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मृतपत्र का पुनर्जन्म — आरिफा एविस #UttarakhandCrisis @harishrawatcmuk

मार्च 30, 2016

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar, chairman of the Drafting Committee of the Constitution of India, referred to Article 356 as a dead letter of the Constitution
Cartoon courtesy :  Radhakrishnan Prasad

मैं यह उम्मीद करता हूँ कि यह एक ‘मृतपत्र’ है जिसका कभी भी प्रयोग नहीं होगा

— डॉ. बी. आर अम्बेडकर



डॉ. बी. आर अम्बेडकर ने अनुच्छेद 356 के विषय में कहा था कि “मैं यह उम्मीद करता हूँ कि यह एक ‘मृतपत्र’ है जिसका कभी भी प्रयोग नहीं होगा।” लेकिन अफसोस यह है कि भारतीय लोकतान्त्रिक सरकारों ने न सिर्फ इसमें संशोधन किया बल्कि 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद से केन्द्र कि तमाम सरकारों द्वारा इस अनुच्छेद का प्रयोग 100 से भी अधिक बार किया गया है । जिसमें बिहार, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश में तो इसे सात से अधिक बार प्रयोग किया जा चुका है ।

अनुच्छेद 356, केंद्र सरकार को किसी भी राज्य सरकार को बरखास्त करने या राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिकतंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो या केंद्र कि नीतियों को लागू करने में असमर्थ हो । जाहिर है कि इस अनुच्छेद का प्रयोग अधिकतर केंद्र सरकार अपने नफे-नुकसान को देखते समय-समय राज्य सरकारों को राष्ट्रपति द्वारा बरखास्त करती है और इस अनुच्छेद से कोई भी राज्य बच नहीं पाया है । यह केवल अपनी विरोधी राजनैतिक सरकारों को समाप्त करने और अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए लागू किया जाता है। इसका लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है क्योंकि लोकतंत्र और भारतीय लोकतंत्र में जमीन आसमान का अंतर है । आज सच्चे लोकतंत्र को समझने के लिए लोकतंत्र और भारतीय लोकतंत्र में अंतर करना समय की जरूरत है ।

Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar, chairman of the Drafting Committee of the Constitution of India, referred to Article 356 as a dead letter of the Constitution. In the constituent assembly debate it was suggested that Article 356 is liable to be abused for political gains. Dr. Ambedkar replied, "I share the sentiments that such articles will never be called into operation and they would remain a dead letter. If at all they are brought into operation, I hope the President, who is endowed with these powers, will take proper precautions before actually suspending the administration of the provinces. I hope the first thing he will do would be to issue a mere warning to a province that has erred, that things were not happening in the way in which they were intended to happen in the Constitution. If that warning fails, the second thing for him to do will be to order an election allowing the people of the province to settle matters by themselves. It is only when these two remedies fail that he would resort to this article.

उत्तराखंड में भी इसका प्रयोग अपने राजनैतिक विरोधी सरकार को बरखास्त करने के लिए किया गया है । यह अनुच्छेद लोकतंत्र के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के संघीय व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा है । इतिहास गवाह है कि सबसे पहले केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बरखास्त करने के लिए इस अनुच्छेद का प्रयोग किया गया था । जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो उसने भी भाजपा शासित राज्यों में राष्ट्रपति शासन इस बहाने लागू किया कि “राज्य सरकारें धार्मिक संगठनों पर प्रतिबंध लगाने में नाकाम रही है।”

उत्तराखंड विधानसभा में कुल 70 सदस्य हैं । सत्ताधारी कांग्रेस के पास 36 विधायक हैं । इसे तीन निर्दलियों, दो बहुजन समाज पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल का एक विधायक का समर्थन भी हासिल था । लेकिन राज्य में राजनीतिक संकट उस समय पैदा हुआ जब विधानसभा अध्यक्ष ने विधानसभा में वित्तीय विधेयक पारित होने की घोषणा कर दी । मेरा मानना है कि भारत के इतिहास में पहली बार आर्थिक मामले के कारण किसी सरकार को बरखास्त किया गया है । कारण एकदम साफ़ दिखाई दे रहा था कि वित्तीय लूट का बंटवारा ठीक नहीं था वर्ना ये नौबत आती ही नहीं क्योंकि अभी भी भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र में सभी पार्टियां आर्थिक मुद्दों पर एक हैं। उनकी निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण की नीतियां एक हैं बाकि मुद्दों में चाहे दिखने में अलग क्यों न हो.

भाजपा और कांग्रेस के बागी नेता जो दावा कर रहे थे कि उनके मत विभाजन की मांग को अनुमति नहीं मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि उपस्थित बहुसंख्यक सदस्यों द्वारा ध्वनिमत से विधेयक गिराया गया और विधानसभा अध्यक्ष ने हमारी मांग को ठुकरा दिया और इसे पारित घोषित कर दिया। जबकि 35 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पहले से ही पत्र लिखकर कहा था कि हम सब इस विधेयक के खिलाफ मत देंगे लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने इस पर विचार करने से इंकार कर दिया।

असल में उत्तराखंड में जोड़तोड़ करके जो सरकार बनाई गई यह शुरू से ही अल्पमत की सरकार थी। जिसे कभी भी गिराया जा सकता था जिसे बहुमत में बदलने के लिए धनबल, भू माफिया और धनिकों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कभी भी किया जा सकता था । केंद्र सरकार को अपनी सरकार बनाने के लिए यह उचित समय लगा । यह भी सम्भावना हो सकती है कि कल की खबर ये हो कि उत्तराखंड में अब बी.जे.पी. की सरकार बन रही है । देश के नेता और बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि ये लोकतंत्र की हत्या है जबकि ये सिर्फ भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र की दिशा और दशा है अनिवार्य चरित्र है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। केंद्र में कोई भी सरकार आये इस अनुच्छेद का दुरुपयोग वह करती रही और आगे भी करती रहेगी क्योंकि यह हमारे संविधान में अंकित है जिसका इतिहास मैं आपको बता ही चुकी हूं।

राष्ट्रपति शासन किसी भी केंद्र सरकार का कुछ घंटों का एक खेल बन कर रह गया है जिसका उदाहरण उत्तराखंड है । शनिवार रात को उत्तराखंड के राजनीतिक संकट पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की आपातकालीन बैठक हुई, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने रविवार सुबह दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किये । जिसमें राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश की गई। उधर जेटली ने तुरंत घोषणा कर दी कि ‘उत्तराखंड प्रशासनिक मशीनरी के चरमराने का असली उदाहरण है और संविधान के लिहाज़ से जो कुछ भी ग़लत हो सकता था वो वहां हुआ है । आप दिए गए समय का इस्तेमाल प्रलोभन देने और रिश्वत देने में इस्तेमाल कर रहे हैं जो कि संविधान का उल्लंघन है।”
आरिफा एविस Arifa Avis

आरिफा एविस 

हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में  स्नातक
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, पुस्तक समीक्षा, कविता का प्रकाशन
ईमेल: arifa.avis@gmail.com

जबकि राज्य में कांग्रेस के नौ विधायकों की बग़ावत के बाद हरीश रावत सरकार को 28 मार्च तक बहुमत साबित करने का मौका मिल चुका था फिर इतनी हड़बड़ी क्यों? इसका उत्तर शायद सभी राजनीतिक पंडित अच्छी तरह से जानते हैं।

वैसे तो उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के खिलाफ कांग्रेस की अर्जी पर मंगलवार को नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन पर रोक लगा दी और मुख्यमंत्री हरीश रावत को अब 31 मार्च को बहुमत साबित करने के लिए कहा है। हाई कोर्ट ने कांग्रेस पार्टी के बागी विधायकों को भी वोटिंग का अधिकार दे दिया है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने कि तैयारी कर रही है और बाकी विकल्पों पर भी विचार विमर्श कर रही है । सवाल तो वहीं का वहीं रह गया कि कोर्ट की तरफ से कोई भी फैसला आये। क्या इस अनुच्छेद पर पुनः विचार–विमर्श होगा? क्या जनता का राजनीतिक पार्टियों पर पुनः विश्वास हो पायेगा ? यह अब संभव नहीं है क्योंकि यह अनुच्छेद कानून द्वारा ही लागू होता है ।

इस घटना ने हमारी राजनीतिक विद्रूपता की पोल ही नहीं खोली, बल्कि उसे और अधिक अविश्वसनीय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । सरकारें बचाने के तमाम हथकंडों से जनता परिचित हो चुकी है और केंद्र की महत्वाकांक्षी मंशा को भी जमीन पर ला दिया गया है । अब हमें लोकतंत्र और भारतीय लोकतंत्र में अंतर तो करना ही होगा वर्ना भारतीय संसदीय राजनीति इस “मृतपत्र” अनुच्छेद का प्रयोग कर हर बार यूँ ही अवाम को बेवकूफ बनाती रहेगी ।

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