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औरत को अगर मुक्ति चाहिए तो उसे जोखिम उठाना पड़ेगा - रमणिका गुप्ता

हाशिये उलांधती औरत के तीन खंडों का लोकार्पण

12 सितम्बर 2013,  साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली - पंकज शर्मा की रिपोर्ट

रमणिका गुप्ता जिस तेवर के साथ किसी जमाने में झारखंड के कोयला खदानों में मजदूरों के हक की आवाज माफियाओं से लड़ते हुए उठाई थी, उसी तरह आज 40 भाषाओं में लिखी गई स्त्री संघर्ष की कहानियों को सामने ला रही हैं। इसके लिए वह धन्यवाद की पात्र हैं। यह बातें माकपा नेत्री वृंदा करात ने आज 11 सितंबर को रमणिका फाउंडेशन की 40 भाषाओं की स्त्री विमर्श से संबंधित महत्त्वाकांक्षी कथा श्रंखला हाशिये उलांघती औरत के तीन खंडों का लोकार्पण करते हुए कहीं। यह कार्यक्रम साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में संपन्न हुआ। श्रीमती करात ने कहा कि इन संकलनों ने महिलाओं की पीड़ा और अनुभव को संकलित कर संघर्ष की सृजनशीलता को सामने लाने का काम किया है।


      हिन्दी की सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में एक वर्ष के अंदर इतनी सारी कहानी को संकलित किए जाने को अदभुत बताया। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श और उसके संघर्ष को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। दुनिया की अलग-अलग जगहों पर स्त्री संघर्ष के अलग-अलग शेड्स हैं। पुरुष के प्रति पूर्वाग्रह के जरिए स्त्री विमर्श उचित नहीं है।

      फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने इस कथा श्रृंखला की योजना के प्रष्फुटन और विकास यात्रा के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि एक टीम के तहत अनामिका, अर्चना वर्मा, सबीहा जैदी, हेमलता महेश्वर, कंचन शर्मा, शीबा फहमी और विपिन चौधरी के सहयोग से इस परियोजना पर काम किया गया और आज 22 भाषाओं की कहानियां फाउंडेशन के पास आ चुकी हैं। जिसमें तेलगू, मराठी, गुजराती, पंजाबी और पूर्वोत्तर की कहानियों के संकलन अब छपने के लिए तैयार हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि आज औरत बोलने लगी है। न कहने का उसमें साहस आ चुका है। औरत को अगर मुक्ति चाहिए तो उसे जोखिम उठाना पड़ेगा।


     हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने कहा कि सेक्स स्त्री जीवन का दमनकारी तत्व है इसलिए वह उसकी मुक्ति का साधन भी हो सकता है। स्त्री पुरुष का युग्म ही समाज की इकाई है। इस युग्म के बिना समाज परिवर्तन नहीं हो सकता।


     अर्चना वर्मा ने इस श्रृंखला की तैयारी के अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन 40 भाषाओं की कहानियों को संकलित किया गया है उनमें कई भाषाएं तो ऐसी हैं जिनकी रचना पहली बार सामने आई है।

     पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारतीय स्त्री विमर्श के राजनैतिक संदर्भ पर सवाल उठाने वालों के लिए जवाब हैं ये संकलन। उन्होंने कहा कि हिन्दी में जब स्त्री विमर्श की चर्चा करते हैं तो विकृत खबरों को सिर्फ दरिंदगी का पर्याय नहीं बल्कि स्त्री संघर्ष को दमन करने वाला पुरुषवादी प्रयास माना जाना चाहिए।

     अनामिका जी ने संकलन की कई कहानियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए स्त्री की भाषा, तेवर, कथ्य और शिल्प के बदलावों को रेखांकित किया।

     मैत्रेयी पुष्पा ने अपने वक्तव्य में कहा कि यदि यह संकलन नहीं आता तो मैं सुभद्रा कुमारी चौहान या महादेवी वर्मा की कहानी कभी नहीं पढ़ पाती। उन्हें पढ़ने पर यही लगा कि उनके जमाने में भी वही आग थी जो आज है।

     विपिन चौधरी ने कहा कि स्त्रियों के मानवीय अधिकारों को लेकर बहुत सारी बातें इस संकलन की कहानियों के जरिए सामने आई हैं।

     कार्यक्रम का संचालन चर्चित कथाकार अजय नावरिया ने किया। कार्यक्रम में शब्दांकन के संपादक भरत तिवारी, सविता सिंह, सुमन केशरी, अशोक गुप्ता, ज्योति कुमारी, रेणु यादव, अनिता भारती, शिवराज बेचैन, तेज सिंह, देवेंद्र गौतम तथा अनेक बुद्धिजीवी, और बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी व विद्यार्थी उपस्थित थे।

Vipin Choudhary, Anamika, Nirmala Jain, Sameer Srivastava, Rajendra Yadav, Maitreyi Pushpa, Ajay Navaria, Ramnika Gupta, Pankaj Sharmai, Archana Verma, Shabdankan, Rati Agnihotri, Sayeed Ayub, Suman Keshrai, Bharat Tiwari, Sahitya Akadami, Vrinda Karat, Purushottam Agrwal

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