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पोलम-पोल " सर्वे की कसौटी पर खबरिया चैनल - अनंत विजय : Exit Poll and News Channels - Anant Vijay

मई 15, 2014
कई ऐसी एजेंसियां भी मैदान में आ गई हैं जो अपना सर्वे मुफ्त में न्यूज चैनलों के मुहैया करवाती हैं और उनकी एकमात्र शर्त होती है कि उनके नतीजों को बगैर किसी फेरबदल के प्रसारित किया जाए । अब इसके पीछे का मोटिव तो साफ तौर पर समझा जा सकता है ।
लगता है कि न्यूज चैनल यह मानकर बैठे हैं कि जनमानस की स्मृति कमजोर होती है और उसे दो हजार चार और दो हजार नौ के सर्वे याद नहीं हैं । लिहाजा सटीक और विश्वसनीय का डंका पीटने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है । 

लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की वोटिंग खत्म होने के साथ ही देशभर के तमाम खबरिया चैनलों पर एक्जिट पोल या पोस्ट पोल के नतीजे आने शुरू हो गए । अलग-अलग चैनल तो अलग-अलग सर्वे करनेवाली एजेंसियां और अलग-अलग नतीजे । हर चैनल अपने अपने विषेशज्ञों की राय से इस या उस गठबंधन को चुनाव बाद मिलनेवाली संभावित सीटों का एलान कर चुका है । अमूनन हर चैनल भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन को बहमुत देता नजर आ रहा है । अपवाद के तौर पर एक न्यूज चैनल है जो एनडीए को तकरीबन ढाई सौ सीट दे रहा है । लेकिन इसके उलट एक और चैनल एनडीए को साढे तीन सौ सीटें देने पर तुला हुआ है । तुर्रा यह कि हर चैनल अपने सर्वे के सबसे सटीक और सबसे विश्वसनीय होने का दावा भी करता चल रहा है । लगता है कि न्यूज चैनल यह मानकर बैठे हैं कि जनमानस की स्मृति कमजोर होती है और उसे दो हजार चार और दो हजार नौ के सर्वे याद नहीं हैं । लिहाजा सटीक और विश्वसनीय का डंका पीटने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है । उन्हें यह भी याद नहीं है पिछले दो लोकसभा चुनाव के दौरान तमाम एक्जिट पोल के नतीजे धरे रह हए थे । दो हजार चार के लोकसभा चुनाव के दौरान देश में फील गुड का वातावरण तैयार किया गया था । ऐसा माहौल था कि देश उन्नति के पथ पर तेजी से दौड़ रहा है और देश की इस तीव्र उन्नति का फायदा जनता को हो रहा है । अर्थवय्वस्था भी दहाई के आंकड़ें को छूने को बेताव दिख रही थी । इन तीव्रताओं और बेताबियों का भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने भी फायदा उठाना तय किया, लिहाजा तय समय से पहले लोकसभा चुनाव का एलान कर दिया गया । फील गुड फैक्टर और शाइनिंग इंडिया की पृष्ठभूमि में देश में चुनाव होने लगे । एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी जैसा तपा-तपाया नेता, जिसके ओजस्वी भाषण की जनता दीवानी थी । लोग घंटों तक उनके भाषणों का इंतजार करते थे । दूसरी तरफ उन्नीस सौ छियानवे के बाद देश की सत्ता से बाहर कांग्रेस । वही कांग्रेस जिसके बारे में नब्बे के दशक के अंत में राजनीतिक पंडितों ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि उसका अंत हो गया है । वही कांग्रेस जिसने सीताराम केसरी के पार्टी अध्यक्ष रहते विभाजन और नेताओं का पलायन दोनों झेला था। बाद में सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी अपने आपको मजबूत करने की कोशिश कर रही थी । उस वक्त कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार हो चुकी थी । वाजपेयी जी बनाम सोनिया गांधी के इस जंग में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पलड़ा भारी दिख रहा था । दो हजार चार के चुनाव के बाद न्यूज चैनलों से सर्वे दिखाने शुरू कर दिए थे । कमोबेश सभी सर्वे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में वापसी करता दिख रहा था । न्यूज चैनलों और अखबारों के सर्वे में एनडीए को दो सौ नब्बे तक सीटें दी गई थी । कुछ चैनलों ने थोड़ी सावधानी बरतते हुए ढाई सौ सीटें दी थी लेकिन इससे कम कोई भी नहीं गया था । इन्ही न्यूज चैनलों और अखबारों ने कांग्रेस को सहयोगियों के साथ एक सौ उनहत्तर से लेकर दो सौ पांच सीटें दी थी । दो हजार चार में जब मतगणना शुरू हुआ था तो ट्रेड मिल पर दौड़ते हुए स्वर्गीय प्रमोद महाजन का फुटेज और वहीं से दिया गया इंटरव्यू लोगों का अब भी याद है । उन्होंने सुबह-सुबह सुबह दावा किया था कि एनडीए की सत्ता में वापसी हो रही है । उनके अति आत्मविश्वास का कारण पिछले दो-तीन दिनों से दिखाए जा रहे एक्जिट पोल के नतीजे थे । लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया तस्वीर बदलती चली गई और एनडीए एक सौ नवासी और कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ दो सौ बाइस के आंकड़े तक पहुंच गया । तमाम एक्जिट पोल के नतीजे धरे के धरे रह गए । सभी सर्वे और भविष्यवाणी बेमानी साबित हुए थे । तकरीबन यही हाल दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के नतीजों के वक्त हुआ था । तमाम खबरिया चैनल और अखबारों ने दोनों गठबंधन को लगभग बराबर-बराबर सीटें मिलने का अनुमान लगाते हुए सर्व दिखाए थे । यह अवश्य था कि सभी सर्वे में यूपीए को ज्यादा सीटें दी गई थी । लेकिन तब भी नतीजे तो गलत ही साबित हुए थे । एनडीए की सीटें एक सौ उनसठतक सिमट गई तो यूपीए दो सौ बासठ तक जा पहुंची । यहां एक बार फिर से इन सर्वे और एक्जिट पोल के नतीजों पर सवाल खड़े हुए थे ।

          इस बार के लोकसभा चुनाव खत्म होने और वोटों की गिनती के बीच तमाम न्यूज चैनलों पर आए इन सर्वे को देखने के बाद यह लगता है कि पूरे देश में बीजेपी या ज्यादा सटीक तरीके से कहें तो नरेन्द्र मोदी की लहर है । इन खबरिया चैनलों के सर्वे के मुताबिक मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी एक बार फिर रायसीना हिल पर कब्जा जमाने जा रही है वहीं दस साल तक रायसीना हिल्स पर राज करनेवाली कांग्रेस आजादी के बाद के सबसे बुरे दौर से गुजरती दिख रही है । इन चुनाव बाद सर्वे के नतीजों से तो यही लगता है कि कांग्रेस इस चुनाव में अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन करने जा रही है । इन सर्वे में एक और बात जो रेखांकित करने योग्य है वह यह कि अलग-अलग चैनलों पर इस सर्वे का सैंपल साइज अलग-अलग है । अबतक दिखाए गए सभी सर्वे में सैंपल साइज बहुत ज्यादा बड़ा नहीं है । सैंपल साइज का आकार उतना महत्व नहीं रखता है लेकिन इसमें सबसे जरूरी यह होता है कि उसमें किन लोगों की नुमाइंदगी है । भारत में जब भी चुनाव होता है तो उसमें जाति और धर्म की अहम भूमिका होती है । इसलिए अगर सैंपल साइज में इस फैक्टर को नजरअंदाज कर दिया जाता है तो उसके गलत होने का खतरा बढ़ जाता है । इसी तरह से अगर सैंपल साइज बीस बाइस हजार का भी है और उसमें ग्रामीण और शहरी वोटरों का अनुपात गड़बड़ाता है तो नतीजों पर असर पड़ता है ।

          भारत में चुनावी सर्वेक्षण बहुत पुरानी अवधारणा नहीं है । पश्चिम में यह अवधारणा बहुत पुरानी है और वहां इस वजह से सटीक होती है कि आबादी कम है और जाति धर्म संप्रदाय का ज्यादा झोल नहीं है ।  कई देशों में तो दो दलीय व्यवस्था होने से भी सर्वे के गलत होने के चांस कम होते हैं । भारत में यह अवधारणा साठ के दशक में आई जब उन्नीस सौ साठ के चुनाव में पहली बार दिल्ली की एक संस्था मे सर्वे किए थे । लेकिन इक्कीसवीं सदी के एन पहले जब भारत का आकाश प्राइवेट न्यूज चैनलों के लिए खुला तो फिर इस तरह के सर्वे की मांग बढ़ गई । हाल के दिनों में जिस तरह से न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गई उसके बाद तो चुनाव के दौरान सर्वे की भी सुनामी आ गई । कई छोटी बड़ी एजेंसियां सर्वे के इस मैदान में उतर गई । जब मांग बढ़ी को सर्वे में एक तरह का खेल भी शुरू हुआ । हाल ही में सरवे करनेवाली एक एजेंसी के कुछ लोग कैमरे पर इस खेल को स्वीकारते नजर आए थे । कई ऐसी एजेंसियां भी मैदान में आ गई हैं जो अपना सर्वे मुफ्त में न्यूज चैनलों के मुहैया करवाती हैं और उनकी एकमात्र शर्त होती है कि उनके नतीजों को बगैर किसी फेरबदल के प्रसारित किया जाए । अब इसके पीछे का मोटिव तो साफ तौर पर समझा जा सकता है । इस बार के चुनाव नतीजों में कांग्रेस, बीजेपी और अन्य दलों के साथ साथ मीडिया की साख का भी फैसला होना है । राजनीतिक दलों के भविष्य के साथ साथ मीडिया के भविष्य का फैसला भी होगा ।

अनंत विजय

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