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इंदिरा दाँगी की कहानी 'गुड़ की डली' | #Hindi @IndiraDangi

नव॰ 27, 2017

‘‘अम्मा भूख लगी है !’’

‘‘अभी तो खाई थी रोटी घण्टा भर पहले !’’

दीपा चुप है किसी गुनहगार की तरह; लेकिन उसकी रिरियाती दृष्टि में भूख़ साक्षात् है। रुक्मिणी सख़्त चिढ़ती है इस नज़र से।

गुड़ की डली

— इंदिरा दाँगी



मर्म को समझने के लिए दिल का कोमल होना आवश्यक है। कहानी लिखने के लिए दिल का कोमल होना आवश्यक है। कहानी में मर्म लिख पाने के लिए इन्सान होना आवश्यक है। ‘गुड़ की डली’ पढ़ते समय ये बातें कहानी से ज़ेहन में आती हैं, अगर पाठक-ही कुछ चोर नहीं हो। इंदिरा दांगी का, कहानी में, नाटक-शैली से रेखाचित्र बनाने का प्रयोग काफी हद तक सफल रहा है, और किसी कहानीकार के बड़े-होने-की-सम्भावना को ऐसे प्रयोगों से ही प्रबलता मिलती है। 

ज़रा इन दो लाइनों में व्यक्त महासागरी पीड़ा महसूस कीजिये — “कहीं अम्मा मारने न लगें ! यहाँ से तो भाग भी नहीं सकती एकदम। पता नहीं निवाला अटका है कि माँ कि शिकन भरी दृष्टि का असर है; रोटी खाती दीपा की आँखों में चुप-चुप आँसू भर आये हैं। ...माँ के माथे पर शिकन-सी साढ़े चार साल की दीपा !”  

हमारे देश को खाए जा रही भूख और मारे जा रही भुखमरी, पर लड़की होने की सजा भुगतने के लिए भ्रूणहत्या से बचने की किस्मत होना आवश्यक है... और उस सजा को जी रही ग़रीब-भारतीय-लड़की को देखने वाली एक ही सत्ता रह गयी है, जिसे इंदिरा इस पंक्ति में बता गयी हैं — “आसमान का अनंत अंधकार देख रहा है, एक गाँव के, एक आँगन में रोशनी है। दीपशिखा-सी झिलमिल एक लड़की पढ़ रही है ...पढ़ रही है।

कहानी गुड़ की ताज़ी डली की तरह कोमल है, हौले से पढ़के देखें। 

भरत तिवारी, 
२७.११.२०१७, नई दिल्ली. 






दस बरस की पायल सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है।

खपरैल गाँव में, तपते बुंदेलखंड की लाल माटी पर, लू धूल के नन्हे भँवर बना रही है जैसे छोटी लड़कियों को खेलता देख वो भी अपना खेल लिए आ खड़ी हुई है।

‘‘सतानवे, अठानवे, निन्यानवे...’’

रस्सी घुमाती दो लड़कियों के बीच पायल दोनों पंजों के बल ज़मीन पर आती है कि हवा में जाती है!

‘‘पयलिया ! नासमिटी ! मुझे पता था तू यहीं मिलेगी !’’

माँ रुक्मिणी ने जैसे ही उसकी चोटी को पकड़ा, उसकी सब सहेलियाँ भाग खड़ी हुईं — रूबी, साधना, आरती उन सबों को भी तो अपने घरों में जाकर काम में लगना है, वर्ना गत उनकी भी यही होनी है।

पाँच करारे थप्पड़ जड़ चुकी रुक्मिणी का गुस्सा किसी तरह शांत नहीं होता — आख़िर किस पर है ये गुस्सा ??

आँगन में गोबर के ढेर के सामने लाकर धक्का दिया उसने लड़की को। पायल गोबर में मुँह के बल गिरते-गिरते किसी तरह बची।

‘‘पूरा आँगन लीपे बिना चिगी घर से तो आज तू नहीं कि मैं नहीं !’’

आँसू पोंछती, नुचे बालों पर हाथ फेरती पायल आँगन लीपने के लिए गोबर में भूसा सानने लगी। रुक्मिणी ने पलना में रो उठे, दस माह के लल्ला को उठाया और बहुत पुचकारते हुए आँचल तले ले लिया। सूखे स्तनों में लेकिन अमृत-दूध कहाँ ? लल्ला अपने नये दाँत गपाकर जैसे ख़ून चूसता है; रुक्मिणी तड़पकर उसे ख़ुद से अलग कर देती है।

  — मेरे जीवन के धन ! तुझे मैं क्या पिलाकर पालूँ ?




बेटे को लगातार रोता देख रुक्मिणी हड़बड़ा उठी। ऊपर आले में छुपा रखा बेला भर दूध उसने एहतियात से उतारा। कटोरी में छक दूध भरके, गुड़ घोलती वो बच्चे को चम्मच से पिलाने लगी। बच्चा पुच-पुच कर पीने लगा। निहाल माँ बलैया लेने लगी अपने गदबद बेटे की।

‘‘अम्मा ?’’
इंदिरा दाँगी
लाऊखेड़ी,
एयरपोर्ट रोड,
भोपाल (म.प्र.) 462030
dangiindira4@gmail.com


कोठरी के किवाड़ से झाँककर साढ़े चार साल की दीपा सहमे स्वर में पुकारती है। अम्मा से एक तय दूरी से बात करती है वो। ये उसने पायल जीजी से सीखा है। जैसे ही अम्मा मारने की मुद्रा में आयें, दौड़ लगाकर पहुँच से बाहर हुआ जा सके। अम्मा हाथ में आये को भले पीटपाट लें अपनी हड़ीली, पीली उँगलियों से लेकिन वे दस-बीस क़दम भी दौड़ने में पिछड़कर हाँफने लग जाती हैं, सो वो जान गई है अपनी नन्ही बुद्धि में...जीवन का ज्ञान !

‘‘क्या है ?’’

‘‘अम्मा भूख लगी है !’’

‘‘अभी तो खाई थी रोटी घण्टा भर पहले !’’

दीपा चुप है किसी गुनहगार की तरह; लेकिन उसकी रिरियाती दृष्टि में भूख़ साक्षात् है। रुक्मिणी सख़्त चिढ़ती है इस नज़र से।

‘‘मर ! खा ले !’’

दीपा दौड़कर चौके में आती है। बाँस की डलिया में, धोती के टुकड़े से ढँकी रोटियों में से एक रोटी खींच लेती है। वहीं बैठकर खाने लगती है। मोटी रोटी को मुँह भरकर बड़े कौर में निगलती दीपा बीच-बीच में अम्मा के चेहरे को देखती जाती है। कहीं अम्मा मारने न लगें ! यहाँ से तो भाग भी नहीं सकती एकदम। पता नहीं निवाला अटका है कि माँ कि शिकन भरी दृष्टि का असर है; रोटी खाती दीपा की आँखों में चुप-चुप आँसू भर आये हैं। ...माँ के माथे पर शिकन-सी साढ़े चार साल की दीपा !

‘‘जा, पानी पी आ। और थाली में तरकारी लेकर रोटी खा।’’

माँ ने कुछ नर्म लेकिन उसी स्थायी दूरी भरी आवाज़ में कहा। दीपा पानी पीने को जलघरा की ओर दौड़ गई। लटाये बालों, मैली फ्रॉक और धूल भरे हाथ-पैरों वाली दीपा जलघरा के मटके से पानी लेकर, ओक बनाकर पी रही है। पायल आँगन लीप रही है। रुक्मिणी दोनों बेटियों को देख एक गहरी साँस छोड़ती है। कम-से-कम बड़ी बेटी संध्या से तो निबटी वो; चार महीने पहले ही उसे सम्मेलन से ब्याह दिया है। साढ़े पन्द्रह साल की संध्या की उमर अठारह बरस लिखवाई सरकारी सम्मेलन वालों के काग़ज़ों में, तो सुभीते से बेटी के हाथ पीले हो भी गये। लल्ला के बापू का तो धेला ख़र्च नहीं हुआ पूरे ब्याह में, तब भी भले आदमी से ये भी न बना कि उसे एक नई धोती दिलवा दी होती बेटी के ब्याह पर; और उसके मतलबी मायकेवालों से भी इतना न बना कि इस मौके़ पर तो कन्यादान लेने वाले जोड़े के लिए कपड़े भेजने की रस्म निभा देते। मारे ग्लानि के वो कुछ न बोली। कभी फेरीवाले से, छुपे पैसों की ख़रीदी डेढ़ सौ की साड़ी पहनकर ही वो कन्यादान में बैठी जबकि लल्ला के बापू कोरे कुर्ता-पायजामा पहने थे ! वो याद करती है, कित्ती सारी चीज़े मिली थीं संध्या को सरकार और सेठों की तरफ़ से दान-धर्म में ! सिलाई मशीन, पलंग, अलमारी, प्रेस, साड़ी, चाँदी की पायल, कुकर, रसोई के बर्तन और वो गैस चूल्हा ! — गैस चूल्हे की याद आते ही रुक्मिणी का दिल कड़वाहट से भर उठा। विदाई बेला में उसने गैस चूल्हा उठाकर अपने गाँव जाने वाले ट्रेक्टर की ट्राली में रखा ही था कि दुल्हन बनी साढ़े पन्द्रह साल की संध्या ने घूँघट उठाकर भरी सभा में उसे टोक दिया था,
‘‘ऐ अम्मा ! हमारा गैस चूल्हा वापिस करो।’’

ससुराल पक्ष के बूढ़े गद्गद् हो उठे; दुल्हन ससुराल में वफ़ादार रहेगी !
रुक्मिणी पर घड़ों पानी पड़ गया था। इस नासमिटी को अपनी ग़रीबन माँ पर इतनी भी दया न आई कि मुफ़्त में मिला गैस चूल्हा उसकी तरफ़ छोड़ दे ! पालपोस कर इसी दिन के लिए बड़ा किया था बेटी को ?? अब कभी न बुलायेगी अपनी देहरी पर ! मौरछठ, गौना, पच — कभी एक धेला, एक लत्ता न भेजूँगी किसी मौक़े-त्यौहार पर तब पता चलेगी मायकेवालों की कीमत ! बनी रहे ससुराल की देहरी की कुतिया !
...यों इस घर में ऐसा कुछ क़ीमती है भी नहीं बेटी की ससुराल भेजने को !




गृहस्थी का पूरा कामकाज सम्हालती रही बड़ी बेटी की याद थकी रुक्मिणी को रह-रहकर आती है। याद आती है तो क्रोध भी आता है। और सामने ये जो दो लड़कियाँ हैं, इन्हें देख-देख क्रोध भीतर सदा सुलगा-सा रहता है। बेटियों से नज़र हटाकर वो लल्ला को निहारने लगती है जो इतना दूध पी चुका है कि अब उगल रहा है। दीपा के पैदा होने के बाद, उसने तीन बार, गहने बेचकर पेट में आई बेटियाँ गिरवायीं तब कुलदीपक की सूरत देखने को मिली है। बकती हैं गाँववालियाँ, बका करें कि इस देहरी पर कुल पाँच अजन्मी कन्याओं के वध हुए हैं; इस घर का पानी भी पीना पाप है !

‘‘अम्मा ?’’
अब किवाड़ की ओट से पायल झाँक रही है, उसी स्थायी दूरी के साथ, दौड़कर भाग सकने लायक।

‘‘आँगन लिप गया ?’’

‘‘स्कूल का टाइम हो गया है। लौटकर लीप दूँगी।’’

‘‘तब नहीं हुआ था स्कूल का टैम जब खेल रही थी हुरदंगिया ! मत जा आज स्कूल। पहले पूरा आँगन लीप फिर पानी भरने जा।’’

‘‘जाने दो मौड़ी को स्कूल।’’ घास का गट्ठा आँगन में पटककर, बूढ़ी गाय को छप्पर तले बांधा; और चबूतरे पर बैठकर सुस्ताने लगा गृहस्वामी।

धनी लौट आये हैं; प्रफुल्लित मन से रुक्मिणी लल्ला को गोद में लिए कोठरी की देहरी पे आ बैठती है। आज तो ये बड़े सबेरे ही गाय लेकर निकल गये थे। गाय चर भी आई है और इतनी घास भी ये ले आये हैं कि आज के दोनों वक़्त की सानी बच गई। रुक्मिणी निहाल है। बेटा पैदा करने की अपनी क़ाबिलियत पर उसे गर्व महसूस हुआ। लल्ला का मुँह जिस दिन से देखा है, नशे में बुथीं धनी की आँखें खुल गई हैं वर्ना तो पिछले दस सालों से नशा-पत्ती-जुये का वो जीवन जिया कि बीस बीघा ज़मीन बिक-बिककर अब सात बीघा भर बची है।

‘‘पानी भरने तुम काये नहीं जाओगी आज ? मेंहदी रची है पैरों में ?’’

बीड़ी सुलगाते हुए रामप्रकाश ने कहा। रुक्मिणी ने चुप रहना ठीक समझा। क्या पता मुँह से कोई तेज़ बात निकल गई तो दो-चार थप्पड़ तो यों ही पड़ जाने हैं।

‘‘इस बीड़ी में साली कुछ मज़ा नहीं। जा, चिलम भरके ला।’’

रुक्मिणी झटपट चिलम भरकर देती है।
‘‘मुझे खेत जाना है फिर लल्ला को कौन देखेगा ?’’

‘‘डाल जाओ अपने सपूत को यहीं चबूतरा पे। पहले पानी भर लाओ फिर खेत चली जाना। मौड़ा की फिकर न करना।’’

‘‘आप नाहक परेशान होओगे। और फिर इस मौड़ी को रोज ही स्कूल जाने का क्या चस्का है ? घर के चार कामों से जी दुकाकर वहाँ लड़कों संग हुरदंग मचाने के सिवा करती क्या होगी बदमाशिन ?’’

‘‘वहाँ करती क्या होगी ?? कुपढ़ ! तू क्या जाने कि स्कूल तो रोज ही जाना पड़ता है। मास्टरजी हाजिरी लगाते हैं नहीं तो मार पड़ती है। जा, तू पानी भरके ला !’’

स्कूल का मुँह तो रामप्रकाश ने भी कभी न देखा था, लेकिन वो स्कूल जाने के फायदे ज़रूर जानता है — स्कूल में खाना मिलता है ! साल में एक जोड़ी युनीफार्म मिलती है! किताबें मिलती हैं! और सालाना वजीफ़ा भी तो मिलता है! इस साल बेटी के वजीफ़े के दो हज़ार रुपयों से रामप्रकाश ने अपने लिए दो जोड़ी नये कुर्ता-पजामा ख़रीदे थे; गले में डालने को छन्नी-तौलिया और प्लास्टिक के जूते अलग। वो जानता है, उसी दिन से ये बैरन मौड़ी के स्कूल जाने के ख़िलाफ़ हो गई है।

गगरे लेकर पानी भरने जाती रुक्मिणी को पति ने कहा,
‘‘अगली साल मौड़ी का वजीफ़ा मिले तो तुम अपने लिए धोतियों का जोड़ा ले लेना।’’

‘‘हओ ! ख़ूब पहन लिया वजीफ़े से धोतियों का जोड़ा! कछू सुख आपकी बड़ी मौड़ी दे गई; ये तो और, उसकी चुटिया पे की तेज़ है।’’

वो कुड़बुड़ाती चली गई, अपनी पंजर काया से दो बड़े गगरे सम्हाले जिन्हें अभी भरकर लाना है कई-कई बार।

‘‘दीपा, जा, भईया को घुमा ला।’’

रामप्रकाश ने अपनी उखड़ती साँसों में चिलम का सुट्टा खींचा और चौपाल की तरफ़ निकल गया।

इस पूरे माहौल के बीच पायल ने फटाफट नहाकर युनीफार्म पहन ली, दो चोटियाँ बना लीं और किताबों का झोला उठाकर बाहर निकल आई। कच्ची सड़क पर, झोला उठाये वो ऐसे दौड़ती चली जा रही है जैसे परिन्दे उड़ान भरते हैं आसमान में पहुँचने के लिए। स्कूल उसे बहुत अच्छा लगता है। इतना अच्छा कि जब वो स्कूल में नहीं होती, तब भी स्कूल के बारे में ही सोचती रहती है। हर दिन जब भी स्कूल खुलता है, पायल स्कूल ज़रूर-जरूर आती है; चाहे घर पर मार ही क्यों न खा ले इसके लिए।
— नाखून काटने चाहिए। ...उसके झोले में, पन्नी में लिपटी ब्लैड की आधी पत्ती हमेशा होती है। अपने भी नाखून  काटती है और दीपा के भी।

— दाँत सुबह और रात को माँजने चाहिए। ...दो समय दातुन करना उसके लिए खाना खाने जितना ही ज़रूरी काम है अब।

— रोज़ नहाना चाहिए। ...पायल अब साल के तीन सौ पैंसठ दिन नहाती है, चाहे ओले ही क्यों न बरस रहे हों आसमान से।

— साफ़ कपड़े पहनना चाहिये। ...अपने कपड़े धोने के लिए पायल हिंगोटे बीन लाती है पास के जंगल से।

स्कूल में सुनी-सीखी हर बात जैसे उसकी अपनी आत्मा का आदेश होती है उसके लिए।




पेड़ के नीचे कक्षायें लग चुकी हैं। गाँव की प्राथमिक शाला के कुल जमा तीन कमरों में से दो पर सरपंच का कब्ज़ा है। एक में भूसा भरा रहता है, दूसरे का, आगे का दरवाज़ा चिनवा के एक दरवाज़ा पीछे बनवा लिया है अपनी बखरी के ऐन सामने। उसमें उनके मवेशी बँधते हैं। स्कूल के अख़्तियार में सिर्फ़ एक कमरा है जिसे हेडमास्टर का ऑफिस, स्कूल की स्टेशनरी रखने का स्टोर, मध्यान भोजन का सामान रखने की रसोई और पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी पर फहराने वाला झंडा रखने की जगह  — हर संभव तरह से उपयोग किया जाता है। कक्षायें पेड़ के नीचे लगती हैं जहाँ कुत्ते और आवारा मवेशी भी फिरते रहते हैं। कक्षा के समय के अलावा छात्र-छात्रायें इस मैदान से गोबर इकट्ठा करते देखे जा सकते हैं जिसके लिए अलग से पन्नियाँ वे अपने बस्तों के साथ लाते हैं।

पेड़ के नीचे कक्षा लगी है। पायल चुपके से आकर टाटपट्टी के अंतिम सिरे पर बैठ गई है। ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखते शिक्षक ने उसे देख लिया; पर बुलाकर सज़ा नहीं दी है। शिक्षक एक निराश शिक्षाकर्मी है जो शहर से, बस पकड़कर, साइकिल चलाकर हर दिन गाँव आता है स्कूल में पढ़ाने। उच्च शिक्षित होने के बाद भी उसे यही नौकरी मिल सकी है जो न स्थायी है न वेतन पर्याप्त है। ...पर इस नौकरी के भी उम्मीदवार हज़ारों थे। यहाँ तो सरकारी चपरासी की नौकरी के लिए भी पीएचडी होल्डर से लेकर एमबीए तक मिल जाते हैं। शिक्षक बिला नागा पढ़ाने आता है।

ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखा जा चुका है। बच्चे अपनी कापियों पर सवाल हल कर उठे हैं। वो वहाँ, सबसे पीछे क्या कर रही है ? शिक्षक को अब अपनी इस छात्रा पर गुस्सा आया। एक तो देर से आई है फिर धूल में खेल रही है ! पूरी कक्षा सवाल हल करने में व्यस्त है। सर हरी संटी हाथ में लिए चुपचाप टहलते हुए पीछे तक आये हैं।
— ये क्या ??

सवाल का रफ़ कार्य पायल एक सींक से धूल पर लिखकर कर रही है। काग़ज़ और पेन-पेंसिल उसके लिए कितने दुलर्भ हैं, सर जानते हैं। उन्होंने अक्सर ही उसे रेस्ट टाइम में स्कूल परिसर में काग़ज़ के गिरे टुकड़े बीनते देखा है। दूसरे बच्चों की फेंकी या गिरी स्लेट पेंसिल के बारीक टुकड़े भी वो बीन लेती है। स्लेट पर ही वो हमेशा रफ़ कार्य करती है कक्षा में। आज शायद वो भी नहीं है इसके पास।
सर को संटी लिए सामने घूरते देख पायल चुपचाप खड़ी हो गई। पूरी कक्षा उसकी ओर देखने लगी है। अपनी ग़रीबी का उसे बख़ूबी एहसास है। उसका सिर झुक गया है।

‘‘हूँ। जवाब तो एकदम सही है।’’

सर ने हरी संटी से धूल पर हल सवाल के नीचे राइट का निशान बना दिया।
‘‘शाबास ! ये लो तुम्हारा इनाम !’’

ज़ेब के दोनों पेन निकालकर सर ने उसकी ओर बढ़ा दिये।

मुख्य परीक्षायें सिर पर हैं। पायल जब देखो तब पढ़ती ही रहती है। पढ़ती नहीं जब, तब भी मन ही मन पढ़ती रहती है। घर के तमाम काम उसके हाथों बिगड़ते हैं और वो अम्मा से कभी गाली, कभी मार खाती ही रहती है इन दिनों; लेकिन पढ़ाई में उसका ध्यान अटल है। उसके भीतरी अंधेरों में जैसे कोई ज्योति जगमगा रही है। अंधेरा ज्योति पर एकाग्र; ज्योति अंधेरे पर एकाग्र ...पढ़ाई के लिए पायल; पायल के लिए पढ़ाई !
आँगन में लालटेन जल रही है। झटपट खाना खाकर पायल फिर लालटेन के पास आ बैठी है और किताब-कापियाँ खोल लीं। सब काम निबटाकर, सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर बने कच्चे कोठे में सोने जाने से पहले अम्मा ने रुककर उससे पूछा,
‘‘बर्तन माँजकर रख दिये पायल ?’’

‘‘कल परीक्षा है।’’ किताब से बिना सिर उठाये उसने जवाब दिया।

लड़की की मुँहजोरी रुक्मिणी को असहनीय है; पर समय को देख, वो ख़ून का घूँट पीकर रह गई। कोटे में जाते वो अभी हाल ही तो कहकर गये हैं कि जल्दी आना। लल्ला को भी उन्होंने सुला दिया होगा। अब अगर ऐसे समय में इसे पीटेगी तो इस कलमुंही की चीख-पुकार से कहीं वे नाराज़ न हो जायें ! पड़ोसी सुनेंगे तो फिर बुराइयाँ होंगी उसकी कल कुँए पर।
दाँत मिसमिसाती रुक्मिणी हाथ में रस्सी का माँजन लिए राख से बर्तन घिसने बैठ गई,

‘‘पढ़के बन जा तू कलेक्टरनी !’’

‘‘देखना अम्मा, कलेक्टरनी ही बनूँगी।’’

‘‘मुँह की बात छीनती है छिनाल! लड़कीजात को ऐसी मुँहजोरी शोभा नहीं देती। लिख ले आज, मेरी बात अगर झूठी पड़ जाये तो ! तेरा धनी जूते मारेगा तुझमें — जूते !’’

‘‘अम्मा, तुम पति को धनी क्यों कहती हो ? धनी तो जानवर के मालिक को कहते हैं ना ?’’

बेटी के सवाल पर अवाक् रह गई रुक्मिणी। सूझा ही नहीं, क्या जवाब दे। वो जल्दी-जल्दी बर्तन धोकर ऊपर कोठे में जाना चाहती है। कहीं वे सो न जाये।

‘‘अम्मा ?’’ अक्सर की तरह आज भी सीढ़ियाँ चढ़ती माँ की धोती की कोर पकड़ ली नन्ही दीपा ने।

‘‘अम्मा, मैं तुमाये पास सोऊँगी। बस आज अम्मा !’’

माँ ने देखी, उसके स्वर की ही नहीं, आँखों की भी कातर याचना। ऊपर से पति के खाँसने का स्वर सुनाई दे रहा है। ये अंतिम संकेत है। रुक्मिणी ने नन्ही मुट्ठी की पकड़ से अपनी धोती का किनारा झटक लिया; और किसी पुर्जे की तरह सीढ़ियाँ चढ़ती चली गई।

‘‘जीजी, कोठरी में चलो। अकेले डर लगता है।’’

‘‘तू यहीं ले आ अपनी कथरी। यहीं सो जा।’’ किताब से नज़र नहीं हटी उसकी।

दीपा अपनी कथरी और तकिया घसीटती ले आई आँगन में।




‘‘जीजी !’’
‘‘अब क्या है?’’
‘‘नींद नहीं आती।’’
‘‘तो पढ़ ले।’’

स्लेट पर वर्णमाला लिखने को दे दी दस साल की गुरु बहन ने, साढ़े चार साल की शिष्या बहन को। कुछ देर लिखती, कुछ देर चित्र बनाती दीपा जीजी की गोद में सिर रखकर सो गई। पायल अपनी पढ़ाई करती, उसे थपकी देती जाती है। ...बहन नहीं, आधी माँ है वो उसकी !

रात शायद आधी पार हो ढल रही है। आसमान का अनंत अंधकार देख रहा है, एक गाँव के, एक आँगन में रोशनी है। दीपशिखा-सी झिलमिल एक लड़की पढ़ रही है ...पढ़ रही है।

रुक्मिणी लल्ला की मालिश कर चुककर उठी है अब उसके लिए दूध बनाने। स्कूल से लौटी पायल को आँगन में पैर रखते देख ही उसने कोठरी से चिल्लाकर कहा,

‘‘जा, गाय को चरा ला। और हैंडपंप पे पानी पिलाती ले जाना याद से।’’

‘‘अम्मा !’’

पायल ने आज आँगन में ही खड़े होकर, कोठरी के किवाड़ से झाँककर बात नहीं की है। डर की स्थायी दूरी को तय करती वो, भीतर आकर खड़ी हो गई है अम्मा के ठीक सामने।

‘‘क्या है ?’’

‘‘ट्यूशन पढ़ाने का काम मिल गया वहीं तुरंत ! स्कूल के बाद, पीछे सरपंच जी के घर एक घंटा ट्यूशन पढ़ाना है उनके नाती को !’’

‘‘हैं ?? तुझे कैसे...??’’

‘‘मेरा पाँचवीं का रिजल्ट खुल गया है — पूरे स्कूल में प्रथम आई हूँ !’’

रुक्मिणी की हथेली पर गुड़ की डली है; और वो सोच रही है — क्या इसे बेटी को दे ??



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