सिल की तरह गिरी है स्वतंत्रता... कैलाश वाजपेयी को याद करते मंगलेश डबराल Manglesh Dabral on Kailash Vajpeyi


सिल की तरह गिरी है स्वतंत्रता और पिचक गया है पूरा देश

सन उन्नीस सौ साठ के बाद का दशक भारतीय समाज में आज़ादी, लोकतंत्र और नेहरूयुगीन महास्वप्न से मोहभंग और विरक्ति का दशक माना जाता है 

मंगलेश डबराल

सिल की तरह गिरी है स्वतंत्रता... कैलाश वाजपेयी को याद करते मंगलेश डबराल Maglesh Dabral on Kailash Vajpeyi

यह समाजवादी उम्मीदों, समतामूलक अवधारणाओं और परियोजनाओं की अर्थहीनता के उजागर होने का समय था और समाज में विकल्पों के लिए एक बेचैनी जन्म ले रही थी.
 
इस स्वप्नभंग के भीतर से एक ऐसी कविता पैदा हुई जिसे ‘नई कविता’ से अलग ‘सन साठ के बाद की कविता’ कहा गया और जिसके रचनाकारों— रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह और कैलाश वाजपेयी— ने हिंदी की आधुनिक कविता का व्यक्तित्व निर्मित करने में अहम भूमिका अदा की.

इनमें कैलाश वाजपेयी सबसे छोटे थे, उनका जन्म 1936 में उन्नाव ज़िले में हुआ था, लेकिन उनकी कविता ने आधुनिक भाव-बोध का मुहावरा तभी हासिल कर लिया था जब वे बहुत युवा थे: 

यह अधनंगी शाम और यह भटका हुआ अकेलापन
मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया’.

पहला संग्रह
कैलाश वाजपेयी का पहला कविता संग्रह ‘संक्रांत’ 1964 में प्रकाशित हुआ था जब वे सिर्फ 28 वर्ष के थे. तब तक वे एक अलग तेवर वाले गीतकार के रूप में चर्चित-प्रतिष्ठित हो चुके थे.

चाह अधूरी राह अधूरी
जीने का अरमान अधूरा
शायद इस अधबनी धरा पर
मैं पहला इंसान अधूरा’ 

और

'कुछ मत सोचो दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो' 

सरीखे उनके गीत कवि सम्मेलनों में धूम मचाते थे.

लेकिन वे उस समय के प्रचलित रूमानी, प्रेम और प्रकृति के गीतों से भिन्न एक वैयक्तिक और अस्तित्ववादी भाव-बोध लिए हुए थे और उनमें उनकी परवर्ती कविता के बीज भी छिपे थे.

'संक्रांत' के बाद प्रकाशित संग्रह 'देहांत से हटकर' में वे ऐसे कवि के तौर पर सामने आए जो आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की, अपने समय, समाज, राजनीति और व्यवस्था से नाराज़गी और विरक्ति की कहानी लिख रहा था.

उन्हीं दिनों रघुवीर सहाय का प्रसिद्ध संग्रह ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ भी आया था और इन दोनों संग्रहों को तुलनात्मक रूप से भी परखा जाता था.

विवाद

इसी दौर में कैलाश वाजपेयी की एक कविता ‘राजधानी’ विवाद का विषय बनी जिसमें कहा गया था कि 

‘सिल की तरह गिरी है स्वतंत्रता और पिचक गया है पूरा देश.’

व्यवस्था पर ज़बरदस्त चोट करती इस कविता की कुछ और पंक्तियाँ इस तरह थीं:

‘चरित्र-रिक्त शासक
और संक्रामक सेठों की सड़ांध से भरी
इस नगरी में मैं जी रहा हूँ
जी रहा हूं जीवन की व्याकृति
झूठे नारों और खुशहाल सपनों से लदी
बैलगाड़ियां वर्षों से
‘जनपथ’ पर आ-जा रही हैं...’

यह शायद उस दौर की एकमात्र हिंदी कविता थी जिस पर संसद में भी हंगामा हुआ और कई सदस्यों द्वारा प्रतिबन्ध लगाने की मांग की गई.

इसी दशक में अकविता नामक काव्य आंदोलन भी शुरू हुआ जिसमें वैयक्तिक विद्रोह, परंपरा-भंजन और यौन-कुंठा की आवाजें बहुत मुखर थीं.

कैलाश वाजपेयी सीधे अकविता में शामिल नहीं हुए, लेकिन यह कहना सही होगा कि यौन-अभिव्यक्तियों को छोड़कर अकविता ने अपना भाषाई मुहावरा काफी हद तक कैलाश वाजपेयी की कविता से हासिल किया था.

परास्त बुद्धिजीवी
इसी दौर में उनकी एक और कविता ‘परास्त बुद्धिजीवी का वक्तव्य’ चर्चित हुई, जिसकी एक पंक्ति विचलित करने वाली थी:

‘अब हमें किसी भी व्यवस्था में डाल दो— हम जी जाएंगे.’

कैलाश वाजपेयी ने अस्तित्ववादी दार्शनिकों का अच्छा अध्ययन किया था और आधुनिक विचार पद्धतियों पर ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में उनके लेखों की याद आज भी बहुत से पाठकों को होगी.

कुछ वर्ष मैक्सिको के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाकर लौटने के बाद उनके सफ़र का दूसरा दौर शुरू हुआ और वे भारतीय संत कवियों-संगीतकारों और तत्वाचिन्तकों, जैन-बौद्धवाद, हीनयान सम्प्रदाय, अद्वैत और सूफी दर्शन की ओर मुड़ गए. लेकिन उनकी कोशिश यह थी कि इन दार्शनिक परम्पराओं की मूल प्रस्थापनाओं, उनके सरोकारों और सार-तत्व को ग्रहण करके अपनी एक दार्शनिकता विकसित की जाए.


उनके परवर्ती संग्रह ‘सूफीनामा’, ‘पृथ्वी का कृष्णपक्ष’, ‘भविष्य घट रहा है’ और ‘हवा में हस्ताक्षर’, जिस पर उन्हें सन 2009 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ, इस तलाश के साक्ष्य हैं.

इस कोशिश में उनकी कविता साधारण से उदात्त की ओर, भौतिक से आधिभौतिक की ओर और अस्तित्व से शून्य की ओर यात्रा करती रही.

दार्शनिकता आम तौर पर कविता के लिए घातक मानी जाती है, उसे बोझिल और अपठनीय बना देती है, लेकिन कैलाश वाजपेयी की कविता पेचीदा रहस्यात्मक प्रश्नों से उलझने के बावजूद पठनीय बनी रहती है.

सांप्रदायिकता के धुर विरोधी
बौद्ध मिज़ाज़ की एक कविता में वे कहते हैं:

‘आंख भी न बंद हो
और यह दुनिया आंखों से ओझल हो जाए
कुछ ऐसी तरकीब करना
डूबना तो तय है इसलिए
नाव नहीं, नदी पर भरोसा करना.’

कुल मिलाकर वह एक ऐसी कविता बनी जो मृत्यु और अनस्तित्व के परदे से जीवन और अस्तित्व को देखती है और बाहरी से ज्यादा आतंरिक जीवन का ध्यान करती है.

बौद्ध और सूफी चिंतन की बुनियाद पर कैलाश वाजपेयी एक निजी अध्यात्म की खोज करते रहे और धार्मिकता, उसके पाखंडों-कर्मकांडों, धर्म की राजनीति और सांप्रदायिकता के धुर विरोधी बने रहे.

उनकी परवर्ती कविता सामाजिक सरोकारों और हस्तक्षेप की कमी के कारण नई पीढ़ियों के बीच कुछ कम प्रासंगिक हो चली थी, लेकिन उन्होंने कविता और जीवन में जिस अलग संसार की तामीर की थी, वह आकर्षण का विषय बना रहा.

उनके अंतिम संग्रह का नाम ‘हवा में हस्ताक्षर’ था और उनकी जीवन-दृष्टि भी इसी तात्कालिकता और नश्वरता से बनी थी.

लेकिन हवा में कैलाश वाजपेयी के हस्ताक्षर इसलिए बने रहेंगे कि उन्होंने संवेदना और भाषा के स्तर पर आधुनिक हिंदी कविता को एक नई प्रखरता दी.

मंगलेश डबराल
साभार बीबीसी डॉट कॉम
www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150404_remembering_kailash_vajpayee_poet_dil
nmrk5136

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