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निधीश त्यागी: उल्लू आंखों ..तमन्ना |Nidheesh Tyagi - Tamanna

अक्तू॰ 29, 2015

कहानी, बहुत कम ऐसा होता है, मेरे साथ पहले नहीं हुआ कि एक के बाद एक किसी संग्रह की सारी कहानियां दिल में उतरती जाएँ, छोटी कहानियों में सारा संसार समाया हुआ है निधीश त्यागी की 'तमन्ना तुम अब कहां हो' में... आपके लिए उसकी कुछ कहानियां शब्दांकन पर आएँगी, उनमे से एक आज पढ़िए

उल्लू आंखों वाली औरत और उसका सुखी परिवार

तमन्ना तुम अब कहां हो - निधीश त्यागी

सुखी परिवार का मतलब मेरे लिए एक पोस्टर है जो मैं बचपन से देख रहा हूं। लाल तिकोन के साथ चार गोब्दू चेहरों का एक पोस्टर जो हर सरकारी अस्पताल और सार्वजनिक महत्व की जगह – जहां आप लघुशंका से लेकर पान की पीक से ग्रैफिटी बनाने का अदम्य इच्छा का निवारण कर सकते हैं- शोभा बढ़ा रहा होता है। ये चित्र इस कदर सामान्य है कि कोई इसे गौर से नहीं देखता। पर ये मर्फी रेडियो के बच्चे की तरह हमारी जिंदगी का सबसे आदतन हिस्सों में से एक है। आपने भी शायद इसे गौर से नहीं देखा होगा।


पर कल कोई सुखी परिवार की बात कर रहा था तो मुझे ये तस्वीर याद आई। गूगल इमेजेस पर ढूंढी तो ये तस्वीर ही मिली ब्लैक एंड व्हाइट किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी की प्रोजेक्ट रिपोर्ट से। आपके पास हो तो मुझे जरूर भेजिये। आभारी रहूंगा।

इस तस्वीर को गौर से देखिये। उस आदमी को याद करिये, जो शक्ल से बेवकूफ था, जिसका कोई कैरेक्टर नहीं था और आसपास से बेपरवाह। उसमें खुश होने की एक अजीब जिद थी। जिस नसबंदी के लिए उसे मॉडल बनाया गया था, उसके चेहरे से लगता था कि वह उससे भी बेपरवाह था। उसमें एक विलक्षण यकीन था कि सरकार सिर्फ उसके भले के अलावा और कुछ नहीं सोच रही। उसके मन में विश्वास था, कि सुखी परिवार के उद्देश्य से ज्यादा वह राष्ट्रीय हित और बीस सूत्रीय कार्यक्रम के लिए ऐसा कर रहा था। देश के लिए जिस तरह के बलिदान लिये या दिये जाते हैं, उसके मुकाबले ये कुछ नहीं था। उस तस्वीर को याद कर मैं सोचता हूं कि ये आदमी क्या काम करता होगा, तो कोई जवाब नहीं सूझता, पर बाद में वह इफको खाद के बोरों और विज्ञापन में फिर दिखलाई पड़ा। क्या वह कृषि प्रधान देश का किसान था, जिसे सब लोग विकास के नाम पर ठग रहे थे। आढ़तिया, पटवारी, अफसर, गुंडे, पुलिस, खाद-बीज के व्यापारी, मेले की छमिया, जमींदार के लठैत। अगर ऐसा था तो उसके चेहरे से इतनी खुशी कैसे टपक रही थी। उसके चेहरे को देखकर नहीं लगता कि उसे कुछ मतलब रहा होगा दुनियादारी, खुशी, ऐंद्रिकता, सैक्स, शराब, साहित्य और कविता से मतलब होगा। वह किसी भजन मंडली के उत्साही सदस्य की तरह दीखता है।


उसके साथ जो औरत थी, वह बहुत भैन जी टाइप की थी और उनके मूर्ख चेहरे की आंखें उल्लू जैसी थी। उसके चेहरे पर भी सरकार को लेकर भारी आस्था और यकीन पढ़ा जा सकता था। वे सोवियत जनता की तरह थी, जो जहालत के नरक में सड़ने और पकने के बावजूद व्लादिमिर इलिच और जोसेफ पर अटूट यकीन रखती थीं। वह एक प्री ब्यूटी पार्लर जमाने की कस्बाई औरत लगती थी, जिसने चेहरे पर एक मैकेनिकल मुस्कुराहट पहनी हुई है, और कानों में झुमके। जो मुसीबत के वक्त साहूकार के पास गिरवी रखने वाले जेवरात टाइप की है। पर वह परिवार छोटा है, इसलिए सुखी है और शायद ऐसी नौबत नहीं आएगी, ऐसा पोस्टर बनाने का फरमान करने वाली विकासशील देश की सरकार का मानना था। वह आज दोपहर में किटी पार्टी कर रही होगी और शाम को टीवी देख रही होगी। उसके हाथों ने देखा होगा गोबर थापने से लेकर ब्यूटी पार्लर में मैनीक्योर तक का सफर। पर नसबंदी के ऐवज में सरकार जो उन दिनों रेडियो बांट रही थी, उसमें इस औरत की दिलचस्पी जरूर रही होगी, ऐसा इसके डिजाइन को देखकर लगता है।


उनको देखकर लगता था, उनका कोई चरित्र नहीं हैं। मतलब ये नहीं वे चरित्रहीन हैं। चरित्ररिक्त। उनका जो व्यक्तित्व है, उसमें कोई चरित्र की गुंजाइश नहीं है। श्रीकांत वर्मा की एक कहानी में एक चरित्र बताता है कि मूर्ख औरतों के चेहरे बर्थडे केक की तरह होते हैं और मूर्ख मर्दों के मक्खन के लोंदे की तरह। ये दोनों शायद श्रीकांत की उपमा पर सटीक बैठते हैं।

उनके बच्चे भी हैं। वे सुबह जल्दी उठने वाले, बालों में तेल चुपड़ कर, समय पर होमवर्क, खड़े होकर राष्ट्रगान, कान में तिनका और नाक में उंगली न डालने वाले बच्चे हैं। वे जल्दी इसलिए सोते हैं, ताकि जल्दी उठ सकें ताकि सेहतमंद, अमीर और होशियार बन सकें। वे गंदी सोहबत में नहीं पड़ते। वे बचपन की गलतियों का खामियाजा जवानी में सैक्सोलॉजिस्ट्स के पास जाकर नहीं भुगतते। उन्हें अपने पहाड़े और प्रार्थनाएं और मैनर्स याद हैं। वे क्लास में सबसे आगे बैठते हैं, हर सवाल का जवाब देने के लिए अपने हाथ खड़े करते हैं, उनके कपड़े साफ हैं और नाखून कटे हुए। वे सुखी परिवार के बच्चे हैं।



निधीश त्यागी ने हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती बाजार में 7 शहरों में काम किया है। 17 साल प्रमुख अखबारों  के संपादक रह चुके निधीश ने चंडीगढ़, अहमदाबाद, बड़ौदा और पुणे से बड़े अखबारों की शुरूआत की है। पांच साल पहले प्रिंट से डिजिटल में आने के बाद  वर्तमान में वो दिल्ली में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में संपादक, बीबीसी हिंदी हैं। एक बेहतरीन इंसान और दोस्त निधीश एक उच्च कोटि के लेखक, कवि और खाद्य-विचारक भी हैं।
ईमेल: nidheesh.tyagi@bbc.co.uk

ये एक निहायत ही घटिया डिजाइन है। जो संजय गांधी जैसे संविधानेतर सत्ता ने एक प्रकार की लोकतांत्रक तानाशाही के दौरान जनता को सुखी परिवार की परिकल्पना में था। सुखी वही जो संजय की समझ में आए। परिवार सुखी हो या न हो, पर सरकार ने तय कर दिया न, तुम सुखी हो। तो हो। जैसे गरीबी रेखा तय होती है। जैसे तय होता है कि कि तुम अपना चरित्र तुम्हें हीन ग्रंथियों से शिकार होने से नहीं रोक सकेगा, इसलिए सुखी होने का फॉरमूला चरित्र रिक्तता से होता है। न तो ये आदमी संजय गांधी है, न ये औरत मेनका और न ये बच्चा वरुण। क्या वह परिवार सुखी था।

क्या परिवार के छोटे होने पर सुखी होने की शर्त थोप दी गई ? क्या इस डिजाइन बनाने वाले ने बाद में आत्महत्या की ? क्या वह सुखी हो सका ? क्या उसे इफ्को में नौकरी मिली ? क्या बारिश की एक ठंडी रात उस किसान को अपनी हरित क्रांति के बीच अपनी पत्नी के सहवास करते वक्त ये लाल तिकोन याद रहा ? क्या संजय गांधी इन दोनों के बीच आ सका ? क्या वे रेडियो जो सरकार ने उस बार बांटे थे, आज भी खुश होकर सुखी परिवारों में बज रहे हैं ?

मुझे पक्का नहीं पता। 
००००००००००००००००

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