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कलियुग में त्रेतायुग पर राजनीति — मृणाल पाण्डे

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रामकथा के जितने रूप हैं उतनी ही तरह के विवरण त्रेतायुग के भी हैं

— मृणाल पाण्डे 

2010 के आसपास दिल्ली वि.वि. में इतिहास, ऑनर्स पाठ्यक्रम से हटा दिये गये रामायण विषयक एक लेख पर भी बवाल मचा था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और अनुवादक डॉ रामानुजम् का यह जानामाना लेख – थ्री हंड्रेड रामायणाज़, फाइव एग्ज़ांपल्स एण्ड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशंस, भारत के विभिन्न क्षेत्रीय समुदायों में प्रचलित रामकथा के सैकडों स्वरूपों पर सारगर्भित चर्चा के लिये मील का पत्थर माना जाता है। 




उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अभी हाल में अयोध्या में राम की विराट प्रतिमा लगाने का ऐलान किया। उसके बाद इस साल खुद अयोध्या जा कर वहाँ त्रेतायुग की दीवाली मनाने का ऐलान कर इतिहास के वैज्ञानिक शोधकारों को भी चौंका दिया है। रामकथा के जितने रूप हैं उतनी ही तरह के विवरण त्रेतायुग के भी हैं। कौन सा सही है इस बाबत पक्के सबूत कम से कम इस समय तक हमको नहीं दिये गये हैं। जानकारों को याद होगा कि 2010 के आसपास दिल्ली वि.वि. में इतिहास, ऑनर्स पाठ्यक्रम से हटा दिये गये रामायण विषयक एक लेख पर भी बवाल मचा था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और अनुवादक डॉ रामानुजम् का यह जानामाना लेख – थ्री हंड्रेड रामायणाज़, फाइव एग्ज़ांपल्स एण्ड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशंस, भारत के विभिन्न क्षेत्रीय समुदायों में प्रचलित रामकथा के सैकडों स्वरूपों पर सारगर्भित चर्चा के लिये मील का पत्थर माना जाता है। इसके अनुसार श्रुति और स्मृति पर आधारित मौखिक परंपरा पर चलते आये हमारे विविधतामय देश में मिथकीय इतिहास इकरंगा नहीं हो सकता। हर क्षेत्रीय भाषा और समुदाय में स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं से जुड कर वह अलग अलग शक्लें ग्रहण कर लेता है। रामायण की उस कथा को लेकर, जिसे आम मान्यतानुसार शिव ने पार्वती को, कृष्ण ने युधिष्ठिर को, वाल्मीकि ने राम को, कंबन ने दक्षिण भारतीय लोगों को, जैन सूरियों ने जैन धर्मानुयायियों को, तुलसी ने मध्यकालीन अवधीभाषी जनता को श्रोता को ध्यान में रखते हुए इलाके के समसामयिक संदर्भों से जोडते हुए सुनाया है, यह साबित करना कि उसके कितने और कई जगह परस्पर विरोधी विविध रूप हैं, नया या आपत्तिजनक नहीं है। यह विविधता एक विशाल भूखंड में ज्ञान की विविधता और रचनात्मकता की लंबी परंपरा से हमारे बडे रोचक साक्षात्कार कराती है।

कहा जाता है कि कुछेक रामकथा स्वरूपों में हनुमान या सीता सरीखे आदर्श पात्रों का उच्छृंखल और कामुक चित्रण मन मस्तिष्क पर कुप्रभाव डाल सकता है। पर यह क्या अचरज की बात नहीं, कि जब दुनिया भर के छात्र इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग से तमाम तरह का गुह्यतम (सचित्र) ज्ञान बटन दबा कर हासिल करने में सक्षम हों तब ...




दक्षिण भारत और द पूर्वी एशिया के देशों में प्रचलित रामकथा के स्वरूपों के उदाहरण देते हुए रामानुजम् ने दिखाया है कि राम कथा देश के विभिन्न जाति, लिंग और धार्मिक मान्यताओं वाले समूहों के अनुभवों और मान्यताओं से निथरती हुई लगभग तीन सौ रोचक और परस्पर विरोधी रूपों में उपलब्ध है। इनमें से किसी भी स्वरूप को कोई भी समुदाय अपनी नापसंदगी का हवाला देकर जबरन खारिज नहीं करा सकता।

राजनैतिक गुटों के द्वारा ऐतिहासिक नहीं, दलगत हितों की तहत किये जाते हस्तक्षेप के चलते आज भारतीय इतिहास के जटिल प्रसंगों की सप्रमाण व्याख्या या ज्ञानप्रद बहस का आगाज़ कर पाना आज बडा ही कठिन हो चला है। हो सकता है कि तीन सौ रामकथाओं में कुछ में पात्रों के चरित्र या घटनाओं के चंद ब्योरे आम धारणा से फर्क हों। संभव यह भी है कि वे मिथकीय रामकथा के पात्रों के बारे में न होकर किसी अन्य स्थानीय शासक के बारे में प्रचलित दंतकथाओं से जुडे हों। बहस इससे नहीं है। पर बिना इतिहासवेत्ताओं के समुचित विमर्श के किसी तरह के जन उत्सव को त्रेतायुगीन बनाना हमारे इतिहास में कट्टरपंथिता के हस्तक्षेप का संकेत है जो उच्च ज्ञान के केंद्रों को इतिहास के घालमेल को मजबूर कर सकती है। यह छिपा नहीं कि देश में हर दल में कई विभेदकारी दिमाग एक बहस विमुख मानसिकता में इस बुरी तरह से जकड चुके हैं कि किसी मुद्दे की अपनी तईं अप्रिय व्याख्या को वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। सारे राज समाज को केवल एक ही दर्शन से हाँकने का उनका उत्कट उत्साह हमको किसी किताब या कलाकृति विशेष पर प्रतिबंध की माँग से लेकर क्षेत्रीय बनाम बाहरी के मुद्दे पर बहुमत से अलग राय देने वालों पर हिंसक हमलों तक में लगातार दिखाई देता है। संविधान द्वारा धर्म निरपेक्ष, लिंग जातिगत भेदभाव से परे घोषित हमारे लोकतंत्र में इस मानसिकता के खतरों की अनदेखी करते जाना घातक होगा।

रामकथा लोक मंगलकारी है, यह एक निरापद, निर्विवाद सूत्र वाक्य है जिससे रामराज का समर्थन या उसको चुनौती देना दोनो इन दिनों आम हैं। बालि या शंबूक की बात दूसरी है, या गर्भवती पत्नी की अग्निपरीक्षा और परित्याग राजधर्म की विवशता है कह कर अनेक दुनियादार व्याख्याकार अप्रिय सवालों से छूटते रहे हैं। कडवे सवालों को लेकर आँख बचा जाना और किसी क्षेत्र की रामकथा को ही मानक बताने की ज़िद के साथ भिन्नता का उग्र विरोध करना वैचारिक गुट विशेष की अपने इलाकाई प्रिय स्वरूप में श्रद्धा भले ही दिखाये लेकिन इसे बौद्धिक संतुलन का प्रमाण तो नहीं माना जा सकता। कहा जाता है कि कुछेक रामकथा स्वरूपों में हनुमान या सीता सरीखे आदर्श पात्रों का उच्छृंखल और कामुक चित्रण मन मस्तिष्क पर कुप्रभाव डाल सकता है। पर यह क्या अचरज की बात नहीं, कि जब दुनिया भर के छात्र इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग से तमाम तरह का गुह्यतम (सचित्र) ज्ञान बटन दबा कर हासिल करने में सक्षम हों तब हमारे विश्वविद्यालयों में एक खास तरह का दिमाग हर कृति को आज भी इसी कसौटी पर कसना चाहे कि क्या यह ब्योरा या जीवनशैली बहू बेटियों के, छात्रों के हाथों में थमाया जा सकता है ? यह एक अलिखित स्वीकार है कि तमाम किताबें शिशुवत बहूबेटियों या शिष्यों के लिये ही लिखी जाती हैं या लिखी जानी चाहियें। इतिहास को इस लाठी से हाँकने पर तो कुछ दूर जाकर वाल्मीकि और व्यास भी भगाये जाने लगेंगे, कालिदास और जयदेव का तो कहना ही क्या ? यह हठयोग हमारे कुछेक उम्दा विश्वविद्यालयीन परिसरों को भी ज्ञान की अद्भुत बहुलता और उसकी प्रखर चुनौतियों से वंचित कर दे तब तो हम उच्चतम शिक्षा से संपन्न युवाओं के नाम पर बस एक अपरिपक्व, बेदिमाग और अर्धसभ्य भीड को ही तैयार करेंगे जिसकी बढती संख्या और घटती गुणवत्ता पर हमारे तमाम अकादमिक विशेषज्ञ क्षोभ जता चुके हैं।




बहस के नाम पर यदि यह मान भी लिया जाये कि पाठ्य पुस्तकें और पुरातिहास के सरकारी विवरण यथासंभव उदात्त और मानसिक परिष्कार करनेवाले हों तो भी यह तथ्य अटल रहता है कि मौखिक लोक कथाओं और पौराणिक ब्योरों से अविच्छिन्न रूप से जुडे भारत के प्राचीन इतिहास का हर बडा अध्येता कभी न कभी विवादित ब्योरों की दलदल में पैर ज़रूर रखेगा। अच्छा हो हम नागरिकों को देश के इतिहास की विविधता बताने और युवाओं को उच्च शिक्षा तथा शोध के लिये तैयार करते समय रामकथा सरीखी सभी जन कथाओं के क्षेत्रीय स्वरूपों से भी उनका परिचय कराते चलें ताकि वे यथार्थ को विभिन्न संस्कृतियों के संदर्भ में देखना लोकतांत्रिक खुलेपन से परखना सीखें। देशभक्ति के नाम पर ताजमहल को गरियाने या लडकियों की उच्चशिक्षा के नाम पर कैंपस से हॉस्टल तक उनपर वर्जनाओं की लंबी सूची लागू कर देने लेने से तो हम अपने बहुलतामय देश के हज़ारों साल पुराने विविधतामयज्ञान विज्ञान को नितांत क्षुद्र और अवैज्ञानिक बना डालेंगे।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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