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राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान 2019 : अनिल यादव की कहानी "गौसेवक "

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धामा अपने गुस्से को छिपाकर अचानक संयत हो गया. उसने कपट की अधिकता से हल्की हो गई आवाज में कहा, "देख रहे हैं सर...आप भी देखते जाइए. याद करिएगा...

राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान 2019 : अनिल यादव की कहानी "गौसेवक " 

इस कहानी को २०१९ का हंस कथा सम्मान दिए जाते समय जो बातें कहानी और कहानीकार के विषय में कही हैं उन्हें याद करते हुए, मैं कहना चाहूँगा कि कहानी जिस तरह आपके उसे पढ़ते समय आपकी मनोदशा, ज़ेहन को नियंत्रण में लेती है, जिस तरह कहानी में आपको गुमा कर अनिल यादव आपको आपकी सोच के चाँद की कलाओं के जिस रोलर कास्टर, जिस बड़े वाले झूले पर बैठाते हैं वहाँ आप उन सभी भावों से गुज़रते हैं जिनसे आप इसके पहले तब दो चार हुए थे, जब आप झूले में बैठे थे। कहानी अख़बार, टीवी, वर्तमान, सच और झूठ का सत्त निकालकर आपके हाथों में रख देती है, इसलिए यह गुज़ारिश है कि तनिक पूर्वाग्रहों और मोबाइल को साइड करने और साहित्य को सम्मान देने के लिए वक़्त निकालिए तब पढ़िएगा… 

भरत एस तिवारी

    फ़ोटो: भरत एस तिवारी

गौसेवक / अनिल यादव

नोट गिनने और गड्डियां बनाकर सहेजने से परेशान होकर, धामा चेरो की अनपढ़ मां ने एक बार कहा था, ”तुमको गौहत्या का पाप लगेगा."

कैमूर की पहाड़ियों में उनकी मुलाकात सरपत की झाड़ियों के बीच एक संकरे, कच्चे रास्ते पर हुई जो अंततः दुनिया के सभी रास्तों से जा मिलता था. उसने मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तभी जानवरों के खुर बजने लगे. उसने कहा, 'एक मिनट रुकिए, गौवंश आ रहा है' और नमस्कार करने लिए झुक गया.

दोनों के बीच ठठरी गाय और बैल सतर्कता से पीठें ताने, आक्रामक सांसे छोड़ते हुए एक-एक कर गुजर रहे थे. हवा व्याकुल हुई, वातावरण में काफी तनाव भर गया. उसके गले से लटकता लंबा गेरुआ गमछा धूल में लिथड़ रहा था. वह नए परिचय की मुस्कान संभाले हुए कत्थई गॉगल के पीछे उभरी मटमैली आंख से लगातार उसे देखे जा रहा था. बड़े जानवरों के बाद जब रास्ते के किनारे की छोटी झाड़ियों की पत्तियां नोचतीं, झुंड से छिटकी बकरियां गुजरने लगीं तब वह सीधा हो गया. सबसे पीछे गोद में बच्चा लिए एक लड़की थी जिसके बाल धूप के रंग की बान की रस्सी के एक टुकड़े से बंधे हुए थे.

वह विरोधाभासों के बीच रहने का इतना आदी हो चला था कि उसका ध्यान चारो ओर फैली सघन हरियाली के बीच जानवरों के उपेक्षित होने की ओर नहीं गया. अगर वह अखबार के रिपोर्टर के बजाय एक किसान या चरवाहा होता तो यह जरूर सोचता कि अच्छी बरसात के बाद हर तरफ फैले चारे के बीच भी ये जानवर सूखे हुए क्यों हैं.
हाईवे के थानों में थानेदारों की पोस्टिंग के लिए काफी मोटी रकम की बोली लगती थी. कोई थानेदार इस चौड़ी सड़क पर कुछ दिन भी टिका रह जाए तो वह धन और राजनीतिक संपर्कों के मामले में आधुनिक राजा हो जाता था.
काफी बड़ा झुंड था जिसमें से कुछ गायों ने सींगे हिलाकर दूर रहने की चेतावनी दी लेकिन वह हाथ जोड़े झुका रहा. यह उसका रोज का काम था. अंततः दो बकरे बचे जो उसके गिर्द सिर तान कर उछलते हुए हवा में इठला रहे थे. उसने फुर्सत पाकर कहा, "हम यहां के ग्राम प्रधान हुए. हमारा नाम धर्मराज चेरो है, लोग गौसेवक भी कहते हैं. एमएलए का चुनाव लड़ चुके हैं."


एक बदहवास औरत भागती हुई आई. वह पैरों में गिलट की पायल पहने हुए थी जो लगातार बजे जा रही थी. उसने लड़की की गोद से बच्चे को छीन लिया और जमीन पर लिटाकर उसका मुंह खोलकर देखने लगी. बच्चा डरकर रोने लगा तो उसने उसे वहीं लिटा दिया और झपट कर लडकी को थप्पड़ से मारने लगी, "रंडी, उसको दिन-रात कोरां में कसे रहती है. पहले नहीं बताना चाहिए था!"

बच्चे का पहला दांत ऊपर के जबड़े में आया था जो भारी अपशकुन था. अब उसको बचपन में ही मर जाना था.

लड़की बच्चे को छोड़कर, ऐंठे हुए कंधे से अपना एक कान दबाए जानवरों के पीछे चली गई. धर्मराज ने गमछे को उछाल कर गरदन में लपेटते हुए कहा, "चलिए आपको डैम दिखाकर लाते हैं."

रिपोर्टर अब नाममात्र के आदिवासी रह गए इस इलाके की सबसे बड़ी नदी पर आधी शताब्दी से बन रहे बांध पर स्टोरी करने काफी दूर के शहर से आया था, लगे हाथ नक्सलियों पर भी जानकारी बटोरनी थी ताकि अगली वारदात हो तो उसका इस्तेमाल किया जा सके. तीन साल पहले, नक्सलियों ने नदी के उस पार बारूदी सुरंग से पुलिस का एक ट्रक उड़ा दिया था, तेरह जवान मारे गये थे, उसे बहुत अफसोस हुआ था क्योंकि अपनी उपयोगिता साबित करने के लिये तब उसके पास नया कुछ नहीं था.

बांध बड़े जतन से सिंचाई विभाग और पुल बनाने वाले मंत्रालय की फाइलों में नौकरशाह धीरे-धीरे बना रहे थे लेकिन नदी किनारे के गांवों में समय इतना अलसाया नहीं रहता था. चुनाव करीब आने पर विपक्षी राजनीतिक पार्टियां शोर मचाने लगतीं तब बड़े अफसरों के दौरे होते, कुछ पुराने ठेकेदार बरसात में बह गयी मिट्टी को ट्रकों से वापस लाकर पुरानी जगहों पर डालने लगते. हाइड्रोलिक सिस्टम वाली जेसीबी मशीनों की घरघराहट और आदिवासियों के ब्लड प्रेशर के बीच सीधा संबंध था. काम शुरू होते ही वाजिब मुआवजे की मांग के लिये प्रदर्शन और करीब से गुजरने वाले हाईवे पर चक्का जाम शुरू हो जाता. जेसीबी के ड्राइवरों और कंस्ट्रक्शन कंपनी के चौकीदारों को मारपीट कर भगा दिया जाता था.
लड़कों के शराब से दीप्त चेहरों पर विनम्र सलोनापन था. वे जिज्ञासा, सौजन्य और प्रेम से इतने भरे थे कि उनके साथ चुहल करने का मन करता था. वे शर्मा रहे थे जैसे उनके कड़ियल बाप ने पहली बार किसी अजनबी के सामने उनके होनहार होने की चुगली कर दी हो. विकास जो गाड़ी चला कर लाया था, बंदूक गोद में रखकर झेंपते हुए घास नोंच रहा था. उस समय वे इतने सलज्ज थे कि उनके गुंडे होने से ज्यादा अभागे होने का विचार विचलित कर सकता था.

पचास साल पहले जब उनके खेत बांध बनाने के लिये, सरकार ने लिये थे तब रेट बहुत कम था. अफसरों ने आम, महुआ और सागौन के पेड़ों का दाम छह रुपया प्रति पेड़ लगया था. बीच में इतना समय बीता कि आदिवासी किसान दोबारा अपने खेत जोतने लगे और अब जमीन के काफी बढ़े हुए दाम के हिसाब से मुआवज़ा लिये बिना हटने को तैयार नहीं थे. अफसरों ने लंबी जांच-पड़ताल के बाद नतीजा निकाला था कि इस बीच के समस्याग्रस्त समय में प्रोजेक्ट की लागत काफी ज्यादा बढ़ चुकी है लिहाज़ा आदिवासियों को नयी दरों से मुआवज़ा देने का आर्थिक बोझ सरकार नहीं उठा सकती. किसानों को मालूम था कि जमींन सरकारी हो चुकी है लेकिन उसका दाम जितना चढ़ रहा था वह उतनी ही ज्यादा अपनी लग रही थी.


एक हफ्ता पहले पुलिस ने बांध की साइट पर प्रदर्शन कर रही भीड़ पर गोली चलायी थी जिसमें एक आदिवासी की मौत हो गयी थी. दूर के कस्बों और शहरों में गोलीकांड से अधिक इस बात की चर्चा थी कि उस आदमी के मरने के बाद से नदी के पानी का रंग बदल कर लाल हो गया और अधिगृहीत की गयी जमीनों पर खड़े सभी आम के पेड़ एक हफ्ते में सूख कर ठूंठ हो गये हैं. रिपोर्टर को नदी के कोप और पेड़ों की दुख की सच्चाई का पता लगाने भेजा गया था. उसने संजोग लगती मुलाकात की योजना पर गौर किया और मृत्यु के बाद वाली जगहों पर अक्सर गुमराह किए जाने के पुराने अनुभवों से पैदा हुए संदेह से धर्मराज चेरो को देखते हुए कहा, "आप तकलीफ न करें, मैं खुद चला जाऊंगा."

धर्मराज चेरो ने रास्ता काटते हुए उसके करीब आकर हाथ जोड़े, " सर, आप हमारे मेहमान हैं. आपको एक-एक चीज़ दिखाएंगे. सब कागज हमारे पास हैं. बांध तो हमारे बाप-दादों के समय से बन रहा है और नाती-पोतों के समय तक बनता रहेगा."

" नदी के पानी का रंग सच में बदल गया है?"

" इसी का बाप मरा है सर, उसके परिवार को खबर कर दी है, आप से मिलवायेंगे तब असली कहानी जानियेगा", उसने बच्चे की तरफ इशारा किया जो धूल में लेटा हुआ, हथेलियों से आंखें ढके सुबक रहा था.

उसने सरपत की फूलों से लचकती झाड़ियों के पीछे छिपी एक सफेद रंग की एमयूवी की ओर बढ़ते हुए कहा "आइये बैठिये, आप ही के अखबार में पढ़ा था, इसका शरीर जीप का है लेकिन आत्मा कार की है".

गाड़ी के बोनट पर गाय के मूत्र में सोना होने का दावा करने वाली एक हिंदू पार्टी का वेलवेट से बना हुआ गदराया झंडा लगा था और बंपर के ऊपर पीतल के अक्षरों में उसके पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य होने का गंभीर ऐलान करती चौड़ी नेमप्लेट थी. रास्ते पर धूल उड़ रही थी लेकिन दूर तक फैले धान के खेतों में नमी थी जहां बगुले घात लगाये बैठे थे. हवा बंद थी. चढ़ती धूप में खेतों के ऊपर उठती अदृश्य भाप से हल्की घुटन महसूस हो रही थी. धामा चेरो ने गाड़ी के शीशे चढ़ा कर एसी चला दिया, भगवा गमछे से चमकती सीट को साफ करते हुए कहा " कैसा गाना सुनियेगा, देशी या विदेशी?"

"सीट तो साफ है फिर काहे...?", रिपोर्टर ने छलकते आतिथ्य के असर को काटने के लिए उसके गॉगल में झांक कर हंसते हुए कहा.

वह हल्का सा झेंपा, "गाड़ी-घोड़ा का भी अपना नखरा होता है न सर!"

कीमती परफ्यूम की महक नाक में गयी तो उसने ज़रा हैरानी से धामा चेरो को गाड़ी चलाते हुए देखा. उसके गदबदे हाथों की मोटी उंगलियों में आठ अंगूठियां थीं, पान के दाग वाले सिल्क के कुर्ते के बटन से सोने की मोटी चेन उलझी हुई थी, मांसल कानों में सोना था. घने, सख्त बालों से ढका सिर और पेट शरीर के अनुपात में काफी बड़े थे जिससे वह आधिक उम्र का लग रहा था लेकिन उसकी आबनूसी त्वचा की चमक चुगली कर रही थी कि वह हद से हद तीस-बत्तीस साल का होगा. लगभग उसी की उम्र का. मोटे कत्थई होठों के ऊपर औसत से तीन गुना ज्यादा हवा खींचने वाली नाक थी जो गालों की चौड़ी हड्डियों समेत गॉगल से ढकी हुई थी. गाड़ी की पिछली सीट पर एक पुरानी दुनाली बंदूक पड़ी हुई थी. इस व्यक्तित्व के आस-पास की क्या चीज़ हो सकती है! उसे शहर के ट्रैफिक में हफ्ते के आखिरी दिन दिखने वाले सरसों के चिकने तेल में डूबे लोहे के शनीचर की आकृति का ख्याल आया जिस पर टन्न की आवाज़ के साथ सिक्के गिरते थे.

गाड़ी एक छोटे से बाज़ार में पहुंची तो ड्राइविंग सीट पर एक सलोना सा लड़का आ गया. धामा पीछे चला गया जहां तीन लड़के एक बड़ा बोरा लाद रहे थे. एक लड़के ने धर्मभीरू किस्म के कारीगर की प्रार्थना के भाव से बंदूक को तीन बार छूकर कंधे से लटका लिया. उसने बोरे में से एक ठंडी बोतल निकाल कर देते हुए कहा, "सर, पानी पीते रहिये, घाम बहुत है."

बाजार में आदमियों और साइकिलों को छोड़ कर हर चीज़ गरीबी के सबसे करीबी रिश्तेदार, प्लास्टिक की बनी थी. अंधेरी कोठरियों में छिपी, गलती ईंटों वाली दुकानों के आगे चप्पलें, साड़ियां, बच्चों के कपड़े, चटाइयां, चोलियां, रिबन लटक रहे थे जिनके नीचे कनस्तरों मे रखे खली, चोकर, दालें, गुड़, तंबाकू, नमक के ढेले भी अक्तूबर की चटक धूप में प्लास्टिक के बने लग रहे थे. हलवाईयों के यहां मिठाईयों की जगह रंगीन पत्थर रखे थे जिन पर हड्डे और मक्खियां, मोबाइल में गाने भरने वाले खोखों से उठते फूहड़ भोजपुरी गानों की धमाकेदार धुनों पर थिरक रहे थे. ग्राहकों की आंखों में ठग लिए जाने से पहले की सनसनी महसूस की जा सकती थी.

सड़क के बीच में एक गड्ढा था जिस में कत्थे के रंग के कीचड़ में एक अलसाया भैंसा आराम कर रहा था. आदिवासी उससे बचते हुए कंधे पर बांस की बंहगियों में बंधे प्लास्टिक के कंटेनरों से दुकानों में पानी पहुंचा रहे थे. एक अधनंगा लड़का टिटकारी मारते हुए आया और उसने चाय की पत्ती से भरा कनस्तर सड़क पर खाली कर दिया. भैंसे ने अपनी अधमुंदी आंखें खोलीं, एक लंबी सांस छोड़कर उठा और खाने लगा. ड्राइवर ने कहा " सर, रोज यह नशेड़ी रोड जाम करता है, जब तक चायपत्ती न मिल जाये यहां से हिलता नहीं."

***

नदी से दो किलोमीटर के दायरे में खंडहर हो चुकी इमारतें थीं. जंगल के बीच, बहुत पहले हुए किसी युद्ध के अवशेष की तरह वर्कशॉप, वॉच टॉवर, स्टोर, दफ्तर और कालोनियां फैले हुए थे. नदी की धार में तीन अधबने पिलर थे जो पानी पर छाई हल्की धुंध में मछली पकड़ने के लिये खड़े ध्यानमग्न मछुआरों की तरह लग रहे थे. अधबने बंधे पर ताज़ा मिट्टी डाली गयी थी.

कुछ दूर पर आम के ठूंठ पेड़ों के बीच पुटुस की झाड़ियों से घिरा शहीद स्मारक था जहां एक कतार में लाल कपड़ों से ढके, घुटनों जितने ऊंचे, ईंटों के सात चबूतरे थे. हर एक पर चिकने पत्थर की एक पट्टी लगी हुई थी और कनेर के कुम्हलाए फूल पड़े थे. घास में धंसे अगरबत्ती के अधजले ठूंठों से उदास गंध उठ रही थी. पिछले तीस साल में छह आदमी पुलिस की गोली से मारे गये थे और एक औरत की मौत कलक्टर के दफ्तर के सामने आमरण अनशन के दौरान हुई थी. रिपोर्टर ने ऊब के साथ पाया कि जब तक सरकार शहीद न मान ले स्मारक मृतकों के जीवन जितने ही साधारण और क्षणभंगुर होते हैं. उसने सबसे नये चबूतरे को छूते हुए कहा, " लेकिन नदी का पानी तो वैसा ही है!"

धामा चेरो ने उसे ऐसे देखा जैसे वह कोई बच्चा हो, "हमेशा थोड़े रहता है. पानी में आत्मा है जो रूप बदलता है, जुलाई में शहीद दिवस के दिन आकर देखियेगा, पूरे पंद्रह दिन लालमलाल रहता है."

गाड़ी चलाने वाले लड़के विकास ने दो ईंटे लाकर धामा चेरो के दिखाते हुए सबसे नयी वेदी की बगल में पटकीं. वह हंसते हुए और ईंटे लाने के लिए बंधे की ओर जाने लगा जैसे आठवीं वेदी बनाने जा रहा हो.

"तुम्हारा फिर दिमाग खराब होने लगा", धामा ने हैरानी से कहा.

"काहे!", उसने बातों से खेले जाने वाले खेल में जीतने की तत्परता से कमर पर हाथ रखते हुए पूछा.

"ग्रामसभा की मीटिंग में प्रस्ताव पास होगा तब न होगा कि तुम्हारे ईंटा रखने से कोई शहीद हो जाएगा."

वह कुछ देर असमंजस में खड़ा रहा फिर सिर झुकाकर वापस लौट आया.

बंधे पर पड़ी नई मिट्टी के ढूहों के बीच से लटियाये, लंबे बालों वाला एक आदमी कंधे पर रेडियो रखे प्रकट हुआ. उसकी एक आंख में माड़ा था, गर्दन में एक घिसी हुई कंठी के ऊपर कई तरह की मालायें पड़ी थीं और हड़ीले बदन पर कपड़े के नाम पर एक गमछा था. उसके कान के पास बैटरियां दिखाई दे रही थीं जिन्हे रबड़ के छल्ले लगाकर गिरने से रोका गया था. रेडियो से लगातार एक व्यर्थ की खरखराहट उठ रही थी जिसके भीतर घुटी हुई बेशुमार आवाज़ें छिपी थीं. इस खरखराहट का जो अर्थ था वही उसके जीवन का भी था. वह जीवन के बेचैन संगीत से वंचित होकर कहीं मर न जाए शायद इसीलिए हमेशा रेडियो साथ लिये रहता था. कंधे पर बंदूक टांगे लड़के ने आगे बढ़कर चहकते हुए कहा,"जब कुछ सुनाई नहीं पड़ता तो क्यों बैटरी जलाते रहते हो?"

वह उसे खराब आंख से देखते हुए धामा चेरो के सामने जाकर खड़ा हो गया, "अरे, कुछ हमारी भी खेती-पाती होगी कि हमारे बाल-बच्चे मर जायें?"

उपहास से धामा का चेहरा चमक उठा, "खेती दो तरह की होती है, एक बाजा वाली और एक टीवी वाली! आप किस विधि से करेंगे? "

लड़के हंसने लगे.

वह उनकी ओर घूमा,"तीन साल से दौड़ रहे हैं, एक जवान बैल मिल जाता तो किसी के साझे में जोत लेते. मेरी हैसियत तुम लोगों की तरह प्रधान का ट्रैक्टर चलवाने की तो है नहीं."

यह आदमी बैगा था जो झाड़-फूंक करता था. आजकल एक प्राइमरी स्कूल में रह रहा था जहां बच्चों को पचरा गाना, नज़र उतारना, बलि देना, भूत हांकना और बान मारना सिखाता था. लोकतंत्र के कई संजोगों के कारण उस स्कूल की सरकारी इमारत में वाचिक परंपरा से लोकविद्या का पुराना पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा था. इसी काम से उसका गुजारा होता था.


नक्सली एरिया होने के कारण कोई टीचर यहां आने को तैयार नहीं होता था लिहाजा अधिकांश स्कूल बंद पड़े थे. नक्सली चाहते थे स्कूल चलें लेकिन इस जंगली इलाके में उनकी उपस्थिति ऐसा बहाना थी जिस पर शिक्षा विभाग में ऊपर से नीचे तक सहमति थी कि यहां के बच्चों को शिक्षा नहीं दी जानी चाहिये. पांच साल पहले कुछ अध्यापकों ने अपनी तनख्वाह का एक छोटा हिस्सा देकर लोकल लड़के-लड़कियों को तैनात किया था जिनका काम रजिस्टर भरना और बच्चों को दिन भर स्कूल में बिठाये रखना था लेकिन यह व्यवस्था चल नहीं पायी क्योंकि जल्दी ही किसान उन स्कूलों के क्लास रूमों में बरसात के दिनों में अनाज-भूसा रखने और जाड़े में जानवर बांधने लगे. जिस बहाने से अध्यापक यहां नहीं आते थे उसी बिना पर जांच-पड़ताल करने वाले अफसर भी इधर का रुख नहीं करते थे. बिरले होली-दीवाली के अंतराल पर कोई प्रिंसिपल हवाखोरी करते हुए इधर आ निकलता था. वह आदिवासियों की महुआ-मुर्गा खातिरदारी से अभिभूत होकर कहता, उसे अफसोस है कि विपरीत परिस्थितियों के कारण वह उनके बच्चों को नहीं पढ़ा पा रहा है लेकिन भगवान चाहेगा तो उनके बच्चों के बच्चे जरूर शिक्षा का वरदान पायेंगे.

धामा चेरो के बाप और इस बैगा ने एक ही अखाड़े में झाड़-फूंक करना सीखा था. दोनों पट्टीदार थे. उसने बैगा को थाने से दो बैल दिलाये थे जिन्हें उसने बेच दिया जैसा कि बहुत से लोग किया करते थे. धामा के पास बैलों की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह तीन साल पहले कुछ पैसों के लालच में प्रधानी के चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार के साथ हो गया था तब से उसकी खेती-बारी ठप थी. इससे भी बड़ी समस्या यह थी कि उसे महुआ, ताड़ी, गांजा किसी भी मादक चीज से नशा होना बंद हो गया था. उसने कई बैगाओं से सलाह की जिनका कहना था कि वह अनजाने में सिद्धपुरुख हो गया होगा जिससे ऐसा होने लगा होगा लेकिन खुद उसका मानना था कि धामा से लगातार डरते रहने के कारण उसका मन अपने से ही नाराज रहने लगा है. खुद को धिक्कारते मन पर नशे का असर न होने के कारण उसका समय बहुत धीमे और मुश्किल से बीतता था.

धामा चेरो ने गमछे से अपना गॉगल साफ कर गालों की चौड़ी हड्डियों पर जमाते हुए कहा, "आप के परिवार का वोट सोने का है, हमको मिलेगा नहीं. आपका लड़का हीरा है, मोटरसाईकिल से उतर कर पैदल चलेगा नहीं. आप खुद पारस पत्थर हैं, गांव के किसी काम में आएंगे नहीं. मुआवज़े के लिये इतना बड़ा आंदोलन चल रहा है और आपको बाजा से ही फुरसत नहीं...यहां से अभी हटिये, देख रहे हैं, बाहर से ये बहुत बड़े पत्रकार आये हैं, अभी हम इनकी सेवा में लगे हैं."

वह जिस इत्मीनान से गर्दन हिलाते हुए सुन रहा था, ज़ाहिर था कि उन दोनों के बीच अक्सर ऐसी बातचीत होती रहती है. बैगा कुछ देर कौए की तरह धामा और लड़कों को सिर घुमा कर बारी बारी से देखता रहा, अचानक सबसे पुरानी वेदी पर अपना रेडियो फेंक कर तेज़ी से वापस चला गया.

इस अनहोनी से सभी चुप हो गये. सन्नाटे का वजन महसूस होने लगा. बैगा ने जिंदगी में पहली बार अपना रेडियो फेंक दिया था जिससे वह दिन-रात चिपका रहता था. इस आदमी ने अपने बच्चों को भी रेडियो जितने दिनों तक गोद में नहीं उठाया था. वह जैसे धनुष की तरह लचकता हुआ गया था, कहना मुश्किल था कि उसने वेदी पर चढ़ावा चढ़ाया है या कोई निर्णायक कदम उठाने जा रहा है. अचानक रेडियो बजने लगा. आर्केस्ट्रा के सभी वाद्ययंत्रों की स्पष्ट आवाज़ के साथ गाना बज रहा था- दिल तो है दिल, दिल का ऐतबार क्या कीजै, आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजै.

सभी की आंखें हैरत से फैल गयीं लेकिन कोई चाहकर भी हंस नहीं पाया. एक लड़का रेडियो की तरफ बढ़ा तो धामा ने रोकते हुए कहा, " इतनी बड़ी बात हो गयी, अब समझ ही जाएंगे या तो हमेशा के लिये बिगड़ जाएंगे".

***

आदमी हो या चीजें अगर बहुत दिनों तक लगातार उपेक्षित होती रहें तो अंतत: एक जिद्दी किस्म का सौंदर्य पा जाती हैं. उन्हे देखने में पुरानी आंखें काम नहीं आतीं. उन्हें उनकी शर्तों पर ही समझा जा सकता है.

डैम की साइट ध्वस्त और उजाड़ होने का सदमा कब का भूल चुकी थी. कॉलोनी के घरों के सुरक्षित घेरे में छतों से बहुत ऊंचे पेड़ ढलती धूप में नहा रहे थे, अब बिना दीवार तोड़े उन्हें काटा नहीं जा सकता था. जो खिड़कियां-दरवाजे गल गए या लोग उखाड़ ले गये थे, उनकी खाली जगहों में कास के सफेद और पुटुस के लालपीले फूल ठसाठस भरे हुए थे. लताओं से ढके बिजली के खंभे पेड़ों की नकल करने वाले बहुरूपिये बन गए थे. फर्न और काई के कालीनों से सजे दफ्तरों में रहने वाले गीदड़, लोमड़ियां, साही और लकड़बग्घे इलाके के वन्य जीवन का प्रशासन चला रहे थे. अब खरगोशों, छिपकलियों, तितलियों, टिटहरियों और तोतों के पास अपनी छत थी जिनमें उनके कुनबे बेफिक्री से फल-फूल रहे थे. दिन में इस आबादी की निगरानी का काम लंगूरों और चीलों के जिम्मे था जो वाच टॉवरों में आ बसे थे. रात में ड्यूटी बदलती थी उनकी जगह इस इलाके के मशहूर सीगों वाले उल्लू आ जाते थे. वर्कश़ॉप में हाथीडुबान सरपत थी. स्टोर में लाखों चमगादड़ बसे हुए थे. झाड़ियों के बीच, जंग खाते डंपर और क्रशर में मोर अंडे देते थे. हवा चलती थी तो कोई एक दिशा जितना बड़ा मुंह फाड़कर भोजपुरी में ढिठाई से फुसफुसाता था- 'भयल बियाह मोर करबे का!'

पिचके टायरों और चिटके शीशों वाले ट्रकों, लारियों के कई केबिनों के दरवाजों पर शरारती लड़कों ने किसी नुकीली चीज से खरोंच कर 'सुहाग कक्ष' लिख दिया था. घास के अंदर खाली बोतलें, शीशे के टुकड़े, ताश के पत्ते और सुहाग दिवस मनाने के तमाम ध्वस्त उपकरण फैले हुए थे. रिपोर्टर को ऐसी जगहें बहुत पसंद थीं. उसे वहां अपनापन लगा.

वे एक ऊंचे टीले पर बैठे जहां से शाम के सूरज का नदी में फेंका सोना झिलमिलाता दिख रहा था. लड़के गाड़ी से बोरा निकाल कर ले आये जिसमें जंगल में मंगल का इंतजाम था. रोस्टेड चिकन, पकौड़ी-नमकीन-मठरी और दही-बड़े की प्लेटों तक तो ठीक था लेकिन जब थर्माकोल के गिलासों में व्हिस्की ढाली जाने लगी, उसने अचकचा कर कहा, "मुझे काम करना है, मैं ये सब करने नहीं आया हूं."

"ये रमन-चमन की जगह है सर! आप मेहमान हैं. आपका एक-एक काम पूरा होगा, मैं गारंटी लेता हूं", धामा ने आदरसूचक मुद्रा में कोहनी के नीचे हथेली लगा कर गिलास बढ़ाते हुए कहा.

वह खतरनाक लगते इस विनम्र आदमी के करीब जाने या पहले जितनी दूरी पर बने रहने के असमंजस में काफी देर बैठा रहा. लड़के बेकली दबाये इंतजार करते रहे. उसके पहला घूंट लेते ही सबने अपने गिलास एक सांस में खत्म कर दिये. उनकी लंबी, कड़वी, नशीली सांसों से उठी भाप से दिशायें गझिन और धुंधली होने लगीं.

धामा ने गाड़ी से डैम वाला बैग मंगा कर, कागज निकाल कर घास पर फैला दिए. रिपोर्टर ने गौर किया, कहीं दूर से ट्रकों की लयबद्ध आवाज आ रही थी. वह जैसे एक ट्रक गुजरने के साथ एक दस्तावेज उठा कर दिखाता जा रहा था. उसके हाथ और ट्रकों के बीच कोई संबंध जरूर था. आधी शताब्दी पहले जारी हुई बांध निर्माण की अधिसूचना, ठेकेदारों के बजाय सरकार द्वारा निर्माण खुद कराये जाने का विधानसभा में पारित संकल्प, नदी साझा करने वाले दो पड़ोसी राज्यों में चला विवाद और समझौता, आदिवासियों के मौलिक अधिकारों और विकास की जरूरत को लेकर चली बहस, मुआवजे की दर को लेकर चली बेहद लंबी मुकदमेबाजी के फैसले, अब तक हुए गोलीकांडों की जांच रिपोर्टें, लड़खड़ाते अक्षरों वाले रोटरी प्रेस पर छपे पुराने अखबारों की कतरनें, ताजा गोलीकांड के बाद चमकदार पत्रिकाओं में जड़े इलाके के सांसद, विधायकों और आदिवासी पंचायतों के प्रमुखों के बयान और मोबाइल फोनों में ठुंसे वीडियो सब उसके सामने थे. उसने दुर्लभ तत्परता से सबकुछ सहेज कर रखा था.


रिपोर्टर को अब कुछ नहीं करना था. लौटते हुए कलक्टर और जिले के पुलिस कप्तान से मिलकर या फोन पर बयान लेने की एक रस्म पूरी करनी थी फिर वह चाहे जैसी रिपोर्ट बना सकता था. वह चाहे तो अपने अखबार में लिख सकता था कि सरकार आदिवासियों की जरूरत, संस्कृति और जीवनशैली को नहीं समझती, उन्हें पश्चिम की नकल वाले विकास के पीछे घसीट कर बर्बाद किया जा रहा है. वह लिख सकता था कि आदिवासी सिर्फ मोहरे हैं और बांध अफसरों-नेताओं-ठेकेदारों की कमाई का सनातन जरिया हैं, वे हर पंचवर्षीय योजना में नियम से सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को हाथ से नहीं जाने देने चाहते. वह लिख सकता था अगर वर्तमान बाजार दर के हिसाब से भी मुआवजा मिले तो जितना पैसा आदिवासी किसानों को मिलेगा उससे कहीं बहुत अधिक धामा चेरो जैसे दलाल मुकदमा लड़ने, आंदोलन करने और नतीजे में भ्रष्ट अफसरों को ब्लैकमेल करके कमा चुके हैं. बांध भले न बने लेकिन उसके अदृश्य पानी की लहरें गिन कर आमदनी करने में दक्ष एक तबका जंगल में पैदा हो चुका है. वह लिख सकता था कि पचास साल में आदिवासियों को मूर्ख और लालची अर्धमानवों के समूह में बदलने की परियोजना पूरी हो चुकी है. तीर-धनुष का इस्तेमाल अब शिकार के लिये नहीं फोटो खिंचाने के लिये किया जाता है और उन्हे दलालों द्वारा शराब पिला कर पुलिस की बंदूकों के सामने ला खड़ा किया जाता है. उन्हे ज्यादा मुआवज़ा मिल भी गया तो वे बसेंगे नहीं बल्कि शहरातियों की नकल में लंबी गाड़ियों में घूमते, शराब पीते, जुआ खेलते हुए जेट स्पीड की तेजी से बर्बाद होंगे. वह लिख सकता था कि बांध बन भी जाये तो कुछ नहीं होगा क्योंकि खेती अलाभकारी काम है, किसान अनाज बेच कर लागत भी नहीं निकाल पाता. यह पुल बसों से सवारी और ट्रकों से सामान ढोने के अलावा औऱ किसी काम नहीं आएगा. अंतत: इसी पुल के रास्ते आदिवासियों को विस्थापित होकर किसी शहर की झुग्गी-बस्ती में जा गिरना है.

वह तथ्यों और सूचनाओं की अधिकता से चकरा कर अपनी स्मृति के कबाड़ में खोई कोई ऐसी तस्वीर खोजने लगा जिसमें यह सब यथास्थान फिट होकर एक सादे शाश्वत सत्य की तरह दिखाई देने लगे. 

उसके सामने कम से कम एक महीना चलने वाली एक स्टोरी सीरीज का मसाला बिखरा पड़ा था, तभी उसका ध्यान ढलती शाम की रोशनी में व्हिस्की के मनोहर रंग पर गया. उसने सोचा, लेकिन मैं तो यहां नदी के पानी के बदलते रंग और आदिवासियों के दुख में सूखते आम के पेड़ों की सच्चाई जानने के लिये आया था. मेरी मदद धामा चेरो जैसे विकास चाहने वाले नहीं, अपनी देह पर देवताओं की सवारी झेलने वाले ओझा और बैगा ही कर सकते हैं. उसे शहीद स्मारक पर चढ़ाये गये रेडियो की याद आयी और तेज हैरानी हुई कि ध्यान कैसे चीजों को जीवित कर देता है वरना वे मृत पड़ी रहती हैं. जैसे उसके कान पहली बार खुले हों, जंगल के हरियाले विस्तार से, खंडहरों से, नदी के पानी से परावर्तित प्रकाश से, आसमान में मंडराती चीलों की उड़ान से एक मद्धिम आवाज आ रही थी- मैं शायद तुम्हारे लिए अजनबी हूं मगर ये चांद तारे मुझे जानते हैं....

शहीद वेदी पर पड़ा रेडियो दोपहर से लगातार बजे जा रहा था.

"और नक्सली?"

धामा हंसा, "नक्सली कहीं आसमान में रहते हैं क्या?" उसने लड़कों की ओर हाथ घुमाया, "अरे सर, यही नक्सली हैं जो आपकी सेवा कर रहे हैं. साले खूब मौज काट रहे हैं बस हमको एक मुसलमान लाकर नहीं दे रहे हैं."

"आंय, कैसा मुसलमान! उसका क्या होगा..."

धामा अचानक चुप हो गया. वह चुप्पी के अंतराल में रिपोर्टर के सहमत होने की उम्मीद से गरदन हिलाते हुए ठहरी नजर से देखता रहा. कोई प्रतिक्रिया न पाकर पछताते हुए लापरवाही के साथ हाथ में पकड़ा गिलास गटक गया और बोला,"ये न हों तो नक्सलियों के बड़े-बड़े तोपची जंगल में पानी बिना टें बोल जायें. गोली-बारूद, खाना, पुलिस मूवमेंट की खबर, सभा-सोसायटी से लेकर रात में नदी पार झारखंड और छत्तीसगढ़ भेजने तक के सब काम यही करते हैं. जिस एरिया कमांडर से मिलना हो आप नाम लीजिये, ये आपको पहुंचा देंगे."

लड़कों के शराब से दीप्त चेहरों पर विनम्र सलोनापन था. वे जिज्ञासा, सौजन्य और प्रेम से इतने भरे थे कि उनके साथ चुहल करने का मन करता था. वे शर्मा रहे थे जैसे उनके कड़ियल बाप ने पहली बार किसी अजनबी के सामने उनके होनहार होने की चुगली कर दी हो. विकास जो गाड़ी चला कर लाया था, बंदूक गोद में रखकर झेंपते हुए घास नोंच रहा था. उस समय वे इतने सलज्ज थे कि उनके गुंडे होने से ज्यादा अभागे होने का विचार विचलित कर सकता था.

धामा चेरो ने कहा, " ए विकास, पैंट उतारो." और अंगूठियों से लदे हाथ जोड़े, "सर! एक विनती है, फोटो मत खींचियेगा. इसकी बहुत सांसत हो चुकी है."

उसने खड़े होकर पैंट नीचे सरका दी. उसकी जांघ में अंदर की तरफ एक गड्ढा था, जहां की चमड़ी बाकी टांग से मुलायम और हल्के रंग की थी. वह जांघिया पहने डूबते हुए सूरज की तरफ दांत भींचे देख रहा था.

"तेरह साल का था तब इसको झारखंड में गोली लगी थी, भाग नहीं पाया था. चुनाव के बाद इसका प्लास्टिक सर्जरी कराना है."

विकास ने कहा, "लेकिन हम कभी किसी की हत्या नहीं किये थे."

बाकी लड़के हंसने लगे. वह जैसे अपनी उम्र से बहुत भारी बोझ लाद दिये जाने की शिकायत कर रहा था. जो उन्हे मजेदार लग रहा था.

***

बंधे को घेरे में लिए जंगल की सीमा को छूकर गुजरने वाला हाईवे राहजनी, बहुत सस्ती वेश्यावृत्ति, ट्रक लूटने जैसे अपराधों के लिए कुख्यात था. व्यापारी बूढ़े गाय-बैलों-भैंसों को अपने एजेंटों के जरिए देहाती इलाकों से खरीद कर ट्रकों से पश्चिम बंगाल भेजते थे. कुछ बंगाल के स्लाटर हाउसों में खप जाते थे लेकिन अधिकांश को बांग्लादेश की सीमा पर ले जाया जाता था जहां उस पार के थोक और खुदरा मांस व्यापारी अच्छी कीमत देकर ले जाते थे. तीन हजार की बूढ़ी गाय आराम से पैंतीस हजार में बिक जाती थी. सौ प्रतिशत से भी अधिक मुनाफा था. राज्य में गौ हत्या पर प्रतिबंध होने के कारण इन्हें बिहार, मध्यप्रदेश और झारखंड में लगने वाले पशु मेलों में बिक्री के नाम पर ले जाया जाता था. यह बहुत पुराना व्यापार था जो जानवरों को काटने-डिब्बाबंद करने की आधुनिक तकनीक, आसान निर्यात और देहातियों को भी बहुत तेज गति से अमीर होने की लगी नई तलब के कारण तेजी पा गया था.

व्यापारियों की एक और दुस्साहसी प्रजाति थी जो अच्छे और ज्यादा मांस वाले कम उम्र के पशुओं की चोरी कराती थी. उन्हें भी इसी रास्ते ट्रकों और कंटेनरों में छिपाकर ले जाया जाता था. इनके कैरियर रास्ते में कई जगह बदले जाने वाले गुंडे होते थे जो बैरियर तोड़ने के माहिर थे और रोकने वालों पर गोली चलाने में भी नहीं हिचकते थे. हाईवे के थानों में थानेदारों की पोस्टिंग के लिए काफी मोटी रकम की बोली लगती थी. कोई थानेदार इस चौड़ी सड़क पर कुछ दिन भी टिका रह जाए तो वह धन और राजनीतिक संपर्कों के मामले में आधुनिक राजा हो जाता था.

अनिद्रा, रक्तचाप और माइग्रेन इस सड़क पर पहरा देने वाले पुलिसकर्मियों की सबसे आम बीमारियां थीं. वे ट्रांसफर से भयभीत होकर पूजा-पाठ और दान करते थे. वे बस नींद पूरी करने के लिए जानवर लदे ट्रकों की खिड़कियों से बरसता पैसा नहीं गंवाना चाहते थे. जिन्हें डाक्टरों की सलाह पर या मौत के डर से बिस्तर पर लेटना ही पड़ता वे दूसरे थानों के सिपाहियों को अपनी ड्यूटी बेच देते थे. तब उन्हें वसूली के बहुत छोटे हिस्से से ही संतोष करना पड़ता था. तब वे विपरीत ग्रहों को अनुकूल बनाने के लिए चेकपोस्ट के करीब फुटपाथ पर बैठने वाले ज्योतिषियों और तांत्रिकों की शरण लेते थे.

हर छिपे कारोबार की तरह यहां के भी कुछ पवित्र, अनुलंघनीय नियम थे जिन्हें अगर जैसे का तैसा माना जाता तो अंडरवर्ल्ड का सारा रोमांच ही खत्म हो जाता. व्यापारियों और पुलिस के बीच लालच की देवी की कृपा से ज्यादा बचाने और ज्यादा वसूलने की होड़ लगी रहती थी. व्यापारी पुलिस के लगाए बैरियर पार करने के नए तरीकों की खोज करते रहते थे. दूसरी तरफ पुलिस भी यथासंभव हर ट्रक में घुसकर पशुओं का स्वास्थ्य प्रमाण पत्र और चारे पानी का इंतजाम देखती थी. गड़बड़ी पाए जाने पर पशु क्रूरता अधिनियम की चुनिंदा धाराओं के तहत मुकदमा कायम किया जाता था जिसके कारण जानवर रास्ते में कुछ दिनों के लिए रोक लिए जाते थे लेकिन कारोबार कभी बंद नहीं होने पाता था. 

धामा चेरो राजनीति के जरिए अपनी देशसेवा को भरोसेमंद आधार देने के लिए एक गौशाला खोलकर रजिस्टर्ड गौसेवक हो गया था.

ट्रकों को हर चेकपोस्ट पर रोका जाता. आए दिन ऐसा होता कि हर नाके पर घूस देने और अनिवार्य तौर पर दो चार लप्पड़ खाने से आजिज आए कुछ ड्राइवर और खलासी ट्रक छोड़कर भाग निकलते थे. अब पुलिस के सामने इन जानवरों को रखने की समस्या होती थी जिनकी देखभाल के लिए सरकार की ओर से प्रतिदिन प्रति पशु सैंतीस रूपए खुराकी मिलती थी. ऐसे जानवरों को धामा चेरो की गौशाला में भिजवा दिया जाता था. वह इनमें से कुछ को छांटकर आदिवासियों और गरीब किसानों में बांट देता था. वे इनका इस्तेमाल खेती में करते थे. जिसको एक मरणासन्न बैल भी मिल जाए उसका वोट पक्का हो जाता था. उसने ग्राम प्रधान का चुनाव इसी तकनीक से जीता था और विधानसभा का चुनाव निर्दलीय होते हुए भी मामूली अंतर से हारा था. इतिहास में कम ही चीजें ऐसी होंगी जो पुलिस और किसान दोनों का समान रूप से भला करती हों. धामा चेरो की राजनीति ऐसी ही निराली चीज थी.

जब व्यापारी जुर्माना भरकर अपने जानवरों को वापस लेने के लिए आते थे, उन्हें धामा चेरो के पास भेज दिया जाता था, धामा उन्हें जंगल में आदिवासियों के घरों की तरफ रवाना कर देता था. दो दिन भटकाने के बाद यदि कोई किसी गांव तक पहुंच भी जाता तो उसे बियाबान में ले जाकर, उन विशाल गड्ढों में सियारों, कुत्तों और गिद्धों की मेहनत से चमकते कंकाल दिखाए जाते थे जहां मरे जानवरों को फेंका जाता था- 'तुम्हारा जानवर तो खुरपका, मुंहपका या न जाने कौन सी रहस्यमय बीमारी से मर गया!'

गौशाला में सिर्फ पुलिस को सैंतीस रूपए प्रतिदिन का भत्ता देने वाले जानवर ही नहीं आते थे, दूरदराज के इलाकों के पशुचोर भी अपना मालजाल, व्यवहार कुशलता और परिश्रम से बनाए गए नेटवर्क के जरिए उसके पास लाते थे. इन सभी को बंधे के पास से नदी पार कराकर बिहार और झारखंड में इंतजार कर रहे दूसरे व्यापारियों को बेच दिया जाता था जो उन्हें ट्रकों के नए काफिले के साथ बांग्लादेश की ओर रवाना कर देते थे.

धामा चेरो की गौशाला की दीवार पर गेरू से बने गाय के चित्र और उसकी सेवा से होने वाले पुण्यों को दर्शाने वाले एक फटे कैलेंडर के सिवा और कुछ नहीं था. असली कारोबार नदी किनारे जंगल साफ करके बनाए गए बांस से घिरे बाड़ों से संचालित होता था जहां चारे पानी की कोई कमीं नहीं थी.

नोट गिनने और गड्डियां बनाकर सहेजने से परेशान होकर, धामा चेरो की अनपढ़ मां ने एक बार कहा था, ”तुमको गौहत्या का पाप लगेगा."

उसने खिलखिलाते हुए उसे समझाया था, "यह वैसा ही है जैसे जंगल से जाती किसी व्यापारी की औरत के थन से कोई आदिवासी बच्चा दो घूंट दूध पी ले. अगर गोहत्या पाप होता होगा तो उन व्यापारियों को लगेगा जो उन्हें कटवाने के लिए ट्रकों में लादकर ले जाते हैं."

विधानसभा चुनाव में एक साल बचा था. समय बीतने के साथ धामा चेरो की मानसिक हालत अस्थिर होती जा रही थी. वह बंदूक की बगल में लेटा हुआ एक रात सपना देखता कि चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंच गया है और सबकुछ उसकी मुट्ठी में आ गया है. दूसरी रात पसीने से भीगे, दांत किटकिटाते हुए के सपने में पाता कि चुनाव से पहले ही विरोधियों ने नक्सलियों से उसकी हत्या करा दी है. वह उम्मीद और डर के बीच झूलते हुए, बचने की पूरी कोशिश के बावजूद शराबी और सनकी होता जा रहा था. ऐसे में विनम्रता का भव्य प्रदर्शन ही उसे चुनाव तक बचाए रख सकता था.

अगर किसी बड़ी पार्टी का टिकट होता तो वह पिछला चुनाव ही जीत गया होता. इस बार वह गाय की रक्षा करने वाली पार्टी में शामिल हो गया था लेकिन टिकट के लिए चुनाव से पहले एक मुसलमान गिराने की शर्त लगा दी गई थी. वह टिकट की बात करता तो पार्टी के बड़े नेता कहते, तुम जिस पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हो उसे वोटर को लालच देकर जीतने का बहुत पुराना अनुभव है. लालच से लालच की काट नहीं हो सकती. नफरत कहीं बहुत अधिक शक्तिशाली चीज है. तुम पहले से ही गौसेवक हो, अगर सिर्फ यह काम कर लो फिर नकदी, शराब, कंबल, साड़ी बांटने वाले मुंह ताकते रह जाएंगे. वह अपने आप पार्टी का माहौल भांप कर टिकट पर दावा पक्का करने के लिए गौवंश को प्रणाम करने लगा था लेकिन उसके आदमी बहुत कोशिश करके भी जानवरों को नदी के उस पार ले जाने वाले एक मुसलमान का इंतजाम नहीं कर पा रहे थे. उसने बकरियों का कारोबार करने वाले एक चिकवा को मोटी तनख्वाह पर रखने की बहुत कोशिश की थी लेकिन वह हर बार पैर सुन्न हो जाने की बीमारी के कारण सत्तर फाल से ज्यादा पैदल नहीं चल पाने का बहाना बनाकर सरक जा रहा था. वह खस्सी को काटने से पहले, उसकी आत्मा को बरसों तक, गले में बंधी रस्सी के कंपन से महसूस करने के कारण भांप गया था कि धामा चेरो किसी दिन उसे गौकशी की तोहमत लगाकर, भीड़ से मरवा देगा और उसके लड़के अपने मोबाइल फोनों से धार्मिक न्याय का वीडियो बनाएंगे ताकि वोटरों को मुसलमानों के कुकर्मों से परिचित कराया जा सके. 

***     

विकास का बाप दशरथ बंसफोर नफासत पसंद आदमी था. सफेद बेलबाटम पहनता था और सिगरेट पीता था. खेत बांध में चले गए वह दर्जी हो गया.

वह बचपन में पुराने कपड़ों को छोटा बड़ा कराने और पैबंद लगवाने डेढ़ कोस दूर रहमानपुर में पंचकैंचिया मियां उर्फ मोहम्मद वकील के घर जाता था जहां तीन मशीनें दिन-रात चलती थीं. मियां का कुछ भरोसा नहीं था कि पुराने कपड़े कब वापस करें लिहाजा उसकी मां भेजते समय एक चपत मार कर कहती थी, 'नाऊ-धोबी-दर्जी तीन जात अलगर्जी' बिना कपड़े वापस लिये घर मत आना. पिटाई के डर से वह वहीं बैठा कपड़ों की रंग-बिरंगी कतरनों से खेलता रहता था. कुछ दिन बाद काज-बटन करने लगा और खिलवाड़ में मशीन चलाना सीख गया.


वह जब कारीगर हो गया, उसे वकील मियां की बीवी की तरफ से कभी आमलेट, कभी खस्सी का सालन तो कभी सेंवई मिलने लगी. उसे खाने से अच्छा यह लगता कि कारखाने में कोई भी चीज़ चीनी-मिट्टी की सफेद चमकती हुई कटोरियों में लायी जाती जो क्रोशिया किये हुए जालीदार कपड़े से ढकी रहती थी. उसे बहुत अच्छा लगता जब महीना-डेढ़ महीना के इंतजार के बाद वकील चाची उसके पास आकर धीरे से कहतीं, "ए बाबू, नास्ता कर लो." उसने घर में भी खाने को नास्ता कहना शुरू किया तो उसकी मां वकील मियां से लड़ने पहुंच गई क्योंकि गांव वाले चिढ़ाने लगे थे कि दर्जी ने दशरथवा को कलमा पढ़ा कर मुसलमान बना लिया है. एक दिन मियां ने मना कर दिया कि वह कारखाने में बैठकर टाइम खोटा न किया करे लेकिन वह आता जाता रहा. इतना हुआ कि चाची ने उसे खाने पीने के लिए कुछ देना बंद कर दिया.

उसकी शादी हुई तब वह कारखाने से दो चीनी मिट्टी की कटोरियां और एक पुरानी, भारी कैंची कमर में खोंसकर चुपचाप चला आया, फिर रहमानपुर की तरफ कभी नहीं गया.

मियां जो बिरले ही कारखाना छोड़कर कहीं जाते थे, तीसरे दिन चीनी मिट्टी की दस चमकती कटोरियां लेकर दशरथ के गांव पहुंच गए. उन्होंने कटोरियां उसकी मां को देकर अपनी कैंची वापस कर देने को कहा लेकिन वह चोर कहे जाने की बेइज्जती के कारण साफ नकार गया. गांव भर के सामने दिन भर हुज्जत चलती रही, कुछ नतीजा नहीं निकला. मियां शाम को कटोरियां उसके दरवाजे के आगे, महुए के पेड़ की जड़ पर फेंक कर वापस लौट गए.

तीन दिन बाद चोरी का फैसला करने के लिए पंचायत हुई जिसमें आठ गांवों से बंसफोर बिरादरी के लोग जुटे. एक बैगा ने टोटका करके बताया कि दशरथ ने मियां के कारखाने से लोहा उठाया था लेकिन वह चीज अब स्थान छोड़कर कहीं और चली गई है. दशरथ ने रोते हुए कबूला कि वह कैंची अपने ननिहाल में एक लड़के को दे आया था जिसने किसी को अढ़ाई रुपया में बेच दिया है. बंसफोर बिरादरी के चौधरी ने मियां से कहा, पुरानी कैंची थी कहीं और चली गई, अब नई का दाम लेकर मामला खत्म करें. मियां अड़ गए. उन्होंने कहा, उसी से हमारी रोजी में बरक्कत हुई है. वह कोई मामूली कैंची नहीं है. हमको उसके अलावे कुछ और लेना मंजूर नहीं है.

कैंची की पंचायत का तमाशा देखने गए, नए जवान हो रहे धामा चेरो ने दूसरी जात की पंचायत के बीच में कूद कर ताना मारा, "सोने की कैंची है क्या जो आपका राजपाट लुटा जा रहा है. हल के फाल को लोहार से निहाई पर पिटवा कर जोड़वा दो, नई कैंची बन जाएगी."

मियां की सांस फूलने लगी. उन्होंने तमक कर कहा, तुम जाहिल जपाट लोग क्या जानो कि कैंची क्या शै होती है. हिंदुस्तान में खूब कपास होती थी और उम्दा कपड़ा बनता था लेकिन हजार साल तक लोग उस कपड़े को लपेटे फिरते रहे. अब भी कई जगह के मंदिरों में वही रिवाज चला आ रहा है कि लोग सिला कपड़ा पहन के अंदर नहीं जाते. मिस्र देश से कैंची आई तब जाकर सिला कपड़ा मयस्सर हुआ. तुम्हारे जैसे लोगों को क्या कहा जाए जो बीस साल पहले तक पोशाक के नाम पर बिहटी और भगई के आगे कुछ जानते ही नहीं थे.

बात बढ़ते बढ़ते बढ़ गई. नौजवान लड़कों ने मियां को धक्का दे दिया. किसी ने हो हल्ले में उनकी दाढ़ी पकड़ कर खींच ली. मियां वापस लौट गए लेकिन उन्होंने बंसफोरों की आबादी वाले पांच गांवों की सभी जात का कपड़ा सिलना बंद कर दिया. शायद एक दर्जी का हुक्का पानी बंद करने का यही तरीका हो सकता था. उस घटना के बाद उनका नाम पंचकैंचिया मियां पड़ गया.

दो साल तक जुआ खेलने और मुर्गों की लड़ाई देखने के बाद, दशरथ मशीन के लिए जिला सहकारी बैंक से लोन लेकर इलाके का नामी टेलर मास्टर हो गया. उसके पांच गांव बंधे हुए थे. लगन के दिनों में उसे फुर्सत नहीं मिलती थी कि अपने रिश्तेदारों की शादियों में जा सके लेकिन सिलाई से इतना अनाज और पैसा मिल जाता था कि खेती से कई जनम में भी नहीं मिल सकता था.

मजे से कुछ साल बीते थे कि उसके ओसारे के आगे महुए के पेड़ पर रोज शाम को एक उल्लू आ कर बैठने लगा. उल्लू बोलता तो वह सीटी बजाता, थोड़ी देर बाद जवाब में वह जोर से चीखता. झुंड बनाकर रोज उल्लू का इंतजार करने वाले बच्चे इस खेल पर हंसते थे लेकिन उसकी मां उल्लू को गालियां देते हुए बड़बड़ाने लगती, "बेटा, यह खिलवाड़ एक दिन बहुत महंगा पड़ेगा. अगर किसी दिन उल्लू ने पलट कर जवाब नहीं दिया तो समझ लेना कि वही तुम्हारा आखिरी दिन है."

वह उसे अंधविश्वासी कह कर फिर से सीटी बजाता.

बरसात की एक शाम, उल्लू आने के समय एक लड़की कंधे पर एक बोरा लादे आयी जिसमें मरम्मत कराने के लिये कपड़े थे. वह मशीन वाली कोठरी के दरवाजे पर स्टूल लगा कर बैठ गयी. दशरथ टेलर मास्टर ने बोरे के मुंह पर बंधी रस्सी को काट कर खोला तो देखा, फौज की एकदम नयी वर्दियां थीं जिनको काट कर तुरंत छोटा किया जाना था. वह समझ गया, लड़की को नक्सलियों ने भेजा है जो मना करने पर जान ले लेंगे. उसने टालने के लिये कहा, नाप के लिये कोई आदमी तो भेजो सिर्फ अंदाज से वह कुछ नहीं कर पाएगा.

लड़की उठ कर बाहर गयी और उसके बारह साल के बेटे विकास का हाथ पकड़ कर ले आयी, "ऐसे नापो कि चार पांच साल बाद भी पहन सके."

रात भर पानी बरसता रहा, वह स्टूल पर चुप बैठी मच्छर मारती रही. टेलर मास्टर लालटेन की रोशनी में वर्दियों को छोटा करता रहा. भोर में साढ़े तीन बजे करीब वह अचानक उठी, उसने बिना कुछ कहे सभी सिली-अनसिली वर्दियां, कपड़ों की कतरनें और धागों की रीलें भी बोरे में भरीं, एक मुट्ठी रुपये दिये और जंगल में गायब हो गयी. उसके जाने के बाद टेलर मास्टर की जान में जान आयी और पूरे दिन सोता रहा. वह तीसरे पहर जब जागा, आस-पास गांवों में सबको पता चल गया था कि वह नक्सलियों की वर्दी सिलता है.

तीन महीने बाद पुलिस कप्तान के दफ्तर से जंगली इलाकों के नौ नक्सल प्रभावित थाना क्षेत्रों में पाये जाने वाले सभी उल्लुओं को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का टेंडर जारी किया गया. बहेलियों और चिड़ीमारों से अधिकतम सत्तर रुपये प्रति उल्लू और एक रुपया प्रति अंडा की दर से दो महीने की अवधि में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा बन चुकी रात्रिचर पक्षी प्रजाति से क्षेत्र को मुक्त कराने के लिये प्रस्ताव आमंत्रित किये गये थे. शहरों में बहस हो रही थी कि उल्लू के संरक्षित प्रजाति का पक्षी होने के कारण अंततः अदालत मारने पर रोक लगा देगी जबकि आदिवासी मांग कर रहे थे कि उन्हे भी रोजगार का अवसर दिया जाना चाहिये क्योंकि वे इस काम में बहेलियों से कहीं अधिक माहिर हैं. टेंडर जारी होने के बाद टेलर मास्टर के घर के सामने वाले पेड़ पर उल्लू ने आना बंद कर दिया था लेकिन उसकी मां अब भी उसे खोजती रहती थी. उसे आशा थी या तो वह उल्लू मारा जा चुका है या जल्दी ही किसी न किसी की गुलेल से मार डाला जाएगा.

एक दिन कस्बे के इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले लड़कों ने धामा चेरो के साथ आकर उसकी मां को बताया कि अढ़ाई कोस दूर सड़क से इधर की तरफ फूटने वाले चकरोड के किनारे एक महुए के पेड़ पर एक बोर्ड टांगा गया है, जिस पर लिखा है- 'लाल सलाम वर्दी सिलाई केंद्र'. टेलर मास्टर को लगा छोकरे चकल्लस कर रहे हैं, उसने उन्हे गालियां देकर भगा दिया. जब बाजार की तरफ अक्सर आने-जाने वाले  बनिये भी इस बोर्ड का जिक्र करने लगे, एक दिन विकास साइकिल से उस पेड़ के पास गया. उसने लौट कर अपनी दादी को बताया, सही बात है, एक दफ्ती पर केवल हाथ से लिखा ही नहीं है बल्कि हमारे घर का रस्ता बताता तीर भी बनाया गया है. दफ्ती को एक खोखल से लटकाया गया है, जिसमें बैठा एक उल्लू सबको देखता रहता है.

उसी रात, पुलिस वाले आये जो मकान की तलाशी लेने के बाद टेलर मास्टर से नक्सलियों के नाम-पते पूछने लगे. वह कुछ नहीं बता पाया तो पुलिस वालों ने उसे हाथ पीछे बांध कर मकान की मोटी धरन से सिलाई मशीन के ऊपर लटका दिया और कोठरी में ताला बंद कर गांव में दूसरे लोगों से पूछताछ करने चले गये. वे तीन घंटे बाद लौटे तो टेलर मास्टर बेहोश हो चुका था. पुलिस वालों ने गांव में सबसे अपने घरों से जितनी सूखी मिर्च हों सब बटोर कर ले आने के लिये कहा. मिर्चों की ढेरी को उसके नीचे जला कर कोठरी को बंद कर दिया गया.

भोर में चमड़े के एक चौड़े पट्टे को पानी में भिगो कर टेलर मास्टर की पिटाई शुरू की गयी. इस बार उसने दर्द से चिल्लाते हुए बहुतेरे नक्सलियों के नाम बताये जिसमे उसके बेटे विकास, मर चुके पिता लच्छू और ससुर राम निहोर भी शामिल थे. उसे सुबह जीप में लाद कर थाने ले जाया जा रहा था तभी रास्ते में वह मर गया. दस घंटे की यातना से उसके फेफड़े फट गये थे.

अगले दिन सभी अखबारों में खबर छपी और टीवी चैनलों में दिखाया जा रहा था कि नक्सल विरोधी अभियान में पुलिस को बड़ी कामयाबी मिली है. बीती रात माओवादियों के एक कमांडर को रोमांचक मुठभेड़ में मार गिराया गया जो दर्जी के भेस में स्थानीय आदिवासियों को सरकार के खिलाफ भड़का रहा था और उल्लुओं के जरिये जंगल में फैले गुरिल्ला दस्तों को संदेश भेजने में माहिर था.

***

धामा चेरो अपने गांव का पहला लड़का था जिसने हाईस्कूल पास कर लिया था. उन दिनों वह चाहता था कि गांव के हर परिवार का राशन कार्ड बन जाए. वह खाद्य आपूर्ति विभाग के बाबुओं के यहां दौड़धूप और विनती कर रहा था, इसलिए नहीं कि सबको सस्ता गल्ला, चीनी और मिट्टी का तेल मिलने लगे बल्कि इसलिए कि मुसीबत पड़ने पर लोग साबित कर सकें कि वे अपने गांव के रहने वाले हैं ताकि पुलिस उन्हें बाहरी बताकर मार न सके. उसके साथ पढ़ने वाले एक लड़के को पुलिस उठाकर ले गई थी, तीन दिन बाद लाश मिली. उसे आंध्रप्रदेश से आया नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था. उसके मां बाप भी साबित नहीं कर पाए कि वह उन्हीं का बेटा था. पड़ोसी गांव के दशरथ टेलर मास्टर के साथ भी यही हुआ था. लोगों ने मान लिया था कि वह उल्लूओं की बोली में चिड़ियों से बात करने की विद्या जानता था लेकिन कोई यह कहने वाला नहीं था कि वह यहीं का मूल निवासी था.


पुलिस जादूगर थी, कुछ भी साबित कर सकती थी. नक्सली भी जादूगर थे. वे बारी बारी से सूरज और चंद्रमा की तरह प्रकट होते थे. नक्सली चाहते थे कि बांध न बनने पाए क्योंकि उनके छिपने के ठिकाने पर बहुत बड़ा सरकारी अमला लाकर बसाया जा रहा था. उन्हें अजनबियों से डर लगता था. जंगल में बसे गांवों के लोगों को न चाहते हुए भी उन्हें बंदूक के डर से खाना-पानी देना पड़ता था, मीटिंग में जाना पड़ता था, रात-बिरात जहां कहें पहुंचाना पड़ता था और सबसे ऊपर पुलिस की मुखबिरी करनी पड़ती थी. उनके पीछे पुलिस आती थी जो खासतौर से जवान लड़कों को छांटकर टार्चर करती थी. उन्हें पीटने में सिपाहियों के हाथ सूज जाते थे, दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तुलना में ज्यादा काम करना और चौकन्ना रहना पड़ता था, इसलिए वे मुआवजे के रुप में घरों से शराब, बकरी, नकदी, मुर्गा जो मिले उठा ले जाते थे. आदिवासियों की हालत उन पिल्लों जैसी हो गई थी जिन्हें बच्चे कान से उठाकर चोर-साव जांचते हैं.

नक्सली और पुलिस, इन दो पाटों के बीच पिसते गांवों में किसी आदमी के शांति से जीने का रास्ता नहीं बचा था. एक दूसरे से डरना और नुकसान पहुंचाना लोगों की नियति थी. दोनों तरफ से कई सालों तक इतनी मार पड़ी थी कि किसी का किसी पर भरोसा नहीं रह गया था. परिस्थितियां ऐसी थीं जिनमें महान अवसरवादी और लंपट व्यक्तित्व बना करते हैं. अगर कोई आदमी किसी तरफ नहीं है तो भी उसके बाइज्जत बचे रहने से डाह रखने वाला कोई उसे पुलिस का मुखबिर बताकर नक्सलियों से दस-बीस हंटर लगवा सकता था या फूलपत्ती चढ़ाकर नक्सलियों का राजदार होने के आरोप में पुलिस से सांसत करा सकता था.

एक दिन धामा चेरो के कालेज के गेट पर लगे लेटरबॉक्स में लाल स्याही से लिखी एक बैरंग चिट्ठी पड़ी पाई गई जिसमें कालेज के प्रबंधक-प्राचार्य से इलाके के विकास के लिए एक हफ्ते के अंदर तीन लाख रूपया टैक्स देने या अंजाम भुगतने की तैयारी करने के लिए कहा गया था. धामा के क्लासटीचर ने चिट्ठी खोलकर पढ़ी और रहस्यमय खुशी से दमकते हुए उसे देकर प्राचार्य जी के पास भेज दिया. वह डरता हुआ उनके दफ्तर में गया लेकिन प्राचार्य जी ने खुली चिट्ठी को इत्मीनान के लिए एक बार फिर खोलकर देखा और व्यस्त भाव से जिले के कप्तान को फोन मिलाने लगे.

सुपोषित प्राचीन जटा, धवल दाढ़ी, त्रिपुंड औऱ दुर्लभ प्रजाति के रुद्राक्ष की मालाओं से मंडित प्राचार्य-प्रबंधक का व्यक्तित्व ऐसे बना था कि वैसा और कुछ हो पाना असंभव लगता था. संक्षेप में वह, एक ब्रह्मचारी संन्यासी पिता और शिक्षाविद् माता की तेजस्वी संतान लगते थे. बाहर से आकर उन्होंने इस जंगल में कालेज की नींव डाली थी. पिछड़े इलाके में शिक्षा का प्रकाश फैलाने की लगन ऐसी थी कि वन विभाग और पुलिस के भक्त अफसरों की सहायता से आदिवासियों की जमींनों पर कब्जा करके विद्यारंभ करना पड़ा अन्यथा बिलंब होता और अज्ञान का अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था. वह पानी के लिए अपना तांबे का लोटा हमेशा साथ रखते थे, जनश्रुति के अनुसार उनका भोजन लकड़ियों पर गंगाजल छिड़क कर बना करता था और उनके आदेशानुसार उनकी गाड़ी में गायत्री मंत्र सर्वदा गुंजरित रहता था. शिक्षा के मार्ग में अत्यल्प वेतन, परिवारवाद, घपला, कुप्रबंधन जैसे वचनों के कांटे बोने वाले अस्थायी अध्यापकों और आदेश पालन में बिलंब करने वाले अन्य स्टाफ को अनुशासित रखने के लिए उन्हें अक्सर ऋषिपद से थोड़ा सा खिसक कर भोजपुरी की सबसे कोमल गालियों का संयत व्यवहार करना पड़ता था जिसका असर उनके रक्तचाप के विचलन में दिखाई देता था. उन्होंने परिसर में परशुराम की प्रतिमा स्थापित कर, एक मध्यम आकार का भव्य मंदिर बनवा रखा था जिसका प्रयोग वह अनिच्छित तत्वों से मिलने के बजाय उस समय का सदुपयोग साधना एवं जांच के लिए आने वाले सरकारी अधिकारियों के आतिथ्य के लिए करते थे. उन्होंने परंपरानुसार अगले आदेश की प्रतीक्षा में खड़े धामा के स्नेह से देखते हुए कहा, "भक्कू की तरह ताक क्या रहे हो धीचोद! रुपया लेकर ही जाओगे क्या."

कस्बे के लघु एवं दुर्बल समाचार पत्रों में, लंबे अंतराल के बाद इलाके में फिर से नक्सलियों की सक्रियता का कलरव आरंभ होने के तीसरे दिन पुलिस ने कालेज के दो अन्य छात्रों के साथ धामा को पूछताछ के लिए उठा लिया. ये दोनों अस्थायी शिक्षकों के बहकावे में आकर आदिवासी और दलित छात्रों को समाज कल्याण विभाग से मिलने वाली छात्रवृत्ति की रकम को सीधे छात्रों के बैंक खातों में डालने की मांग कर रहे थे.

प्राचार्य जी की पारदर्शी व्यवस्था यह थी कि फार्म भरे जाने के समय ही छात्रों से सहमति ले ली जाती थी कि उन्हें छात्रवृत्ति का एक हिस्सा कालेज के विकास के मद में देना पड़ेगा. उन्हें अपव्यय की आदत से बचाने के लिए आधी से अधिक राशि नकद लेने के बाद ही छात्रवृत्ति के चेक दिए जाते थे और धन्यवाद प्राप्त किया जाता था. कार्ल मार्क्स ने आर्थिक प्रश्न को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया था, ये दोनों छात्रों की अर्थव्यवस्था का आंदोलन कर रहे थे और धामा ने नक्सलियों और प्राचार्य जी के बीच दूत की भूमिका निभाई थी इसलिए तीनों का संबंध माओवादियों से हो सकता था. स्थानीय पुलिस ने इसी शंका के समाधान के लिए उनसे रात भर हवालात में रखकर पूछताछ करना उचित समझा था. तीनों को अगली सुबह छोड़ दिया गया था.

उस सस्ती के जमाने में धामा के बाप को अपने इकलौते लड़के को छुड़ाने के लिए चार हजार रुपए देने करने पड़े थे. दारोगा की नींद में खलल डालने के लिए सिपाहियों की गालियां सुननी पड़ीं, झापड़ खाने पड़े और एक वकील के साथ पुलिस कप्तान के बंगले पर जाकर अपनी सात पुश्त के अच्छे चाल चलन का इतिहास सुनाना पड़ा था. धामा के शिक्षा से मोहभंग के महीनों बाद पता चल पाया कि वकील के पास सिर्फ काला कोट और आत्मविश्वास था, वकालत की डिग्री नहीं थी, प्रबंधक सह प्राचार्य जी ने विदेश में रहने वाले अपने छोटे भाई से धन और जिला प्रशासन से एक सुरक्षा गार्ड प्राप्त करने की योजना के पहले कदम के रूप में लाल स्याही से हू ब हू नक्सल शैली में लिखी चिट्ठी खुद ही लेटरबाक्स में डाली थी. वह अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक दोनों उद्देश्यों में सफल रहे और छात्रों की अर्थव्यवस्था से संबंधित किसी आंदोलन की गुंजाइश लंबे समय के लिए खत्म हो गई थी. अब शिक्षा का देवता अंगरक्षक के साथ वन में गरिमापूर्ण ढंग से विचरण कर सकता था.

धामा का बाप पुलिस कप्तान से मुलाकात के आतंक के कारण अचानक चुप रहने लगा. कुछ कहना चाहता तो हकलाने लगता, आधा कोस चलने में कई बार चक्कर आते और अंततः भहरा जाता. पेट में भय घुमड़ता रहता जिसके कारण हफ्तों दस्त लगे रहते. वह दरवाजे पर लबेजान एक झिलंगी खटिया मे लेटा रहता. एक वैद्य की दवाई से कुछ फायदा हुआ तभी वरदान की तरह गैस की बीमारी हो गई. वह एक कोठरी में, देह में टूटा तीर लिए जानवर की कराह जैसी आवाज में डकारता और पादता पड़ा रहता था. झाड़ फूंक तो दूर लोगों ने उसके पास बैठकर दो बातें करना भी बंद कर दिया जिससे उसे बहुत राहत महसूस हुई. वह बाकी उम्र अकेला ही रहना चाहता था ताकि मुंह से कोई ऐसी वैसी बात निकल भी जाए तो कोई सुन न सके.

टप्पेबाजों का एक गिरोह था जो हाईवे पर नक्सलियों का भेष बनाकर सीमेन्ट फैक्ट्रियों से निकलने वाले ट्रकों से वसूली किया करते थे. पुलिस वाले रोड होल्डअप की घटना होने या होने की आशंका पर धामा के घर सुराग एवं आतिथ्य पाने के लिए आने लगे. नतीजा यह निकला कि नक्सलियों की बेगार करने वाले उसे टेढ़ी नजर से देखने लगे क्योंकि उन्हें दिखाई दे रहा था कि वह पुलिस का मुखबिर हो चुका है. अंततः उसने जान लिया कि अब जान बचाने का सिर्फ एक उपाय बचा है.

वह अंतःप्रेरणा से खादी का लंबा कुर्ता पहन कर कालेज के बजाय कचहरी, थाना और विकास के निकटम स्रोत ब्लाक कार्यालय की ओर जाने लगा. उसकी दिनचर्या अधिक से अधिक लोगों के राशन कार्ड बनवाना और सीमेन्ट, अलमुनियम के कारखानों में बेरोजगार आदिवासी युवाओं को नौकरी दिलाने के लिए प्रयास करना हो गई. उसकी तरफ लोग लपकने लगे थे लेकिन भीतर ही भीतर वह अपनी असलियत जानता था और डरा रहता था. उसका कुर्ता अभी कच्चा था, उसमें पॉवर नहीं आई थी.

शादी के साथ, उसके फौज से रिटायर ससुर ने उसकी प्रतिभा को पहचानते हुए दहेज के रुप में ऐसा काम शुरू कराया कि वह देखते देखते एक संपन्न समाजसेवक और कर्मठ देशभक्त का आकार लेने लगा. ससुर फौज के मेस में बार टेंडर रहा था जिसने अफसरों को ऐसी परिस्थितियों में शराब पिलाई थी जब मिलने की कोई संभावना नहीं थी और उनकी इच्छाएं सूख कर मुरझा रही थीं. वह एक सलाम से किसी को भी बीता वक्त याद दिलाने की कला जानता था. उसने धामा से कहा, आप मेरे साथ साझे में लड़कों को फौज में भर्ती कराने का काम शुरू कीजिए. धामा बिदका, मैं फौज के बारे में क्या जानता हूं तो उसने लगभग एक साल लगाकर धीरे धीरे समझाया, कुछ जानने की जरूरत नहीं है. करना सिर्फ यह है कि लड़कों का कागज-पत्तर तैयार कराइए और उन्हें एक बस में ठाठ से खाना-पानी देकर रिक्रूटमेंट सेंटर तक पहुंचा आइए. हर भर्ती का एक फिक्स रेट है, वह लेकर एक साल के लिए सूद पर लगा दीजिए. साल भर में पोस्टिंग हो जाए तो वाह-वाह नहीं तो दरवाजे पर बुलाकर ईमानदारी से पैसा वापस कर दीजिए. अगर आपने सूद की वसूली में ढिलाई नहीं किया तो समझिए, पैसे और जस की कभी कमीं नही पड़ेगी.

धामा ने ससुर को कप्तान मानकर बेरोजगारी के समुद्र में अपनी कश्ती उतारी और देश के लिए जान देने को हरदम तैयार रहने वाले नौजवानों का भविष्य निर्माता बन गया.

एक बार सीमेन्ट फैक्ट्रियों में आदिवासी युवाओं को रोजगार देने की मांग को लेकर कस्बे के बाजार में सड़क जाम चल रहा था और एक फैक्ट्री के नए मैनेजर की गाड़ी फंस गई. एक लड़के ने ईंटा उछाल दिया जिससे उसकी गाड़ी का शीशा चटक गया. वह काफी देर तक गाड़ी में निश्चिंत बैठा, काले चश्मे के पीछे से धामा चेरो को घूरता रहा फिर बाहर निकल कर उसके पास आया. उसने उसे डांटते हुए कहा, "ढेला-पत्थर से कितने दिन राजनीति कर पाओगे. आदिवासी हो तो तीर-धनुष उठाओ. कुछ समझे, तीर-धनुष!"

धामा ने कहा, "गलती हो गई सर! आप हमारा भी कुछ ख्याल करिए."

मैनेजर ने उसे अपना कार्ड देते हुए कहा," तुम तैयारी रखो. जब सही वक्त आएगा तुम्हें बुलाऊंगा, जिसे कहोगे उसे नौकरी मिल जाएगी. "

कुछ महीने बाद कस्बे की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्री में हड़ताल हुई तो मैनेजर ने उसे बुलाकर फैक्ट्री के गेट पर आदिवासियों का एक प्रदर्शन कराने के लिए डेढ़ लाख रुपए दिए. उसने आसपास के गांवों के लोगों को इकट्ठा किया. मैनेजर के बताए दिन फैक्ट्री के गेट पर तीर-धनुष के साथ विशाल प्रदर्शन हुआ. उनकी सभा में आकर, मैनेजर ने धामा से माला पहनने के बाद कहा, हड़ताल करने वाले बाहरी मजदूरों की जगह फैक्ट्री में स्थानीय आदिवासी युवाओं को नौकरी दी जाएगी क्योंकि वे ज्यादा समर्पित और मेहनती हैं. तीन दिनों के भीतर हड़ताल खत्म हो गई.

मैनेजर ने उसे हड़ताल तोड़ने के आदिवासी एक्सपर्ट के रुप में विकसित किया. धामा ने कस्बे बढ़ई से धार्मिक सीरियलों में दिखाए जाने वाले भव्य और चमकीले तीर-धनुष बनवाए जो सिर्फ फोटो खिंचाने के मतलब के थे. वह दूसरी कई फैक्ट्रियों के मैनेजरों के बुलाने पर, आदिवासियों को वाजिब मेहनताने पर ट्रैक्टरों में लादकर प्रदर्शन के लिए ले जाने लगा. मजदूर आंदोलन के नाम पर लंबे समय से चल रही कुछ जातियों के गिरोहों की दादागिरी को खत्म करने में यह बाहरी बनाम लोकल का फार्मूला अचूक साबित हुआ जिसकी मुंहमांगी कीमत उसे हर बार मिल जाया करती थी.

आसपास बीमारियां बहुत ज्यादा थीं. ग्राम प्रधान का चुनाव जीतने के बाद धामा चेरो तेजी से हर मर्ज की दवा बनता गया.       

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विकास ने महुए के पेड़ पर छिपकर, सिलाई मशीन वाली कोठरी के जंगले से अपने बाप की पिटाई देखी थी और गूंगा हो गया था. उसने हर चोट पर भय की बिजली का झटका खाते हुए देखा था कि पसीना पोंछते दो सिपाही बारी बारी से जिस चमड़े के पट्टे से उसके पिता को मार रहे थे उसे कई बार बाहर ले जाकर पानी में भिगोया गया था, उस पर सफेद पेंट से एक तरफ लिखा था 'आन मिलो सजना'. यह पुलिस की रोमांटिक सोच का नमूना था. उसे बहुत दिनों तक अपने पेट में आवाजें चलती महसूस होती थीं लेकिन मुंह खोलने पर कुछ बाहर नहीं आता. वह हाथ-पैर झटकता और मुंह बा कर आंखे झपकाता तो लोग संक्रामक यातना से त्रस्त होकर आंखे फेर लेते थे. उसकी मां और दादी कलपती रहतीं थीं जिनके सामने पड़ने से बचने के लिए वह जंगल में बैठा रहता था.


वही लड़की जो टेलर मास्टर से वर्दियां छोटी कराने आई थी, एक दिन बंदूक लिए पांच आदमियों के साथ आई और उसे जंगल से उठाकर चली गई. पहले पैदल फिर जीप में बिठाकर उसे झारखंड में जंगल के किसी कैंप में ले जाया गया जहां वह तीन दिन अपनी उम्र के कई बच्चों के साथ बैठा रोता रहा. उसे समझाया गया कि उसे उन सब पुलिस वालों को मारकर बदला लेना है जिन्होंने उसके पिता की हत्या की है. बच्चों के साथ उसे भी कोड में बात करना, बंदूक चलाना और जंगल में खाना पानी न मिलने पर भी जिंदा रहने के तरीके सिखाए गए. उसे एक यूनिट से दूसरी यूनिट के बीच रसद और संदेश पहुंचाने के काम पर लगा दिया गया.

उसके मुंह से पहली बार आवाज सात महीने बाद निकली थी जब उसने पेड़ से लगे बोर्ड पर बने गोले में राइफल से सही निशाना लगाया था. वह बिना कोशिश के अपने आप गुर्राया था, आन मिलो सजना. थोड़े समय बाद विजयादशमी के दिन उसे एक पुलिस के मुखबिर को सजा देने के लिए ले जाया गया. उस आदमी के हाथ पैर बंधे हुए थे, आंखों से खून बह रहा था जिन्हें शायद कोई नुकीली चीज भोंक कर फोड़ दिया गया था. वह कोई पचीस लोगों की भीड़ के बीच जमींन पर गुबरैले की तरह लुढ़कते हुए जान बख्श देने के लिए गिड़गिड़ा रहा था. उसे सीने पर गोली चलाने के लिए कहा गया. उसने भारी राइफल उठाकर निशाना लगाया लेकिन घोड़ा नहीं दब रहा था. वह पसीने से नहा गया, कंपकपाने लगा, दांत से दबकर निचला होंठ गहरे तक कट गया लेकिन उसकी राइफल से गोली नहीं निकली. उसकी हालत को देखकर हंसते हुए एक बड़े कामरेड ने अचानक फायर कर दिया और वह आदमी कंपकपा कर शांत हो गया.

कैंप में किसी कामरेड का जन्मदिन मनाया जा रहा था. वह उस दोपहर कैंप के रास्ते पर पहरा दे रहा था तभी अचानक झाड़ियों में से निकले सीआरपीएफ के जवानों ने हमला कर दिया. वह कामरेडों को एलर्ट करने के लिए संकेत देकर भाग पाता, इससे पहले उसकी टांग में गोली लगी. वह सूखी पत्तियों से भरे एक गड़हे में लुढ़क गया और दम साधे रात भर पड़ा रहा. हमले में एक कामरेड मारा गया, बाकी घायलों को उठाकर भागने में सफल रहे थे. अगली दोपहर को कुछ गांव वाले उसे उठाकर जंगल में एक पुराने मंदिर में रहने वाले एक साधु के पास छोड़ आए जहां पहले से मौजूद एक डाक्टर ने उसका इलाज किया. वह ठीक हो गया तो साधु ने उसे शंख बजाना और दो-चार मंत्र पढ़ना सिखाया. वह उसके चेले, बाबा बालकराम के भेष में सोनभद्र, मिर्जापुर और झारखंड के बीच कूरियर का काम करने लगा. एक दिन खबर मिली कि केंद्र सरकार ने जंगल में बहुत ज्यादा फोर्स भेजी है और उसकी यूनिट उड़ीसा की ओर निकल गई है. वह भी साधु को बिना बताए घर चला गया.

वह चाहता था कि उसके पिता दशरथ टेलर मास्टर को शहीद माना जाए और उनकी भी एक वेदी बांध के पास बनाई जाए. उसका मानना था कि टेलर मास्टर बांध के कारण मारे गए. अगर सरकार जमींन जबरदस्ती नहीं लेती तो उसके पिता के दर्जी होने की नौबत नहीं आती, न नक्सलियों की वर्दी सिलते न मारे जाते. वह इस उम्मीद में धामा चेरो की गाड़ी चला रहा था कि पुलिस से बचा रहेगा और वह ग्रामसभा से प्रस्ताव पास कराकर एक दिन उसके पिता की भी आठवीं वेदी बनवा देंगे. मामला यहां फंसा था कि पुलिस ने दशरथ को झारखंड से आया नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया दिखाया था. इतने सालों बाद भी उसे यहां का मूल निवासी साबित नहीं किया जा सका था. किसी ने इसके लिए पैरवी करने की हिम्मत नहीं की थी. दूसरी दिक्कत यह थी कि ग्रामसभा के दो मुसलमान सदस्य उसके पिता को शहीद का दर्जा देने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. ये दोनों पंचकैंचिया मियां के रिश्तेदार थे.

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अंधेरा ध्वस्त इमारतों, जंग लगे ट्रकों, शहीदों के चबूतरों, गिलासों, पाइपों और पेड़ों के बीच की खाली जगहों में भरता जा रहा था. नदी के बहने की आवाज के बीच में किसी ऐसी चीज के गिरने की आवाज छिपी थी जो वनस्पतियों की गंध, तारों की फीकी रोशनी, सिहराती हवा के स्पर्श और शराब के खुमार के साथ मिलकर रिपोर्टर के भीतर सेमल के रूईदार बीज की तरह भटकती हुई गिर रही थी.

रात किसी अकेले झींगुर की आवाज की लय पर किसी आदिम गीत की तरह उठते गिरते हुए हर चीज को अपने ही अनन्य ढंग से सम्मोहक और डरावनी बनाती जा रही थी. डर न होता तो सम्मोहन भी न होता. सरकार, पुलिस, नक्सली, दलाल, गरीबी और आत्माओं से डरते हुए लोग न जाने किस चीज पर मुग्ध जिए जा रहे थे. कहीं वह चीज रात तो नहीं है जो पहले सबकुछ पर पर्दा डालकर सहनीय बनाती है फिर भुलावा देकर सुला देती है फिर चुपके से नींद में अच्छे-बुरे सपने बो कर चली जाती है. उसे कुछ समझ नहीं आया कि वह चीज क्या है. वह सबके बीच होते हुए भी अपने भीतर गुम होकर बुदबुदा रहा था, रहस्य...रहस्य...रहस्य

उसे पहले लगा कि सरपत की जला दी गई झाड़ी की बची रह गई जड़ है. एक छोटी सी लपट उठी, कुछ दिखाई देने लगा, मच्छर उड़ाने के लिए एक हाथ हिला. ठीक पीछे बीस हाथ की दूरी पर एक टीले के ऊपर रेडियो वाला बैगा बैठा चिलम पी रहा था. वह उन सबको तीन घंटे से अपनी एक आंख से एकटक देखे जा रहा था. वह अचानक वहां से हटने के लिए बेचैन हो गया. संयोग कि धामा चेरो ने भी उसी समय अंगड़ाई लेते हुए कहा, "चलिए सर, अब यहां का खेल खत्म. आपको अपनी गौशाला घुमा के लाते हैं."

"भाई आज रहने दो, मुझे गेस्टहाउस पहुंचना है. रात में गेट बंद हो जाएगा तो दिक्कत होगी. " वह डैम से बीस किलोमीटर दूर कस्बे में एक सीमेंट फैक्ट्री के गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था. उसे केयर टेकर ने जंगली इलाके से रात होने के पहले लौट आने के लिए कहा था.

 धामा हंसा," अरे सर, अभी समझे नहीं कि आप किसके साथ हैं. जब आप चाहेंगे, जैसे आप चाहेंगे इस इलाके का कोई भी गेस्टहाउस कोई डाक बंगला खुला मिलेगा. "

"नहीं, मैं उन लोगों को परेशान नहीं करना चाहता."

उसने नशे में लचकते हुए दोनों हाथ थाम लिए, "देखिए सर, इनकार मत कीजिएगा. आप हमारे मेहमान हैं. गौशाला से किसी को आपकी सेवा के लिए साथ कर देते हैं, सुबह हम वापस ले आएंगे."

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वह बस्ती बाजार के पीछे सड़ांध मारते पानी के छिछले ताल के बाद, आखिरी झोपड़ी की दीवार से शुरू होती थी. वहां तक जाने वाला खड़ंजे का रास्ता दोनों तरफ कीचड़ में उगी बेहया की झाड़ियों के बीच मच्छरों से गुंजार और जुगनुओं से रौशन था. गाड़ी की हेडलाइट से नाराज सुअर गुर्राते हुए अपने विशाल परिवारों के साथ इधर उधर भाग रहे थे. अधिकांश घर खपरैल के थे जिनसे मरियल पीली रोशनी झांक रही थी. हवा दड़बों में बंद अदृश्य मुर्गियों की घुटी हुई गंभीर आवाजों से बोझिल थी और छप्परों की थूनियों से बंधी बकरियां बदहवास होकर झटके खा रही थीं. घरों की ऊंचाई, दरवाजे, जंगले, चबूतरे, आले सब औसत से छोटे आकार के थे जिनसे वहां रहने वालों की इस दुनिया में जगह का अंदाजा होता था.


बच्चों से ठुंसी एक कच्ची कोठरी में अधनंगे, मरियल बैंड वाले कोई धुन निकालने का प्रयास कर रहे थे. शोर बहुत था, पिस्टीन बजाने वाले बैंड के अगुआ का गाल चमक रहा था लेकिन उस संगीत का सामूहिक प्रभाव डरावना, उदास और असहाय कर देने वाला था. जाने क्यों ऐसा लगता था कि उन्हें कभी कभार किसी शवयात्रा में ही बुलाया जाता होगा वरना उनका मुख्य काम भारी रात काटने के लिए अभ्यास करते जाना था.

एक छप्पर के नीचे कुछ बाहरी लोग ताश खेल रहे थे जिनके कंधों पर हाथ रखे लड़कियां चुपचाप देख रही थीं. वहां मोढ़े पर बैठी एक मोटी औरत ने चिंचियाती आवाज में कहा, "नेताजी नमस्कार." वह टाउन एरिया की निर्वाचित सदस्य थी.

धामा चेरो ने गाड़ी की खिड़की से सिर निकाल कर कहा, "नेताइन अपनी गौशाला से होकर आते हैं."

औरत ने पान से सड़े दांतों को दिखाकर हंसते हुए शरारत से हाथ नचाया, "कोई फायदा नहीं है. लौटकर यहीं आना पड़ेगा."

गाड़ी एक ठिगने से घर के सामने रुकी जिसके आगे 'कामधेनु गोसेवा केंद्र' का पुराना साइनबोर्ड लगा हुआ था. दीवार पर गेरू से एक धुंधली सी गाय बनी हुई थी जिसके पेट पर पिसे चावल की उड़ती सफेदी हथेलियों के रूप में छपी थी. गाय जादुई लग रही थी क्योंकि वह मिट्टी की दीवार में उभरे ढेलों और लीपे गोबर की चिटकी पपड़ियों में कभी अदृश्य हो जाती थी कभी दिखने लगती थी. धामा ने लड़कों को बाहर छोड़ दिया था जो किसी घर में लड़ाई के लिए तैयार किए जा रहे एक नामी मुर्गे को देखने चले गए. वह उसे साथ लेकर घर के दरवाजे के नीचे आधा झुकते हुए भीतर घुसा.

एक संकरी सी दलान पार करने के बाद एक बड़ा सा अहाता था जिसके बीचोबीच तुलसीचौरा था और किनारे की तरफ नीम और आम के दो छोटे पेड़ थे. सबसे दूर के कोने में लौकी की गझिन लतर से ढकी हुई एक मड़ई थी जिसके बाहर जांघिया पहने एक आदमी छोटी सी झिलंगी खटोली में करवट लेटा हुआ था. उसके सिरहाने एक हैंडपंप था जिससे लटकता एक रेडियो अपनी आवाज को पाता-खोता बजे जा रहा था. मड़ई में एक औरत ढिबरी की रोशनी में पहसुल से तरकारी काट रही थी. उन दोनों के बीच एक बच्चा, जिसकी करधनी में घुंघरू लटक रहा था, प्रफुल्ल चौपाए की तरह आवाजाही कर रहा था. जैसे उस औरत से आंखे मिलना ही संसार का मजेदार आश्चर्य हो. बच्चा औरत के पास जाकर अपनी नन्हीं मुट्ठी से उस पर धूल फेंकता, वह देखती तो हर मसूढ़े से हंसता हुआ नाटकीयता के साथ गिर पड़ता. लौटकर आदमी के ऊपर धूल डालता लेकिन कोई प्रतिक्रिया न पाकर वह खटोली की पटिया को झकझोरते हुए जरा देर झूलता और वापस लौट आता.

पता नहीं यह हरियाली से छनकर आती मद्धिम रोशनी की नरमाई थी, तुलसी की उनींदी पत्तियां या बच्चे के आसपास उफनती प्रसन्न उर्जा, उस अहाते को देखकर गरीबी के गोपनीय सौंदर्य के बारे में दो चार बातें करने का मन करता था.

धामा चेरो अपनी उपस्थिति की सूचना देने के लिए 'कोई है तो नहीं' कहकर खंखारता हुआ खटोली पर खाली जगह में बैठ गया और उसे औरत की बगल में रखी मचिया पर आग्रह करके बैठाया. बच्चे के चकित होकर एक जगह रुक जाने से चुप्पी फैलने लगी जिसमें पहसुल पर बजती चूड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी. वह आदमी धामा चेरो को अधिक जगह देने के लिए अपनी खटोली में सिकुड़ गया.

धामा ने नशे में मचलते हुए सिर हिलाकर औरत की ओर इशारा किया, "सर, ठीक है?"

रिपोर्टर चुपचाप औरत के आलता लगे पैरों और बच्चे को देखे जा रहा था जो आंखे फाड़े लगातार दूर खिसकता जा रहा था.

धामा भारी सांस लेकर उठा, झोपड़ी के भीतर गया और ढिबरी को लाकर औरत के सामने रख दिया. नाक की लौंग चमकने लगी, भरे सांवले गाल दिखने लगे जो रह रह कर कांप जाते थे. उसने वापस खटोली पर बैठते हुए कहा, "अब देखिए सर." और निचला होंठ दबाते हुए चिंतित ढंग से कहा, "चलेगी!"

रिपोर्टर ने पहले ऐसी औरतें देखी थीं लेकिन पहली बार देख रहा था कि वे किसी अजनबी के साथ हमबिस्तर होने के ठीक पहले क्या कर रही होती हैं. इस छोटे से परिवार को देखते हुए उसे वह सादा सा मनोरम अहाता भयानक लगने लगा. उसके रूख का इंतजार करते धामा ने खंखार कर गला साफ करते हुए कहा, "अपनी पार्टी के बहुत बड़े नेता हैं. चुनाव के टिकट का हिसाब-किताब देखने दिल्ली से आए हैं. सीमेंट फैक्ट्री के गेस्टहाउस तक जाना पड़ेगा."

वह चुपचाप अपना काम करती रही.

"कहीं ऐसे इलेक्शन लड़ा जाता है. सेवा करिएगा तब न मेवा मिलेगा."

इस बीच बच्चा सरकते हुए पास चला आया था. औरत ने उसे दूर हटाते हुए कहा, "इसको कौन देखेगा?"

"सब उसी के लिए तो हो रहा है. थोड़ा त्याग तो करना पड़ेगा."

"अभी तो खाना भी नहीं बना है. पहले इसको सुलाना होगा."

"किसी और को बुलाइए, जल्दी कीजिए, हम लोग यहीं बैठे हुए हैं."

औरत ने हैंडपंप चलाकर तरकारी धोई. बच्चे को गोद में उठाकर कई बार बेचैनी से बाहर गई और आई. अंततः उसने बच्चे को जमींन पर रखकर, ढिबरी हाथ में लेकर ताना मारते हुए कहा, "नेताजी आप समझते नहीं हैं, आंटी जी आई हुई हैं."

"धत्तेरे की, पहले न कहना चाहिए था. इतना नखरा क्यों कर रही थी. " दोनों उठकर बाहर निकल गए.

दरवाजे के बाहर टाउन एरिया की सदस्य खड़ी मिल गई. वह इंतजार ही कर रही थी. उसने नया पान खा लिया था. वह हंसी तो धामा ने कहा, "नेताइन यहां तो गड़बड़ हो गया. देखिए आपके दरबार में कुछ है, दिल्ली से साहेब आए हैं. "

उसने पीठ पर हाथ बांधकर, धामा के साथ धीरे धीरे चलते हुए कहा, "नेता, आज चेकपोस्ट पर बहुत माल आया हुआ है. आपने उसका पिहान जितना भारी पिछवाड़ा नापने में बहुत देर लगा दिया. सब लड़कियों को ट्रक वाले लेकर चले गए, इस समय एक भी नहीं बची है."

राजनीति में आमतौर पर दो तरह की महिलाएं पाई जाती हैं. एक वे हैं जिनके नाम के तुरंत बाद कोई न कोई भारी भरकम केयर आफ लगा होता है. ग्राम प्रधान से लेकर संसद तक के ज्यादातर पदों पर वही हैं लेकिन उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है. वे किसी न किसी संपन्न प्रभावशाली की पत्नी, भाभी बिटिया या चाची हैं. उनके लोहे में बेंट किसी और का लगा है. वे विभिन्न आकार प्रकार की गद्दियों पर रखी किसी पुरुष की खड़ाऊं से शक्ति पाती हैं. वे राजनीति में अपने लिए नहीं किसी और के लिए होती हैं. उन्हें मजबूरी को नारीसुलभ त्याग बताकर फुसलाए रखा जाता है. दूसरी वे हैं जो आगे बढ़ने के लिए किसी न किसी प्रभावशाली की केयर ऑफ होना चाहती हैं लेकिन सिर्फ अपने लिए राजनीति में आती हैं. उनके बीच प्रतिस्पर्धा कितनी तगड़ी होती है इसका अंदाजा जाड़ों की दोपहर किसी राजनीतिक पार्टी के दफ्तर के लॉन में खड़े होकर लगाया जा सकता है जहां नेताजी लोग गाजर का हलवा, चूड़ामटर, तिलकुट, कोरमा, नहारी, कबाबादि की खुशबुओं और खिलखिलाहटों से घिरे कबूतरों की तरह कटोरदानों से टूंगते रहते हैं. इन औरतों को पता रहता है कि किस नेताजी को उनके हाथ का क्या पसंद है और बगलवाली के कटोरदान को ठेलकर अपना आगे करने का कौशल आता है. घरों में दमन के माहौल और व्यक्तिगत गरीबी से बचने के लिए वे अपनी देह को राजनीति की सीढ़ी बनाने को तैयार रहती हैं. जो बड़े शहरों की राजनीति में बंद कमरों में होता है वह इस पिछड़े इलाके के जंगल में खुलेआम हो रहा था.

ये दोनों औरतें अब प्रतिद्वंदी थी. धामा पहले दोनों को नेताओं, अफसरों और पुलिस वालों के पास भेजा करता था. एक टाउन एरिया की सदस्य बनने में कामयाब हो गई थी, दूसरी होना चाहती थी लेकिन धामा के झांसों से उसका भरोसा डोल गया था. रिपोर्टर उनकी राजनीति का शिकार हो गया था. टाउन एरिया वाली नेताइन की दीवार पर एक बहुत पुराना पोस्टर लगा था जिसमें एक किसान नेता के फोटो के नीचे लिखा था- 'भारत की तरक्की का रास्ता गांवों के खेत खलिहानों से होकर जाता है'. उसने मन ही मन एडिट किया जिससे नारा चुस्त हो गया, 'औरतों की तरक्की का रास्ता देह से होकर जाता है'.

धामा चेरो ने हाथ जोड़कर, अचानक एक अजनबी हंसी हंसते हुए उससे सटकर कहा, "हम समझ गए सर, आप धर्मात्मा आदमी हैं. आपका इस नेतानगरी से कोई लेना देना नहीं है. चलिए चलकर अब रामलीला देखा जाए."

नेताइन ने रिपोर्टर से मुखातिब होते हुए धामा चेरो के आगे लगभग आरती की मुद्रा में हाथ घुमाते हुए कहा, "आप तो बम्भोला हैं. आप के लिए तो गाय और औरत बराबर है. आपका बस चलता तो हर वोटर को औरत बांटते. लेकिन...उसने हाथ उठाकर दो उंगलियों के बीच झिरी बनाई...इतनी मिलेंगी कहां. भगवान की दया से मिल भी गयीं तो उनके घरों में जो पहले से बैठी हुई हैं गदर काटने लगेंगी."

"अरे भाई मुझे गेस्टहाउस जाना है. बहुत देर हो चुकी है." रिपोर्टर ने उकता कर कहा.

धामा ने एक साथ हंसते और उसे अनसुना करते हुए कहा, "होने दीजिए, आज मेरे यहां रुक जाइएगा. वहां जाकर भी सोना ही तो है."

हां सोना ही तो है, सोया तो कहीं भी जा सकता है, सोचते हुए वह उसके पीछे चल पड़ा.

***

पलाश औऱ तेंदू के पेड़ों के बीच एक खलिहान में दर्शक चादरों, गमछों में लिपटे बैठे थे. ऊपर एक ओस से भीगी, काफी छोटी, पुरानी चांदनी थी जो उन्हें छांव दे पाने में असमर्थ थी. किनारों पर साइकिलों पर टेक लगाए लड़के खड़े थे. हवा में गांजे की गंध थी जो एक पेड़ के नीचे ट्रैक्टर जैसी आवाज करते जर्जर जनरेटर से उठती लग रही थी. मंच पर एक फटा पर्दा तना था जिस पर शहर छपा हुआ था. चौड़ी सड़क के किनारे ऊंची इमारतें, ऊंचे फव्वारे, बसें और रेस्टोरेंट थे जिनके बीच एक लड़का और लड़की हाथ थामे चल रहे थे. सबके ऊपर एक हवाई जहाज उड़ रहा था.

तीन हैलोजन लाइटों के केंद्र में गुड़हल की दो पतली मालाओं और एक चमकीली पन्नी लिपटे धनुष के सहारे सीता स्वयंवर का दृश्य चल रहा था. हारमोनियम पर बैठे व्यास गलत बोले गए संवादों को अभिनेताओं से भी ऊंची आवाज में ध्वनित उदारता से सुधार रहे थे. परदा राजा जनक के दरबार का वातावरण बनाने या रामलीला को आधुनिक रूप देने के लिए नहीं बल्कि मंच का ठाठ खड़ा करने की जरूरत से लगाया गया था. यह वैसा ही था जैसे नई जरूरतों के दबाव में जंगल में बसे गांवों की जिंदगी बेमेल खिचड़ी हुई जा रही थी. यहां सबकुछ कामचलाऊ जुगाड़ से चल रहा था.


गाड़ी हिचकोले खाते हुए सीधे मंच के पास जाकर रुकी. चारो तरफ से बच्चे दौड़े, अभिनेता अपनी जगहों पर ठिठक गए और स्वयंवर थोड़ी देर के लिए थम गया. हारमोनियम छोड़कर व्यास धामा चेरो का स्वागत करने के लिए लपके. उसे तुरंत मंच पर ले जाकर, स्टैंड से माइक निकाल कर थमा दिया गया.

वह लाइट से चौंधिया कर थोड़ी देर आंखे झपकाते हुए, हाथ की ओट बनाकर दर्शकों में से कुछ को पहचानने की कोशिश करता रहा. उसने गला साफ करने के बाद एक छोटा सा भाषण दिया, बड़ी खुशहाली की बात है कि इस साल रामलीला हो रही है. बीच में कई साल टूट गई थी. कोई पुछत्तर नहीं था. बड़ा प्रयास करके हम लोगों ने दोबारा चालू करवाया है. लेकिन हम देख रहे हैं स्थिति सही नहीं है. पंडित जी बता रहे हैं, परुसराम मुनि का चोगा फट गया है, लक्ष्मण और भरत दोनों भाईयों के लिए कपड़ा बनवाना जरूरी है. हनुमान जी का गदा पिचुक गया है. कई सरुप तो ऐसे हैं जो पोशाक नहीं होने के कारण मंच पर आते ही नहीं हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. जो लोग रावणी सेना में हैं, उनको कौन साजबाज की जरूरत है. वो लोग तो जो पहने हैं वही पहन कर बिना शरम के पार्ट खेल सकते हैं. बताया गया है कि और भी कई सामान की जरूरत है ताकि रामलीला को अच्छे से चलाया जा सके. मैं अपनी ओर से रामलीला के हर प्रमुख कलाकार को पांच सौ रुपया की सहायता दे रहा हूं. आप जानते हैं कि पिछला चुनाव में हम सिर्फ तीन हजार वोट से पिछड़ गए थे. एक साल में फिर चुनाव होने वाला है. इस बार पार्टी का टिकट मिलेगा और आप लोगों की कृपा से जरूर मिलेगा. किसी विरोधी की चाल नहीं चलने दी जाएगी. आपका आशीर्वाद रहा तो मेला, ठेला, मनोरंजन में किसी चीज की कमीं नहीं होने दी जाएगी.

उसने दर्शकों की तालियों के बीच हाथ जोड़कर मंच का एक चक्कर लगाया. इस बीच मंच के आगे दो कुर्सियां लाकर रख दी गई थीं.

साजिंदे जनरेटर के पीछे से चिलम का दम मारकर वापस अपनी जगह लौट आए थे. स्वंयवर फिर से शुरू हो गया. कुर्सियों पर धामा और उसके मेहमान पत्रकार को बिठाया गया. वे दोनों राजा जनक के दरबार में शिवजी का धनुष तोड़ने की जुगत में लगे विदूषक राजाओं को जनता की अपेक्षानुरूप बनावटी गंभीरता से देख रहे थे. रिपोर्टर को महसूस हुआ कि उसके गंभीर होने की जरूरत नहीं है. धामा को चुनाव लड़ने के लिए छवि की चिंता होगी लेकिन वह तो बाकी जनता की तरह हंस सकता है. थोड़ी देर पहले उसने अहाते में जो स्वयंवर आयोजित किया था, क्या वहां कोई अदृश्य धनुष था जिसे वह तोड़ने में चूक गया था या धामा अपने साथ किसी को भी लेकर जाता तो उस सांवली औरत का रवैया वही होता. तभी मोटरसाइकिल से एक सिपाही प्रधान को खोजता हुआ आया. उसे देखते ही उसने कहा, "आप आराम से बैठकर रामलीला देखिए. किसी चीज की जरूरत हो तो लड़कों से बोल दीजिएगा. मैं एक घंटे में थाने से होकर आ रहा हूं."

रिपोर्टर को काफी देर से अपनी कनपटी पर सनसनी महसूस हो रही थी जैसे कोई उसे लगातार ताड़ रहा हो. उसने बेचैनी से घूमकर दर्शकों की ओर देखा. रेडियो वाला बैगा गोद में एक बच्चे को लिए, भीड़ में सरकता हुआ उसकी कुर्सी के पाए के पास आकर बैठ गया. बच्चे ने उसकी तरफ मुट्ठी तानकर उंगलियां खोलीं. बैगा ने कहा, "ए बाबू सोचे कि इसको रामलीला दिखा दें. पता नहीं कितने दिन जिंदा रहे!"

"क्यों, अभी तो यह पैदा ही हुआ है."

"ऊपर की तरफ दांत आ गया है न. बहुत बड़ा असगुन है, " उसने बच्चे का मुंह ऊपर उठाते हुए कहा, जानते हैं नेताजी थाने क्यों गए हैं. आज बहुत ज्यादा गाय आई है. बड़ा हत्यार है. नदी पार करवाने गया होगा, आप इस बारे में अपने अखबार में क्यों नहीं लिखते हैं?"

वह झेंपना चाहता था. रिपोर्टरों को लंबे अभ्यास से अपराधबोध को हैरानी में बदलने की महारत हासिल हो जाती है. उसने आंखे फैलाकर कहा, "अच्छा!"  और बच्चे को देखकर मुस्कराया, "क्या पता इस शैतान के कारण किसी की जान बच जाए."

इस बीच विकास आकर धामा की खाली कुर्सी पर बैठ गया. वह बैगा की ओर देखकर हंसा तो उसने चिढ़कर कहा, "गौसेवक नाम तो भरमाने के लिए रखा है. असली काम तो गाय गोरू को बंगाल पठाने का है."

बैगा अपनी घुटी हुई सांसों और नाराजगी से धामा के बारे में जो बताना चाह रहा था, वह सामने ही यहां वहां बिखरा हुआ था. उसने बच्चे को हथेलियों पर तौलते हुए कहा, "बहुत अब्बर हुई तो भी एक गाय अढ़ाई तीन कुंटल से कम नहीं पड़ती है और उसका मांस बहुत सस्ते से सस्ते डेढ़ सौ रुपया किलो बिकता है...ए बाबू जरा सोचिए कितना पैसा आता होगा."

"तो तुम भी यही करो, सब झंझट खत्म हो जाएगी", उसने पीछा छुड़ाने के लिए कहा.

वह रिपोर्टर की तरफ माड़े वाली आंख उठाकर लाचारी से हंसा, "यही करना होता तो तीन साल से भिखमंगे की तरह एक बैल मांग रहे होते, हम अपने नेमधरम पर ही ठीक हैं."

धामा काफी देर बाद मोटरसाइकिल से लौटकर आया. रामलीला खत्म होने की ओर थी. कम दर्शक बचे थे और पात्रों की आवाजों में नींद सुनाई दे रही थी. चांदनी रात ओस से भीगकर गझिन और भारी हो चुकी थी. उसके पीछे लंबी लाठी लिए एक बूढ़ा बैठा था. दोनों के बीच में, गोल मटमैली टोपी के ऊपर फटा हुआ मफलर बांधे एक पंद्रह साल का दुबला सा पीला लड़का दुबका हुआ था. उसकी भयभीत आंखे जाने कहां टंगी हुई थीं, वह सब कुछ देखते हुए भी जैसे कुछ नहीं देख रहा था.

बूढ़े के चेहरे पर कुछ प्रेत जैसा भाव था. गहरी आंखों और घनी मूंछों के नीचे उसके सफेद दांत देखते हुए अचानक लगने लगता था जैसे खोपड़ी हंस रही है. उसकी हड्डियां काफी चौड़ी थीं, वह घुटनों से ऊपर बंधी धोती और झक्क सफेद कुर्ता पहने हुए था. वह करीब आया तो रिपोर्टर उठकर खड़ा हो गया क्योंकि उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी थी.

सर, "ये हमारे कार्यकर्ता हैं. घर के झगड़े में पुलिस ले आई थी. इन्हीं को छुड़ाने गए थे." वह हंसा, "बताइए इस उमर में लाठी से दो आदमियों का सिर खोल दिया था."

रिपोर्टर ने लड़के को देखा जो झुककर जमींन पर कुछ खोजते हुए मिट्टी के ढेले उठा रहा था. बैगा उससे कुछ पूछ रहा था. वहां मौजूद लगभग सभी की आंखे उसी एक पर टिक गई थीं. वे उसे हैरानी से पहचानते हुए कानाफूसी करने लगे थे. धामा ने कहा, "सर, गौशाला का नया स्टाफ है. पांच हजार पर रखा है. यही लाए हैं"

बैगा ने लड़के से पूछा, "तुम इन ढेलों का क्या करोगे?"

"पेशाब...इस्तिन्जा करने के लिए है ", लड़के ने हकलाते हुए कहा.

बैगा बूढ़े घूरते हुए बड़बड़ाने लगा, "अच्छा तो धर्म का पक्का मियां खोजकर ले आया है."

बूढ़ा पेड़ों के बीच चला गया. वह लौटा तो उसके हाथ में किसी झाड़ी की तीन लंबी टहनियां थीं. उसने टहनियों को उमेठ कर अपनी लाठी को गाड़ी की छत पर लगेज कैरियर से बांध दिया. विकास ने उत्सुकता से जांच कर देखा, लाठी अपनी जगह से हिल नहीं रही थी.

धामा ने पूछा, "नदी में कितना पानी है!"

"यही पोरसा भर होगा. बंधे की गाद भर गई है. इस बार ज्यादा पानी नहीं है," बूढ़े ने कहा.

तभी भीड़ में शोर उठा. बैगा झुक कर दोहरे हुए जाते लड़के की गरदन पकड़ कर धक्का देते हुए चिल्ला रहा था, "अरे, भागो ससुर, जल्दी भाग यहां से! पैसा के लिए जान देने चले आए हो. कुछ होश है तुमको, कल नहीं तो परसों तक पुर्जा पुर्जा उधिया जाएगा तुम्हारा!"

लड़का लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह फटी आंखों से बैगा को देखे जा रहा था, उसका एक गाल अनियंत्रित फड़क रहा था. भीड़ मंच के आगे से उठकर लड़के की ओर भागी आ रही थी. बैगा की गोद का बच्चा डर के मारे नीचे लटक कर चिघ्घाड़ते हुए रोने लगा.

विकास ने फुर्ती से गाड़ी का पिछला दरवाजा खोला और लपक कर बंदूक निकाल ली. वह बैगा की ओर मुड़ा तो तो धामा ने उसे डपटते हुए बंदूक वापस रखकर जल्दी चलने का इशारा किया. उसने बांह पकड़ कर लड़के को खड़ा किया और गुस्से से बैगा को घूरते हुए कहा, "तो आप मानेंगे नहीं...बहुत नशा हो गया है."

बैगा भीड़ की ओर मुंह करके चिल्ला रहा था, गाय गोरू तक तो ठीक था लेकिन अब आदमी का बच्चा  हतोगे तो कैसे बरदाश्त होगा. कौन कहेगा कि ये ठीक काम है. कह दे कोई. हमारे रहते ये नहीं होने पाएगा. विपत तो यह है कि तीन साल हो गया तुम्हारे डर के मारे कोई नशा नहीं होने पाया. कितने हाथ गोड़ हैं तुम्हारे, लगता है तुम्हीं खोपड़ी में नाच रहे हो. सोचो कितना महुवा बर्बाद हुआ होगा, कितना गांजा फुराया होगा लेकिन कभी मन पर कुछ चढ़ता ही नहीं. आज अगड़धत्त चढ़ा है.

रिपोर्टर और बूढ़ा पहले ही बैठ चुके थे. धामा भी लड़के की बांह थामे हुए गाड़ी में बैठ गया. उसकी कांपती मुट्ठी में इस्तिन्जा के ढेले पिसकर मिट्टी हुए जा रहे थे. भीड़ के शोर को इंजन की आवाज से दबाती गाड़ी झटके से आगे बढ़ गई.

रिपोर्टर को सिहरन हो रही थी जैसे फंदे में आ फंसे किसी जंगली जानवर को गाड़ी में लादा गया हो और उसकी वहीं बलि दी जाने वाली हो. विकास भी बैगा के चिल्लाने के पीछे अचानक भीड़ के झपट पड़ने से हड़बड़ा गया था जिसका अंदाजा उसकी भारी सांसों से हो रहा था. कुछ दूर चलने के बाद गाड़ी चकरोड काट कर बनाई गई एक नाली में उछली. आगे बैठा बूढ़ा डैशबोर्ड पर गिर पड़ा. उसका सिर हल्के से शीशे से जा टकराया था. विकास ने गाड़ी रोक दी ताकि वह सीधा हो सके.

बूढ़े ने सीट पर पैर रखकर देखा, घुटना फूट जाने से खून बह रहा था. वह थोड़ी देर बहते खून को देखता रहा फिर जीभ से सपड़ सपड़ करते हुए चाटने लगा. उसकी गहरी आंखें चांदनी में टिमटिमा रही थीं, चेहरे पर खोपड़ी जैसी हंसी खिल गई थी.

इसी बीच धामा के बगल में बैठा लड़का दरवाजा खोलकर भाग निकला था. उसकी तरफ सबका ध्यान तब गया, जब धामा ने चिल्लाकर विकास से उसे पकड़ने को कहा लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. वह चांदनी रात में सरपत के बीच खरगोश की तरह लड़खड़ाता, उछलता दिखाई दे रहा था. सीट पर एक मुट्ठी धूल बची थी. उसके पीछे भौंकते कुत्तों के साथ दौड़ती, रामलीला के दर्शकों की एक छोटी सी भीड़ 'भाग, पट्ठे भाग' चिल्ला रही थी.

धामा अपने गुस्से को छिपाकर अचानक संयत हो गया. उसने कपट की अधिकता से हल्की हो गई आवाज में कहा, "देख रहे हैं सर...आप भी देखते जाइए. याद करिएगा...लोग पांच हजार की सैलरी पर रखे गए आदमी को भी बहका दे रहे हैं और कहेंगे कि बेरोजगारी है."

रिपोर्टर ठठाकर हंसना चाहता था लेकिन सख्ती से मुंह बंद किए हुए बैठा रहा. यह सख्ती उसके व्यक्तित्व में जाने कब से समाई हुई थी जिससे उसकी नौकरी और जिंदगी चल रही थी. उसने लौटकर उसी सख्ती से नदी के पानी का रंग लिखा, सूखते आम के पेड़ों का दुख लिखा लेकिन कभी इस घटना और धामा चेरो के असली कारोबार का जिक्र नहीं किया क्योंकि वह अब इस जंगली इलाके में उसके लिए खबरों का स्रोत और गर्व करने लायक हर तरह से संपन्न सेवक था.

***

थोड़ी देर में भोर होने वाली थी. बांसों के झुरमुट और काफी बड़े सहन के बाद धामा चेरो का बारह खंभों के ओसारे वाला सफेद घर रहस्यमय लग रहा था. शायद दीवारों पर ताजा चूना किया गया था. एक पंपिंग सेट था जिसके पास ट्रैक्टर, एक कार और दर्जन भर मोटर साइकिलें खड़ी थीं. सहन में पांच भैंसे और दो ऊंचे बैल बंधे थे जिन्हें ओस से बचाने के लिए पीठ पर बोरे डाले गए थे. किसी विदेशी नस्ल का एक ऊंचा भारी कुत्ता था जो किसी बुजुर्ग की तरह एक बार उठकर खांसा और अन्यमनस्क भाव से चलते हुए दूर जाकर बैठ गया.

बूढ़े के करीब पहुंचते ही जानवर भयभीत होकर फुफकारने और खूंटे से बंधी रस्सियां तुड़ाने लगे. हवा भारी हो गई. बूढ़े ने उनकी ओर बढ़कर पैर पटका और तेजी से ओसारे के किनारे की एक कोठरी के दरवाजे की सांकल उतार दी.

धामा ने टार्च जलाई तो रोशनी के घेरे में आई चीजें चमकने लगीं. वहां पुराने पोस्टरों के बंडल, तुड़े मुड़े बैनरों के ढेर, सैकड़ों की संख्या में धनुष, तीर और चमकीली पन्नियां लगे तरकश, गाड़ी की बैटरियां, टायर, साइन बोर्ड, खाली बोतलें, फावड़ा और कई तरह के रिंच पिलास फैले हुए थे. बूढ़े ने लंबी बांहों में भर कर कई बोझ धनुष एक तरफ फेंके जिनकी खड़खड़ाहट से लंबी दलान देर तक गूंजती रही. नीचे विभिन्न आकार प्रकार की सींगे थी धूल में लिथड़े नकली बालो के गुच्छे थे. उसने छांट कर सींगों का एक ढेर लगाया. बालों के गुच्छों को सतर्कता से झाड़कर साफ किया. इन सबको एक बोरे में भरा और सिर पर लादकर बांस के झुरमुट से होता हुआ जंगल की ओर जाते रास्ते पर गायब हो गया.

पेड़ों के नीचे चांदनी में उसकी लुकती छिपती पीठ को देखते हुए धामा ने कहा, "ऐसे कलाकार अब नहीं मिलते."

बूढ़ा वाकई बीते जमाने का एक दक्ष और क्रूर कलाकार था. वह गाय, बैल और भैंस की शक्ल बदलने का माहिर मेकअप-मैन था. वह सींगों को छोटा-बड़ा करके, उनका हुलिया ऐसा बदल देता था कि उन्हें बरसों तक पालने वाला आदमी भी धोखा खा जाता था. थन फुलाकर बकेन गायों को दुधारू बनाना, कानों का आकार और आंखों का रंग बदलना, कुछ ही घंटों में उन्हें चाटने या मारने की नई आदतें लगा देना उसके लिए बायें हाथ का काम था. वह ठसाठस भरे ट्रक में गाय बैलों को लगभग सुन्न करके कई दिनों तक चुपचाप खड़ा रख सकता था. वह उनके थूथन को सल्फ्यूरिक एसिड से जला देता था, नाजुक अंगों में मिर्च की बुकनी झोंककर बिल्कुल अनुशासित रखता था. वह मनुष्य और जानवर के बीच की कोई रहस्यमय पुरातन प्रजाति था जिस इस कारोबार में बहुत सम्मान था.

धामा का मकान एक बहुउद्देश्यीय इमारत था, इस समय जिसके कमरों में कई किस्मों के लोग सोए हुए थे. उनकी सांसे और खर्राटे सुनाई दे रहे थे.

असली घर तो अंदर एक आंगन से लगा हुआ था तीन चार कमरों का हिस्सा था. दोनों के पहुंचने पर उसकी पत्नी बरामदे में रखी डाइनिंग टेबल पर एक शीशे का जग और दो गिलास रख गई. धामा ने मेज पर रखी मंहगी व्हिस्की की बोतल से पैंग बनाए. उसकी पत्नी भीतर से लाई गई, चमाचम क्राकरी में भुने हुए काजू, पिस्ते, नमकीन और तली मछली के टुकड़े रखती जा रही थी. रिपोर्टर ने गिलास उठाते हुए प्रशंसा से कहा, "आपका रहन-सहन तो बहुत अच्छा है."

धामा को जैसे चोट लगी हो. उसने बच्चे की तरह चांदनी में हाथ फैलाकर शिकायत से कहा," च्च! जंगल में मोर नाचा किसने देखा !"

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(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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