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हिन्दी कहानी 'अज़ाब' - विजयश्री तनवीर | Vijayshree Tanveer - Hindi Story - Azab




लेखन के बहाव की लय तय कर रही होती है कि जो लिखा गया वह कहानी बना या नहीं। युवा कहानीकार विजयश्री तनवीर की कहानी ‘अज़ाब’ इस पाठक को अपने साथ बहा ले गई। ~ सं० 

अज़ाब

विजयश्री तनवीर

[एम ए-हिंदी व समाजशास्त्र ( चौ .चरण सिंह विश्वविद्यालय) / डिप्लोमा-जनसम्पर्क व पत्रकारिता (जामिया) / प्रकाशित कृतियां-तपती रेत पर (काव्य संग्रह) / अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार (कहानी संकलन) / हंस कथा सम्मान से सम्मानित।]   
 
शरबरी जिस्म भी बेचती थी तो धींगाई से। बिना रोए बिना मलाल किए। "जिस्म का क्या मलूल। मिट्टी है मिट्टी।" और उसी मिट्टी से सरेशाम मीरगंज के कूचे आबाद रहते थे।

जाने किसी की मन्नत फली थी या आह पड़ी थी कि आसमान ऐसा टूटकर बरस रहा था जैसे अबके बरसकर फिर बरसना ही न होगा। दोपहर में भी माहौल पर झुटपुटा सा तारी था। सूरज का कोई अता-पता न था। गोया रोज़ की नौकरी से बेज़ार हो बादलों की चादर ढाँप किसी कोहग़ार में सुस्ता रहा हो। शहर की आबादी से अलगाया रात-दिन कामदारों से घिरा घूरपुर का ईंट भट्ठा भी इस वक़्त सुनसान पड़ा था। ऊजड़ भट्ठे के चारदांग जहाँ तक नज़र जाती थी ईंटों की जगह अगर कुछ था तो बस अनहद मिट्टी का फैलाव। 

दो दिनों की धारासार बरसात ने भट्ठे पर फड़ों में रखी कच्ची ईंटों को मिट्टी के लोंदों में बदल दिया था। चटयल मैदान पर सूखने को दूर तक बिछी तमाम कच्ची ईंटें भी गलकर गारा हो गई थीं। 

भट्ठे के हमगोशे में लचर झुग्गियों का एक भरा पूरा कुनबा आड़ी-टेढ़ी और बेढंगी सफ़ में हैरान खड़ा था। अजहद नीची छतों वाली इन झुग्गियों की साख़्त बहुत कुछ दियासलाई की डिबियों के मानिंद थी। जिनके भीतर ईंट पथेरे, बेलदार, और मजदूरों की बसावट है। इन्हीं में से एक झुग्गी में बदनतोड़ बुख़ार से लरजती सजीली चारपाई पर तीन इकाई बनी पड़ी थी। कल आधी रात से उसका सारा बदन ऐसे जल रहा था जैसे अभी-अभी उस डाले की ओर से झुलसकर लौटी है जिधर रात दिन जलने वाली सुरंगनुमा भट्ठी की शदीद आग में उसकी पाथी हुई ईंटें पकती हैं। जब-जब सजीली उस आग को देखती है तब-तब उसे अज़ाब में मिलने वाली जहन्नुम की आग का तसव्वुर होता है और मारे ख़ौफ़ के उसका रोआँ-रोआँ सिहर उठता है। उस घड़ी उसके मुँह से ख़ुद ब ख़ुद ही एक दुआ फूट जाती है। "या अल्लाह रहम कर! मेरे गुनाह माफ़ कर। मुझे नेकी अता कर जहन्नम के अज़ाब से बचा।”

लेकिन आज सजीली किसी और ही दहशत में थी। अलसुब्बह भट्ठे मालिक ने अपने माथे पर हाथ मारकर सूखी आवाज़ में कहा था। " काहे की दिहाड़ी दूँ, ईंट कहाँ रहीं? मिट्टी है मिट्टी। मिट्टी का क्या मोल और क्या मजूरी!”

वह नन्हीं ज़ैनब को सीने से चिपटाए दीवार के सहारे धप्प से ज़मीन पर बैठ गई थी। बिना पलस्तर की खुरखुरी दीवार से उसकी नंगी पीठ खुरचती चली गई थी। एक जुमले से उस खुर्रे आदमी ने उसके जिस्म का सारा अरक निचोड़ लिया था। वह जाने और लोगों से किस किस बात पर देर तक बहसता रहा था। मगर उसने बस एक हरफ़ 'मिट्टी' सुना था। इकबार को लगा जैसे अपनी क़ब्र से उठकर शरबरी उसके कान में फुसफुसाई है। "क्यों रंज रखती है गुल्लन। सब मिट्टी है मिट्टी।”

दूसरे कान में भट्ठे मालिक के बोल लहर रहे थे। "काहे की दिहाड़ी, मिट्टी का क्या मोल!"

सजीली से ज़्यादा कौन जानता है मिट्टी का मोल और मजूरी! जबसे एक मनहूस शाम को शरबरी ने उसे अपनी छाती में भींचकर मिट्टी का मतलब समझाया था। उसे वह घमस भरी शाम किसी हादसे की तरह याद रहती है। 

अंदाज़न पंद्रह का सिन था। शदीद गर्म शाम में उसे पाँच फीट लम्बी पाँच फीट चौड़ी बोसीदा कोठरी में धकेलकर दरवाज़ा मूँद दिया गया था। कैसा तो फूहड़ सिंगार किया था और उससे भी फूहड था उसका लिबास। गहरी काट का गला और एकदम नंगी पीठ। उस पर कच्ची छातियों पर कसी हुई गद्देदार अंगिया में उलटी सीधी साँस आ रही थी। बेहिसाब गर्मी में नीची छत पर चक्कर काटता पंखा देह को पछोरने वाली लू फेंक रहा था। बदन पर लदी हुई भड़कदार इत्र की महक से उसे मिचलाहट होने लगी थी। फिर कोठरी का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला और एक अजनबी अंदर घुस आया। उसका पहला ख़रीदार उससे तिगुनी उम्र का थुलथुल और नदीदा आदमी था। उस पहले के बाद हर रात दूसरा, बीसवाँ, पचासवाँ, सौंवा जाने और कितने! मगर उसे पहला याद है। उसके मुँह से कच्ची शराब की बू उड़ रही थी और बदन से पसीने की ऐसी बास फूट रही थी जैसे वह मुर्गियों के दड़बे से उठकर आया हो। वह मिट्टी के तूदे की तरह उसके ऊपर गिर पड़ा था। उसने उसके बदन पर चढ़े तमाम कपड़े नोच दिए। बाद में उसे महसूस हुआ कि ज़रूर वह मुर्गियों और बकरों को तड़पा-तड़पाकर ज़बह करने वाला कसाई रहा होगा। वह बड़ी बेरहमी से बजबजाती हुई अपनी सारी गिलाज़त को उसके भीतर उतार गया। बाद उस रात के उसे लगा था उसका जिस्म गन्दे ख़ून और मवाद की गिलाज़त से भरा एक फोड़ा है। काश! कोई किसी नुकीले ख़ंजर से उस फोड़े में चीरा लगा दे और उसके अंदर की सारी गिलाज़त बह जाए। वह गला फाड़कर कितने घण्टे लगातार रोई थी। अपनी देह की बेहाली के दुःख से भी बड़ा था अल्लाह के अज़ाब और क़हर का ख़ौफ़। जहन्नम में काँटेदार थूहड़ खिलाए जाने का डर। संडासी से उसके गलफड़ों को फाड़ दिए जाने का डर। ऊँट खच्चरों जितने बड़े साँप बिच्छुओं के डंक मारने का डर। इस ज़िना के अज़ाब में अब जहन्नम की सियाह आग में झुलसकर उसकी सारी खाल बदन से जुदा होकर गिर पड़ेगी। सोचकर ही दहशत से उसका मुँह ज़र्द पड़ गया था। वह रो रोकर आसमान की तरफ़ हाथ और मुँह उठाए उस गुनाह की माफ़ी माँगती रही जो उसने नहीं किया था। " मेरे अल्लाह मुझे बख़्श दे! मैं अज़ाब में पड़ गई... इस गलीज़ बदन के साथ कैसे जिऊंगी।”

उस रुलाई से शरबरी दहल गई थी। उसे अपनी छाती में भींचकर वह फूट पड़ी थी। "तुझे क्यों अज़ाब मिले, उस निट्ठुर अल्लाह को क्यों न मिले... जिसने बेक़सूर ही हमें इस दोज़ख में फेंक दिया। तेरे उस अल्लाह की भी किसी को जवाबदारी है कि नहीं?"

लेकिन उस बेपायां रात को उसकी आँखें बरसाती नाबदार हो गई थीं। सो बरसती ही रहीं। तब शरबरी उसे झिंझोड़कर चिल्ला पड़ी थी। 

“तू रंडी है। याद रख तेरी आँख के आँसुओं से ज़्यादा यहाँ तेरी आँख में पड़े काजल का मोल है। किस बात का सोग मना रही गुल्लन? रूह पाक रहे। जिसम का क्या मलूल, मिट्टी है मिट्टी।”

फिर शुदा-शुदा जाने कैसे ख़ुद ब ख़ुद ही उसकी आँखों का पानी सूखता गया और उसने मिट्टी को बस मिट्टी ही समझा। बिला उज़्र अपनी मिट्टी को बेहयाई से हर रात ख़रीदारों के तले बिछा दिया। रोज़ सवेरे उस रौंदी हुई मिट्टी को समेट लिया और समेटी हुई मिट्टी से अगली बेहया रात के लिए अपना एक नवेला बुत गढ़ लिया। 

मगर मीरगंज के कोठे पर मिट्टी का इतना मातम न होता था जितना इस घड़ी ईंटों के मिट्टी हो जाने से उसे और बाक़ी कामदारों को हो रहा था। झुग्गियों की सफ़ में एकदम से कोहराम मच गया था। भट्ठा मालिक अपने जानिब निपटारा करके चलता बना था। 

“मैं कहाँ तक नुक़सान उठाऊँगा? अब भादों बाद ही कुछ काम होगा। रह सको रहो, न तो और कोई हिल्ला देखो।”

दिहाड़ी गई सो गई लेकिन अचानक बेरोज़गार हुए मजदूर रोज़ी की फ़िक़्र में बुरी-बुरी बकने लगे थे। 

"इस स्साले हरामखोर की भली चलाई। हलक में हाथ डालकर दिहाड़ी खींच लेंगे। ईंट मिट्टी हुईं तो हमारा क्या क़सूर, मौसम की मार हम मजूर क्यों भुगतें? बिना काम बीस दिन कैसे कटेंगे? रात बारह से नौ तक बैल की तरह जुते रए... ढलाई पथाई सीखी। इसके कहे अब दूसरे हिल्ले लग जाएं?" 

ख़ूब हैस-बैस के बाद दोपहर तक आधी से ज़्यादा झुग्गियाँ वीरान हो चली थीं। 

आसमान इकसार बरस रहा था। बीच-बीच में हवा की झोंक के साथ बारिश की कोई खूँखार बौछार आती तो अलकतरे से रंगी टीन की इकहरी किवाड़े ज़ोरों से भड़भड़ा जातीं। भड़भड़ाती किवाड़ों के पीछे सजीली का सूखा दुबलाया जिस्म किसी अंदेशे में भुरभुरे पत्ते की तरह सिहर उठता। बुख़ार की तमल्मुली में वह बार-बार उठकर बैठ जाती। । उसकी शहरग तेज़ी से फड़कने लगती। आज बरसते पानी में ऐसी धार थी मानों छत के कई फाड़ कर देगी। 

चारपाई के नज़दीक ही साल भर की ज़ैनब पुरानी ओढ़नी से बनी झुलनी में पड़ी थी। झुलनी की डोरी सजीली की उंगलियों में फंसी थी। आधी नींद आधी जाग में वह हर दो चार मिनट पर उसे हिलाए जा रही थी। झुलनी हिलती तो कुनमुनाती ज़ैनब चुप हो जाती। सजीली को लगता है शरबरी की रूह हर वक़्त उसके आस पास डोलती है। उसके भीतर से जन्मा लिजलिजे गोश्त का लोथड़ा एक बरस से उसने अपने कलेजे से लगा रखा है। जैसे उसके सीने पर शरबरी का क़र्ज़ रखा है। शरबरी ने भी तो उसे बच्चे की तरह पाँच बरस अपने कलेजे से लगाए रखा था। मरते दम वह पेट से घुटने सटाए सिकुड़ी चमड़ी वाली ननकी ज़ैनब को उसकी हिफ़ाज़त में दे गई थी। 

“गुल्लन अपने अल्लाह से दुआ करना इसे हयात मिले। इज़्ज़त की रोटी नसीब हो। कैसे भी हो इसे तालीम देना। कुछ कमा खाएगी। एक कसबी तो बस जनमती और मरती है, जीती थोड़े ही है!”

सजीली ने मिचमिची आँखों से झुलनी में पड़ी शहद की चुसनी चूसती ज़ैनब को देखा। बादाम की गिरी जैसी आँख, सुंतवा नाक, गोरा भभूका रंग। पूरी की पूरी शरबरी। शरबरी का ख़्याल आते ही वह और भी मुस्तैदी से झुलनी की डोर हिलाने लगी थी। उसे महसूस हो रहा था शरबरी उसके सिरहाने बैठी उसका सिर थपक रही है। धीरे-धीरे उसकी बुख़ार से लस्त आँखें वजनी होती गईं। 

कच्ची नींद के अल्ल बल्ल ख़्वाबों में उसे अमीनाबाद के ज़ायकेदार महक भरे ललचाऊ कूचे दिखाई पड़ते हैं। नींद में भी पेट में भूख का बगूला सा उठने लगता है। दसेक साल का सिन है। वह अब्बू की साइकिल के डंडे पर बैठी है। वे दुकान से लौट रहे हैं। जिस दुकान में चिकन की नाज़ुक कशीदाकारी से सजे कपड़ों के थान के थान रखे हैं। यह उसके अब्बू की दुकान है। वे कारीगरों को समझा रहे हैं " फ़लाँ कपड़े पर जाली फ़लाँ पर मुर्री, फ़लाँ पर टेपची डालनी है और सफ़ेद मलमल पर ज़ंजीरा। " अब्बू ने गल्ले से निकालकर पैसे अपनी कोथली में भर लिए हैं। अब वह किसी शहंशाह की शहज़ादी है। एक हुक़्म पर सब हाज़िर। सड़कों पर मेले जैसी भीड़ है। वह डंडे पर बैठी ख़ामख़ा ही घण्टी टिनटिनाए जा रही है। अब्बू मुस्करा रहे हैं। " हमारी गुल्लन लाड़ो क्या खाएगी... टुंडे क़बाब... कि नल्ली नहारी?" 

"वाहिद की बिरयानी अब्बू। " वह तपाक से बोली थी। 

खाने की लज़्ज़त सचमुच ही उसके तालू पर घुलने लगी थी। उसे याद पड़ा वह कल शाम से भूखी है। खाली पेट की गुर्राहट से उसकी नींद टूट गई। 

बुख़ार ज़ोर पकड़ रहा था। अजीब आलम था। थूक सटकते गला ऐसे कसक रहा था जैसे गले में खारदार झाड़ उग आए हों। उसकी कमज़ोर याद में मीरगंज कोठे की एक मरियल सी लड़की उभर आई। वह अक्सरहां रातों को नींद में अपना गला थामकर गें sss गें sss कर घिघियाती थी। मगर उसकी आवाज़ उसके हलक में ही दबती जाती थी। तब किसी ने कहा था काबूस रोग ने पकड़ा है। उसे नींद में लगता है कि जिन्नातों ने उसकी छाती पर चढ़कर उसका गला भींच रखा है। इस वक़्त उसे ठीक वही कैफ़ियत हो रही थी। डॉक्टर के पास जाए बिना शायद निजात नहीं मिलेगी। उसने अधबैठी होकर ढुलमुल छातियों के बीच फंसा बटुआ निकाला। कुल जमा एक सौ साठ रुपए। इनमें से सौ रुपए डॉक्टर की हथेली पर रखने की दिलेरी कहाँ से लाए! रात दिन लगकर तीन हज़ार ईंट पाथी थीं। हज़ार ईंट पर पाँच सौ के हिसाब से डेढ़ हज़ार हाथ में आते मगर भट्ठे मालिक की संगदिली देखो। सारा रुपया डकार गया। काम बन्द हुआ सो अलग। यह भी कोई धंधा है जो मौसम का मोहताज रहे। कोठे पर थी तो सर्दी, गर्मी बरसात बटुआ भरा रहता था। ज़िंदगी ज़लील थी मगर सहल थी दोनों जून सालन रोटी। कभी मीठे को मन मचल जाए तो शीर खुर्मा। अभी भूख से उसकी आंते कुड़कुडा रही थीं। वह सीली हुई दीवार का सहारा लेकर पानी घूँटने लगी। पानी का स्वाद भी अजीब बकबका सा था या फिर मालूम नहीं अचानक उसकी ज़बान ने स्वाद पकड़ने का हुनर खो दिया है कि अब बस तसव्वुर में ही उसे चीज़ों का स्वाद आता है। बुख़ार की थकावट में वह बारिश में तर हुई कच्ची ईंट सी चारपाई पर ढह गई। माहौल में घनी बियाबानी थी। ऐसे में ख़ैर ख़बर लेने को भी कौन आता जो उससे कहकर दवाखाने से बुख़ार की कोई पुड़िया-गोली ही मंगवा लेती। ख़ुद भी जाए तो कहाँ जाए। भट्ठे के दो मील इधर और दो मील उधर तक कोई दवाखाना तो क्या नून हल्दी का दुकानचा भी नहीं। इतवार के रोज़ सब औरतें ईंटों के ट्रक में लदकर हफ़्ते भर की साग सब्ज़ी और ज़रूरियात का सामान ले आतीं। भट्ठे की तरह कोठे पर उसे हारी बीमारी की फ़िक़्र नहीं रहती थी। कोठेवालियां कितनी भी बेग़ैरत थीं मगर एक दूसरे के दुःख दर्द में शिरक़त करती थीं। उसकी थकी हुई आँखों में उसके बदन की खुरचनों को सहलाती हुई शरबरी फिर मुस्कराने लगी। एक दफ़ा उसे चिरकारी बुख़ार ने धर लिया था। शरबरी हर दूसरे रोज़ बिना नागा उसे डॉक्टर को दिखाने ले जाती थी। हफ़्तों तक पाबंदी से तीन ख़ुराक देती थी। धौंस से दलिया खिचड़ी, फल फ्रूट खिलाती थी और अपने रोज़ के बंधे हुए ग्राहक छोड़कर उसके कमज़ोर होते हाथ पैर मलती थी। 

उसे याद है उन दिनों मौसम पर गुलाबी जाड़ा चढ़ने लगा था। मग़रिब का समय था। वह बुख़ार से बेतरह तप रही थी। ठीक ऐसे जैसे यहाँ भट्ठी में पड़ी ईंट तपती है। शरबरी उसके माथे का ताप देखकर हौल गई थी। ठंडे पानी की पट्टी से भी बुख़ार क़ाबू न हुआ तो वह उसे अपनी पीठ पर लादकर डॉक्टर के पास ले जाने लगी। आते-जाते सारे रिक्शों पर सवारियां बैठी थीं। एक रिक्शेवाला सड़क किनारे खड़ा हथेली पर सुर्ती और चूना रगड़ रहा था। शरबरी ने उसे गोद में लिए हड़बड़ी में बिना कुछ पूछे ही रिक्शे पर सवार हो गई। " डॉक्टर सलाउद्दीन के दवाखाने ले चलो।”

“ख़ाली नई है। " रिक्शेवाला रुखाई से बोला। 

शरबरी ने उसकी रुखाई को बिल्कुल तवज्जो न दी थी। 

"ख़ाली तो है भले आदमी... बच्ची बीमार है। पाँच मिनट का रास्ता है। सर्राफ़ा बाज़ार से ज़रा आगे जाना है बस।”

"कहा न ख़ाली नई है... सवारी पकड़ रखी है। उतर जाओ। " रिक्शेवाले ने लापरवाही से कहा। 

शरबरी ने सजीली का जलता हुआ माथा छुआ। उसके भीतर की हड़बड़ी और गहरी हो गई। " अच्छा दस की जगह बीस दूँगी। अब जल्दी चलो।”

"जा न और कोई देख... अल्लाह वाला हूँ किसी रंडी की हराम कमाई नहीं खाता मैं। " रिक्शेवाले की आवाज़ में तल्खी और नफ़रत भरी थी।”

अचानक जैसे शरबरी के अंदर किसी शेरनी की रूह घुस गई। उसने भरे बाज़ार अपने पंजे से रिक्शेवाले का गरेबान थाम लिया। "नीच! भड़ुए! क्या बोला? हराम की कमाई! मुझसे ज़्यादा हलाल की क्या खाएगा तू?"

रिक्शेवाला शरबरी की गुस्सैल पकड़ में छटपटाने लगा था। शरबरी उसका गरेबान थामे बोले जा रही थी। 

“पता भी है कैसे कमाती हैं रंडियां! मरभुक्खे गिद्धों के पंजों से अपने लिए रोज़ का निवाला छीनती हैं। अपने रिक्शे में बिठाकर रोज़ कितने नदीदों को हम रंडियों के दरवाज़े छोड़ता हैं तू। ख़ूब चैन से यहाँ खड़ा उन हरामज़ादों की कमाई की खैनी रगड़ता है। वो हलाल है तुझे?”

एक पल को रिक्शेवाला भौंचक रह गया। उसे शरबरी से ऐसे गदर की उम्मीद नहीं थी। शरबरी गला फाड़कर डकराती रही। 

"जिसम भले बेचती हूँ पर ज़मीर बचा रक्खा है।... हराम और हलाल की बड़ी फ़िक़र है मरदूद, एक मासूम जान की नहीं!"

शरबरी के चिल्लाने से आते-जाते लोग एक जगह जुट गए थे। बलवे से घबराया रिक्शेवाला तेज़-तेज़ रिक्शा खींचता कहीं ग़ायब हो गया था। उसके बाद शरबरी अपनी पीठ पर लादे हुए ही हाँफती कलपती उसे डॉक्टर सलाउद्दीन के दवाख़ाने ले गई थी। 

शरबरी जिस्म भी बेचती थी तो धींगाई से। बिना रोए बिना मलाल किए। "जिस्म का क्या मलूल। मिट्टी है मिट्टी। " और उसी मिट्टी से सरेशाम मीरगंज के कूचे आबाद रहते थे। 

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उसे क़तई याद नहीं वह अमीनाबाद से मीरगंज कैसे पहुँची थी। यादों की तख़्ती पर जैसे किसी ने गीला कपड़ा फेर दिया है। सब मिटा-मिटा सा है। बस इतना याद पड़ता है कि रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रात थी। यानी शबे क़दर की रात। जहन्नम से आज़ादी की रात। और इसी रात की सुबह वह जहन्नुम में पड़ी थी। गली-गली सिवइयों और मेवों के बाज़ार सजे हुए थे। चूड़ी, बूंदों, मेहंदी और रुपहले चुटिल्लों के ठेले गाड़ों पर औरतें और लड़कियां टूट पड़ी थीं। मस्जिदों में इबादत करने वालों का जमावड़ा था और मस्जिदों के बाहर जकात सदके लेने वाले मंगतों फ़क़ीरों की लम्बी क़तारें। ताक़ रातों में अब्बू दीनी लोगों के साथ रात के पिछले पहर तक मस्जिद में ठहरा करते थे। घर की देखभाल को एक बेवा फूफी गाँव से आई हुई थीं। ख़ास तौर पर अम्मी की देखभाल को। लड़का पैदा किए छह महीने हो गए थे लेकिन अम्मी जच्चा बनी पड़ी थीं कि पहला जाड़ा जच्चा बच्चे पर भारी होता है। वो उन दिनों हर वक़्त अकड़ी रहती थीं जैसे तीन लड़कियों बाद उन्होंने अपनी नस्ल से जुदा कोई अज़ीम जीव जन दिया है। वह अज़ीम जीव हर वक़्त बंदरिया के बच्चे की तरह अम्मी से चिपटा रहता। दो मिनट गोद से बिस्तर पर रखो तो उसका रोना शुरू हो जाता। उसे गोद की बुरी लत पड़ गई थी। वह था भी चिरक ढाँस। कुछ न कुछ लगा ही रहता। कभी नाक चल जाती कभी छाती पर बलग़म। कभी उल्टी दस्त। उसके फेर में लड़कियों की तरफ़ अम्मी का ग़ौर नहीं रहा था। मगर अब्बू तीनों बेटियों को ख़ूब लाड़ करते। उसे याद है उस रात अब्बू उसके लिए सजाफ़ वाला फ़ीरोज़ी दुपट्टा लाए थे। वह इतनी ख़ुश थी कि खेलते-खेलते दुपट्टे को ओढ़े ही सो गई थी। आधी रात अम्मी के अलकलड़ैते का रोना शुरू हो गया तो अम्मी ने उसे झिंझोड़कर जगा दिया। "गुल्लन ज़रा देर भैया को सम्भाल शीशी में दूध बना लाऊँ। " वह पलंग से पीठ टिकाए आँखें मींचे ही आदतन उसे गोद में लिटाकर टांग हिलाने लगी। "आsssss आssss निन्नी आssss भैया को निन्नी आ। " अचानक उसे अपनी गोद में गरम गीलापन महसूस हुआ। एक झटके से उसकी आँख खुल गई थीं। अल्लाह उसका फ़ीरोज़ी दुपट्टा!

“हट्ट मुतोड़े। " मारे गुस्से के उसने उस नन्ही जान को बिस्तर पर पटक दिया। फिर तो उस पर अम्मी का क़हर टूट पड़ा। अपने लाल को लगी ठेस का अंदाज़ा कर मालूम नहीं अम्मी ने तड़ातड़ कितने झापड़ और धौल बजाए थे। उसके नाज़ुक गाल सुर्ख़ और कमर नीली पड़ गई थी। वह अब्बू के इंतज़ार में सुबकती हुई ड्योढ़ी पर ही ऊँघने लगी थी। 

वह शायद बहुत गाढ़ी नींद सोई थी। पता नहीं तसलसुल कितने घण्टे! उसे लगा था वह रेल में है मगर आँखे खुलने को न हुई थीं। जब आँख खुलीं तो सूरज आसमान में ऊँचा चढ़ आया था। शायद दिन के दस ग्यारह बजे होंगे। वह रिक्शे में दुपल्ली टोपी लगाए एक अधपकी दाढ़ी वाले की गोद में थी। उसके होंठ एकदम सियाह थे और आँखों पर मोटी सी ऐनक चढ़ी थी। बेगाने नावाक़िफ़ रास्तों से गुज़रते हुए रिक्शा हड़बड़ी में उछलता हुआ दौड़ रहा था। वह बार-बार रिक्शे की चिकनी सीट से उखड़ जाती। अपनी शशदर आँखों से एक एक चीज़ को वह यूँ देख रही थी जैसे अब भी रात की उसी कम्बख़्त नींद में है। एक जगह ज़ेवरातों का बाज़ार था। घनी दुकानों के बीच तंग तवील घबराई सी गलियाँ। बिजली के खम्भों पर तारों का मकड़जाल। उन जालों में फंसी हुई कटी पतंगे और पॉलीथिन की थैलियां। जगह जगह पर कचरे के घूरे थे जिन पर मुर्ग़े कुड़कुडा रहे थे। वह ज़रा बहुत पढ़ना जानती थी। एक दुकान के नीचे मीरगंज इलाहाबाद लिखा था। अमीनाबाद के सिवा दुनिया में और कोई जगह भी है! अल्लाह! मालूम नहीं वह अमीनाबाद से कितनी दूर है! अब्बू उसे कहाँ-कहाँ ढूँढते फिर रहे होंगे। वह हड़हड़ाकर रो पड़ी थी। "हमें अब्बू के पास जाना है।”

दाढ़ीवाले का सपाट सख़्त चेहरा थोड़ा सा नरम हुआ। " रो मत। सब्र रख। ले चलेंगे तेरे तुझे अब्बू के पास।”

“कितनी देर में?" 

"अगर चुप रहेगी तो दो चार दिन में।”

"दो कि चार?”

"चोप्प। भेजा मत खा। अपना मुँह बन्द रख।”

उसकी आवाज़ में कुछ ऐसी सनसनाहट थी कि उसके हाड़ तक सिहर उठे। वह अपने रोने को हलक में दबाए-दबाए सुबकती रही। तनिक आगे बीच बाज़ार में ही लोहे के घिरे-घिरे से छज्जों पर छोटे छोटे आइनों में झाँककर सँवरती हुई पीलिहाई औरतें नीचे आते-जाते लोगों को इशारों से बुला रही थीं। 

उफ़्फ़ कितनी घुटी-घुटी सी गलियाँ थी। गलियों के भीतर और घुटनभरी गलियां। वहीं कहीं वे रिक्शे से उतर गए थे। हरे रंग में लिपटी एक भद्दी और डरावनी सी इमारत थी। उसके ज़ेहन में अब भी उस इमारत का नक़्श ताज़ा है। लकड़ी का अधखुला दुपल्ला दरवाज़ा था। पतले गलियारे के दोनों तरफ़ छोटे कमरे। फिर एक ठीक ठाक बड़ा दालान। दालान में तख़्त पर दरी बिछी थी। गाव तकियों से टिकी बैठी एक गिराँडील औरत सरौते से छालियाँ कतर रही थी। उसकी आवाज़ उसके ढाँचे से मेल नहीं खाती थी। उस भरी-भरी सी औरत ने उसके गाल छूकर पूछा--" नाम क्या है तेरा?"

उस बेजा छुअन से सहमकर उसने कहा था--"गुल्लन। " फिर वह उसके हाथों की ज़द से कुछ परे हटकर बोली। "गुलनाज़ बानो।”

औरत बिना बात हंसने लगी थी। हंसते समय उसकी पूरी देह हिचकोले खा रही थी ख़ासकर चर्बीदार थुलथुला पेट। 

"इस नाम को बिल्कुल ई भूल जा। अब से कोई पूछे तो कहेगी तेरा नाम सजीली है। समझ गई ना?"

वह बिल्कुल नहीं समझी थी। उसका नाम सजीली क्यों होने लगा। उसका नाम तो गुलनाज़ है। वह अपनी गरदन घुमाकर इधर-उधर देखने लगी। दालान के चारों तरफ़ दुमहले की छज्जेदार खोर में इधर उधर टहलती लड़कियां झुककर उसे झाँक रही थीं। उनमें से कुछेक नीचे उतर आईं। उसके गिर्द लड़कियों का एक घेरा सा बन गया था। लड़कियों से मुख़ातिब भारी औरत की हल्की आवाज़ दालान में बिखर गई थी। 

"अभी कच्ची है। गोश्त ग़िज़ा खाएगी तो दो साल पीछे पक जाएगी... जब तलक तुममें से किसी की निगरानी में रहेगी।"

लड़कियां चुप रहीं। बारीक़ आवाज़ कुछ कड़क हो गई। 

"सुना कि नहीं?" 

लड़कियों ने मरे मन से हुंकार भरी। "जी खाला।”

"तो बताओ कौन लेगा ज़िम्मा? रोज़ का सौ रुपया बेसी दूँगी। खाना कपड़ा मेरा।" मोटी औरत अपनी पैनी आँखों से एक-एक चेहरे को बेधती हुई बोली। लड़कियों के हजूम में से आगे होकर बीसेक साल की एक गदबदी, भूरी भक्क लड़की ने उसके उलझे बालों को सहलाकर उसकी कलाई थाम ली थी। उसकी आँखों में लाड़ की लहर थी। 

"इसका ज़िम्मा मैं लेती हूँ खाला।" 

लड़की उसे लेकर सँकरा अंधेरा ज़ीना चढ़ने लगी। लम्बी खोर में कई सारी तंग कोठरियां थीं। गलियों में गलियों की तरह कोठरियों के अंदरून भी कोठरियां। सीलन भरी, बदशक़्ल, और बोसीदा। वहाँ न बादगीरें थीं न रौशनदान। माहौल में हवा और रौशनी की गुज़र न थी। उसकी सांस बोझिल होने लगी थी। हमदर्दी पाकर उसने लड़की की कुरती की खूँट पकड़ ली और ज़ार ज़ार रोने लगी। "हमें हमारे घर अमीनाबाद भेजवा दो।"

लड़की उसके हाथ थामकर उसके नज़दीक उकड़ू बैठ गई। वह उसकी कातर गुहार सुनकर उदास आवाज़ में बोली। 

"यहाँ से कोई रास्ता तेरे घर को नहीं जाता।”

"कैसे नहीं जाता... फिर क्या हम यहाँ उड़कर आ गए?" वह और ज़ोर से रोने लगी थी। 

“कुछ दिनों बाद सब समझ जाएगी। यहाँ बस आने का रास्ता है जाने का नहीं। " कहते हुए लड़की का चेहरा अजीब हो गया था। सजीली उसे बेयक़ीनी से देखने लगी थी। 

“भेजवा दो ना। हमारे अब्बू की ओढ़नियों की दुकान है। हम आपको बजंकली की ओढ़नी दिलवाएंगे। " लड़की ने अपनी हथेलियों से आँसू पौंछकर लाड़ से उसकी चिबुक उठाई। 

"यहाँ ओढ़नी ओढ़ने का कोई काम नहीं है। अच्छा बता तुझे भूख लगी है?"

"नहीं " उसने कहा। 

"चल कुछ खा ले। कितनी देर से भूखी होगी। " वह कुछ यादकर बोली। "तेरा नाम गुल्लन है न?”

"गुलनाज़ बानो। बस अब्बू-अम्मी गुल्लन बुलाते हैं।" वह खुलने लगी थी। 

"मैं तेरी अप्पी हूँ। तुझे गुल्लन बुलाऊँगी।”

सुनकर उसे अच्छा लगा था। कि वह उसे नए नाम से नहीं बुलाएगी। "और तुम्हारा क्या नाम है?" 

"शरबरी। तू शब्बो अप्पी कहना।”

उसने हाँ में सिर हिलाया। 

"बोलकर बता।”

"शब्बो अप्पी।”

"फिर बोल।”

"शब्बो अप्पी। " उसने दोहराया। 

लड़की के भीतर जाने क्या उमड़ रहा था वह उसे बेसाख़्ता अपने गले लगाकर रो पड़ी थी। 

"हाँ मेरी लाड़ो बोल... बोल। फिर बोल। मैं तेरी शब्बो अप्पी हूँ।”

उस दिन से वह आठों पहर शरबरी के संग लगी रहती थी। खाना, नहाना, सोना, जागना सब संग-संग। शरबरी उसके लंबे बाल सँवारती और थू-थू कर बलाएँ लेती। जब पहली बार महीना हुआ तो शरबरी ने कपड़ा धरना सिखाया। उसे शरबरी किसी परी के मिसल लगती थी। क़ुदस सीरत वाली आसमानी परी। इस बदतर जगह पर एक फ़िरिस्तादा जो बस उसकी हिफ़ाज़त के लिए आई है। वह सोचती थी वह बड़ी होकर शरबरी जैसी बनेगी। मुक़द्दस और मददगार। लेकिन एक रात दिलोदिमाग़ में शब्बो अप्पी के लिए पाले नेक भरम उबकाइयाँ लेने लगे। 

उस रात पेड़ू में दर्द की बेचैनी से नींद खुल गई थी। माहवारी का दूसरा दिन था। ऐंठन से अंतड़ियां कटी जा रही थीं। जांघों के पिछले और निचले हिस्से में जैसे रोड़ियाँ भर गई थीं। वह बूढ़ी गेंदा अम्मा की कोठरी में पेट में गोड़ घुसाए पड़ी थी। दिन भर तो शरबरी साए की तरह उसे साथ रखती मगर रात होते खाना खिलाकर गेंदा चाची की कोठरी में सुला जाती थी। शरबरी की बात उसे अल्लाह मियाँ का फ़रमान थीं। सो मन में किसी तरह के सवाल की गुंजाइश ही न थी। सोते-सोते जाग पड़ी तो उसे सीधी शब्बो अप्पी याद आई। वह कोठरी की तरफ़ चल दी। कोठरी की सिटकनी भीतर से बंद थी। वह दरवाज़ा खड़काने लगी। 

"अप्पी दरवाज़ा खोलो। पेट में दरद है।”

अंदर से शरबरी की हाँफती हुई आवाज़ आई। "गेंदा अम्मा से कहकर गरम पानी की बोतल रखवा ले।”

वह हैरान हो गई थी। शब्बो अप्पी उसके दर्द की बात सुनकर भी दरवाज़ा मूँदे पड़ी है। उसने दरवाज़े की दरार से आँख सटाकर देखा तो जैसे एक ज़लज़ला आ गया। 

शरबरी एक लंबे चौड़े से आदमी की तरफ़ मुँह किये करवट लेकर लेटी थी। सरापा नंगी। उसके बदन पर एक कत्तर भी नहीं थी। वह सन्न रह गई थी। उसकी आसमानी परी शब्बो अप्पी बरहना बदन इस आदमी के साथ क्या कर रही है! दरवाज़े की दरार से उसके चेहरे की एक फांक दिखाई पड़ रही थी। उस पर एकदम बेहयाई सवार थी। उसके बदन से अंगुल भर की दूरी पर साथ में पड़ा आदमी हाँफते हुए अपना इज़ार बांध रहा था। फिर शरबरी भी धीरे से कुछ बोलते हुए सिरहाने पड़े अपने कपड़े पहनने लगी। दरवाज़े से एक आँख सटाए वह अंदर की एक-एक हरक़त देख रही थी। वह अपनी आँखों को देखने और कानों को सुनने से रोक लेना चाहती थी। जब उस आदमी ने कुछ रुपए बड़े भोंडेपन से शरबरी के गिरेबान में ठूँस दिए। वह चुपचाप गेंदा अम्मा की कोठरी में जाकर लेट गई। आँख मूँदती तो सामने सरापा नंगी शब्बो अप्पी ठिठियाने लगती। सारी रात बेदारी में कटी। सुबह शरबरी आई तो वह एकदम से फट पड़ी। 

“अप्पी रात कोठरी में आपके संग कौन आदमी था?"

“मुझे क्या मालूम कौन था। नाम पता थोड़े ही पूछा था। " नंगा सवाल सुनकर भी शरबरी सहज रही। 

"पराए मर्द के आगे बदन उघाड़े ज़िना होता है?”

"होता होगा। तेरा अल्लाह बिगड़ेगा तो तिरवेनी नहा लूँगी। यहाँ दुनिया भर के पाप कटते हैं। मेरे भी कट जाएंगे। " शरबरी ने शरारत से उसके गाल पर चिकोटी भरी तो वह बिदक गई। 

"लड़कियों को परदे में रहना चाहिए। पता भी है कितनी मुद्दत जहन्नम में भटकती फिरोगी! कितने अज़ाब झेलोगी!”

“सयानी लाड़ो तुझे यह सब किसने कहा?" शरबरी मुस्कराने लगी। 

"मौलाना साहब ने।”

"तेरे मौलाना ने देखा है जहन्नम?" अबकी उसकी मुस्कराहट मद्धम हंसी में बदल गई थी। 

“उन्होंने अल्लाह की किताब में पढ़ा। जहन्नम की सत्तर हज़ार वादियां हैं। एक-एक वादी में सत्तर हज़ार खाइयाँ। हर खाई में सत्तर हज़ार बिल हैं और हर बिल में कितने-कितने साँप हैं। वो तुम्हारे जिस्म को खाएंगे।”

उसकी बात सुनकर शरबरी पहले तो ढिठाई से हंसती रही। फिर उसके चेहरे पर अंधेरा घिर गया। 

"तू बड़ी पागल है गुल्लन। तेरा मौलाना तुझे इसी जहन्नम के बारे में बताता होगा। किसी रात उसने इस जहन्नम का फेरा किया होगा। यह दुनिया ही जहन्नम है। और इस जहन्नम में इस कोठे जैसे सत्तर हज़ार जहन्नम हैं। ये जो कोठरियां हैं न यही वो बिल हैं जहाँ साँप रहते हैं जो हर रात हमें खाते हैं। " बोलते बोलते शरबरी का चेहरा भभकने लगा था। 

"जा नहीं डरती मैं तेरे अल्लाह के अज़ाब फज़ाब से। इससे बड़ा और क्या अज़ाब भोगूँगी। छह दिन भूखी रही तब जाना पेट की आग से बड़ी कोई दूसरी आग नहीं। जो औरतों की नंगई इतनी बुरी लगती है तेरे अल्लाह मियाँ को तो बिजली क्यों न गिरा दी इस कोठे पर?"

साल छह महीनों में ही सजीली के ज़ेहन में शरबरी की बातों के मायने साफ़ होने लगे थे। फिर उसे शरबरी से नाराज़ी नहीं होती थी बस उसे जहन्नम में मिलने वाले अज़ाब की फ़िक़्र रहती थी। वह दिन चढ़े, आधी रात, जब-तब अल्लाह से उसकी बख़्शाइस की दुआएँ करती थी। वह सुबह-सुबह के ख़्वाब देखती थी कि उसकी शब्बो अप्पी को कोई नेक आदमी ब्याहकर अपने साथ ले गया है। वह बड़ी उम्मती और पर्देदार हो गई है। उसे बहुत बाद में समझ हुई कि सुबह के ख़्वाब क़तई सच्चे नहीं होते। कोठे पर सब तरह के मर्द आते थे। पकी दाढ़ियों वाले नमाज़ी और बोदी वाले पुजारी, बाँके क़द्दावर और काने कुतरे, तजुर्बेकार और नौसखुए, खुर्रे और मोहब्बती। लेकिन सब एक मुसाफ़िर की तरह बस रात भर को। सांझ आई ठहर गए, सवेरा हुआ चल पड़े। कोठे वाली खाला की हिदायत थी मर्दो को बस रिझाना है उनसे मोहब्बत नहीं करनी। कोई लड़की अगर इश्क़ में पड़ती तो खाला के टहलुए उसकी खाल उधेड़ देते। उन्हीं दिनों शरबरी का एक असामी रोज़ आने लगा था। शरबरी गदरा गई थी। हर वक़्त खिली-खिली दीखती थी। वह उसके सिवा बाक़ी सारे ग्राहकों को साफ़ इंकार करने लगी थी। खाला के गोइन्दों पर यह बात ज़ाहिर थी। मगर शरबरी धींग थी। अपनी मर्ज़ी की। चाहे कोई मार-मार खाल खींच ले। कोई चार महीने यह सिलसिला चला। मगर अचानक उसका आना बंद हो गया। शरबरी दिन ब दिन मुरझाने लगी। गुलाबी जिल्द वाली बेलाग परी ज़र्द पड़ती गई। धीरे-धीरे वह हंसना बोलना भी भूल गई थी। हंसाने की कोशिश होती तो उसकी आँखों के कोर भीग जाते। कभी ग़फ़लत में बड़बड़ाती "गुल्लन तू बस देखती रह। आज नहीं तो कल तेरा नौशा भाई आएगा ज़रूर।" कभी खाला का गला पकड़ लेती। "आदमख़ोर कुतिया! तूने मार दिया न उस फ़रिश्ते को?" फिर एक दिन सबको मालूम हुआ कि वह पेट से है। पूरे तीन महीने का हमल था। मरी को कोई क्या मारता! अल्लाह-अल्लाह कर दिन पूरे हुए। अठवाँसी लड़की जनमी और शरबरी इस जहन्नम से हमेशा को निजात पा गई। उस दिन बहुत रोई थी सजीली। कलेजे पर दर्द की ऐसी बरफ़ जम गई थी जो तिड़कती ही न थी। जितना रोती जमी हुई बरफ़ और सख़्त होती जाती। 

शरबरी के बाद उसका कोई निगेहबान न था। बस उसके पेट से जने लोथड़े में जीने की एक वजह मिल गई थी। एक रात वह उस ढाई पसली की जान को लिहाफ़ में दुबकाए बैठी थी कि भारी बूटों की आवाज़ से सारा कोठा थर्रा उठा। तमाम कोठरियों में अफ़रातफ़री मच गई थी। किसी लड़की की तलाश में पुलिस ने छापा मारा था। कई लड़कियां मौका पाकर निकल भागीं। उसने भी जो हाथ आया एक झोले में भरा और बच्ची को सीने से चिपकाए बिना पीछे देखे दौड़ती चली गई। 

******

सजीली के बदन की तपिश से बिस्तर तप रहा था। बुख़ार की कच्ची नींद में इतने सारे दिन, महीने और साल किसी सपने की तरह उसकी आँखों से गुज़र गए। ज़रा होश हुआ तो सुध हुई कि कई घण्टों से ज़ैनब न दूध को और न गोद को रोई थी। वह गूदड़ सी चादर झटकारकर एकदम उठ गई और लपककर झुलनी में सोती हुई ज़ैनब को गोद में उठा लिया। उसे छूते ही वह घबरा गई। ज़ैनब के जिस्म में आँच पर रखे हुए तवे की तरह दहकन उठ रही थी। उसके होंठ पपड़ाए हुए थे और चेहरा सुर्ख़ पड़ गया था। वह घबराकर उसके माथे पर भीगी पट्टियां रखने लगी। बुख़ार की इस शिद्दत को वह तो झेल जाएगी मगर इस ननकी जान का क्या होगा! उसे आख़िरी साँस लेती शरबरी याद आने लगी। "दुआ करना गुल्लन इसे हयात मिले।”

उसने दहकती हुई ज़ैनब को अपनी बाहों में भींच लिया। एक फ़िक़्र से दूसरी बड़ी फ़िक़्र सामने खड़ी हुई तो उसका बुख़ार टूटने लगा। किसी भी सूरत हज़ार-पाँच सौ का जुगाड़ तो करना ही होगा। पंद्रह-बीस दिन भट्ठे पर काम की कोई उम्मीद नहीं थी। सोचते-सोचते उसका चेहरा अजीब हो गया। वह कोई सख़्त फ़ैसला करके बिस्तर से उठ गई। मग़रिब का समय था। देर से लस्त पड़ी देह में एकदम से फुर्ती भर गई थी। उसने देग भर पानी गरम किया और मलमलकर नहाने लगी। नहाने के बाद मुसल्ला बिछाकर नमाज़ की नीयत बांधी। फ़र्ज़ के बाद नफ़िल पढ़ी। भीगी आँखों से ज़ैनब की सेहतमंदी की दुआ की और उस पर दरूद भेजे। 

बाहर बरसात रुक चुकी थी। लेकिन लगातार बरसे मेह से दीन बस्ती की सूरत और दीन हो गई थी। आमने-सामने खड़ी झुग्गियों के बीच आने-जाने को बनी पगडंडी कीचड़ से तराबोर थी। पिछवाड़े में कच्ची उथली मोरियों में बहता मैला बारिश के पानी के साथ जहाँ-तहाँ बह रहा था। उसने आस पास की झुग्गियों का फेरा किया तो एक दरवाज़ा खुला हुआ दिखा। भीतर चार जन का परिवार था। परिवार की औरत नरमदिल थी। उसने हाथ जोड़कर अपनी और बच्ची की तबीयत का हवाला दिया। 

"आस पास कोई दवाख़ाना नहीं है। दो-ढाई घण्टे बच्ची को संभाल लें तो बड़ा एहसान होगा। बस दवा लेकर लौट आऊँगी।”

फिर वह अपनी झुग्गी में लौटी। बहुत दिनों बाद उसने गहरी काट वाले गले की कुरती पहनी और छाती पर गोटदार ओढ़नी बिछाकर आँखों में कीच के मानिंद गाढ़ा सुरमा भर लिया। भट्ठी के नज़दीक रहने से उसका चेहरा कजला गया था बहुत दिनों बाद उसने अपनी कजलाई सूरत पर सिंगार किया था। अपने जिस्म पर भड़कदार इत्र की महक लादी थी और बदरंग हुए होठों पर सुर्ख़ी चढ़ाई थी। बहुत दिनों बाद उसे लगा था कि ईमान की रोटी खाकर भी वह बाजारू और बिकाऊ ही दिखती है। आज अपने को बिकाऊ ज़ाहिर करने में उसने कोई क़सर न रख छोड़ी थी। साज सिंगार के बाद उसने मन ही मन बिस्मिल्लाह किया। वह लंबे-लंबे डग भरकर मटियाले कीचड़ को लांघती हुई भट्ठे पर ईंटों से लदे खड़े ट्रक के क़रीब पहुँच गई। ट्रक शहर की तरफ़ जाने को तैयार था। ड्राइवर को उसे वहां तक छोड़ने में कोई उज़्र न था। पनियल सड़कों पर हिचकोले खाता ट्रक आबादी की ओर बढ़ने लगा। 

बादल छितरा गए थे। लेकिन किसी भी समय दोबारा घिर सकते थे। दो दिन के तूफ़ान में कई कमज़ोर दरख़्त गिर गए थे। सड़के बेहाल थीं। बहुत ख़ामोश और भीगी हुईं। ड्राइवर आवाज़ दबाए कोई सिनेमाई गीत गुनगुना रहा था। उसके मुंह से शराब की बास उठ रही थी। मगर वह शरीफ़ आदमी था कि उसने उससे किसी तरह की पेशकश नहीं की थी। 

"बस यहीं उतार दो। " जब उसने कहा तो वह उसे अचरज़ से ताकने लगा था। वह शुक्रिया कह सूनी सड़क के मुहाने पर उतर गई थी। यह नौआबाद इलाक़ा था। इस तरफ़ गाड़ियों की आमदोरफ़्त नहीं थी। आठ दस मिनट के अंतराल पर कोई गाड़ी गुज़रती तो किनारों को भिगोती चली जाती। उनकी रौशनी में पेड़ों के धुले हुए पत्ते चिलकने लगते। सड़क किनारे खाल-खाल गंदले पानी के चहबच्चों में बैठे मेढंक टर्रा रहे थे। हवा में नमी थी। हवाओं के झकोरों से किनारों पर खड़े दरख़्तों के पत्तों पर ठहरा हुआ पानी झड़ने लगता तो उसे सिहरन होने लगती। वह तेज़-तेज़ चलते हुए एक दुकानचे के आगे लगी तिरपाल के साएबान में खड़ी हो गई। दुकान के ठीक सामने एक लैंपपोस्ट की जलती बुझती बदहवास रौशनी पर बरसाती पतंगे मंडरा रहे थे। उसे लगा वह भी ऐसी बुझी हुई सी बदहवास रौशनी है जिसे पतंगों की तलाश है। 

बहुत दिनों बाद छाती से ओढ़नी सरकाकर वह आते-जाते लोगों को भोंडे इशारों से बुला रही थी। इस वक़्त उसे अल्लाह के क़हर और जहन्नम के अज़ाब का ज़रा भी खौफ़ नहीं था। उसकी आँखों में सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़ैनब के दहकते हुए नन्हे हाथ-पाँव कुलबुला रहे थे। उसे शरबरी की बात ठीक याद थी। "भला तुझे क्यों अज़ाब हो! तेरे अल्लाह को क्यों न हो?"
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