बाक़र गंज के सैयद - 3 : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 3 : Asghar Wajahat


बाक़र गंज के सैयद  3

~ असग़र वजाहत

मीर जाफर के इतिहास में जाने के लिए पिछली कड़ी, मतलब बंगाल के सूबेदार अलीवर्दी ख़ाँ के युग से बात शुरू करना पड़ेगी। अपने समकालीन शासकों और सूबेदारों में अलीवर्दी ख़ाँ (1671-1756) को एक ख़ास दर्जा हासिल है। इसकी वजह यह है कि लड़कपन और जवानी में काफी मुसीबतों और तकलीफों का सामना करने के कारण उनका व्यक्तित्व निखर गया था। अलीवर्दी कुशल सेनापति और शासक थे। उनके अंदर वे सब गुण थे जो आमतौर पर उस जमाने के समांतों में नहीं होते थे। अलीवर्दी ख़ाँ के इख़्लाक, मुरव्वत, ईमानदारी, नेकनीयती और भाईचारे के सभी कायल थे। कहते हैं वे अपने जमाने के ऐसे शासक थे जो आम लोगों में लोकप्रिय थे। उन्होंने बंगाल के अवाम की भलाई के लिए जो काम किए थे वे बाद में कोई न कर सका।

अलीवर्दी ख़ाँ सुबह नमाज़ के वक़्त से पहले उठ जाते थे। वे सौमो-सलात के पाबंद थे। सुबह की नमाज़ के बाद अपने चुनिन्दा साथियों के साथ कॉफी पीते थे। इसी दौरान प्रशासन के कामों को निपटाते थे।
बाक़र गंज के सैयद - १ : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 1 : Asghar Wajahat
उन्हें अच्छा खाना खाने और पकवाने का शौक था। कभी-कभी अपने सामने कोई खाना पकवाते थे और बावरची को निर्देश देते थे। अगर कोई किसी नये खाने का नुस्ख़ा बताता था तो उसे आज़माते थे। उनका दस्तरख़ान काफ़ी बड़ा होता था। ज़ोहर की नमाज़ के बाद वे बर्फ का या ठण्डा पानी पीते थे। इसके बाद पूरे दिन वे पानी नहीं पीते थे। दिन के काम पूरे करने और इशा की नमाज़ पढऩे के बाद वे अपनी बेगम नवाब बेगम साहिबा और ख़ानदान की दूसरी औरतों को वक़्त देते थे। उनका अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरी औरत से कोई जिस्मानी रिश्ता न था।


अलीवर्दी ख़ाँ की तीन बेटियाँ थीं। कोई बेटा न था। सबसे बड़ी बेटी मेहरुन्निसा बेगम थीं, जिन्हें घसीटी बेगम भी कहा जाता था। उनकी शादी नवज़ेश मुहम्मद ख़ाँ से हुई थी। अलीवर्दी ख़ाँ तो जंगों में मसरूफ रहा करते थे। हुकूमत का पूरा काम-धाम नवज़ेश मुहम्मद ख़ाँ करते थे। यही वजह थी कि घसीटी बेगम ने बेपनाह दौलत जमा कर ली थी। उनके खज़ाने की चर्चा हर जुबान पर रहती थी। अलीवर्दी ख़ाँ की तीसरी और सबसे छोटी बेटी की अवलाद सिराजुद्दौला थे। चूंकि सिराजुद्दौला परिवार के अकेले लड़के थे जो अलीवर्दी ख़ाँ की गद्दी के हक़दार थे इसलिए अलीवर्दी ख़ाँ उनको हद से ज्य़ादा प्यार करते थे। उन्हें अपनी नजरों से ओझल न होने देते थे। उनकी हर ख़्वाहिश को पूरा करना अपना फर्ज समझते थे। सिराजुद्दौला के लिए अलीवर्दी ख़ाँ का असीमित प्रेम ही सिराजुद्दौला का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा। अपने नाना के असीमित प्यार ने उसे काफी उद्दण्ड बना दिया था। हद ये है कि वह अपनी बड़ी बुआ घसीटी बेगम को भी घास न डालता था। उनसे मुकाबला करता था। घसीटी बेगम के आलीशान महल 'मोती झील' की टक्कर पर उसने 'हीरा झील' महल बनवाया था। वरिष्ठ दरबारियों से भी सिराजुद्दौला आदरपूर्वक व्यवहार नहीं करता था।

अलीवर्दी ख़ाँ के मरने के बाद तेईस साल की उम्र में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बन गया। उसके अधिकार में क्षेत्रफल, जनसंख्या और संसाधनों की दृष्टि से एक ऐसा क्षेत्र आ गया जो इंग्लैण्ड से बड़ा था।

सिराजुद्दौला के गद्दी पा जाने से उसके रिश्तेदार और कुछ प्रभावशाली लोग खुश नहीं थे। सबसे ज्य़ादा नाखुश थीं घसीटी बेगम क्योंकि उनकी सिराजुद्दौला—मतलब सिराज से कभी नहीं बनी थी। घसीटी बेगम के पास अपार दौलत थी जो उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी। ख़बरें उडऩे लगीं कि घसीटी बेगम सिराजुद्दौला के विरोधियों को लामबंद कर रही हैं। उनके पास इतनी दौलत थी कि उससे एक बड़ी सेना खड़ी की जा सकती थी। घसीटी बेगम बंगाल के बड़े सामंतों और जागीरदारों को जानती थीं। सिराजुद्दौला को लगा कि घसीटी बेगम को क़ाबू में करना ज़रूरी है। उसे एक ही रास्ता नज़र आया। उसने घसीटी बेगम की दौलत ज़ब्त कर ली और उन्हें नज़रबंद कर लिया।

घसीटी बेगम के अलावा असंतुष्ट गुट के लोगों में मीर जाफर भी प्रमुख थे। मीर जाफर अलीवर्दी ख़ाँ के ज़माने से ही एक संदिग्ध और महत्वाकांक्षी आदमी समझे जाते थे। लेकिन सिराजुद्दौला के सत्ता में आने के वक़्त वे मीर बख़्शी थे। मतलब सेना को वेतन देने वाले विभाग के मुखिया थे। सिराजुद्दौला ने उन्हें इस पद से हटा दिया था और मीर मदन को मीर बख़्शी बना दिया था। इसे मीर जाफर ने अपना अपमान माना था। वे घसीटी बेगम वाले गुट से और करीब हो गये थे।

 बंगाल में एक और हस्ती भी थी जो सिराजुद्दौला से अपना हिसाब बराबर करना चाहती थी। यह कोई मामूली हस्ती न थी। जगत सेठ महताब राय न सिर्फ बंगाल के सबसे बड़े और धनवान सेठ थे बल्कि कई पुश्तों से उनका परिवार बंगाल के सूबेदार का ख़जांची हुआ करता था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बड़े-बड़े अफसरों को निजी व्यापार के लिए कर्ज देने वाले महताब राय जगत सेठ बहुत बड़ी ताक़त थे।

बताया जाता है जगत सेठ महताब राय के पूर्वज मारवाड़ के थे। 1495 ई. में गहलोत राजपूतों में से गिरधर सिंह गहलोत ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। इस परिवार के हीरानन्द साहू 1652 ई. में मारवाड़ छोड़ पटना में आ बसे थे। पटना उन दिनों व्यापार का एक बड़ा केन्द्र हुआ करता था। यहां हीरानन्द साहू ने शोरा का कारोबार शुरू किया था। उन दिनों योरोपियन शोरा के सबसे बड़े ख़रीदार हुआ करते थे। शोरा व्यापार के साथ-साथ साहू ने ब्याज पर कर्ज देने के काम को भी बढ़ाया था और जल्दी ही उनकी गिनती धनवान साहूकारों में होने लगी थी। हीरानन्द साहू के सात बेटे थे। सात रत्न जवान होकर व्यापार करने के लिए इधर-उधर बिखर गये। उनके एक बेटे माणिक चन्द ढाका आ गये जो उस जमाने में बंगाल की राजधानी हुआ करता था। दरअसल माणिक चन्द ही थे जिन्होंने बंगाल के जगत सेठ परिवार की बुनियाद रखी थी। मुर्शिद क़ुली ख़ाँ बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबेदार (1965-1727) और माणिक चंद एक दूसरे के गहरे दोस्त थे। माणिक चंद न सिर्फ नवाब मुर्शिद क़ुली ख़ाँ के ख़जांची थे बल्कि सूबे का लगान भी उनके पास जमा होता था। दोनों ने मिल कर बंगाल की नयी राजधानी मुर्शिदाबाद बसायी थी और औरंगज़ेब को एक करोड़ तीस लाख की जगह पर दो करोड़ लगान भेजा था। 1715 में मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर ने माणिक चंद को सेठ की उपाधि देकर उसकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए थे।

नवाब और ईस्ट इण्डिया कम्पनी सेठ माणिक चंद से बड़े-बड़े मसलों पर सलाह लिया करते थे। नवाब ने अपनी टकसाल का काम भी सेठ माणिक चंद पर छोड़ दिया था। बिहार, बंगाल और उड़ीसा में सेठ माणिक चंद के ढाले सिक्के चलते थे। इतिहासकार कहते हैं कि वह अपने ज़माने में देश का सबसे धनवान नागरिक था। अपनी अपार सम्पत्ति की रक्षा के लिए उसने एक निजी सेना बना रखी थी। माना जाता था कि सेठ माणिक चंद के पास सोने और चांदी का इतना बड़ा भण्डार है कि वह उससे गंगा की धारा का रुख़ मोड़ सकता है। गंगा की धारा का रुख़ मोडऩे की कोशिश सेठ माणिक चंद ने कभी नहीं की लेकिन सत्ता का रुख़ ज़रूर कई बार मोड़ा।

सेठ माणिक चंद को नायाब हीरे-जवाहरात जमा करने का भी शौक था लेकिन हरे पत्थर यानी पन्ने के लिए तो उनका ज़ुनून मशहूर था। दूर-दराज़ से पन्ने के व्यापारी उनके लिए कीमती से कीमती पन्ना लाते थे। सेठ माणिक चंद पारदर्शी हरे रंग के दीवाने थे। अच्छे पन्ने के लिए सोने की थैलियाँ खोल देते थे। व्यापारी उनकी इस कमजोरी को अच्छी तरह समझते थे और क़ाहिरा की बाज़ारों से ख़रीदे गये नायाब पन्ने उन्हें मुँहमांगी क़ीमत पर बेचते रहते थे। सेठ माणिक चंद के पास सब कुछ था पर न थी तो कोई संतान। गंगा की धार मोड़ देने की ताक़त रखनेवाले सेठ माणिक चंद यहाँ मजबूर थे। उन्होंने परिवार आगे चलाने के लिए अपने भतीजे फतेह चंद को गोद ले लिया था।

सेठ फतेह चंद को मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने 'जगत सेठ' की उपाधि दी थी। एक बड़े से पन्ने पर 'जगत सेठ' खुदवा कर सील बनवाई गयी थी जो दूसरे दुर्लभ उपहारों के साथ शाही दरबार में फतेह चंद को पेश की गयी थी। आमतौर पर बंगाल के सूबेदार के साथ बहुत अच्छे संबंध बना कर रखने वाले जगत सेठ और बंगाल के सूबेदार सरफ़राज़ ख़ाँ (1739-40) में कुछ खटक गया था। वजह यह थी कि सरफ़राज़ ख़ाँ बला का अय्याश था। औरतें उसकी कमज़ोरी थीं। किसी ने उसे यह बता दिया था कि जगत सेठ फतेह चंद की बहू अप्सराओं जैसी सुन्दर है। सत्ता और शराब के नशे में चूर सरफ़राज़ ख़ाँ ने यह आदेश दे दिया कि वह जगत सेठ फतेह चंद की बहू को देखना चाहता है। यह आदेश नहीं था, जगत सेठ के मुँह पर तमाचा था। एक ऐसे आदमी का अपमान था जिसका सम्मान दिल्ली दरबार में किया जाता है। जगत सेठ के तन-बदन में आग लग गयी थी। इस अपमान का बदला लेने के लिए जगत सेठ ने बिहार के नायब सूबेदार से सम्पर्क साधा। अलीवर्दी ख़ाँ को मौके की तलाश थी। वह बंगाल का सूबेदार बनना चाहता था। जगत सेठ की मदद ने उसकी योजनाओं को आगे बढ़ा दिया। उसने सरफ़राज़ ख़ाँ पर चढ़ाई कर दी। गिरिया के मैदान में आमना-सामना हुआ था जहां लड़ाई के दौरान सरफ़राज़ ख़ाँ के ही किसी फौजी ने उसे गोली मार दी थी और वह मर गया था। उसे जगत सेठ फतेह चंद को अपमानित करने की सज़ा उसे मिल गयी।

सरफ़राज़ ख़ाँ ने जो ग़लती की थी वह सिराजुद्दौला ने तो नहीं की थी लेकिन भरे दरबार में जगत सेठ का अपमान कर दिया था। अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ के मरने के बाद वह बंगाल की गद्दी पर तो बैठ चुका था लेकिन दिल्ली दरबार से उसे फ़रमान (आदेश) नहीं मिल पाया था। दिल्ली दरबार का हाल बुरा था। बग़ैर लिए दिए कुछ न होता था। पद और जागीरें बिकती थीं। सिराजुद्दौला को अपने लिए फ़रमान हासिल करने के लिए तीन करोड़ रुपये की ज़रूरत थी। रुपया हासिल करने के लिए उसने तत्कालीन जगत सेठ माधव राय को दरबार में बुलाया और तीन करोड़ कर्ज देने को कहा। माधव राय की बूढ़ी तजुर्बेकार आँखें दूर तक देख रही थीं जबकि सिराजुद्दौला की जवान आँखें अपने आसपास तक महदूद थीं। माधव राय जानते थे कि सिराजुद्दौला बहुत दूर तक दौडऩे वाला घोड़ा नहीं है। उस पर तीन करोड़ का दाँव लगाना घाटे का सौदा होता। जगत सेठ ने दरबार में मजबूरी जाहिर कर दी। इस पर सिराजुद्दौला को गुस्सा आ गया था। उसने जगत सेठ को गालियां दीं थी और भरे दरबार में एक थप्पड़ लगा दिया था।

हिन्दुस्तानी तारीख़ का शायद पहला दस्तावेजी षडय़ंत्र शुरू हो गया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जगत सेठ, मीर जाफर के बीच लिखित समझौता हो गया था। पूरी होशियारी बरती गयी थी कि इस समझौते की भनक भी किसी को न लगे। लेकिन कलकत्ता के एक धनी व्यापारी सेठ अमीचंद (अमीरचंद), जो कम्पनी की तरफ से मुर्शिदाबाद दरबार में प्रतिनिधि था, इसकी भनक पा गया और दस्तावेज़ी षडय़ंत्र में अपना पाँच प्रतिशत का हिस्सा माँगने लगा। उसकी माँग को पूरा करना या उसे चुप कराना आवश्यक था। इसलिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लॉर्ड क्लाइव ने एक फ़र्जी दस्तावेज़ बनाया जिसमें अमीचंद की माँग को स्वीकार किया गया था।

कुछ इतिहासकार कहते हैं प्लासी का विख्यात युद्ध हुआ नहीं था। वह युद्ध के नाम पर एक बहुत व्यवस्थित नाटक था। सारी तैयारियाँ इस तरह की गयी थीं कि कहीं कोई भूल-चूक न हो। युवा नवाब सिराजुद्दौला के अलावा सभी लोग जानते थे कि युद्ध शुरू होने से पहले ही युद्ध का निर्णय हो चुका है। सिराजुद्दौला के साथ फ्रांसीसी तोपख़ाना था जिसने तोपें दाग़ना शुरू कर दिया था लेकिन सेना के सिपाहसालार आगे नहीं बढ़े। तब सिराजुद्दौला को पता चला कि क्या खेल हो गया है। कहते हैं उसने अपनी पगड़ी मीर जाफर के क़दमों पर रख कर कहा था कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सूबेदारी तुम्हारे क़दमों पर पड़ी है, इसे बचा लो। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मीर जाफर ने सिराजुद्दौला को युद्ध बंद करने और मुर्शिदाबाद चले जाने की सलाह दे दी थी।

न लड़े जाने वाले युद्घ में वीरता दिखाने के लिए लॉर्ड क्लाइव को 'बैरन ऑफ प्लासी' की उपाधि दी गयी थी। क्लाइव ने इतना धन लूटा था कि उस जैसे साधारण अंग्रेज की गिनती लन्दन के धनवान लोगों में होने लगी थी। मीर जाफर से करोड़ों वसूल करने के बाद सिराजुद्दौला के गुप्त खज़ाने से अमूल्य हीरे जवाहरात और मनों सोना मिला था। और फिर सोने की चिडिय़ा की गर्दन हाथ में आ गयी थी।

व्यापारियों से लडऩा मुश्किल काम है। वैसे भी जगत सेठ और ईस्ट इण्डिया कम्पनी जैसे व्यापारियों से एक साथ दुश्मनी कर लेना तो मौत को दावत देना था।

सत्ता के रंगमंच पर जो नायक आते हैं उनकी क़िस्मत में तख्त या तख्ता लिखा होता है। मुर्शिदाबाद में सत्ता का नाटक सिराजुद्दौला की जान लेकर समाप्त नहीं हुआ। नये सूबेदार मीर जाफर का बेटा मीरन कई मायनों में अपने बाप का भी बाप था। उसे कहा तो छोटे नवाब जाता था लेकिन था वह बड़ा नवाब। मीरन उन सबका सफाया कर देना चाहता था जिन पर ज़रा भी शक हो सकता था कि वे उसके पिता और फिर बाद में उसके रास्ते में आ सकते हैं। घसीटी बेगम वैसे तो सिराजुद्दौला के खिलाफ़ थी और मीर जाफर के सत्ता में आ जाने से खुश थीं लेकिन वे अपने आप में सत्ता का एक केन्द्र थी। उनके पास बेहिसाब दौलत थी। बंगाल, बिहार और उड़ीसा के बड़े जमींदारों में उनकी बड़ी मान्यता थी। इसलिए मीरन ने यह फैसला किया कि घसीटी बेगम और उनके साथ सिराजुद्दौला की माँ अमीना बेगम को 'सैरे दरिया' पर भेज दिया जाये। जब यह खबर मोती झील महल और हीरा झील महल पहुँची तो रोना-पीटना मच गया। सिराजुद्दौला की माँ आमना बेगम तो ये जानती थीं कि उनको नहीं बख्शा जायेगा लेकिन घसीटी बेगम को ये उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। खबर सुन कर वे सकते में आ गयी और फिर अचानक दहाड़े मार-मार रोने लगी।

कुछ ही देर में घसीटी बेगम को ले जाने के लिए सिपाहियों के एक दस्ते के साथ हवशने आ गयी। घसीटी बेगम ने पता नहीं क्यों अपनी खादमाओं को हुक़्म दिया कि उन्हें सबसे बेश कीमती कपड़े और ज़ेवर पहनाये जाये। उन्होंने पूरे सिंगार किए। इस बीच इधर-उधर से सिसकियों और रोने की आवाज़े भी आ रही थी। पूरी तरह तैयार होने के बाद घसीटी बेगम इमामबाड़े आयीं। वहाँ उन्होंने सलाम पढ़े और डियोढी में पहुँच गयीं जहाँ हबशनें उनका इंतज़ार कर रही थीं।

भगीरथी के किनारे एक पालकी पहले से मौज़ूद थी। यह अमीना बेगम की पालकी थी। बहुत सालों बाद दोनों बहनें मिली तो इस मौक़े पर। हबशनों ने दोनों बहनों को पालकियों से उतारा। दूर तक पर्दा हो गया। सामने भगीरथी लहरें मार रही थी। ऊपर सूरज चमचमा रहा था। दोनों तरफ़ आम के बाग़ों का सिलसिला फैला था।

मल्लाहों ने शाही बजरा आगे बढ़ाया। दोनों बहनें दुआएं पढऩे लगीं। धीरे-धीरे बजरा बीच धारे में पहुँच गया। मल्लाहों ने पता नहीं क्या किया कि पल भर में बजरा पलट गया। मीरन का हुक़्म पूरा हो गया। लेकिन अफसोस कि उसका भविष्य सुरक्षित न रह सका। मीरन यानी नसीरुलमुल्क, अलाउद्दौला नवाब मुहम्मद सादिक अली खान बहादुर, असद जंग ने तैयारियां तो इस तरह की थीं कि अपने वालिद मीर जाफर के बाद बंगाल की सूबेदारी का ताज उसके सिर पर आये लेकिन क़िस्मत में कुछ और ही लिखा था। राजमहल के दौरे पर मीरन अपने ख़ेमे में सो रहा था। 2 जुलाई 1760 की रात थी बंगाल में बरसात का मौसम था। काले स्याह बादलों के बीच बिजली कड़क रही थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। मीरन गहरी नींद में था। अचानक आसमान पर चमकने वाली बिजली एक पल में मीरन के ख़ेमे पर गिरी और मीरन का भविष्य भूत में बदल गया।

मुर्शिदाबाद की किसी शाही शादी में दिल्ली से मुन्नी और बब्बू नाम की दो बिजलियाँ आयी थीं। दोनों का नाच नवाब मीर जाफर को इतना पसंद आया था कि उन्होंने दोनों से शादी कर ली थी। नज्मुद्दौला मुन्नी के बेटे थे जिन्हें मीर जाफर के मरने के बाद शुजा-उल-मुल्क नज्मुद्दारैला, महाबत जंग का ख़िताब देकर और उनसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी की काउंसिल ने एक लाख चालीस हज़ार पाउण्ड का नज़राना लेकर बंगाल का कागज़ी नवाब बना दिया था कि सारे अधिकार अंग्रेजों के विश्वसनीय मुहम्मद रज़ा ख़ाँ के पास थे।

यह जानकारी कई सूत्रों से मिलती है कि मीर ज़ैनुलआब्दीन मुहम्मद रज़ा ख़ाँ नायब सूबेदार बंगाल के साथ काम करते थे। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह काम राजस्व विभाग से संबंधित रहा होगा क्योंकि मुहम्मद रज़ा ख़ाँ नवाब के लिए या कहना चाहिए कम्पनी के लिए तहसील वसूली करते थे। डॉ0 अब्दुल मजीद ख़ाँ ने अपनी किताब 'द ट्रांज़ीशन इन बंगाल' 1756-1775 में उल्लेख किया है कि लार्ड क्लाइव ने मुहम्मद रज़ा ख़ाँ और उनके रिश्तेदार मीर ज़ैनुलआब्दीन को अपने दूत बनाकर मराठों से बातचीत करने नागपुर भी भेजा था। मुहम्मद रज़ा और मीर ज़ैनुलआब्दीन की क्या रिश्तेदारी थी यह पता नहीं चल सका। लेकिन यह बहुत संभव है कि वे रिश्तेदार रहे हों क्योंकि दोनों शिआ और सैयद थे।

नवाब नज्मुद्दौला कागज़ के शेर थे। असली शेर जिसकी दहाड़ से पूरा बंगाल, बिहार और उड़ीसा काँप जाता था, मुहम्मद रज़ा ख़ाँ (1717-1791) थे। उन्हें कम्पनी ने नायब नाजि़म नियुक्त करा दिया था और उनके पास लगान वसूल करने का अधिकार आ गया था। प्रसिद्ध इतिहासकार पी.जे. मार्शल ने उनके बारे में काफी विस्तार से लिखा है। मुहम्मद रज़ा ख़ाँ के पिता हादी अली ख़ाँ शीराज़ के प्रसिद्ध हकीम थे। उन्हें भी सोने की चिडिय़ा के पंख दिखाई पड़ गये थे इसलिए वे हिन्दुस्तान यानी दिल्ली आ गये थे। उस वक्त मुहम्मद रज़ा ख़ाँ दस साल के थे। होते-हुआते यह परिवार मुर्शिदाबाद आ गया था। मुहम्मद रज़ा ख़ाँ ढाका के नायब नाजि़म बन गये थे। ये लूटमार का ज़माना था। न कोई कायदे कानून थे और न कोई हुकूमत थी। न किसी का डर था और न कोई पाबंदी थी। शर्त यही थी कि 'ऊपरवाले' नहीं 'ऊपरवालों' को खुश करते रहो। ऐसे हालात में दूसरे नायब सूबेदारों की तरह मुहम्मद रज़ा ख़ाँ ने भी खूब पैसा कमाया था। जो आख़िरकार उनके बहुत काम आया। उन्होंने लॉर्ड क्लाइव और कम्पनी के दीगर अफसरों को पचास हज़ार पाउण्ड के उपहार दिए थे तो उन्हें बंगाल की दीवानी मिली थी। उसके बाद मुहम्मद रज़ा ख़ाँ की तूती बोलने लगी। उनके पेशाब से चिराग़ जलता था। नवाब से कम उनके ठाठ-बाट नहीं थे। शानो-शौकत में वो अच्छे-अच्छों को मात देते थे। लॉर्ड क्लाइव ने कम्पनी से कह सुन कर उनकी तनख्वाह नब्बे हज़ार पाउण्ड प्रति वर्ष तय करायी थी। उस जमाने में यह बहुत बड़ी रक़म थी पर कौन जाने कहाँ-कहाँ जाती थी? कैसी-कैसी बंदर बांट होती थी?

कम्पनी का काम शासन करना नहीं व्यापार करना था। वह शासन को भी व्यापार के सिद्धांतों के आधार पर चला रही थी। सत्ता में आते ही कम्पनी ने दस प्रतिशत लगान बढ़ा दिया था। लगान की रक़म सीधे इंग्लिस्तान भेज दी जाती थी। कम्पनी का मुनाफा लगातार बढ़ रहा था क्योंकि लगान लगातार बढ़ाया जा रहा था। हद ये है कि भयानक अकाल के वर्ष यानी 1770 में कम्पनी ने घोषणा कर दी थी कि अगले साल दस प्रतिशत लगान बढ़ाया जायेगा। होते होते लगान पाँच गुना बढ़ा दिया गया था। कम्पनी को सन् 1765 में पन्द्रह मिलियन पाउण्ड का मुनाफा हुआ था जो 1777 में तीस मिलियन पाउण्ड तक पहुँच गया था। पाँच गुना लगान न दे पाने वाले मर गये थे या जंगलों में भाग गये थे। वैसे कम्पनी किसानों को पाँच गुना लगान अदा करने का सरल तरीक़ा—अफीम की खेती—बताती थी। इतिहासकार बताते हैं कि बंगाल के अकाल का एक कारण यह भी था कि किसानों ने अनाज उपजाना कम कर दिया था और अफीम की पैदावार बढ़ गयी थी।

अकाल के दौरान अनाज के व्यापार पर एकाधिकार कम्पनी और उसके अधिकारियों का ही था। इस खड़े खेल में मुहम्मद रज़ा ख़ाँ ने भी चूक नहीं की थी। सस्ता अनाज बहुत महंगे दामों पर बेचा जाता था। एक लाख लोग बंगाल की धरती में समा गये थे। लाशों को कोई दफन करने वाला या जलाने वाला न था। गाँवों से सड़ी-गली लाशों की ऐसी बदबू आती थी कि रास्ता चलना मुश्किल था। भूख ने सब कुछ छीनने के बाद जान भी ले ली थी। लेकिन कम्पनी, उसके अधिकारी और उससे जुड़े लोग मालामाल हो रहे थे। लालच का विस्तार ब्रिटिश पार्लियामेण्ट तक फैल गया था। 1767 में ब्रिटिश पार्लियामेण्ट ने कानून पास किया था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी प्रति वर्ष 470,000 पाउण्ड ब्रितानी सरकार को दिया करेगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी को सरकार और सम्राट, दोनों का आशीर्वाद प्राप्त था।

बंगाल के नायब सूबेदार की सम्पन्नता और दोनों हाथ से दौलत लूटने से कुछ लोगों में ईष्र्या होना स्वाभाविक थी। मुहम्मद रज़ा ख़ाँ के मित्र ही उनके शत्रु हो गये थे और मौक़े की तलाश में थे। 1765 से 1772 तक मुहम्मद रज़ा ख़ाँ उस वक़्त तक दहाड़ते रहे जब तक वारेन हेस्टिंग गवर्नर जरनल बन कर कलकत्ता नहीं पहुँच गया। मुहम्मद रज़ा के विरोधी गुट ने उसे 'अपना बनाने' के लिए वही हथकण्डा अपनाया जो मुहम्मद रज़ा ने लॉर्ड क्लाइव के साथ अपनाया था। इसका असर हुआ। गवर्नर जरनल ने दीवानी के हिसाब में बड़ी गड़बड़ी पाई। जांच ही नहीं शुरू हुई बल्कि हिंसक तरीक़े से 27 अप्रैल, 1772 को मुहम्मद रज़ा ख़ाँ अपराधी की तरह गिरफ्तार कर लिए गये। उनकी जगह राजा नन्दकुमार के बेटे गुरुदास को नायब नाजि़म बना दिया । 1772 में मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के संरक्षक और उन्हें नौकरी देने वाले मुहम्मद रज़ा ख़ाँ गिरफ्तार हो गये थे। दीवानी का काम कम्पनी ने अपने हाथ में ले लिया था। कम्पनी शासन में जटिलताएँ पैदा हो गयी थीं। ऐसे हालात में मीर ज़ैनुलआब्दीन लखनऊ के नवाब असिफुद्दौला के वजीरे-आज़म सरफ़राज़ुद्दौला (28 जनवरी, 1775-मार्च, 1776 कार्यकाल) के बुलाने पर लखनऊ आ गये। वे अकेले नहीं आये थे, मिर्ज़ा अबू तालिब इस्फहानी भी उनके साथ थे। मिर्ज़ा अबू तालिब ने अपनी किताब 'तारीख़े आसफी' और दूसरी किताब 'खुलासतुल-अफ़कार' में काफी विस्तार से अपने और मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के लखनऊ आने का हाल लिखा है। मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ और अवध के वज़ीरे-आज़म मुख्तारुद्दौला, दोनों ताबतबाई सैयद थे। यानी दोनों दूसरे इमाम के वंशज थे। इसके अलावा अवध उसी तरह शिआ सल्तनत थी जैसे मुर्शिदाबाद थी। सैयद ज़ैनुलआब्दीन औसत कद और अच्छी काठी के आदमी थे। हड्डी चौड़ी थी। रंग बेहद साफ था, जो बंगाल की धूप में कुछ ललिहा गया था। नाक नक्शा खड़ा था। किताबी चेहरे के बीच सितवाँ नाक, गहरी और चमकदार आँखें उनके संवेदनशील और बुद्घिमान होने का प्रमाण देती थीं। माथा चौड़ा था जिसके ऊपर दस्तार उनके 'पुराने जमाने के लोग' होने का सुबूत बन जाती थी। उस ज़माने में लखनऊ के युवा दुपल्ली टोपियों की तरफ आकर्षित हो रहे थे लेकिन पुराने अपनी 'दस्तारें' संभाले हुए थे। उथल-पुथल, हिंसा, अराजकता, सत्ता के लिए षडय़ंत्रों और युद्घों के लगभग पच्चीस साल के अनुभव ने उनके चेहरे पर प्रौढ़ता के निशान छोड़ दिए थे।

अवध के नवाब असिफुद्दौला तख्त पर बैठते ही इस फ़िक्र में लग गये थे कि अपनी माँ बादशाह बेगम के प्रभाव से कैसे निकलें। अपनी अथाह संपत्ति, बड़ी-बड़ी जागीरों और लम्बे चौड़े अमले की मालिका बादशाह बेगम का अवध के बड़े-बड़े राजाओं और जमींदारों में बड़ा असर था। असिफुद्दौला ने अपनी माँ के प्रभाव से निकलने की ख़ातिर फ़ैजाबाद को खैरबाद कहा और लखनऊ को नयी राजधानी बनाया।

नवाब आसिफुद्दौला के बारे में यह विश्वास के साथ कहा जाता है कि वे एक विचित्र व्यक्ति और शासक थे। उनके व्यक्तित्व के अंतरविरोधों ने उनको एक पहेली बना दिया है। ईस्ट इंडिया कम्पनी के रेज़ीडेंट जॉन ब्रिस्टो ने आसिफुद्दौला के बारे लिखा है कि महामहिम के मनोरंजन लड़कों वाले हैं। वे अपने विश्वसनीय लोगों की नियुक्ति विवेक से नहीं करते। उनके व्यवहार में अस्थिरता और लम्पटता है। वे लम्पटों के साथ वार्तालाप करते हुए यह भूल जाते हैं कि वे नवाब हैं और इस प्रकार उनके आधीन उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते। वे पूरा पूरा दिन लम्पटों के सहचर्य में और शराब के नशे में गुजार देते हैं। वे और उनके नौकर तक नशे में अशोभनीय आचरण करते हैं। इस तरह की दिनचर्या के कारण उनके पास राज़कीय काम देखने का समय नहीं होता । मैं कम्पनी के कामों के संदर्भ में उनसे मिलने की प्रतीक्षा करता रहता हूं और प्राय: मुझसे कहा जाता है कि मैं उनके मंत्रियों और विश्वसनीय लोगों से मिलूं जिनको उन्होंने पूरे सरकारी काम सौप रखे हैं।

एक दूसरे समकालीन अंग्रेज ने लिखा है कि नवाब बेवजह हंसते हैं, गंदी बातें और गाली गलौज़ करते हैं। बेकार में मनोरंजन से प्रसन्न होते हैं। गंदी भाषा बोलने वाले उन्हें प्रिय हैं। यहाँ तक कि जिसकी भाषा जितनी गंदी होती है वे उसे उतना ज्यादा पसंद करते हैं।

'तारीखे अवध' में हक़ीम मुहम्मद नज़्मुलगऩी ने एक चश्मदीद इतिहासकार का हवाला देते हुए लिखा है कि बचपन से ही नवाब को ऐशो-आराम पसंद था। घटिया लोगों की सोहबत पसंद आती थी। बे मौक़ा हंसना, गाली देना, और फिर गाली का जवाब गाली से पाने की आशा करना उनका स्वभाव था। उनकी पढ़ाई लिखाई भी वैसी नहीं हो पाई थी जैसी होना चाहिए थी। यहाँ तक लिखा गया है कि वे बचपन से ही आप्राकृतिक यौन संबंधों में लिप्त थे। उनके बहुत से दुष्ट साथियों को उनके पिता नवाब शुजाउद्दौला ने दमघोंट कर या पानी में डुबो कर मार डालने की सजाएँ दी थी। ऐसी भयानक सजाएँ दिए जाने से यह साबित होता है कि आप्राकृतिक यौन संबंधों में उनकी क्या भूमिका रहती होगी।

आसिफुद्दौला की शादी निजामुद्दौला खानेखाना की बेटी शम्सुनिलसा बेगम से हुई थी। इतिहासकार बताते हैं कि शादी के बाद वे एक रात भी अपनी पत्नी के साथ न सोये थे। उनको अच्छी-अच्छी दवाएं दी गयी थीं इलाज़ कराया गया था कोई पर फायदा न हुआ था। दूसरी तरफ इतिहासकार आसिफुद्दौला को दानवीर, कला पारखी, गरीबों का मददगार, लखनऊ का शाहजहाँ भी मानते हैं। संसार का सबसे बड़ा इमामबाड़ा बनवाने के लिए आसिफुद्दौला ने कई विशेषज्ञों से प्रसताव मंगवाये थे। और आखिरकार फैसला दिल्ली के किफ़ायतउल्ला के दिए हुए नक्शे के पक्ष में किया गया था। यह फैसला जो आसिफुद्दौला ने किया था, बड़ी सूझ-बूझ के बग़ैर संभव नहीं था। इतिहासकार बताते हैं 1783 में पड़े अकाल के समय इमामबाड़े का निर्माण राहतकार्य जैसा था। इमामबाड़े बनाने का काम रात दिन चलता था। दिन में ग़रीब और मज़दूर इमामबाड़ा बनाते थे। शरीफ लोग जो यह ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे कि अकाल के कारण उनकी हालत इतनी खराब हो गयी है मज़दूरी करना पड़ रही है, रात में आते थे और दिन भर जो बना था उसे तोड़ देते थे। उन्हें भी मज़दूरी मिलती थी। मतलब यह है कि इमामबाड़ा अकाल पीडि़तों की मदद का एक ज़रिया था।

आसिफुद्दौला लुच्चे लफंगों को ही नहीं बहुत प्रतिभाशाली लोगों को भी पहचानते थे। उन्होंने अपने युग के अद्भुत प्रतिभाशाली क्लाड मार्टिन (1735-1800) को बुलाकर नौकरी दी थी। आसिफुद्दौला अपने युग के नये आविष्कारों के लिए लालायित रहते थे और उन्हें किसी भी कीमत पर खरीदते थे। उन्होंने नजफ़ (इराक) में एक नहर का निर्माण के लिए सात लाख रुपया दान किया था। इस नहर के बन जाने से नजफ़ निवासियों को पानी की सुविधा हो गयी थी। आसिफुद्दौला की दानवीरता ने अपव्यय की सीमापार कर ली थी। कहते है लखनऊ के दुकानदार यह कहकर दुकान खोलते थे जिसको न दे मौला उसको दे आसिफुद्दौला। मतलब यही कि जिसे ऊपर वाला भी नहीं देता उसे आसिफुद्दौला देता है।

उर्दू के प्रसिद्घ और श्रेष्ठ कवि मीर तक़ी मीर (1723-1810) को भी आसिफुद्दौला ने लखनऊ बुलाया था। मीर तक़ी मीर की कविता का सम्मान करने वाला शासक निश्चित रुप से कला और साहित्य का कम से कम अध्येयता तो रहा ही होगा।

राजधानी बनाये जाने से पहले लखनऊ कोई बड़ा शहर न था। वहाँ आमतौर पर मुग़ल सेनाएँ डेरा डाला करती थीं। धीरे-धीरे मुग़ल सेनापतियों ने अपनी आसानी के लिए कुछ अहाते, कटरे बना दिए थे जिनके अंदर आबादी हो गयी थी। इन कटरों में अबू तुराब ख़ाँ का कटरा, मुहम्मद अली ख़ाँ का कटरा, सराय मोऑली ख़ाँ प्रमुख थे। चौक नाम की अकेली बाजार थी—जो अकबरी दरवाजे से लेकर गोल दरवाजे चली गयी थी। चौक के ही पास ब्राह्मणों और कायस्थों के पुराने मोहल्ले थे। राजधानी बनने के बाद असिफुद्दौला के साथ फ़ैजाबाद की एक बड़ी आबादी भी लखनऊ आ गयी थी और फ़ैजाबाद के मोहल्लों के नाम पर ही लखनऊ में फतेह गंज, रकाब गंज, दौलत गंज, बेगम गंज जैसे तमाम मोहल्ले बस गये थे। राजा मुकैत राय ने मुकैत गंज और हसन रज़ा ख़ाँ ने हसन गंज बसाया था।

लखनऊ आकर आसिफुद्दौला ने 'दौलतख़ाना' में, जिसे शीश महल भी कहा जाता है, क़याम किया था। नवाब को चूंकि शिकार का शौक था इसलिए शहर से फासले पर कुछ शिकारगाहें भी बनवायी थीं। 1798 में क्लाड मार्टिन ने असिफुद्दौला के लिए 'कोठी हयात बख़्श' डिज़ाइन की थी। सरकारी दफ्तर मच्छी भवन क़िले में थे। दरबार भी वहीं लगता था। मीर ज़ैनुलआब्दीन के साथ मुर्शिदाबाद से लखनऊ आये मिर्ज़ा अबू तालिब इस्फ़हानी की अपनी अलग दास्तान है। प्रो. हुमायूँ कबीर से लेकर प्रो. मुहम्मद हबीब तक ने उन्हें 18वीं सदी के लखनऊ का एक महत्वपूर्ण लेकिन रहस्यमयी व्यक्ति माना है। कवि, इतिहासकार, संगीतज्ञ, खगोलशास्त्री, प्रशासक और पर्यटक मिर्ज़ा अबू तालिब के प्रसिद्घ फारसी ग्रंथ 'तफ़ज़ीहुल ग़ाफ़लीन' के उर्दू अनुवादक डॉ. सरवत अली ने किताब की भूमिका में लिखा है : ''ये अफ़सोसनाक़ हक़ीक़त है कि अहले इल्म (ज्ञानीजनों) और अरबाबे तारीख़ (इतिहासकारों) ने उनके (अबू तालिब) हालात और कारनामों की तरफ तवज्जो (ध्यान) नहीं की, हाँ योरोप के बाज़ ओल्मा (कुछ विद्वानों) ने उनकी बाज़ तसनीफात (रचनाओं) के तरजुमे (अनुवाद) अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी ज़बानों में शाया (प्रकाशित) किए, आबू तालिक की बेशतर तसनीफात (रचनाएँ) योरोप के कुतुबख़ानों (पुस्तकालयों) में महफूज़ (सुरक्षित) हैं और अब तक शाया (प्रकाशित) नहीं हुईं।''

अबू तालिब के वालिद हाजी मुहम्मद बेग ख़ाँ इस्फहान से दिल्ली आये और फिर लखनऊ आ गये थे। अबू तालिक का जन्म 1752 ईस्वी में लखनऊ में हुआ था। हालात ने ऐसे पलटे खाये कि अबू तालिब के वालिद हाजी मुहम्मद लखनऊ से मुर्शिदाबाद पहुँचे और वहाँ मुहम्मद रज़ा ख़ाँ नायब सूबेदार बंगाल की सरकार में नौकर हो गये। पाठक ध्यान देंगे कि पिछले पन्नों में मुहम्मद रज़ा ख़ाँ पर विस्तार से लिखा जा चुका है। मुहम्मद रज़ा ख़ाँ की सरकार में मीर ज़ैनुलआब्दीन भी काम करते थे। इन दो प्रौढ़ों की जल्दी ही दोस्ती हो गयी। अपने वालिद और ज़ैनुलआब्दीन के दोस्ताना रिश्ते को अबू तालिब ने कई जगह बहुत सम्मान से बयान किया है। लखनऊ में अबू तालिब ने अपने वालिद के दोस्त का साथ देने की बड़ी क़ीमत भी चुकाई थी। लखनऊ में मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ और मिर्ज़ा अबू तालिब को वज़ीरे आज़म मुख्तारुद्दौला ने अपनी महलसरा में ठहराया था। वज़ीरे आज़म बन जाने के बाद मुख्तारुद्दौला की महलसरा का नक़्शा ही बदल गया था। महलसरा में एक सिरे से सब कुछ नया और वेश क़ीमती नज़र आता था। सिपाहियों की वर्दियों से लेकर झाड़ फानूस तक जगमगाया करते थे। मुख्तारुद्दौला ने शाही खज़ाने का मुँह अपनी तरफ खोल दिया था। उन्हें कोई कुछ कहने वाला था। रेजीडेण्ट बहादुर से लेकर नवाब तक उनकी मुट्ठी में थे। उस दौर में अगर कोई नवाब आसिफुद्दौला को सलाम करने जाता था तो वे कहते थे हमें सलाम करने क्यों आये हो? मुख्तारुद्दौला को सलाम करने जाओ। उन्हीं से कुछ मिल सकता है। हमारे पास कुछ नहीं है।

मीर ज़ैनुलआब्दीन, ख़ाँ लखनऊ के रंग ढ़ंग देख रहे थे। दरबारी और ओहदेदार इशारों ही इशारों में बातें करते थे। सब डरा करते थे कि खुदा जाने ज़ुबान से क्या निकल जाये कि पकड़े जायें। आला हुज़ूर का तो लफ्ज़ भी किसी की ज़ुबान पर न आता था। यह सब जानते और कहते थे कि वे अपने कमतरीन नौकरों को बड़े-बड़े ओहदे दे रहे हैं। ज़लील और कम हैसियत लोग शानदार घोड़ों और शाही हाथियों पर शहर में दनदनाते फिरते हैं। मुख्तारुद्दौला का इससे कोई सारोकार न था क्योंकि इससे उन पर कोई फ़र्क़ नही पड़ता था।

रोज-रोज होने वाली दावतों और तफरीहों से ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ कुछ तंग आ गये थे। उनका मक़सद तो काम की तलाश था। अबू तालिब भी नवाब वज़ीर से सरकार में कोई बड़ा ओहदा चाहते थे। मुख्तारुद्दौला के पास इन दोनों की ज़रुरतों को समझने और पूरा करने का वक़्त न था। महफिलों में वे इतना मदहोश हो जाते थे कि गाना सुनने के अलावा और कुछ करने लायक न बचते थे। लेकिन इस दौरान मुख्तारुद्दौला की एक शानदार महफिल में ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का परिचय ख़्वाजासरा अल्मास अली से हो गया। परिचय क्या हुआ उन्हें खजाने की कुंजी मिल गयी। जिस इंतजार में उन्होंने तीन-चार महीने गुजारे थे वह ख़त्म हो गया। आगे बढऩे से पहले ख्वाजासरा मियां अल्मास अली के बारे तफसील से बताना ज़रुरी है।

जिस समाज में धर्म, नस्ल, खानदान ही श्रेष्ठता के आधार हों वहां मियां अल्मास अली जैसे लोगों का होना चमत्कार ही माना जायेगा। नवाब आसिफुद्दौला के दरबार में मियां अल्मास का दर्जा बहुत ऊँचा था। नवाब उन्हें मामू कहते थे। नवाब की माँ बहू बेगम, की पूरी जयदाद की देखभाल वही करते थे। अवध की सरकार की तरफ से दोआब का पूरा इलाका लगान वसूल करने को मिला हुआ था। वे एक करोड़ रुपये से अधिक मालगुज़ारी हर साल जमा कराते थे। नवाब बहुत मुश्किल मौक़ो पर उनसे मश्विरा किया करते थे। नवाब ने उन्हें अपना वज़ीरे आज़म भी बनाया था लेकिन एक दिन बाद ही मियाँ अल्मास ने इस्तीफा दे दिया था। लखनऊ में कोई ऐसा इज़्ज़तदार नहीं था जो उनका कजऱ्दार न हो। वे उदार, दयालु, हिम्मती, बुद्घिमान और वफ़ादार माने जाते थे। उन्होंने लाखों रुपये लगा कर कई मस्जिदें और इमामबाड़े बनवाये थे। उसका कारोबार और कोठियां कोठियां कलकत्ता, हैदराबाद और बम्बई तक फैली हुई थीं। उन्होंने उन्नाव जिले में एक गाँव बसाया था जो आज भी मियाँ गंज के नाम से मौजूद है।

मियाँ अल्मास का ताल्लुक किसी ऊँचे ईरानी-तूरानी परिवार से नहीं था। उनका जन्म पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी किसान परिवार में हुआ था और वे जन्म से ही ज़न्खा थे। उनके परिवार जनों ने उन्हें बेच डाला था। वे ग़ुलामी की मंडी के बिकते-बिकते बहूबेगम, मतलब आसिफुद्दौला की माँ के दहेज में फैजाबाद पहुंचे थे। एक ग़ुलाम ख्वाजासरा के रुप में उनकी सेवाओं, कार्यकुशलता, बुद्घिमानी और वफ़ादारी की भावना से बहूबेगम इतना प्रभावितत हुई थीं कि उन्होंने अपनी जागीरों की देखभाल का काम मियाँ अल्मास को सौंप दिया था। धीरे-धीरे तरक्की करते हुए वे आसिफुद्दौला के विश्वस्त दरबारियों में शामिल हो गये थे।

प्रतिभा-प्रतिभा को पहचानती है। मियाँ अल्मास अली ने ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ और मिर्ज़ा अबू तालिब को पहचान लिया था। उन्हें यह फैसला करते देर नहीं लगी कि इन दोनों को वे अपने तहसील वसूली के काम में लगा सकते हैं। मियाँ अल्मास अली ने ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को दोआब का एक बड़ा इलाका जो कोड़ा के नाम से जाना जाता था दे दिया। यह पच्चीस लाख रुपये मालगुजारी का इलाका था। इतना बड़ा काम मिलने पर भी मीर ज़ैनलआब्दीन अपने पुराने दोस्त के बेटे मिर्ज़ा अबू तालिब को भूले नहीं। इस इलाके के घाटमपुर, अकबरपुर, सिकन्दरा, बिलासपुर और फफँूद परगने उन्होंने ने मिर्ज़ा अबू तालिक को दे दिये।

इस आख्यान में आगे चल कर एक बहुत महत्वपूर्ण आदमी आयेगा जिसके बारे में पहले से बता देना ज़रूरी है। अवध के दरबार में दो अफ़गानी भाई हैदर बेग ख़ाँ और नूर बेग ख़ाँ आमिल के पदों पर काम करते थे। दोनों पर ये इल्ज़ाम साबित हो गया था कि उन्होंने नवाब के खज़ाने में लगान की वाजिब रक़म नहीं जमा कराई है। इस इल्ज़ाम में दोनों भाई गिरफ्तार कर लिए गये थे। दरबार के दूसरे लोग जो ईरान और तूरान के बड़े सम्मानित परिवारों से थे, वैसे भी इन भाइयों को अपने बराबर नहीं समझते थे। मीर ज़ैनुलआब्दीन तो कई बार कह चुके थे कि कम हैसियत और कमज़ात लोगों को आगे बढ़ाने का यही अंजाम होता है। इन दोनों भाइयों पर जब जुर्म साबित हो गया तो दरबार के सम्मानित और ऊँचे परिवार के लोगों ने कहा कि इन्हें वही सज़ा मिलना चाहिए जो ऐसे मुजरिमों को मिलती है।

दोनों भाई कैदख़ाने में डाल दिए गये। तहसील वसूल करने वालों के डण्डों, लातों, घूंसों और गालियों का शिकार होते रहे। दोपहर दोनों तपती धूप में बाँध दिए जाते थे और उन पर लगातार डण्डे बरसते रहते थे। नूर बेग ख़ाँ की पिटते-पिटते जान निकल गयी। हैदर बेग ख़ाँ भी मरने वाला था। लेकिन बहार अली ख़ाँ ने तरस खाकर इसका हाल नवाब आसिफुद्दौला की माँ बादशाह बेगम को सुनाया तो उनको तरस आ गया। उन्होंने बीच में पड़ कर हैदर बेग ख़ाँ को माफी दिला दी। यही हैदर बेग ख़ाँ आगे चल कर क्या करता है ये देखने की बात है। कोड़ा सरकार के आमिल हो जाने के बाद ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ ने चैन की साँस ली थी। कोड़ा सरकार अवध की बड़ी सरकारों में गिनी जाती थी और अबू तालिब के मुताबिक कोड़ा से करीब तीस लाख रुपये की तहसील वसूल होती थी। इसका इलाका आज के फतेहपुर जि़ले के अलावा कानपुर और इटावा के कुछ हिस्सों में फैला हुआ था। कोड़ा, आमिल की सरकार का सदर मुक़ाम हुआ करता था लेकिन दूसरे इलाकों में भी आमिल के नायब रहा करते थे या नायबों के कारिन्दे लगान वसूली का काम करते थे। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को कोड़े में पुराने आमिल की हवेली मिल गयी थी जिसके चारों तरफ उन्होंने ऊँची चहारदीवार उठवा कर उसे एक क़िले जैसी शक्ल दे दी थी। कोड़ा का पुराना किला करीब-करीब खण्डहर हो गया था लेकिन किले की फसील मजबूत थी और अंदर मस्जिद की इमारत के अलावा कुछ इमारतें ऐसी भी थीं जहाँ कम से कम फौज को रखा जा सकता था। क़दीमी बस्ती होने की वजह से कोड़ा एक आबाद क़स्बा था। सौ साल पहले वाली रौनक तो नहीं रह गयी थी लेकिन रिन्ध नदी के रास्ते से ताजिरों और उनके माल असबाब का आना जाना कायम था। कोड़े में कुछ शरीफों के पुराने ख़ानदान आबाद थे और बड़ी तादाद में नौमुस्लिम आबादी थी जिनमें गौतम खानज़ादों का बड़ा मुक़ाम था। राजपूतों के पुराने और प्रभावशाली जमींदार असोथर और अरगल में थे। ब्राह्मणों की बड़ी आबादियाँ गंगा किनारे के बड़े गाँवों जैसे भिटौरा और असनी में थीं। हसुआ और बिलन्दा भी दो बड़े इलाके थे जहाँ सैयद और पठान जमींदारों का बहुत असर था। इन इलाकों में इल्म-ओ-अदब का भी अच्छा-खासा माहौल था। हसुआ के दो मुक़ामी शायर सैयद रज़ी हसन 'सबा' और मीर अल्ताफ़ हुसैन 'ताबिश' की आसपास काफी शोहरत थी। इन शायरों को ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ कभी-कभी कोड़ा आने की दावत भी देते थे। पालकियाँ लेकर कहार सिपाहियों और खिदमतगारों के साथ हसुआ जाते थे। पूरे एक दिन का रास्ता था। सुबह पहले पहर में रवाना होते थे तो चिराग़ जले हसुआ पहुँचते थे।

कोड़ा में ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की रिहायश शाहाना थी। बीसियों मुसाहिबों, असाबदारों, खिदमतगारों ओर सिपाहियों के साथ महलसरा में शहज़दों की तरह रहते थे। आराम और असाइश का हर सामान मुहैया था। सुबह दरबार करते थे जिसमें इलाके से तहसील वसूल, आमदनी, खर्च और अहकामात के अलावा गरीब गुरबा की फरयादें सुनी जाती थीं। इलाके के नज़्मो-ज़प्त के सिलसिले में खबरनवीस अपने रुक़्क़े पेश करते थे। इलाके से आये परगनों के हाकिम और जमींदार अपने-अपने इलाक़ों का हाल पेश करते थे। खज़ांची, मीरमुंशी, पेशकार, मोहर्रिर रौशनाई से कागज़ स्याह करते, अहकामात लिखा करते थे।

सूरज ढलते ही महलसरा जगमगाने लगती थी। सैकड़ों शीशे के झाड़ फानसू, क़ुमक़ुमे, शाख़े, काफूरी श्म्ओं से इस तरह रौशन हो जाते थे कि दिन का गुमान होता था। दीवानखाने में सफेद फर्श पर ईरानी कालीन बिछा दिए जाते थे। सरे महफिल एक बीशकीमती कालीन पर गावतकिए के सहारे ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ मसनद पर बैठते थे। उनके बराबर सिर्फ अबू तालिब को ही बैठने की इज़ाज़त थी क्योंकि मीर साहब अबू तालिब को अपने बड़े बेटे बाक़र अली ख़ाँ से कम न समझते थे। अबू तालिब भी ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को अपने वालिद का जिगरी दोस्त और अपना सरपरस्त ही मानते थे। दोनों के मिज़ाज़ में भी मुमासलत थी। दोनों को शेरो-शायरी, इल्मो-अदब का शौक दीवानगरी की हद तक था। दोनों फारसी शायरी के आशिक़ थे। अबू तालिब अपनी फ़ारसी ग़ज़लें सबसे पहले ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को ही सुनाते थे।

शेरो-सुखन की महफिल के बाद दस्तरख़ान लगता था। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को उस ज़माने के रईसों की तरह खाने का शौक़ था। इसी के तहत उनके बावरचिख़ाने में लखनऊ के चार ख़ानसामा थे जिनमें से शाकिर मियाँ क़ोरमा कलिया और सालन पकाने के माहिर थे। मद्दू मियाँ बिरयानी और पुलाब में लाजवाब माने जाते थे। तीसरा फीरीनी, शाही टुकड़े, क़ुल्फी वगैरा के लिए था। चौथे बावरची की जिम्मेदारी शीरमाल, बाक़रखानी, कुलचे से लेकर रूमाली रोटी और रौग़नी टिकिया तैयार करना था। इन बावर्चियों के साथ मसाला कूटने, पीसने और छानने वाले थे जो हवनदस्तों में बेहतरीन मसाला कूटते और सिलों पर पीसते थे क्योंकि अच्छे खाने का राज़ ही अच्छा मसाला है। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को मुर्ग़ के शोरबे में पकाई गयी अरहर की दाल पसंद थी और इसके लिए एक अलग बावर्ची तैनात था। उनके दस्तरखान पर आमतौर से बादाम का क़ोरमा या कभी ताल मखाने का सालन, फसल पर कीमा मटर, फसल पर ही शबदेग़, कच्चे क़ीमे के कबाब, सींख कबाब, कभी मछली के कबाब, अनारदाना पुलाव या मुतन्जन, अरहर की दाल के अलावा चपाती, शीरमाल, अ_ारह वर्की पराठे और तरह-तरह की चटनियाँ हुआ करती थीं। मीठे में उन्हें फसल पर बूट का हल्वा बहुत पसंद था। जब फसल नहीं होती थी तो वो आमतौर पर फ़ीरीनी पसंद करते थे।

मुर्शिदाबाद में पैदा होने और पलने बढऩे की वजह से मछली ज़ैनुलआब्दीन की कमज़ोरी थी। रिन्ध नदी से रेहू पकडऩे के लिए मछुआरे दिन-दिन भर जाल डाले पड़े रहते थे। कभी बड़ी तादाद में मछली मिल जाती थी तो कच्चे पोखर में डाल दी जाती थी ताकि वक़्ते ज़रूरत काम आये।

लखनऊ के मोहल्ले मोआली ख़ाँ की सराय में उन्होंने महलसरा बनवायी थी जिसमें उनके बड़े बेटे बाक़र अली ख़ाँ का क़याम था जबकि पूरा खानदान अभी मुर्शिदाबाद में था। वे जल्दी ही पूरे खानदान को लखनऊ लाना चाहते थे।

नवाब आसिफुद्दौला के पिता नवाब शुजाउद्दौला के जमाने में पूरा राजकाज इलचखाँन, राजा सूरत सिंह और राजा पटरचंद देखते थे। ये लोग मुख़्तारुद्दौला (उस समय मुर्तुज़ा ख़ाँ) को अपने नौकरों से भी गया गुज़रा समझते थे। लेकिन नये ज़माने में मतलब आसिफुद्दौला के दौर में मुख़्तारुद्दौला वजीरे आज़म थो और वे अपने पुराने दुश्मनों से हिसाब बराबर करना चाहते थे। एक वक़्त आया कि जब इलच ख़ाँ को लगने लगा कि उनकी-गर्दन फंदे में आने ही वाली है। वे अपनी जान बचाने की गुहार करते रेज़ीडेण्ट के पास पहुँचे। रेज़ीडेण्ट ने उन्हें राय दी कि तुम किसी बहाने से, नवाब की इजाज़त लेकर, लखनऊ छोड़ दो। यह सुनकर इलच ख़ाँ के दिमाग में एक नादिर विचार आया। आसिफ़द्दौला नवाब तो बन गये थे लेकिन उन्हें दिल्ली दरबार से पद् और मान्यता न मिली थी। दस्तूर के मुताबिक दिल्ली सम्राट ख़िल्अत (एक तरह का कीमती गाउन) देकर पद् की स्वीकृति दिया करता था। इलच ख़ाँ ने नवाब से कहा कि वे दिल्ली जाकर खिल्अत ला सकते हैं। नवाब ने न केवल सहर्ष आज्ञा दे दी बल्कि अच्छा खासा धन भी दिया। दूसरी तरफ मुख़्तारुद्दौला यह समझ गये कि इलच ख़ाँ अगर खिल्अत ले आया तो नवाब की नज़रों में चढ़ जायेगा। इसलिए उन्होंने अपने दिल्ली दरबार के सूत्रों को लिखा कि इलच ख़ाँ को किसी क़ीमत पर खिल्अत नहीं मिलना चाहिए। इस संघर्ष में इलच ख़ाँ हार गये और अवध से भाग गये। मुख़्तारुद्दौला ने एक दुश्मन का सफाया कर दिया।

मुख़्तारुद्दौला का रुतबा बुल्द से बुल्दतर होता जाता था। अपने सभी भाइयों को बड़े बड़े खिताब दिला कर उन्होंने बहुत अहम ओहदों पर तैनात कर दिया था। रेजीडेण्ट बहादुर जान ब्रेस्टो से इतनी दोस्ती बढ़ गयी कि दिन में एक बार दोनों की लाजमी मुलाक़ात होती थी। फिरंगी चाहते थे कि नवाब अपनी फौजी ताक़त कम करे। मुख़्तारुद्दौला उस सही मौके की तलाश में थे जब नवाब को इस बात पर तैयार किया जा सके। लेकिन मुख़्तारुद्दौला को एक नये ओर ताक़तवर मोर्चे से ललकारा जाने लगा। यह मोर्चा था नवाब आसिफुद्दौला की माँ और दादी का मोर्चा।

मुख़्तारुद्दौला के हर काम और उनके हर आदमी में बेगमात ख़ामियाँ देखने लगीं। बेगमात के पास चूंकि उपार दौलत थी इसलिए अवध के ताक़तवर लोगों में उनकी बड़ी मान्यता थी। मुख़्तारुद्दौला को लगा कि इन नये मोर्चे को न तोड़ा गया तो उन पर इतने गोले गिरेंगे कि उनका पता भी नहीं चलेगा।

यह जग जाहिर था कि नवाब शुजाउद्दौला के पूरे ख़जाने पर बेगमात का कब्ज़ा था। सरकारी ख़ज़ाना खाली थी। लगान वसूल की रक़म आने में देर थी। नये नवाब आसिफुद्दौला को पैसे की बड़ी ज़रुरत थी। मुख्तारुद्दौला ने नवाब को सीधा रास्ता बताया। बेगमात के पास जो पैसा है वह सरकारी ख़जाने का पैसा है। नवाब आसिफ़द्दौला ने जब अपनी माँ से रुपया मांगा तो इतिहासकार हकीम मुहम्मद ग़नी ख़ाँ के अनुसार उन्होंने बेटे से झल्ला कर कहा कि अभी तेरे बाप को मरे दस रोज़ भी नहीं गुज़रे और मैं मातम के सोग में बैठी हूं ऐसा बेमहल (बेमौका) सवाल करना किस क़दर बेहयाई है। मुझे रोने की भी फुर्सत नहीं।...''

बहरहाल किसी सूरत आसिफुद्दौला माँ से छ: लाख रुपया ले गये। लेकिन इतनी छोटी सी रक़म 'उदार और दानी' नवाब के कब तक काम आती। कुछ दिनों बाद चार लाख रुपये और ले लिए। इस तरह माँ और बेटे के दिल मे फ़र्क आ गया। मुख़्तारुद्दौला यही चाहते थे। इस मोर्चे का सर करने के बाद मुख़्तारुद्दौला कमाल का अहंकार और घमंड पैदा हो गया था। बड़े-बड़ों का अपमान कर देना उनके लिए मामूली बात थी। अपनी शानों शौकत को इस तरह बढ़ा रहे थे कि वह नवाब की शान से टक्कर लेने लगी थी। उन्होंने नवाब के बुज़ुर्ग रिश्तेदारों जैसे सलार जंग, शेरजंग, मिर्ज़ा अली ख़ाँ वग़ैरा का भी सम्मान करना बंद कर दिया था। अपने कामों की जिम्मेदारी ख्वाजासरा अनवर को दे दी जो अव्वल नम्बर का लुच्चा था। खुद दिन-रात शराब के नशे में मदहोश रहने लगे थे। जाने कहाँ से जलालो नाम की एक रण्डी मिल गयी थी जिसने उन्हें अपना ज़रखरीद ग़ुलाम बना लिया था।

मुख़्तारुद्दौला की सत्ता के खिलाफ़ एक दूसरा विरोधी गिरोह भी षडय़ंत्र कर रहा था। इस गुट का नेता नवाब की पैदल फौज का सरदार ख़्वाजा बसंत अली ख़ाँ था। उसे दो बड़े सरदार राजा झाऊलाल और तपरचन्द मदद दे रहे थे। उन्होंने एक मार्के में मुख़्तारुद्दौला के खिलाफ षडय़ंत्र रचा था लेकिन वह उससे बच निकला था। इस षडय़ंत्र में सीधे-सीधे राजा झाऊलाल और तपरचन्द की शिरकत साफ थी। नवाब वज़ीर ने इन दोनों को गिरफ्तार करा लिया था। इनके गिरफ्तार होने के बाद ख़्वाजा बसंत अली ने सोचा कि षडय़ंत्रकारियों पर दबाव पड़ेगा तो उसका नाम भी सामने आ जायेगा। इसलिए उसने नवाब आसिफुद्दौला के छोटे भाई सआदत अली ख़ाँ के साथ मिल कर यह योजना बनाई कि मुख़्तारुद्दौला वज़ीरे आज़म और नवाब आसिफुद्दौला, दोनों की एक साथ हत्या कर दी जाये। अवध के तख्त पर सआदत अली ख़ाँ बैठ जायेंगे।

इस दौरान एक दिन नवाब आसिफुद्दौला ने ख़्वाजा बसंत अली से अपने वज़ीरे आज़म मुख़्तारुद्दौला की शिकायत की। बताया कि वह बहुत चालाक और ख़ुदसर है। वही काम करता है जो उसे करने होते हैं। हुकूमत का काम अच्छी तरह नहीं चल रहा है, वग़ैरा वग़ैरा। ख़्वाजा बसंत के लिए यह सुनहरा मौका था। उसने आसिफुद्दौला की हाँ में हाँ ही नहीं मिलाई बल्कि नवाब से मुख़्तारुद्दौला को क़त्ल करने की इजाज़त भी ले ली। नवाब वज़ीर जानते थे कि मुख़्तारुद्दौला से पीछा छुड़ाने का यही तरीक़ा है।

ख़्वाजा बसंत अली ने नवाब और मुख़्तारुद्दौला को एक साथ ठिकाने लगाने के लिए एक शानदार दावत का इंतिज़ाम किया। इस दावत में उसने मुख़्तारुद्दौला को बुलाया। चूँकि मुख़्तारुद्दौला को यह पता नहीं था कि नवाब ने उसे क़त्ल कर दिए जाने की इजाज़त दे दी है इसलिए वह दावत में आने पर तैयार हो गया। ख़्वाजा बसंत ने जब नवाब को दावत में आने की दावत दी तो नवाब टाल गये। उन्हें मालूम था कि इस दावत में ख़्वाजा बसंत अली मुख़्तारुद्दौला की हत्या कर देगा। उन्हें पता था कि मुख़्तारुद्दौला रेजीडेण्ट का खास आदमी है। वे इस पचड़े में न पडऩा चाहते थे। नवाब के इंकार कर देने से ख़्वाजा बसंत अली परेशान हो गया। वह नवाब को दावत में बुलाने तीन बार गया। नवाब के सामने दावत की तैयारियों और इंतिज़ाम की चर्चा की। नवाब को बहुत ललचाने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सका। इस पर उसने सोचा कि मुख़्तारुद्दौला का काम तमाम करने के बाद वह नवाब से निपट लेगा।

मुख़्तारुद्दौला की हत्या की जि़म्मेदारी अजब ख़ाँ को सौंपी गयी। अजब ख़ाँ के दोस्त फज़ल अली और तालिब भी उसके साथ शामिल हो गये। मौका देख कर, जब मुख़्तारुद्दौला गाना सुनने में मसरूफ था फज़ल अली ने उस पर तीन कदम आगे बढ़ कर पै-दर-पै तीन वार किये और वह खत्म हो गया। गाना गानेवालियाँ चीख़ें मारने लगीं और साजिन्दे गिड़गिड़ाने लगे कि कहीं उन्हें सुबूत मिटाने के लिए न मिटा दिया जाये। बसंत अली ने उन्हें दिलासा दिया कि ऐसा नहीं होगा। मुख़्तारुद्दौला के कत्ल की ख़बर फैल गयी।

इसके बाद ख़्वाजा बसंत नवाब के यहां आया और अन्दर जाने की इजाज़त माँगी। नवाब को यह शक भी नहीं था कि ख़्वाजा बसंत उनकी हत्या करने के इरादे से आ रहा है लेकिन फिर भी उन्होंने कहला भेजा कि ख़्वाजा बसंत अली अकेला अन्दर आ सकता है। वह अकेला अन्दर गया। नवाब जानते थे कि मुख़्तारुद्दौला के क़त्ल की तहक़ीक़ात रेज़ीडेण्ट जॉन ब्रेस्टो करेंगे। वे ख़्वाजा बसंत अली का भी बयान लेंगे। अपने बयान में अगर ख़्वाजा बसंत अली ने कह दिया कि उसने नवाब से मुख़्तारुद्दौला को क़त्ल करने की इजाज़त ले ली थी तो मामला बिगड़ जायेगा। इसलिए ख़्वाजा बसंत अली का दुनिया से उठ जाना ही बेहतर है। बसंत अली के अंदर आते ही नवाब ने नवाज़ सिंह को इशारा कर दिया और उसने एक ज़ोरदार तलवार का वार सिर पर किया और बसंत अली खत्म हो गया।

मुख़्तारुद्दौला के क़त्ल हो जाने के बाद नवाब और रेज़ीडेण्ट, दोनों ने मिर्ज़ा हसन रज़ा ख़ाँ को वज़ीरे आज़म बनाया। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे। नवाब उन्हें 'भैया' कह कर पुकारते थे। उनका काम नवाब के साथ शिकारगाहों और दूसरी तफरीहों में शामिल रहना था। हसन रज़ा की कमियाँ ये थीं कि वे पढ़े-लिखे न थे और सरकार का कामकाज करने का उनको कोई अनुभव न था। दूसरे, वे गज़ब के अहंकारी थे। इस सूरत में कम्पनी के कहने पर नवाब ने हैदर बेग ख़ाँ को नायब वज़ीरे आज़म नियुक्त कर दिया था। पाठक ध्यान दें ये वही हैदर बेग ख़ाँ हैं जिन्हें माल- गुजारी न दे पाने के आरोप में नवाब ने गिरफ्तार करा दिया था। जिन पर तहसील वसूल करने वाले सिपाहियिों के जूते और घूँसे पड़ा करते थे। जिनके बड़े भाई नूर बेग ख़ाँ इसी मारपीट की वजह से मर गये थे।

हुकमत के कामों में न तो नवाब को दिलचस्पी थी और न वज़ीरे आज़म को। इसलिए पूरी हुकूमत हैदर बेग ख़ाँ के हाथ में थी जो कम्पनी के हित साधने की मजबूरी के अलावा हर काम में पूरी तरह खुदमुख़्तार था। स्याह और सफेद का मालिक था। उसे अपना अतीत याद था। यह भी जानता था कि दरबार के उच्च वंशीय ईरानियों और तूरानियों ने न केवल उनकी मदद नहीं की थी बल्कि वे किसी हद तक उसके भाई की मौत के जि़म्मेदार भी हैं। इसलिए हैदर बेग बदला लेने के भयानक रास्ते पर चल निकला। उसने दरबार के पुराने ख़ानदानी लोगों को सताना शुरू कर दिया। सूरत सिंह को निकाल दिया जो बरेली इलाके से करीब सत्तर लाख रुपया दिया करता था। यह इलाका उसने कुंदनलाल और दो-तीन कायस्थों को दे दिया।

हैदर बेग और रेज़ीडेण्ट के बीच बहुत दिनों से खींचा तानी चल रही थी। रेज़ीडेण्ट को शिकायत थी कि अवध सरकार समय पर कम्पनी की सेनाओं का वेतन नहीं भेज पाती। हैदर बेग रेज़ीडेण्ट की बढ़ती हुई ताक़त पर लगाम लगाना चाहते थे। उस उठा पटक में हैदर बेग ने क्लाड मार्टिन को अपनी सहयोगी बनाया और उसके माध्यम से कलकत्ता में ईस्ट इंडिया कम्पनी के गर्वनर जरनल की काउंसिल के एक सदस्य को यह प्रार्थनापत्र भेजा कि रेज़ीडेण्ट जॉन ब्रिस्टो पर से नवाब का विश्वास उठ चुका है और कम्पनी बहादुर अब किसी नये रेज़ीडेण्ट को लखनऊ भेजे। कम्पनी बहादुर ने इस पत्र पर तुरंत कार्यवाही करते हुए जॉन ब्रिस्टो को वापस बुला लिया और उनकी जगह पर दूसरा रेज़ीडेण्ट आ गया। यह हैदर बेग की शानदार विजय थी। नया रेजीडेण्ट मेडेल्टन हैदर बेग से बना कर रखता था। हैसियत और ज़्यादा मजबूत बनाने के लिए हैदर बेग ने एक दूसरे बड़े प्रतिद्वंद्वि को ललकारा। इस व्यक्ति के बारे में पाठकों को कुछ जानकारियाँ मिल चुकी हैं। मियाँ अल्मास अली आसिफुद्दौला को हुमूकत में बहुत बड़े और शक्तिशाली दरबारी थे। वे एक करोड़ रुपये से अधिक के मालगुज़ार थे। अपनी निजी सेना रखते थे। उन्होंने ही ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को अपने एक इलाके की मालगुज़ारी का काम सौंपा हुआ था। आरोप लगाया गया कि मियाँ अल्मास अली सरकारी खज़ाने में वाजिब मालगुजारी नहीं जमा करता कभी वह मौसम की खराबी और फसल की बर्बादी की वजह बताता ये कहता कि फलाँ फलाँ इलाके में सिक्खों की फौज ने तबाही मचा दी और काश्तकार लुट गये। हैदर ख़ाँ ने अल्मास अली पर लगाम कसी और उन्हें क़ायल माक़ूल करके कुछ लाख रुपये वसूल कर लिये। यह बात मियाँ अल्मास अली के दिल में लग गया। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि हैदर ख़ाँ उनसे ऐसा बर्ताव करेगा। हैदर ख़ाँ ने नाराज़ लोगों की फेहरिस्त में बड़े बड़े नाम शामिल थे। इनमें एक नाम नवाब सालारजंग का था जो नवाब आसिफुद्दौला के सगे मामू थे। मियाँ अल्मास अली उनके पास गये और अपनी पगड़ी उनके क़दमों पर डाल दी। कहा है कि हुजूरे वाला मैं तो सरकार का ग़ुलाम हूँ और मेरे पास जो है वह सरकार की अमानत है। लेकिन ये काबुली बच्चा हैदर ख़ाँ इस क़दर हद से बढ़ गया है कि न बड़े को देखता है और न छोटे को। किसी सूरत उसे वज़ारत से बाहर करना है। सालार जंग खुद भी हैदर ख़ाँ से बहुत दु:खी थे। फौरन तैयार हो गये। सोचा ये कि दांव इतना पक्का होना चाहिए कि हैदर ख़ाँ की खटिया खड़ी हो जाये। सबसे पहले बेगमात को साधा गया। बेगमात भी हैदर ख़ाँ से ख़ार खाये बैठी थीं। उन्होंने न सिर्फ हामी भरी बल्कि पूरी मदद करने का इंतज़ाम किया। किसी बहाने से नवाब को बुलाया गया और उन्हें हैदर ख़ाँ के बारे में ऐसा बताया गया कि वे हैदर ख़ाँ को निकाल देने को तैयार हो गये।

लेकिन एक मसला यह आ खड़ा हुआ कि हैदर बेग को वज़ीरे आज़म बनाते वक़्त नवाब ने कम्पनी बहादुर से यह समझौता किया था कि हैदर बेग को निकालने और दूसरा वज़ीरे आज़म रखने के लिए कम्पनी बहादुर की मंज़ूरी ज़रुरी होगी। भोले-भाले नवाब हाथ कटाये बैठे थे। हैदर बेग को निकालने के लिए कलकत्ता में बैठे ईस्ट इण्डिया कम्पनी बहादुर के गवर्नर जरनल की मंज़ूरी जरुरी थी। तय पाया के गवर्नर जरनल से हैदर ख़ाँ को निकाल दिए जाने की मंज़ूरी लेने के लिए बहार अली ख़ाँ को कलकत्ता भेजा जाये। बहार अली ख़ाँ सोलह लाख रुपये और कीमती हीरे जवाहरात ले कर कलकत्ता पहुँचा। गर्वनर जरनल से उसकी मुलाकात का हाल हकीम मुहम्मद नज्मुद्दीन ख़ाँ ने तारीखे अवध में इस तरह लिखा है ''जिस कमरे में गवर्नर जरनल और उसकी (बहार अली खाँ) की मुलाकात हुई वहाँ एक पर्दा लिपटा हुआ था गवर्नर जनरल के हुक्म से वह खोला गया। शुजाउद्दौला (नवाब आसिफुद्दौला के पिता) की तस्वीर उस पर खिंची हुई थी। बहार अली ख़ाँ तस्वीर को देख कर खड़ा हो गया और आदाब तस्लीमात बजा लाया और आँखों में आँसू भर आये। गवर्नर जरनल ने फरमाया कि जिस दिन से ये शख़्स दरम्यान से उठ गया है दिल से तस्कीन-ओ-आराम ज़ायल (ख़त्म) हो गया है। उस वक़्त गवर्नर जरनल की मेम साहब एक तरफ बिल्ली के बच्चों के साथ खेल रही थीं। कीमती मोती जिसका हर एक दाना एक हज़ार रुपये से कम न होगा बड़े प्याले में डाल कर उन पर बिल्ली के बच्चों को डाल दिया था। और वो उन पर से उठ नहीं सकते थे। जब उठने का इरादा करते पाँव के तले से मोती लुढ़क जाते और वह इस तमाशे से हंसती थी। कान में जो उसके आवेज़े (बालीञ्चबुंदे आदि) थे उनका हर एक मोती पचास हज़ार की कीमत से कम का न होगा। बहार अली ख़ाँ ने यह हाल देखकर अपने तहायफ़ (उपहार)को ले जाना मुनासिब नहीं समझा। कुछ बेहतरीन तोहफे गवर्नर जरनल के सामने रखे तो उसे देखकर कहा कि उनको उठा लो इसलिए कि दारुल सल्तनत (राजधानी) लंदन में ये बात मशहूर हो जायेगी कि एक करोड़ रुपये के तोहफे फैज़ाबाद से आये होंगे।''

हैदर बेग ने कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थी। उन्हें पता चल गया था कि उनके खिलाफ़ शिकायत गवर्नर जरनल तक पहुँच चुकी है। उन्होंने फौरन गवर्नर जरनल को ख़त भेजा कि बहार अली ख़ाँ बातों पर तवज्जो न दी जाये। वे (हैदर बेग) कम्पनी के ख़ादिम है और एक करोड़ रुपया नज़राने के तौर पर पेश करेंगे। फिलहाल बारह लाख रुपयों की हुण्डी भेजी जा रही है। ये ख़त आते ही गवर्नर जरनल का रुख बदल गया। हैदर बेग और ज़्यादा मज़बूती से नायब वज़ीरे आज़म के पद पर जम गये।

अबू तालिब इस्फहानी ने अपनी किताब 'तफज़ीहुल-ग़ाफ़लीन' यानी 'तारीख़े आसफ़ी' में साफ-साफ लिखा है कि नायब वज़ीरे आज़म हो जाने के बाद हैदर बेग जिन पुराने और खानदानी दरबारियों से बदला लेना चाहता था उनकी फेहरिस्त में पहला नाम ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का था। हैदर बेग अबू तालिब से भी इसलिए नाराज़ था कि अबू तालिब ज़ैनुलआब्दीन का साथ छोड़ कर उसके गिरोह में नहीं आ रहे थे। अब चूँकि हैदर बेग को कोई रोकने-टोकने वाला न था इसलिए उसने सबसे पहले ज़ैनुलआब्दीन को तबाह और बर्बाद करने के लिए षडय़ंत्र रचे। हैदर ख़ाँ ने सन् 1777 ई. में साल के उन महीनों में जो तहसील वसूल के महीने माने जाते हैं, ज़ैनुलआब्दीन को लखनऊ तलब कर लिया। लखनऊ आते ही उन्होंने हैदर ख़ाँ अपनी आने की इत्तिल्ला दी और मुलाकात कर वक़्त माँगा। लेकिन उनकी दरखास्त का कोई जवाब नहीं आया। तीन दिन इंतिज़ार करने के बाद उन्होंने दूसरा रुक्का भेजा। उसका भी जवाब नहीं आया। उन्होंने नायब वज़ीरे आज़म के दफ्तर में पता लगवाया तो मालूम हुआ कि उनको दोनों दरखास्तते 'हुजूर' ने देख ली है लेकिन कोई जवाब नहीं लिखवाया। तीसरी बार भी जब दरखास्त का जवाब नहीं आया तो ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ अपने खिलाफ़ की जाने वाली साजि़श समझ गये। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि उनको लखनऊ बुलाने और फिर मिलने का वक़्त न देने का यही मतलब है कि तहसील वसूल में देर हो और उनसे जवाब तलब किया जाए। ज़ैनुलआब्दीन ने तहसील वसूली का काम पर मिर्जा अबू तालिब के सिपुर्द कर दिया था और उन्हें पूरा यकीन था कि मिर्ज़ा उनकी ग़ैर मौजूदगी में भी वक़्त का पाबंदी और दीगर मामलात का ख्याल रखेंगे।

ज़ैनुलआब्दीन ने अपने लखनऊ के दोस्तों खासतौर पर मिर्ज़ा हसन और मंहदी अली से इस मसले पर राय मश्विरा किया था। दोनों ने उन्हें बहुत एहतियात से क़दम उठाने की सलाह दी थी। अगर ज़ैनुलआब्दीन हैदर ख़ाँ से मिले वग़ैर वापस कोड़े लौट जाते हैं तो ये हुक्म उदूली क़रार पायेगा और उन पर सख्त कार्यवाही हो सकती है। अगर कोड़े नहीं जाते तो तहसील वसूल के काम में कोई रुकावट नहीं आना चाहिए। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को मिर्जा अबू तालिब पर पूरा यक़ीन था।

चिलचिलाती हुई दोपाहर थी। गर्मी ऐसी थी कि खस की टट्टिया पानी डालते रहने के बावजूद सूख जाती थीं। दोपाहर तो क़यामत खेज़ होती थी। लू और धूप मिलकर ऐसा ताण्डव करते थे कि आदमी क्या जान जानवर तक पनाह माँगते लेते थे। पंखा झलने वालों के हाथों में छाले पड़ गये थे और पानी मरने वाले दो-दो पहर पानी ही भरा करते थे। दोपाहर का खाना खाकर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ दीवानखाने के तहखाने में चले जाते थे।

अचानक एक दोपहर खबर मिली कि मिर्ज़ा अबू तालिब आये हैं। इस ख़बर ने उनकी परेशानी बढ़ा दी। मिर्ज़ा आबू तालिब ने उन्हें जो बताया उससे उनकी परेशानी और बढ़ गयी। मिर्ज़ा अबू तालिब ने उन्हें काफी तफसील से बताया कि इलाके के बड़े जमींदार लगान नहीं दे रहे हैं। सरकशी पर उतरे हुए है। इसकी वजह-वजह यह है कि उनको कहीं से कोई इशारा किया गया है। इशारा ऐसे आदमी ने किया है वे शेर हो गये हैं। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को समझतेदेर नहीं लगी कि लगान न देने का इशारा किसने किया है। लेकिन सवाल यह था कि अब किया क्या जाये। अगले माह तहसील वसूल शाही ख़जाने में जमा कराना है। अगर हिसाब पूरा न हुआ तो हैदरी ख़ाँ गिरफ्तार कराने में कोई कसर न छोड़ेगा। वो एक तरह से अपना और अपने भाई का बदला लेना चाहता था। वह चाहता था कि मीर ज़ैनुलआब्दीन पर सिपाहियों के डंडे, लात-जूते चले और उन्हें पूरी तरह ज़लील किया जाये।

दूसरी तरफ हैदर बेग ने अपनी हैसित और ज़्यादा मज़बूत कर ली थी। मिडिल्टन से हैदर बेग को अच्छी पटती थी क्योंकि उसकी हर सिफारिश को हैदर बेग सिर आँखों पर लेता था। रेज़ीडेण्ट को और चाहिए भी क्या था? उसे पल-पल की खबरें मिल जाया करती थी और हैदर बेग को उसका संरक्षण प्राप्त था। सत्ता के दोनों सिरे हाथ में आ जाने के बाद हैदर बेग और ज़्यादा आक्रामक हो गया था।

ज़ैनुलआब्दीन के खिलाफ़ हैदर बेग जो साजि़श रच रहा था उसमें कामयाब हो गया। कोड़ा से न सिर्फ वक़्त पर तहसील वसूली नहीं आई बल्कि उसमें तीन लाख रुपये की कमी भी हो गयी। इस तीन लाख पर कार्यवाही होने ही वाली थी कि ज़ैनुलआब्दीन ने अपनी जेब से तीन लाख देकर जान छुड़ाई थी। इस तरह हैदर बेग अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो सका पर उसने हार नहीं मानी।

हैदर बेग ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को बिल्कुल अकेला कर देना चाहता था। नवाब के दरबारी और लखनऊ के बाइज़्ज़त लोग हैदर बेग के डर की वजह से ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ से ताल्लुक़ात खत्म कर चुक थे। अगर कोई उनसे मिलता जुलता भी था तो इतनी एहतियात से कि किसी को ख़बर न हो। मियाँ अल्मास जैसे ताक़तवर लोग भी हैदर बेग से कोई टकराव नहीं चाहते थे। लेकिन मिर्ज़ा अबू तालिब ने ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का साथ नहीं छोड़ा था। हैदर बेग के आदमियों ने अबू तालिब को कई बार समझाया था कि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का साथ उन्हें बहुत मंहगा पड़ेगा लेकिन अबू तालिब टस से मस नहीं हुए थे। वे जानते थे कि अब हैदर बेग उनके खिलाफ भी कई मोर्चे खोल देगा।

हैदर बेग के जासूस उसे बराबर खबर करते रहते थे कि अबू तालिब ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की तरफ़दारी कर रहे हैं। हैदर बेग चूँकि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को तन्हा करके तबाह करना चाहता था इसलिए उसे अबू तालिक का रवैया बड़ा नागवार लगता था। उसने अपने कई ख़ास लोगों के ज़रिये अबू तालिब को यह पैग़ाम भेजा कि अगर वो ज़ैनुलआब्दीन की तरफ़दारी छोड़ दें और उनके साथ शामिल हो जायें तो उन्हें बहुत फायदा पहुँच सकता है। अबू तालिब इस लालच में नहीं आये। हैदर बेग को भी पता चल गया कि अबू तालिब उसकी बात नहीं मानेंगे। इसलिए हैदर बोग ने अबू तालिब के खिलाफ भी साजि़शें शुरू कर दीं।

तक़रीबन सभी इतिहासकार और गज़ेटियर यह बताते हैं कि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की पत्नी का नाम मिसरी बेगम था। मुर्शिदाबाद की तीनों वंशालियों में मिसरी बेगम की तलाश हैरत में डाल देने वाले नतीजे तक पहुँचती है और मज़ेदार और सोचने वाली बात यह है कि किसी इतिहासकार ने मिसरी बेगम का उल्लेख करते हुए उनके बारे में सबसे बड़ा तथ्य पता नहीं क्यों नहीं बताया। मुर्शिदाबाद की सभी वंशालियों में सिर्फ एक मिसरी बेगम हैं। बहुत साफ तौर पर यह पता चलता है कि मिसरी बेगम बंगाल के नवाब मीर जाफऱ की बेटी थीं। मीर जाफ़र से ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की पुरानी रिश्तेदारी तो संदिग्ध हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि मीर जाफऱ ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के ससुर थे। और इस तरह बाकरगंज के सैयदों में कहीं मीर जाफ़र का ख़ून शामिल है।

क्रमशः ...
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('हंस' में प्रकाशित हो रही कड़ी... )
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