलमान दो कैसे हो गये ?
 
आदमी-1: लेकिन जनम से तो तुम मुसलमान हो।
 
बरक़तउल्ला: जनम से तो आदमी आदमी होता है हम उसे हिन्दू और मुसलमान बनाते हैं...पंडित गनेशी राम पाण्डे हमारे पिता थे...हम उनकी आत्मा की शान्ति के लिए पिण्ड दान करने आये हैं...हमें गंगा जी में जाने दो।
 
आदमी-1-2: गंगा जी अपवित्र हो जायेगी।
 
अन्य लोग: हाँ गंगा जी अपवित्र हो जायेगी।
 
आदमी-3: इसे गंगा जी में न जाने दो।
 
आदमी-1: अरे मियाँ गंगा में कैसे चला जायेगा।
 
अन्य लोग: गंगा अपवित्र हो जायेगी।
 
(आदमी मिलकर बरक़तउल्ला को धक्के मारते हैं उसे भगाना चाहते हैं। कहते हैं गंगा अपवित्र हो जायेगी। लेकिन बड़ा पण्डा उन्हें रोकता है। गंभीरता और विश्वास के साथ कहता है।)
 
बड़ा पण्डा: नहीं...गंगा अपवित्र नहीं होगी...आस्था और विश्वास से गंगा अपवित्र नहीं होती...आओ भाई बरक़तउल्ला मैं तुम्हें अपने साथ ले चलता हूँ...गंगा जी में।
 
(बड़ा पण्डा बरक़तउल्ला को अपने साथ लेकर गंगा जी के अंदर आता है। बरक़तउल्ला मंत्र पढ़ते हुए पिण्ड दान करता है।)
 

 
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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