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लेख: कहीं कुछ कमी सी है - प्रेम भारद्वाज

दिस॰ 25, 2012

हे मिंग्वे ने लिखा है- ‘जीवन के बारे में लिखने के लिए जीवन को जीना जरूरी होता है.’ 
वर्तमान समय में जो रचनाएं आ रही हैं, वे जीवन के किस रूप से जुड़ी हैं, कितना अपने समय में धंसी हुई हैं, और कितना समाज से संबद्ध हैं, यह अवलोकन का विषय है. वर्ष 2012 का सिंहावलोकन करने पर जो तस्वीर बनती है, वह कथा साहित्य में संख्या के स्तर पर सुखद है, मगर उनका स्तर और स्वर दिल को उत्साह से भर देने वाला शायद नहीं है.

प्रेम भारद्वाज (sam
कहानियों और उपन्यासों की दुनिया में वर्ष 2012 में मुख्य रूप से युवाओं ने ही मोर्चा संभाला. संख्या और स्तर की दृष्टि से युवा लेखकों की कहानियों और उपन्यासों का ग्राफ ऊंचा रहा. बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों का रचनारत रहना ही उनकी उपलब्धि रही. नामवर सिंह ने कुछ साल पहले यह चिंता व्यक्त की थी, कि उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं. उनकी चिंता इस साल दूर होती दिखायी दी, जब एक दर्जन से ज्यादा उपन्यास हिंदी पाठकों के सामने आये. कहानी हो या उपन्यास, कथ्य के स्तर पर उनमें पर्याप्त विविधताएं हैं. शिल्प के प्रयोग भी खुशनुमा हैं. बावजूद इसके कोई भी कृति ऐसी नहीं आयी, जो अपनी मौजूदगी से पाठकों को चमत्कृत कर दे या जो एक नयी लकीर खींचती हो.

पहले बात उपन्यास की. अगर काशीनाथ सिंह के ‘महुआचरित’ को उपन्यास माना जाये, तो यह मान लेना चाहिए कि उम्र के चौथेपन में भी काशीनाथ सिंह शिल्प की पुरानी जमीन को तोड़कर कुछ नया करने की दिशा में सक्रिय हैं  उनका लघु उपन्यास ‘महुआचरित’ अपने कथ्य के स्तर पर भले ही कुछ लोगों को न जंचा हो, उनको उसमें पोर्नोग्राफी का आभास भी मिला हो, मगर वह एक प्रयोग तो है ही. कविता की शैली में उपन्यास लिखने का नया प्रयोग है. वरिष्ठ लेखकों में द्रोणवीर कोहली (कथा-स्पर्श), रमेश चंद्र शाह (कथा-सनातन), गिरिराज किशोर (स्वर्ण मृग) ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है. महेश कटारे (कामिनी काया कांतरे), प्रदीप सौरभ (देश भीतर देश), नरेंद्र नागदेव (एक स्विच था भोपाल में), मदन मोहन (जहां एक जंगल था), यशोदा सिंह (दस्तक), ने अपने उपन्यासों में अलग-अलग विषय उठाये, जो सामाजिक सरोकार से जु.डे हैं. महेश कटारे अपने उपन्यास में राजा भर्तृहरि के बहाने मौजूदा समय-समाज को टटोलते नजर आते हैं. काफी श्रम से लिखे गये इस उपन्यास की ओर पाठक देर-सबेर जरूर आकृष्ट होंगे. नरेंद्र नागदेव भोपाल गैस त्रासदी के कारणों को तलाशते हैं, तो मदन मोहन के उपन्यास में ठेठ ग्रामीण जीवन में हुए या हो रहे बदलावों का चिट्ठा है. उत्तर प्रदेश के पूर्ववर्ती इलाके के राजनीतिक-सांस्कृतिक यथार्थ को प्रभावशाली तरीके से यह उपन्यास पाठकों के समक्ष रखता है. प्रदीप सौरभ के ‘देश भीतर देश’ में पूर्वोत्तर की व्यथा-कथा है, जिसे पत्रकारीय अनुभवों से बुना गया है. इसमें आभासी दुनिया की भी छौंक है. महुआ माजी के बहुचर्चित उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ को रेणु पुरस्कार मिला. वीरेंद्र यादव के शब्दों में ‘इस उपन्यास में महुआ माजी यूरेनियम की तलाश में जुड़ी जिस संपूर्ण प्रक्रिया को उजागर करती हैं, वह हिंदी उपन्यास का जोखिम के इलाके में प्रवेश है.’ अत्यधिक श्रम और शोध के सहारे लिखे गये इस उपन्यास की कुछ लोगों ने शोध प्रबंध का नाम देकर आलोचना भी की है. बिना शोर-शराबे के खामोशी से रचनारत राकेश कुमार सिंह का उपन्यास ‘हुल पहाड़ियातिलका मांझी के जीवन पर आधारित है. आदिवासी समाज के जीवन और संघर्ष का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज है. अपनी ताजगी भरी भाषा के जरिये कविता में स्थान बनाने वाले युवा रचनाकार राकेश रंजन का उपन्यास ‘मल्लू मठफोड़वा’ हवा के एक तेज झोंके की तरह है. हाजीपुर क्षेत्र की आंचलिकता लिये हुए यह उपन्यास अपनी समग्रता में पाठकों पर एक जादू सा करता है. युवा कवयित्री नीलेश रघुवंशी का उपन्यास ‘एक कस्बे के नोट्सस्त्री विर्मश के नये द्वार खोलता है. शरद सिंह कस्बाई सीमोन’, कविता मेरा पता कोई और है’ के उपन्यासों में भी स्त्री विर्मश, सह जीवन, प्रेम और सामाजिक संघर्ष के दबाव में भीतर का द्वंद्व अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त हुआ है. इनसे इतर रजनी गुप्त का उपन्यास ‘कुल जमा बीस’ किशोरावस्था पर है और अपने विषय के कारण अहम हो जाता है. स्त्री विर्मश के ‘देह’ अध्याय की महत्वपूर्ण लेखिका बनती जा रही जयश्री राय का उपन्यास ‘औरत जो नदी है’ देह के पार द्वार तक ले जाता है, जहां बेचैनी के आलम का आगाज होता है. मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘शालभंजिका’ उनके ही उपन्यास ‘शिगाफ’ का सा प्रभाव पैदा नहीं करता. एक फिल्मकार नायक को आधार बनाकर लिखे गये इस उपन्यास में खास तरह का आस्वाद जरूर है और आवेग भी. युवा कथाकार प्रियदर्शन मालवीय का उपन्यास ‘घर का आखिरी कमरा’ आजादी के बाद मुसलमानों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति में आ रहे बदलाव को रेखांकित करता है. इसमें युवा बेरोजगार को दोहरा दंश झेलना पड़ता है. इसे उसके मुसलमान होने से भी जोड़ा गया है. सरिता शर्मा की कहानियां कम प्रकाशित हुई हैं, मगर उनका पहला उपन्यास ‘जीने के लिए’ आत्मकथा के ज्यादा नजदीक है. शैलेंद्र सागर का उपन्यास ‘एक सुबह यह भी’ वर्तमान समय और राजनीतिक परिदृश्य पर चोट और व्यंग्य है, और एक गंभीर चिंता भी कि आजादी के इतने सालों बाद भी चीजें नहीं बदली हैं.

उपन्यास की तरह कहानी संग्रह के मामले में भी युवा लेखकों की ही धूम रही. जोश पर अनुभव हावी रहा. विजय मोहन सिंह का ‘चाय की प्याली में गेंद’, कृष्ण बिहारी का ‘बाय-बाय’, क्षितिज शर्मा का ‘ढाक के तीन पात’, राजी सेठ का ‘रुको इंतजार हुसैन’, लता शर्मा का ‘देवता बोलते नहीं’, रोहिणी अग्रवाल का ‘आओ मां परी हो जाएं’, जितेन ठाकुर का ‘एक रात का तिलिस्म’ और अनंत कुमार सिंह के ‘ब्रेकिंग न्यूज’ को छोड़ दें तो युवा कथाकारों के संग्रह ही आलोकित विवेचित होते रहे. इस साल अधिकतर युवा कथाकारों के दूसरे-तीसरे कथा संग्रह आये हैं. मगर यहां खुश नहीं हुआ जा सकता कि उन्होंने अपने पिछले संग्रह से इतर इस नये संग्रह में लेखकीय विकास को रेखांकित किया है. आमतौर पर दूसरे-तीसरे कथा संग्रह पर किसी लेखक को ‘ग्रेस’ नहीं मिलना चाहिए. गीतांजलि श्री के संग्रह ‘यहां हाथी रहते थे’ में ‘अनुगूंज’ वाली गूंज नहीं है, न ही मनीषा कुलश्रेष्ठ के ‘गंधर्व गाथा’ में उनका पहले संग्रह वाला लोक तत्व. यही बात चंदन पांडेय के ‘इश्क फरेब’ और नीलाक्षी सिंह के ‘जिनकी मुट्ठियों में सुराख है’ पर भी लागू होती है. नीलाक्षी सिंह की इधर की कहानियां पढ.कर यह आभास होता है कि जैसे वे अपना श्रेष्ठ दे चुकी हैं. अल्पना मिश्र का ‘कब्र भी कैद और जंजीरें भी’ उनका तीसरा कहानी संग्रह है. अल्पना मिश्र की कहानियां उत्पीड़न के खिलाफ मानवीय आंदोलन का पक्ष रखती हैं. पंकज सुबीर महुआ घटवारिन’ में लोक को आधुनिकता के रेशों से जोड़ने का कमाल करते हैं. रवि बुले के संग्रह ‘यूं न होता तो क्या होता?’ में उनकी सिग्नेचर ट्यून मौजूद है. दो युवा कथाकारों राजीव कुमार का ‘तेजाब’ और श्रीकांत दुबे का कहानी संग्रह ‘पूर्वज’ संभावनाएं जगाता है. युवा कहानीकारों में अलग राह पकड़ने वाले राजीव कुमार की कहानियां सामाजिक-राजनीतिक चेतना से संपृक्त हैं. यहां युवा वर्ग का अकेलापन और उसके संघर्ष हैं  अनंत सिंह के ‘ब्रेकिंग न्यूज’ संग्रह की कहानियां समाज के भित्र संदभरें को व्याख्यायित करती हैं. कैसे शहरों का रोग गांवों को भी लग गया है और संवेदनशील अनैतिकता बाजार की आंधी में सब कुछ नष्ट कर रही है. अजय नावरिया के कहानी संग्रह ‘सर सर’ में दलित चिंताएं हैं-अपने सामाजिक संदर्भ में दलितों की मानसिक यंत्रणा का साक्षात्कार इन कहानियों में होता है.

इस वर्ष हिंदी में अनूदित होकर कुछ उपन्यास भी आये, जिन्हें पाठकों की प्रशंसा मिली है. साहित्य अकादमी से प्रकाशित जुवान मैनुवल मार्कोस के उपन्यास ‘गुंतेर की सर्दियां’ का अनुवाद प्रभाती नौटियाल ने किया है. वहीं ‘सिमोन दि बोउवार’ की ‘वेरी इजी डेथ’ का इसी नाम से गरिमा श्रीवास्तव ने अनुवाद किया है, जो स्वराज प्रकाशन ने छापी है. ‘वेरी इजी डेथ’ की कहानी मृत्यु शैय्या पर पड़ी उस मामन की कथा है, जो वृद्ध है और चाहती है कि अपनी बीमारी से निजात पाकर नये सिरे से जीवन का आगाज करे.

कुल मिलाकर इस वर्ष कथा साहित्य का परिदृश्य भरा-पूरा है. कहानी उपन्यास खूब लिखे जा रहे हैं, वे छप भी रहे हैं. मगर बात वहीं आकर फंस जाती है कि साहित्य में कोई नयी लकीर नहीं खींची जा रही है. काल के भाल पर कोई रचना आखिर अमिट निशान क्यों नहीं छोड़ पा रही है?

प्रभात खबर, २३ दिसम्बर २०१२ , रविवार से साभार

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