डॉ सच्चिदानंद जोशी की #कहानी 'ऑल द बेस्ट' | Dr Sachchidanand Joshi ki #kahani 'All The Best' - #Shabdankan
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डॉ सच्चिदानंद जोशी की #कहानी 'ऑल द बेस्ट' | Dr Sachchidanand Joshi ki #kahani 'All The Best'

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Dr Sachchidanand Joshi

ऑल द बेस्ट

-डॉ सच्चिदानंद जोशी


सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। रेडियो पर संगीत सरिता कार्यक्रम की धुन बज रही थी। एफ एम के न जाने कितने चौनल हो गये थे। फिर भी राधे बाबू को ये ही चौनल पसंद आता था। कम शोर और अच्छे गाने।

बंगले का दरवाजा खुला और निक्की बेबी बाहर निकली। एकदम तैयार स्कूल की यूनिफार्म में। राधे बाबू चौंके इतनी सुबह! बाहर देखा तो मोहन भी गाड़ी लगा चुका था। याद आया राधे बाबू को ‘‘अरे हां आज से तो बारहवीं की परीक्षा शुरू है।’’ निक्की बेबी धड़धड़ाती बाहर निकल रही थी।

‘‘गुड मार्निंग बेबी’’ राधे बाबू ने कहा। निक्की बेबी ने शायद सुना नहीं। या फिर सुना तो अनसुना कर दिया। उसके चेहरे से साफ दिखाई दे रहा था कि वो तनाव में है। फिर भी राधे बाबू ने उसे शुभकामनायें देना अपना कर्तव्य समझा।

‘‘आज से पर्चे शुरू हैं न बेबी! ऑल द बेस्ट!’’ राधे बाबू ने अपनी शुभकामनायें दे दीं।

‘‘थैंक्यू गार्ड भैया!’’ निक्की बेबी ने इस बार अनमने ही सही जवाब दिया और चिल्ला कर बोली, ‘‘मम्मा! कम ऑन आय एम गेटिंग लेट।’’

लेट कैसे हो सकती है पर्चा तो नौ बजे से है। राधे बाबू ने मन ही मन सोचा। फिर उन्होंने खुद को झिड़की दी। ठीक ही तो है, बोर्ड परीक्षा में एक्जाम सेंटर जो बदल जाता है। जल्दी जाना ही ठीक है। तभी अंदर से बदहवास-सी मैडम भी बाहर निकलीं। शायद जल्दबाजी में ठीक से तैयार नहीं हो पाई थी। अपने हाथों से बालों को संवारते और अपनी ड्रेस ठीक करते उन्होंने दरवाजा खींचा और गाड़ी की तरफ बढ़ी।

‘‘गुड मार्निंग मैडम’’ राधे बाबू ने मैडम का अभिवादन किया।

‘‘गुड मार्निंग’’ मैडम ने राधे बाबू की तरफ देखे बगैर जवाब दिया और गाड़ी में बैठ गई।

‘‘कितनी बार कहा है कार का ए.सी. चालू रखा करो ताकि कार जरा ठंडी हो जाये। अब चलो जल्दी।’’ मैडम ने मोहन को फटकार लगाई और गाड़ी बंगले के गेट के बाहर हो गई।

‘‘मैडम भी तनाव में हैं।’’ राधे बाबू ने मन ही मन सोचा और होना भी चाहिये। पिछले डेढ़ महीने से निक्की बेबी की परीक्षा के लिये छुट्टी लेकर बैठी है। रोज सुबह शाम निक्की बेबी को क्लास के लिये लेने छोड़ने भी जा रही है। उनकी इस सारी मेहनत की सही परीक्षा तो आज से ही शुरू होनी थी। एक दिन तो मैडम साहब पर ही चिल्ला उठी थी, ‘‘बस मैं ही खट रही हूं बेटी के लिये। तुम्हें कोई फिक्र है बेटी की।’’

‘‘अब क्या हुआ तुम्हारी तरह से मैं भी छुट्टी लेकर बैठ जाऊं। मालूम तो है तुम्हें, चाईल्ड केयर लीव सिर्फ महिलाओं को है।’’ साहब ने झल्ला कर उत्तर दिया था।

‘‘चाईल्ड केयर लीव न सही, दो चार दिन यूं ही छुट्टी लेकर नहीं बैठ सकते। पता नहीं ऐसा कौन सा काम है तुम्हारा जो तुम दो-चार दिन बेटी के लिये छुट्टी नहीं ले सकते। मैं भी तो अपने जरूरी काम छोड़कर बैठी हूं घर पर। जानते हैं, ये निक्की भी कभी-कभी इतनी टेन्स हो जाती है कि वो मुझसे नहीं सम्हलती।’’

सही कह रही थी मैडम! निक्की बेबी इन दिनों कुछ ज्यादा ही तनाव में रहती थी। पढ़ाई, परीक्षा का बोझ दोनों ही था। परीक्षा के बोझ से याद आया राधे बाबू को कि परीक्षा तो आज से सुमी की भी शुरू हो रही थी। सुमी यानि राधे बाबू की दूसरे नंबर की बिटिया। वो भी बारहवीं का ही इम्तेहान दे रही है। वो भी तो गई होगी पर्चा देने। राधे बाबू ने परसों मैडम से अनुरोध भी किया था सुबह एक घंटा जल्दी छोड़ देने का।





‘‘मुझे ऐतराज नहीं। लेकिन तुम अपने ठेकेदार से पूछ लो। दिन वाला गार्ड यदि जल्दी आ जाये तो तुम चले जाना। कम से कम गेट खोलने बंद करने के लिये तो कोई हो। और किसी काम के तो तुम लोग हो नहीं।’’ मैडम ने जवाब दिया था और अंदर चली गई थीं। उनके इस जवाब का मतलब ‘ना‘ ही था। ठेकेदार से पूछने का मतलब था दो चार गालियां खाना और अपनी एक दो दिन की तनख्वाह कटवा लेना। दिन ड्यूटी वाले जगदीश की मां अस्पताल में थी। बेचारा रात भर अस्पताल में रहकर बड़ी मुश्किल से आठ बजे ड्यूटी पर पहुंच पाता था। उससे कुछ कहना बेकार था। लिहाजा राधे बाबू को यहीं रुकना पड़ रहा था आठ बजे तक।

मन ही मन उन्होंने सुमी बिटिया को आल द बेस्ट कह दिया। शांत रहकर पढ़ाई करती है सुमी बिटिया। कोई शोर नहीं, कोई तनाव नहीं। कई दिनों से तो उसके पास ठीक से बैठ भी नहीं पाये थे राधे बाबू। बस एक बार शायद दिवाली के समय कहा था उससे ‘‘बिटिया अच्छे नंबर लाने की कोशिश करना नहीं तो किसी अच्छे सरकारी कालेज में एडमिशन नहीं मिलेगा। तू तो जानती है प्राइवेट कालेज की फीस देने लायक पैसा नहीं है हमारे पास।’’

उस दिन से लगता था सुमी ने गांठ बांध ली थी। दो कमरों के मकान में सारे शोर-शराबे के बीच सुमी एक कोने में बैठ चुपचाप अपनी पढ़ाई करती रहती थी। राधे बाबू की उससे मुलाकात कम ही हो पाती है। बंगला ड्यूटी खत्म करके राधे बाबू को घर पहुंचते नौ बजे जाते हैं। दस से छह तक आर्केड कन्सल्टेंट में ड्यूटी करते हैं। उसका दफ्तर घर के पास ही है। फिर भी वापिस लौटते शाम के सात बज जाते हैं। शाम को सुमी ने एक ट्यूशन क्लास ज्वाईन कर रखी थी। कोई भले मानुष अध्यापक थे जो बहुत कम पैसों में बच्चों को फिजिक्स और मैथ्स पढ़ा रहे थे। तीस चालीस बच्चों की क्लास थी। राधे बाबू ने उन्हें देखा तो नहीं लेकिन उन्हें लगता था कि वो सचमुच कोई देवदूत होंगे। वरना आज के जमाने में छः सात सौ रुपये में फिजिक्स और मैथ्स कौन पढ़ायेगा। सुमी वहीं जाती थी दो घंटे। और किसी कोचिंग क्लास में भेजने की तो हिम्मत ही नहीं थी राधे बाबू की। कोचिंग और ट्यूशन के दाम तो सातवें आसमान पर थे। निक्की बेबी जिस क्लास में जाती है, सुना है वहां फीस घंटे के हिसाब से थी। कालेज एडमिशन का हाल तो और भी बुरा है। कभी कभी अखबार में कालेज के एडमिशन के बारे में समस्या पढ़कर तो राधे बाबू का दिमाग चकरा जाता था। बान्नवे, चौरान्नवे पर्सेन्ट वाले बच्चों को भी एडमिशन नहीं मिल पा रहा था है अच्छे कॉलेज में। क्या करेंगे यदि सुमी अच्छे नंबर नहीं ला पाई तो।

ऐसा नहीं था कि ये चिंता सिर्फ राधे बाबू को ही थी। साहब मैडम भी इसी चिंता में डूबे थे। एक दिन साहब यही बोलते तो बाहर निकले थे ‘‘नहीं पढ़ेगी ठीक से तो फिर निक्की को आस्ट्रेलिया भेजना पड़ेगा ग्रेज्युएशन के लिये। कम से कम ये तो कह पाऊंगा कि बेटी विदेश में पढ़ रही है। ‘‘मैडम ने उस पर जवाब भी दिया था, ‘‘हां दिल्ली के किसी सेकंड ग्रेड कॉलेज में पढ़ाने से तो अच्छा है कि बेटी आस्ट्रेलिया या फ्रांस में पढ़े।’’

‘‘फ्रांस में पढ़ेगी तो चालीस-पचास लाख रुपये साल से कम का खर्चा नहीं होगा।’’ साहब ने हिसाब लगाया।

‘‘क्या करें। करना तो पड़ेगा। एक ही तो बेटी है हमारी।’’ मैडम ने कहा था और चर्चा वहीं समाप्त हो गई थी।

साहब लोग आस्ट्रेलिया फ्रांस की सोच सकते थे, राधे बाबू के लिये तो दिल्ली के ही कॉलेज थे।

सोचते-सोचते आठ बजे गये। जगदीश भी आ चुका था। राधे बाबू ने झटपट यूनिफार्म उतारी, दूसरे कपड़े पहने और घर जाने लगे। जाते-जाते वो जगदीश की मां का हाल पूछना न भूले।

‘‘अभी ठीक है। लेकिन डाक्टर कहते हैं हफ्ता भर और रखना पड़ेगा। क्या करूं दादा मजबूरी है नहीं तो मैं निश्चित जल्दी आ जाता।’’ जगदीश ने उत्तर दिया।

‘‘नहीं नहीं, मैंने उसके लिये नहीं पूछा। हमारी सुमी बिटिया बड़ी समझदार है मेरी मजबूरी समझ लेगी।’’ राधे बाबू ने कहा और घर की राह ली।

घर पहुंचने में ही नौ बजे गये थे। नहा-धोकर तैयार हुये तो ललिता ने टिफिन बनाकर रख दिया।

‘‘सुमी ठीक से चली गई न!’’ राधे बाबू ने पूछा।

‘‘हां, अच्छे से गई है। पड़ोस के सुरेश भैया चले गये थे साथ। उनका भी बेटा है बारहवीं में। उसका भी सेंटर वही था। दोनों को अपनी स्कूटर पर बैठा कर ले गये।’’ ललिता ने कहा फिर कुछ देर रुकी राधे बाबू को लगा और कुछ कहना चाहती है ललिता।

‘‘क्या बोल रही थी बोलो न।’’ राधे बाबू ने कहा।

‘‘मैं कह रही थी कि यदि संभव हो तो बिटिया को लेने चले जाते। बेचारी बारह बजे धूप में अकेली आयेगी।’’ ललिता ने कहा राधे बाबू के लिये ये बड़ा धर्मसंकट था। सुबह छोड़ने जाने के लिये तो वो तैयार थे। कोशिश भी की थी। लेकिन दोपहर के बारे में तो उन्होंने सोचा भी नहीं था।

‘‘मैं तो इसलिये कह रही थी कि परीक्षा का सेंटर तो दूसरी जगह है। नई जगह है, वहां से बिटिया कैसे आयेगी?’’

ललिता की चिंता वाजिब थी। लेकिन आज आर्केड कन्सलटेंट में बोर्ड मीटिंग थी। खन्ना साहब ने कल ही सबको हिदायत दी थी, ‘‘सबको समय पर पहुंचना है। यूनिफार्म भी साफ सुथरी होनी चाहिये। और राधेश्याम, चाय-पानी, खाने का सारा इंतजाम तुम्हें ही देखना है। सब कुछ अच्छे से होना चाहिये।’’

ऐसे में आज के दिन तो दफ्तर से निकलना नामुमकिन था। आज खन्ना साहब से पूछने का मतलब था नौकरी से हाथ धोना। वैसे भी खन्ना साहब का खास विश्वास था राधे बाबू पर। राधे बाबू को सोच में पड़ता देख ललिता तुरंत बोली, ‘‘रहने दो। मैं सुरेश भैया से ही कह दूंगी। वो ले आयेंगे सुमी को।’’

‘‘नहीं नहीं, ऐसा करो तुम चली जाओ और आते समय बस से मत आना रिक्शा कर लेना।’’ राधे बाबू ने कहा और जेब से दो सौ रुपये निकालकर ललिता को देने लगे।

‘‘रिक्शा क्यों करेंगे। खामखा डेढ़ दो सौ रुपये लग जायेंगे।’’

‘‘नहीं, बिटिया परीक्षा देकर थकी हारी लौटेगी। रिक्शे से ही आना।’’ राधे बाबू ने कहा और झटपट तैयार होकर दफ्तर की ओर निकल गये।





शाम को जब राधे बाबू घर लौटे तो सात बज चुका था। बोर्ड मीटिंग के बाद सारी चीजें समेटने में समय लग गया। शुक्र है कि मीटिंग अच्छी हुई और खन्ना साहब ने सबको बधाई दी। सबके सामने उन्होंने कहा, ‘‘वेल डन राधेश्याम तुम्हारा इंतजाम अच्छा रहा।’’ खन्ना साहब की ये बात बहुत मजेदार थी खुश होते हैं तो तारीफों के पुल बांध देते हैं और नाराज होते हैं तो मां बहन सब गालियां दे डालते हैं। सुमी बिटिया के कॉलेज एडमिशन में कोई दिक्कत होगी तो राधे बाबू के लिये खन्ना साहब ही आसरा हैं।

घर में ललिता और छोटी बेटी रिमी घर पर थे। सुमी ट्यूशन क्लास जा चुकी थी। बड़ा लड़का तो घर में टिकता ही नहीं है। न उसे घर से मतलब था न मां-बाप से। कब आता, कब जाता, इसका कोई पता राधे बाबू को नहीं होता था। शुरू शुरू में पूछते थे राधे बाबू, अब तो उन्होंने उसके बारे में पूछना भी छोड़ दिया था। दसवीं में फेल हुआ था तब आखरी बार बात की थी शायद उससे। अब उस बात को भी पांच साल हो चुके थे।

‘‘सुमी का पर्चा ठीक हुआ?’’ खाना खाते-खाते राधे बाबू ने पूछा।

‘‘हां, अच्छा हुआ। बहुत खुश थी। अब अगला वाला ठीक हो जाये तो बड़ा बोझ उतरेगा।’’ ललिता ने बताया।

‘‘अगला पर्चा कब है?’’ राधे बाबू को पूछते शर्म भी आ रही थी। उन्हें अपनी बिटिया की परीक्षा का टाईम टेबल तक पता न था।

‘‘अगला पर्चा पांच तारीख को है। यानि तीन दिन बाद।।’’

‘‘उस दिन मैं कोशिश करूंगा कि बिटिया को छोड़ने जाऊं। मैं मैडम से छुट्टी मांग लूंगा।’’ राधे बाबू ने कहा जरूर लेकिन उन्हें मालूम था कि वो झूठ बोल रहे हैं। मैडम का रुख साफ था ‘‘ठेकेदार से कहो।’’ इन दिनों वैसे भी मैडम का रुख राधे बाबू की तरफ से रूखा ही हो गया था। इसलिये बार बार जताती भी थी “वैसे भी तो तुम लोग और किसी काम के तो हो नहीं। बस गेट खोलने बंद करने में ही काम आते हो।“

ये बात एकदम नहीं उठी थी। गार्ड की ड्यूटी में जो होता है वो सब काम राधे बाबू ईमानदारी से किया करते थे। फिर एक दिन मैडम ने कहा सुबह पूजा के लिये फूल ले आया करो। राधे बाबू ने फूल लाना शुरू कर दिया। फिर कभी मदर डेयरी से दूध तो कभी सफल की दुकान से थोड़ा सामान लाने मैडम भेज दिया करती थी। राधे बाबू ने कभी किसी काम के लिये मना नहीं किया। लेकिन उस दिन राधे बाबू हां नहीं कर सके। हुआ यूं कि बंगले के अंदर काम करने वाला हरी छुट्टी गया हुआ था। और सुबह सुबह साहब जूतों की खराब हालत देखकर नाराज हो गये। साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर था। मैडम ने चुपचाप जूते लाकर राधे बाबू को देते हुए कहा, ‘‘राधे जरा इस पर पालिश कर देना।’’ तिलमिला उठे थे राधे बाबू।

‘‘मैडम ये हमसे न होगा। ये गार्ड ड्यूटी में शामिल नहीं है।’’

‘‘तुम लोगों के दिमाग चढ़ गये हैं। सीधे काम के लिये मना कर रहे हो। ठीक है देख लूंगी।’’ मैडम ने कहा था और जिस तेजी से आई थी उसी तेजी से वापिस भी चली गई थी। उसके बाद जूते की पॉलिश का क्या हुआ, ये राधे बाबू को मालूम नहीं। उन्हें अंदेशा था कि मैडम ठेकेदार से शिकायत कर उनकी ड्यूटी बदलवा देंगी। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। हां, उस दिन से मैडम जरूर खिंची-खिंची सी रहने लगी। अब उन्होंने राधे बाबू को ‘‘राधे’’ की जगह ‘‘गार्ड’’ कहकर पुकारना शुरू कर दिया। राधू बाबू बाजार से सामान लाने का काम भी अब जगदीश से या किसी और से कहने लगी थी। इसलिये तो जब उन्होंने बिटिया की परीक्षा के लिये जल्दी जाने की बात कही थी तो उन्होंने ताना मारा था, ‘‘वैसे भी तो तुम लोग कुछ काम करते नहीं हो।’’

राधे बाबू बंगले पहुंचे तो जगदीश आतुरता से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। वो यूनिफार्म उतारकर दूसरे कपड़े पहन चुका था।

‘‘कैसा हुआ बिटिया का पेपर?’’ जगदीश ने पूछा।

‘‘अच्छा हुआ ऐसा ललिता बता रही थी। उससे तो मुलाकात ही नहीं हो पाई आज दिन भर में।’’

‘‘इधर अंदर तो घमासान मचा है। निक्की बेबी का पेपर बिगड़ गया है। दिन भर से धमाचौकड़ी मची है। कभी मां चिल्लाती है तो कभी बेटी। हलाकान कर डाला है मां-बेटी ने। साहब आयेंगे तो और बड़ा तमाशा होगा। अब आप मजे लेना उस तमाशे के।’’ जगदीश ने दिन भर के हालात का विवरण पेश करते हुये कहा। उसे जरा प्रोत्साहन मिलता तो शायद और ज्यादा चटखारे लेकर बताता। लेकिन राधे बाबू ने ही उसे रोक दिया।

‘‘हो गया होगा कुछ भी हमें उससे क्या। घर का अंदरूनी मामला है, वो लोग निबट लेंगे। हमें तो अपनी ड्यूटी करनी चाहिये।’’ ड्यूटी से शायद जगदीश को भी याद आ गया कि उसे अस्पताल पहुंचना है। राधे बाबू से विदा लेकर जगदीश चलता बना। राधे बाबू भी केबिन में जाकर यूनिफार्म पहनने लगे।

अगले दो दिन काम की भागादौड़ी मे ही बीत गये। साहब और मैडम में निक्की बेबी को लेकर जमकर झगड़ा भी हुआ। साहब ने तो यहां तक कह दिया मैडम से कि ‘‘यदि बेटी सम्हालनी नहीं आती तो उसे पैदा ही क्यों किया।’’ इस पर मैडम ने भी साहब को बुरा भला कहते हुये कह दिया कि ‘‘बेटी को पैदा करना ही सब कुछ नहीं होता। उसे पास बैठाकर उसकी बातों को सुनना भी बाप का फर्ज होता है। लेकिन बाप को तो इधर उधर मुंह मारने से ही फुर्सत नहीं है।’’

बंगले की दीवारें इतनी मोटी भी नहीं थीं कि ये सारी आवाजें बाहर न आ सकें। राधे बाबू सब कुछ सुनते और मुस्करा कर रह जाते। बच्चों की परीक्षा मां बाप में कैसा तनाव पैदा कर देती है यही सोच कर वे आश्चर्य में पड़ जाते। हां, इस बीच सुमी बिटिया के पास बैठकर उससे बतियाने की फुर्सत उन्होंने जरूर निकाल ली थी। उससे अपनी मजबूरी भी बताई थी कि क्यों वो उसे परीक्षा के दिन छोड़ने नहीं आ सके। सुमी बिटिया भी बड़ी समझदार थी। उसने अपने बाबा की मजबूरी को समझा और कह भी दिया कि आगे भी नहीं आ पायें तो उसे बुरा नहीं लगेगा। उसने राधे बाबू को आश्वस्त कर दिया कि अब वो एक्जाम सेंटर का रास्ता जान चुकी है और अकेली भी आना जाना कर सकती है। फिर भी राधे बाबू ने तय किया था कि चाहे कुछ भी हो जाये वो अगले पेपर यानि पांच तारीख को बिटिया को छोड़ने जायेंगे।

लेकिन सोचा हुआ सब कुछ हो ही जाये ऐसा कहां होता है। राधे बाबू की जिंदगी में तो शायद नहीं ही होता। सोचा सब कुछ होना होता तो बेटा ही ठीक से लिख-पढ़ नहीं जाता। सुमी के बाद लाख चाहने पर भी आने वाली बिटिया को आने से रोक भी तो नहीं पाये राधे बाबू।

चार तारीख की सुबह जगदीश की मां स्वर्ग सिधार गई। जगदीश का अब कुछ दिन ड्यूटी पर आना संभव नहीं था। ठेकेदार ने राधे बाबू को दिन रात दोनों ड्यूटी करने को कहा था। लेकिन राधे बाबू की दिन की नौकरी की वजह से ठेकेदार को मजबूरन रवि को भेजना पड़ा। रवि वैसे ही दिन में पढ़ाई करता था, इसलिये बामुश्किल ड्यूटी एडजस्ट कर पा रहा था। उसने राधे बाबू को फोन पर कह भी दिया था, ‘‘चाचा थोड़ी देर हो जायेगी आने में सम्हाल लेना।’’ दोनों ड्यूटी में इतने उलझ गये थे राधे बाबू कि जगदीश की मां की काठी में भी नहीं जा पाये थे।

पांच तारीख की सुबह संगीत सरिता खत्म होने आया तब भी उन्हें निक्की बेबी के आने की आहट सुनाई नहीं दी। मोहन न जाने कितनी देर से गाड़ी चालू किये बैठा था। वे हैरत में थे कि बेबी आज लेट कैसे हो गई। एक बार मन हुआ कि दरवाजे की घंटी बजाकर ताकीद कर दे। लेकिन संकोच में रह गये। तभी दरवाजा खुला और मां बेटी बाहर निकलीं। राधे बाबू ने आदतन ‘‘गुड मॉर्निंग’’ कहा। लेकिन दोनों में से किसी ने उनकी बात का जवाब नहीं दिया। निक्की बेबी जब कार में बैठी तो राधे बाबू उसे शुभकामनायें देने आगे बढ़े। तभी उन्हें मैडम की आवाज सुनाई दी, ‘‘डोंट लुक एट हिम। अदरवाईज यू विल स्पाईल टुडेज पेपर ऑलसो।’’

‘‘यस ममा! ही इज अनलकी फॉर मी।’’ निक्की बेबी ने कहा।

‘‘चलो मोहन’’ मैडम ने कहा और कार बंगले के बाहर निकल गई।

बारहवीं तक ही पढ़े थे राधे बाबू। वो भी हिंदी मीडियम से। लेकिन दुनिया ने इतनी अंग्रेजी तो उन्हें सिखा ही दी थी कि वो मां बेटी द्वारा कहे गये इन वाक्यों का अर्थ समझ सकें। फिर भी वो एक बाप थे। मन ही मन बुदबुदाये, ‘‘ऑल दी बेस्ट बेबी। आज का पेपर अच्छे से करना।’’

उन्हें यकीन था कि आज निक्की बेबी का पेपर जरूर अच्छा होगा और शायद सुमी बिटिया का भी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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