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हौलनाक अनुभव ~ मृदुला गर्ग | Distressing Experience - Mridula Garg

वरिष्ठ साहित्यकार मृदुला गर्ग ने यहाँ जो अनुभव साझा किया है वह सच में हौलनाक है। नुसरत ग्वालियारी का शेर याद आया - 
      "रात के  लम्हात  ख़ूनी  दास्ताँ  लिखते  रहे
       सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो  गए"

हमारा काम आप तक इसे लाना था, मालूम नहीं कि आप कोई प्रतिक्रिया देंगे भी...  ~ सं0 



मृदुला गर्ग ~ हौलनाक अनुभव 

कल मुझे एक हौलनाक अनुभव हुआ। मैं अस्पताल में दरवाज़े के पास खड़ी गाड़ी का इंतज़ार कर रही थी।

मेरे ठीक सामने 2 युवा मर्द कुर्सियों पर बैठे थे। मैं काफ़ी देर उन्हें देखती रही। ज़ाहिर है, उन्होंने उठ कर मुझसे बैठने के लिए नहीं कहा। जानती हूं कि हमारे यहां यह परम्परा नहीं है। फिर भी पता नहीं क्यों मुझे बुरा लगा। शायद इसलिए कि गंभीर रूप से बीमार पति के साथ सारा दिन रहने के बाद मैं बेहद थकी हुई थी। लग रहा था और खड़ी रही तो गिर जाऊंगी।

खैर उससे उनका क्या लेना देना था। परंपरा के खिलाफ़ वे क्यों जाते!

काफ़ी देर बाद,स्वीकार करती हूं, मैंने एक बेवक़ूफ़ी। शायद अपने गिरने की आशंका से ध्यान हटाने के लिए। उनका चित्र ले लिया। अमूमन मैं चित्र लेती नहीं। पर तब लिया। मैं उसे मिटा पाती, उससे पहले एक युवक कूद कर खड़ा हो गया। दूसरा मोबाइल पर व्यस्त था। उसी में लगा रहा।

"आप मेरी फोटो नहीं ले सकतीं। यह ग़ैर-क़ानूनी है।" मैने कहा, "ठीक कह रहे हैं आप, डिलीट कर रही हूं।" करते हुए मैंने कहा, "वैसे मैं आपका नहीं, हिंदुस्तान का चित्र ले रही थी। यह अकेला देश है जिसमें जवान मर्द बैठे रहते हैं और बुज़ुर्ग औरतें खड़ी। 

चाहें तो बैठ जाएं, उसने निहायत बदतमीज़ी से कहा। नहीं, आप ही बिराजें। पर उसके बैठने से पहले ही दूसरा युवक उसकी कुर्सी पर आ बैठा। उसने एतराज़ नहीं किया। 

उसे देख लगा,वह विदेश से आया है। धराशाई होने से ध्यान हटाने के लिए, पूछ लिया, "आप कहां से आए हैं?"

"अमरीका से," उसने कहा," पर मैं अपने देश लौटना चाहता हूं। मैं अपने देश और प्रधानमंत्री से बहुत प्रेम करता हूं।"

मैं चुप रही। मेरी चुप्पी में उसे असहमति दिखी। तमतमा कर बोला, "मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं। ईश्वर के बिना हम ड्रग खा खा कर मर जाएंगे। पर ईश्वर खुद धरती पर नहीं आता। किसी के माध्यम से काम करता है। प्रधानमंत्री वह माध्यम हैं।"

"ईश्वर में मैं भी विश्वास करती हूं पर वह तो सब के भीतर है, आपके, मेरे, इनके, उनके, हर स्त्री पुरुष के।"

"नहीं, जो ग़लत हैं, हमारे ईश्वर को नहीं मानते, उन्हें ख़त्म करना ज़रूरी है।"

"यानी कौन?"

"मणिपुर के कुकी।"

हतप्रभ मैंने कहा, "जो नरसंहार और नारी उत्पीड़न वहां हो रहा है, उसे आप सही समझते हैं!"

"बिल्कुल। मैं ईश्वर और अपने प्रधानमंत्री पर विश्वास करता हूं। वे सब कुछ सही कर देंगे।

"ठीक कह रहा हूं न?" बाक़ी युवकों की तरफ देख उसने पूछा। उन्होंने सहमति में सिर हिलाया।  तब तक मोबाइल में खोए युवक ने भी। मुझसे और वहां खड़ा नहीं रहा गया। बाहर धूप में निकल आई। गाड़ी का इंतज़ार करते गिर भी जाती तो उनके साथ से कम दर्दीला होता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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