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कैलाश वाजपेयी कविता को रचते नहीं, जीते थे - गिरीश पंकज | Girish Pankaj on Kailash Vajpai

अप्रैल 2, 2015

कैलाश वाजपेयी कविता को रचते नहीं, जीते थे  - गिरीश पंकज | Girish Pankaj on Kailash Vajpai
कैलाश वाजपेयी हिन्दी के उन विरल कवियों में है जो कविता को बुद्धि विलास के लिए नहीं रचते थे वरन जीने के लिए रचते है - गिरीश पंकज

कैलाश वाजपेयी कविता को रचते नहीं, जीते थे -

गिरीश पंकज

कैलाश वाजपेयी नहीं रहे, यह खबर साहित्य जगत को दुखी कर गयी।  मुझे और अधिक दुःख इसलिए भी हुआ कि उनके साथ पांच साल तक अनेक बार मिलने का सुअवसर मिला था. २००८ से २०१२ तक मैं साहित्य अकादमी के परामर्श मंडल का सदस्य था, उस मंडल में दिल्ली से कैलाश वाजपेयी और इंद्रनाथ चौधुरी भी शामिल थे. उसी  परामर्श मंडल में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी सदस्य थे जो अभी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं. जब परामर्श मंडल के चौदह लोगो की सूची मेरे पास पहुँची तो उसमे कैलाश वाजपेयी जी का नाम देख कर बड़ी खुशी  हुयी थी। उनकी कविताएँ 'धर्मयुग' और अन्य पत्रिकाओ में पढ़ता रहता था इसलिए जब उनका नाम परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में नामित देखा तो खुशी स्वाभाविक थी. और सचमुच वो दिन भी आ गया जब वाजपेयी जी से परिचय हुआ. उनका सहज-सरल स्वाभवा सबको अच्छा लगा. वे हमरे साथ अकादमी की बैठको में भी शामिल होने जाते थे . बाद में स्वास्थ्य के कारण केवल दिल्ली में होने वाली बैठको में ही आया करते थे. उनकी उपस्थिति से हम सब प्रसन्न रहते थे क्योंकि वे बीच-बीच में मज़ेदार चुटकियाँ भी लिया करते थे. उन्होंने अपना संग्रह ''हवा में हस्ताक्षर'' मुझे भी दिया था. इसी पुस्तक को साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००९) मिला। हम सबने एकमत हो कर उस संग्रह की अनुशसा की थी. 

वाजपेयी जी के साथ बहुत-सी बातें हुआ करती थी, मगर एक रोचक संस्मरण मुझे याद है जब उनसे मुलाकात हुयी और उनकी सहजता के कारण हम भी कुछ खुले, तो एक बार  माफिया लोगो के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा होने लगी. तब मैंने कहा था, ''आज हालत यह है कि - 

कुर्सी तेरा रूप स्वयं ही काव्य है 
कोई कवि हो जाये सहज सम्भाव्य है''.

मेरी पैरोडी पर वे जोर से हँसे और बोले, "हाँ पंकज . यही हो रहा है.'' मैंने अपना  व्यंग्य संग्रह उन्हें दिया था. उन्होंने संग्रह की तारीफ की तो खुशी हुयी। 

कैलाश वाजपेयी हिन्दी के उन विरल  कवियों में है जो कविता को बुद्धि विलास के लिए नहीं रचते थे वरन जीने के लिए रचते है. उनकी कविता जीवन के नए पाठ पढ़ाती है. दर्शन तो उनकी कविताओं में कूट-कूट कर भरा है. 'तीसरा अँधेरा', 'महास्वप्न का मध्यांतर', 'भविष्य घट रहा है', 'सूफीनामा', और 'हवा में हस्ताक्षर' जैसी कृतियों के रचयिता ने कविता को जीने की कोशिश की. उन्हें मैंने पांच साल में अनेक बार देखा, और निकट से देखा, उनका विशिष्ट पहनावा उनकी खास पहचान था मगर उनका जीवन-दर्शन और विशिष्ट पहचान बनाता था. कविता को उन्होंने देखिये कैसे परिभाषित किया कि,
कविता हर आदमी 
अपनी समझ पर समझता है 
ईश्वर एक कविता है.

कविता को ईश्वर बना देने वाला कवि छोटा कवि नहीं हो सकता, उसकी सोच व्यापक होगी. उनकी कविता में ईश्वर आते है, आध्यात्मिकता आती है. जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य पर विमर्श भी है. उनका ''सूफीनामा'' देखे तो उसमे अनेक कविताए हमे सीधे अध्यात्म की दुनिया तक ले जाती  हैं. ''बंधुआ मजदूर '' शीर्षक कविता जब मैंने देखी तो लगा उन्होंने दुखी मजदूरो पर कुछ लिखा होगा, मगर पढ़ने पर लगा कि ये तो अलौकिक दुनिया में ले गये. कविता में उन्होंने मनुष्य के इस तन को, इस चोले को काल का  मजदूर बताया है। 

ऐसा नहीं है की वाजपेयी केवल गंभीर विमर्श ही करते थे. वे हम सबके साथ बैठते तो मज़ाक भी करते थे  व्यंग्य भी किया करते थे. एक बार उन्होंने ''लन्दन  की डाक मीनार'' पर  छोटी- सुनायी थी. 

ऊंचाई है या मज़ाक
यह कौन इंजीनियरी है 
कि नीचे से ऊपर देखने के लिए 
लेटना ज़रूरी है

उन्होंने बहुत कम लिखा, मगर जो भी लिखा वो साहित्य की कालजयी धरोहर है. उनका एक नाटक भी है '' युवा संन्यासी विवेकानंद''. तीन  निबंध संग्रह भी है. एक प्रबंध काव्य है ''पृथ्वी का कृष्णपक्ष'' उन्होंने पचास साल पहले "आधुनिक हिन्दी कविता में शिल्प'' विषय पर पीएच डी थी. यही  कारण है कि उनकी कवितायात्रा में अपने समय की साहित्य धारा का गंभीर असर हुआ। वे छंद का दामन थाम सकते थे, मगर उन्होंने नयी कविता रास्ता अपनाया लेकिन उन्होंने कविता को अपठित नहीं बनाया। दर्शन के बोझ से लादा नहीं। मैंने एक बार उनसे कहा था, ''आपकी  कविताओ को समझने के लिए मुझे  ''प्राणायाम''  करने की ज़रूरत भी महसूस नहीं होती'', मेरी बात सुनकर वे हँसते हुए बोले,"तमु धन्य हो।" 

सचमुच  वाजपेयी की कविताओ में  दर्शनतत्व होने के  बावजूद सरलता है, तरलता है।  उनकी एक कविता है-"सद्भाव'' . इसकी तारीफ भी मैंने उनसे की थी. कविता देखिये-

शब्द बार-बार हमें
बासी पड़े अर्थ की 
कुब्जा-सतह तक ले जाते हैं 
विचार-घास ढँका दलदल 
विचार हमें तर्क की पेंचदार खाई में 
धक्का दे आते हैं 
खुला आसमान है भाई पड़ोसी।

वाजपेयी जी अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका रचनात्मक अवदान हमें उनकी उपस्थिति का आभास कराता रहेगा।  साहित्य से एक बड़ा कवि उठ गया. समाज से एक निर्मल मन वाला सद्भावी इंसान उठ गया. उनकी रचनो के विश्व के अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुए हैं. इस तरह हम देखे तो उनके काव्य की खुशबू अनेक भाषाओ को महकाती रहेगी। उनको शत-शत नमन. फिलहाल इतना ही, बाद में उनके काव्य-कर्म पर विस्तार से लिखूंगा।

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