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प्रीतिश नन्दी: यह महज असहिष्णुता नहीं है - | Intolerance - Pritish Nandy

नव॰ 27, 2015

जी नहीं, यह महज असहिष्णुता नहीं है

प्रीतिश नन्दी

 (अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद: भरत तिवारी)

पिछले इतवार को भारत के बेहतरीन कवि जयंत महापात्रा ने अपना पद्म श्री लौटा दिया । सम्मान लौटाने के जो कारण उन्होंने अपने पत्र में भारत के राष्ट्रपति को लिखे वो कमोबेश वैसे ही थे जैसे बाकी कवियों, फिल्म निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के थे । अब कोई तीन दशक हो गए मुझे जयंत को जानते हुए । मैंने उनकी पहली किताब छपवाई थी जब वो प्रकाशक की तलाश में परेशान थे । और ये सम्मान तो मैं दे सकता हूँ : उनके अन्दर लेशमात्र भी राजनीति नहीं है । वो कभी पहचान के पीछे गए ही नहीं इसीलिए उन्हें पहचान मिली भी देर से ।

अपना सम्मान लौटाते समय उन्होंने देश में बढती ‘मोरल एईसिमिट्री’ (नैतिक विषमता) पर कुछ लिखा है । मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आया कि वो क्या कहना चाह रहे हैं (कवियों की अपनी ही भाषा, अपनी ही बोली होती है) लेकिन यह पढ़ कर मैं संवेदित हो जाता हूँ जब वो इसे एक निजी प्रकृति का महत्वहीन कदम बताते हुए लिखते हैं कि इसे देश को अपमान पहुंचाने की कोशिश न समझा जाये । उन्होंने ऐसा शायद इसलिए कहा क्योंकि माहौल बिगाड़ने वाले इसको राजनीति से जोड़कर कह रहे हैं कि यह सब मौजूदा शासन को शर्मसार करने के इरादे से किया जा रहा है । कुछ लोगों की ऐसी मंशा हो भी सकती है, सम्मान वापस करने वालों में से जितनों को मैं जानता हूँ, वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मौजूदा हालात पर अपनी व्यथा - अपनी पीड़ा प्रकट करने का उन्हें और कोई जरिया नहीं नज़र आ रहा है । ना ही यह मोदी के विरुद्ध है । ये पीड़ा, हमारा देश जिस रास्ते जा रहा है, उसके खिलाफ है । ये पीड़ा एक ख्वाब के मरने के खिलाफ है ।

ये दुर्भाग्य है कि इसे असहिष्णुता के खिलाफ़ लड़ाई कह के मिडिया ने इसका कुछ ज्यादा ही सरलीकरण कर दिया है । असहिष्णुता उन अनेक कारणों में से बस एक कारण है जिनसे आज हमारा रचनात्मक समुदाय व्यथित है । अन्य कारण भी हैं जिनसे बहुत लोग दुःखी हैं । बढ़ती हिंसा, रचनात्मक अभिव्यक्ति का घुंटता गला, बेवकूफी-भरी रोकें, निजी जीवन में राज्य का हस्तक्षेप, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना, तर्कवादी विचारकों की हत्या: ये चिंताओं के कुछ कारण हैं । मुझे नहीं लगता कि इन सारे कारणों को मोदी के मत्थे मढ़ा जा सकता है । लेकिन उनके लिए यह ज़रूरी है कि वो इस पतन को रोकें । एक राज्यपाल जो यह सोचता हो कि हिंदुस्तान सिर्फ हिन्दुओं के लिए है उससे त्यागपत्र लिया जाना चाहिए । कोई मंत्री जो यह सोचता हो कि मुसलमान होने के बावजूद एपीजे अब्दुल कलाम एक अच्छे राष्ट्रपति थे – उसे कलाम का बँगला नहीं तगड़ी झाड़ मिलनी चाहिए । और फिर, बेवजह बडबडाते वो जाने-पहचाने चेहरे तो हैं ही जो हर जगह उत्पात मचाने के लिए हाज़िर रहते हैं । उनको सिर्फ मोदी ही चुप करा सकते हैं ।



यही सब है जो माहौल को दूषित कर रहा है । विचारक दुःखी हैं । नहीं, ये राजनीति नहीं है । ये मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ़ नहीं है । अगर कुछ है तो ये एक नए भारत की आवाज़ है जो ज़बरदस्त शोरगुल के बीच अपने को सुनाने की कोशिश कर रही है । हताशा तब होती है जब ये दिखता है कि पहले की अनुदारता की जगह एक नयी-अनुदारता आ गयी है, जो कुछ मायनों में कहीं अधिक ही क्रूर है । नयी सरकार से हमें यह उम्मीद नहीं थी । सम्मान वापस करने वाले दुःखी, निराश व्यक्ति हैं, उनका दुःख और बढ जाता है क्योंकि उनकी मंशा का गलत अर्थ लगाया जा रहा है ।

मैंने टीवी पर उनमें से कुछ को अपनी बात समझाने में असफल होते देखा है । अपनी निराशा के कारण को सही समझा पाना हमेशा आसान नहीं होता और पत्रकार – टकराव को पकड़ने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं । वो सवाल ही ऐसा पूछते हैं कि बुद्धिजीवी तक उनसे मात खा जाये । ज्यादातर लोगों के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं होता जब उनसे पूछा जाता है कि आपने पहले विरोध क्यों नहीं किया, कांग्रेस के समय, जब इसी तरह की गलत बातें हुईं । आपने तब अपना सम्मान क्यों नहीं वापस किया? ऐसे सवालों का कोई सही जवाब है ही नहीं । एकदम सटीक समय पर विरोध हो ऐसा कम ही होता है । वो बस हो जाता है ।

असल बात ये है : अपने नेताओं से कोई उम्मीद करे हमें बहुत वक़्त हो गया । कांग्रेस ने हमारी सारी उम्मीदों की हत्या कर दी, खासकर के अपनी दूसरे यूपिए कार्यकाल में । वो चुनावी अभियान में मोदी की कही बातों का दम था जिसने हमें उम्मीद दी । बदलाव, असली बदलाव की उम्मीद पर अचानक ही हम भरोसा करने लगे । यही कारण है कि आज हम बहुत अधिक निराश है । बदलाव का जनादेश, उम्मीद का जनादेश भी था । वो उम्मीद आज गलत सिद्ध कर दी गयी है । बस इतना ही है । मोदी का ध्यान रखने वाले इसमें कुछ ज्यादा ही राजनीति ढूंढ रहे हैं ।

अगर यही बात कांग्रेस के समय में हुई होती, कोई इतना पीड़ित न महसूस करता । वे आज पीड़ित हैं क्योंकि उन्होंने मोदी से कहीं बहुत बेहतर की उम्मीद रखी थी । उन्होंने उनसे वादा किया था कि वो भारत को बदल देंगे । उन्होंने उनसे बेवकूफी-भरी रोकों, बेकायदा-हत्यारी-भीड़ का वादा नहीं किया था । उनका वादा आशा और बदलाव का वादा था । इसलिए, उनके ज़हन में, मोदी (ना, भाजपा नहीं) की यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी है की वो सबकुछ व्यवस्थित करें । जब मोदी चुप्पी चुनते हैं या ध्यान नहीं देते (जैसे मनमोहन सिंह किया करते थे) तब लोग और बुरी तरह हताश होते हैं । 



सम्मान वापस करने वाले लोग भेडि़या धसान नहीं हैं जो सामूहिक आत्महत्या करने जा रहे हों । ये 60 लोग, बुद्धिमान लोग, विचारक लोग एक विचार व्यक्त करने की कोशिश कर रहे हैं । यह कोई घिनौनी साजिश नहीं है । ये एक साधारण-सी चेतावनी भर है । अच्छा होगा मोदी के सलाहकार इसे संज्ञान में लें और चुनाव अभियान में मोदी ने जो वादे किये थे उन्हें पूरा करने की आमसहमति बनायें ।

कोई सरकार बदलने की मांग नहीं कर रहा है । (अभी तक तो नहीं ।) हमारी इतनी ही मांग है कि शासन प्रक्रिया की गुणवत्ता में सुधार हो । क्या ये बहुत बड़ी मांग है? मेरे हिसाब से नहीं । इसलिए मेरे सम्मान अभी तक मेरे पास ही हैं ।

(This article was originally published in 'Mumbai Mirror' in English, Bharat Tiwari has made an attempt to translate it to Hindi) 
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