सिम्मी हर्षिता की कहानी उनका जाना और मृदुला गर्ग का मर्म - #Shabdankan
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सिम्मी हर्षिता की कहानी उनका जाना और मृदुला गर्ग का मर्म

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सिम्मी हर्षिता की कहानी उनका जाना और मृदुला गर्ग का मर्म

सिम्मी हर्षिता की कहानी उनका जाना और मृदुला गर्ग का मर्म 

...इससे ज़्यादा,मृत्यु के बाद याद किये जाने के लिए एक लेखक क्या कर सकता है? 

"तुम्हें तो पसंद हैं न? बस इतना ही काफी होना चाहिए। अपनी पसंद का कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। जीवन को यही पसंद है। तुम तो फूलों से प्यार करती हो और क्या यह भी नहीं। जानती कि फूल खिलने से कभी नहीं डरते। वे काँटों में, पत्थरों में, रेगिस्तानों में भी एक बार खिल लेते हैं मुरझा जाने से पहले। तुम पुष्प बनो भयभीत पुष्प नहीं। फूलों का डर से कोई रिश्ता नहीं होता।” — सिम्मी हर्षिता की कहानी से

सबसे पहली समीक्षा मैंने सिम्मी हर्षिता के कहानी संग्रह 'बंजारन हवा' पर लिखी थी, अर्सा हुआ। शायद 1994 में। उसकी शुरुआती पंक्तियाँ थीं, "सिर्फ़ हवा बंजारन नहीं होती। लेखन शैली भी होती है और उसी का हमें इंतज़ार रहता है।हवा तभी ताज़ा रह सकती है जब रुख़ बदल कर बहे। यही बात कहानियों के साथ भी है। यूँ भी कहानी पढ़ने का मज़ा हवा पर सवार होकर घूमने की तरह है। ऐसी हवा जो विभिन्न रूपों, रंगों, तापमानों के दृश्यों से होकर गुज़रे; उनपर पड़ी धूल की परत हटाकर उन्हें पारदर्शी बनाये और पाठक से अपेक्षा रखे, कि वह अपनी नज़र से नहीं, किसी दूसरी ख़ानाबदोश नज़र से उन्हें देखेगा।"

और अंतिम पंक्तियां थीं, "बंजारन हवा उन कहानी संग्रहों में से है, जिसे पढ़ना ज़रूरी हो जाता है। अपना मनोबल बनाये रखने के लिए कि हमारे पास ऐसे लेखक भी हैं, जो वर्षों से चुपचाप लिखते आये हैं और अब तक, हवा पर सवार होने का साहस बनाये हुए हैं। रचनात्मकता का प्रयोजन ही है कि, वह जब-तब फ़िज़ा पर छाये गर्दोग़ुबार को फूंकों से उड़ाने का करतब करे और कुछ देर के लिए हमें ताज़ी बेलौस बहती हवा में साँस दिलवाये।"

इस ताज़ी बेलौस बहती हवा को तेज़ रफ़्तार से बहने से, हर मुमकिन दैहिक विकलांगता भी रोक नहीं पाई, उपन्यास 'जलतरंग' उसका सबूत है। इससे ज़्यादा,मृत्यु के बाद याद किये जाने के लिए एक लेखक क्या कर सकता है? यह हमारे साहित्य समाज की कमतरी है कि न हम साहसिक लेखन की कद्र करते हैं, न वैयक्तिक साहस की। फिर भी कुछ कद्रदान, कुछ दोस्त मिल ही जाएंगे, इस उम्मीद के साथ मैं, लेखिका सिम्मी हर्षिता को याद कर रही हूँ।

मृदुला गर्ग

मृदुलाजी से सिम्मी हर्षिताजी के निधन की बात सुनने से पहले, सिम्मी हर्षिताजी का नाम भी नहीं सुना था। जिस तरह वह उनके देहांत पर हिंदी साहित्य जगत की उदासीनता से व्यथित थीं वह देखना दुखद था, दुखद है। वह उनसे जुड़ा संस्मरण, जिसका हिस्सा आपने ऊपर पढ़ा होगा, किसी पत्रिका के लिए लिख चुकी थीं, जब उनसे बात हो रही थी। वह एक कहानी, ज़िक्र उन्होंने किया है, के बारे में भी बतलाती रहीं और यह भी कि सिम्मी हर्षिता कैसे हिंदी साहित्य के उस संसार को दिखलाती हैं जहाँ एक अच्छा लेखक गुमनाम और गुम हो जाता है। बहरहाल, वह कहानी तो अभी नहीं मिल सकी लेकिन यह ‘उस फूल का नाम’ मिली, वह सचमुच ही बेहतर कहानीकार थीं। मेरी श्रद्धांजलि उन्हें। 
भरत एस तिवारी
नई दिल्ली
15 फरवरी 2019


उस फूल का नाम 

— सिम्मी हर्षिता

1940 — 2019

मित्रा अब मेरे यहां कभी नहीं आती। मित्रा अब यहां नहीं रहती। जब-जब मैं इस सड़क पर से गुजरती हैं और यह मोड़ आता है तो मुझे वह घर दिखाई दे जाता है जहाँ कभी मित्रा रहा करती थी और याद आ जाती है वह चीज जो उसे सबसे अधिक पसंद थी- जो उसके बदरंग जीवन में रंग भरती थी — मुरझाए चेहरे को एक ताजगी देती थी- मन को खिलने की खुशी और आश्वासन देती थी। उसे पाने के लिए उसने कभी ‘फूल तोड़ना मना है’ के लिखित-अलिखित आदेश पर ध्यान नहीं दिया था। ध्यान देकर अपनी पसंद पर कभी बोझ नहीं डाला था। बस वह इतना सोचती और हाथ आगे बढ़ा देती- ‘कम से कम मुझे एक फूल-एक खुशी पाने का अधिकार तो है ही। मैं ईश्वर नहीं, पर ईश्वर की संतान हूँ ही, सो फूलों पर थोड़ा सा हक मेरा भी तो बनता ही है। ईश्वर के लिए फूल तोड़ना मना नहीं होता तो फिर मेरे लिए मना ही क्यों हो?'

जो उसका नाम नहीं जानते थे, फूल उन्हें उसका नाम बता देते- 'फूलों वाली वही लड़की' मित्रा ने कब से बालों में फूल टाँकना आरम्भ किया है- वह चोटी से चल कर कब जूड़े तक जा पहुँचा है - यह उसे याद नहीं आता। फूल टाँके बिना उसकी हँसी और सज्जा अधूरी हैं- यही याद रहता है। जो फूल मित्रा सालों-सालों से लगाती आ रही हैं- वह रातों-रात बुआ की आँखों में एकाएक काँटे की तरह चुभने-खटकने लगा है। बुआ पहली बार टोकती हैं “कुँआरी लड़कियाँ- भली लड़कियाँ हमारे यहा फूल नहीं लगातीं।“

“बुआ, ये तो मैं वर्षों से लगा रही हैं। फिर अब ये भले-बुरे की बात क्यों ?”

“पहले तू लड़की थी- अब जवान हो गई है! ऑफिस जाने लगी है!”

“ये दोनों बातें भी तो वर्षों पुरानी हैं।”

बुआ का सारा ध्यान मित्रा के फूल में आकर अटक गया है। बुआ मित्रा के प्रति एक संरक्षिका का दायित्व पूरी ईमानदारी और चौकसी से निभाना चाहती हैं और फूल उसमें रुकावट डाल रहा है। बे माँ-बाप की लड़की कहीं राह से कुराह न हो जाये। जैसे कि माँ-बाप वाली लड़कियाँ राह से कुराह न होती हों।

“फूल को फूल लगाने की क्या जरूरत है भला ?' बुआ चिंता से अगला तर्क देती है।”

“मैं तो कांटा हूँ- फूल नहीं” मित्रा लापरवाही से हँस देती है।

बुआ के मुख से अड़ोसन-पड़ोसन के सामने फूल झरने लगते हैं- “मित्रा जैसी भली-सँभली लड़की आज के जमाने में मिलनी कठिन है। कितना तो काम करती हैं घर का। दफ्तर जाने वाली आजकल की लड़कियाँ घर का काम करना बिल्कुल पसंद नहीं करती।” बुआ मित्रा के लिए पड़ोसियों का प्रमाणपत्र चाहती हैं मन की पूरी तसल्ली के लिए।

मित्रा के मन ने रसोई से उत्तर दिया- 'अरे तो मैं कौन-सा खुशी से करती हैं। इतना सब काम? किये बिना गुजारा नहीं, सो करती हैं। माँ होती तो मैं भी उसके सामने नखरे और लापरवाही करती। आफिस से लौटकर थकी-सी पलंग हो जाती। माँ हाथ में गरम चाय का प्याला थमा देती-सिर पर हाथ फेरती। कभी डाँटती तो मैं भी रूठ जाती और मनाने की फिक्र माँ को ही करनी पड़ती। अब तो न रूठना-न मानना। उस रिश्ते का स्वाद कैसा होता है, यह मैं माँ बनकर जानना-चखना चाहती हूँ।'

बुआ अगली बात और भी खुश होकर बोलीं- “ फैशन तो उसे छू तक नहीं गया है। न लिपिस्टिक, न बिंदी। बस एक सीधी-सरल सी सूती साड़ी लपेटकर चल देती है आफिस।” । पड़ोसन उस रंग में भंग डालते हुए बोली- “पर ये तेरी दुलारी मित्रा दफ्तर में शकुंतला बनकर क्यों जाती है? सजने के और भी ढंग हैं जमाने की चलन के अनुसार। दफ्तर और फूल का तो कोई जोड़-मेल दिखाई नहीं देता। हर चीज का एक वक्त और जगह होती है। । अब कोई लड़की चलता-फिरता बाग-बगीचा बनकर चल पड़ेगी तो जो नहीं भी देखना चाहेगा उसकी भी आँख उस ओर उठ जाएगी।”

बुआ ने वाक्य को बीच में ही काट दिया- “आखिर कहना क्या चाहती है तू?”

कुछ नहीं। कुछ नहीं। मुझे क्या कहना है ?” पड़ोसन चीखता-सा स्वर सुनकर भयभीत उठ खड़ी हुई। पर बुआ की शंका को उसके उत्तर ने पुख्ता कर दिया और भय तथा पराजय के अंधे कुएँ में धकेल दिया। कुछ पल चुप रहने के बाद मानो किसी लम्बी बीमारी से उठते हुए अपने आप से बोली-“मैं तो बहुतेरा मना करती हूँ, पर मानती ही नहीं। मेरी अपनी बेटी होती तो मानती न। अब भला वह क्यों मानेगी ?

जैसे कि अपनी बेटियाँ बहुत आज्ञाकारी होती हों।

सवालों और फूलों के काँटे दिन-रात चुभते रहे। शब्दों के पत्थर बुआ के सिर से आ-आकर टकराते रहे। बुआ का चेहरा दो ही दिनों में कांटे की तरह नुकीला और पत्थर की तरह कठोर बन गया। घर के फूलों ने उस दिन से हँसना छोड़ दिया। वे कूड़ेदान में या गेट के बाहर नुचे-खुचे रूप में रोते हुए मिलते। मित्रा उन्हें देखती और उसके आँसू फूलों के आँसुओं से जा मिलते- 'ओ बुआ। तुम्हें हो क्या गया है ? फूलों से इतना डर? तुमने इन्हें जान से मार डाला? मेरे कारण इतनी क्रूरता और ऐसा कठोर अन्याय इनकी कोमलता के प्रति?'

और मित्रा बीमार पड़ गईं।

हाल ही में जापान की व्यावसायिक यात्रा से लौटे उच्चाधिकारी के हृदय में अपनी कम्पनी की उन्नति के लिए कई आदर्श विचार कार्यान्वयन के लिए हलचल मचाते रहते हैं। इस यात्रा ने उन्हें बताया है कि आदर्श मानव ही सम्पूर्ण गुणवत्ता वाले संस्थान, समाज और देश को जन्म देता है और वे एक आदर्श मानव, एक आदर्श प्रशासक बनना चाहते हैं। अपने सहकर्मियों को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ देना, उनकी कार्मिक सफलताओं पर उन्हें पुरस्कृत करना-वक्त जरूरत पर सलाह देना, उनके व्यक्तिगत दुख-कष्ट में हार्दिक सहानुभूति प्रदर्शित करना आदि उनकी कार्यशैली का वैसा ही सहज हिस्सा बन गया है जैसा मित्रा द्वारा जूड़े में फूल टांकना।

लगभग आठ दिन तक मित्रा आफिस न जा पाई। किसी न किसी के हाथ उसकी बीमारी को अर्जियाँ पहुँचती रही। उसके वह आदर्शप्रिय उच्चाधिकारी महोदय एक दिन आफिस बंद होने के बाद संध्या को अपनी स्टेनो-टाइपिस्ट मित्रा का हालचाल पूछने आ पहुँचे। हाथों में एक फूल नहीं फूलों का गुलदस्ता लिए हुए और उस पर लिखी हुई शुभकामनाएँ- 'गैट वैल् सून!'

इतने दिनों बाद अपने सामने फूलों को हंसता देखकर मित्रा का चेहरा फूल-सा खिल उठा- “ थैंक्स सर।”

‘जहाँ ढेरों काम पड़ा हो करने को, वहां किसी एक को इतनी देर तक आराम करने का अधिकार नहीं है। दूसरों को भी तो आराम करने का अवसर मिलना चाहिए न।' सुनकर मित्रा हंस दी और वे भी हंस दिए। न बुआ ने उन्हें बैठने को कहा, न मित्रा की कुछ कहने की हिम्मत हुई। वे जल्दी-जल्दी आए और खड़े-खड़े चले गए।

मित्रा उन फूलों पर रह-रहकर हाथ फेर देती और कभी आँखों से लगा देती तो टप-टप दो आँसू चू पड़ते।

अगले दिन जन्मदिन का बधाई कार्ड आ पहुंचा। वह एक बार फिर हंस दी और रो दी। बॉस के चेहरे में उसे माँ का चेहरा झिलमिलाता नजर आया तो हंसी खिलखिलाहट में बदल गई — ‘बुआ, अब मैं ठीक हूँ। कल ऑफिस जाऊगी।‘ उसने बीमारी की चादर परे फेंकते हुए कहा।

बुआ ने सुना और दो दिन से शंकित डोलता मन चौंक उठा - फूलों का गुलदस्ता। गैट् वैल् ....। अब जन्मदिन पर बधाई कार्ड। वह दफ्तर है या घर? वह बॉस है या इसके जूड़े का फूल?'

एक प्रेम-कहानी के लिए भला और क्या चाहिए। ऐसा भी नहीं। कि बुआ ने कभी फिल्में देखी न हों, जिनमें प्रेम की खेती के लिए सही मौसम तथा बीज संबंधी सारी जानकारी दे दी जाती है। प्रेम और फूलों का रिश्ता भला कौन नहीं जानता? बॉस और उसकी स्टेनो-टाइपिस्ट के रिश्ते की कहानियों को भी कौन नहीं जानता? सच तो यह है कि फिल्मों के कारण अब हर रिश्ता एक खुली किताब बन गया है। हर रिश्ते का दो और दो चार वाला सरलीकरण हो गया है। कब-कहां-क्यों और क्या होगा- सभी जान चुके हैं तो बुआ क्यों न जाने ?

बुआ ने न कुछ पूछा-न कुछ कहा। जैसे कि ऐसा तो होना ही था फूलों वाली लड़की के साथ। सर पर माँ-बाप का अंकुश न होगा। तो लड़की कहीं न कहीं गिरेगी ही। जैसे कि जिनके माँ-बाप होते हैं, गिरती न हों। माचिस लकड़ी से मिलेगी तो उसे जलाएगी ही। भले ही माचिस वर्षा से भीगी हुई हो और लकड़ी सीली हो। पर कभी न कभी धूप निकलती ही है और गीलापन सूखता ही है और चाहे जो भी हो या न हो, पर यह नहीं हो सकता कि जिस बात का बुआ को शक हो गया हो – वह सच न हो। यदि बुआ कहती हैं कि घर मैला हो गया है, ट्रंक और अलमारियों में पड़े हुए उसके सारे कपड़े मैले हो गए हैं, उसके बाल मिट्टी से लथपथा गए हैं, तो धुलाई ही अंतिम सत्य है। उसके सत्य के बीच किसी का कोई दूसरा सत्य दखल नहीं दे सकता।

उस दिन को आधी रात को बुआ चौंककर उठ बैठीं और एका एक जोर-जोर से रोने लगीं। उनकी आवाज कोलतार के कडवे घने धुएं की तरह दम घोटने वाली थी। क्या बुआ ने कोई भयानक सपना देखा है? क्या बुआ को आज रोने का दौरा पड़ गया है? फूफा बार-बार पूछते हैं और बुआ सिसक-सिसक कर सुनाती है- “सपने में मित्रा की माँ मुझे कह रही थी- 'तेरी इस फूलवती के लक्षण मुझे ठीक नहीं लगते। ये फूल लगाकर दफ्तर क्यों जाती है। तू इसे मना क्यों नहीं करती? इसका बॉस फूलों का पेड़ लेकर इसके लिए क्यों आया था? तूने पढ़ा क्या? क्या लिखा था उस पर? गैट् वैलु मून्। भला उसे क्या मतलब है मित्रा के जल्दी ठीक होने या न होने से? उसने 'मून्' क्यों लिखा है? उस मुए ने इसे 'चांद' क्यों कहा? उसके इसके जन्मदिन पर बधाई कार्ड क्यों भिजवाया है? लगता है किसी गलत चक्कर में पड़ गई है मेरी मित्रा। मेरी बेटी का भला बुरा अब तेरे हाथ में ही है।' पर मैंने मित्रा की माँ को समझा दिया है कि तू चिंता मत कर। मैं सब ठीक कर दूंगी।''

“अरे तेरा होना ही काफी नहीं था जो मित्रा की माँ भी तेरे । वहम के गोरखधंधे में शामिल हो गई है। पर ये ‘गै वैल् मून' का क्या चक्कर है। उसमें तो ‘सून' लिखा था न। एक साधारण सा औपचारिक कथन।' फूफा ने पूछा।

“नहीं। सून् नहीं मुन् ही लिखा था।"

“अच्छा चल, सो जा। तेरे अपने मन का ही खलल है ये सपना। मित्रा की माँ को पच्चीस साल तक गुमशुदा रहने के बाद आज ही आना था क्या? उसे और कोई काम नहीं तुम्हारे बेकार मन में आने के सिवा?''

“तुमने मेरे मन को बीमार कहा ?' “मैंने बेकार मन कहा था।“ “ नहीं। तुमने बीमार मन कहा था।“

“ अरी भली औरत। आज ये क्या उलटवांस हो गया है तुम्हें? कुछ को कुछ पढ़ने-सुनने लगी हो। चलो, सो जाओ शांत मन से।“

“तुमने अशांत मन कहा ?”

“हे प्रभु। हमारी रक्षा करो। ये क्या हो रहा है अब इस घर में ? अब ये उलटी गंगा बहाना बंद करो।”

अब ये जो मित्रा राह से कुराह हो गई है तो हमारी बेटियों का क्या होगा? उन पर भी इसका बुरा साया पड़ेगा।” बुआ ने भूकंप की बोझिल चट्टान के नीचे दबे-कराहते स्वर में कहा। फूफा ने शांत भाव से बुआ की बात पर भीगा कबल डालकर शक की आग बुझाने की कोशिश करते हुए कहा- “अरी भलीमानुस। फूल तो वह वर्षों से लगाती आ रही है। समझ में नहीं आता कि इसमें अब नई बात क्या हो गई है? लड़की ही तो फूल लगाएगी, कोई लड़का नहीं। या हम-तुम जैसे बूढे लगाएंगे? एक झूठे से सपने के वहम में आकर जो इतना ही एक फूल से डरती हो तो मित्रा को घर में बिठा दो या चुपचाप शादी कर दो और निश्चित सो रहो। इसके बाप ने पांच हजार रूपए दे ही रखे हैं इसके विवाह के लिए।”

सुनते ही बुआ के खुले-रूखे बाल फुफकारते हुए चीखे- "हूँ दे दो । कर दो। अब तो बहुत बड़ा दिल हो गया है तुम्हारा। क्या पाँच हजार में शादी होती हैं लड़की की। अपनी सारी जमा-पूंजी इसकी 'शादी में लगा देंगे तब जाकर डोली उठेगी। तब क्या अपनी दोनों बेटियों की शादी किसी राजा के गड़े खजाने से होगी ?”

“जब देखो तब नीमराग ही गाने लगती हो। अरे कभी खांडव राग भी गा दिया करो। बहुत हुआ। अब सो ही जाओ।” सारे मामले को तरह देते हुए फुफा गुसलखाने की ओर मुड़ गए और मित्रा। दरवाजे की ओर से निकलकर चुपचाप अपनी चारपाई पर सिल हो गई। उसे लगा चारों ओर खड़ा अंधेरा उसे धीरे-धीरे निगल रहा है और एक दिन वह बुआ की जगह ले लेगी।

बुआ के सिर पर जो वहम और सनक सवार हो जाए तो उसे फिर रोकने-समझाने या विरोध करने की सामर्थ्य किस में है भला? और जो दीवार बनेगा उसे तो फिर दिन-रात लड़ाई-झगड़ा, रोना-धोना तथा भूख-हड्ताल सहनी होगी। बुआ के सामने खड़े होकर सबका जीना दुश्वार करने के बदले अच्छा यही है कि तूफान को रास्ता दे दो ताकि बहुत कुछ खड़ा-पड़ा नष्ट होने से बच जाए। यदि सुबह उठते ही फूफा को ये आदेश हुआ है कि मित्रा के लिए आज की गाड़ी से इलाहाबाद जाने का टिकट ले आओ तो लाना ही पड़ेगा- मित्रा को अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर विदा होना ही पड़ेगा- बात चाहे कितनी ही अतर्कसंगत और अपमानजक क्यों न हो। तार को भी मामा-मामी तक यह सूचना उसी दिन पहुंचा नी पड़ेगी- “मित्रा आज आ रही है। वहां किसी अच्छी सी सरकारी नौकरी का प्रबंध करें। बाद में यहां ट्रांसफर करवा लेंगे।”

यह सारी उतावली बदहवासी मामा-मामी को अच्छी नहीं लगती। समझ में भी नहीं आती। पहुंचते ही वे बार-बार खोदने लगते हैं — “... कारण क्या हैं? नौकरी तो थी ही। सरकारी नौकरी की भी साथ-साथ कोशिश की जा सकती थी। रातों-रात ऐसी उठा-पटक की कौन सी मुसीबत आन पड़ी हैं? क्या किया है तुमने?” बुआ के शक की बात यदि वह कह दे तो क्या मामा-मामी को अच्छा लगेगा? क्या वे उस पर विश्वास करेंगे? मित्रा के मुंह पर ताले और आँखों में ठहरी हुई कुहरीली रात।

दो दिन गुजरते-न-गुजरते दूसरी तार आ पहुंची-“तुम्हारे जाते ही बुआ बहुत बीमार हो गई है और दिन-रात तुम्हें पुकारती रहती थी। तार मिलते ही लौट आओ।

दिल्ली से दौलताबाद-दौलताबाद से दिल्ली। न हंसी आती न रोना आता इस सारे नाटक पर। यह अनुभूति तक स्पष्ट न हो पाती कि वह दिल्ली है या इलाहाबाद। कभी उसे लगता जैसे वह मर गई । है और अपना दाह संस्कार करके लौटी हैं।

लगभग पंद्रह दिनों के बाद वह काम पर जाने के लिए तैयार हुई है। बुआ एक बार फिर अच्छी तरह से टोह-टाहकर पूरी तसल्ली कर लेना चाहती हैं- “मित्रा, तेरी नौकरी में क्या फूल लगाना जरूरी है?”

“नहीं तो बुआ। वह तो यूं ही अपने मन की खुशी के लिए लगाती थी। अपने ढंग से खुश होने का अधिकार आखिर सबको है। जैसे चाय के बिना आपसे नहीं रहा जाता वैसे ही फूल के बिना मुझसे नहीं जीया जाता। पर अब आप फूलों की चिंता न करें।”

“तू खुश रह, यह मैं भी चाहती हैं, पर खुशी के और भी ढंग हैं। बस, तू फूल-ऊल मत लगाया कर। मुझे ये सब चोचले अच्छे नहीं लगते। तेरे सिर पर तेरे माँ-बाप नहीं हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि तू जो चाहे करे और हमारे घर की बदनामी हो। मेरी बेटियों के विवाह में अड़चन आए।“

“बुआ, आप फूल को किसी पुरुष या चाल-चलन के साथ। क्यों जोड़ती हैं?”

“मैं ज्यादा सवाल-जवाब नहीं सुनना चाहती। फूल तुझे नहीं लगाना है तो बस नहीं ही लगाना है और हां अपने बॉस से हेल-मेल बढ़ाने की जरूरत नहीं। उसे हमारे घर आने की भी जरूरत नहीं। नहीं तो तेरा यहाँ नौकरी करना नहीं हो पाएगा। तेरे फूफा से कह दिया है कि कहीं और कोशिश करें।”

मित्रा में खास बात तो उसका फूल ही था। फूलों वाली लड़की के फूल पर ही आकर दृष्टियां टिक जाती थीं। इसलिए बिन फूलों वाली मित्रा उस दिन एक प्रश्न बन गई। फूल देखते रहने वालों को फूल की अनुपस्थिति अखरी। जैसे कि चेहरे पर रंग-रोगन लगाते रहने वालों से उसके न होने पर पूछ बैठना कि ये बासी-बेरौनक चौखटा क्यों? हे रंगमुखी। क्या बीमार हो ?

बॉस ने डिक्टेशन देते हुए पूछ ही तो लिया- “मित्रा मिस, सब ठीक तो हैं न ?'

“जी हाँ।“

“ये क्या हुआ कि एक हाथ से इस्तीफा देना और दूसरे से ले लेना ?”

“एकाएक ही इलाहाबाद चले जाना अनिवार्य हो गया था और फिर एकाएक ही जाना टल गया।”

“तुम्हारे फूल को क्या हुआ हैं? घर में सब ठीक तो है न?”

“घर में आजकल फूल नहीं खिलते।”

“तो यहां के लॉन में तो खिलते ही हैं।”

“जी।”

“मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि मेरे चारों ओर कोई इतना मुरझाया हुआ नजर आए। फूल वालों को देखकर मुझे उनकी जिंदादिली का — प्रकृति से उनके जुड़े होने का एहसास होता है। इस एहसास को बनाए रखो।“

“देखो आज माँगेराम ने इस गुलदस्ते के फूल नहीं बदले। कहता है कि उसे फूलों से एलर्जी है। काँटों से किसी को एलर्जी क्यों नहीं होती। फूलों से ही क्यों होती हैं ?”

ऑफिस से बाहर आते हुए लगा — कोई है जो फूलों को समझता है। पतझड़ हुए पौधे में एक नन्हीं सी कोंपल खिल उठी।

रेस्टोरेंट में एक मेज के पास अकेली बैठी हुई मित्रा दिन के भोजन के नाम पर कुछ ले लेने के बारे में सोच रही है। भूपत किसी शीतल पेय की तलाश में उधर ही आ निकला है हमेशा की तरह।

मित्रा को देखते ही हमेशा की तरह वह एक गज़ल का टुकड़ा गुनगुनाने लगा

“तूने ये फूल जो जुल्फ़ों में सजा रखा है,
इक दीया है जो अंधेरा में जला रखा है।”

वह मित्रा के दाएं-बाएं देखता है - पर कुछ दिखता नहीं। घूमकर पीछे से चक्कर लगा आता है और चौंकता है- “अरे मित्रा आज पंद्रह दिनों बाद आई हैं और फूल भी नहीं लगाया हुआ। आखिर क्यों ? यह शोक मनाने जैसी स्थिति क्यों? खैरियत तो है न? घर में सब जिंदा तो हैं न? मुझे अवश्य ही अफसोस प्रकट करने के लिए जाना चाहिए।

दुसरे ही पल वह मित्रा के सामने बैठा कह रहा था- “मुझे । बहुत अफसोस है।”

क्यों? किस बात का अफसोस?”

“क्या अफसोस का कोई कारण नहीं है ?”

“ नहीं।”

“यह तो बहुत अच्छी बात है। तो फिर आप इतने दिन आई क्यों नहीं और आज आपने फूल क्यों नहीं लगाया हुआ?”

“इससे आपको क्या फर्क पड़ता है ?”

“इससे फूलों को फर्क पड़ता हैं- फूलों की गजल को फर्क पड़ता है। फूल लगाया कीजिए। फूल खिलता है आप पर।”

“आपकी ये बातें सुनकर मुझे एक मुहावरा याद आ रहा है।”

“कौन सा ?”

“मान न मान मैं तेरा मेहमान।”

“फूल लगाने वाले इतने कटीले होते हैं, मैंने कभी सोचा भी न था। फूलों पर फूले न समाने वाले इतने जहरीले होते हैं, मैंने कभी सोचा ही न था।”

“अभी भी सोच ले। देर नहीं हुई हैं।”

“अब तो देर हो गई है। अब क्या सोचना ?”

“मतलब?”

“मतलब कि लंचबेक खत्म हो गई है।” और वह जैसे एकाएक आया था, एकदम से उठकर चल दिया सोचते हुए- ‘कुछ लोग अभागे होते हैं और कुछ सभागे होते हैं। कुछ बोर होते हैं और कुछ खुशीचोर होते हैं।‘

और वह उसका जाना देखती रही। भूपत, जिसकी ऊपरी जेब में रूमाल या पैन के बदले खिले गुलाब की अधूरी सी पंखुड़ियां किसी झालर की तरह झांकती रहती हैं। जैसे कि जेब न हुआ फूलदान हुआ। यह फूलदानी-गुलदानी दृश्य देखकर मित्रा को हँसी आ जाती हैं- 'लो अपने जैसा कोई सनकी फूलों को प्यार करने वाला। एक अजब का विभाव है इस इन्सान में। इसे देखते ही मेरे मन की दशा बदल सी जाती है। पर नहीं। मुझे किसी से प्रेम नहीं करना। मुझे तो केवल विवाह करना है। वह अपने आप को फैसला सुनाकर उठ खड़ी हुई।

“मैं पिछले कुछ दिनों से देख रही हैं कि आप जानबूझकर मुझे बदनाम करना चाहते हैं। मेरे लिए नई परेशानी पैदा करना चाहते हैं। रेस्टोरेंट में कितने टेबुल खाली पड़े हैं। फिर भी आपका इसी मेज के पास आकर बैठना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। मेरे टाइपराइटर के पास आपका फूल रख जाना भी मुझे कतई पसंद नहीं।“

“कृपया जरा धीरे बोलिए। किसी ने सुन लिया तो मेरी बदनामी हो जाएगी कि मैं लड़कियों का पीछा करता हूँ। इससे मेरी प्रमोशन और तबादले की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ेगा। आप तो जानती ही हैं अपने आदर्शवादी बॉस को। क्या फूलों वाली लड़की को । चाह सकता हूँ?”

“मुझे इस तरह का मजाक बिल्कुल पसंद नहीं।”

“मैं मजाक नहीं कर रहा। जो कुछ कह रहा हूँ- पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ।”

“मैं प्यार नहीं कर सकती। मुझे तो शादी करनी है। इसलिए मैं प्यार नहीं कर सकती इधर-उधर यूँ ही ऐश के लिए घूमने-फिरने के लिए। प्यार तो ब्लाइंड कर सकते हैं। मैं हर काम करने से पहले बहुत सोचती हूँ। फिकल् माईंड है मेरा। चिंताग्रस्त है मेरा स्वभाव। हर पल भविष्य की चिंता मुझे सताती है। मुझे धनी-मनी, उछलता-कूदता हुआ लड़का नहीं चाहिए। वह चाहिए जिसमें गंभीरता हो, जो मुझे समझे। ऐसा नहीं जो किसी लड़की को देखकर कोई गज़ल गुनगुनाना शुरू कर दे और उसे फूल देने की कोशिश करे।'

भूपत ठहाका लगाकर हंस पड़ा। “आप ठीक कहती हैं। मुझे भी यह सब अच्छा नहीं लगता हैं। बस आपका फूल लगाना अच्छा लगता है इसीलिए यह सब हो गया। फिर किसी रिश्ते को बनाने-पाने के लिए कोई न कोई राह तो तलाशनी ही पड़ती है न। और ऐसे में सबसे आसान है फूलों वाला रास्ता। मुझे भी प्रेमिका नहीं पत्नी चाहिए, जिसे मेरी परवाह हो। पर एक सच मैं आपको आज और अभी ही कह देना चाहता हूँ। उसके बाद ही आप कोई फैसला करें।”

"कौन सा सच ?”

“ज्योतिषी मुझे माँगलिक कहते हैं। इसीलिए कोई मुझे लड़की देना नहीं चाहता। ज्योतिषी भय दिखाते हैं कि लड़की के लिए यह विवाह अशुभ होगा।“

“यह तो बहुत अच्छी बात हैं। मैं तो सच ही जीना नहीं मरना चाहती हैं। माँगलिक यानी मंगलजनक-मंगलसूचक। मेरे अमंगल जीवन को ऐसा ही माँगलिक पुरुष चाहिए। तुम्हारे साथ एक सहज जीवन जीते हुए मरना इस असहज-बीमार मरण से तो अच्छा ही होगा। फिर जो पति-पत्नी माँगलिक नहीं होते क्या उनकी मृत्यु नहीं होती? उनके जीवन में कभी कोई हादसा नहीं होता?”

“तो मैं मान लूं कि आज तुमने मेरी भावनाओं के फूलों को स्वीकार कर लिया है ?”

“मेरी बुआ को पसंद नहीं मेरा फूल लगाना या फूलों को स्वीकार करना।”

"तुम्हें तो पसंद हैं न? बस इतना ही काफी होना चाहिए। अपनी पसंद का कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। जीवन को यही पसंद है। तुम तो फूलों से प्यार करती हो और क्या यह भी नहीं। जानती कि फूल खिलने से कभी नहीं डरते। वे काँटों में, पत्थरों में, रेगिस्तानों में भी एक बार खिल लेते हैं मुरझा जाने से पहले। तुम पुष्प बनो भयभीत पुष्प नहीं। फूलों का डर से कोई रिश्ता नहीं होता।”

बुआ को सामने पाकर मित्रा उनसे कहना चाहती है- 'बुआ, अब तुम्हें सच ही अधिकार है मित्रा पर संदेह करने और डांटने-डपटने का। देखो तो एक फूल मेरे पर्स में छुपा बैठा है हंस रहा है। पर बुआ को बिना फूलों वाली इस आज्ञाकारी मित्रा से कोई शिकायत नहीं हो पाती।‘

अब सवाल यह है कि विवाह की बात शुरू कौन करे? कैसे करे?

यदि मित्रा शुरू करती हैं या भूपत तो बुआ उस पर थू-थू करेगी कि आखिर फूल लगाने वाली लड़की ने नौकरी के दौरान यह सब किया। अपने सहकर्मी के साथ प्रेम चक्कर चलाया। उनके परिवार की इज्जत पर बट्टा लगाया उनकी लड़कियों को गलत रास्ता दिखाया। उनके घर को हमेशा के लिए मैला कर दिया। उनके उपकार का कैसा बदला चुकाया।

वह बुआ के मन को ऐसी कोई ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। उनके अशांत वहमी मन में अपनी तरफ से कोई नई उथल-पुथल नहीं मचाना चाहती।

फिर ऐसी कौन सी तरकीब है जिससे मित्रा का काम भी बन जाए और बुआ का मन भी रह जाए?

हाँ, एक राह सुझाई देती है। मुख्य सड़क से सीधे न जाकर, पास की गली से निकलकर बुआ तक पहुंचा जा सकता है और फूलों-सी उस खुशी को पाया जा सकता है।

मित्रा ने चिट्ठी लिखी है जो दिल्ली से चलकर इलाहाबाद जा पहुँची है। मामा के पत्र के माध्यम से रिश्ता चलकर बुआ तक आ पहुँचा है जो यह दर्शाता है कि उन्होंने मित्रा के लिए एक रिश्ता ढूँढा। । है। लड़का दिल्ली का ही रहने वाला हैं। वे झटपट शादी चाहते हैं। कोई माँग नहीं हैं उनकी, भले लोग हैं।

भले लोग सबको अच्छे लगते हैं इसलिए बुआ भी पढ़-सुनकर खुश होती हैं। फूफा भी प्रसन्न हैं। शुभ दिन देखकर, पत्र में दिए गए । पते के आधार पर लड़के वालों के घर जा पहुंचती है बुआ और अपने ज्योतिषी से जन्मकुंडली मिलान तक बात पहुंचाती है। बुआ का ज्योतिषी लड़के की कुंडली के आधार पर ग्रहों का रहस्योद्घाटन करता है लड़का माँगलिक है। लड़की के लिए शुभ नहीं है । बुआ दो टूक फैसला सुना देती हैं- “मैं यह पाप नहीं करूंगी। यह शादी नहीं होगी।”

अब क्या हो? अब क्या हो सकता हैं? बुआ की ‘नहीं होगी’ को ‘होगी' में भला कौन बदल सकता है? जो ‘पाप’ बुआ नहीं कर सकती क्या वह 'पाप' मामा-मामी कर सकते हैं? । मित्रा छुट्टी लेकर मामा-मामी के पास इलाहाबाद आ पहुंची है। उसके चेहरे पर आंसुओं से लिखी एक इबारत है। मामा वे आसू नहीं देख-सह पाते। वे मानते हैं भी नहीं वह सब जो बुआ मानती हैं।

ने इसे 'पाप' नहीं ‘वहम' कहते हैं। उन्होंने मित्रा के सिर पर हाथ । फेरते हुए कहा- मैं तुम्हारी शादी करूंगा।” और सहयोग के लिए  मामी की ओर देखा।

एक तार दिल्ली आ पहुंची है। भूपत और उसके माता-पिता को उन्होंने इलाहाबाद बुलवाया है। सारी स्थिति उनके सामने रख दी है। सहमत हैं तो फिर देर किस बात की ?

दूल्हे और दुल्हन का नया जोड़ा आ पहुंचा है। पंडित महोदय आ पहुंचे हैं। पांच व्यक्तियों की बारात आ पहुंची है। जिंदगी रिश्तों के नए रंग और फूलों की मालाएं, जय की मालाएं लेकर आ पहुंची है।

बुआ को दो छायाचित्र भेज दिए गए हैं। एक में दूल्हा-दुल्हन साथ-साथ खड़े हैं। दूसरे में भूपत मित्रा की माँग में सिंदूर भर रहा है।

चित्र देखकर फूफा और दोनों बहनें खूब खुश होती हैं। बुआ भी खुश होना चाहती हैं, पर हो नहीं पातीं। सोते-सोते जागकर रोने लग जाती हैं- "हाय मित्रा। ये तूने क्या किया? क्या तू हम से इतनी तंग आ गई थी कि अपना भला-बुरा न सोचा? हाय मित्रा के मामा ये पाप तूने क्यों किया? मित्रा बेटी के अनिष्ट के प्रति तेरे मन में कोई डर शंका न आई? कैसे निष्ठुर हो रे तुम।”।

चित्रों के पीछे-पीछे मित्रा भी आ पहुंची है, पर अकेली ही। बुआ के मन का क्या भरोसा? पहले वह उन्हें मना-समझा तो ले। अपने दूल्हे के लिए उनके मन में थोड़ी सी जगह तो बना ले।

बुआ मित्रा को छाती से लगाकर जोर-जोर से रोए जा रही है। पता नहीं फिर कभी वह मित्रा को जीवित रूप में देख पाएंगी या नहीं? “हाय मित्रा। तूने माँगलिक लड़के से विवाह के लिए हां क्यों की? हम तेरे लिए कोई अच्छा लड़का हूँढ़ते जिसके साथ तु सुखी रहती। हाय। तेरी माँ को हम क्या मुंह दिखाएंगे और क्या जवाब देंगे?”

मित्रा समझाती है -“बुआ कोई न कोई खतरा तो हर जगह है। मेरे सुख की ही चिंता हैं न तो मैं बहुत सुखी हूँ। एक कवि जैसा दिल है उसके पास। जिंदगी को समझता है वह और मुझे भी। शांत और ठहरा हुआ स्वभाव है उसका। मुझे यही कुछ तो चाहिए था।”

बुआ आसू पोंछ लेती हैं और दूसरी चिंता में फंस जाती हैं” तुम्हें नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी। ऐसी पक्की नौकरी और इतनी अच्छी कम्पनी में नौकरी किसे मिलती है? महीने में दो हजार का नुकसान हैं तुम्हें। बाद में तनख्वाह और बढ़ जाती। उसकी ट्रांसफर कलकत्ता हो गई है तो तुम यही रह लेती।”

बुआ, तुम लाभ क्यों नहीं देखती? केवल पैसा क्यों देखती हो? तुम मेरी खुशी क्यों नहीं देखती? तुम्हारी मित्रा को एक सच्चा मित्र मिला है। माता-पिता भी मिले हैं। बस, तुम आशीर्वाद दो तो सब कुछ ठीक ही होगा। चाहूँगी तो नौकरी वहां भी मिल जाएगी। हां, अब तो मेरे फूल लगाने से तुम नाराज नहीं होओगी न?”

बुआ के चेहरे की किसी न किसी गिनती में फँसी रेखाएं और रूखे बाल स्नेहसिक्त होकर मुस्कराने लगते हैं और पति को आदेश देते हैं- “तुम जाकर मित्रा के दूल्हे और उसके माता-पिता को लिवा लाओ। शादी के बाद लड़की का यूँ मायके अकेले आना शुभ नहीं होता।”

यूँ एक कहानी पूरी हो गईं। मित्रा की खुशी सब की खुशी बन गई। जब भी कहीं आते-जाते उस सड़क से निकलना होता— मित्रा की याद आ जाती। जीवन की उलझनों और भाग-दौड़ में लगभग 18 वर्ष कब गुजर गए पता ही न चला। कोल्हू के बैल जैसी तय दिनचर्या ने न दिनों का पता दिया, न सालों का। बुआ के घर जाने का विचार या उत्साह मन में कभी न जगा। जैसे कि मित्रा के बिना उस घर का कोई अर्थ न हो। कोई सूत्र न हो। वहां जाने की कभी कोई जरूरत भी महसूस न हुई।

फिर एकाएक न जाने क्या हुआ कि मन असंख्य प्रश्नों से घिर । गया। अब मित्रा कहाँ है? कैसी है? क्या करती है? अब क्या सोचती है? उसका वह कविभाव कैसा है। उसके सपने आगे बढ़े या नहीं? कविभाव कहीं अकविभाव तो नहीं बन गया ? किससे पूछूं? कहां ढूंढूं मित्रा को? क्या बुआ अब भी इसी मकान में रहती हैं? क्या वह मुझे पहचान लेंगी? क्या मेरा वहां जाकर मित्रा के बारे में इतने वर्षों बाद सवाल-जवाब करना उचित हैं ?

मित्रा की याद ने जिस आवेग के साथ घेरा-उसके सामने कोई आशंका और दुविधा टिक न पाई और एक शाम काम से लौटते हुए गेट को पारकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने जा खड़ी हुई। दरवाजा खुला हुआ था। इसलिए कुछ आगे बढ़कर अंदर झांक लिया। देखा-दाई ओर के कमरे में फूफा मेज के आगे बैठे कुछ लिख रहे हैं और बुआ कपड़े उठा-रख रही है।

“नमस्कार।”

“नमस्ते नमस्ते।” बुआ ने मुस्करा कर उत्साहित किया। मेरी दुविधा और संकोच तिरोहित हुए। फूफा गंभीर और तटस्थ चेहरा बनाए देखते रहे।

“मैं मित्रा की दोस्त हूँ।” मैंने बुआ को बताया।

“ हाँ-हाँ। मैं पहचान गई हैं। तुम कभी-कभी यहां आया करती थी।”

“ आजकल मित्रा कहाँ है और कैसी है ?

“ठीक है। पिछले महीने ही उसके पति का तबादला दिल्ली हो गया है। सिर्फ लड़की ही है।”बुआ ने बुझे भाव से कहा।

“क्या आप मुझे उसका पता और फोन नम्बर देंगे ?” उत्तर में फूफा ने एक पुरजा मुझे पकड़ा दिया।

और मैं कई दिन तक सोचती रही-क्या उसके दिल्ली आने और याद के दस्तक देने में कोई तार्किक संबंध है ?

हैलो क्या मित्रा बोल रही है ?”

“नहीं। मैं उनकी बिटिया बोल रही हैं। आप राधा आंटी बोल रही हैं ?

“नहीं मैं धारा बोल रही हूँ।”

तभी फोन का चोंगा मित्रा ने ले लिया- "हैलो कौन ?”

“तुम मित्रा बोल रही हो न। मैं धारा, वसंत विहार से बोल रही हूँ। क्या पहचाना नहीं?”

“मुझे कुछ याद नहीं आ रहा।”

"तुम्हारे घर के सामने वाली सड़क के पार 'जी' ब्लॉक था। तुम्हारा मेरा कभी-कभी आना-जाना होता था। तुम्हारी आवाज मैं पहचान गई हैं। बिल्कुल वैसी ही दूधिया आवाज़।”

“कुछ और बताओ। याद नहीं आ रहा।”

“मुझे कहानियां पढ़ने का शौक था। जब भी मैं कोई अच्छी कहानी पढ़ती तो तुम्हें भी पढ़वाती थी और फिर उस पर चर्चा किया करते थे।“

“हाँ-हाँ। तुम्हारा अकेला कमरा था। उसमें टाईपराइटर था।” “ हाँ-हाँ।  कैसी हो?”

“मैं बहुत खुश हैं। खुब सैर की है। सारा हिंदुस्तान घूमाँ जगह-जगह ट्रान्सफर होती रही।“

“सुनकर बहुत अच्छा लग रहा हैं। सदा खुश रहो। तुम्हारी बुआ से बात हुई तो बड़े निराश स्वर में बोलीं कि सिर्फ एक लड़की ही है। क्यों जल्दी ब्रेक लगा दी?”

“बस ऐसे ही। कुछ लोग एक से ही खुश हो जाते हैं उसी से पूरी खुशी पा लेते हैं।”

“क्या उम्न होगी?”

“इसी साल हाई स्कूल की परीक्षा दी है।”

“तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करने की इच्छा होती है।”

“पर अब तो मैं बहुत कम बातें करती हूँ।” मुस्कान में लिपटा एक वाक्य।

उसके लहजे से लगा जैसे वह अतीत को याद नहीं करना चाहती हैं और वर्तमान के मोती को अपने अंतस की सीप में संजो-छिपाकर रखना चाहती हैं।

सिम्मी हर्षिता
जन्म : 29 नवम्बर, 1940, रावलपिण्डी
देहांत : 6 फरवरी 2019
शिक्षा : एम. ए., हिन्दी तथा समाजशास्त्र ।

पंजाब भाषा विभाग द्वारा वर्ष 1997 के श्रेष्ठ कथा-साहित्य के लिए ‘33 कहानियाँ’ संग्रह पुरस्कृत
हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा वर्ष 2006 का साहित्यकार सम्मान
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2006 का सौहार्द सम्मान

पहली कहानी ‘अपने-अपने दायरे' 1960 में ‘संचेतना' पत्रिका में
कथा संग्रह
‘कमरे में बन्द आसमान' (1975),
‘धराशायी' (1980),
‘तैन्तीस कहानियां'  (1996),
‘बनजारन हवा' (2000) तथा
‘विस्थापित सदी'।
उपन्यास
‘संबंधों के किनारे' (1984),
‘यातना शिविर' (1990) और
‘रंगशाला' (2003)
पंजाबी में अनुवाद
‘संबंधा दे कण्डे-कण्डे' (1992),
‘तसीहे घर' (2001)
 । 


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