वह कलेक्टर था। वह प्रेम में थी। बिल उसने खुद चुकाया। | ग्रीन विलो – अनामिका अनु

ग्रीन विलो

लेखक: डॉ. अनामिका अनु

“प्यार की इक गहरी पीड़ा को अनामिका अनु ने वहीं गहरे में बैठ कर लिख दिया है. ग्रीन विलो कहानी पर ज्यादा लिखने की ज़रुरत नहीं है, आप बेशक पढ़ने के बाद आपनी राय लिखियेगा.”
- संपादक


अनामिका अनु का चित्र ग्रीन विलो कहानी के साथ, शहर की रोशनी और भावनात्मक पृष्ठभूमि में एक साहित्यिक प्रस्तुति
अनामिका अनु की कहानी “ग्रीन विलो” का दृश्यात्मक रूप, शहर की रोशनी और स्मृतियों के बीच प्रेम और प्रतीक्षा की कहानी को उभारता हुआ।

ग्रीन विलो कितना उदास है न? प्रेम में छला, टूटा आदमी पूरी उम्र न जाने किन-किन पीड़ाओं से गुज़रता है। उदास आदमी टूटे आदमी से अच्छा है। उदास सोचता है और कई चीज़ों को समझ पाता है। टूटा आदमी तो पूरी उम्र स्वयं को समेटने में ही ख़र्च कर देता है। प्रेम की उदासी, प्रेम में टूटन का सुंदर विकल्प है।

कंगला के किले में अलौकिक शांति पसरी है। अहाते में हरियाली फैली हुई है और गेट पर खड़ी दो सफ़ेद मूर्तियाँ और भी सफ़ेद लग रही हैं। किले में बैठकर मालविका सर्दियों में शांत इम्फाल नदी की लहरों का स्मरण कर रही है। ठंड काफ़ी है। अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ते ही मालविका की हथेलियों के मध्य एक मासूम-सी गर्माहट किलकारी मारने लगी है। उसे अचानक सूरज की आँखें याद आ गईं—मोटे होंठ, बड़ी-बड़ी आँखें, मालविका से दस साल छोटा। कुर्ता, बंडी, चश्मा, किताब और न जाने देह में कौन-सी अलाव जलाए रखता था। होंठों की प्यास सावन की प्रतीक्षा नहीं करती थी। वह आकुल-व्याकुल रहता था, मरु के भीतर सिर गाड़े, कितने मील पार कर जाता था। नीलकंठी का फूल — सालों भर बैंगनी कलियाँ चटकती रहती थीं…

उसे याद आया अपना ख़ाली हाथ। वह कैसे एक-एक पैसे जोड़कर गई थी सूरज से मिलने। लखनऊ के इमामबाड़े के पास एक अच्छा-सा होटल, एक नरम कमरा। राशन के पैसे बचा-बचाकर और इश्क़ का ऐसा भूत कि सूरज मद्धम, रात उजली और दुःख द्रौपदी-माला हो गया था।

सूरज लखनऊ का नया-नया कलेक्टर बनकर आया था — बेहद उत्सुक और उत्साहित। चीते-सी फुर्ती, बाल-सुलभ सहजता, सरलता ऐसी कि मधुरता में कभी कमी नहीं; अद्भुत आकर्षक व्यक्तित्व। किसी भी दुनिया की बात कर लो — इतना पढ़ा-लिखा कि विश्व-ज्ञानकोश खोलकर रख दे। उससे वार्ता चुनौती की तरह आती और मालविका हर चुनौती को जिस गंभीरता और दृढ़ता से पार करती, उसे देखकर सूरज अचंभित रह जाता था। दोनों की दोस्ती और दोनों के प्रेम के बीच एक बाँस का पुल था और जिस दिन वह टूटा, प्रेम की नदी ने भी उसे नहीं थामा।

दिन भर मध्ययुगीन अध्यात्म की राजनीति पर चर्चा और जिरह — तर्क पर तर्क। शाम के सरकते ही उस रस्म की अदायगी भी हो गई। जो आया, वह चला गया। रात पहले से अधिक ठंडी और स्मृतियाँ बर्फ़ के फाहे।
आज दूसरा दिन था।

मालविका ने फ़ोन उठाया और एक छोटा-सा उत्तर दिया — “मैं नौ बजे तक निकलूँगी।”

उधर से सूरज की आवाज़ आई—
“मत जाओ। आज फिर मिलने आऊँगा।”

मालविका ने धीरे से कहा—
“मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं दो दिन रुक सकूँ।”

सूरज ने कहा—
“तुम चिंता मत करो। दूसरे दिन का बिल मैं भर दूँगा। प्लीज़ रुक जाओ। मेरे लिए — मर जाऊँगा।”

मालविका रुक गई। उसने ‘यारेख’ किताब का कुछ अंश पढ़ा और खिड़की के पास खड़ी हो गई। वे पंक्तियाँ टेप-रिकॉर्डर की भाँति उसके भीतर बजती रहीं — घर्र-घर्र कर टेप फँसता जाता था, आवाज़ विकृत होती जा रही थी, मगर शब्द एकदम स्पष्ट थे —

“तुम हिब्रू और जर्मन में कविता और दर्शन लिखते हो,
मैं विरह की भाषा में मौत को व्यक्त होती जा रही हूँ।
मैं तुमसे मिलने को व्यग्र हूँ।
वैध बंधनों को खोलो और आओ—
अवैध प्रेम की प्रबलता का सम्मान करो।
मेरी देह की हर कोशिका तुम्हारी गंध पाने के लिए साँस रोके है।
मैं शनैः-शनैः मर रही हूँ…
अब एकदम ध्वस्त होने की कगार पर हूँ।
सबों को सोचकर आओगे तो रास्ता बहुत लंबा है,
मेरे पास समय बहुत कम है।”

एक-एक पंक्ति मालविका के भीतर बजती रही। उसके भीतर हर पंक्ति तेज़ थाप पर नृत्य कर रही थी। थाप की व्यग्रता, ध्वनि और उसकी आवृत्तियाँ — सब एक साथ बढ़ती जा रही थीं। वह झटके के साथ खिड़की से हटकर बिस्तर पर बैठ गई, ताकि उसके भीतर बज रहा टेप-रिकॉर्डर बंद हो जाए। प्रतीक्षा से लंबी इस ब्रह्मांड में कोई दूसरी चीज़ नहीं है।

वह अपना सिर पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी। फिर कमरे में तेज़ी से एक छोर से दूसरे छोर तक टहलने लगी। पाँव बढ़ते जा रहे थे, आँखों से अनवरत आँसू बहते रहे। सुबह से दोपहर हुई और फिर दोपहर से शाम। वह मकड़ी-सा महसूस कर रही थी — वैध और अवैध के जाल में जकड़ी हुई; प्रतीक्षा को कीट की तरह निगल जाना चाहती थी। धैर्य और बेचैनी — दोनों भीतर द्वंद्व कर रहे थे। वह बार-बार बिस्तर से उठकर खिड़की के पास जाती।

सड़क उठकर बिस्तर के क़रीब आ गई थी। हर पदचाप, कार के आने की आवाज़, कार के दरवाज़े खुलने-बंद होने की ध्वनियाँ — उसे साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रही थीं। अचानक उसका सिर भारी हो गया। पेट में असह्य वेदना शुरू हो गई।

रिसेप्शन पर जाकर उसने पुराना टिकट कैंसिल करवाया और अगले दिन का टिकट भी बुक करवा लिया।

उसे तब ध्यान आया कि सबेरे से उसने कुछ भी नहीं खाया-पिया है।

उसने पर्स में देखा — तीन हज़ार रुपये थे। होटल में एक दिन का रुकना ढाई हज़ार का था और जो कुछ खा-पी लिया, उसका अलग।

शाम पसरकर खिड़की से कमरे में आ गई है। अखरोट-सी ऊबड़-खाबड़ एक सड़क दूर से आकर होटल के पिछवाड़े में रुक जाती है। बाईं ओर लकड़ियों का ढेर लगा है। एक आदमी बहुत देर से वहाँ चहलकदमी कर रहा है। चिड़ियों की चहचहाहट एकदम ख़त्म — सब नीड़ को लौट गई हैं। गुलमोहर की परछाईं सड़क पर पसर गई है। एक अप्रत्याशित बेगानापन लेकर शाम उतरी है। वह बेचैनी महसूस कर रही है, बार-बार घड़ी देख रही है।

देर शाम तक सूरज नहीं आया। मालविका की धड़कन तेज़ हो रही थी। वह फ़ोन नहीं उठा रहा था। देर रात उसका फ़ोन आया — “मैं एक मित्र के यहाँ आया हूँ, पत्नी ज़िद कर रही थी। आ नहीं पाऊँगा।” इतना कहकर उसने फ़ोन रख दिया।

मालविका ने न दोपहर में खाया था, न रात में। बिल कैसे चुकाएगी — इसी असमंजस में पड़ी-पड़ी पानी की एक बोतल भी उसने नहीं मँगवाई। उसका मन हुआ कि साधारण पानी माँगे और एक कप चाय बनाकर पिए, मगर डर उसे घेरे जा रहा था। वह उस डर को धकेलकर कमरे से बाहर निकली और लगभग डेढ़ किलोमीटर बिना रुके पैदल चलती रही।

तभी सड़क के किनारे परांठे का एक ठेला दिखा — मद्धम रोशनी और हवा में एक नीम-बेहोशी। उसने पच्चीस रुपये में दो परांठे बँधवाए और वहीं फुटपाथ पर बैठकर खाने लगी। उनमें बासी आलू की गंध थी; उससे खाया नहीं गया। पास ही नगर-निगम का नल था — वहाँ जाकर उसने पानी पिया। प्यास ऐसी कि ख़त्म ही नहीं हो रही थी और शरीर ऐसा कि पानी को थामना नहीं चाहता था।

उसने फिर फ़ोन देखा — सूरज का कोई संदेश नहीं था। बिल कैसे भरेगी — सोच-सोचकर गला सूख रहा था। टैक्स जोड़कर ज़्यादा पैसे माँगे तो वह किससे पैसे माँगेगी — कुछ समझ नहीं आ रहा था।

वह रात भर जागती रही। यह रतजगा उसके रोम-रोम को थका चुका था।

उसे लगा — धुंध, राख और दुःख की गंध बिल्कुल एक-सी होती है। रात गहराती जा रही थी और ठंड बढ़ती जा रही थी। उसने अपने पतले स्वेटर के ऊपर खादी की शॉल लपेट ली। इस ठंड में कुछ पैसे बचाकर वह एक गर्म शॉल ख़रीदेगी।

सबेरे के नौ बजे थे।

उसने पानी के जग की तरफ़ देखा — जग ख़ाली था। वह उठी और खिड़की की ओर देखने लगी। लकड़ियों का ढेर रात में जल चुका था। राख का ढेर धूप से टकराकर सतरंगी प्रकाश बिखेर रहा था।

उसने फ़ोन देखा — सूरज का कोई संदेश नहीं। वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर लगभग भागते हुए रिसेप्शन पहुँची, बिल माँगा और निपटारा किया — उन्नतीस सौ सात रुपये। मालविका ने बिल चुकाया और राहत की साँस ली। उसके पास 93 रुपये बचे थे। स्टेशन जाते समय ऑटोवाला 200 रुपये से ज़्यादा माँगेगा — यह सोचकर वह पैदल ही निकल पड़ी।

पानी की एक बोतल सड़क किनारे की दुकान से ख़रीदी और बढ़ती रही। चलते-चलते वह थक गई थी। पाँव दुख रहे थे और भूख से अंतड़ियाँ मरोड़ खा रही थीं। वह रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ती जा रही थी। रास्ते में अंकुरित चने-मूँग, नारंगी-अंगूर-सेब, चाय-बिस्कुट — सब उसका ध्यान खींच रहे थे। भूख ऐसी कि “प्रतीक्षा” शब्द के अतिक्रमण पर आमादा।

जगह-जगह होर्डिंग लगे थे— “लखनऊ के कलेक्टर इस ठंड में गरीबों के रात के खाने, कंबल और रहने की व्यवस्था करेंगे।”

साथ में सूरज की तस्वीर…

उसे ज़ोर से प्यास और भूख लग रही थी। पुराने स्वेटर और खादी की शॉल को शीत-लहरें तीर रही थीं।

बड़े-बड़े होर्डिंगों से छोटी-छोटी टीस निकलकर आसपास काँटों का जंगल खड़ा कर चुकी थीं। वह धैर्य से, मंथर गति से बढ़ रही थी। आँखों में सूरज का चेहरा था — मोह भी चरम पर और देह में कष्ट भी। 36 घंटे भूखी, इतनी ठंड में, इतने भारी बैग के साथ — वह कभी इतनी दूर नहीं चली थी। पानी की बोतल ख़रीदने के बाद उसके पास 73 रुपये बचे थे; वह उन्हें ख़र्च नहीं करना चाहती थी। सफ़र लंबा था और कई मामलों में वह स्वयं को अर्थहीन महसूस कर रही थी।

अचानक एक पत्थर से पैर की उँगलियाँ टकराईं। बैग हाथ से छूटकर बाईं ओर जा गिरा। घुटने में चोट लगी — घुटना फूट गया। खून की बूँदें सूती सलवार के आर-पार। वह उठ नहीं पा रही थी। पास बीड़ी फूँकते लड़के ने उसे उठाया — उठाने के क्रम में देह को अश्लील ढंग से छुआ। मालविका का शरीर काँप उठा।

उसने एक ऑटोवाले को हाथ दिया — “स्टेशन जाने का कितना लोगे?”

“सौ रुपये, मेमसाब।”

“मेरे पास 73 रुपये ही हैं। पैर में चोट लगी है — स्टेशन पहुँचा दो, भाई।”

ऑटोवाले ने कुछ देर सोचा और तैयार हो गया। मालविका लगभग लँगड़ाती हुई ऑटो में बैठी। पानी की बोतल हाथ से छूटकर नाले में जा गिरी। ऑटो तेज़ी से भागा — शहर और समय पीछे छूटते गए। फटे घुटने में ठंडी हवा सांय-सांय कर रही थी। दर्द चरम पर था, पर प्रिय के न आने की टीस उससे भी बड़ी।

स्टेशन पर उतरकर वह प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची। सभी प्रतीक्षा-कुर्सियाँ भरी थीं। वह बैग थामे ज़मीन पर बैठ गई। विदुषी मालविका का चेहरा प्रतिभा के तेज से दमक रहा था, भीतर का तूफ़ान शांत नहीं हो रहा था।

उसने पास खड़े युवक से टिकट दिखाकर पूछा — “भाई, मेरा बैग बोगी तक पहुँचा दोगे? घुटने में ज़ख़्म है।” युवक संशय से देखता रहा और चला गया। ट्रेन आने ही वाली थी।

अचानक वही युवक व्हीलचेयर लेकर लौटा। उसे बिठाकर बैग कंधे पर टाँग लिया। बोगी में बैठाकर एक पॉलीथीन थमा दी — डेटॉल की छोटी बोतल, हैंडी-प्लास्ट, रूई और चार पेन-किलर। कुछ कहने से पहले ही वह चला गया।

उसने घाव साफ़ किया, दुपट्टा फाड़कर बाँधा, दवा ली। खाली पेट दर्द बढ़ गया। तभी सामने बैठे सहयात्री ने दो रोटियाँ और भिंडी की भुजिया बढ़ाई। वह मना करना चाहती थी, पर देह ने अनुशासन तोड़ दिया। धीरे-धीरे कौर खाते हुए उसकी आँखों से आँसू टपकते रहे—टप-टप।

सूरज का फ़ोन फिर नहीं आया। मालविका की प्रतीक्षा भी गंतव्य के साथ ख़त्म हो गई। उन दो रोटियों की तृप्ति ने उसे उम्र भर अतृप्त नहीं होने दिया…

अब भी उसका मन विचलित होता है। अवसाद आता है। सुख-दुःख बाँटने वाला कोई नहीं। रोटी खाते समय वह डेढ़ दिन की भूख याद कर सिहर उठती है। पहला प्रेम अब भी स्मृतियों में धड़कता है — वह समझ नहीं पाती कि एक आसक्त से इतना प्रेम कैसे हो गया।

आज सूरज अपनी अनैतिक प्रवृत्तियों और बौद्धिक क्षमताओं के लिए प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध मालविका अय्यर भी है — अपनी बेबाकी और नई सोच के लिए।

मगर उस रात के बासी परांठे और यात्रा की निस्सहायता ने उसे स्वयं के बहुत क़रीब ला खड़ा किया। देह के उत्सव और दायित्व के भेद को उसने समझा।

मालविका ने घड़ी देखी। शाम से पहले होटल लौटना है। वह मुड़ी और किले को देखा। हरियाली देखकर उसके मन में आया — कंगला का अर्थ सूखी ज़मीन ही क्यों, हरी माटी भी तो हो सकता था…

पास खड़ा ग्रीन विलो उसे देखकर धीरे-से मुस्कुरा उठा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

लेखक परिचय

1 जनवरी 1982 को मुज़फ़्फ़रपुर में जन्मी और केरल में रह रही डॉ. अनामिका अनु को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (2020), राजस्थान पत्रिका वार्षिक सृजनात्मक पुरस्कार (2021), रज़ा फेलोशिप (2022), ‘महेश अंजुम युवा कविता सम्मान’ (2023) तथा 2025 का प्रतिभा सम्मान (केरल हिंदी प्रचार सभा) प्राप्त है।

उनके प्रकाशित काव्यसंग्रह का नाम है ‘इंजीकरी’ (वाणी प्रकाशन)। कथा संग्रह: ‘येनपक कथा और अन्य कहानियाँ’। उन्होंने ‘यारेख : प्रेमपत्रों का संकलन’ (पेंगुइन रैंडम हाउस) का संपादन किया है। ‘सिद्धार्थ और गिलहरी’ (राजकमल प्रकाशन) में के. सच्चिदानंदन की कविताओं का अनुवाद है।

ईमेल: anuanamika18july@gmail.com
फोन: 8075845170


यह भी पढ़ें

डॉ. अनामिका अनु की अन्य रचनाएँ:
शब्दांकन पर प्रकाशित अनामिका अनु की सभी रचनाएँ

और पढ़ें:
समकालीन हिंदी कहानियाँ


कहानी पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अवश्य लिखें।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

कहानी कैसे लिखें — कहानी के तत्व — रोहिणी अग्रवाल
राजेन्द्र लड़ते थे पर संबंध तोड़ते कभी नहीं थे। ~ मन्नू भंडारी |  Mannu Bhandari interview by Vivek Mishra
कहानी: यहाँ कमलनी खिलती है - मृदुला गर्ग | Mridula Garg's Hindi Kahani
समय से परे | अचला बंसल
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
गीताश्री की कहानी — मत्स्यगंधा | Geetashree ki kahani MatasyaGandha
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
हिंदी कहानी: प्रेतयोनि - चित्रा मुद्गल | Chitra Mudgal, Hindi Kahani
कहानी: बादल बारिश भीजनहार- बलराम अग्रवाल | HindiKahani by Balram Agarwal
हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर नासिरा शर्मा की कविताएं | Nasera Sharma - Poetry