महारानी एक्सप्रेस, कहानी — तरुण भटनागर - #Shabdankan
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महारानी एक्सप्रेस, कहानी — तरुण भटनागर

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आजकल की कहानियों के साथ किये जाने वाले प्रयोगों — जो अधिकांशतः असफल होते हैं — ने कहानी-कला का नुक्सान अवश्य किया होगा. लचर होती जाती कहानियाँ और उनसे लदेफदे अखबार और अनजान पत्रिकाएं  हिंदी साहित्य की धता उतारने में व्यस्त हैं. इनसब के बीच अच्छी कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं लेकिन क्या वह उस पाठक तक पहुँच पा रही हैं जिसकी पहुँच (या जानकारी) में हिंदी साहित्यिक पत्रिकाएं नहीं होतीं, या जिस तक कहानी उसके रोज़ाना के अख़बारों के माध्यम से पहुँच रही है? ऐसी ही अच्छी यह तरुण भटनागर की  कहानी 'महारानी एक्सप्रेस' है. तरुण भटनागर की कहानियों में कथारस अपने मौलिक रूप में मौजूद होता है जो कि इसलिए भी बड़ी बात है...क्योंकि वह कहानी के साथ  नए प्रयोगों का उतना ही प्रैक्टिकल करते हैं जितने से उसकी कहानी-कला को नुक्सान नहीं पहुँचे. 

इस कहानी का पाठ कलाकार राजपाल यादव ने अपनी आवाज़ में भी किया है जिसे सुनने का अवसर जल्द मिलने की आशा है तबतक पाठन का आनंद उठाया जाए...

भरत एस तिवारी

महारानी एक्सप्रेस, कहानी 

— तरुण भटनागर

तारा कटनी के रेल्वे स्टेशन पर पिछले दो घण्टे से बैठी है। लोहे के बक्से के ऊपर । किनारे होल्डोल रखा है। कुली अभी तक यहीं खड़ा था , फिर अनमना सा कहीं और चला गया । दूर तक जाती रेल्वे लाईन पर बहुत दूर भाप का इंजन खड़ा है। संकराती रेल्वे लाईन के अंतिम से छोर पर बडी काली बिंदी की तरह दीख रहा है वह। दूर, बहुत दूर। काले गोले में तीन सिरों वाला राष्ट्रीय प्रतीक चमक रहा है, सफेद चमकीला। कभी - कभी धैर्य और भाप का बादल इंजन से ऊपर की ओर लपकता है, एक झटके से कुकुरमुत्ते की तरह। फिर इंजन के ऊपर फैलता है, धीरे-धीरे घुलता जाता है हवा में फैलकर विलीन हो जाता है। तारा के भीतर कुछ धड़क उठता है। लगता है अभी ट्रेन रेल्वे स्टेशन पर आ लगेगी। वह कुली को ताकती है। वह नहीं दीखता । इंजन यथावत खड़ा रहता है, चल पड़ने के भ्रम के साथ।

यह ट्रेन अपनी मनमर्जी से चलती है। कटनी से चोपन तक यह किसी का कहना नहीं मानती। कहीं भी धुंआ-भाप उगलती घण्टो खड़ी रहती है। कहीं भी सरकती है। धीरे-धीरे । कहीं भी ऐसे भागती है मानो कभी रूकेगी नहीं। लगता है, पता नहीं इस ट्रेन के लिए कोई सिग्नल बना भी है या नहीं? पता नहीं यह कैसी आँख मिचौली करती है जंगलों - पहाड़ों के बीच से भाप छोडती आठ डिब्बों वाली यह ट्रेन कभी भी कहीं भी दिख जाती है। गुजरती हुई , इंतजार करती हुई, धीरे-धीरे रेंगती हुई...... । तारा को पता नहीं था कि बैढन के लोग इस ट्रेन को ‘महारानी एक्सप्रेस' कहते हैं। यह है भी महारानी। एकदम महारानी। जिसके नाक पर गुस्सा है। गुरूर है। जो खुदमुख्तार है। जब बल खाती घाटियों को पार करती है तो लगता है कितना इतराती है। जब रूठकर रूक जाती है तो कोई इसे मना नहीं पाता। वह खड़ी रहती है खुद में मगन, रुठी और अनमनी। जब चहक कर चलती है तो पूरी बोगी लचकती है। एक ताल में पहियों की पटरियों पर आवाज़ आती है। एक सी लय में हवा गुनगनाती है, ट्रेन की खिड़की दरवाज़ों पर अठखेलियाँ करती है। महारानी एक्सप्रेस जब सीटी बजाती है तो जंगल की दुनिया उसे देखती है हठात, एकटक -- अरे देखो वह जा रही महारानी एक्सप्रेस ।

पूरी दुनिया रेल्वे स्टेशन पर महारानी एक्सप्रेस का इंतजार करती है। सिर पर जलाऊ लकड़ी का गठ्ठर रखे आदिवासी औरतें, पोटली लटकाये कोई आँवई, कोई बुड्ढा -बुड्ढी जो बहुत दिन बाद कहीं दूर-पार के गाँव जा रहे हैं, कोई तेंदूपत्ता के बण्डलों के साथ इंतजार करता जंगल का आदमी, मज़दूरों का बीड़ी फूँकता झुण्ड, तो कोई ठेकेदार , कोई फड मुंशी, पीले बस्ते में फाइलें बाँधे किसी दूर गाँव के दफ़्तर का बाबू , बच्चे को गोद से चिपकाये काली देहवाली गाँव की कोई औरत, कचहरी की पेशी के बाद गाँव लौटता कोई किसान, कोई एकदम अकेला गुमसुम सा नौजवान, काम की तलाश में कोई शहरी कारीगर, कंधे पर होल्डोल उठाये कोई बेचैन नौकरी पेशा शिक्षक कितने सारे लोग, तरह-तरह के .. .....सब महारानी एक्सप्रेस के इंतजार में ।

जब तारा टिकट ले रही थी तो कुली ने कहा था कि टिकट की जरूरत नहीं। महारानी एक्सप्रेस में टिकट नहीं लगता। हर कोई बेटिकट बैठता है। महारानी एक्सप्रेस हर किसी के लिए है। क्या टिकट वाले और क्या बे-टिकट ? टी.टी.ई. आता है। सवारी की हथेली पर पैन से एक निशान बना देता है । यही निशान टिकिट है। निशान के ऐवज में सवारी उसे कुछ पैसे दे देती है। टी.टी.ई. को पता है कि कौन कितने पैसे दे सकता है। लोगों को भी पता है कि किसे-कितने पैसे देने हैं। कुछ इतने फटेहाल हैं कि पैसे नहीं दे सकते। कुली कहता कि टी.टी.ई. उनकी हथेली पर भी निशान बनाता है । बस उनसे पैसा नहीं लेता। वह कहता कि गरीब आदमी उसे उम्मीद से देखता है। वह उसे देख मुस्कुराता है । कभी कोई गरीब अपनी अण्टी से चवन्नी या अठन्नी निकालता है। टी.टी.ई उससे पैसा लेने से मना कर देता है। बस धीरे से उसके बायें हाथ की हथेली पर एक निशान बना देता है। फिर आगे बढ़ जाता है - कुली उसे महारानी एक्सप्रेस के टी.टी.ई. के बारे में बताता जाता।

तारा को कुली की बात पर यकीन नहीं होता है। भला ऐसा भी कहीं हो सकता है। पर कुली कहता - जो लोग पैसे दे सकते हैं उससे वह पैसे जरूर लेता है । माँगकर लेता है। वह ऐसे लोगों को हड़काता भी है। धमकाता है कि बिना टिकिट पर फाइन कर देगा, पुलिस केस बना देगा। फिर आदमी को पैसा देना पड़ता है। कुछ लोग कम पैसे देने की बात कहते हैं। वह जानता है कि किससे पूरे पैसे लेने हैं और किससे कम। हथेली पर बना निशान आख़िरी स्टेशन याने चोपन तक काम आता है। कोई भी टिकिट पूछे, चाहे नया टी.टी.ई या पुलिस वाला हर किसी को हथेली का निशान दिखा दो, वह चुपचाप आगे चला जायेगा। जब रेल्वे स्टेशन से बाहर आओ, गेट पर खड़े पुलिस वाले को अपनी हथेली पर बना निशान दिखा दो, वह चुपचाप चले जाने देगा - कुली अपनी रौ में कहता जाता - हर कोई टी.टी.ई की तारीफ करता है। गरीब लोग उसे बहुत बढ़िया कहते हैं। तो ऐसी है हमारी ‘महारानी एक्सप्रेस' - कुली तारा को समझाता जा रहा था। तारा को लगा पता नहीं वह कहाँ आ गई है। उसने कुली के लाख समझाने पर भी टिकिट ले ही लिया।

सिंगरौली में एक थर्मल पावर प्लाण्ट बन रहा है। प्लाण्ट की फाउण्डेशन पड़ गई है। पहला साइट ऑफिस बन गया है। प्रधानमंत्री ने इसकी आधार शिला रखी है। स्टेज एक का काम शुरू हुआ है। पेपरों में आया है कि यह भविष्य में देश का सबसे बड़ा थर्मल प्लाण्ट होगा।

तारा का यहाँ शुरू होने जा रहे अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में काम करने का ऑफर आया है। तनख्वाह अच्छी है। घर के हालात देखते हुए ही उसने यह निर्णय लिया था, कि वह सिंगरौली चली जाये। फिर यह जगह उसके घर के पास है। उसका घर झारखण्ड में है। उसे यह भी लगा कि यह जगह भी ठीक वैसी ही होगी जैसी कि उसका झारखण्ड है। बहुत सी वजहें थीं कि वह चली आई। छोटी बहन और माँ को भी साथ ले आई ।

स्टेशन पर महारानी एक्सप्रेस लग रही है। उसका इंजन धीरे-धीरे सरक रहा है। किसी भीमकाय तपते हुए विशाल काले आकार का वह इंजन धीरे-धीरे सीमेण्ट के प्लेटफार्म को धड़धड़ाता हुआ बढ़ रहा है। तारा की छोटी बहन ने पहली बार भाप का इंजन देखा। लोहे के विशाल पहियों को धक्का मारते पिस्टन और उनमें से निकलते भाप के गुबार को छोटी बहन ध्यान से देखती रही। धड़धड़ाते पहियों पर घूमते लोहे के पिस्टन और विशाल सिलेण्डर के काले आकार को देखकर पहले तो वह खुशी से चीखी पर जैसे ही इंजन ने सीटी बजाई और धुंये और भाप का गुबार छोड़ा वह डरकर तारा से चिपक गई।

........तारा को हर बात याद है। गुजिता दिनों की बातें । बहुत पुरानी यादें । अब न तो वैसे भाप के इंजन रहे जिन्हें स्टेशन पर घण्टों से इंतजार करते यात्री बड़े इत्मिनान से देखते थे और न रहीं वैसी फुर्सते। उन दिनों सिंगरौली में बन रहा यह प्लाण्ट एक अजीब सी दुनिया अपने में समेटे था। स्टेज एक का काम शुरू हुआ था। ट्रक और डोजर जमीन को समतल कर रहे थे। इंजीनियर प्लानिंग में जुटे थे। एक छोटा सा साइट ऑफिस था। टीन की छत वाला। दो तरफ दरवाजे थे। पीछे पहाड़। लाइट नहीं थी। वे वहाँ रात दिन प्लानिंग करते, डिजाइनिंग करते, नक्शे तैयार करते, बहस -मुबाहिसे करते......। अक्सर देर रात उस बियावान में इस ऑफिस के भीतर से रोशनी आती रहती थी।

...ट्रेन में वह सीट के बीच बैठी थी। छोटी बहन खिड़की पर जमी थी। तारा की माँ सामने की सीट पर बैठी थी। माँ छोटी बहन को खिड़की से दूर रहने को कह रही थी। भाप, कोयला और राख के बादल खिड़की तक आ रहे थे। छोटी बहन की आँखें इंजन के धुंये और कालिख से काली हो गई थी। ऐसा लगता मानो काजल लगाया हो। वह बार बार आँख मलती और बाहर देखती। बाहर पीछे सरकते जंगल थे। साथ -साथ चलता आकाश था। बहुत दूर धीरे-धीरे गोल घूमती एक पहाड़ी थी। फूस और खप्पर की छतें थीं, जो आहिस्ते-आहिस्ते पीछे छूट रही थीं।

तारा पल भर को खिड़की के पार देखती । एक अजीब सी आंशका से उसका दिल डूबता जाता । एक किस्म का आजनजीपन उसे घेर लेता । पता नहीं वे कहाँ जा रहे हैं? हर बार यही होता है जब-जब वह किसी नई जगह नौकरी को जाती तब-तब ऐसा ही होता। तमाम आशंकाओं में डूबा मन घबराता। दिल बैठता जाता। पर इस जगह के लिए उसे यह लगा था कि यह झारखण्ड के पास है। उसके अपने घर के पास। पर घर के पास होने का भाव भी कोई सांत्वना न देता था। दिल जोरों से धड़क रहा था। महारानी एक्सप्रेस जोंक की तरह रेंगती बढ़ रही थी। घाटियों के बीच से, पथरीले पहाड़ों के गिर्द और कहीं-कहीं दूर तक फैले छितर जंगलों के बीच से वह बहुत आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ रही थी। कभी जोर की सीटी और तेज छूटती भाप के साथ वह झटके से तेज़ गति पकडती पर फिर थोड़ी देर बाद मंथर चाल चलने लगती।

तारा ने अपने आसपास नज़र दौड़ाई। ट्रेन की खिड़की से लकड़ी का गठ्ठर बाँधकर लटकाया गया था। दूध के डब्बे और तेंदूपत्ता के बण्डल खिड़की की रेलिंग से बँधे ट्रेन के बाहर लटक रहे थे। साफ सुथरे कपड़े वाले थोड़े संपन्न लोग सीटों पर बैठे थे। गाँव के लोग, कुछ औरतें और बुजुर्ग और कहीं कहीं पूरा परिवार डिब्बे के फर्श पर ही बैठा था । एक दो औरतें और चार-पाँच आदमी संडास के पास जमीन पर बैठे थे। लगता था ये किसी एक ही गाँव के रहने वाले थे। कुली ने बताया था कि अगर सीट खाली हो तो भी वे जमीन पर ही बैठते हैं। उनके पैरों में चप्पलें नहीं थी। मैली -कुचैली, फटती और तार -तार होती साड़ियों में कुछ औरतें अपने बच्चों के साथ बैठी थीं। उनमें से कुछ ने लंबा पूँघट किया हुआ था। कुछ बूढी और जवान होती औरतों के चेहरे खुले थे। कुछ आदमी सिर्फ धोती पहरे थे, ऊपर से उघाड़े तो कुछ ने बनियान पर रखी थी। एक आदमी और एक लड़का पैण्ट शर्ट पहरे थे । लड़के की पैण्ट में बटन नहीं थी और आदमी की शर्ट में। पैट को कमर पर सुतली से बाँधकर लड़के ने टिका रखा था। पिता की शर्ट बेटन होने से सामने से खुली थी। जिससे भीतर की मैली कुचैली, छिद्रयुक्त और शर्ट के बाहर पैण्ट तक झूलती बनियान दीखती थी। ये दोनों तारा की सीट के पास बीच के रास्ते में उकडू बैठे थे। फर्श पर बैठे ज्यादातर बच्चों के तन पर बहुत कम कपड़े थे। कोई रद्दी पुरानी हाफपैण्ट पहने था और बटन की जगह पिन से लगाई गई शर्ट डाटे था तो कोई बहुत छोटा पूरा तरह से नंगा किसी पुरानी फटी पुरानी कथरी या तार-तार होती चादर में लिपटा फर्श पर लेटा था तो कोई अपनी माँ की देह से चिपका टुकुर-टुकुर देख रहा था।

तारा जहाँ नजर दौड़ाती उसे साँवले चेहरे देखते। कोई खुशी भी नहीं थी। कोई संताप भी न था। वे चुप थे। भावहीन। पता नहीं वे कहाँ जा रहे थे? कुछ ऊंघ रहे थे, तो कुछ बेवजह इधर-उधर देख रहे थे और कुछ की आँखें दरवाजों और खिड़कियों के पार गुजरती जाती दुनिया पर एकटक थीं। एक औरत की आँखे क्षण भर को तारा की आँखों से मिलीं। पर जैसे कुछ भी नहीं हुआ। उस तरफ खामोशी थी। उसके काले भावहीन चेहरे पर वह खामोशी अविचल थी। चेहरे पर खामोशी को पढ़ना सबसे आसान होता है | चेहरे पर खामोशी की कोई रेखा नहीं होती।

तारा ने सोना चाहा। पर नींद न आई ।

सिंगरौली एक वीरान सा स्टेशन था तब। अब भी कहाँ ज्यादा आबाद हुआ। थर्मल पावर स्टेशन के बहुत से लोग इसे आबाद करते रहे हैं। आबाद करने का एक ऐसा काम जिसमें वे अनवरत लगे रहे हैं। अपने घर की तरफ जाने के लिए वे अक्सर यहाँ इकट्ठा होते हैं। वे तमाम लोग भी जिनका जीवन बदला है, इस जगह हुई शुरूआत के साथ। वे अक्सर यहाँ दीखते हैं। दुर्जनों -सैकड़ों। सैकड़ों तरह के कामों में भिड़े हुए। उन तमाम वीरानियों को भरते हुए जो बरसों से यहाँ डेरा डाले हुए हैं। जिसे तारा लगातार महसूस करती रही है। बहुत कठिन होता है किसी अनजान निर्जन जगह की वीरानी को भरना, पर बरसों से देश के कोने-कोने से आये लोग यहाँ यह करते रहे। असंख्य बार। उन प्रयासों का कहीं कोई दस्तावेज़ नहीं। बहुत कम कहानियाँ हैं जो लोग जानते हैं । उन लोगों की कहानियाँ जो तारा की तरह यहाँ आये काम की तलाश में। घबराये दिल और एक अजनबीपन के साथ इस धरती पर पैर रखे। एक अजीब से भय और संकोच के साथ इस बियावान में किसी ट्रेन या बस से उतरे और फिर चलते चले गये...और इस तरह यह दुनिया थोड़ा और आगे बढ़ गई और एक दिन एक आबाद नगर बनी, पूरे देश का सबसे विशाल थर्मल प्लांट बनी। बनी सैकडों -हजारों लोगों का घर, लाखों की आशाओं और करोड़ों की खुशियों का संसार । इन बातों का कोई हिसाब नहीं। हो भी नहीं सकता।

... दो कमरों का छोटा सा अस्पताल था। एक डॉक्टर, एक नर्स, एक वॉर्ड बॉय, एक मेहतर, दो कंपाउण्डर और दो चपरासी। यह पूरा अस्पताल था। यहीं पर उसे उस खामोशी के बारे में ठीक-ठीक पता चला था, जो ट्रेन की उस औरत के चेहरे पर उसने पढ़ी थी। वह चुप्पी जो महारानी एक्सप्रेस के सवार उन तमाम चेहरों पर बसी हुई थी।

'तुमने हमारी जमीन ली। हमारा घर छीन लिया। देखना एक दिन तुम लोगों को यहाँ से जाना होगा।

वह मरीज एक किस्म की कातरता के साथ तारा को कह रहा था और फिर तारा पर गुर्राते हुए कहता रहा - तुमने हमारा घर छीना, हमारी जमीन छीनी, तुमने ...। तारा उसके बॉये हाथ पर पट्टी बाँध रही थी। उसका नाम विशेश्वर था। पास के गाँव का है यह। मुखिया का आदमी । गाँव व दो चार घर उस पर आश्रित हैं। विशेश्वर के दूसरे भाइयों के घर। याने उन सब घरों का खर्च उसके दिये पैसों पर ही चलता है। पहले एक परिवार था पर अब सब अलग रहने लगे हैं। सब बड़े हो गये। शादी हुई । परिवार बढ़ा। अलग होने की जरूरत थी । पर ज़मीन एक थी। चूल्हा भी एक। फिर एक दिन पता चला कि ज़मीन भी जायेगी , घर बार भी..... कि प्लांट लग रहा है, सब चीज प्लांट की हो जायेगी और बदले में मिलेगा मुआवजा ।‘

जब मुआवजा मिला तब विशेश्वर के मन में लालच आ गया । जब जमीन एक थी तो कोई बंटवारा न था। जमीन सबकी थी। सब काम करते थे। पर पैसा ? पैसा तो बाँटता है । मुआवजे में खासी रकम मिली थी। झगड़ा इन्हीं पैसों पर शुरू हुआ। पर विशेश्वर से कोई पंगा नहीं ले सकता था। मुखिया के डर से हर कोई कतराता था। परिवार का हर सदस्य जानता था कि अगर लट्ट भी चला दो गुप्ती–फरसा चला दो या मारपीट भी कर दो तो भी नुकसान खुद का ही है। पुलिस आयेगी, कोर्ट कचहरी होगी। पूरा परिवार तबाह हो जायेगा। फिर विशेश्वर ठहरा मुखिया का आदमी। लड़ना कठिन था। हक मिलना और कठिन |

एक दिन भाइयों में खूब बहस हुई। घर में कोहराम मच गया। औरतें अपने-अपने आदमियों को समझाती रहीं। वे एक दूसरे के साथ गाली गलौच करते रहे। पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजों-खिड़कियों की संद से झाँकता तमाशा देखता रहा। विशेश्वर ने मना कर दिया था कि वह फूटी कौड़ी न देगा। वे तीन भाई थे। बड़ा भाई शहर में था और सबसे छोटा वहीं रहता था। विशेश्वर मंझला था। बड़ा भाई कुछ दिनों के लिए शहर से आया था। उसी ने मुआवज़े के पैसे की बात की थी। इसी पर झगड़ा बढ़ गया। छोटा भाई बहुत दिनों से खुद को जप्त किये बैठा था। उस दिन उसका गुस्सा फूट पड़ा। पर जानता था कि मारपीट से उसे ही नुकसान होगा। उसने कइयों के घरों को सिर्फ इसलिए बर्बाद होते देखा था, कि वे विशेश्वर जैसों से लड़ पड़े थे। वे अपने हक के लिए लड़े थे और इसकी कीमत बेहद खतरनाक थी। पर उस दिन वह आपा खो बैठा था। आखिर खुद को जप्त करने की भी एक सीमा होती है। गुस्से का बाँध टूट गया। उसने पहले तो विशेश्वर का हाथ जोर से पकड लिया और फिर अपने पैने दाँत उसके हाथ में गड़ा दिये। विशेश्वर दर्द से कराह उठा। उसके छोटे भाई के दाँत उसकी खाल को फाड़कर माँस में धंस गये थे। घाव कुछ दिनों तक बना रहा , फिर पक गया, पीव और गंदे खून से भर गया।

'दादा हाथ सीधे रखो’ - घाव पर पट्टी बांधती तारा ने कहा।

‘भगवान तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा। याद रखना। तुमने हमारा घर छीना, हमारी ज़मीन छीनी...'

विशेश्वर अब भी तारा पर गुर्रा रहा था।

तारा ने जिस डॉक्टर के साथ काम सीखा था, वह उसे बहुत कुछ बताता था । बताता था कि नर्स वह है जो दर्द को ठीक-ठीक समझती है। जो सिर्फ घाव को या तकलीफ भर को नहीं जानती, पर उसकी वजह भी जानती है। जो ठीक -ठीक जानती है कि क्यों कोई रोता है, क्यों किसी को एकदम से गुस्सा आता है, क्यों कोई एकदम चुप हो जाता है...... ....इंसान , इंसान को काट खाये यह उसने पहली बार देखा। उसने मारा नहीं, कोई हथियार नहीं चलाया...बस गुस्से से तमतमा उठा और काट दिया। वह मारने पीटने से बचना चाहता था, वह हमला करने से खुद को जप्त करता रहा...पर गुस्सा था कि काट दिया। विशेश्वर ने तारा को आपने भाई के लिए गालो का रुपक प्रयोग करते हुए बताया था कि उसने काट दिया। तारा ने थोडे अचरज से उसके हाथ को देखा था। उसने एक दो बार सहपाठी द्वारा काट खाये गये बच्चों के हाथों की मरहम पट्टी तो की थी। पर आदमियों के इस तरह काट खाने का मामला पहली बार आया था। फिर पता चला कि विशेश्वर का भाई डरता था। वह मारने-पीटने से बचना चाहता था, पर गुस्सा था कि विशेश्वर का हाथ पकड़ा और काट दिया।

तारा ने कुछ ऐण्टीबायोटिक्स विशेश्वर को दीं। विशेश्वर अब भी उस पर गुर्रा रहा था । तारा ने सोच रखा था वह सब कुछ चुपचाप सुन लेगी। एकदम खामोश। क्योंकि वह नर्स है। यह दर्द की वजह ठीक-ठीक जानती है । विशेश्वर उसके चेहरे पर प्रतिक्रिया के भाव ताडता रहा। वह तलाश में था कि तारा के चेहरे पर गुस्से या प्रतिकार की एक रेखा दीख जाये और फिर वह जी भरकर अपनी भड़ास निकाल ले। पर वहाँ कुछ भी नहीं था।

......ये दो गोली सुबह, यह एक शाम को। तीन दिन बाद फिर से आना। ड्रेसिंग फिर से कर देंगी।

विशेश्वर ने उसके चेहरे को फिर से देखा। गौर से देखा। फिर जाने लगा। जाते-जाते रुका। उसकी तरफ मुडा । कहने लगा हर कोई एक जैसा नहीं होता है। तुम अलग हो। तारा ने मन ही मन सोचा कि एक दिन तुम सब मानोगे ही कि हम सब अलग हैं। हम सिद्ध करेंगे कि हम और तुम एक ही हैं। कि यह दुनिया तुम्हारी -हमारी दोनों की दुनिया है........ फिर उसने खुद से कहा - पता नहीं वह क्या-क्या तो सोचती रहती है, क्यों सोचती है राम जाने ? विशेश्वर ने क्षण भर को तारा को देखा। वह अब दूसरे मरीज को देख रही थी। फिर धीरे से वहाँ से चला गया।




तारा जानना चाहती थी कि वह कौन था जिसने विशेश्वर के हाथ पर काटा। वह जो लड़ा नहीं, जिसका प्रतिकार सिर्फ काटना था। कौन था वह ?

तीन दिन बाद विशेश्वर फिर आया । तारा ने उसकी ड्रेसिंग की । इस बार वह चुप था। वह कुछ नहीं कह रहा था।

' अब बिल्कुल ठीक हो जाओगे। पर दवा लेते रहना, पूरी लेना बंद न करना।‘

विशेश्वर ने उसे दो रूपये जेब से निकालकर देने चाहे। वह मुस्कुरा उठी। उसने पैसे नहीं लिये।

‘बहन माफ करना जो हमारी बात का बुरा लगा हो।'

‘यह तो मेरा काम है। अक्सर लोग कहते हैं।‘

क्या ? अक्सर लोग इस तरह का बर्ताव करते हैं....? ‘

‘करते हैं। कभी -कभी कोई गाली भी देता है।‘

‘तब तो गुस्सा आता होगा। है न।‘

तारा चुप रही। डॉक्टर के पर्चे को देखती रही।

‘बहन एक बात बोलूं।‘

‘हाँ।‘

पर्चा देखकर शैल्फ पर से दवा निकालने के काम में लगे-लगे ही तारा ने कहा।

‘मैं छोटा आदमी हूँ। पर फिर भी कभी कोई काम हो तो बताना।‘

तारा चुप रही। दूर अपने रास्ते से महारानी एक्सप्रेस गुजरी थी। जब विशेश्वर कह रहा था कि तब तो गुस्सा आता होगा...है न, उस वक्त उसके गुजर जाने के बाद की आहटें सुनाई दे रही थीं। उसकी गूंज चुकी लंबी सीटी की आवाज के बाद दोपहर की ख़ामोशी का एक खाली पन्ना खुल गया था। खामोशी के उस खाली पन्ने में खालिस सफेद रंग था। उस खालिस सफेद में लफ्जों का इंतज़ार करती समानांतर लकीरें खिंची थीं। पता नहीं कब और कहाँ लफ्जों का इंतज़ार करने को ये लकीरें पन्ने की उस सफेदी में खींच दी गई थीं। खिड़की के बाहर हवा में झूलती शाख के पत्ते खडखडा रहे थे। टेबिल पर एक रूल अस्पताल के ओ.पी.डी. के रजिस्टर पर चुपचाप रखा था। दरवाजे के हरे पर्दे लहरा रहे थे, बेआवाज । विशेश्वर ने कहा था कि कभी कोई काम हो तो बताना और तारा चुपचाप रहना चाहती थी। इस तरह वह चुप रही। इस तरह दूर से कहीं महारानी एक्सप्रेस गुजरी थी।

पता नहीं यह कैसी तो दुनिया है? बिल्कुल अलग। तारा को लगता। जब अजनबीपन के साथ और डूबते दिल से किसी नई जगह वह आ जाती है तो उस जगह को वह जानना चाहती है। यह जगह? कितनी अजीब। औरतें हाथ में चप्पल पकड़े नंगे पैर चली जाती हैं। वे आदमियों के सामने चप्पल नहीं पहर सकतीं। उनके आदमी गाँव के बड़े लोगों के सामने चप्पल नहीं पहर सकते। गाँव के बड़े लोगों के सामने आदमी और औरतें सिर्फ और सिर्फ जमीन पर बैठते हैं। एक बार एक आदमी गाँव के ठाकुर साहब के सामने कुर्सी पर बैठ गया था। उसे ठाकुर के आदमियों ने बुरी तरह से मारा और घर के बाहर फेंक आये। कुओं पर सिर्फ पण्डितों और ठाकुरों का कब्जा है। वे उन्ही को पानी देते हैं जो उनके लिए काम करते हैं। जो उनके खेतों में, घरों में, खलिहानों में जानवरो की भॉति काम में जुते होते। हैं, सिर्फ वे ही पानी पा सकते हैं। एक ब्राहम्ण नौकर कुँये से पानी निकालता है और दूर से उनके बर्तनों में उँडेलता है। उलाहना देता है। कभी पानी देता है, कभी नहीं देता है । कभी किसी पोखर या नदी का पानी वे लोग ले आते हैं। हैजा और पेचिश के शिकार होते हैं। तारा को अचरज होता कि यहाँ इतना पीलिया और पेचिश क्यों होती है? पता चला यह बीमारी पण्डितो और ठाकुरों को नहीं होती। यह सिर्फ उनको होती है, जिनके हिस्से का पानी भी तय नहीं हो पाया है।

कैसी है दुनिया ? जहाँ इंसान को जानवर माना जाता है। उसे डॉक्टर की बात याद आई -नर्स याने वह जो दर्द को जानती हो। तारा को पता है कि दर्द का ठीक-ठीक मतलब क्या है? उसने सोचा वह यह जगह छोड़कर नहीं जायेगी। कभी नहीं। उसका विश्वास और पक्का होता जाता। वह सोचती वह कभी नहीं जायेगी। उसे अस्पताल में उन लोगों का इलाज करना पड़ता जो जहर खाकर आते थे। कई लोग सिर्फ इसलिए जहर खा लेते ताकि उनकी बात मान ली जाये। अपनी बात, अपनी आवाज लोगों तक पहुँचाने वे जहर खा लेते । खासकर सल्फास। घर परिवार के ही किसी सदस्य से लेकर गाँव मोहल्ले के किसी बड़े आदमी को धमकाने, डराने की नीयत से वे जहर खा लेते। फिर अस्पताल में पलंग पर पड़े होते। तारा उनको उल्टी करवाती। सिलाइन चढ़ाती। वे तारा से गुजारिश करते कि वह उसे बचा ले। कि उनके पास कोई और तरीका नहीं था, अपनी बात, अपनी जिद मनवाने का । कि उनका जो हक है, उसकी याद दिलाने उन्हें जहर खाना ही था। न्याय की गुहार लगाने उन्हें जहर खाना ही था। कोई और उपाय भी कहाँ था ? तारा ऐसे लोगों को भौंचक सी ताकती। उसका दिल दुःख और डर से भर उठता। कितनी नृशस है यह दुनिया, जहाँ अपनी बात मनवाने जहर खाना पड़ता है। कितनी निरंकुश । उसे लगता कि जहर खाने वाले की बात कितनी सच्ची और तर्क संगत है, पर लोग नहीं समझना चाहते । वह धीरे-धीरे बढ़ते पावर प्लाण्ट और उसके आसपास फैले कस्बों को गौर से देखती। उसका यकीन पक्का होता जाता कि वह यह जगह छोड़कर कभी न जायेगी।




.......सर इस आदमी को अगर नौकरी मिल जाये तो पाँच लोगों का यह पूरा परिवार भूखों मरने से बच जायेगा।

तारा ने प्लाण्ट के एच.आर. के हैड से कहा था। उस आदमी का नाम दीनानाथ था। वही आदमी जिसने विशेश्वर का हाथ काट लिया था। विशेश्वर का छोटा भाई दीनानाथ। तारा को दीनानाथ की कहानी पता चल गई थी। वह चाहती थी कि उसे प्लाण्ट में नौकरी मिल जाये। जमीन का मुआवजा विशेश्वर ने ले ही लिया था। वह अपने भाई दीनानाथ को फूटी कौड़ी न देना चाहता था। पर तारा को पता था कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी भी मिलती है । सो वह सोचती कि यदि दीनानाथ नौकरी पा जाये तो उसके परिवार के कष्टों का भी निदान हो जायेगा। उसकी माँ ने उससे कहा था कि रहने दे। तुझे क्या लेना देना इस मामले से। ऐसे मामलों में नहीं पड़ना चाहिए। पर फिर भी वह एच.आर, के हैड से बात करने चली आई थी। माँ के मना करने के बाद भी। पर ये क्या? एच.आर. के हैड ने उसको बताया कि उसके परिवार के सब सहमत हैं कि दीनानाथ को ही नौकरी दी जाये, पर विशेश्वर रजामंद नहीं है। तारा ने देखा कि फाईल में विशेश्वर ने एक आपत्ति लगा रखी थी। एक दरख्वास्त। जिसमें लिखा था कि दीनानाथ को नौकरी न दी जाये। दरख्यास्त के नीचे विशेश्वर के अँगूठे के निशान थे।

एक दिन कटनी जाते वक्त महारानी एक्सप्रेस में विशेश्वर तारा को मिल गया । वह नीचे फर्श पर बैठा था। तारा को देख उसने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम कहा। मुस्कुराया और फिर दूसरी तरफ मुँह फेर लिया। तारा उससे बात करना चाहती थी। तारा ने उसे सामने की सीट पर बैठने को कहा। पर वह फर्श पर ही बैठा रहा। तारा महारानी एक्सप्रेस की खिड़की के पार देखने लगी। पहाड़, घाटियाँ, जंगलों के दृश्य धीरे -धीरे पीछे सरक रहे थे। उसने आखें बंद की । अंधेरे में उसे थर्मल पॉवर प्लाण्ट की इमारत दीखी और वह बात फिर याद आई वह जो दर्द जानती हो.......। उसने चौंककर अपनी आखें खोली। विशेश्वर उसकी ओर देख रहा था। वह मुस्कुराया। वह यथावत बनी रही।

‘तुमने कहा था कि मैं जो माँगूगी वह तुम मुझे दोगे।‘

‘हाँ दीदी। बिल्कुल। पर हम ठहरे गॅवार , फटीचर । हम क्या दे सकते हैं ?’

‘ दे सकते हो। अपने लिए नहीं किसी और के लिए चाहिए।‘

' किसी और के लिए?

' हाँ।

‘किसके लिए? कौन है वह? ‘

महारानी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म से सरक रही थी। तारा ने उसके धीरे-धीरे सरकते पहियों को देखा जो भाप छोडते पिस्टन के साथ भक्क-भक्क की आवाज करते धीरे-धीरे रेंग रहे थे। पूरी ट्रेन खाली हो गई थी। ज्यादातर लोग स्टेशन के मेन दरवाजे से बाहर निकल चुके थे, बस कुछ आदमियों और औरतों का एक झुण्ड दरवाजे के पास खड़ा था। एक बच्चा सरकती ट्रेन को देखकर हाथ हिला रहा था।

' हम दुनिया की फिकर करते हैं, पर अपने ही नहीं दीखते। अपनों से ही खीजते हैं, नहीं बाँटना चाहते अपना दुःख और अपनी खुशी अपनों के साथ ही।‘

विशेश्वर चुपचाप खडा रहा। जाने क्या कह रही है सिस्टर दीदी ?

महारानी एक्सप्रेस के दूर जाते जाने की आवाज सुनाई दे रही थी। दोपहर की खामोशी में यह एक परिचित सी आवाज़ है। इंजन की झिझकती सी भक्क-भक्क। दूर कहीं से सुनाई देकर एकदम से चुप हो जाने वाली सीटी की साप सी आवाज़। तेल और धुंएँ की बहुत परिचित सी गंध, मानो ट्रेन न हो रोटियों के लिए जलाई जाती शाम की सिगड़ी से उठती सौंधी गंध हो। दोपहर के बेनूर से सन्नाटे से गुजरती लय हो जैसे कोई, अपनी धुन में, जिसे लोग भूलवश महारानी एक्सप्रेस कह देते हों। दोपहर को उसकी आवाज़ पर घडी देख अस्पताल का चपरासी कह उठता है - आज लेट हो गई - या यही कि आज वक्त पर है - एक बेहद जरुरी बात जिसे वह कहता ही है, एक बात जिसे सुनने का कितना तो मन करता है। दोपहर को दूर से आती उसकी आवाज सुन, जंगलों में छनती धूप के रास्ते, अपनी मस्ती और फुर्सतों से सरकती, महारानी एक्सप्रेस की कोई फिल्म चलने लगती है, तारा के जेहन में।

जाने क्या कह रही है सिस्टर दीदी - विशेश्वर के मन में सवाल है।

मैं तुम्हारे भाई के बारे में बात कर रही थी। तुम्हारा छोटा भाई दीनानाथ। उसका भी घर है, परिवार है। पाँच पेट लगे हैं उसके साथ। तुम उसकी नौकरी लग जाने दो। अपनी दरख्वास्त वापस ले लो।

तारा ने सीधे-सीधे कहा। उसे घुमा-फिराकर कहना नहीं आता। वह नर्स है और सीधे-सीधे कह देती है। कभी उसे मलाल भी होता है कि उसे चिकनी-चिपुडी बातें करना नहीं आती। पर फिर लगता है कि ठीक ही है जो नहीं आता। उसकी बात सुन विशेश्वर को झट्का सा लगा। उसे तमाम ख़याल आये। पहले तो लगा कि हो सकता है दीनानाथ इससे मिल आया हो। हो सकता है दीनानाथ ने इससे कोई साँठगाँठ कर ली हो। वर्ना इसे क्या मतलब ? हो सकता है उस दिन जो मैं इस पर गुर्राया था, उसका बदला ले रही हो। राम जाने क्या है? क्यों दीनानाथ के पक्ष में है? वह आज कटनी आया था, दीनानाथ के खिलाफ थाने में रपट लिखाने । एक गवाह भी लाया था। उसे पता चला था, कि हाथ पर काटना भी अपराध है। बस उसी दिन उसने सोच लिया था कि रपट तो लिखवायेगा ही। मुखिया ने भी उसे भरोसा दिया है, कि पुलिस और वकील दोनों से बात करेगा। बस वह रपट लिखवा आये।

' मैंने उन औरतों के बारे में सुना है जो एक साड़ी खरीदती हैं और फिर उसे बीच से काट कर दो कर लेती हैं। एक हिस्सा पहरती रहती हैं और जब वह तार-तार हो जाता है तब दूसरा हिस्सा पहरने के लिए निकालती हैं। वे नदी के किनारे साड़ी उतारकर पानी में गले तक डूबकर नहाती हैं, क्योंकी जब घर में पहरने को एक ही कपड़ा हो तो कोई और उपाय कहाँ। उन लोगों को भी जानती हैं जो सल्फास खाते हैं और उन्हें भी...जो हाथों में काट देते हैं। यह दुनिया सबकी है, सबसे मिलकर बनी है।'

तारा ने कहा। विशेश्वर तारा को घूरता रहा। उसे उसकी बात का ओर-छोर समझ नहीं आया। उसने तारा को कुछ नहीं कहा। बस प्रणाम किया और चला गया। रास्ते भर वह तारा के बारे में सोचता रहा। उसने उसकी हर बात सुनी। उसके गुस्से को जब किया। उसे दवा दी। पट्टी बाँधी। जब-जब पैसे देकर उसने उसका अहसान उतारना चाहा उसने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। पता नहीं क्यों उसे अपनी माँ याद आई जो बचपन में ही गुजर गई थी। वह भी ऐसी ही थी। हर गुस्से को जज्ब कर लेने वाली। पिता उसको मारता था, वह चुपचाप सहती, पर उसने घर को संजोया, कभी हार न मानी। जब वह गुजरी तब वह उसके पास था। छोटा भाई दीनानाथ उसके किनारे कथरी में लिपटा पड़ा था।

माँ को तेज बुखार था। कहते थे कि कोई लाइलाज बीमारी थी। बीमारी जो पोखर के पानी से होती थी। बीमारी जो पण्डित के कुंये से मिलने वाले पानी से नहीं होती थी। जो उन पोखरों और तालाब के पानी में थी जिसका पानी विशेश्वर के मोहल्ले वालों के हिस्से आया था। पर यह सब पता न था। इस तरह वह बीमारी थी। बीमारी जिसका इलाज था। जो तब भी लाइलाज न थी। जो चालीस साल पहले उन दिनों भी ठीक हो जाती थी। उस बीमारी से उस गाँव में कभी कोई बड़े घर का शख्स न मरा था। पर जिसके बारे में विशेश्वर के मुहल्ले में यह खबर थी कि वह बीमारी दरअसल लाइलाज बीमारी थी। इस तरह मरने से पहले उसकी माँ को भी पता ही था कि उसे जो बीमार हुई है वह लाइलाज है।

इस तरह विशेश्वर के मुहल्ले में यह झूठी खबर थी कि यह जो बीमारी है यह लाइलाज बीमारी है और तब प्लाण्ट का अस्पताल भी न था। उनके मुहल्ले में झूठी खबर थी कि जिसे यह बीमारी हो जाये वह मारा जायेगा, जिसे यह बीमारी हो जाये उसका मरना तय है और तब तारा को उस अस्पताल में नौकरी के लिए आने में पूरे चालीस साल थे। तब तो तारा पैदा भी नहीं हुई थी। अस्पताल की जगह तब जंगल थे। तब महारानी एक्सप्रेस भी न चली थी। यहाँ प्लाण्ट लगाने का कोई ख़याल भी न था तब कहीं। इस तरह पूरे सुकून से विशेश्वर के मुहल्ले में यह झूठी खबर फैल सकती थी, सो वह फैलती रही थी। तारा को आने में पूरे चालीस साल थे और झूठी खबर को झूठी कहने का कहीं कोई ख़याल भी न था। विशेश्वर के मोहल्ले की इस झूठी खबर में सुकून का जहर था और मौत में नियती का बोलबाला। इस तरह न तो पोखर का पानी अपवित्र था और न ही गाँव के पण्डित के कुँये का कानून। मुहल्ले को अपनी गिरफ्त में ले चुकी इस झूठी खबर के खण्डन होने में अभी चालीस सालों का समय था। कि जिस बीमारी से विशेश्वर की माँ मरी थी वह लाइलाज न थी। कि जो खबर थी वह झूठ थी। इस तरह एक बेशर्म झूठी खबर का मोहल्ले में बरसों से बोलबाला था और इस तरह विशेश्वर की माँ मर रही थी।

माँ ने मरते समय उससे कहा था, कि वह सबसे बड़ा है। कि सबसे छोटे का ख्याल उसे ही रखना है। तब उसे मरने का ठीक-ठीक मतलब पता नहीं था। जब माँ को जलाने ले गये तब उसने दीनानाथ को अपनी गोदी में सुला लिया था। उसे बड़े होने का भी ठीक-ठीक मतलब पता नहीं था। वह उस रात खूब रोया था। बाद में एक दिन उसे माँ की कई सारी बातें याद आई। यह वह दिन था जिस दिन तारा ने उसे बताया था कि उसकी माँ जिस बीमारी से मरी थी उसका इलाज हो सकता था। वह बच सकती थी। उन पुराने दिनों में भी उसका इलाज हो सकता था। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी माँ चालीस साल पहले इस बीमारी के कारण बीमार पड़ी थी, इलाज तब भी था ही। बात बस इतनी सी है, बस इतनी सी कि उसे पीने को साफ पानी नहीं मिल पाता रहा होगा - तारा ने उसे कहा था - काश कोई किसी को साफ पानी से भी महरुम न करता, कम से कम पीने लायक पानी से तो उसे मरहूम न करता - उसने खुद में मगन होते हुए कहा था। फिर उसने वही बात कही थी जो उसने उससे आज महारानी एक्सप्रेस में कही - हम अपनों से ही खीजते हैं, नहीं बाँटना चाहते अपना दुःख और अपनी खुशी अपनों के साथ ही, है न ।

माँ को याद करते उसे लगा कि काश चालीस साल पहले इस प्लाण्ट की यहाँ शुरुआत होती। काश यह अस्पताल होता। काश महारानी एक्सप्रेस होती और लोग आते-जाते। काश उन दिनों भी तारा जैसी कोई सिस्टर दीदी होती. तो क्या पता माँ आज भी जिंदा होती। आज उसे तारा कि कहीं दो बातें याद आती रहीं पहली उस दिन की वह बात कि काश कोई किसी को साफ पानी से भी मरहूम न करता और एक आज की कि हम अपनों से ही तो खोजते हैं, नहीं बाँटना चाहते अपना दुःख और अपनी खुशी अपनों के साथ ही, है न...’।

कुछ दिनों बाद एच.आर. वाले अधिकारी ने ही तारा को बताया था कि उस हाथ काटने वाले आदमी को नौकरी मिल गई है। उसके बड़े भाई ने अपनी दरख्यास्त वापस ले ली थी। उसे बहुत कुछ याद आया। कितने भी कष्ट हों अंत में हम ही जीतेंगे हर बार। हर बार जीतेगा प्यार। हर बार हारेगा दर्द ही। उसने सोचा। फिर लगा पता नहीं वह क्या-क्या सोचती रहती है? कोई इस तरह से भी सोचता है भला? हुँह। फिर उसने अपनी माँ को सारा वाकया बताया। माँ ने उसे फिर से कहा कि उसे ऐसे मामलों से दूर ही रहना चाहिए। पर उसे लगता रहता है कि वह ऐसे मामलों में पड़ती ही रहेगी।

महारानी एक्सप्रेस अब नहीं चलती। जगह मिल जाये तो लोग अब ट्रेन के फर्श पर नहीं बैठते। प्लाण्ट का अस्पताल अब इस इलाके की जीवनधारा की तरह है। हजारों लोगों को काम मिला। चीजें बदलीं । तारा यहीं रह गई। उसे कहीं नहीं जाना था।

तरुण भटनागर
+91 94251 91559


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1 comment:

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