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गर्व से कहो हम फासिस्ट हैं - संजय सहाय (संपादक हंस) Say it proudly we are fascist - Sanjay Sahay (Editor Hans)

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गर्व से कहो हम फासिस्ट हैं

संजय सहाय


1921 में नेशनल फासिस्ट पार्टी (पीएनएफ) के जन्म के साथ ही इटली में फासिज्म का उदय हुआ. इस नए राजनीतिक विचार का अंकुरण प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हो चुका था. यह सर्वसत्तावादी कट्टर राष्ट्रवाद की राजनीति पर आधारित पार्टी थी, जिसका उद्देश्य पूरी तरह से दक्षिणपंथी था, किंतु जिसकी राजनैतिक शैली वामपंथी तत्त्वों से प्रभावित थी.

          फासीज़ प्राचीन रोम के पहले की इट्रस्कन सभ्यता का चिह्न था, जिसे रोम ने दंडाधिकार के प्रतीक के रूप में अपना लिया था. रोमन फासीज़ बर्च या एल्म की लकड़ी से बने पाँच-पाँच फीट के डंडों का गट्ठर होता था, जो समूह की शक्ति का प्रतीक था. गट्ठर को लाल रंग के चमड़े के फ़ीतों से कसा जाता था, और ऊपर एक कुल्हाड़ी या फरसे का फल भी बाँध दिया जाता था. कुल्हाड़ी दंडाधिकारी के मृत्युदंड अथवा जीवनदान देने के अधिकारों को इंगित करती थी. फासीज़ के चिह्न का इस्तेमाल इटली में भिन्न राजनैतिक समूह पहले भी करते रहे थे. वे उसे ‘फासियो’ कहते थे, जिसका अर्थ लीग्स अथवा संघ है.


       अमेरिका में भी फासीज़ का इस्तेमाल अनेक राजकीय व न्यायिक चिह्नों में होता रहा है. 1870 के उपरांत फ्रेंच रिपब्लिक ने भी अपनी राजकीय मुहर में इसका इस्तेमाल किया. आज भी इसका इस्तेमाल फ्रांस में गैरआधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय चिन्ह में होता है. फासिस्ट पार्टी के बेनिटो मुसोलिनी ने फासीज़ का फासिज़्म के मूल चिह्न के रूप में उपयोग किया. इतालवी फासिज़्म की जड़ें वहाँ के राष्ट्रवाद में थीं. पीएनएफ का घोषणापत्र था कि यह पार्टी राष्ट्रसेवा को समर्पित एक क्रांतिकारी मिलीशिया (जनसेना) है, जिसकी नीतियाँ तीन उद्देश्यों के लिए हैं- व्यवस्था, अनुशासन और वर्गीकरण. यह बात दीग़र है कि अनुशासन के नाम पर अराजकता फैलाने में मौत का काला प्रतीक धारण किए मुसोलिनी के ‘ब्लैक शर्ट्स’ गैंग के सदस्य सबसे आगे रहे. इस नवोदित इतालवी फासिज़्म ने स्वयं को प्राचीन रोमन साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया और प्राचीन रोम तथा रेनेसांस काल के रोम के बाद स्वयं को तीसरे रोमन साम्राज्य के रूप में प्रचारित किया. बेनिटो मुसोलिनी जूलियस सीज़र को फासिस्टों का आदर्श मानता था, और आगस्टस सीज़र को साम्राज्य-निर्माण का. 1932 में घोस्ट राइटर जिओवानी जेंतीले ने ‘द डॉक्ट्राइन ऑफ फासिज़्म’ (फासिज़्म का तत्व) लिखी, जो बतौर लेखक बेनिटो मुसोलिनी के नाम से प्रकाशित हुई. यह इतालवी फासिज़्म का निरूपण था. यह डॉक्ट्राइन कहता है ‘फासिस्ट राज्य शक्ति और साम्राज्य का संकल्प है. यह साम्राज्य न केवल सीमाओं, सैन्यबल या व्यापारिक विस्तार की अवधारणा पर आधारित है बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विस्तार पर भी. एक ऐसे साम्राज्य की कल्पना की जा सकती है जहाँ एक राष्ट्र बिना किसी भूभाग को जीते प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से दूसरे राष्ट्रों का मार्गदर्शन तय कर सकता है.’ ज़ाहिर है कि विश्वगुरु बनने की सनक पर हमारा एकाधिकार नहीं रहा है

          प्रथम विश्वयुद्ध में हारे हुए जर्मनी और हवा का रुख देख मित्र शक्तियों के साथ मिल गए विजेता इटली, जिसकी आर्थिक व्यवस्था विजय के बावजूद ध्वंस के कगार पर पहुँच चुकी थी, दोनों में ऐसी परिस्थितियाँ बनती जा रही थीं जहाँ सर्वसत्तावादी, नस्लवादी, कट्टर राष्ट्रवाद को लोकप्रियता मिल सके. वर्साई संधि से ब्रिटेन और फ्रांस अवश्य लाभान्वित हो रहे थे किंतु इटली, जिसने छह लाख सैनिकों को युद्ध में खोया था, की जनता जून 1919 की इस संधि से स्वयं को छला हुआ महसूस कर रही थी और तत्कालीन नेतृत्व को इसके लिए दोषी मान रही थी. उधर हारा हुआ जर्मनी तो इस संधि से अत्यंत आहत था. अन्य सैन्य/ आर्थिक प्रतिबंधों के साथ-साथ जर्मनी को युद्ध के लिए जिम्मेदार होने के कारण 132 बिलियन मार्क का जुर्माना भी भरना था. नतीजा था कट्टर राष्ट्रवाद. जर्मनी में 1919 में ही बनी नात्सी पार्टी, जो फासिस्ट सिद्धांतों पर आधारित थी, अडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में 1933 में सत्तासीन हो गई. मुसोलिनी के तीसरे रोमन साम्राज्य की घोषणा की ही तरह इसने भी खुद को तीसरे ‘राइश’ (राज्य/साम्राज्य) के रूप में पेश किया. पहला राइश औटो प्रथम के सन 962 में हुए राज्याभिषेक से लेकर नेपोलियन के युद्धों (1806) तक रहा. दूसरा राइश होहेनत्सोलर्न राजाओं के अंतर्गत औटो वान बिस्मार्क द्वारा एकीकृत किए गए जर्मनी के ‘इंपीरियल चांसलर’ नामित (1871) किए जाने से लेकर वर्साई संधि के पूर्व अंतिम चांसलर फ्रीड्रिक एबर्ट (1918) तक रहा. जर्मन फासिज़्म इतालवी फासिज़्म से इस मामले में थोड़ा भिन्न अवश्य रहा कि जर्मन फासिज़्म में नस्लवाद और आर्यन प्रभुताबोध चरम पर रहा. हालाँकि दोनों फासिस्ट राज्यों का अंत किस तरह हुआ यह किसी से छिपा नहीं है.

          सामान्यत: ऐसी शक्तियों के उदय के लिए आवश्यक है कि पूरा समाज अनेक प्रकार की हीन ग्रंथियों और बोधों से ग्रस्त हो- जैसे, ‘हम सदियों गुलाम रहे’, ‘दूसरों ने हमें लूटा’, ‘हमारे सीधेपन का बेजा लाभ उठाया’, ‘हमारे वर्तमान नेताओं ने हमें ठगा’ आदि-आदि. ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति केंद्रित, सर्वसत्तावादी और कट्टर राष्ट्रवादी शक्तियों का आकर्षण बेपनाह रूप से बढ़ जाता है. बावजूद इसके सावधानी बरतने की घोर आवश्यकता है. हमारे जैसे उदारवादी व्यवस्था के हिमायती लोग तो किसी न किसी तरह वैसे दिन भी काट लेंगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम राष्ट्र के लिए बहुत गंभीर हो सकते हैं. यहाँ यह बताना दिलचस्प है कि 2003 में डॉक्टर लारेंस ब्रिट नाम के सज्जन ने भिन्न फासिस्ट राज्यों (मुसोलिनी, हिटलर, फ्रैंको, सुहार्तो व अन्य लातिनी मुल्कों के तानाशाहों) के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि इन सब फासिस्ट राज्यों के चरित्र में 14 बिंदु समान थे.

  • एक, राष्ट्रवाद का सशक्त प्रचार. 
  • दो, मानवाधिकारों के प्रति धिक्कार (शत्रु व राष्ट्रीय सुरक्षा का भय दिखा लोगों को इस बात के लिए तैयार करना कि खास परिस्थितियों में मानवाधिकारों को अनदेखा किया जा सकता है, और ऐसी स्थिति में शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना से लेकर हत्या तक सब जायज़ है.). 
  • तीन, शत्रु को और बलि के बकरों को चिह्नित करना (ताकि उनके नाम पर अपने समूहों को एकत्रित-उन्मादित किया जा सके कि वे ‘राष्ट्रहित’ में अल्पसंख्यकों, भिन्न नस्लों, उदारवादियों, वामपंथियों, समाजवादियों और उग्रपंथियों को मानवाधिकारों से वंचित रखने में समर्थन दें.). 
  • चौथा, सेना को आवश्यकता से अधिक तरजीह और उसका तुष्टिकरण. 
  • पाँचवाँ, पुरुषवादी वर्चस्व. 
  • छठा, मास मीडिया को येन-केन-प्रकारेण प्रभावित कर उसे अपना पक्षधर बनाना और नियंत्रण में रखना. 
  • सातवाँ, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों पर नकेल कसना. 
  • आठवां, धार्मिकता व सरकार में घालमेल करते रहना (बहुसंख्यकों के धर्म और धार्मिक भावाडंबर का इस्तेमाल कर जनमत को अपने पक्ष में प्रभावित करते रहना). 
  • नौवाँ, कारपोरेट जगत को पूर्ण प्रश्रय देना (चूँकि कारपोरेट जगत से जुड़े उद्योगपतियों/ व्यापारियों द्वारा ही फासिस्ट ताकतें सत्ता में पहुँचाई जाती हैं, तो जाहिर है एक-दूजे के लिए...). 
  • दसवाँ, श्रमिकों की शक्ति को कुचलना. 
  • ग्यारहवाँ, अपराध और दंड के प्रति अतिरिक्त उत्तेजना का माहौल बनाना. 
  • बारहवाँ, पुलिस के पास असीमित दंडात्मक अधिकार देना. 
  • तेरहवाँ, भयानक भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार. 
  • चौदहवाँ, चुनाव जीतने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाना.

          माना कि डॉक्टर ब्रिट कोई बड़े इतिहासकार या शिक्षाविद नहीं हैं, पर कुछेक त्रुटियों के बावजूद उनके बिंदुओं को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता. उपरोक्त बिंदुओं में से अनेक को हम तथाकथित उदारवादी मुल्कों से लेकर भारतवर्ष तक की पूर्ववर्ती सत्ताओं द्वारा समय समय पर आजमाते देखते रहे हैं, पर बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में भारत में बड़ी तादाद में इनका इस्तेमाल किया जाए. इस बात की भी बड़ी संभावना है कि निकट भविष्य में  कतार में खड़े अपने सीनों पर हथेली टिकाए हम जोर-जोर से चीखते नजर आएँ- गर्व से कहो हम फासिस्ट हैं.

('हंस' से साभार)

2 टिप्‍पणियां:

  1. क्या हमारे यहाँ यही 14 बिंदू इस समय भी लागू नहीं हैं ?

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  2. हा हा हैडिंग बाद में पढ़ी वो यही तो कह रही है ।

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