advt

मैंने कभी धर्म और जाति के आधार पर पूछा क्या? जवाब है "कई बार पूछा" — रवीश कुमार

दिस॰ 23, 2019

लोकसभा और राज्य सभा में जब यह बिल लाया गया तो चर्चा में प्रधानमंत्री ने भाग लिया? जवाब है नहीं. क्या चर्चा के वक्त प्रधानमंत्री सदन में थे? जवाब है नहीं. क्या प्रधानमंत्री ने बिल पर हुए मतदान में हिस्सा लिया? जवाब है नहीं. क्या आप यह बात जानते थे या मीडिया ने आपको यह बताया है? जवाब है नहीं. क्या मीडिया आपको बताएगा? तो जवाब है नहीं.
मैंने कभी धर्म और जाति के आधार पर पूछा क्या? जवाब है कई बार पूछा.  — रवीश कुमार

प्रधानमंत्री का रामलीला झूठ 

— रवीश कुमार

अरे' से शुरू होकर ‘रे' पर ख़त्म हो रहे वाक्यों ने प्रधानमंत्री की भाषा को नई गरिमा दी है. तहज़ीब की किताब में ‘रे' का जो मुक़ाम है वो ‘अरे' का नहीं है. ‘अरे' के इस्तमाल के कई संदर्भ हो सकते हैं.' अरे' में आह्वान भी है और ललकार भी. क्रोध भी. रे' के भी हैं लेकिन सुन ओ सखी रे के अंदाज़ से तो प्रधानमंत्री का मतलब ही नहीं था. उनके ‘रे' में दुत्कार है. तिरस्कार है. ‘रे' सड़क की भाषा में तू-तड़ाक के परिवार का है. भारत के प्रधानमंत्री को जनता ने कितना प्यार दिया लेकिन बदले में उन्होंने कैसी भाषा दी है. रामलीला मैदान में उनकी भाषा का लहज़ा नफ़रत तिरस्कार और झूठ से भरा था. उनका भाषण सिर्फ़ भाषा की तहज़ीब के लिहाज़ से जनता को अपमानित नहीं करता बल्कि तथ्यों के लिहाज़ से भी करता है. कई बार समझना मुश्किल हो जाता है कि जिन फ़ैसलों को लेकर हर बार चार सौ सीटें मिलने और विराट हिन्दू एकता के मज़बूत होने की बात कही जाती है उन्हीं फ़ैसलों के बचाव में प्रधानमंत्री की भाषा तू-तड़ाक और अरे-रे की क्यों हो जाती है. क्या यही विराट हिन्दू एकता की सार्वजनिक तहज़ीब होगी? क्या इस विराट हिन्दू एकता के बच्चे घरों में अरे और रे बोलेंगे?



ग़नीमत है प्रधानमंत्री की भाषा मन की बात में जाकर शालीन हो जाती है जैसी एक चाहे जाने वाले लोकप्रिय नेता की होना चाहिए. मगर राजनीति में उनके समर्थकों ने जिस भाषा को गढ़ा है और जब उसकी झलक प्रधानमंत्री की भाषा में दिखती है तो अच्छा नहीं लगता. अपने आलोचकों को मां बहन की गालियां देने वाले कहीं एक दिन घरों में मां बहन या पिता के साथ न बोलने लगें? एक अच्छा नेता अपने समर्थक समुदाय के बीच शालीनता के मानक को भी गढ़ता है. प्रधानमंत्री ध्वस्त कर देते हैं.

मैंने कभी धर्म और जाति के आधार पर पूछा क्या? जवाब है कई बार पूछा. अभी तो पिछले हफ़्ते झारखंड में प्रधानमंत्री उपद्रवियों को उनके कपड़े से पहचानने की बात कह रहे थे. उसी एक चुनाव की सभा में अमित शाह ख़ुद को बनिया कह रहे थे. बहुत पीछे जाएंगे तो प्रधानमंत्री ख़ुद की जाति से वोटर का आह्वान करते पाए जा सकते हैं.

रामलीला के ही भाषण में नागरिकता क़ानून के विरोधियों को वे आसानी और चालाकी से पाकिस्तान परस्त घोषित करते हैं. जब वे कहते हैं कि इन्हें पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और आतंकवाद का विरोध करना चाहिए कि नहीं. ये लोग नागरिकता क़ानून का विरोध कर रहे हैं और प्रधानमंत्री उन्हें आतंकवाद के समर्थक होने के कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. शायद वे अपनी इस बात से उस विराट हिन्दू एकता की समझ बुद्धि के समाप्त हो जाने का एलान भी कर रहे हैं जो उनके हिसाब से उतना ही सोचेगी जो वे कह देंगे. दुखद है. अगर इस बात का इशारा हाथों में तिरंगा उठाए मुसलमानों की तरफ़ है तो यह सिर्फ़ एक छोटा सा तथ्य है. 2008 में न सिर्फ़ छह हज़ार मुफ़्तियों ने आतंक के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे बल्कि दो सौ जगहों पर सभाएं हुई थीं. 2015 में आतंकी संगठन आई सीस की पहुंच जब भारत तक पहुंची तो उसके विरोध में 70 से अधिक शहरों में सभाएं की थीं. दारुल उलूम और अन्य मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने इसका नेतृत्व किया था.

उसी सभा में प्रधानमंत्री ने एक बार नहीं कहा कि देश के ग़द्दारों को गोली मारो सालों को नारे लगाने वाले उनकी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता नहीं हो सकते. उनके नेता और कार्यकर्ता तिरंगा लेकर गोली मारने वाले नारे लगा रहे हैं. जामिया को आतंक का अड्डा बताते हैं. प्रधानमंत्री इन बातों पर चुप रहे और पुलिस की हिंसा और बर्बरता पर भी. यह समझना होगा जिस विराट हिन्दू एकता के नाम पर हर बात पर 400 सीटें मिलने का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाता है क्या उनके सबसे बड़ा नेता उस विराट हिन्दू एकता को यही भाषा संस्कार देना चाहते हैं? जिसमें उनके समर्थक और उनके राज्य की पुलिस भीड़ और हिंसा की भाषा बोले?

रामलीला मैदान में प्रघानमंत्री ने लोगों से कहा कि देश की दोनों सदनों का सम्मान कीजिए. खड़े होकर सम्मान कीजिये. बस मैदान में जोशीला माहौल बन गया. लोग खड़े होकर मोदी मोदी करते रहे. किसी को भी लगेगा कि क्या मास्टर स्ट्रोक है. लेकिन लोकसभा और राज्य सभा में जब यह बिल लाया गया तो चर्चा में प्रधानमंत्री ने भाग लिया? जवाब है नहीं. क्या चर्चा के वक्त प्रधानमंत्री सदन में थे? जवाब है नहीं. क्या प्रधानमंत्री ने बिल पर हुए मतदान में हिस्सा लिया? जवाब है नहीं. क्या आप यह बात जानते थे या मीडिया ने आपको यह बताया है? जवाब है नहीं. क्या मीडिया आपको बताएगा? तो जवाब है नहीं. संसद के बनाए क़ानूनों का खुद उनकी पार्टी कई बार विरोध कर चुकी है. संसद के बनाए क़ानून की न्यायिक समीक्षा होती है. उसके बाद भी विरोध होता है. सुप्रीम कोर्ट भी अपने फ़ैसलों की समीक्षा की अनुमति देता है.

प्रधानमंत्री के भाषण में कई झूठ पकड़े गए हैं. उन्होंने कहा नागरिकता रजिस्टर की सरकार में कोई चर्चा नहीं हुई. यह झूठ था क्योंकि कई बार सदन में और बाहर गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि नागरिकता रजिस्टर लेकर आ रहे हैं. उनकी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में कहीं नीचे किनारे लिखा है. आप जानते हैं कि जनता तक मीडिया घोषणा पत्र की बातों को कितना पहुंचता है. अमित शाह ने अभी तक नहीं कहा कि बग़ैर चर्चा के ही वे संसद में बोल गए कि NRC लेकर आ रहे हैं. प्रधानमंत्री ने एक और झूठ कहा कि कोई डिटेंशन सेंटर नहीं बना है. इस साल जुलाई और नंवबर में ही उनकी सरकार ने संसद में बताया है कि असम में छह डिटेंशन सेंटर बने हैं और उनमें कितने लोगों को रखा गया है. संसद में जवाब की कॉपी सोशल मीडिया में घूम रही है. आप चेक कर सकते हैं कि आपके हिन्दी अख़बारों और चैनलों ने बताने की हिम्मत की है या नहीं.

सारा आधार यही है कि जनता को अंधेरे में रखो और झूठ बोलो. प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में सरासर झूठ बोला है. यह झूठ विराट हिन्दू एकता के खड़े हो जाने का अपमान करता है. झूठ और नफ़रत की राजनीति की बुनियाद पर हिन्दू गौरव की रचना करने वाले भूल गए हैं कि इससे हिन्दू वैभव नहीं आएगा. वैभव आता है सुंदरता रचनात्मकता और उदारता से. अगर आप गौरव और वैभव का फ़र्क़ समझते हैं तो मेरी बात समझ लेंगे वरना मेरे इस लेख की प्रतिक्रिया में आने वाली टी सेल की गालियों को पढ़ें और अपने घरों में आने वाले हिन्दू गौरव का स्वागत करने के लिए तैयार रहें.

(ये लेखक के अपने विचार हैं तथा यहाँ NDTV से साभार प्रकाशित हैं)
००००००००००००००००







टिप्पणियां

टिप्पणी पोस्ट करें

ये पढ़े क्या?

{{posts[0].title}}

{{posts[0].date}} {{posts[0].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[1].title}}

{{posts[1].date}} {{posts[1].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[2].title}}

{{posts[2].date}} {{posts[2].commentsNum}} {{messages_comments}}

{{posts[3].title}}

{{posts[3].date}} {{posts[3].commentsNum}} {{messages_comments}}

ये कुछ आल टाइम चर्चित

कहानी: दोपहर की धूप - दीप्ति दुबे | Kahani : Dopahar ki dhoop - Dipti Dubey

अरे! देखिए वो यहाँ तक कैसे पहुंच गई... उसने जल्दबाज़ी में बाथरूम का नल बंद कि…

जनता ने चरस पी हुई है – अभिसार शर्मा | Abhisar Sharma Blog #Natstitute

क्या लगता है आपको ? कि देश की जनता चरस पीए हुए है ? कि आप जो कहें वो सर्व…

मुसलमान - मीडिया का नया बकरा ― अभिसार शर्मा #AbhisarSharma

अभिसार शर्मा का व्यंग्य मुसलमान - मीडिया का नया बकरा …

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

कायरता मेरी बिरादरी के कुछ पत्रकारों की — अभिसार @abhisar_sharma

मैं सोचता हूँ के मोदीजी जब 5, 10 या 15 साल बाद देश के प्रधानमंत्री नहीं …

साल दर साल

एक साल से पढ़ी जाती हैं

कहानी "आवारा कुत्ते" - सुमन सारस्वत

रेवती ने जबरदस्ती आंखें खोलीं। वह और सोना चाहती थी। परंतु वॉर्ड के बाहर…

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं! — गीताश्री आखिर बाईजी का नाच शुर…

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani

premchand ki kahani  प्रेमचंद के फटे जूते premchand ki kahani — …

हिंदी कहानी : उदय प्रकाश — तिरिछ | uday prakash poetry and stories

उदय प्रकाश की कहानी  तिरिछ  तिरिछ में उदय प्रकाश अपने नायक से कहल…

मन्नू भंडारी: कहानी - अकेली Manu Bhandari - Hindi Kahani - Akeli

अकेली (कहानी) ~ मन्नू भंडारी सोमा बुआ बुढ़िया है।  …

हिन्दी सिनेमा की भाषा - सुनील मिश्र

आलोचनात्मक ढंग से चर्चा में आयी अनुराग कश्यप की दो भागों में पूरी हुई फिल…

गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं! #Gulzar's 10 Marvellous Poems

गुलज़ार की 10 बेहतरीन कविताएं! जन्मदिन मनाइए: पढ़िए नज़्म छनकती है...  गीतका…

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika …

महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi Verma Stories list in Hindi BIBIYA

बिबिया —  महादेवी वर्मा की कहानी  mahadevi verma stories list in hind…