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एक नक़्शा, एक ख़्वाब और कुछ तितलियां — उमा शंकर चौधरी की लम्बी कहानी | a long story by Uma Shankar Chaudhary - ek naqsha, ek khvaab aur kuchh titaliyaan


और फिर उस रात उनके सपने में काली मिर्च खरीदते एक अंग्रेज दिखा। वह अंग्रेज दालचीनी को बहुत गौर से देख रहा था। उस अंग्रेज ने किशोरी बाबू को एक हैट गिफ्ट में दिया और कहा ‘तुमने हमारे खाने को टेस्टी बनाया हम तुमको धूप से बचायेगा।’ अभी दूसरे दृश्य में शकुन्तला उस हैट में दिख रही है समुद्र के किनारे घूमती हुई। किशोरी बाबू समुद्र किनारे सीप ढूंढ़ते हैं और फिर अपने हाथ से उसकी माला बनाते हैं और शकुन्तला को पहनाते हैं। 


'कहानी में जाने आगे क्या घट जाए' वाला इंतज़ार और कुछ अप्रत्याशित होने की ग्रैविटी से कहानी की रोचकता और उससे पाठक के जुड़ाव को यदि आँका जा सकता हो तो यह पाठक 'एक नक़्शा, एक ख़्वाब और कुछ तितलियां' और उसके लेखक, प्रिय कथाकार मित्र उमा शंकर चौधरी को सौ में सौ नंबर देगा। पढ़िए और आनंद लीजिए इस खूबसूरत रचना के हर एक दृश्य का ...  ~ सं०  
 

लम्बी कहानी

एक नक़्शा, एक ख़्वाब और कुछ तितलियां

उमा शंकर चौधरी

[एक मार्च उन्नीस सौ अठहत्तर को खगड़िया बिहार में जन्म। कविता और कहानी लेखन में समान रूप से सक्रिय। / प्रकाशन- तीन कहानी संग्रह ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’, ‘कट टु दिल्ली और अन्य कहानियां’, ‘दिल्ली में नींद’, तीन कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’, ‘चूंकि सवाल कभी खत्म नहीं होते’, ‘वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग’, और एक उपन्यास ‘अंधेरा कोना’ प्रकाशित। / सम्मान - साहित्य अकादमी युवा सम्मान, भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन सम्मान, रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार, अंकुर मिश्र स्मृति सम्मान। / मोबाइल: 9810229111 ईमेल:umshankarchd@gmail.com]


एक

किशोरी बाबू हवाई जहाज में बैठे हैं और उनका हवाई जहाज आसमान में उड़ रहा है। वे खिड़की के साथ वाली कुर्सी पर बैठे हैं और देख रहे हैं कि बाहर बर्फ के अनगिनत पहाड़ हैं। बर्फ के उन अनगिनत पहाड़ों के बीच से उनका हवाई जहाज बिना उनसे टकराये उड़ता जा रहा है। हवाई जहाज के भीतर लोगों को ठंड लग रही है। उन्होंने महसूस किया कि यह ठंड बाहर से आ रही है। हवाई जहाज में जो एयरहोस्टेस थीं उन्होंने उनसे मदद मांगनी चाही। वे एयरहोस्टेस परियों की तरह की थीं। उन्हीं परियों में से एक, उनके मांगने पर, उनके लिए हल्के गुलाबी रंग का बहुत ही मुलायम कम्बल लेकर आयी है। किशोरी बाबू फिर बाहर देखते हैं और अब वहां बर्फ के पहाड़ खत्म हो गए हैं। वहां अब धूप निकली है। बाहर कुछ चिड़ियां हैं जो अपने बच्चों से बतिया रही हैं। आसमान में रहने वाले कुछ सितारे उस हवाई जहाज के बहुत करीब आ गए हैं। किशोरी बाबू का गला सूख रहा है। उन्होंने मदद के लिए घंटी बजाई है और उनके लिए मदद हाज़िर है। वे खड़े होकर पूरे जहाज को एकबार निहारना चाहते हैं। जहाज में बहुत रोशनी है। कुछ लोग सो रहे हैं, कुछ बतिया रहे हैं। अपनी सीट पर से ही देखते हुए उन्हें आखिरी सीट पर बैठे हुए पशुपति दिखता है। पशुपति गले में गमछा लपेटे है और कमर में लुंगी बांधे है। किशोरी बाबू को मन किया कि खेत में बुआई कहां तक पहुंची, अभी पूछ ले। लेकिन फिर उन्होंने अपनी निगाह को खिड़की के बाहर ही कर लिया। खिड़की के बाहर अभी उन्हें एक बहुत ऊंची बिल्डिंग की छत दिख रही थी। उस छत पर लोग बैठे थे और धूप सेंक रहे थे। 

तभी दृश्य बदल जाता है। वे लाल किले के सामने खड़े हैं और सुहावनी धूप निकली हुई है। वे अंदर जाते हैं और राजा के सिंहासन के एकदम पास तक पहुंचा जाते हैं। दरबार में राजा के सिंहासन के अतिरिक्त दरबारियों के बैठने के लिए ढ़ेर सारी कुर्सियां रखी हैं। महल की भव्यता देखने लायक है। वहां बड़े-बड़े पर्दे लगे हुए हैं और वे हवा में हिल रहे हैं। हवा में हिल रहे हैं और रुनझुन-रुनझुन की आवाज आ रही है। उन्होंने वहीं से बाहर देखा। बाहर ढ़ेर सारे घोड़े खड़े थे और बहुत सारे सैनिक। किशोरी बाबू ने राजा के सिंहासन पर बैठने की इच्छा जाहिर की और सैनिकों ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें उस सिंहासन पर बैठाना चाहा। किशोरी बाबू सिंहासन के करीब गए तो देखा कि सिंहासन पर एक गिलहरी पहले से ही बैठी हुई है। वे बिना उस सिंहासन पर बैठे लाल किले से बाहर निकल आए। लाल किले के बाहर सड़क पर गाड़ियों का अंबार है। चारों तरफ चिल्ल-पों मची हुई है। सुंई-सुंई की आवाज के साथ गाड़ियां निकल रही हैं। जितनी बार गाड़ियां निकल रही हैं उतनी बार पेड़ के पत्ते हिल रहे हैं। वे लाल किले के बाहर खड़े हैं और उसके ठीक बगल में एक 40-42 माले की ऊंची इमारत है। उस इमारत की सबसे आखिरी फ्लोर को देखने की कोशिश किशोरी बाबू करते हैं परन्तु उनके गले में कांटे उग आते हैं। वे चक्कर खाते-खाते बचते हैं और तभी उनको वहां उसी इमारत के बगल में अपने गांव का मंदिर दिख जाता है। वे गले में उग आए कांटों के साथ उस मंदिर में घुस जाते हैं।

तभी एक बार फिर दृश्य बदलता है। इस बार इस दृश्य में किशोरी बाबू फिर से उसी हवाई जहाज में आ जाते हैं। बस अंतर यह है कि इस बार वे कुर्सी पर नहीं उस राजसिंहासन पर बैठे हैं। अंतर यह है कि इस बार बाहर बर्फ का पहाड़ नहीं है बल्कि अंदर बर्फ गिर रही है। किशोरी बाबू के अंदर सिहरन होती है और वे फिर से मदद के लिए उन महिलाओं को आवाज लगाते हैं। महिलाओं में से एक, एक सुंदर छाता लेकर आती है और उन्हें बर्फ से बचाती है। वह महिला आती है और इस बार उसके साथ पशुपति भी आ जाता है। किशोरी बाबू उसको पूछते हैं कि मेरा मुकुट कहां है। पशुपति कहता है कि आज ही तो बारिश हुई है, बुआई तो अब होगी ना। किशोरी बाबू खिड़की से बाहर देखते हैं। उन्हें वहां दो ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें दिखाई देती हैं। वे इमारतें अभी दूर हैं परन्तु अंदर बैठी सभी सवारियां बहुत उत्साहित हैं कि अभी इस हवाई जहाज को इन दोनों इमारतों के बीच से होकर गुजरना है। किशोरी बाबू डर जाते हैं। वे फिर से उन महिलाओं को आवाज लगाते हैं। महिलाएं आती हैं, उन्हें हिम्मत बंधाती हैं कि डरने की कोई बात नहीं है, ऐसा तो रोज ही होता है। परन्तु किशोरी बाबू का मन नहीं मानता। वे घबरा जाते हैं और उनकी नींद खुल जाती है। 

किशोरी बाबू की नींद खुली तो उन्होंने घड़ी तो नहीं देखी परन्तु उन्होंने अनुमान लगाया कि अवश्य इस समय सुबह के लगभग तीन, सवा-तीन बज रहे होंगे। उन्होंने बगल में लेटी शकुन्तला की तरफ देखा। शकुन्तला गहरी नींद में थी। कमरे के साथ लगा हुआ जो अंदर की तरफ का बरामदा था वहां एक हल्की रोशनी का बल्ब जल रहा था। उस बल्ब की रोशनी से इस कमरे में कुछ प्रकाश था। किशोरी बाबू ने उसी लाल रोशनी में शकुन्तला के चेहरे को देखा। शकुन्तला के घुंघराले बालों की कुछ लटें उनके चेहरे पर थीं। शकुन्तला के बाल भले ही बहुत हद तक सफेद हो गए हों परन्तु उनका घुंघरालापन अभी भी जस का तस बरकरार था। शकुन्तला के चेहरे पर झुर्रियां अवश्य आ गयी थीं परन्तु गोरापन और चेहरे का नमक अभी बरकरार था। यूं उस चेहरे को देखकर लग रहा था कि वह काफी जद्दोजहद के बाद का थका हुआ चेहरा है। परन्तु शकुन्तला के चेहरे पर आज थोड़ा सुकून दिखा तो किशोरी बाबू को बहुत आराम मिला। लेटे-लेटे वे छत की तरफ देखने लगे और फिर अभी-अभी देखे हुए सपने के बारे में सोच कर खुश होने लगे। सपने को उन्होंने दुहराया तो उसमें बर्फ, पहाड़, सिंहासन और गिलहरी सब दुबारा से आए। फिर वह खिड़की भी आयी जिससे उन्होंने बर्फ के उस पहाड़ को देखा था। यह वही खिड़की थी जहां से उन्हें वे दो ऊंची इमारतें दिखीं थीं जिनके बीच से इस हवाई जहाज को निकल जाना था। किशोरी बाबू उस खिड़की पर आकर कुछ देर रुके। उस खिड़की पर आकर रुकने पर उनके मन में एक खुशी दौड़ गयी, फिर वे शांत हो गए। उन्होंने मन में सोचा शकुन्तला के ठीक होते ही वे अवश्य हवाई जहाज की यात्रा करेंगे। उन्होंने ऐसा सोचने के बाद धीरे से उठना चाहा परन्तु शकुन्तला की नींद खुल गई। शकुन्तला को जगा देख किशोरी बाबू को बहुत दुख हुआ और उन्होंने पूछा ‘क्या तुम पानी पिओगी?’ शकुन्तला ने आंखें खोलकर किशोरी बाबू की तरफ देखा और फिर आंखें बंद कर लीं। किशोरी बाबू दबे पांव उठे और फिर उस अंदर वाले बरामदे को पार करके एक कमरे में चले गए।

इस कमरे में पहुंच कर किशोरी बाबू ने एक मद्धिम रोशनी वाला बल्ब जलाया। कमरा एकदम खाली है, सिवाय इसके कि इस कमरे के एक कोने में एक बड़ा सा डंडा पड़ा हुआ है। इस कमरे में एक दरवाजा है और एक बड़ी सी खिड़की है। खिड़की अंदर वाले बरामदे में खुलती है। लेकिन वह हमेशा बन्द रहती है। कमरे में एक बड़ी सी अलमारी है। यह अलमारी दीवार से जुड़ी हुई है। कमरे में इस अलमारी के सिवा, जो कि दीवार में फिक्स की हुई है, के अलावा सिर्फ एक डंडा है। परन्तु यह कमरा खाली होकर भी खाली नहीं है। इस कमरे का फर्श लाल रंग का है। और इस फर्श पर हरे चॉक से इस देश का नक्शा बनाया हुआ है। इस नक्शे में घूमने की अलग-अलग जगहों को बहुत ही शिद्दत से उभारा गया है। किशोरी बाबू आए और उन्होंने बहुत ही गौर से उस नक्शे को देखा। उनके मन में अभी-अभी सपने में देखा गया वह दृश्य उभर आया जब हवाई जहाज के भीतर बर्फ गिर रही थी और मदद करने वाली महिला उनके लिए छतरी लेकर आयी थी। उन्होंने सोचा अभी बर्फ तो शिमला में गिर रही होगी या फिर नैनीताल में। वे एक बार कमरे से बाहर निकले और बाहर वाली खिड़की के बाहर से आसमान की तरफ देखना चाहा। ऐसा लगा जैसे किशोरी बाबू यह देखना चाह रहे हों कि बाहर बर्फ गिर रही है या नहीं। बाहर अंधेरा था और उन्हें बर्फ के गिरने-न-गिरने का कुछ पता नहीं लगा। किशोरी बाबू अंदर आए और उन्होंने कोने में पड़े डंडे को उठाया और नक्शे के बाहर खड़े होकर वहीं से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड पर डंडा घुमाना शुरू किया। उन दोनों जगहों पर कई हिल स्टेशन के नाम लिखे हुए थे। किशोरी बाबू का डंडा नैनीताल पर आकर ठहर गया। फिर वे डंडे को कोने में रखकर अलमारी के पास आए और वहां से एक फर वाला कम्बल निकाल कर नैनीताल में जाकर कम्बल ओढ़कर बैठ गए। 

दो

किशोरी बाबू की जब शादी हुई तब तक उनकी नौकरी हो चुकी थी। उनके पिता रामअवतार सिंह खेतिहर थे। एक बड़े खेतिहर थे। खेती करने में उनका बहुत मन रमता था। उनके खेत गांव से दूर थे। और जब बुआई-कटाई का समय होता था तब वे अक्सर कई रातों तक खेत में ही रहा करते थे। खुद खेती करते थे परन्तु चाहते थे बच्चा पढ़-लिखकर नौकरी करे। रामअवतार सिंह खुद नौकरी नहीं कर पाए तो इसका उनको बहुत दुख था। उन्हें ऐसा लगता था कि नौकरी करके लोगों की ज्यादा सेवा कर सकते हैं। बेटा एक ही था और बेटियां तीन। पढ़ाया तो उन्होंने बेटियों को भी। लेकिन बेटियां भी नौकरी करें उनकी सोच ऐसी नहीं थी इसलिए उन्होंने बेटियों की पढ़ाई को बस संस्कार सीखने तक ही सीमित रखा। रामअवतार बाबू अपने बेटे के लिए चाहते थे कि या तो वह कोई बड़ा अधिकारी बने या फिर शिक्षक। और इस तरह किशोरी बाबू शिक्षक तक का ही सफर पूरा कर पाए। 

जब उस समय गांवों में शादियां जल्दी हो जाती थीं रामअवतार बाबू ने सभी बेटियों की शादी को निपटाकर बेटे की शादी में इंतजार किया। उन्हें लगता था कि शादी के बाद दिमाग भटक जाता है और बेटा उसके बाद कम से कम नौकरी तो नहीं कर पाएगा। बेटे ने पिता की इस तपस्या को शिक्षक बनकर पूरा किया। जब किशोरी बाबू की शादी हुई तब तक उनके साथ के सारे लड़कों की शादी हो चुकी थी। ऐसा लगता था कि उसकी शादी हो नहीं पाएगी। परन्तु ऐसा नहीं है। किशोरी बाबू की शादी भी हुई और लड़की भी सुन्दर और सुशील मिली। 

किशोरी बाबू अपने पिता के सामने कुछ बोलते नहीं थे। पिता ने तय किया कि उन्हें खेती नहीं करनी है तो उन्होंने खेती नहीं की। पिता ने तय किया कि नौकरी करनी है तो उन्होंने की। पिता ने शादी के लिए नौकरी की शर्त रखी तो उन्होंने इंतजार किया। पिता ने शादी तय की तो उन्होंने स्वीकार किया। न तो उन्हें मालूम था कि किस गांव, किस परिवार, किस लड़की से उनकी शादी हो रही है। ना ही लड़की की उम्र वे जानते थे और ना ही नैन-नक्श। वह तो पिता के आदेश के अनुसार विवाह के मंडप में बस बैठ गए। लेकिन पिता अपने प्यारे पुत्र के पिता थे, दुश्मन नहीं। और वह भी ऐसा पुत्र जो अपने पिता का इतना आज्ञाकारी हो। पुत्र, जिसने पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए नौकरी पा ली हो। 

यह खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गयी कि किशोरी की पत्नी बला की सुंदरी आयी है। किशोरी बाबू का सीना इसे देखकर फूला रहता कि उनके घर पर उनकी पत्नी की सुंदरता को देखने के लिए गांव की महिलाओं की कतार लगी रहती है। खुद किशोरी बाबू पहली बार शकुंतला को देखने से पहले अपने पिता से नाराज़ थे। लेकिन जब उन्होंने शकुन्तला को देखा तो लगा जैसे वे स्वप्न देख रहे हों। शकुन्तला के चेहरे पर जो मुस्कुराहट तारी थी उसने किशोरी बाबू को चौंका दिया था। उस पर शकुन्तला के घुंघराले बाल। किशोरी बाबू ने तब शकुन्तला के घुंघराले बालों को छूते हुए अपने पिता को मन में धन्यवाद कहा था और अपनी पत्नी को कहा कि ‘तुम्हें पता है, तुम तो रोशन आरा से भी ज्यादा खूबसूरत हो।’ शकुन्तला रोशन आरा को नहीं जानती थी। परन्तु उन्हें यह अवश्य समझ में आ गया कि यह उनकी तारीफ में बोले गए शब्द हैं। यह अलग बात है कि सुबह अपनी कही हुई बात को मन में जब किशोरी बाबू ने सोचा तब उन्हें याद आया जिस झटके से उन्होंने पत्नी की सुंदरता की तुलना रोशन आरा से कर दी है वह तो अजीब ही है। रोशन आरा तो देखने में सामान्य थी। पहले तो किशोरी बाबू ने सोचा कि वह शकुन्तला से इसके लिए माफी मांग लेंगे और फिर तुलना के लिए किसी और को चुन लेंगे लेकिन फिर उन्हें लगा कि इससे शकुन्तला का दिल टूट जाएगा और शकुन्तला को कौन सा पता है कि रोशन आरा इतनी सुन्दर नहीं थी जितनी कि शकुन्तला है। 

 

तीन

इस घर में कुल मिलाकर पांच कमरे हैं। चार कमरे इस नीचे वाले माले में है और एक ऊपर। इस घर को जब बनाया गया था तब इस घर का जो मुख्य द्वार था अब वह मुख्य द्वार नहीं है। किशोरी बाबू ने घर बनाने के लिए जब इस जमीन को खरीदा था तब उन्हें आश्वासन दिया गया था कि मुख्य द्वार तक पहुंचने के लिए जितनी जमीन वे छोड़ रहे हैं उतनी ही जमीन सामने वाले भी छोड़ेंगे और एक सामान्य रास्ता बन पाएगा। परन्तु ऐसा हुआ नहीं। जब तक सामने जमीन परती रही तब तक तो कोई दिक्कत नहीं हुई परन्तु जब उसपर घर बनना शुरू हुआ तब सामने वाले ने वायदे से मुकरते हुए जमीन नहीं छोड़ी और किशोरी बाबू के घर के लिए इस मुख्य दरवाजे में बहुत संकरा रास्ता बच गया। वह तो भला हो घर के बाएं तरफ आए पड़ोसी का जिन्होंने अपने घर तक गाड़ियों के पहुंचने के लिए रास्ता बनाना चाहा और किशोरी बाबू को फिर से अपनी जमीन का हिस्सा छोड़कर ही सही परन्तु एक चौड़ा रास्ता मिल पाया। और इस तरह इस घर को जिस रास्ते को ध्यान में रखकर बनाया गया था उससे उलट इस घर का मुख्य द्वार बदल गया। मुख्य द्वार बदला तो घर का पूरा नक्शा ही घूम गया। जो बगीचा घर के बगल वाले हिस्से में था वही अब घर का मुख्य हिस्सा हो गया और अब घर में प्रवेश करने का रास्ता इस बगीचे के बीच से ही गुजरा। लेकिन इस घर को अभी भी कोई भीतर से देखेगा तो उलझन में अवश्य पड़ जाएगा कि घर का प्रवेश इस तरफ है तो बड़ा दरवाजा उस तरफ क्यों है?

अब इस घर में घुसते ही सबसे पहले छत पर जाने की सीढ़ी है। वह सीढ़ी जो पहले कभी घर के बगल वाले हिस्से में थी। उस सीढ़ी के बगल से इस घर में घुसने पर सबसे पहले एक बरामदा कहें या हॉल कहें, है। उस हॉल के बांये तरफ एक कमरा है, जो पहले घर में घुसने के बाद का सबसे पहला कमरा था। हॉल के ठीक सामने एक कमरा है और हॉल के दायें तरफ एक कमरा। एक कमरा इस घर में हॉल के दांये जाकर थोड़ा सा बांये मुड़ने पर भी है। यह कमरा एक तरह देखा जाए तो इस घर का सबसे अलग कमरा है। यह वही कमरा है जिसमें किशोरी बाबू, कहानी के एकदम शुरुआत में, रात को सपने से जगने के बाद गए थे। इसी कमरे के लिए यह कहा गया था कि इसमें एक खिड़की है जो बरामदे की तरफ है, परन्तु उसे बंद रखा गया है। इस खिड़की के बंद होते ही यह कमरा इस घर से बिल्कुल ही कट जाता है। इस घर के ऊपरी माले पर सिर्फ एक कमरा बनाया हुआ है। इस कमरे को तब तो इस बात को ध्यान में रखकर बनाया गया था कि जिस भी बच्चे की पढ़ाई जब गम्भीर हो जाएगी वह इस कमरे का इस्तेमाल करेगा। बच्चों के घर से बाहर जाते ही यह कमरा काफी दिनों तक तो खाली रहा फिर पिछले दो-एक वर्षों से किशोरी बाबू ही इस कमरे में शाम में आकर बैठते हैं। इस कमरे में उन्होंने कबूतर और गोरैयों को देने के लिए दाना रख रखा है। और छत पर वे कुछ देर गोरैयों और कबूतरों के साथ बिताते हैं। 

किशोरी बाबू इतिहास के शिक्षक थे और एक अच्छे शिक्षक थे। शुरुआत के कुछ वर्षों तक तो वे अपने गांव से ही दूर-दराज तक के स्कूल तक नौकरी करते रहे। उनके पास एक साइकिल थी और वे कई किलोमीटर तक उसी साइकिल से सफर कर लिया करते थे। किशोरी बाबू को दो बच्चे हुए एक बेटी और एक बेटा। किशोरी बाबू में पढ़ाई को महत्व देने की सोच अपने पिता से आयी थी। इसलिए जब उनके बच्चे बड़े होने लगे तब उनके मन में यह आया कि बच्चों को अच्छी तालीम कम से कम इस गांव से मिलना संभव नहीं था। आठवीं-नौवीं तक की पढ़ाई तो गांव से हो गयी परन्तु उससे ऊपर की पढ़ाई गांव से संभव नहीं थी इसलिए धीरे-धीरे किशोरी बाबू ने गांव को छोड़ने का निर्णय लिया। गांव को छोड़ने के इस निर्णय के पीछे जो सबसे बड़ी दिक्कत थी, वह थी खेती। किशोरी बाबू अपने पिता के इकलौते पुत्र थे और यही कारण है कि उनके खेत बंटे नहीं और खेती उनके पास ठीक-ठाक थी। एक तो खुद ही वे पढ़ने-लिखने वाले इंसान थे इसलिए उनकी बहुत रुचि भी इसमें नहीं थी और दूसरा यह बच्चों की पढ़ाई का मुद्दा तो था ही। जब तक किशोरी बाबू के पिता जिंदा रहे, किशोरी बाबू गांव में रहे परन्तु उनके निधन के बाद वे इस छोटे से शहर में आ बसे। यह शहर भी क्या शहर है। है तो कस्बा ही लेकिन शहर की सारी बुराइयों के साथ। 

चार

किशोरी बाबू ने अपने जीवन में तीन चीजों को बहुत महत्व दिया। पहला अपनी नौकरी, दूसरा अपने बच्चों की पढ़ाई और तीसरा खेती। इन तीन बातों का किशोरी बाबू के जीवन में महत्व भी उसी क्रम में है। नौकरी को लेकर वे हमेशा बहुत गम्भीर रहे। वे इतिहास के शिक्षक थे और ब्लैकबोर्ड पर हाथ में चॉक लेकर बच्चों को एक-एक तारीख को बतला कर समझाया करते थे। भारत का पूरा नक्शा वे अपने हाथ से ऐसा खींच देते थे जैसे कि किताब से पूरा छाप लिया गया हो। वे उस नक्शे पर तारीखों के आधार पर शासन को बहुत ही विस्तार से बतलाया करते थे। इतिहास में उनका सबसे मनपसंद समय था मध्यकाल। वे मध्यकाल के इतिहास को बहुत ही रोचक ढंग से पढ़ाया करते थे। दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगल काल तक। उनकी पूरी कहानी दिल्ली और आगरा के बीच घूमती थी। वे कक्षा में पढ़ाते और कोशिश करते कि क्लास में ही एक ऐसा माहौल तैयार हो जाए जहां एक तरफ किला तैयार हो जाए। जहां घोड़े की सवारी हो। जहां रथ पर राजा सवार होकर आए, आदि-आदि। किशोरी बाबू पढ़ाते और हमेशा उनकी इच्छा रहती कि वे जिन्दगी में एक बार इन जगहों पर घूमने अवश्य जाएंगे। 

जब तक उनके अपने बच्चे छोटे थे तब तक वे गांव में रहे लेकिन जब उन्हें यह समझ में आने लगा कि गांव में रहने में बच्चों की पढ़ाई का नुकसान है तब उन्होंने नजदीक के कस्बे में अपना घर बना लिया। यह कस्बा यूं तो जिला मुख्यालय था परन्तु एक तरह से यह विकासशील कस्बा था। इस कस्बे में जिस इलाके में किशोरी बाबू ने अपना घर बनाया था वहां ऐसे लोग अपना घर बना रहे थे जो गांव के जीवन से भागकर शहरी जीवन, शहरी सुख-सुविधाओं को पसंद कर रहे थे। यह कस्बा अभी ऑनलाइन खरीददारी पर निर्भर तो नहीं हुआ था परन्तु उनकी जिन्दगी अब अपने आप में ही सिमटने अवश्य लग गयी थी। यहां भी घरों में इंटरनेट की सुविधा थी और लोग टेलीविजन और व्हाटसएप्प और फेसबुक पर जुटने लगे थे। लोग एक-दूसरे के घर में ताकाझांकी नहीं करते थे। लेकिन अभी यहां के लोग गंजी और लुंगी में सड़क पर टहलते हुए अवश्य मिल जाते थे। 

इस कस्बे में एक रेलवे स्टेशन था और एक बस स्टैंड। तीन सिनेमा हॉल थे। लेकिन तीनों में से किसी में भी एसी नहीं था। इस कस्बे के लोग थैले में भरकर सब्जियां लाते थे। यहां के लोग अभी खाने में पनीर तक तो पहुंच गए थे लेकिन पैकेट वाले पनीर का चलन अभी यहां नहीं आया था। यह कस्बा अभी बालाजी स्वीट्स में चाट और समोसे पर खुश था। यहां लड़कियां अकेले सिनेमा देखने नहीं जाती थीं। मोमोज और पिज्ज़ा की दुकानें कहीं-कहीं अब दिखने लगी थीं। 

किशोरी बाबू अपने पिता के निधन के उपरान्त जब इस कस्बे में आए तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती खेत के विस्तार को संभालना था। खेती बहुत थी और उनका खेती का अनुभव बिल्कुल शून्य। अपने आप को शहर में आने से वे रोक नहीं सकते थे और खेती को खाली छोड़ा नहीं जा सकता था। किशोरी बाबू ने खेती को बटाई पर लगाया। जिस कस्बे में वे रहने आए थे उसकी दूरी उनके गांव से ज्यादा नहीं थी। चौदह किलोमीटर की दूरी किशोरी बाबू प्रायः साइकिल से ही पूरी करते रहे। 

जब तक उनके बच्चे बड़े हुए उनकी दिनचर्या इसी तरह चलती रही। चाहे वे गांव में रहे हों या फिर इस कस्बे में। वे साइकिल से नियमित स्कूल जाते थे और फिर शाम को बच्चों को लेकर बैठ जाते थे। गांव में भी उनके पास इतनी फुरसत कभी नहीं रही कि वे पोखर में तैरती बत्तखों को देख सकें। जब तक पिता जिंदा रहे वे खेती की जिम्मेदारियों से मुक्त थे। परन्तु शहर आते ही उनके ऊपर यह अतिरिक्त भार पड़ा। यूं तो खेती बटाई पर ही लगा दी गयी थी परन्तु उनके कामों में एक यह काम अतिरिक्त जुड़ा कि उन्हें महीनें में तीन-चार बार गांव जाना ही पड़ता था। और फिर इस शहर में भी उन्होंने अपने जीवन को संभालने में ही अपना वक्त बिता दिया। स्कूल जाना, आते वक्त थैले में सब्जी लेते आना, बच्चों को पढ़ाना और फिर जब भी फुरसत हो, गांव की तरफ निकल जाना। यह किशोरी बाबू की दिनचर्या थी। यह किशोरी बाबू की दिनचर्या ही नहीं जिम्मेदारी भी थी। 

परन्तु इन जिम्मेदारियों के अतिरिक्त किशोरी बाबू के पास अपना एक मन भी था। किशोरी बाबू उड़ना चाहते थे। यहां से वहां तक। वहां से यहां तक। वे इतिहास के शिक्षक थे तो किताबों को पढ़-पढ़ कर उनके मन के भीतर भारत का नक्शा बस गया था। इस देश के अलग-अलग समयों का इतिहास उनके मन में बसा हुआ था। भारत किस समय कितना बदला और कैसे बदला वे अपने छात्रों को पढ़ाते थे। परन्तु उनका मन करता था कि उन बदलावों को अब अपनी आंखों से देखें। लेकिन सिर्फ ऐतिहासिक जगहों को ही नहीं उनका मन भारत की अलग-अलग संस्कृतियों को देखने के लिए भी बेताब था। उनका मन करता था कि उनके डैने निकल आएं और वे यहां से वहां तक और वहां से यहां तक उड़ कर चले जाएं। वे बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी के बाद की दिल्ली को करीब से देखना चाहते थे। कितनी बदली दिल्ली। अब कैसी लगती होगी दिल्ली। वे दक्षिण भारत देखना चाहते थे। वह कौन सा रास्ता है जिधर से मसाला ढूंढ़ते अंग्रेज पहुंचे। उत्तर भारत की संस्कृति से कितनी भिन्न है दक्षिण भारत की संस्कृति। वे समुद्र देखना चाहते थे। समुद्र के किनारे बैठ लहरों को उठते और गिरते देखना चाहते थे। वे मुंबई की ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों को देखना चाहते थे तो पहाड़ पर गिरती बर्फ को भी देखना चाहते थे। किशोरी बाबू इस देश के हर रंग को अपनी आंखों में समा लेना चाहते थे। परन्तु फिलहाल अपनी जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने अपने ख़्वाबों को तह लगाकर रख दिया था। एक ऐसी फुरसत के इंतजार में जब वक्त हो और उनका मन आसमान में उड़ रहा हो। 

पांच

खुद इस बात को किशोरी बाबू स्वीकार करते हैं कि शकुन्तला उनके जीवन में नहीं आयी होती तो उनका जीवन बेरंग होता। शकुन्तला बेहद खूबसूरत थी इसे तो कहानी में बतलाया ही गया है लेकिन किशोरी बाबू के जीवन में उन्होंने रंग सिर्फ अपनी खूबसूरती से ही नहीं भरा था बल्कि उससे भी ज्यादा अपने संग-साथ से। शकुन्तला ने ही किशोरी बाबू को दो प्यारे प्यारे बच्चे दिए। शकुन्तला का साथ ही था कि इस कस्बे में इतना प्यारा घर बन पाया। शकुन्तला का साथ ही था कि बेटी और बेटे दोनों की अच्छी नौकरी भी हुई और अच्छी शादी भी हुई। किशोरी बाबू को याद नहीं आता कि वे बच्चे को पढ़ाने बैठे हों और घर के स्तर पर कभी कोई परेशानी शकुन्तला ने आने दी हो। पति से लेकर बच्चों तक को कब क्या चाहिए शकुन्तला को उंगलियों पर जैसे याद रहता था। 

शकुन्तला लम्बी थीं और हृष्ट पुष्ट थीं। हृष्ट-पुष्ट मतलब स्वस्थ। उन्होंने मोटापे को अपने शरीर पर कभी चढ़ने नहीं दिया। वे बहुत फुर्तीली थीं। कभी यहां-तो कभी वहां। किशोरी बाबू कहते ‘तुम्हारे पैर में तो चकरी लगी हुई है।’ वे यह भी कहते कि ‘शकुन्तला अगर उनकी पत्नी नहीं होती तो ना जाने यह जीवन कैसा होता।’ किशोरी बाबू याद करना चाहें तो भी उन्हें याद नहीं आया होगा कि कभी उनका पत्नी के साथ किसी भी बात पर कुछ भला-बुरा हुआ हो। शकुन्तला घर संभालती थी और किशोरी बाबू के मन में उनके लिए बहुत सम्मान था। वे हमेशा लोगों को कहते कि बाहर जाकर नौकरी कर लेने के अलावा उन्हें आता ही क्या है। घर में जो संस्कार है और बच्चों के भीतर जो संस्कार गए हैं वह सब सिर्फ शकुन्तला के कारण ही संभव हो पाया है। 

शकुन्तला के साथ किशोरी बाबू का एक खास तरह का रिश्ता रहा है। किशोरी बाबू का जीवन चल रहा था। बच्चे बड़े हो रहे थे। नौकरी चल रही थी। जीवन चल रहा था। और साथ ही साथ किशोरी बाबू और शकुन्तला का सम्बन्ध एक अलग तरह से साहचर्य के साथ चल रहा था।

किशोरी बाबू ने शकुन्तला के लिए अपने मन में फूलों का एक बाग तैयार कर रखा था। उस बाग में लताओं से बना और फूलों से लिपटा एक झूला भी था। इस बाग में अक्सर किशोरी बाबू अपनी शकुन्तला के साथ विचरण किया करते थे। झूले पर बैठते थे। और कभी निराश होते तो इसी झूले पर झूलते हुए अपनी शकुन्तला के कन्धे पर अपना सिर रख देते थे। शकुन्तला भी अपने पति के मन को पढ़ती थी और प्यार करती थी। वह किशोरी बाबू के साथ इस बाग में घूमती थी, उनकी बांहों में बांहें डाले आसमान की ओर ताकती थी। वे वहां मौजूद सितारों को अपने आंचल में टांका करती थी। इस बाग में तितलियां थीं और गिलहरियां। शकुन्तला को तितलियां बहुत पसंद थीं और किशोरी बाबू को गिलहरियां। दोनों घंटों इन तितलियों और गिलहरियों के बीच समय गुजारा करते थे। 

अपने जीवन की कई उपलब्धियों को किशोरी बाबू ने इसी बाग में सेलिब्रेट किया था। शकुन्तला के लिए वे कई बार सोने के कंगन, पायल और बिछिया लेकर आए और इसी झूले पर उन्होंने इसे शकुन्तला को पहनाया भी है। शकुन्तला अपने पति में इस कदर खोई रहती कि वह ओस की बूंदों को देखकर खुश होती और बारिश की फुहारों पर नाचने लगती। 

यह मन का कोना दोनों का निजी था जहां भागम-भाग भरी दुनिया से अलग अपनी ही एक दुनिया थी। समानान्तर रूप से जीवन के सारे संघर्ष चलते रहे परन्तु उनका अपना निजी कोना बना रहा। दोनों में प्यार बना रहा। 

छः

लेकिन यह कहानी उनके बीच के प्यार की कहानी नहीं है बल्कि किशोरी बाबू की उस इच्छा की कहानी है जिसे उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों के बीच तहा कर रख दिया था। 

किशोरी बाबू अपनी जिम्मेदारियों में शिद्दत से लगे रहे और उनके मन के भीतरी कोने में एक बलवती इच्छा दबती रही।

किशोरी बाबू ने अपनी सभी इच्छाओं को अवकाश प्राप्ति के बाद के लिए रख छोड़ा था। उन्होंने सोचा था कि बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर, अपनी नौकरी से भी सफलतापूर्वक अवकाश प्राप्त कर अपनी शकुन्तला के साथ अपने मन के उन ठिकानों पर घूमेंगे, जहां-जहां की कल्पना उन्होंने मन में कर रखी थी। जैसलमेर के सोनार किला के भीतर अपनी शकुन्तला के साथ आईसक्रीम खाते हुए घूमने का ख्वाब उन्होंने शकुन्तला से भी साझा किया। वे शकुन्तला को बतलाते--‘‘सोचो शकु (शकु वे सिर्फ अकेले में ही कहते थे) वह अकेला किला है जिसमें राजा ने अपने किले के भीतर ही पूरा गांव बसा लिया था। इतनी ऊंचाई पर बसा यह किला सोने जैसे पत्थर से बना है। सोना नहीं, सोने जैसे पत्थर से बना। ऐसे देखो तो पत्थर और सूरज की रोशनी में देखो तो सोना।’ शकुन्तला सुनती और उस समय किशोरी बाबू के मुंह पर आई हुई चमक को देखकर आह्लादित होती। 

ऐसे तो अपनी नौकरी को बहुत ही ईमानदारी और शिद्दत से किया किशोरी बाबू ने लेकिन जिस दिन उनकी अवकाश प्राप्ति थी वे अंदर से काफी खुश थे। 

अपने अवकाश के आखिरी दिन भी किशोरी बाबू ने अपने बच्चों को पढ़ाया। इतिहास में उनका प्रिय क्षेत्र-मध्यकाल था। उन्होंने उस दिन शाहजहां के अंत और औरंगजेब के उत्थान की कहानी बच्चों को पढ़ाई। मुमताज का शाहजहां से यह कहना कि वह उनकी मृत्यु के बाद दूसरी शादी ना करें। मुमताज अपने बच्चों के जीवन में सौतेले भाई या बहन की तकरार नहीं चाहती थीं। किशोरी बाबू ने बतलाया कि इतनी मारकाट तो किसी सौतेले भाइयों में भी कभी नहीं हुई जितनी कि इन सगे भाइयों के बीच हुई। बच्चे ध्यान से सुनते रहे और सोचते रहे कि किशोरी बाबू के बाद इस किस्सागोई का क्या होगा। 

किशोरी बाबू ने उसी दिन जहां आरा और रोशन आरा की भी कहानी सुनाई। तभी उनको याद आया कि शादी की पहली रात उन्होंने अपनी शकुन्तला को रोशन आरा कह दिया था, रोशन आरा तो बहुत सामान्य थी देखने में। शकुन्तला के सामने रोशन आरा की क्या बिसात।

किशोरी बाबू को शकुन्तला की याद आयी तो यह भी याद आया कि आज अपनी शकुन्तला के लिए अवश्य वे कुछ लेकर जाएंगे। 

और फिर अपने विद्यालय के बच्चों से अलग होते हुए और आंखों में आंसू लिए किशोरी बाबू जब निकले तो सबसे पहले शकुन्तला की पसंद की चीज ढूंढ़ने निकल पड़े।

सबसे पहले उन्होंने सोचा कि कुछ मिठाइयां ले जाएं। लेकिन फिर याद आया मिठाई शकुन्तला को ज्यादा पसंद कहां है। सोचा एक साड़ी ले लेते हैं। लेकिन फिर लगा इसमें नया क्या है। सोचा कोई गहना ले लें। लेकिन बहुत भटकने के बाद भी पसंद नहीं आया। फिर जूता-चप्पल और यहां तक कि पाउडर, बिन्दी तक सब देख लिया। लेकिन जल्दबाजी इतनी थी कि कुछ भी पसंद नहीं आ रहा था। अंधेरा होने लगा तो किशोरी बाबू खीझने लगे। और खीझने लगे तो कुछ निर्णय होना लगभग असंभव सा हो गया। 

किशोरी बाबू जब मुंह लटकाए घर पहुंचे तो शकुन्तला को लगा कि वे अवकाश प्राप्ति के कारण दुखी हैं। शकुन्तला ने बहुत समझाना चाहा परन्तु किशोरी बाबू मुंह फुलाए चौकी पर बैठे रहे। बहुत समझाने के बाद किशोरी बाबू ने अपने दिल की बात शकुन्तला को बतलाई और शकुन्तला ने यह सुनकर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। और तब किशोरी बाबू ने अपने आप को शकुन्तला की बांहों से छुड़ाकर अपने बगल में बैठा लिया था और कहा था। 

‘तुमने कभी समुद्र की लहरों को नहीं देखा है। उसमें एक गजब की आवाज होती है। उसकी आवाज एक कोरस बनाती है। उसमें बनने वाले झाग को तुमने नहीं देखा है। उस पानी में मौजूद नमक को भी तुमने कभी महसूस नहीं किया है। उसका ऊपर उठना फिर गिरना। उसमें जीवन का पूरा फ़लसफा है।’

‘तुम्हें मैं पुरी बीच पर ले जाउंगा। वहां कोणार्क मंदिर देखेंगे और फिर वहीं से जगन्नाथ मन्दिर। तुम्हें पता भी है कि कोणार्क मन्दिर कितना पुराना है। तुम्हें यह पता है कि उसे एक रथ का आकार दिया गया था। किताबों से अलग उन रथ के पहियों को सामने साक्षात देखने का आनन्द ही कुछ और होगा।’

‘कोणार्क मन्दिर से लेकर जगन्नाथ मन्दिर तक का जो रास्ता है वह समुद्र के किनारे है। उस समुद्र के किनारे वाले रास्ते पर हम साथ-साथ चलेंगे।’

‘अब मेरा यह समय सिर्फ हमारे लिए है। हम साथ-साथ घूमेंगे और पूरा हिन्दूस्तान घूमेंगे। इतिहास भी, समुद्र भी, पहाड़ भी, रेगिस्तान भी। तुमने कभी यूं खुले में आंखों के सामने बाघों को घूमते भी तो नहीं देखा है।’

शकुन्तला चुपचाप सुन रही थी और किशोरी बाबू के चेहरे पर आई हुई चमक को देख रही थी।

सात

किशोरी बाबू-शकुन्तला के दो बच्चे हैं। बेटी अवनी ने आईआईटी इलेक्ट्रॉनिक की पढ़ाई की और अब ऑस्ट्रेलिया में रह रही है। अवनी की शादी पुष्कर से हुई। पुष्कर पहले बैंगलुरू में नौकरी कर रहा था और फिर उसे ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा तो अवनी ने भी अपने लिए नौकरी वहीं ढूंढ़ ली। उनका एक बेटा है विवान। 

किशोर बाबू का बेटा सिद्धार्थ अवनी से चार साल छोटा है। सिद्धार्थ ने आईआईटी मुम्बई से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की और अभी हैदराबाद में नौकरी कर रहा है। किशोरी बाबू के रिटायरमेंट से दो साल पहले सिद्धार्थ की भी शादी हो गयी। सिद्धार्थ की शादी सुनंदा से हुई। सुनंदा भी वहीं उसी फील्ड में नौकरी कर रही है। 

किशोरी बाबू और शकुन्तला अपने बच्चों के जीवन को व्यवस्थित करने में एक सफल माता-पिता थे। आज भले ही दोनों बच्चे उनसे दूर हैं परन्तु इस बात का सुकून दोनों को है कि दोनों अपने जीवन में आनन्द में हैं। यह भी सुकून की बात है कि दोनों बच्चों के जीवन साथी भी ऐसे मिले जो उनके क्षेत्र के ही थे और दोनों में बहुत प्यार था। दोनों बच्चे नौकरी के सिलसिले में अभी बाहर रह रहे हैं, ऐसा नहीं है। जब से उनकी पढ़ाई का दर्जा ऊंचा हुआ, वे बाहर ही हैं। पहले इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए बाहर गए फिर उसकी पढ़ाई के लिए। यूं समझा जाए कि एक बार वे बाहर क्या निकले, फिर लौटकर घर नहीं लौटे। माता-पिता चाहते भी यही थे कि बच्चे सफल होकर और आगे निकलें, यहां नहीं लौटें। और हुआ भी ऐसा ही। 

ऐसा नहीं है कि बच्चे सफल हो गए, बाहर निकल गए, शहरी हो गए या फिर उनका रहन-सहन अलग हो गया तो उन्होंने माता-पिता को भुला दिया। बेटी ने हमेशा चाहा कि वे ऑस्टेलिया घूमने आएं, कुछ दिन यहां आकर साथ रहें। सिद्धार्थ तो हमेशा कहता है ‘कुछ और दिन रह लीजिए गांव की वादियों में फिर तो आपको शहर ही आना है।’ सिद्धार्थ जब भी अपने माता-पिता के पास जाता है तो अपने साथ शहर की खूब सारी बातें ले जाता है। 

ऐसा तो नहीं है कि किशोरी बाबू सिद्धार्थ या अवनी के पास जाना नहीं चाहते हैं परन्तु रिटायरमेंट तक तो वे इस व्यस्तता को अपनी ढाल बनाए रहे कि ‘अब तो बस दो-एक साल बचे हैं, फिर करना क्या है, बस घूमना ही तो है।’ शकुन्तला, किशोरी बाबू की दिली इच्छा को जानती है तो उन्हें उनके लिए, उनके साथ घूमने की बहुत इच्छा है, नहीं तो उनके भीतर शहर को लेकर एक अजीब तरह का डर है। 

किशोरी बाबू की घूमने की इच्छा जो अभी तक उनके खाली होने का इंतजार कर रही थी वह उनके रिटायरमेंट के बाद भी मुश्किल में घिर गई। यह तो इतना आसान नहीं था कि किशोरी बाबू अपने घर, जड़-जमीन को छोड़कर रहने के लिए उस या इस महानगर में चले जाएं परन्तु हां वे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए अवश्य पहले अपने बच्चों के पास जाना चाहते थे फिर यहां और वहां। परन्तु किशोरी बाबू अपनी समस्याओं में घिरते चले गए।

आठ

वे दिन बहुत खुशगवार थे। अवकाश प्राप्ति के बाद अब सुबह-सुबह उठकर किशोरी बाबू को स्कूल नहीं जाना था। शाम को देर से उन्हें घर नहीं लौटना था। 

आजकल सुबह देर से होती थी। शाम जल्दी हो जाती थी। सुबह उठकर किशोरी बाबू बहुत सारा वक्त बगीचे में बिताते थे। इस बगीचे में दो आम के पेड़ थे, दो अमरूद के और एक नींबू का। जो खाली जगह थी, जिसपर अभी तक कभी कभार ही कुछ सब्जियां लगा ली जाती थीं, किशोरी बाबू ने इस जगह को साफ-सुथरा करके यहां सब्जियों के बीज बो दिए। इस बगीचे में बहुत सारे फूल के पौधे लगे हुए थे। गुलाब, गेंदा, उड़हूल और चमेली। इस बगीचे में मेंहदी का एक पौधा भी था। किशोरी बाबू आजकल देर से जगते हैं फिर भी शकुन्तला से पहले जगते हैं। वे चाहते भी हैं कि शकुन्तला आराम से उठे। वे उठते हैं, फ्रेश होते हैं और इस बगीचे से ढ़ेर सारे फूल तोड़कर शकुन्तला के सिरहाने रखते हैं। शकुन्तला की नींद उन फूलों की खुशबू से खुलती है। शकुन्तला जगती है और सामने किशोरी बाबू का मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखता है। 

 सुबह और शाम जिस समय मौसम में ठंडक रहती है किशोरी बाबू शकुन्तला को लेकर इस बगीचे में आते हैं। फिर यह बगीचा असल में जितना मनमोहक है उससे ज्यादा वह मन के बाग में तब्दील हो जाता है। चारों तरफ फूल खिल जाते हैं। झूला टंग जाता है। ढेर सारे प्यारे-प्यारे पक्षी यहां आ जाते हैं। गिलहरियां और खरगोश यहां आ जाते हैं। आसमान में सितारे टंक जाते हैं। आसमान से बर्फ के फाहे गिरने लगते हैं। किशोरी बाबू सुबह-सुबह ओस की बूंदों को पत्तों पर से सीधे शकुन्तला की हथेली पर रखते हैं। किशोरी बाबू शकुन्तला को फूलों से सजे झूले पर बैठाते हैं और उचककर बादल के एक टुकड़े को अपनी अंजुरी में भरकर लाते हैं और उसे शकुन्तला की गोद में धर देते हैं। 

 शाम का गोधुलि समय है। झूला झूलते हुए शकुन्तला के करीब जाकर किशोरी बाबू उनके कान में कहते हैं ‘इस खामोशी को महसूस करो। कोई आवाज नहीं है यहां। यहां एक पत्ता भी अगर पेड़ की डाल से टूटकर गिरेगा तो उसकी आवाज सुनाई देगी। यहां तक कि तुम अगर अपनी धड़कन की आवाज सुनना चाहो तो वह भी तुम्हें सुनाई देगी।’ कुछ देर दोनों शान्त रहते हैं। कहीं कोई आवाज नहीं है। एक पत्ता भी नहीं हिल रहा है। बर्फ गिरने की आवाज भी नहीं है। कोई कीड़ा भी चल नहीं रहा है। तब फिर से किशोरी बाबू शकुन्तला के कान में धीरे से कहते हैं--‘ठीक ऐसी ही खामोशी में हम तब होंगे जब एलेप्पी के बैक वाटर में बोटिंग कर रहे होंगे। सोचो एक बोट होगी और हम होंगे। ठहरा हुआ पानी होगा और उस ठहरे हुए पानी में बोट बस धीरे-धीरे आगे फिसल रही होगी। पानी की पतली-पतली धाराएं होंगी। बीच में बस नाव जितनी जगह होगी। दोनों तरफ की झाड़ियों से नाव रगड़ खाएगी। हमसे रगड़ खाएगी। उसकी एक खास आवाज होगी। कभी तुमने शांत पानी में नाव के चप्पू के डूबने और उससे बाहर निकलने की आवाज को सुना है! वह आवाज हमारे जीवन की पूंजी होगी।’

शकुन्तला उस फूलों से सजे झूले पर बैठी किशोरी बाबू को बहुत ध्यान से सुन रही है। वह झूलते हुए ही कहती है ‘मेरी पूंजी तो आप हैं।’

किशोरी बाबू फिर कहते हैं --‘समुद्र के शांत जल में उस हाउस बोट में जब हम रात गुजारेंगे तो सोचो खामोशी को सचमुच में हम कितने करीब से महसूस कर पाएंगे। चांदनी रात होगी और उस छोटे से घर के चारों तरफ पानी उस चांदनी रात को ओढ़े हुए सो रहा होगा। कोई शोर नहीं। बस वहां पानी के उस बोट से टकराने की निरंतर आने वाली आवाज होगी। वह आवाज हमारे कानों में संगीत की तरह बजेगी। जीवन की असली पूंजी तो वह होगी।’ 

लेकिन किशोरी बाबू के ख्वाब पूरे होने में बहुत सारी बाधाएं थीं। अभी किशोरी बाबू ने अपनी आजादी में डूबना-उतरना शुरू ही किया था और अपने कामों को समेटना शुरू ही किया था ताकि वे बाहर कहीं घूमने निकल सकें, शकुन्तला बीमार हो गयी। 

वह न सुबह थी और न शाम। वह रात भी नहीं थी। ठीक दोपहर को जब कि किशोरी बाबू खाना खाने के बाद अभी आराम कर रहे थे और शकुन्तला रसोई समेट कर उस कमरे की तरफ बढ़ रही थी कि शकुन्तला को अचानक लगा जैसे उसकी नजर के सामने यह पूरा घर घूम गया हो। शकुन्तला आवाज लगा नहीं पायी। वह गिरी तो उसकी आवाज भी किशोरी बाबू को नहीं मिल पायी। जब कुछ देर तक शकुन्तला नहीं आयी और उसने पुकारने पर भी प्रतिक्रिया नहीं दी तब किशोरी बाबू ने जाकर देखा। शकुन्तला बीच वाले हॉल में बेसुध पड़ी थी।

हमेशा चुस्त-दुरुस्त दिखने वाली शकुन्तला बीमार पड़ने के बाद मुरझा सी गयी। शकुन्तला कैसे बीमार पड़ी, शकुन्तला को बीमारी क्या है, इसे समझना आसान नहीं था। कभी चक्कर आए, तो कभी बहुत कमजोरी महसूस हो। कभी सिर दर्द, तो कभी ऐसा महसूस हो कि धड़कन ने काम करना ही बंद कर दिया है। 

उस दिन के बाद से शकुन्तला का जीवन सामान्य नहीं रह गया था। किसी दिन या कुछ घंटे ऐसा लगे कि शकुन्तला स्वस्थ हो गयी है कि तभी बहुत तेज आवेग के साथ सिर दर्द शुरू हो जाए। ऐसा आवेग कि लगे सिर के दो टुकड़े हो जाएंगे। वह चलने को हों तो अचानक सिर घूम जाए। कभी बहुत ठंड लगे, तो कभी गर्मी। कुछ समझना मुश्किल था। चूंकि यह सब चल रहा था तो भूख में भी फर्क आ गया था। कभी खाने का मन कर भी जाए तो गले के अन्दर खाने को धकेलना पड़े। कई बार जब शकुन्तला अपने बिस्तर पर अधलेटी रहती तो उनको देखकर ऐसा कहना मुश्किल भी हो जाता कि अभी वे बीमार हैं परन्तु उसी के कुछ घंटे के बाद या तो सिर दर्द का आवेग या फिर बहुत जोर का चक्कर। इतनी तरह की समस्याएं एक साथ शुरू हो गयीं कि शकुन्तला के भीतर अपने आप को लेकर एक डर समा गया। 

ऐसा नहीं है कि शकुन्तला का इलाज नहीं हुआ या अभी हो नहीं रहा है। शकुन्तला को अपने कस्बे के सबसे अच्छे डॉक्टर, नजदीकी बड़े शहर के डॉक्टर सभी को दिखलाया जा चुका था। ऐसा भी नहीं है कि बच्चों ने मां की चिंता नहीं की। अवनी लगातार इस चिंता में रही कि मां का इलाज अच्छी तरह से हो। जब उसे वक्त मिला वह मां के पास आयी भी। सिद्धार्थ ने एक बार, जब मां की तबियत थोड़ी सामान्य थी तब, वह उन्हें अपने साथ हैदराबाद लेकर भी गया। लेकिन हर जगह एक ही बात, बहुत कुछ समझ नहीं आ रहा। इन्हें आराम की जरूरत है। समय लगेगा। धीरे-धीरे सब सामान्य होगा। 

शकुन्तला के बीमार पड़ने पर किशोरी बाबू को शुरुआत में तो यही लगा था कि अभी कुछ ही दिन में वे ठीक हो जायेंगी और फिर सब सामान्य हो जाएगा। परन्तु ऐसा हुआ नहीं। 

नौ

शकुन्तला की जब तबियत बिगड़ी तब थोड़ी हलचल हुई। अवनी से लेकर सिद्धार्थ, सब यहां से वहां तक दौड़ने लगे। किशोरी बाबू खुद कई डॉक्टरों के चक्कर लगा लिए। लेकिन जब यह समझ में आ गया कि बीमारी कोई बड़ी भी नहीं है कि उसका इलाज तुरंत करवाया ही जाए। और उस इलाज से तुरंत शकुन्तला दुरुस्त हो ही जाएगी। जब यह निश्चित हो गया कि यूं ही स्वास्थ्य अब ऊपर-नीचे होता रहेगा, तब दिनचर्या थोड़ी सामान्य हुई। सिद्धार्थ के पास इतना वक्त नहीं था कि वह बार-बार अपनी मां के पास आ सके। परन्तु उसने इस बात पर बहुत जोर डाला कि वे दोनों यहीं हैदराबाद आकर रह लें। यहां मेडिकल की अच्छी सुविधा है। परन्तु किशोरी बाबू ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि शकुन्तला की देखभाल के लिए वे हैं तो। और वे तो अब खाली ही हैं। और अब शकुन्तला को अच्छी मेडिकल सुविधा से ज्यादा आराम की जरूरत थी। हर वक्त उनके केयर की जरूरत थी। और इसके लिए वे हैं। किशोरी बाबू ने कहा, यहां खेती का सारा काम भी बिखरा हुआ है। घर को ऐसे खाली छोड़कर लम्बे समय के लिए जाना भी सम्भव नहीं है। इसलिए उन्होंने कहा, यहां के माहौल में हम एक-दूसरे के साथ ज्यादा खुश रहेंगे। सिद्धार्थ इस बात को समझता था कि महानगरीय जीवन में दोनों को बहुत सुकून नहीं मिलने वाला था। और वहां भी सिद्धार्थ और सुनंदा दोनों दिन भर काम पर ही रहने वाले हैं तो यहां अकेले रहने से बेहतर है कि वे वहीं रहें। 

शकुन्तला बीमार क्या पड़ी, किशोरी बाबू ने एक पैर पर खड़े रहकर उनकी सेवा करना शुरू कर दिया। कौन सी दवाई कब देनी है। कब क्या खाना खाने देना है। कब गर्म दूध लेना है। कब ठंडी हवा में नहीं निकलने देना है। किस तरह शकुन्तला को गहरी नींद आ जाए, इसके लिए सारे जतन वे करते थे। वे कोशिश करते थे कि शकुन्तला को बिस्तर से कम से कम उठना पड़े और उन पर काम का कोई बोझ ना रहे। वे उनके लिए अभी भी सुबह-सुबह ताजे फूल तोड़कर लाते थे और उनके सिरहाने रख देते थे। ये फूल इस उम्मीद में भी वे रखते थे कि एक दिन शकुन्तला बिस्तर से उठकर इस फूल की खुशबू की तरह ही खिलखिला देगी और वे झटपट सामान पैक कर घूमने निकल जाएंगे। किशोरी बाबू मन में सोचते थे कि अभी शुरुआत पहाड़ से नहीं बल्कि समतल से ही करना ठीक रहेगा। उन्होंने सोचा जयपुर या जोधपुर अच्छा रहेगा। फिर लगा उन हवेलियों में घूमने में अभी शकुन्तला को दिक्कत होगी। फिर उन्होंने सोचा सबसे पहले हरिद्वार और ऋषिकेश से शुरुआत की जाए। नदी के किनारे हरि की पैड़ी पर शकुन्तला जब सुबह सुबह टहलेगी तो उसका मन एकदम तरोताजा हो जाएगा। ऐसा सोचते हुए उनके मुंह में हरि की पैड़ी पर मिलने वाली पूरी जलेबी का स्वाद आ गया। 

लेकिन धीरे-धीरे किशोरी बाबू को यह समझ में आ गया कि अभी वक्त लगेगा और इसे जीवन में नियमित कामों से साथ ढ़ालना ही होगा। 

किशोरी बाबू के अवकाश प्राप्ति के बाद और शकुन्तला के बीमार हो जाने के बाद और कुछ वक्त गुजर जाने के बाद जो दो-तीन बातें नई हुईं उनमें से एक तो यह कि किशोरी बाबू एकदम से घर में सिमट गए। शकुन्तला को कभी भी उनकी जरूरत पड़ जाती थी। इसलिए वे अब घर से बाहर सिर्फ सामान या सब्जी वगैरह लाने ही जाते थे। या फिर दवाई लाने या अपने पेंशन के काम से। दूसरी जो महत्वपूर्ण बात हुई वह यह कि सिद्धार्थ ने इस बीमारी के बाद एक अच्छा सा मोबाइल लाकर मां को दिया और जिसमें व्हाटसएप्प पर एक ग्रुप बना दिया गया - ‘फैमिली टाइज’। इस ‘फैमिली टाइज’ में छः लोग जुड़े हैं। सभी परिवार के ही। बेटे-बेटी के साथ बहू और दामाद भी। शुरू शुरू में तो शकुन्तला और किशोरी बाबू का बहुत सारा वक्त इस ग्रुप में कट जाता था परन्तु यह भी धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा। शुरू शुरू में सभी को जोश था तो चुटकुले-पहेलियां बहुत चलीं परन्तु आगे चलकर फिर धीरे-धीरे वहां भी बस इंतजार ही बचा रह गया। शकुन्तला लेटे-लेटे बार बार फोन उठा कर देखती लेकिन वहां कुछ नया नहीं दिखता। सिद्धार्थ अपने कामों में इतना व्यस्त रहता कि उसे बात करने की फुर्सत की नहीं मिलती। अवनी के साथ व्यस्तता के साथ समय की भी दिक्कत थी। जब उसके यहां बात करने का सही समय होता तब यहां भारत में बहुत ही बेढंगा समय होता। तो इस व्हाट्सएप्प ने तो कुछ साथ दिया था फिर बाद में बस किशोरी बाबू और शकुन्तला ही एक-दूसरे के लिए बचे रह गए थे। 

किशोरी बाबू उम्मीद के सहारे दिन काट रहे थे। वे शकुन्तला को देखते थे और हर दिन उन्हें लगता था कि आज कुछ बेहतर हो रहा है। परन्तु फिर कुछ ही दिनों में वह उम्मीद टूट जाती थी। जब शकुन्तला के चेहरे पर कुछ ताजगी दिखती किशोरी बाबू अपना डेस्टीनेशन तय करने लगते। अपने मन के भीतर वे सामान पैक कर लेते। उस जगह का इतिहास अपने मन में दोहरा लेते। वहां की चर्चित जगहों, खाने की चीज़ों को अपने मन में ले आते। और फिर एक दिन शकुन्तला के चेहरे पर फिर से थकावट आ जाती। 

लगभग तीन-चार वर्ष गुजर जाने के बाद धीरे-धीरे किशोरी बाबू मायूस होने लगे। चूंकि ठंडी हवा से शकुन्तला को बहुत दिक्कत होती थी इसलिए घर के सारे खिड़की दरवाजे लगभग बंद ही रहते थे। ठंडी हवा सांस में जाते ही शकुन्तला के सीने में अजीब तरह की घरघराहट उत्पन्न हो जाती थी। इसलिए सुबह-शाम घर से बाहर निकलना उनका बंद था। छत पर चढ़ना और बगीचे में जाना लगभग बन्द। जब बहुत तेज धूप रहती थी तभी वे बाहर निकल सकती थी। तो पूरे घर में किशोरी बाबू ने जो एक खुशनुमा माहौल बना रखा था वह अब सब मुरझाता जा रहा था। 

किशोरी बाबू अब अकेले उस बगीचे में जाते थे। वह बगीचा अब एकदम उदास हो चुका था। वहां कोई चिड़िया अब नहीं आती थी। कोई झूला वहां नहीं था। हरियाली, फूल सब बंजर में तब्दील हो चुके थे। किशोरी बाबू वहां आते थे, आसमान की ओर ताकते थे। वहां कोई बर्फ नहीं थी, ओस की बूंद भी अब नहीं थी। वहां अब सूखे पत्ते बिखरे रहते थे। कभी उनका मन करता था तो बस उन सूखे पत्तों को बटोर दिया करते थे और कुछ नहीं।

शकुन्तला, किशोरी बाबू से लगभग चार साल छोटी थी। किशोरी बाबू ऐेसे तो स्वस्थ थे परन्तु उन पर भी बुढ़ापे का असर दिखने लगा था। अब यह घर जिसमें यह बुजुर्ग दम्पत्ति रह रहा था, उजाड़ की तरह बन गया था। ऐसा लगता था जैसे इसमें कोई रहता ही नहीं था। चूंकि शकुन्तला का घर से निकलना बिल्कुल बन्द हो गया था तो अगल-बगल के लोगों से भी सम्पर्क धीरे-धीरे खत्म सा ही हो गया। वैसे भी जैसा कि पहले ही बतलाया गया कि यह कस्बा भी शहर के नक्शेकदम पर था जहां लोग धीरे-धीरे अपने जीवन को मोबाइल और कंप्यूटर में सिमटाते जा रहे थे। सभी के पास उस आभासी दुनिया में ही एक समाज था जहां सभी दिन भर बिना घर से निकले ही आराम से टहला करते थे। 

ऐसा नहीं है कि इस बंद घर में कभी कोई आता नहीं था। किशोरी बाबू कभी-कभार गांव भी जाते थे। वहां खेतों को देखना उनकी जिम्मेदारी थी। लेकिन सब भागम-भाग में ही चलता था। गांव से बटईदार आते थे कभी-कभी। इन चार-पांच वर्षों में अवनी अपने परिवार के साथ आयी। दो बार वह कुछ दिन रह कर भी गयी। सिद्धार्थ साल में एक बार तो लगभग आ ही जाता है। चार-पांच बार वह भी आया है। पैसों की कोई कमी किशोरी बाबू को थी नहीं कि उन्हें अपने बच्चों का मुंह ताकना पड़ता। दोनों बच्चे जाते वक्त अपने पिता को ढेर सारी हिदायतें देकर जाते कि अपना भी ख्याल रखा कीजिए। मां की सेवा में आपको पता भी है कि आपने अपना क्या हाल कर रखा है। सिद्धार्थ ने कई बार चाहा कि उनका चेकअप करवा दे। लेकिन हर बार किशोरी बाबू यह कह कर टाल देते कि उन्हें क्या हुआ है। वह तो हट्टे-कट्टे हैं। वह तो कहते कि तुम्हारी मां को भी क्या हुआ है, कुछ भी तो नहीं, बस कुछ ही दिनों के बाद वह स्वस्थ होगी और हमलोग सबसे पहले तुम्हारे यहां ही आएंगे। ऐसा कहते हुए किशोरी बाबू की जबान लड़खड़ाती थी और वे भीतर से डर से जाते थे।

धीरे-धीरे किशोरी बाबू को यह लगने लगा था कि उनकी जिन्दगी मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जा रही है। 

ऐसा लगता था कि सबकुछ है पर कुछ है जो रिक्त है। घर में टीवी है लेकिन किशोरी बाबू बहुत कम ही उसे चलाते हैं। घर में रोशनी कम रहती है। या तो कम बल्ब लगे हुए हैं या फिर कम जलाए जाते हैं। यदि कोई बल्ब खराब भी हो जाए तो दूसरे कमरे से या फिर बरामदे से आ रही रोशनी से काम चल जा रहा था। यूं तो घर को साफ रखने की कोशिश करते रहते थे किशोरी बाबू लेकिन छत के कोनों में जाले लगते जा रहे थे। पंखों में धूल की मोटी मोटी परत चढ़ गयी थी। ऐसा लगता था जैसे इस घर में धूप और हवा घुसने से हिचक रहे हों। ऐसा लगता था जैसे यह वर्षों से बन्द पड़ी कोई हवेली हो जिसमें बस दो आत्माएं रहे जा रही हों। 

दस

अब जब किशोरी बाबू घर के भीतर लगभग बंद से हो गए हैं तब उनके पास अब वक्त ही वक्त है। शकुन्तला घंटों आराम करती हैं। कभी स्वस्थ महसूस करती हैं तो उन दोनों में थोड़ी बहुत बातचीत हो जाती है, नहीं तो एकदम शांति। किशोरी बाबू के पास उनकी देखभाल के बाद भी बहुत सारा खाली वक्त होता है। यहां से वे सिर्फ अच्छे दिन का इंतजार कर सकते थे। ऐसे अच्छे दिन जब फिर से हरियाली होगी। जब शकुन्तला के चेहरे पर फिर से ताजगी लौटेगी। जब फिर से आसमान में सितारे आएंगे। जब फिर से उन सितारों को अपने आंचल में शकुन्तला टांकेगी। परन्तु फिलहाल वे सिर्फ अच्छे दिन का इंतजार ही कर सकते थे। 

किशोरी बाबू अब अनमने से रहने लगे हैं। वे घण्टों छत को देखते रहते। वे बस इस सामान को यहां से वहां और वहां के सामान को वहां से यहां करते रहते थे। फिर एक दिन उन्होंने अपने मन में कुछ ठाना और बाजार से अलग-अलग रंग के कुछ चॉक खरीद लाए। और कुछ अनाज के दाने। अनाज में बाजरा और मक्का। उन्होंने उस अंदर वाले कमरे को खाली किया। वह कमरा जो घर में घुसते ही दायीं तरफ अंदर जाकर था। उस कमरे का फर्श लाल था। उन्होंने उस फर्श पर हरे रंग से इस देश का नक्शा बनाया और फिर उस नक्शे में उन्होंने अपने मन की उन सारी जगहों को उकेरा, जहां उन्हें जाना था। हरे रंग के चॉक से नक्शा बना और पीला, नीला सभी अलग अलग रंग के चॉक से उसमें जगहों के नाम, उन जगहों में क्या-क्या घूमने लायक है। सब उस नक्शे में बहुत स्पष्ट रूप से उकेर दिया गया। उन घूमने वाली जगहों में किशोरी बाबू ने पहाड़ भी बनाया, रेगिस्तान भी, समतल जगहों के घूमने वाली जगहें भी और इतिहास से संबंधित जगहें भी। 

अनाज के दानों की बोरी को किशोरी बाबू ने ऊपर वाले कमरे में रखा और छत के एक कोने को पक्षियों का कोना बनाया। उन्होंने वहां दो-तीन बर्तनों में पानी रखा और फिर दानों को बिखेर दिया। पहले कुछ दिन तो वहां पक्षी नहीं आते थे। उन दिनों पक्षियों को यहां के दानों का पता नहीं था। लेकिन पंद्रह-बीस दिनों के बाद वहां कबूतर और गोरैये दाना चुगने लगे। 

अब किशोरी बाबू की व्यस्तता बढ़ गयी थी। उन्होंने अपनी एक अलग ही दुनिया बना ली थी। उन्हें शकुन्तला की जरूरतों का सब पता था इसलिए वे जल्दी-जल्दी सभी कामों को निपटाते थे और फिर वे उस कमरे की तरफ भाग जाते थे। वहां उन्होंने एक नुकीला डंडा रख रखा था जिससे वे उस नक्शे पर जगहों को ढूंढ़ते थे। पहले तो वह नक्शा इतना बारीक नहीं था लेकिन फिर दिन बीतते गए और उन्होंने उस नक्शे को बहुत ही बारीक कर दिया। वे किताबों को पढ़ते, अपने मोबाइल में एक जगह से दूसरी जगह की दूरी को पता करते। फिर उन जगहों को वहां चिह्नित करते। हर जगह के घूमने वाली जगहों को चिह्नित करते। वहां पर खाने, रहने, नृत्य, भाषा सभी को वहां वे बारीक अक्षर में लिखकर रखने लगे थे। फिर उन्होंने अपने मन में एक खेल जैसा बना लिया था। वे सुबह जगकर अपने मन में यह मान लेते कि आज कहां जाना है। और जहां का भी निश्चित होता तो वे वहां की पोशाक पहन कर नक्शे के भीतर उस जगह पर बैठ जाते। उनकी बराबर कोशिश रहती कि वे रसोई में उस दिन कुछ उसी तरह का खाना भी बना पाएं। उन्होंने उस कमरे की अल्मारी में ठंड के कपड़े रख रखे थे। कुछ रंगीन गमछे रख रखे थे। वहां छाता रखा हुआ था। कभी बर्फ गिरती थी तो छाता लेकर बैठ जाते थे। ठंड लगती तो गर्म कपड़े पहन लेते। कभी अपने रंगीन गमछों से अलग अलग तरीके की पगड़ियां बनाकर पहनने की कोशिश करते। कभी राजस्थान तो कभी गुजरात तो कभी हिमाचल।

किशोरी बाबू बीच-बीच में छत पर चढ़कर अपने पक्षियों को भी देख आते थे। गोरैया-कबूतर अपने मन से वहां आते थे और दाना चुग कर पानी पीकर ऊंचे आसामान में उड़ जाते थे। वे अपने मन के मालिक थे। वे कहीं भी उड़ सकते थे। कहीं भी जा सकते थे। वे आजाद थे। किशोरी बाबू अक्सर वहां बैठकर उन पक्षियों को देखा करते थे। वे पहचानने की कोशिश करते थे कि वे पक्षी क्या एक ही हैं या फिर अलग-अलग। किशोरी बाबू ऐसे किसी पक्षी को कभी पहचान नहीं पाए जो बार-बार यहां आता हो। हो सकता है कि बहुत सारे पक्षी उनमें समान हों परन्तु किशोरी बाबू आज तक उनकी पहचान को कभी नियत नहीं कर पाए। वे उन पक्षियों को दूर आसमान में उड़ते हुए देखते और उन्हें लगता कि काश उनके पास भी ऐसे ही डैने होते। 

किशोरी बाबू अपने इस सारे खेल को शकुन्तला से छुपाकर रखना चाहते थे। इसलिए उनकी यह कोशिश रहती कि वह उस कमरे तक नहीं जाएं। वह जगह के अनुसार पोशाक में भी उतना ही बदलाव लाते थे कि वे पकड़े ना जा पाएं। और प्रायः कोशिश करते थे कि उन पोशाकों में वे शकुन्तला के सामने नहीं जाएं। वे बार-बार छत की तरफ जाते थे, छुपाना वे इसे भी चाहते थे। शकुन्तला अब छत पर लगभग नहीं ही जाती थी। 

ऐसा नहीं है कि शकुन्तला को इन सभी बातों का अंदाजा नहीं था परन्तु वे किशोरी बाबू को खुश देखना चाहती थी। वह जान बूझकर उस कमरे की तरफ नहीं जाती थी, जिधर वे नहीं जाएं, इसके लिए किशोरी बाबू तमाम बहाने बनाते थे। 

लेकिन इस घर में जब भी अवनी और सिद्धार्थ आए हैं, किशोरी बाबू को अपनी पूरी इस दिनचर्या को छोड़ना पड़ा है। और सिर्फ छोड़ना ही नहीं पड़ा है बल्कि उसके सबूत को भी मिटाना पड़ा है। छत पर पक्षी आते रहे हैं। वहां तो वे दाना देते रहे हैं। परन्तु इस कमरे में जो पूरी चित्रकारी थी उसे मिटाना पड़ा। यह बहुत अजीब लग सकता है परन्तु अब इस पूरे प्रकरण में किशोरी बाबू को इतना मजा आने लगा था कि वे चाहते ही नहीं थे कि अब कोई ऐसा इस घर में आए जिसके कारण उन्हें पूरी दिनचर्या को बदलना पड़े। उनके मन में यह बैठ गया था कि जब तक वे अपनी मर्जी की जिन्दगी हकीकत में नहीं जी सकते तो क्यों न कल्पना में ही जी लें। लेकिन उन्होंने उम्मीदों के दामन का साथ छोड़ा नहीं था। वे बार-बार शकुन्तला के कमरे में जाते उनके चेहरे को देखते और समझने की कोशिश करते कि आज उनके चेहरे की ताजगी का क्या हाल है। वे निराश होते हैं और फिर किसी न किसी टूरिस्ट प्लेस पर आकर बैठ जाते। यह एक खेल जैसा हो गया था और इस खेल को खेलते हुए किशोरी बाबू के चेहरे पर बच्चों जैसा कौतूहल आ जाता था।

ग्यारह

ऐसा नहीं है कि शकुन्तला को इसका अहसास नहीं है कि उसके कारण किशोरी बाबू फंस से गए हैं। उस दिन जब शकुन्तला अपने बिस्तर पर अधलेटी थी और किशोरी बाबू ने उनके सामने खाने की थाली रखी थी और वे पानी का गिलास लाने जा रहे थे, तब शकुन्तला ने उनका हाथ पकड़ लिया था। उन्होंने उनको अपने पास बिठाया और अपने सिर को किशोरी बाबू के कन्धे पर टिका दिया। किशोरी बाबू शांत बैठे रहे। उन्हें शकुन्तला के रोने का अहसास तब हुआ जब उनका कुर्ता भींगने लगा। 

‘तुम जल्द ही ठीक हो जाओेगी। विश्वास रखो।’ किशोरी बाबू ने आश्वासन देना चाहा।

शकुन्तला चुप रही।

‘मैं समझ सकता हूं तुम थक गई होगी और काफी ऊब भी चुकी होगी। लेकिन हम संघर्ष करने से आंख नहीं चुरा सकते हैं ना! सब जल्द ही दुरुस्त होगा।’ शकुन्तला चुप रही और रोती रही।

किशोरी बाबू ने शकुन्तला के चेहरे पर आ रहे घुंघराले बालों की एक लट को उठा कर कान के पीछे कर दिया और उसकी आंखों से गिर रही आंसुओं की धार को अपने हाथों से पोंछ दिया। किशोरी बाबू ने गौर से और बहुत नजदीक से शकुन्तला के चेहरे को देखा। चेहरे पर उदासी तो थी परन्तु अभी भी चेहरा बहुत खूबसूरत था। किशोरी बाबू को वे दिन याद आ गए जब शकुन्तला को एक झलक देखने भर के लिए कितने लोग आया करते थे। किशोरी बाबू के मन में अचानक आया कि ‘क्या शकुन्तला किसी और से ब्याही जाती तो उसकी सुंदरता की देखभाल और बेहतर होती। क्या वे शकुन्तला को खुश रखने में चूक गए हैं।’ किशोरी बाबू शकुन्तला को नजदीक से देख रहे थे तो शकुन्तला की आंखों से फिर से आंसू बह आए। 

‘मैंने तुम्हारा अच्छे से ख्याल नहीं रखा ना। मैं अच्छा आदमी नहीं हूं ना। मैं अच्छा बाप भी नहीं था क्या?’ शकुन्तला ने अपने हाथ को किशोरी बाबू के होंठों पर रख दिया। 

‘अपना चेहरा देखा है आपने, कितना कमजोर हो गया है। कितना काला हो गया है चेहरा। सारी हड्डियां निकल आयी हैं। आपको याद भी है कि आपकी अपनी भी जिन्दगी है! बूढ़ा शरीर कमजोर हो रहा है। अपना ध्यान नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा! मैं तो किसी लायक अब रही नहीं।’

किशोरी बाबू ने शकुन्तला के चेहरे को बहुत ही चुहल के साथ देखा और धीरे से कहा ‘तुम्हारे घुंघराले बाल तो अभी भी घुंघराले ही हैं।’

लेकिन शकुन्तला ने इस चुहल पर ध्यान नहीं दिया।

‘आप मेरा एक काम कर दीजिए।’ शकुन्तला ने कहा तो किशोरी बाबू एकदम से खड़े हो गए।

शकुन्तला बिस्तर से धीरे से नीचे उतरी और किशोरी बाबू का सहारा लेकर दूसरे कमरे में गई, जहां एक लकड़ी का बहुत पुराना सन्दूक पड़ा हुआ था। सन्दूक में ताला नहीं था। शकुन्तला के इशारे पर किशोरी बाबू ने उस सन्दूक को खोला और उसमें से प्लास्टिक में बहुत अच्छी तरीके से पैक किया हुआ एक बंडल निकाला और उसे सन्दूक बन्द कर उसके ऊपर रख दिया। शकुन्तला ने उस पैकेट को बहुत जतन से खोला। उसमें शकुन्तला और किशोरी बाबू की शादी के कपड़े थे। इतने पुराने! किशोरी बाबू को विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी शादी के कपड़े अभी भी रखे हुए थे। शकुन्तला ने उसमें से किशोरी बाबू का कुर्ता और एक केसरिया रंग का लम्बा सा गमछा निकाला। एक टोपी भी। किशोरी बाबू को याद है इस कुर्ते के साथ उस दिन उन्होंने इस गमछे को कन्धे पर रखा था जिससे शकुन्तला की साड़ी की गांठ बंधी थी। उन्हें वह टोपी भी याद है जिसे उन्होंने मड़वे पर मोर-मुकुट उतारने के बाद पहना था। 

शकुन्तला ने उस कपड़े को आगे बढ़ाकर किशोरी बाबू को पहनने को कहा। किशोरी बाबू ने कोई सवाल नहीं पूछा और अपने पहने हुए कुर्ते को निकाल उस कुर्ते को पहन लिया। किशोरी बाबू ने महसूस किया कि इतना पुराना होने के बावजूद उस कपड़े में कोई बदबू नहीं थी बल्कि उसमें से फिनायल की खुशबू आ रही थी। उन्होंने अपने कंधे पर उस गमछे को रखा और टोपी पहन ली। किशोरी बाबू ने महसूस किया कि इतना पुराना होने के बावजूद वह कुर्ता उन्हें आराम से आ गया। शकुन्तला ने उस पहने हुए कुर्ते पर हाथ फिराया और उनके हाथ को पकड़ कर चल दी।

शकुन्तला ने उन्हें अपने साथ फिर उसी कमरे में लाकर बिस्तर पर लिटा दिया और फिर खुद भी उनके साथ लेट गयी। शकुन्तला का सिर किशोरी बाबू की छाती पर था। लेटने पर किशोरी बाबू की टोपी उतर गयी थी। 

‘आज से चार-पांच साल पहने आप यह कुर्ता पहनते तो नहीं आता। तब आप मोटे थे। आपका पेट निकला हुआ था। आज तो यह कुर्ता भी आपको ढ़ीला हो रहा है। सोचिए तो मेरी वजह से क्या हाल हो गया है आपका!’

किशोरी बाबू सीधा लेटे हुए थे और उनकी छाती पर मुंह रखकर शकुन्तला बहुत धीमी आवाज में अपनी बातें कहे जा रही थी। 

‘आप कह रहे थे ना कि आप अच्छे पति हैं या नहीं। लेकिन आप पति बने ही कब? आप तो सब दिन मेरे चाहने वाले रहे ना।’

‘आपकी शर्ट के बटन सारे दुरुस्त हैं ना। आप यह सब काम तो मुझे दे दिया कीजिए जिसे मैं बैठे बैठे कर सकती हूं।‘

‘आपकी धड़कन इतनी तेज क्यों हो रही है।’

‘तुम बाएं सीने पर कान धर कर सुनोगी तो धड़कन तो तेज होगी ही।’ किशोरी बाबू ने धीमे से कहा तो शकुन्तला ने अपने कान को उनकी धड़कन से थोड़ा नीचे कर लिया। 

‘मुझसे छुपकर बहुत मीठा तो नहीं खाने लगे हैं ना आप।’

‘आपको कितना पसंद था न मेरे हाथ का हलुवा।’

‘मैं तंदरुस्त होउंगी तो आपके लिए हलुआ बनाऊंगी। साथ में पूरी। आपने दलपूरी भी बहुत दिनों से नहीं खाई होगी ना।’

‘तुम ठीक होगी तो हलुआ तो खाउंगा ही। पर सबसे पहले हम घूमने चलेंगे।’ किशोरी बाबू ने इस वाक्य के दूसरे वाले हिस्से को बच्चे की तरह थोड़ा तुतलाते हुए कहा। 

किशोरी बाबू को महसूस नहीं होने दिया परन्तु शकुन्तला ने अपने मुंह को धीरे से उनके सीने से हटाकर नीचे कर लिया था ताकि उनका कुर्ता भीग ना जाए। 

‘हम हरिद्वार चलेंगे। या अयोध्या। या फिर कामाख्या मंदिर।’

शकुन्तला ने अपने हाथ से अपने आंसू पोंछे। फिर हल्का सा मुस्काई। और फिर किशोरी बाबू से चुहल करते हुए कहा - ‘हरिद्वार क्यों, हम गोवा जाएंगे।’

बारह

फिर एक दिन किशोरी बाबू की जिन्दगी में वह दिन भी आया जिसकी कल्पना उन्होंने अब लगभग छोड़ ही दी थी। वह दिन बुधवार था और मौसम सुहाना था।

वह दिन बहुत खुशनुमा दिन था। किशोरी बाबू उस दिन पता नहीं कैसे देर तक सोते रह गए। उन्हें जब शकुन्तला ने जगाया तो आंख खोलते ही उन्होंने देखा कि शकुन्तला के हाथ में चाय थी। किशोरी बाबू एक बार को तो घबरा भी गए और शायद झेंप भी गए। उन्होंने झट से बिस्तर से उठ जाना भी चाहा। परन्तु शकुन्तला ने मुस्कुराते हुए चेहरे से उन्हें रोक लिया। शकुन्तला का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर किशोरी बाबू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने हाथ पकड़ कर शकुन्तला को बिस्तर पर बिठाया और चाय की ट्रे को बीच में रख लिया।

किशोरी बाबू कुछ कहते, उससे पहले ही शकुन्तला ने कह दिया ‘‘आज कुछ तबीयत ठीक लग रही है। आज सांस फूल नहीं रहा है। और चक्कर भी नहीं आ रहा।’

‘लेकिन फिर भी आराम करती।’

शकुन्तला ने हाथ के इशारे से आश्वस्त किया कि वह आज ठीक हैं। तो किशोरी बाबू ने चुप रहना ही बेहतर समझा। 

और उस दिन की जो शुरुआत चाय बनाने से हुई वहां से शकुन्तला की तबीयत धीरे-धीरे ठीक होने की तरफ ही बढ़ी। बहुत मेहनत वाला काम किशोरी बाबू ने उन्हें करने तो नहीं दिया परन्तु सुखद यह था कि चेहरे पर मुस्कान लिए शकुन्तला ने घर में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराया। वह घर जो शकुन्तला के बिस्तर पर जाने के बाद से एकदम सूना हो गया था धीरे-धीरे लगा कि उसमें रौनक लौटने लगी है। एक-दो दिन गुजरने के बाद सबसे पहले किशोरी बाबू शकुन्तला को लेकर उस बाग में लौटे। उस बाग में हरियाली लौटने लगी। पत्तों पर ओस की बूंदें गिरने लगीं। किशोरी बाबू ने फिर से फूलों से सजे उस झूले पर शकुन्तला को बैठाया। चारों तरफ फूल खिले थे। बहुत दिन हुए इन फूलों की तरफ किशोरी बाबू को देखे। किशोरी बाबू ने उनकी तरफ देखा तो फूलों ने भी मुस्कुरा कर उनका स्वागत किया। उन्होंने उन फूलों में से एक गुलाब उधार लिया और उसे अपनी शकुन्तला के बालों में खोंस दिया। वहां के सारे फूलों ने, पत्तियों ने, पक्षियों ने और बारिश की फुहारों ने शकुन्तला से शिकायत की। शकुन्तला ने उन सभी की शिकायतों को सुना और अपने आंचल में समेट उसे अपने माथे से लगा लिया। 

शकुन्तला थोड़ी-बहुत दुरुस्त हो रही थी तो किशोरी बाबू के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। चार दिन हो गए शकुन्तला की तबीयत में थोड़े सुधार हुए और इन चार दिनों में किशोरी बाबू को अपने उस कोने वाले घर में जाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। वहां के सारे नक्शे जस के तस हैं। घूमने की सारी जगहें किशोरी बाबू का इंतजार करती रहीं।

इन चार दिनों में किशोरी बाबू को एक दिन याद भी आया कि उनसे वे जगहें छूट रही हैं परन्तु उन्होंने अपने मन में सोचा ‘बस शकुन्तला यूं ही दुरुस्त होती रहे फिर तो हमें इन्हें इस नक्शे पर घूमने की जरूरत नहीं रहेगी।’ किशोरी बाबू अपने मन में सोच रहे थे कि ईश्वर ने फिर भी सुन लिया नहीं तो वे खुद भी बुढ़ापे के उस मोड़ की तरफ बढ़ रहे थे जहां उनके लिए कहीं आना-जाना धीरे-धीरे आसान नहीं रह जाएगा। उन्होंने अपने मन में सोचा कि शकुन्तला तंदरुस्त हो रही है और वह घूमने-फिरने, मस्ती करने जा सकेंगे, ऐसा सोचते ही उनके मन में अजीब सी खुशी की लहर दौड़ गयी। उन्होंने अकेले कमरे में थिरकना शुरू कर दिया।

फिर एक दिन शाम को किशोरी बाबू शकुन्तला को लेकर अपनी चिड़िया के पास गए। शाम अभी ढ़लना शुरू ही हुई थी। पक्षी अभी दाना चुग रहे थे। उन पक्षियों को दाना चुगते हुए देख कर शकुन्तला का मन अह्लादित हो गया। किशोरी बाबू ने एक बर्तन में अनाज के दाने लाकर दिए। शकुन्तला ने उन दानों को उन चिड़ियों के सामने बिखेरा और उसका मन झूमने लगा। किशोरी बाबू ने उंगली पकड़ कर शकुन्तला को उन चिड़ियों के बीच ला खड़ा किया। उन कबूतरों और गोरैयों ने शकुन्तला को घेर लिया। कबूतर और गोरैये उड़ रहे थे और फिर नीचे आकर उन्हें घेर ले रहे थे। शकुन्तला के चेहरे पर मुस्कान थी। और इस मुस्कान को देखकर किशोरी बाबू का मन झूम रहा था। किशोरी बाबू उनके करीब आए और आसमान की तरफ शकुन्तला को दिखलाते हुए कहा, ‘देख रही हो ये पक्षी कितना उन्मुक्त होकर उड़ रहे हैं, अब तुम दुरुस्त हो रही हो ना तो हम भी उड़ेगे।’ 

‘तुम्हें पता है इंडिया में ऐसे-ऐसे द्वीप हैं जहां बस इतनी ही जगह है जितने में कि यह मोहल्ला। एक बार हम अंडमान जरूर चलेंगे। तुम्हें पता है वहां के समुद्र का पानी इतना साफ है कि किनारे पर जमीन तक दिखती है।’

शकुन्तला ने किशोरी बाबू की तरफ घूर कर देखा तो ऐसा लगा जैसे किशोरी बाबू से वह पूछ रही हों कि ‘आपको कैसे पता?’

‘मैंने सब तस्वीरों में देखा है।’ उन्होंने बिना सवाल पूछे ही जवाब दे दिया।

शकुन्तला ने अपने दोनों हाथों से किशोरी बाबू के चेहरे को पकड़ कर दुलार करते हुए कहा ‘अब तो सब ठीक हो रहा है, तो जरूर चलेंगे।’ किशोरी बाबू आसमान की तरफ देखने लगे। आसमान में पक्षी उड़ रहे थे। 

तेरह

किशोरी बाबू ऊंट की सवारी कर रहे हैं और हिचकोले खा रहे हैं। ऊंट खड़ा होता है और दूर तक सिर्फ रेत ही रेत दिखती है। उसी रेत में एक बूढ़ा अलगोजा बजा रहा है। शकुन्तला दूसरे ऊंट पर बैठी है। एक छोटी बच्ची उस अलगोजे की धुन पर नाच रही है। उसी ऊंट पर से दूर कहीं समुद्र की लहरें दिखती है। किशोरी बाबू शकुन्तला को इस धुन से निकाल कर उस समुद्र की उफानों को दिखाने ले जाना चाहते हैं परन्तु शकुन्तला इस धुन में ही खोई है। फिर ऊंची-ऊंची बिल्डिंग दिखने लगती है खूब सारा शोर-शराबा है। खूब रोशनी है। वहां हाथ में हाथ डाले शकुन्तला साथ में है। बिल्डिंग बहुत ऊंची है और सबसे ऊपरी माले को शकुन्तला देखना चाहती है। वह ऊपर देखती है और आश्चर्य से उसे चक्कर आने लगता है। 

जब से शकुन्तला की तबियत थोड़ी ठीक हुई है किशोरी बाबू के सपने में रोज ऐसी ही बातें आती हैं। रोज सपने से जगते हैं और खुश होकर शकुन्तला की तरफ देखते हैं। शकुन्तला के चेहरे पर सुकून की लकीर देखकर खुशी में झूमते हुए उठ जाते हैं। 

आजकल किशोरी बाबू अपने उस नक्शे वाले कमरे में फिर से जाने लगे हैं। वहां वे बैठकर यह प्लान बना रहे होते हैं कि किस ट्रिप में कौन सा इलाका कवर हो जाएगा। अपने मोबाइल का सहारा लेकर वे अपने घूमने का रास्ता वहां बैठकर बनाते रहते हैं। 

उन्होंने एक इसके लिए एक डायरी तैयार की। उस डायरी में उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों के हिसाब से एक-एक यात्रा-मार्ग रेखांकित करना शुरू कर दिया। वे अपने मोबाइल का सहारा लेते थे। उस इलाके के रास्तों को उससे समझते थे। वहां जाने का सही मौसम और महीना निश्चित करते थे। वहां पहुंचने के आरामदेह रास्तों की पहचान करते थे। उन रास्तों में पड़ने वाली घूमने की जगहें, रुकने की जगहें, खाने-पीने की जगहें सभी को रेखांकित करके वे उस डायरी में नोट करते थे। मोबाइल और सामने जमीन पर बना हुआ नक्शा उनके इस पूरे शोध का आधार था। वे इन्हीं दोनों पर आश्रित होकर अपनी पूरी योजना तैयार कर रहे थे। 

उन्होंने सोचा केरल को दो बार में घूमा जाएगा। एक बार इस तरफ कोचिन की तरफ का रखते हैं। जिधर एलेप्पी, ऐरनाकुलम और मुन्नार घूमा जाएगा। उन्होंने मुन्नार के चाय बगानों को और वहां बनने वाली चॉकलेटों के बारे में जाना। वहां मसाला ढूंढते आए अंग्रेजों के इतिहास को भी पढ़ा। वास्को डी गामा के इतिहास को भी समझा। उन्होंने नक्शे के सहारे केरल का दूसरा ट्रिप तिरुअनंतपुरम का बनाया। उसी में उन्होंने तमिलनाडु और रामेश्वरम को भी जोड़ा।

और फिर उस रात उनके सपने में काली मिर्च खरीदते एक अंग्रेज दिखा। वह अंग्रेज दालचीनी को बहुत गौर से देख रहा था। उस अंग्रेज ने किशोरी बाबू को एक हैट गिफ्ट में दिया और कहा ‘तुमने हमारे खाने को टेस्टी बनाया हम तुमको धूप से बचायेगा।’ अभी दूसरे दृश्य में शकुन्तला उस हैट में दिख रही है समुद्र के किनारे घूमती हुई। किशोरी बाबू समुद्र किनारे सीप ढूंढ़ते हैं और फिर अपने हाथ से उसकी माला बनाते हैं और शकुन्तला को पहनाते हैं। 

किशोरी बाबू ने सोचा वे किताबों के उस खजाने को भी नहीं देख पाए जो प्राचीन भारत में विश्व की धरोहर थी। वे उस नालन्दा विश्वविद्यालय के खंडहर को बहुत करीब से देखना चाहते थे। उन्होंने अपने मन में इसका आकलन करना चाहा कि इतनी किताबें कि जलने में तीन महीने लग जाएं। तीन सौ कमरे, बड़ा सा पढ़ने का कमरा। तमाम तरह के शोध। कई तरह की औषधियों की खोज। विज्ञान, गणित, इतिहास, धर्म की शिक्षा देते हुए यह शिक्षण संस्थान अपने आप में कितना आकर्षक रहा होगा। 

और उस रात किशोरी बाबू के सपने में उस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र आए जो अपने घर से नाश्ता करके अपने माता-पिता से हाथ हिलाते हुए विदा लेकर वहां पहुंच रहे हैं। वे अपने कमरे में बैठे हैं और शिक्षक उन्हें बौद्ध धर्म के बारे में शिक्षा दे रहे हैं। उस विश्वविद्यालय के भव्य परिसर में हर तरफ सिर्फ शिक्षा और संस्कृति का माहौल है। तभी उस सपने में एक पूरी भीड़ अपने हाथ में मशाल लिए उस परिसर पर हमला करती है। वे आग लगाना चाहते हैं शिक्षा के इस भव्य परिसर को। लेकिन तभी सभी छात्र अपनी-अपनी पुस्तकों को लेकर उस भीड़ के सामने बैठ जाते हैं। छात्र अपनी पुस्तकों को उस भीड़ के सामने खोल कर रख देते हैं। और भीड़ को वापस लौट जाना पड़ता है। और इस तरह यह भव्य परिसर इतिहास में सुरक्षित बच जाता है। 

इस तरह वे रोज एक न एक टूर मैप तैयार करते और उनके सपने में वही सारी चीजें आने लगतीं। कभी वे शिमला, नैनीताल, मसूरी, रानीखेत के बारे में सोचते तो रात में उन पर बर्फ गिरने लगती। कभी वे कश्मीर के बारे में सोचते तो वे डल झील पर जमी बर्फ को हाथ से सहला रहे होते। 

लगभग दस दिन हो गए शकुन्तला को थोड़ी राहत में आए हुए। किशोरी बाबू ने सोचा कि अब वह समय आ गया है जब वह अपने सपने को जी सकेंगे। उनके इस सपने में वह अकेले नहीं उनकी शकुन्तला भी साथ है। उन्हें यह लगने लगा था कि अब वह समय आ गया है जब शकुन्तला के साथ बैठ कर कोई एक जगह तय कर लें। और फिर जाने की तैयारियां शुरू कर लें। लेकिन किशोरी बाबू की किस्मत में शायद यह नहीं लिखा था। 

चौदह

वह भी दिन बुधवार ही था। मौसम बहुत सुहाना था। मार्च का महीना। ठंड जा चुकी थी और गर्मी अभी आयी नहीं थी। सुबह बगीचे से फूल लाकर किशोरी बाबू ने शकुन्तला के सिरहाने रख दिए थे। वैसे तो आजकल प्रायः सुबह की चाय शकुन्तला ही बना रही थीं। परन्तु आज किशोरी बाबू बहुत खुश थे। आज उन्होंने सुबह उठते ही तय कर लिया था कि वे आज शकुन्तला के साथ बैठकर कुछ तय कर ही लेंगे। आज उन्होंने सुबह-सुबह अपने परिवार वाले ग्रुप में सभी को गुड मॉर्निंग भी लिखा था। उन्होंने सुबह-सुबह सभी को शकुन्तला की तबियत का अपडेट भी दिया था कि ‘मां की तबीयत में काफी सुधार है। अब वह छत पर भी जाने लगी है।’ और इस पर सिद्धार्थ का स्माइली भी आ गया था। अवनी के यहां अभी रात थी। 

सुबह नाश्ता करने के बाद किशोरी बाबू शकुन्तला को लेकर छत पर भी गए थे। धूप अभी गुनगुनी थी। बहुत देर तक बर्दाश्त करने लायक धूप रही तो नहीं परन्तु कुछ देर तक वह बहुत सुहावनी लग रही थी। शकुन्तला के चेहरे पर मुस्कान थी और अभी अभी नहा कर आयी थी तो चेहरा और खिल रहा था। किशोरी बाबू ने कहा ‘तुम्हें पता है कि तुम कितनी भोली हो। तुम्हें मैंने उस पहले दिन रोशन आरा की तरह सुंदर कहा था। लेकिन रोशन आरा तो बहुत ही सामान्य थी। यह तो मेरे मुंह से तब गलती से निकला था। तुम रोशन आरा की तरह नहीं उसकी मां मुमताज की तरह सुंदर हो।’ 

शकुन्तला ने प्यार से झिड़कते हुए कहा था, ‘अपनी उम्र का तो ख्याल कीजिए।’

‘यही तो मैं भी कह रहा हूं कि बस उम्र ही निकलती ही जा रही है इसलिए जितना जीना है, जी लें।’

‘अब मैं थकता जा रहा हूं शकुन्तला। अब नहीं जी पाया तो अब कुछ दिनों में मैं जीने लायक नहीं रह जाउंगा।’

शकुन्तला छत पर चौकी पर बैठी थी और सामने थोड़ी दूर पर चिड़िया दाना चुग रही थी। शकुन्तला ने किशोरी बाबू को अपने पास बुलाया और बैठे-बैठे अपने बांहों के घेरे में उन्हें समेट लिया और फिर कहा ‘तो फिर जीना शुरू कर दीजिए।’

यह सुनकर किशोरी बाबू का मन बाग-बाग हो गया। वे दोनों उठकर वहां से नीचे आए। किशोरी बाबू ने कहा कि तुम थोड़ा आराम कर लो, मैं थोड़ी देर में आता हूं। शकुन्तला जानती है कि वे कहां जा रहे हैं, इसलिए पूछती नहीं है। 

किशोरी बाबू उस नक्शे वाले कमरे में जाते हैं और सबसे पहले तो एक बार जोर से बिना आवाज निकाले जीत की खुशी में चिल्लाने जैसी हरकत करते हैं। फिर किनारे पर शांत खड़े होकर बहुत देर तक उस नक्शे को देखते रहते हैं। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक उड़ीसा, पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र सभी पर अपनी निगाह फिराते हैं। फिर उस डंडे को उठाकर एक-एक जगह पर रखकर अपने मन में सोचते, आ रहा हूं तुमसे मिलने। 

एकबारगी उन्हें लगा कि अरे उनसे नॉर्थ ईस्ट वाले राज्य तो छूट ही रहे हैं। उन्होंने मन में सोचा मेघालय, सिक्किम भी तो जाना है। सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह - चेरापूंजी। फिर मन में सोचा उस हरदम होने वाली बारिश में उनकी शकुन्तला कैसे जाएगी। फिर अपने मन में ही कहा, अभी तुम्हारे पास थोड़ी देरी से आउंगा। अभी शकुन्तला को थोड़ा और दुरुस्त हो लेने दो। पर आउंगा तो जरूर। 

किशोरी बाबू इन्हीं जगहों के ऊहापोह में फंसे थे कि तभी स्टील के गिलास के हाथ से छूट कर गिरने की बहुत तेज आवाज आयी। किशोरी बाबू डर गए। वे दौड़कर लॉबी में आए तो ठीक वैसे ही, जैसे कि पहले गिरी हुई मिली थी, शकुन्तला उसी के आसपास फिर से गिरी हुई थी। बेहोश। शकुन्तला शायद अपने बिस्तर से उठकर रसोई से पानी लाने गयी थी। और फिर शायद वैसे ही चक्कर आया होगा। और पहले हाथ से छूटकर गिलास गिरा होगा फिर खुद शकुन्तला। बहुत मुश्किल से किशोरी बाबू ने शकुन्तला को उठाकर बिस्तर पर लिटाया। चेहरे पर पानी मारकर होश में लाने की कोशिश की। होश में आकर शकुन्तला सिर्फ आंखे खोल पा रही थी। 

शकुन्तला को बहुत जोर की ठंड लग रही थी। पूरा शरीर कांप रहा था। किशोरी बाबू ने दो-दो कम्बल उन्हें ओढ़ा रखे थे। उन्होंने शकुंतला के पैरों के तलुवों को सूती कपड़े से रगड़ना शुरू किया। फिर हाथ की तलहट को कपड़े से रगड़ा। कम-से-कम एक-डेढ़ घंटे की मेहनत के बाद शकुन्तला नींद में गयी। किशोरी बाबू ने उनके चेहरे को देखा। उनका चेहरा एकदम जर्द पड़ गया था। चेहरे पर फिर से ढ़ेर सारी उदासी लौट आयी थी। 

शकुन्तला सो गयी तो उनके पास बैठ कर किशोरी बाबू ने मोबाइल को उठाया। उन्होंने अपने परिवार के ग्रुप को खोला और बहुत देर उसे देखते रहे। पता नहीं क्यों उनको कुछ लिखने का मन नहीं किया। उन्होंने उस शब्द ‘फैमिली टाइज’ को अपने मन में कई बार दुहराया। फिर उन्होंने एक उदासी का सिम्बल वहां भेज दिया। 


पंद्रह

अंधेरा घिर आया, शकुन्तला सोती रही। किशोरी बाबू उस अंधेरे में बस एक लॉबी की लाइट जला कर चुपचाप बैठे रहे। शकुन्तला सोती रही तो उन्होंने उठाना भी नहीं चाहा। शाम को एक बार हल्के से उन्होंने शकुन्तला को उठाया था। दवाई खिलायी और फिर उन्हें सो जाने दिया। पूरे घर में सिर्फ दो जगह बत्ती जल रही थी - एक लॉबी में और एक उस सामने वाले कमरे में जिसमें शकुन्तला सो रही थी। कमरे की रोशनी बहुत मद्धम थी। वे चुपचाप बैठे थे। खिड़की के बाहर घुप्प अंधेरा था। सामने वाला परिवार शायद आज घर पर नहीं था। नहीं तो उसके घर के सामने एक लाइट जलती है। वहां कोई रोशनी नहीं थी। किशोरी बाबू को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। कभी वे रसोई तक उठ कर जाते और लौट आते। कभी सामने वाले कमरे की तरफ जाते और शकुन्तला को देखकर लौट आते। कभी वे बाहर बरामदे की तरफ जाने लगते और फिर खिड़की के बाहर के अंधेरे को देखकर लौट आते। मोबाइल उनके पास ही रखा हुआ था परन्तु उसे देखने का मन उनका नहीं था। वे उठे और एक गंदा कपड़ा लेकर घर के खिड़की-दरवाजे को धीरे-धीरे साफ करना शुरू कर दिया। 

यह सब करते-करते जब उन्होंने दो-तीन घंटे बिता दिए तब उन्हें भूख लगी। फिर उन्हें याद आया कि उन्होंने आज खाना तो बनाया ही नहीं। वे शकुन्तला के पास गए। शकुन्तला को धीरे से हिलाया और उनसे भूख के बारे में पूछा। शकुन्तला नींद में मदहोश थी। पता नहीं कब की थकी लग रही थी। किशोरी बाबू उनके चेहरे को बहुत देर तक देखते रहे और फिर रसोई में जाकर कुछ थोड़ा-बहुत खा लिया। पानी पीकर वे सोने आ गए। सोने आए तो शकुन्तला उसी तरह मदहोश सो रही थी। किशोरी बाबू ने शकुन्तला के ललाट को चूम लिया। 

नींद के लिए बहुत जद्दोजहद की। बहुत देर तक करवट बदलते रहे। परन्तु नींद आंखों से गायब थी। चारों तरफ घनघोर सन्नाटा था। कहीं कोई आवाज नहीं थी। सन्नाटा भांय-भांय कर रहा था। बहुत देर तक वे उस सन्नाटे की आवाज को समझने की कोशिश करते रहे। फिर पता नहीं कब नींद लग गयी। 

नींद आयी तो सपना आया। सपने में वे आज समुद्र के बीच में जा रहे थे और वहां जाकर पता लगा कि समुद्र में आज तूफान आ गया है। पानी हिलोरें मार रहा था। समुद्र के तले से सारी रेत निकल कर बाहर आ रही थी और फिर उस रेत से एक बड़ा सा रेगिस्तान बन गया था। उस रेगिस्तान में ऊंट पर वे जा रहे हैं और फिर ऊंट के सामने नागफनी के ढेर सारे कांटे उग आए हैं। फिर शकुन्तला एक पहाड़ पर दिखती है। फिर वहां बर्फ गिरने लगती है। शकुन्तला बर्फ में जमने लगती है। वे शकुन्तला के हाथ को पकड़ कर पहाड़ से नीचे दौड़ने लगते हैं। नीचे बैक वॉटर है। वहां वे हाउस बोट में बैठ जाते हैं। हाउस बोट के नाविक की शक्ल बहुत डरावनी है। वह नींद में है और उसके हाथ से पतवार छूट जाता है। नाव धीरे-धीरे चलती रहती है, तभी वहां बगल की झाड़ी से सांप नाव में कूद जाता है। वे फिर शकुन्तला का हाथ पकड़ कर नाव से उतर कर उसी झाड़ी में कूद कर भागने लगते हैं। झाड़ी में बहुत देर तक दौड़ते-दौड़ते वहां अचानक से एक ऊंची बिल्डिंग आ जाती है। उस बिल्डिंग में एक अपने आप चलने वाली सीढ़ी लगी हुई है। किशोरी बाबू उसी सीढ़ी से ऊपर चले जाना चाहते हैं परन्तु शकुन्तला उस सीढ़ी पर चढ़ नहीं पाती। फिर किशोरी बाबू उन्हें लिफ्ट में ले जाते हैं। लिफ्ट बहुत ऊपर जाती है और जाती रहती है पता नहीं कहां तक। वह रुकती ही नहीं है। बहुत देर बाद लिफ्ट खुलती है तो वे दोनों फिर से पहाड़ पर आ चुके हैं। वहां फिर से बर्फ गिर रही है। लिफ्ट से निकलते ही शकुन्तला फिर से जमने लगती है। फिर बारिश, फिर बर्फ, फिर खाई, फिर पहाड़, फिर समुद्र सब एक एक करके आए जा रहा है एक दूसरे पर ओवरलैप करते हुए। एक गया नहीं कि दूसरा। दूसरा गया नहीं कि तीसरा। सब एक-दूसरे पर चढ़ा हुआ। सब गड्डमड्ड। किशोरी बाबू को लगा उनका सर फट जाएगा। वे अचानक से सपने से बाहर आ गए। उन्होंने महसूस किया पसीने से उनका पूरा शरीर भीग गया है। वे उठ कर बैठे और लगा अभी सर फट जाएगा। वे कुछ देर तक शांत बैठे रहे। फिर उन्हें शकुन्तला को देखने का होश आया। शकुन्तला अभी भी मदहोश सी पड़ी हुई थी। शकुन्तला के पास ही शकुन्तला का मोबाइल पड़ा हुआ था। उन्हें याद नहीं आया कि उनका मोबाइल कहां है। उन्हें इस समय इसका दुख भी नहीं हुआ कि उनके पास उनका मोबाइल नहीं है। उन्होंने बहुत ही अनमने मन से शकुन्तला के मोबाइल को ही उठाकर ‘फैमिली टायज’ को खोला। वहां उनके द्वारा भेजा गया ‘उदास चेहरा’ अभी भी अकेला था। 

वे उठे और अपने नक्शे वाले कमरे में चले गए। उन्होंने कमरे की बत्ती जलाई और उस नक्शे को देखकर उनका रोना छूट गया। वे चाहते तो थे कि बहुत चिल्ला कर रोएं परन्तु फिर उन्हें याद आया कि शकुन्तला सो रही है और वे उन्हें कष्ट देना नहीं चाहते थे। वे बिना मुंह से आवाज निकाले जोर-जोर से रोने लगे। उनपर पागलपन का दौरा जैसा चढ़ गया था। वे कभी कश्मीर को देखते और जमीन पर लेट कर उसे गले लगाने लगते। फिर वे वहां से रामेश्वर चले जाते तो उसे गले लगा लेते। वे कभी कच्छ चले जाते, कभी डलहौजी तो कभी कोलकाता। सभी जगहों को वे गले लगाते, उसे चूमते और आंसू बहाते। अंत में वे पहुंचे शिमला। शिमला के माल रोड की तस्वीर उन्होंने अपने मोबाइल में देखी है। उस माल रोड से पूरे शिमला का विहंगम दृश्य। शिमला की सर्द रात। उस सर्द रात में माल रोड पर एक ओवरकोट पहने किशोरी बाबू। हल्की हल्की फाहे जैसी बर्फ का गिरना। माल रोड की रोशनी, चहल-पहल। सामने घंटा घर। उस घंटा घर के बगल में खड़े होकर दिखता पूरा शिमला। रोशनी में नहाया हुआ शिमला। उन्होंने वहां पश्मीना शॉल की नर्मी को महसूस किया और वह नर्मी उनके अंदर तक फैल गयी। उनके अंदर एक भयंकर चीत्कार उठा। बिना आवाज वाला चीत्कार। ऐसा लगा जैसे उनकी नसें फट जाएंगी। ऐसा लगा जैसे उनके सिर के टुकड़े हो जाएंगे। 

वे शिमला के ऊपर जमीन पर लेट गए और जार-जार रोने लगे। और फिर रोते-रोते वहीं निढाल हो गए। 

सोलह

सुबह बहुत देर से शकुन्तला की नींद खुली। अमूमन ऐसा होता नहीं था। इसलिए जब शकुन्तला की नींद खुली और उसने बिस्तर पर से सामने खिड़की के पार देखा तो दिन चढ़ आया था। उसे आश्चर्य हुआ कि आज किशोरी बाबू ने उन्हें जगाया नहीं। उसका सर अभी भी बहुत भारी लग रहा था और उनसे उठा नहीं जा रहा था। उन्होंने किशोरी बाबू को आवाज लगायी। जितनी जोर से वे आवाज लगा सकती थीं उतनी जोर से। परन्तु उधर से कोई जवाब नहीं आया। शकुन्तला ने उठने से पहले मोबाइल को अपने हाथ में लिया और उसमें ‘फैमिली टायज’ को खोला वहां उन्हें किशोरी बाबू का भेजा हुआ उदासी वाला चेहरा मिला और फिर उसके नीचे एक-दो घंटा पहले का अवनी का भेजा हुआ एक संदेश - ‘क्या हुआ’।

शकुन्तला धीरे-धीरे किसी तरह उठकर बाहर आयी और पूरे घर में किशोरी बाबू को ढूंढ़ा। फिर उन्हें लगा शायद वे छत पर होंगे। उनसे चला नहीं जा रहा था इसलिए उन्होंने फिलहाल छत पर जाने का विचार छोड़ दिया। फिर उन्हें याद आया कि वह कमरा जिधर वे जान बूझकर नहीं जाती हैं। उस कमरे में जाने पर उन्होंने देखा किशोरी बाबू उस नक्शे पर निढाल पड़े हुए हैं। शकुन्तला ने किशोरी बाबू को औंधे से सीधा किया। उनकी सांसें बंद थी। शकुन्तला वहीं धम्म से बैठ गयी। 

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