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राजेन्द्र यादव हिंदी के आखिरी सार्वजनिक बुद्धिजीवी - अनंत विजय | Rajendra Yadav : The Last Public Intellectual of Hindi

अग॰ 29, 2015

साहित्य स्पांटेनियटि  का गेम है स्पांसरशिप का नहीं - राजेन्द्र यादव

आज अगर समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य में एक अजीब तरह का ठंडापन और वैचारिक सन्नाटा जैसा नजर आता है तो हंस पत्रिका के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव की कमी शिद्दत से महसूस की जाती है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजेन्द्र यादव हिंदी के संभवत आखिरी सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे । साहित्य के अलावा सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर उनकी स्पष्ट राय होती थी जो वो प्रकट भी करते थे । इस बात की परवाह किए बगैर कि उसका अंजाम क्या होगा । अपनी टिप्पणियों की वजह से उनको कई रातें पुलिस सुरक्षा में गुजारनी पड़ी थी । दूसरी बात जिसकी कमी आज महसूस होती है वो है एक सक्रिय साहित्यक संपादक की । राजेन्द्र जी के वक्त हंस पत्रिका में एक धार और उसका तेवर साफ तौर पर दिखता है जो उनके निधन के बाद निस्तेज हो गया है । इसकी भी वजह थी ।
राजेन्द्र यादव लगातार लेखकों के संपर्क में रहते थे, नए और पुराने । ना सिर्फ संपर्क में रहते थे बल्कि उनको उकसाते भी रहते थे । उकसाते थे लेखन के लिए, उकसाते थे साहित्य सवालों से मुठभेड़ करने के लिए । बहुधा इसके लिए उनके विरोधी और प्रसंसक दोनों उनको विवादाचार्य कहा करते थे । इन विशेषणों से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था । कहना ना होगा कि यह उनके लगातार संवाद का नतीजा था कि हंस पत्रिका को वो इतने लंबे समय तक निकालने और पाठकों का पहला पयार बनाने में सफल रहे । राजेन्द्र जी के अलावा ये गुण रवीन्द्र कालिया में भी है । वो भी लेखकों से लगातार संवाद बनाए रखते थे और उसका नतीजा उनके संपादन में निकले ज्ञानोदय के अंकों में दिखता भी था । खासकर साहित्य के संपादकों के लिए यह जरूरी है कि वो अपने लेखकों के संपर्क में रहें और किस लेखक से क्या लिखवाना है इस बारे में उनका विजन साफ रहे । राजेन्द्र यादव के निधन के बाद इसका अभाव साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है ।

राजेन्द्र यादव एक और बात कहा करते थे – साहित्य स्पांटेनियटि ( स्वत:स्फूर्त ) का गेम है स्पांसरशिप का नहीं । राजेन्द्र जी के हंस संपादक रहते वहां भी स्पांटेनियटि और स्पांसरशिप का गेम दिखता था, लेकिन उसका अनुपात दाल में नमक की तरह होता था । इन दिनों तो स्पांटेनियटि पर पूरी तरह से स्पांसरशिप साहित्य जगत पर हावी हो गई है, नमक में दाल की तरह । लेखकों पर मोटे मोटे अंक प्रकाशित हो रहे हैं जो लगभग अभिनंदन ग्रंथ की तरह हैं, भक्तिभाव से सराबोर । आप हमें पुरस्कार दो हम आपको सम्मानित करेंगे । आप सेमिनार में हमें बुलाओ, हम गोष्ठियों में आपको आमंत्रित करेंगे, आदि आदि । सभी जानते हैं कि ये खेल तल रहा है लेकिन कोई भी लेखक इनसब पर कुछ लिखता नहीं है ।  राजेन्द्र यादव होते तो कम से कम अपने संपादकीय में इसका विरोध अवश्य करते । इन दिनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने जिस तरह से साहित्यक और सामाजिक मु्दों पर खामोशी अख्तियार कर ली है वो पूरे साहित्य जगत के लिए ना तो अच्छा संकेत दे रही है और ना ही इससे अच्छा संकेत निकल रहा है । यादव जी के संपादकत्व के दौर की पत्रिका हंस को याद करते हुए इस वक्त के हंस को देखते हुए दुख होता है । यादव जी हमेशा आलोचनानुमा बोझिल लेखों के खिलाफ थे । वो अपने खिलंदड़े अंदाज में कहा करते थे कि यार ! बहुत ज्ञान पेल दिया है, इतना बरदाश्त नहीं हो रहा है । यादव जी की एक और खासियत यह थी कि वो खुद तो नए से नए किताबों के बारे में जानने को उत्सुक रहते ही थे, हिंदी के पाठकों तक उस जानकारी को पहुंचाने के लिए सजग और प्रयत्नशील रहा करते थे । किसी नई किताब की चर्चा करने पर एकदम बच्चे की चरह जिद पर उतारू हो जाते थे कि आज ही भेजो, आज ही मंगवाता हूं आदि आदि । आज अगर यादव जी जीवित होते तो छियासी साल के होते । उनकी स्मृति को नमन ।
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