धर्मयुग: हृषीकेश सुलभ की बेजोड़ कहानी 'रक्तवन्या' - #Shabdankan
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धर्मयुग: हृषीकेश सुलभ की बेजोड़ कहानी 'रक्तवन्या'

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केया दास की ज़िन्दगी में घाव ही घाव हैं......चोट ही चोट हैं। वह हर पल अपने शरीर से अलग होते मांस-पिंडों को रिसते लहू में डूबो कर जोड़ने-साटने के प्रयास करती है और बदलती जा रही है एक टेढ़ी-मेढ़ी आकृति में। उसकी ज़िन्दगी के पोर-पोर पर निशान बन गए हैं। कहीं चोट के काले निशान, तो कहीं टँगिया और संगीनों के जख़्म। 

हृषीकेश सुलभ 

हथेलियों को मुट्ठी में बदलने की कोशिश में असफल केया दास की आँखों के सामने से ज़िन्दगी सरक जाती है। बच जाती हैं सिर्फ़ स्मृतियों की टीसें और...शून्य।


हृषीकेश सुलभ की कहानी कोई भी पाठक (या आजकल लेखक भी) जब शब्द-शब्द पढ़ लेगा, वह अपने एकदम पास होने वाली घटनाओं, जिनसे वह ख़ुद को दूर किये होता है, अनभिज्ञ-सा दीखता होता है, को अपने अंतस को झकझोरता पायेगा, और फिर उसका इन्सान कदापि उसे पीठ नहीं दिखायेगा। साहित्यकार का धर्म जब व्यापारी के धर्म से रेस मिलाने लगता है तब वह साहित्य-संसार बनता है जो वर्तमान है। इस रेस में शामिल होते के साथ, उसका सरोकारों को पछाड़ देना, रचनाधर्मी को कुचलते हुए व्यापार-धर्म का जीत जाना है... मगर इस वर्तमान में अभी हृषीकेश सुलभ की मौजूदगी यह बतलाती है कि रचना के साहित्यकार और दुकानदार में हार बेचने वाले की ही होनी है। कोई 35 साल पहले छपी इस कहानी का आज, अभी-का सच कह देना, और कुछ भी कहने की गुंजाइश बाकी नहीं रहने देता।

'रक्तवन्या' पर, जो १९८२ में धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी, हृषीकेशजी कहते हैं, "भारतीजी (धर्मवीर भारती) ने बहुत प्यार से इसे छापा था।"

भरत तिवारी


धर्मयुग: हृषीकेष सुलभ की बेजोड़ कहानी 'रक्तवन्या'

रक्तवन्या

— हृषीकेश सुलभ

सिर्फ़ सात-आठ जवान लड़कियाँ। कसाई की दुकान में टँगे गोश्त की तरह थर-थर काँपती हुई लड़कियाँ। 


अजीब होती जा रही है केया दास। उसे अब अपने-आप से भय लगने लगा है। जंगल की ये रातें उसे तिलिस्मी लगती हैं। डरावनी। पूरे शरीर में सिहरन भर देने वाली रातें।

केया दास करवटें बदलती है। बिस्तर पर छटपटाती है। सिरहाने जलने वाले लैम्प को लगातार घूरती है। तकिए में मुँह छिपा कर रोती है। रात-रात भर जागती रह जाती है केया दास। पहाड़ी के शीर्ष से गिरने वाले तीरथगढ़ के झरने का-सा शोर उसकी कोठरी में भर जाता है। दरभा घाटी में खड़े शाल-वृक्षों को झकझोर कर बहने वाली तूफ़ानी हवा के झोंके अयाचित मेहमान की तरह आकर दस्तकें देने लगते हैं। केया दास को यह कोठरी कोटुमसर गुफा के गर्भ की तरह लगती है। गुफा-तल पर बने छोटे-छोटे गड्ढों में तैरने वाली अंधी मछलियों की तरह वह इस कोठरी में हाथ-पाँव मारती रहती है।

रात जैसे-तैसे कटती है। रोशनी का लाल टुकड़ा किसी वनपाखी की तरह दाना चुगने के लिए खिड़की से घुसता है। कोठरी में रोशनी रेंगने लगती है। सुबह के आकाश में मूँगिया रंग के बादल के टुकड़े टँगने लगते हैं। केया दास जम्हाई भरती है। कोठरी से बाहर निकलती है। आकाश की ओर मुँह उठा कर देखती है और काँप उठती है साँभरी की तरह, मानो बादल के टुकड़े मुँह उठा कर उसे दबोचने के लिए झुके आ रहे हों।

दिन होता है। जंगल का जीवनक्रम बदलता है। केया दास को लगता है, वह हिंसक वन-पशुओं के झूंड के बीच घिर गई है। जंगल के बीच इस्पाती चट्टानों की काली पट्टी की तरह बिछी सड़क पर ट्रकों का गुज़रना शुरु हो जाता है। सामने नाका पर खाकी वर्दी में बैठा फॉरेस्ट गार्ड कोठरी के दरवाज़े पर खड़ी केया दास को घूर रहा है। केया दास को लगता है, जैसे उसकी छाती पर कोई तेज़ धार वाली टँगिया से वार कर रहा हो......छप...छप...छप...!

केया दास की ज़िन्दगी में घाव ही घाव हैं......चोट ही चोट हैं। वह हर पल अपने शरीर से अलग होते मांस-पिंडों को रिसते लहू में डूबो कर जोड़ने-साटने के प्रयास करती है और बदलती जा रही है एक टेढ़ी-मेढ़ी आकृति में। उसकी ज़िन्दगी के पोर-पोर पर निशान बन गए हैं। कहीं चोट के काले निशान, तो कहीं टँगिया और संगीनों के जख़्म। कभी जख़्मों से लहू रिसता है, तो कभी मवाद। केया दास ने संगीनों की नाव पर लहू की नदी को पार किया है और तब पहुँची है टँगिया, हिंसक वन-पशुओं और तूफ़ानी बयार वाले इस जंगल में। कभी न रुकने वाली यातना के इस लम्बे सफ़र में थक चुकी है केया दास। उसके पाँवों से लिपटी हैं अतीत की लतरें।

......पूर्वी बंगाल का शहर फ़रीदपुर। पद्मा नदी के किनारे बसा शहर फ़रीदपुर। केया दास को लगता है, जैसे भूकंप आ गया हो। पृथ्वी फिरकी की तरह डोलने लगी हो। गोला-बारूद के विस्फोट......। मशीनगनों और बन्दूकों की आवाज़ें...। संगीनों से छिदते-बिंधते शरीर। चीख़ें। पुकारें। शरीर से उतरते वस्त्रों की होली। पाशविक पंजों से नुची देह। नंगी देह। केया दास के सामने पड़ी है वृद्ध बाबा की लाश। भाई का दो टुकड़ों में बँटा शरीर। तेरह वर्षीय बहन की लहूलुहान लाश। रोती-बिसूरती पीशी माँ......और इन सबके बीच पड़ी है स्वयं केया दास की नंगी-बेहोश देह।

......पद्मा का जल लाल होता जा रहा है। ...पद्मा में लहू मिलता जा रहा है। फ़रीदपुर अब शहर नहीं रहा। फ़रीदपुर धुएँ और शोलों से ढका जलता हुआ ख़्वाबगाह है। केया दास भाग रही है। जलते-सुलगते सपनों की लाशें फलाँगती हुई भाग रही है। बुढ़िया पीशी माँ के साथ संगीनों की नाव पर सवार केया दास प्रलय की धारा में बहती जा रही है।

......शरणार्थी शिविर की काली रातें। अँधेरे की मुट्ठी में मृतप्राय ज़िन्दगियाँ, जैसे घुप्प अँधेरी कोठरी में बुझती ढिबरी की लौ। मासूम बच्चे और क़ब्र में पाँव लटकाए बूढ़े लोग। कराहें, आँसू और चुप्पी। पपड़ी पड़े होठों की घाटियाँ। रीत गई आँखों का रेगिस्तान। सिर्फ़ सात-आठ जवान लड़कियाँ। कसाई की दुकान में टँगे गोश्त की तरह थर-थर काँपती हुई लड़कियाँ। क्या-क्या छूट गया फ़रीदपुर में? केया दास अँगुलियों पर हिसाब करती है। अँगुलियों के पोर ख़त्म हो जाते हैं और हिसाब करना बाक़ी रह जाता है। शिविर तक साथ आने के बाद भी कई लोग साथ छोड़ गए। किसी को संगीन का जख़्म खा गया, तो किसी का फेफड़ा बारूद के धुएँ से नाकाम हो गया। कोई अपंग ज़िन्दगी से लड़ते-लड़ते थक गया, तो कोई मन में बैठी दहशत से पागल होकर मर गया। केया दास को नहीं मालूम कि वह कैसे जीवित बच गई। उसका पेट पृथ्वी बनता जा रहा है। माह गुज़रते हैं — एक के बाद एक। ......और समूची केया दास पृथ्वी बन जाती है। वह लोगों की भीड़ में अकेली सोई रहती है — पृथ्वी की तरह ऊपर से निश्चल और शांत,...पर पृथ्वी के अन्दर कोई तूफ़ान मचाता है। समूची सृष्टि को उलट देने के लिए आकुल कोई हाथ-पाँव मारता है। पृथ्वी की छाती में बारूद के गोले फूटने लगते हैं और आँखों में रक्तवन्या की धारा तेज़-तेज़ दौड़ती है। शिविर नींद में कराह रहा है और केया दास अपने पेट पर मुक्के से प्रहार कर रही है। मुक्के......लगातार मुक्के......अनगिनत मुक्के। दाँतों तले दबा निचला होंठ दर्द से स्याह होता जा रहा है। फिर पृथ्वी रक्तवमन करने लगती है। शिविर में शोर भर जाता है। दहशत से भरे लोग रक्त में सनी केया दास को देखते रह जाते हैं।

पीशी माँ केया दास के सिरहाने बैठी सुबक रही है। डॉक्टर दवा देकर जा चुका है। शिविर की हलचल रुक गई है। केया दास के होंठ बुदबुदाते हैं, “आपनार नाम की ?”

“आमार नाम? आमार नाम मानस......मानस मुखर्जी।”

पता नहीं कब अतीत का भूला हुआ संवाद याद आने लगता है। ......मौलश्री की गझिन होती छाँव। परिचय का गाढ़ा होता हुआ रंग। पंख लगा कर उड़ते हुए सपने।



“केया, बीयेर पर आमादेर एकटि छोट्टी बाड़ी होबे......मौलश्री बने।”

“बाड़ीर दरकार हबेइबा कैनो...आमरा मौलश्री बने थाकबो। ......मौलश्रीर छायार तले।”

मानस हँसता है। मौलश्री के ढेर सारे फूल झरते हैं। केया दास आँचल फैला कर फूल बटोर रही है।

मौलश्री की छाँव..., वे झरते हुए फूल — सब कुछ बह गया पद्मा की रक्तवन्या में। इस जंगल में तो एक भी मौलश्री का पेड़ नहीं है। केवल शाल-वृक्ष हैं। संगीनों की तरह मुँह उठाए..., आकाश की छाती में चुभते हुए शाल-वृक्ष।

सूरज खिड़की से ऊपर उठ गया है। केया दास अपने लम्बे बालों को सहेजती है। समेट कर पीछे बाँधती है। दिनचर्या निबटाती है। रात का बचा हुआ खाना गर्म करती है। खाने के बाद कन्धे से झोला टाँगती है। कोठरी में ताला डाल कर बाहर निकलती है। लाल मूरम से पटी यह पगडंडी पक्की सड़क से जुड़ती है। नाके पर बैठे लोगों के शरीर में हरकतें भरने लगी हैं। फॉरेस्ट गार्ड ने बीड़ी सुलगा ली है। ठेकेदार हरसुख गोलछा के मुंशी की नाक फूलने लगी है। कम्पाउंडर राधाचरण ने ताश के पत्ते फेंक कर अपनी आँखों पर धूप-छाँह वाला चश्मा चढ़ा लिया है। केया दास नाका पार करती है। फॉरेस्ट गार्ड राग अलापता है, “हाथ चो चूड़ी कोन लेका दिलो ,”

कम्पाउंडर और मुंशी दोहरे स्वर में राग भरते हैं, “नाका पर जाउन रिलिस नाका वाला दिलो।”

केया दास के दाहिने हाथ में थरथरी भर जाती है। वह अपनी कलाई को देखती है। चूड़ियाँ एक-दूसरे से टकरा रही हैं। पीछे से आती ठहाकों की आवाज़ के व्यूह में घिरी वह छटपटा उठती है। ठहाकों की ध्वनि हिंसक वन-पशुओं की तरह दूर तक उसका पीछा करती हैं।



स्कूल में दोपहर की छुट्टी होती है। लड़के अपनी-अपनी स्लेटें और क़िताबें छोड़ कर दौड़ते हैं। देखते-देखते स्कूल का कमरा, बरामदा और फिर सहन ख़ाली हो जाता है। आड़ी-तिरछी रेखाओं पर चलते हुए बच्चे नीलगिरि के पेड़ों के बीच खो जाते हैं। ......ये पेड़ दसे भले नहीं लगते। सूख कर अलग होती छाल वाले इन पेड़ों को देख कर उसे लगता है, जैसे जंगल को कोढ़ फूट रहा हो। इन पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए केया दास का दम घुटता है।

पूरा स्कूल चुप पड़ा है। केया दास वहीं बरामदे में बैठी नीलगिरि की फुनगियों को निहार रही है। हवा की लहरों से पत्तों में सरसराहट है,......और है एक अजीब-सी आवाज़। उसके भीतर भय पैठने लगा है। आँखों पर पड़ती सूरज की रोशनी धुँधली होने लगी है। धुँधलके में केया दास का अतीत उभरता है।

...एक कैम्प,...दूसरा कैम्प,......फिर तीसरा कैम्प।

ज्गदलपुर के पश्चिमी छोर पर लगे धरमपुरा कैम्प में आते-जाते केया दास के पास शरीर के नाम पर सिर्फ़ हड्डियाँ और सिकुड़ती चमड़ी बची है। पीशी माँ दिन-रात सेवा करती है। रात-रात भर सिरहाने बैठ कर सान्त्वना देती है। केया दास की आँखों में आँसू की लहरें डोलती हैं। पीशी माँ अपने आँचल से उसकी आँखें पोंछती है और ख़ुद सिसकने लगती है, जैसे वह सिर्फ़ केया के लिए अपने जीवन का भार ढोए जा रही हो।

एक डॉक्टर हर दिन नियम से आकर सुबह-शाम केया की जाँच करता है। उसके तपते ललाट पर अपनी हथेली रखता है। मुँह में थर्मामीटर लगा कर बुख़ार देखता है। भौंहों पर अँगूठा रख कर आँखों में झाँकता है। ललाट पर हथेली का स्पर्श पाते ही केया के सीने के भीतर सिहरन की एक रेखा खिंच जाती है।

पीशी माँ को अब दवा और राशन के लिए शरणार्थी वितरण केन्द्र तक नहीं जाना पड़ता। डॉक्टर के हाथों में कभी दवा की शीशियाँ होती हैं, तो कभी पीशी माँ के लिए राशन। पीशी माँ उसे भोलू पुकारती है। केया के पास बैठ कर अपने भोलू डॉक्टर का गुणगान करती है। डॉक्टर पीशी माँ का सम्बोधन सुन कर मुस्कराता है। केया दास डॉक्टर के मुस्कुराते चेहरे पर अपनी आँखें नहीं टिका पाती।

एक दिन डॉक्टर की हथेलियों का स्पर्श पाते ही ज्वर में तपती केया के होंठ हिलते हैं, “आपनार नाम की ?”

डॉक्टर सिर्फ़ मुस्करा कर रह जाता है। केया के तपते ललाट पर अपनी हथेली का स्नेहिल स्पर्श देकर उठ जाता है। वह डॉक्टर को जाते हुए देखती रहती है। उसके सवाल के उत्तर में दसों दिशाओं से आवाज़ आती है — “आमार नाम मानस......मानस मुखर्जी।”

दिन और माह कछुए की चाल से सरकते जा रहे हैं। धरमपुरा कैम्प की हवा में घुली-मिली कराहों और सिसकियों की गंध मिटने लगी है। अब केया बिना किसी का सहारा लिये खाट से उतर कर ज़मीन पर चलती है। अपने पाँवों पर चल कर वह हर शाम तार के घेरे तक जाया करती है और पहाड़ियों के शीर्ष पर आँखें टिका कर कुछ तलाशने की कोशिश करती है। पाँव थक जाते हैं तो पत्थर के टुकड़ों पर बैठ कर चारों तरफ़ आँखें घुमाती है — बेतरतीब फैली झाड़ियों में, जहाँ-तहाँ खड़े शाल-वृक्षों की फुनगियों पर। ......फिर वह आकर उसके पीछे खड़ा हो जाता है। चुप्प। एकदम निःशब्द। केया को जब अपने पीछे डॉक्टर के खड़े होने का अहसास होता है — वह सिहर जाया करती है। कई बार डॉक्टर के जाने के बाद उसने इस सिहरन को पहचानने का प्रयत्न किया है,...उसकी गति को मापना चाहा है, पर वह विफल रही है। अक्सर वह पूछता है, “ क्या देख रही हो ?”

कोई उत्तर दे पाना केया के लिए असम्भव होता है। वह चाहती ज़रूर है कि कुछ बोले। डॉक्टर को बतला दे कि वह क्या देख रही है......कि वह पहाड़ियों के शीर्ष से ढलान तक और पेड़ों की फुनगियों-झाड़ियों के बीच ज़िन्दगी तलाश रही है। ज़िन्दगी..., नन्हे ख़रगोश की तरह फुदकती ज़िन्दगी। ......लेकिन ये शब्द उसके होंठों तक आकर वापस लौट जाते हैं। फेफड़े के बीच जाकर दुबक जाते हैं। केया मात्र औपचारिकता के नाते डॉक्टर की ओर देख कर अपनी आँखें झुका लेती है। वह ख़ामोश केया के उत्तर की प्रतीक्षा करता है। फिर सिगरेट निकालकर सुलगाता है। कश लेते हुए काँटेदार तार के घेरे के बीच जगह चुन कर अपनी दोनों बाँहें टिका देता है।

वक़्त की चोट से केया दास की देह पर उभर आए नीले निशानों का रंग बदलने लगा है। चेहरे पर बनी खाइयाँ भरने लगी हैं। केया चाहती है कि वह स्वस्थ होकर जीने की कोशिशें करे, पर हौसला साथ नहीं देता। स्मृतियों का दबाव इतना तेज़ होता है कि वह हाँफने लगती है। आँखों के आगे फैले अँधेरे के वृत्ताकार घेरों में अतीत की लौ थरथराती है। उस लौ की मद्धिम रोशनी में केया दास अपने वर्तमान और भविष्य की अस्पष्ट छाया देखती है। वह अपनी हथेलियाँ फैला कर इस छाया को मुट्ठियों में बंद कर लेना चाहती है। ...पर अँगुलियों की पोर अकड़ जाती हैं। हथेलियों को मुट्ठी में बदलने की कोशिश में असफल केया दास की आँखों के सामने से ज़िन्दगी सरक जाती है। बच जाती हैं सिर्फ़ स्मृतियों की टीसें और...शून्य।

पुनर्वास योजना के अन्तर्गत धरमपुरा के पास ही एक गाँव में मिली झोपड़ी में केया दास के दिन सरकते हैं और रातें कटती हैं। पीशी माँ ने पासा पलट दिया है। खाट पकड़ ली है। पीशी माँ की सेवा-टहल, हिन्दी की पढ़ाई और कपड़ों पर कसीदाकारी — केया की दिनचया इन्हीं कामों की परिधि में घिर गई है।



डॉक्टर अब अक्सर सुबह आता है। महुआ के छतनार पेड़ों की छाया में अलसाई झोपड़ी के दरवाज़े पर साइकिल की घंटी ट्रिंग-ट्रिंग बजा कर आवाज़ देता है — “पीशी माँ......पीशी माँ!”......और किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना अन्दर चला जाता है। पीशी माँ के सिरहाने बैठ कर घंटों उनकी बातें सुनता है। केया चाय का कप देकर अपने कामों में लग जाती है...और वह अपनी आँखों से उसका पीछा करता है। केया दास पूरे घर में थरथराती हुई डोलती फिरती है या कपड़े पर सुई-धागे से रेखाएँ बनाती है। डॉक्टर की आँखों की दबाव से अक्सर सुई-धागा अपनी लक्ष्य से अलग हो जाता है। केया की अँगुलियों की पोर से लहू रिसने लगता है। रिस-रिस कर टपकती लहू की बूँदें उसके मन में दहशत भर देती हैं। उसे लगता है, ये बूँदें धारा बन जाएँगी......रक्तवन्या की धारा।

वह बाहर जाती हैं। दरवाज़े पर बैठ जाती है। घुटनों में मुँह छिपा कर रोती है।

......और एक दिन डॉक्टर उसे दरवाज़ा के पास बैठ कर सुबकते हुए देख लेता है। उसकी धीमी आवाज़ केया दास को दुलारती है, “ केया...केया!”

केया दास उसकी आवाज़ का स्पर्श पाकर सिहरती है।

“मेरी तरफ़ देखोगी भी नहीं ?” प्रार्थना के बोल की तरह डॉक्टर की आवाज़ फिर उसे छूती है। डॉक्टर उसके सामने ज़मीन पर ही पालथी मार कर बैठ जाता है। केया डबडबाई आँखों से उसे निहारती है। पाँव के पास छिटक आए महुआ के दानों को उठा कर हथेली पर डगराते हुए डॉक्टर बोलता है, “केया, आदमी जब अकेलेपन के भँवर में घिरने लगे, तो उसका मन टूटने लगता है। टुकड़ों में बँटे मन को देह के घोंसले में छिपा कर जी पाना आसान नहीं होता।”

केया के पास अभिव्यक्ति के लिए सिर्फ़ अहसास उभरते हैं और जाने कहाँ जाकर छुप जाते हैं। केया चुप रहती है। डॉक्टर अपने संवाद को आगे बढ़ाता है, “केया! मैं जानता हूँ कि बीच राह में अकेले छूट जाना ख़ुद को मरते हुए देखने या महसूसने-सा दुःख देता है। आदमी को चाहिए कि वह नया रास्ता खोजे। कुछ नया सोचे। तुम्हें मेरी बातें पागलपन लग सकती हैं, पर मैं......”

“रतन!” केया दास के होंठ काँपते हैं। बाक़ी शब्द उसकी आँखों से पानी बन कर ढुलकने लगते हैं। डॉक्टर पहली बार केया की आवाज़ में अपना नाम सुनता है। केया आगे कुछ भी नहीं बोल पाती है।



“केया, हर व्यक्ति के भीतर जीवन को सहजता से जीने की भूख होती है। तुम उस भूख को मार रही हो। मैं तुम्हें सहानुभूति और दया नहीं देना चाहता। चाहता हूँ, तुम्हें नमी दूँ ताकि तुम्हारे मन के भीतर छिपे जीवन के बीज, जो सूखते जा रहे हैं— अंकुरित हों। वे पौद बनें। फिर उनके वृन्तों पर फूल खिलें...जीवन के फूल।”

सुरक्षा की छाँव लिये विशाल वृक्ष की तरह अपने ऊपर पसरते रतन की संवेदनाओं की छाया से अचानक बाहर निकल जाती है केया दास।

“रतन! मेरी एक बात मानोगे?”

“बोलो।”

“मत आया करो मेरे पास। मुझे लगता है, मैं जीवन भर तुम्हारे स्नेह का प्रतिदान नहीं दे सकूँगी।”

“मैंने तुमसे कोई प्रतिदान नहीं माँगा केया। ...कभी नहीं। मैं चाहता हूँ कि तुम सहज जीवन जी सको। ...ऐसा जीवन, जिसमें उछाह हो,...लालसा हो।”

डॉक्टर रतन के शब्द बीच राह में छूट गए राहगीर की तरह ठिठक जाते हैं। केया दास दरवाज़ा बन्द कर चुकी है। डॉक्टर हतप्रभ-सा खड़ा रहता है। भीतर से आती केया की हिचकियों की आवाज़ें सुन रहा है। फिर धीरे-धीरे महुआ के दानों के ऊपर साइकिल डगराते हुए वापस लौट जाता है। केया दास उसके जाते हुए पैरों की ध्वनि से दूर होती जाती है। ...दूर......बहुत दूर।

दूर से आती हुई बच्चों की आवाज़ केया के मन में उभरते अतीत के बिम्बों पर छा जाती है। नीलगिरि के पेड़ों के बीच मृगशावकों के झुंड की तरह उछलते-कूदते हुए स्कूल की ओर आते बच्चों को वह अपनी आँखों में भर लेना चाहती है। स्कूल का सहन, बरामदा और कमरा बच्चों के शोर में तैरने लगता है। केया दास के सामने स्लेटें हैं, ब्लैकबोर्ड पर खड़िया से बने सफ़ेद अक्षर हैं, क़िताबें हैं और हैं झरने के संगीत की तरह फैलती हुई बच्चों की खिलखिलाहटें। केया दास धागा बन कर मनकों की तरह यह सब कुछ अपने साथ पिरो लेना चाहती है।



दिन ख़त्म होने वाला है।

सूरज धीरे-धीरे घाटी के गर्भ में उतर रहा है। स्कूल बन्द करके केया दास वापस लौट रही है। दिन भर की थकान और अतीत के तनाव ने पैरों और मन की गति को शिथिल बना दिया है। यह शिथिलता केया दास को भयातुर बना रही है। अपने भयातुर मन और देह की गाथा को वह इस छोर से उस छोर तक पढ़ना चाहती है। चाहती है, अतीत के एक-एक दिन को अपनी खुली हथेलियों पर रख कर हिसाब करना। केया दास सोच रही है। केया दास बुदबुदा रही है। दिन पर दिन उलझती जीवन-स्थितियों को छटपटाहट के साथ मूल्यांकित करने की कोशिश में लगी है। ज़िन्दगी की गझिन बुनावट से एक-एक धागा खिसकता जाता है। जगह ख़ाली होती जाती है और बुनावट झाँझर। ......मौलश्री की गझिन छाँह की कल्पना लिये मानस फ़रीदपुर की मिट्टी में दब गया। उसकी छाती में उछाह की थिरकन भरने की आकांक्षा लिये डॉक्टर रतन वापस लौट गया। परछाईं की तरह साथ चलने वाली पीशी माँ ने साल भर तक बिस्तर पर लोटने के बाद एक दिन दम तोड़ दिया। सब चले गए। सबने उसकी ज़िन्दगी में अपनी-अपनी यादें टाँक दी। गुज़रे हुए वक़्त के हिंसक नाख़ूनों ने उसकी ज़िन्दगी को ख़ूब खरोंचा है। केया दास खरोंच के उन निशानों को टटोलती है।

......प्राथमिक पाठशाला की शिक्षिका का नियुक्ति-पत्र अपने हाथों में लिये खड़ी है केया दास। आँखों का समुद्र उमड़ रहा है। नहीं......अब और नहीं। वक़्त के हिंसक नाख़ून अब मुर्दा हो रहे है। अब और ज़ख़्म नहीं बनेंगे। ज़ख़्मों से अब मवाद और लहू नहीं रिसेगा। केया दास अब अपने फेफड़े में स्वच्छ हवा भरना चाहती है। भागना चाहती है। दौड़ना चाहती है। केया दास अपने अतीत को अपने हाथों दफ़न कर देना चाहती है। उसके मन में अपने वर्तमान के प्रति संतोष के बीज अंकुरित हो रहे हैं। उसकी छाती में उल्लास की आँच है। ......वह दरभा जाकर नौकरी ज्वाइन करेगी। जंगल की गोद में बसे बच्चों को अपनी आँखों की उजास बाँटेगी। केया दास की ज़िन्दगी को एक ठौर मिल गया है, जहाँ खड़ी होकर वह आने वाले कल के रेखाचित्रों में भरने के लिए रंगों का चुनाव करेगी। वह साँप के केंचुल की तरह अपने अतीत को उतार कर फेंक रही है ताकि बच्चों के स्नेहिल संसार के असीम विस्तार में ख़ुद को निर्बन्ध छोड़ सके।

दरभा घाटी के घने जंगल के बीच केया दास साँभरी की तरह कुलाँचे भर रही है। इस गाँव से उस गाँव जाकर अपने स्कूल के लिए बच्चे तलाश रही है। उसके विचार एक नई ज़मीन पर अंकुरित हो रहे हैं। उसकी कल्पना की पौद उग रही है। केया दास जंगल की पगडंडियों पर तेज़-तेज़ चलती है। वन-पुष्पों को जूड़े में सजाती है। चश्मों-नालों के किनारे रुकती है। अँजुरी भर-भर कर जल पीती है। वह भागते-दौड़ते, चलते-रुकते हर समय सोचती रहती है — जीवन में परिवर्तन का चक्र कैसे-कैसे घूमता है। घटनाओं का क्रम ऐसे चलता है, जैसे सब कुछ पूर्व-नियोजित हो। ...क्या जीवन ऐसे ही चलता है? अपने आप जीवन का यह टूटना-जुड़ना सोच की गति में अवरोध नहीं बनता? वक़्त शरारती बच्चों की तरह ईंट-पत्थर फेंक कर उसे क्षत-विक्षत करता रहा,...भीड़ का रेला हर पल उसके चारों तरफ़ से गुज़रता रहा,...रोशनी की तलाश में दिशा बदलती उसकी प्रतिछाया तले गिद्ध लाश खाते रहे और वह अनन्त की ओर अपनी आँखें स्थिर किए पड़ी रही। किसी ने उसके ऊपर से ईंट-पत्थर चुन कर अलग नहीं किया। किसी ने गिद्धों को भगा कर सड़ती लाशों का जमघट साफ़ नहीं किया। किसी हथेली ने कौवों की बीट को पोंछा नहीं। ...क्यों?...क्यों?...ऐसा क्यों हुआ उसके साथ? केया दास के पाँवों की गति जैसे-जैसे तेज़ होती है, ‘क्यों‘ की कड़ियाँ लम्बी होती जाती हैं। हरेक कड़ी से रतन झाँकता है — डॉक्टर रतन। केया सिहर जाती है। भाग-दौड़ करके सप्ताह भर में ही उसने स्कूल के लिए बच्चों का जमघट खड़ा कर लिया है। क्या वह बच्चों की इस भीड़ को अनुशासित जीवनक्रम दे सकेगी? अगर रतन प्रश्नों के बीच से इसी तरह झाँकता रहा, उसे सिहरन देता रहा, तो क्या वह अपनी ज़िन्दगी के इस ठौर पर रुक कर भविष्य में सपनों में रंग भर सकेगी? निहार सकेगी अपने कल के सलोने रूप को? केया दास के सामने प्रश्न हैं। ...सिर्फ़ प्रश्न।



दरभा घाटी का जंगल केया दास के चारों तरफ़ व्यूह रच रहा है।

धीरे-धीरे व्यूह का दबाव तेज़ होता है। केया दास को झटका लगता है। उसके मन का उछाह काँप उठता है। वक़्त के हिंसक नाख़ूनों में फिर जान आने लगी है। ...पर इस बार वह समर्पण नहीं करेगी। वक़्त की देहरी पर लहूलुहान लाश की तरह नहीं बिछेगी। ...नहीं। वह जंगल के इस व्यूह को तोड़ेगी।

व्यूह के एक द्वार पर खड़ा रेंजर ज्ञान सिंह बोल रहा है, “आप पहली शिक्षिका हैं। इसके पहले शिक्षक लोग ही यहाँ आते रहे हैं। शायद तीन लोग आपके पहले यहाँ आ चुके हैं, पर टिका कोई नहीं। चार साल हुए स्कूल को खुले, पर चार दिन भी पढ़ाई नहीं हुई होगी अब तक। कोई टिकना ही नहीं चाहता। आते ही हर आदमी जाने की कोशिश शुरु कर देता है। किसी को बाघ-भालू का डर,...किसी को मलेरिया का डर, तो किसी को पत्नी-वियोग। ...इसी लिए मैंने शादी ही नहीं की। अकेले इस जंगल में पड़ा हूँ।” रेंजर ज्ञान सिंह के होंठों पर काली मुस्कान लिपट जाती है। केया दास सिहरती है। वह बोले जा रहा है, “......पर आपको यहाँ कोई तकलीफ़ नहीं होगी। मै। हूँ। ...आप जो सुविधा चाहें,...मिल जाएगी। मन भी लगेगा यहाँ। ये साले ट्राइबल्स अपनी औलाद को पढ़ाना ही नहीं चाहते। इस लिए स्कूल में छुट्टी ही छुट्टी रहती है। टहलना-घूमना,...मौज-मस्ती करना — बस यही काम है यहाँ। ख़ूबसूरत जगह है। ...तो चलूँ? बाँस का आक्षन करवाना है। डी. एफ. ओ. साहब भी आ रहे हैं। ...किसी चीज़ के लिए संकोच नहीं करेंगी। ...अच्छा...चलता हूँ।”

घुर्र-घुर्र करती जीप के इंजन की रिरियाहट में डूब जाती है केया दास। लाल मूरम वाली धूल उड़ाती हुई जीप काली सड़क पर चढ़ जाती है। वह अपने सीने में जल्दी-जल्दी साँसें भरती है।

“नमस्ते जी।”

“नमस्ते।”

“आप मास्टरनी बाई हैं?”

“जी हाँ।”

“रेंजर सहब बोले, तो हमने सोचा मिल लेते हैं। अपने एरिया में आई हैं, तो मिल लेना ज़रूरी है। इस एरिया में मेरी ठेकेदारी चलती है। फॉरेस्ट और पी.डब्ल्यू.डी. दोनों का काम मिल जाता है। अभी दरभा से कोंटा जाने वाली सड़क का काम चल रहा है। ......आपका क्वार्टर भी मैंने ही बनवाया था......और पीछे वाले दोनों क्वार्टर भी। एक में कम्पाउन्डर बाबू रहते हैं और दूसरे में तो आजकल ताला ही बन्द रहता है। पहले एक नर्स रहती थी गीता बाई। भली औरत थी...पर बेचारी...।”

केया दास ठेकेदार के थुलथुल चेहरे पर ‘बेचारी‘ शब्द का अर्थ तलाशती है। वह अचकचा जाता है। अपने को घूरती केया दास की चुभन से बचने के लिए वह बात पलटता है। ...... “कोई ज़रूरत हो तो मेरे मुंशी से मँगवा लेंगी। मैं मुंशी को भेज दूँगा। ...आप इस जंगल में अकेली आई हैं तो ठेकेदार हरसुख गोलछा का फ़र्ज़ बनता है कि आपकी देख-रेख करे। ... आपका ध्यान रखे। ...अच्छा जी अब चलते हैं। नमस्ते।”

हरसुख गोलछा सिगरेट सुलगाता है। मोटरसाइकिल स्टार्ट करता है। लाल मूरम वाली धूल फिर उड़ती है। केया दास के सीने में स्वच्छ हवा का भरना बहुत ज़रूरी है, नहीं तो उसका दम घुट जाएगा।

एक और हमलावर केया दास के सामने खड़ा है। वह सुन रही है और हमलावर बोल रहा है, “आपको इस जंगल में देख कर एक अजीब ख़ुशी हो रही है। हम लोग तो इस जंगल में वनवास काट रहे हैं। बिल्कुल मन नहीं लगता। न किसी के साथ हँस सकते हैं और न ही बोल सकते हैं। एक भी ढंग का आदमी नहीं है। ......अब इन जंगलियों से क्या बात कर सकता है कोई?”

सब-इंजीनियर अप्पा राव बहुत गम्भीर आवाज़ में बोलता है। एक-एक शब्द नाप-तौल कर पूरे वज़न के साथ। उसके होंठ मूँछों के बीच ठहर-ठहर कर खुलते और बन्द होते हैं। अप्पा राव बोल रहा है, “अब आप आ गई हैं, तो कम-से-कम थोड़ा समय तो ढंग से कटेगा आपके साथ। दो-चार बातें करने लायक़ कोई तो मिला इस जंगल में। हाँ, अभी तो बहुत बिजी होंगी आप! है न? शाम को रेस्ट हाउस आइए — चाय पर। मैं वहीं रहता हूँ।”

“सॉरी।”

“सॉरी क्यों?......आज नहीं तो कल।”

अप्पा राव आगे बढ़ जाता है,...बाईं तरफ़। दाईं तरफ़ की पगडंडी पक्की सड़क तक जाती है और बाईं ओर की पगडंडी ढलान की तरफ़ नीचे उतर कर रेस्ट हाउस जाने वाली कच्ची सड़क से मिलती है।

रेंजर ज्ञान सिंह, ठेकेदार हरसुख गोलछा और सब-इंजीनियर अप्पा राव — सबके सब शातिर खिलाड़ियों की तरह अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। केया दास एक-एक चाल को समझ रही है। उसे अपने चारों ओर बनते व्यूह की भयावहता और शक्ति का अहसास है। फिर भी, वह इस व्यूह के बीच अपने को अपनी पूरी ताक़त के साथ जीवित रखने की कोशिश करेगी क्योंकि, गाँव का पटेल धनसी मुरिया उसके साथ है।



धनसी मुरिया कहानी सुना रहा है। बूढ़ी देह में लिपटी लँगोटी और माथे पर पगड़ी। ठुड्डी के नीचे घाव का निशान। आँखों में बच्चों की-सी उत्सुकता और आवाज़ में भोलापन। पालथी मार कर बैठा है। केया दास उसके सामने बैठी है। बीच में सुलगती शाल की लकड़ी से धुआँ उठ रहा है। धनसी मुरिया की आवाज़ धुएँ के गुंजलक में दृष्य रच रही है। धनसी बोल रहा है। केया दास चुप है। जंगल के एक-एक हमलावर का चरित्र बखान रहा है धनसी। इस जंगल में बहुत ख़तरनाक हमलावर हैं। केया दास एक-एक शब्द सहेज रही है। जोड़-जोड़ कर अर्थ निकाल रही है।

तीन साल हुए इस दरभा घाटी में एक ग्राम-सेविका आई थी — सुधा कुमारी। धनसी उसे बेटी की तरह लाड़-दुलार करता था। उसके लिए जंगल में तरह-तरह के फल-फूल बीनता फिरता था। ये तीनों, महीनों उसके पीछे पड़े रहे। एक दिन उसने अप्पा राव को तमाचा जड़ दिया और ज्ञान सिंह के मुँह पर थूक दिया। कुछ दिनों बाद उसकी लाश घाटी में मिली। पुलिस आई। धनसी सहित गाँव के कई लोगों को पीटा और चली गई। धनसी सब कुछ जानते हुए कुछ नहीं बोला। पुलिस को वही लोग लाए थे, जिन्होंने सुधा कुमारी की जान ली थी। पुलिस जाँच करने नहीं, मुँह बन्द करवाने आई थी। धनसी जानता था कि हरसुख गोलछा ने बीच सड़क से साँझ के नीम अँधेरे में उसे उठवा लिया था। फिर रेस्ट हाउस में ज्ञान सिंह और अप्पा राव के साथ मिल कर......। बाद में सुधा कुमारी की लाश साइकिल सहित घाटी में फेंक दी गई थी।

कुछ दिनों बाद नर्स गीता बाई आई थी। वह आते ही जंगल के व्यूह में उलझ गई थी। कभी अप्पा राव,...कभी ज्ञान सिंह और कभी हरसुख गोलछा। गीता बाई का सारा ख़र्च हरसुख गोलछा उठाता था। अचानक एक दिन गीता बाई के घर में ताला बन्द हो गया। वह ज्ञान सिंह के घर जाकर रहने लगी। उन दिनों अप्पा राव लम्बी छुट्टी पर गया था और हरसुख गोलछा रायपुर के अस्पताल में अपने पेट का ऑपरेशन करवा रहा था। तीन माह बाद, एक सुबह गीता बाई की लाश ज्ञान सिंह के कमरे में झूल रही थी। ज्ञान सिंह ने लाश माटी में दबवा दी। कागज़ पर रेंजर ज्ञान सिंह ने लिखा, “गीता बाई कल रात मलेरिया से मर गई।” — और धनसी मुरिया ने अँगूठा लगाया। कागज़ लेकर ज्ञान सिंह सरकारी महकमे को ख़बर करने जगदलपुर चला गया और धनसी मुरिया पागल की तरह जंगल में भटकता रहा। पेड़ों से सिर टकराता फिरा। भीमा देव-आँगा देव को गुहारता रहा। नर्स गीता बाई ने बहू और माँ बनने का सपना देखा था। पेट में पलती संतान को रेंजर ज्ञान सिंह का नाम देना चाहा था।

केया दास के कानों के पर्दे फट रहे हैं। वह बिखर रही है। क्षत-विक्षत हो रही है। उसके चारों ओर विस्फोट हो रहा है, मानो डायनामाइट से इस्पाती चट्टानें उड़ाई जा रही हों। पूरा जंगल विस्फोट की आवाज़ में डूब रहा है।

व्यूह रचने वाले हमलावरों के पंजे केया दास की ओर बढ़ रहे हैं। सारे मीठे नुस्ख़े असफल हो चुके हैं। पैंतरे बदले जा रहे हैं। युद्ध शुरु हो चुका है। केया दास लड़ रही है। एक सुबह स्कूल के बरामदे में एक मुरिया लड़की बेहोश पड़ी मिलती है। हरसुख गोलछा बोलता है, “मास्टरनी बाई, सरकारी पैसे से पेट नहीं भरता तो हमसे ले लिया करो, पर सरस्वती के मंदिर में धंधा मत करवाओ।”

दरभा घाटी में हलचल भर जाती है। भरी भीड़ में ज्ञान सिंह गालियाँ उछालता है। अप्पा राव उसके पास आकर फुसफुसाता है, “आज रात को हम भी आएँ क्या?”



गाँव के लोग चुप हैं। सब सच्चाई जानते हैं। इसके पहले भी तो अक्सर ऐसा होता रहा है। सुधा कुमारी कैसे मरी? क्या नर्स गीता बाई ने सचमुच फाँसी लगा ली थी? धनसी भी चुप है। चुप रहने को जी नहीं करता, पर लाचार है। धनसी जानता है कि गाँव की हर बेटी माँ माह भर छाती पर हाथ रख कर दिन-रात काटती है। क्या पता, कब उसकी बेटी की माहवारी रुक जाए? जब मास्टरनी बाई यहाँ नहीं थी, तब भी तो यह सब यहाँ होता रहा है। फुलिया, मनकी, रेवती, यशोदा,...न जाने कितने नाम गुम गए इस जंगल में! केया दास बदहवास जी रही है। धनसी हर रोज़ आकर उसे समझाता है, “आमचो गोठ के मान बाई। लौट जा।”

जंगल की हवा के साथ अफ़वाहें और धमकियाँ उड़ रही हैं।

......और एक रात केया दास के दरवाज़े पर दस्तकें होती हैं। वह आँखें मलती हुई दरवाज़े की कुंडी सरकाती है। एक...दो...तीन लोग भीतर घुसते हैं। कोठरी में तूफ़ान आ जाता है। दरभा घाटी भी फ़रीदपुर की तरह जलता हुआ ख़्वाबगाह बन जाती है। केया दास चीख़ती है। केया दास चिल्लाती है। धीरे-धीरे उसकी आवाज़ दम तोड़ देती है। ......हमलावर चले जाते हैं। बच जाती है सिर्फ़ केया दास। नंगी-बेहोश केया दास।



नाका सामने है। केया दास कुछ महीनों के दरभा घाटी के अपने इतिहास का एक-एक पन्ना फाड़ कर फेंक देना चाहती है। तीन माह पहले आए इस तूफ़ान के अतीत से अपना पीछा छुड़ाना चाहती है, पर इसके निशान बहुत गहरे हैं। तीसरे माह भी केया दास के रजस्वला होने की अंतिम तारीख़ आज गुज़र गई। केया दास नाका के पास पहुँचती है। सामने खड़ी जीप से एक आदमी उतर कर उसके पास आकर खड़ा हो जाता है। वह अस्फुट स्वर में बुदबुदाती है, “रतन!”

“हाँ केया। आज ही आया हूँ। कैसी हो?”

“ठीक हूँ। ...तुम?”

“तबादला हो गया। आज ही ज्वाइन किया है। दरभा के हेल्थ सेंटर में दो सालों से कोई डाक्टर आने को तैयार नहीं हो रहा था। मैंने सोचा, जब तुम इस जंगल में नौकरी कर सकती हो, मैं क्यों नहीं! बस आ गया। फॉरेस्ट के डाकबँगले में ठहरा हूँ। कल क्वार्टर में शिफ्ट कर जाऊँगा। तुम्हारे क्वार्टर पर गया, तो पता चला, स्कूल गई हो। स्कूल जा ही रहा था कि तुम आती हुई दिख गई। ...कैसा चल रहा है स्कूल?”

“ठीक ही चल रहा है। ......जैसे-तैसे।”

“जैसे-तैसे? गाँव के लोग तो बड़ी तारीफ़ कर रहे थे तुम्हारे स्कूल की।”

“हूँ!” केया दास हुँकारी भरती है।

“केया, मैं थेड़ी देर बाद तुम्हारे यहाँ आ रहा हूँ। वहीं इत्मिनान से बातें करेंगे। हाँ,...रात का खाना भी तुम्हारे घर ही खाऊँगा।”

केया दास चुप है। उसके पास कोई उत्तर नहीं है। रतन जीप स्टार्ट करके आगे निकल जाता है। अब केया को सड़क से नीचे उतरना है। पगडंडी पकड़ कर अपने क्वार्टर तक जाना है।


जंगल का जीवनक्रम बदल रहा है। दरभा घाटी में अँधियारा भर चुका है। केया दास अपनी कोठरी में लस्त-पस्त पड़ी है। दरवाज़ा और दोनों खिड़कियाँ बन्द हैं। कोठरी में उमस है। अँधियारा है। सिरहाने टेबुल पर रखा लैम्प माचिस की एक तीली की बाट जोह रहा है। पसीने से सराबोर केया दास अँधेरे में निर्णय का बिन्दु तलाश रही है। उसे लगता है, जैसे वह फिर शरणार्थी शिविर में डाल दी गई हो। चीख़ों, कराहों और यातना के स्मृति-दंश के बीच छटपटाती केया दास का पूरा शरीर एक बार फिर पृथ्वी की शक्ल में बदलने लगा है। ......फिर पृथ्वी के अन्दर कोई तूफ़ान मचाएगा। ......समूची सृष्टि को उलट देने के लिए हाथ-पाँव मारेगा। ...केया दास की साँसें धौंकनी की तरह चलने लगी हैं। रगों में रक्त-प्रवाह तेज़ होने लगा है। ...नहीं!......केया दास अब पृथ्वी नहीं बनेगी। उसे पृथ्वी बनाने का सिलसिला लोग भले जारी रखें, पर वह हर बार विरोध करेगी। केया दास सोचती है। ......कहीं कोई अंतर नहीं है। हमलावरों का चरित्र एक ही होता है। देश-काल का कोई प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। उसके लिए फ़रीदपुर और दरभा घाटी में कोई भेद नहीं। अप्पा राव, ज्ञान सिंह और हरसुख गोलछा...और उसके सोनार बाँग्ला पर हमला करने वाले पिशाचों के बीच कोई फ़र्क़ नहीं है।

हृषीकेश सुलभ Hrishikesh Sulabhकेया दास अँधेरे में अपनी आँखें स्थिर कर देती है। रगों का रक्त-प्रवाह और तेज़ हो उठता है। पूरे शरीर में झनझनाहट भर जाती है। ऊपर के दाँत नीचले होंठ पर आकर टिक जाते हैं। अँगुलियाँ सिमटने लगी हैं। ......और धीरे-धीरे दोनों हथेलियाँ मुट्ठियों की शक्ल में बदल जाती हैं। ...दरवाज़े पर कोई दस्तक देता है। फिर पुकारता है, “केया...केया!” वह आवाज़ पहचानती है। रतन है। ...क्या करे वह! उठ कर दरवाज़ा खोल दे और लिपट जाए रतन से!...सच बता कर बहा ले जाए रतन को अपनी हिचकियों की धारा में!

......दरवाज़े पर दस्तकों और पुकारों का क्रम जारी है। केया दास पल भर के लिए दुविधा में डोलती है। फिर उसकी मुट्ठियों का कसाव तेज़ होता है। ...नहीं! वह किसी हमलावर की संतान को अपने गर्भ में शरण नहीं देगी। ......केया दास मुक्कों से अपने पेट पर प्रहार कर रही है। रतन उसे पुकारते हुए लगातार दरवाज़े की साँकल बजाता जा रहा है। केया दास की कोठरी शरणार्थी शिविर में बदल जाती है। केया दास डूब रही है। ......केया दास उतरा रही हैं। ......केया दास रक्तवन्या की तेज़ धारा में बहती जा रही है।
(धर्मयुग, 1982)


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