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वो पचास दिन — मृणाल पाण्डे | Modi's demonetisation - @MrinalPande1

जन॰ 13, 2017

मोदीजी का लड़ाई की रणनीति के बिना काले धन के खिलाफ युद्ध के लिए जाना...

और वापस आना ... किसानों, बूढों, गर्भवती महिलाओं, मध्यवर्गीय होम लोन आकांक्षियों और छोटे मंझोले उद्योगों के लिये कुछेक नई छूटों का ऐलान करने वाले का !




मृणाल पाण्डे

चंद नाखुश करनेवाले किंतु वाजिब सवाल                        

मृणाल पाण्डे


साल के आखिरी दिन टीवी के माध्यम से देश से मुखातिब होकर प्रधानमंत्री ने कहा कि नोटबंदी एक शुद्धियज्ञ था जो भ्रष्टाचार समाप्ति और कालेधन को बाहर लाने के लिये उनकी सरकार ने करवाया । भाषण में 50 दिन तक इस जनमेजयी नाग-यज्ञ से भीषण तकलीफ झेलती रही जनता का भरपूर शुक्रिया तो अदा किया गया । लेकिन 45 मिनट चले भाषण में इस रहस्य का उद्घाटन एक बार भी नहीं हुआ कि इतने काले नागों की कथित आहुति से कुल कितना काला धन उनके बिलों से बाहर आया ? न ही यह, कि बैंकों की व्यवस्था सामान्य होने (यानी हर खाताधारक को चेक या एटीएम से बिना दिक्कत मनवांछित धनराशि निकाल पाने) में अभी और कितने दिन लग सकते हैं ?

अचरज यह भी, कि सबसे अधिक तकलीफ सह रहे वर्गों : किसानों, बूढों, गर्भवती महिलाओं, मध्यवर्गीय होम लोन आकांक्षियों और छोटे मंझोले उद्योगों के लिये कुछेक नई छूटों का ऐलान कर दिया गया, जो अमूमन बजट में की जाती रही हैं । वह निगोड़ा तो पहली फरवरी को आ ही रहा था । राजनीति के जिन अनुभवी पर्यवेक्षकों ने अभी अपना अनुपात बोध नहीं खोया है, उनका यह अहसास पक्के यकीन में बदल गया, कि इस बहुप्रचारित कवायद का असली लक्ष्य चुनावों और राजनीति में प्रतिद्व्ंदियों को धूल चटाना था, आर्थिक या नैतिक सुधार-वुधार नहीं । क्योंकि नोटबंदी के बाद संस्थागत भ्रष्टाचार को चिन्हित और खत्म करने पर बल देते हुए सरकार के सारे उपलब्ध साधनों से तुरत यज्ञ का अगला चरण शुरू हो जाता तो ही बात बनती । लेकिन चुनावी तारीखों की घोषणा के बाद सरकार लगता नहीं इस नाज़ुक घड़ी में इस क्रांति को अधिक मज़बूत कर अतिरिक्त अपयश कमाने की इच्छुक है । लिहाज़ा सरकारी तंत्र का मुख अफरातफरी के बीच देश को डिजिटलीकरण की संपूर्णक्रांति की तरफ मोड़ दिया गया है ।

और आदेश हुआ है कि देशहित में देश के तमाम अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण, अंग्रेज़ी जानने- न जाननेवाले लोग बिना नई तकनीकी, उसकी संचालन व्यवस्था, उसके मानवीय कर्मियों की गहरी पड़ताल किये बिना ही, सिर्फ सरकार के कहने पर कई देसी-परदेसी बैंकों, और डिजिटल कंपनियों तथा नेटवर्कों को अपनी सारी जमा-जथा सुपुर्द कर उनको उसका चौकीदार व दारोगा नियुक्त कर दें ।

विपक्ष की तमाम अपीलों को बरखास्त करते हुए इसी बीच सरकार बजट सत्र चालू करने जा रही है । काश इस सत्र में संसद पुन: कांग्रेसयुगीन गलतियों, बसपा के चुनाव फंड की कालिमा या सपा के पारिवारिक टकराव की लालिमा जैसे मसलों पर बहस मोड़ कर प्रत्याशित हंगामों में संसद का समय बरबाद न करे । ताकि यह सुनिश्चित हो कि सरकार अपनी शीर्ष बैंकिंग संस्था रिज़र्व बैंक, द्वारा नोटबंदी के आदेश से पहले काले धन की बाबत जो भी उसने जाँच करवाई, जिस तरह करवाई तथा नोटबंदी से जुड़े सभी अध्यादेशों की बाबत साफ सुथरे ब्योरे सदन के पटल पर पेश करे । यह भी देश जाने कि कालेधन को कूतने की सरकारी गणना पद्धति क्या अधिकृत संस्था आरबीआई से आई थी कि यह काम बाहरी विशेषज्ञों का था ? यदि हाँ, तो किस संस्था और उसके किन विशेषज्ञों ने डाटा हैंडल किया था और उनके द्वारा कुल अनुमानित काली राशि कितनी थी ? घोषित 50 दिनी मीयाद के बाद जब रिज़र्व बैंक ने पुराने नोट लेना बंद कर प्रक्रिया का समापन कर दिया तो अब तक सरकार के हाथ खास काला धन नहीं लगा है । यह बात खुद रिज़र्व बैंक के गवर्नर साहिब बता चुके हैं । यह भी ज़ाहिर हुआ है कि सरकार ने ही 7 नवंबर को रिज़र्व बैंक को सलाह दी थी कि नोटबंदी की जानी है, और कथित रूप से स्वायत्त बैंक ने बिना कई बेहद ज़रूरी सवाल पूछे या सलाह दिये, आनन फानन बैठक बुलवा कर यह औपचारिकता भी पूरी कर दी । बस अगले ही दिन खुद प्रधानमंत्री जी द्वारा इसकी घोषणा कर दी गई, जबकि प्रथानुसार यह काम रिज़र्व बैंक के गवर्नर का है । तब तक न काफी मात्रा में नये नोट छपे थे न ही ज़मीनी टीमों को इस विशाल कार्यक्रम की कोई पूर्वसूचना देकर खास प्रशिक्षण दिया जा सका था जिसके दुष्परिणाम गिनाना ज़रूरी नहीं ।  फिर भी जाननेवाले जाने कैसे यह तमाम भेद पहले ताड़ चुके थे सो कुल 50 दिनों में नये भ्रष्टाचार के औज़ारों द्वारा कालेधन का अधिकांश सफेद बनवा लिया गया ।

इस सारे प्रकरण के बाद खीझी हुई भारत की जनता, खासकर गरीबों, किसान मजूरों को अश्रुमय धन्यवाद देना और भारतीय धीरज को फूलहार चढाना नाकाफी है ।

औरतें तो सदा से भुनभुनाती रही हैं कि अपने यहाँ गरीब की जोरू सबकी भाभी बनने को अभिशप्त होती है, और धैर्य का सही मतलब ज़बर्दस्ती को चुपचाप झेलना होता है । सास हो कि पुलिस या सरकारी अमला, कमज़ोर का पक्ष लेता ही कौन है ? यह ज्ञान शक्तिहीन जनता को बहसतलब बनने की बजाय मंथरा की ही तरह फितरतन फजीहतपसंद और चमत्कारप्रिय बनाता गया है ।

चुनावी राजनीति हो या फिल्म या सीरियल, जब-जब कहानी में खतरनाक ट्विस्ट आये, आमजन चाहता है कि सलमान खान या अक्षय कुमार की फिल्म की तरह एक महानायक सूमो दौड़ाता दीवार फाड़ कर निकले और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अपनी मां या प्रेमिका को बंधक बनाकर रखे हुए विलेन को पीटपाट कर मामला बरोबर कर दे ।

सबका साथ सबका विकास, जनता या कि नारी का हम सम्मान करते हैं, भ्रष्टाचार नहीं होना चाहिये, यह तो ऐसे चुनावी मुद्दे हैं जिनपर 1947 से लेकर आज तक का हर दल का मैनीफेस्टो टिक मार्क लगाता है ।

यह भी शिथिल जनता जानती है कि हर पार्टी ने बहुत चुस्त व्यवस्था कर ही रखी होगी कि उसके शीर्ष नेता के करकमल खुद कभी कीचड़ से मलिन नज़र न आयें । नज़रबट्टू होली का नारियल तो अक्सर कोषाध्यक्ष या कि उस मुँहलगे किंतु भरोसेमंद कार्यकर्ता को बनाया जाता है जो नेतृत्व के मंदिर के बाहर बैठा सारा चढ़ावा गुप्त खातों में भरता रहता है । रिज़र्व बैंक की जवाबदेही हो या कि उम्मीदवार चयन की, अभी भी सब दल नियम नहीं, अंग्रेज़ी कहावत का ही अनुसरण करते दिखते हैं, कि तुम मुझे बंदा दिखाओ, मैं तुमको सही नियम बता दूंगा (यू शो मी द मैन, आई विल शो यू द रूल) ।

सीमा सुरक्षा बल का जवान घटिया खाने की शिकायत करें तो उसका एक दिन में तीन बार तबादला, दूसरी तरफ ताबेदार लोगों को नियमविरुद्ध नया कार्यकाल ।

जब तक यह तरीके लागू हैं, तब तक जनविवेक सोता रहेगा । पर क्या हम अपनी सारी जमा जथा सिर्फ इस आधार पर कई वादाफरोशियों के बाद भी, डगमग सर्वरों और खराब कनेक्टिबिटी के बावजूद, शातिर साइबर अपराधियों के जाल से घिरी डिजिटल दुनिया के हवाले कर दें, कि इससे हमको भीड़भाड़ में जेब कटने या घर में सेंध लगने का डर नहीं रहेगा ?


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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