सांता क्लाज हमें माफ कर दो — सच्चिदानंद जोशी #कहानी | Santa Claus hame maaf kar do


उस दिन शायद पहली बार मैंने अपने पिताजी से पूछा था, "बाबा ये हिंदू क्या होता है ?" बाबा हँस दिए थे बस। दूसरे दिन यही बात मैंने जुबेर को बताई थी, तो उसने कहा था, "तू जानता है, मेरे अब्बा मुसलमान हैं और कहते हैं कि मैं भी मुसलमान हूँ।"


अभी बड़े दिन पर डॉ सच्चिदानंद जोशीजी का सन्देश आया जिसमें "सांता क्लाज हमें माफ कर दो" कहानी के पाठ का लिंक था. कहानी सुनते हुए अवाक् था...जिसके ख़त्म होने पर बताया गया कि बाकि का अंश इस शनिवार आएगा. क्योंकि कहानी पूरी तरह सामायिक है,  मुझे लगा कि यह उनकी बिलकुल नई कहानी है. जोशीजी ने बताया कि यह उन्होंने कोई पंद्रह वर्ष पहले लिखी थी. और यह जानते ही कहानी का शब्दांकन पर आना तय किया था. मुझे नहीं पता कि इस कहानी पर पाठकों और हिंदी ने तब क्या कहा था लेकिन यह पता है कि "सांता क्लाज हमें माफ कर दो" ने न सिर्फ़ मेरी आँखों को अब, आज के दौर के रूबरू रखते हुए, नम किया है बल्कि जोशी जी के लेखन के प्रति मेरे सम्मान को भी बढ़ाया है.

भरत एस तिवारी

"सांता क्लाज हमें माफ कर दो"

— सच्चिदानंद जोशी





"सोनू, आज रात को सांता क्लाज आएँगे, तुम्हारे और बिटू के लिए ढेर सारे खिलौने लाएँगे।" पत्नी मेरे दस वर्षीय पुत्र को समझा रही थी। सोनू भी बड़े मजे से अपनी माँ की बातें सुन रहा था। "माँ, सांता क्लाज कौन होते हैं ?" सोनू ने उत्सुकतावश पूछा। पत्नी ने भी उसे बड़े धीरज से हर साल दुहराई जाने वाली क्रिसमस फादर की कहानी सुना दी। सांता क्लाज की पूरी कहानी सुनने के बाद सोनू ने जिज्ञासा प्रकट की-"माँ, ये सांता क्लाज तो ईसाई हुए न, फिर वे हमें कैसे उपहार दे सकते हैं?"

मैं और पत्नी दोनों चौंके। बच्चे ने पहली बार एक ऐसा सवाल किया था, जो वह हर साल नहीं करता था। पत्नी ने उसे बहलाना चाहा-"बेटा, सांता क्लाज ईसाई नहीं होते, वे सभी बच्चों के होते हैं। सभी बच्चों को प्यार देते हैं, उपहार देते हैं। अगर तुम उनके नाम से चिट्ठी लिखकर अपनी मनचाही चीज माँगो, तो सांता क्लाज जरूर तुम्हें वह चीज लाकर देंगे।"

"माँ, अगर सांता क्लाज ईसाई नहीं हैं, तो वे सिर्फ क्रिसमस पर ही क्यों आते हैं, दीवाली-दशहरे पर क्यों नहीं आते ? उस समय मुझे कितनी ढेर सारी चीजें चाहिए होती हैं-पटाखे , खिलौने, कपड़े, मिठाई और न जाने क्या- क्या? पर हर बार मुझे तुमसे कहना पड़ता है। अगर सांता क्लाज दीवाली पर आएँ, तो कितना अच्छा होगा!" बच्चे की जिज्ञासा और तर्क अपनी जगह ठीक ही थे। लेकिन उसकी नई शब्दावली मेरी समझ से परे थी; इससे पहले वह कभी ईसाई शब्द अपनी जुबान पर लाया भी नहीं था। सांता क्लाज हमें माफ कर दो

"अब तुम जाकर सो जाओ और सोने से पहले अपने बिस्तर पर सांता क्लाज के नाम से चिट्ठी छोड़ देना। सांता क्लाज जरूर तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे।" पत्नी ने इस प्रसंग को समाप्त कर, बच्चों को सुलाने की मंशा से कहा। "लेकिन माँ, रवि कह रहा था कि हम हिंदुओं के यहाँ सांता क्लाज नहीं आएँगे।"

"अब तुम चुप करते हो या लगाऊँ एक थप्पड़?" मुझसे नहीं रहा गया और मैंने बच्चे को डपट दिया। दरअसल गुस्सा मुझे सोनू के उस हमउम्र दोस्त रवि की कही बात पर आ रहा था।

सोनू सो गया, पर मैं नहीं सो पाया। सोचता रहा कि आखिर बच्चों का क्या दोष है, चारों तरफ यही सब तो सुन रहे हैं। और जब सुन रहे हैं तो कुछ-न-कुछ असर तो इनके दिलो-दिमाग पर हो ही रहा होगा।

शायद हाई-स्कूल की परीक्षा का फार्म भरना था। उस फार्म में एक कॉलम था धर्म । उस दिन पहली बार मैंने और जुबेर अहमद ने अलग-अलग चीजें भरी थीं उस फार्म में। नहीं तो मकान नंबर और गली नंबर तक एक ही भरा जाता था।

उस दिन शायद पहली बार मैंने अपने पिताजी से पूछा था, "बाबा ये हिंदू क्या होता है ?" बाबा हँस दिए थे बस। दूसरे दिन यही बात मैंने जुबेर को बताई थी, तो उसने कहा था, "तू जानता है, मेरे अब्बा मुसलमान हैं और कहते हैं कि मैं भी मुसलमान हूँ।"

पता नहीं क्यों, उस दिन न जुबेर के अब्बा ने सवाल का सही जवाब दिया, न मेरे बाबा ने। जो हमारे मास्टरजी ने बताया वही हमने भर दिया था उस कॉलम में। उस दिन शायद पहली बार अहसास हुआ था कि मैं हिंदू हूँ और जुबेर मुसलमान। पर यह अहसास क्षणिक ही था। जुबेर का साथ कॉलेज तक रहा। उसके बाद जुबेर फौज में भरती हो गया और मैं बैंक में नौकरी करने लगा। लेकिन उस दिन से आज तक होली, दीवाली, ईद कोई भी त्योहार जुबेर के बिना नहीं मना। ईद और दीवाली दोनों पर ही हम लोग नए कपड़े सिलवाते और डटकर मौज-मस्ती करते । नौ दुर्गा के हमारे आनुष्ठानिक भोज में ब्राह्मण देवता की पालथी से पालथी सटाकर बैठा करते थे जुबेर अहमद और ईद पर जुबेर के अब्बा की पहली ईदी पर हक मेरा होता था।

मजे की बात तो यह थी कि यह सब करते समय हमें ऐसा नहीं लगता था कि हम इस दुनिया से कुछ अलग कर रहे हैं। सिर्फ परीक्षा या दाखिले के फॉर्म जमा करते समय ही याद रहता था कि जुबेर अहमद उस कॉलम में इसलाम भरता है और मैं हिंदू।

और आज मेरा यह दस साल का लड़का सशंकित है कि सांता क्लाज उसके घर नहीं आएँगे, क्योंकि वह हिंदू है। यह क्या हो गया है? कल को ताजिए के नीचे से निकलते समय भी क्या यह यही सवाल दुहराएगा?

XXX

सांता क्लाज तैयार है अपनी यात्रा के लिए। उसे ढेर सारे बच्चों को मिलने जाना है। उसने सभी बच्चों के लिए नए-नए उपहार रखे हैं। ढेर सारी चॉकलेट, बिस्कुट और न जाने क्या-क्या भरा है उसके थैले में।
लेकिन शहर की फिजा खराब है। शहर में कयूं लगा हुआ है। उसे मालूम है कि उसके पास समय कम है। पर उसे इस बात की भी चिंता है कि कहीं कोई बच्चा छूट न जाए। कम-से-कम सभी बच्चों को 'मेरी क्रिसमस' तो कह ही दें। ऐहतियात के तौर पर उसने कप! पास भी बनवा दिया है।

सांता क्लाज तेजी से कदम बढ़ाता चला जा रहा था कि गश्ती सिपाहियों ने उसे रोक लिया।

"ऐ बुड्ढे ! कहाँ जा रहा है?"
"बच्चों के पास जा रहा हूँ भाई। मैं सांता क्लाज हूँ।"
"कौन सांत क्लाज? अब साले अँगरेजी नाम बताकर रोब झाड़ना चाहता है।'' पुलिसवाला गुस्से में बोला। उसने सांता क्लाज को एक डंडा जमा दिया।
"जरा साले का हुलिया तो देख।" दूसरा पुलिस वाला बोला।
"ऐसे ही तो भेस बनाकर निकलते हैं और फिर लूटपाट मचाते हैं। नींद हम पुलिस वालों की हराम होती है।" तीसरे ने अपनी राय जाहिर की।
"भाई, मेरा यकीन करो। मैं बच्चों में उपहार बाँटता हूँ। कल क्रिसमस है, मुझे बच्चों को उपहार देने हैं, बच्चे मेरा इंतजार कर रहे होंगे।'' सांता क्लाज ने पुलिस वालों से अनुनय-विनय की।
"लो भाई और सुनो। रात के बारह बजे कर्फ्यू में बच्चे इसका इंतजार करेंगे।" एक बोला।
"और तेरे थैले में क्या है ?" दूसरा बोला और सांता क्लाज के उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर उसने थैला छीन लिया।
भाई, मैं सच कह रहा हूँ, मेरा विश्वास करो। इस थैले में सिवाए खिलौनों के और कुछ नहीं है।"
"अबे इसमें तो सचमुच खिलौने हैं।" पुलिस वाले ने अब तक वह थैला सड़क पर उलट दिया था, "क्यों बे, कोई खिलौने की दुकान तोड़कर भागा है क्या? तोड़कर भागा है या जला आया है ?"
"अब मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊँ कि मैं सचमुच सांता क्लाज ही हूँ।" सांता क्लाज हैरान था।
"हम पुलिस हैं भैया, यकीन पर नहीं, सबूत पर जीते हैं। यकीन तो से किसी को किसी पर नहीं रहा अब।" उनमें से एक समझदार था। सबूत सांता क्लाज को उस कप!-पास की याद आ गई, जो उसने जल्दी में जेब में रख लिया था।
"मेरे पास कर्फ्यू-पास है। उसे देखकर तो तुम लोगों को यकीन हो ही जाएगा।" सांता क्लाज ने कहा और कप!-पास पुलिसवालों की ओर बढ़ा दिया। बारी-बारी से तीनों पुलिस जवानों ने उसे पढ़ा और ज्यादा शक की निगाहों से सांता क्लाज को घूरने लगे।
"पर बाबा! पास था तो इसे ऊपर लगाकर रखना चाहिए।"
"पता नहीं था भैया, जिंदगी में पहली बार कप! देखा है न।"
"अच्छा बाबा, यह तो बताओ कि इतनी रात गए तुम कौन से धर्म का काम करने निकले हो?" समझदार पुलिस वाले ने सवाल किया।
"धर्म का काम?" सांता क्लाज भौंचक्का रह गया, "मैं तो सभी से मिलने निकला हूँ। मैं सभी बच्चों-बड़ों को क्रिसमस की खुशियाँ बाँटने निकला हूँ। यह तुझसे किसने कह दिया कि मैं किसी धर्म का प्रचार करने निकला हूँ?" सांता क्लाज ने पूछा। जवाब में पुलिस वाले ने कप!-पास उसकी ओर बढ़ा दिया। उसे पढ़कर सांता क्लाज के सामने पूरा मामला शीशे की तरह साफ हो गया। पास पर यात्रा के उद्देश्य कॉलम में लिपिक महोदय ने 'ईसाई धर्म का काम', लिख दिया था।
"यहाँ लोगों की जान पर बनी है और आप धर्म का काम करने निकले हैं?"
"वो भी रात के बारह बजे।"
"क्या खूब!"

सांता क्लाज धर्मसंकट में पड़ गया। वह उन पुलिसवालों को समझाना चाहता था। लेकिन दूसरी ओर उसे उन बच्चों की भी चिंता सता रही थीं जो उसकी राह देख रहे होंगे।

तभी एक मोटर साइकिल आकर रुकी। मोटर साइकिल वाला इंस्पेक्टर होगा, क्योंकि उसे देखते ही गश्ती टोली अदब-कायदे में आ गई।

"क्यों क्या बात है?" उसने पूछा।

"कुछ नहीं सर, ये बाबा रात को सड़क पर भेस बनाकर घूम रहा था।" एक ने जानकारी दी। इंस्पेक्टर ने सांता क्लाज की तरफ देखा और चौंककर बोला, अरे सांता क्लाज तो क्या क्रिसमस आ गया? पता ही नहीं चला। गश्त लगाते-लगाते तारीखें भी भूल गया हूँ।"

"सर, आप इसे, मेरा मतलब है, इन्हें जानते हैं?" एक पुलिस वाले ने हिम्मत कर पूछा।

"इन्हें कौन नहीं जानता। पर सालो, तुम्हें कैसे मालूम होगी, सांता क्लाज की कहानी। सरकारी स्कूलों में पढ़कर नकल से पास हुए होगे।" इंस्पेक्टर ने अपने सिपाहियों को घुड़की दी, जिसे उन्होंने खीसें निपोरते हुए स्वीकार किया।
"सॉरी फादर सांता क्लाज, हमारे सिपाहियों ने आपको खामख्वाह तकलीफ दी। पर आप तो जानते ही हैं, माहौल ही खराब चल रहा है। आप अब जा सकते हैं।" इंस्पेक्टर ने कहा।

सांता क्लाज ने जल्दी-जल्दी सड़क पर बिखरे खिलौने समेटे और लंबे डग भरता आगे चला गया। उसे बहुत सारे काम जो करने थे।

"सो तो नहीं गया?" सिगड़ी तापते हुए चंदू ने रामू से पूछा।
"नहीं यार, जाग रहा हूँ और अच्छी तरह जाग रहा हूँ।" रामू बोला।
"आज खतरा ज्यादा है। कल आराधना नगर में इसी समय बलवा हुआ था?"
"वैसे अपने यहाँ खतरा तो नहीं है, फिर भी चौकस रहना जरूरी है।" रामू ने कहा और अनायास ही उसका हाथ पास में रखी लोहे की रॉड पर चला गया। चंदू भी चौकन्ना होकर पत्थर के ढेर की तरफ देखने लगा, जो उसने छत पर जमा कर रखा था।
"घड़ी में क्या बजा है?" चंदू ने उबासी लेते हुए पूछा।
"एक बजने वाला है।" रामू घड़ी देखकर बोला और साथ में फिकरा भी कस दिया, "अभी मुझसे पूछ रहे थे और खुद को नींद आ रही है।"
"नींद नहीं यार, बोरियत हो रही है। ऐसा लगता है कि जो कुछ होना एक ही बार में हो जाए। यह रोज-रोज का टेंशन बरदाश्त नहीं होता।"

तभी वहाँ से सायरन बजाती पुलिस की गश्ती जीप निकली। दोनों पेट के बल छत पर लेट गए। डर था कि कहीं पुलिस देख न ले और मदन की तरह वे भी गोली के शिकार न हो जाएँ। बेचारा मदन चौकसी करते समय पुलिस की गोली का शिकार हो गया था।

ठंडी हवा और तेज हो चली थी और कंबल की ऊब भी अब उन्हें ठंड, से नहीं बचा पा रही थी।

"मैं थोड़ा छत पर टहल लेता हूँ, तब तक सुरेश और राजेंद्र भी आ जाएँगे।" चंदू बोला।
"टहलना पर जरा होशियारी से।" रामू ने कहा और तभी उसकी नजर दूर से आती एक आकृति की ओर पड़ी। अँधेरे में कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। रामू उस आकृति के, स्ट्रीट लाइट के नीचे आने तक इंतजार में दम साधे पड़ा रहा। जैसे ही वह आकृति स्ट्रीट लाइट के नीचे से गुजरी, रामू का हाथ फिर उस लोहे की रॉड पर चला गया। उसने इशारे से चंदू को बुलाया।
"क्या हुआ?" चंदू ने पास आकर कहा।
"वो देख, लबादा ओढ़े कोई चला आ रहा है।" चंदू ने भी उस आकृति को देखा और बोला, "चल, नीचे चलकर देखते हैं।"
दोनों छत से नीचे कूदे और ज्यों ही वह आकृति पास आई, रामू ने रॉड जमीन पर ठोकते हुए पूछा, "कौन है ?"
"मैं सांता क्लाज हूँ ?"
"कौन सांता क्लाज? हमारे मुहल्ले में क्या करने आया है?" चंदू ने पूछा।
"भाई, मैं हर साल क्रिसमस की पहली रात को आता हूँ। बच्चों में उपहार बाँटता हूँ।"
"अच्छा-अच्छा, वो सांता क्लाज कहानियों वाला? बचपन में हमने भी खूब कहानियाँ सुनी हैं।" रामू थोड़ा संयत होकर बोला।
"पता नहीं भाई, कैसा माहौल हो रहा है, उधर पुलिस ने रोका, इधर तुम लोगों ने।"
"हम लोग मुहल्ले की निगरानी कर रहे हैं। दो घंटे की शिफ्ट है हमारी।"
"पर भाई, चारों तरफ पुलिस घूम रही है, फिर तुम्हें क्या डर?"
"जब मुसीबत आती है न तो कोई नहीं आता, बाबा। अपनी हिफाजत खुद ही को करनी पड़ती है।" चंदू बोला।
"लेकिन बाबा, तुम इतनी रात गए निकले ही क्यों? जानते नहीं, इतनी रात गए सड़क पर निकलना कितना खतरनाक है।'' रामू ने पूछा।
"मेरे पास कर्फ्यू-पास है।" सांता क्लाज ने बताना चाहा।
"कर्फ्यू पास कोई सुरक्षा कवच है क्या? इससे तो बस मरनेवाले की शिनाख्त करने में आसानी होती है।"
"मेरा आना तो जरूरी ही था, भैया। बेचारे बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे।"
"कौन से बच्चे?" चंदू ने उपहास किया, छोटे बच्चे या तो सो गए होंगे या फिर टी.वी. पर पिक्चर देख रहे होंगे या कंप्यूटर पर गेम खेलने में व्यस्त होंगे। जो बड़े बच्चे हैं-हमारी तरह वे पहरा दे रहे होंगे।"
"और इतनी रात गए तुम्हारे लिए दरवाजा कौन खोलेगा। सभी लोग पूरी किलेबंदी करके सोते हैं। रात-बेरात कोई दरवाजा खटखटाए, तब भी नहीं खोलते।" रामू बोला।
"फिर उन उपहारों का क्या होगा, जो मैं इन बच्चों के लिए लाया हूँ।" सांता क्लाज निराशा से बोला।
"कौन से उपहार लाए हो? तुम्हारे ये खिलौने, टॉफियाँ अब किस काम के हैं ? बम वगैरह लाए होते। एकाध देशी कट्टा ही ले आते। हमारे मुहल्ले में, एक भी नहीं है। अब तुम्हारे उन खिलौनों की किसे जरूरत है ? अब तो चाहिए असली गोला-बारूद, देशी कट्टे, रिवॉल्वर।" चंदू तीखे लहजे में बोला।
"कुछ नहीं तो सोडावाटर की बोतलें ही ले आते फोड़ने के लिए। जाओ बाबा, कम-से-कम आज जो तुम्हारे इन खिलौनों की जरूरत नहीं है। चल चंदू, ऊपर चलते हैं।" रामू ने कहा और वो जैसे कूदे थे, वैसे ही ऊपर चढ़ गए।

XXX

रात को दरवाजे की घंटी बजी। पहले तो लगा कि आभास है, लेकिन जब घंटी लगातार बजने लगी, तब जाकर नींद खुली। इतनी रात गए कौन हो सकता है! आहट लेनी चाही, पर कोई आहट न मिली। हाथ कोने में रखे लट्ठ की ओर बढ़ गए। घर में यही एकमात्र ऐसी वस्तु थी, जिसे हथियार कहा जा सकता था। पत्नी भी हाथ में मिर्ची की पुड़िया लेकर तैयार हो गई थी।
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। मैंने लगभग डपटते हुए पूछा, "कौन है?"
"मैं सांता क्लाज हूँ!'' एक थकी लेकिन प्यार भरी आवाज आई। मुझे यकीन नहीं हुआ, इसलिए दुबारा पूछा, "कौन सांता क्लाज?"
"मैं क्रिसमस फादर हूँ। सोनू ओर बिटू के लिए उपहार लाया हूँ।"
मन में कोई संदेह ही न रहा। लट्ठ एक तरफ फेंककर दरवाजा खोलने लगा। दरवाजे को मजबूती देने की दृष्टि से लगा रखे सोफे, पट्टियाँ, स्टूल हटाकर दरवाजा खोलने में कुछ समय लग गया।
दरवाजे पर सांता क्लाज खड़े थे। वही रूप, वही हुलिया, पर चेहरे की हँसी गायब थी। उसकी जगह था भय, वेदना और थकान।
"फादर सांता क्लाज, आपने बहुत रात कर दी। बच्चे आपका इंतजार करके सो गए।"
जवाब में सांता क्लाज ने अपनी सारी कहानी सिलसिलेवार सुना दी। सुनाते-सुनाते उस ठंड में भी उनका बदन पसीने से नहा गया था।
"अच्छा, कहाँ हैं सोनू और बिटू ? मैं उन्हें उपहार दे दूं। अभी मुझे और भी बहुत जगह जाना है।" अपनी बात खत्म करते हुए सांता क्लाज बोले।
मैं सांता क्लाज को बच्चों के कमरे में ले गया। बिटू तो खैर छोटा था, अतः उसकी माँग का सवाल ही न था, सोनू ने जरूर अपने तकिए के नीचे एक चिट्ठी रख छोड़ी थी।
"सांता क्लाज ने खुशी-खुशी वह चिट्ठी उठाई। उसे पढ़ते-पढ़ते सांता क्लाज के चेहरे का रंग उड़ने लगा।
"क्या हुआ फादर? अगर बच्चे ने कोई ऐसी-वैसी माँगकर दी हो तो आप संकोच न करें, मैं उन्हें समझा दूंगा। आय एम सॉरी, बच्चे हैं। उन्हें इस बात का पता नहीं रहता कि किससे क्या चीज माँगनी चाहिए।" मैं सफाई देने लगा। उत्तर में सांता क्लाज ने वह चिट्ठी मेरे हाथ में थमा दी।
चिट्ठी को पढ़ते ही मेरी सारी विचारशक्ति क्षीण हो गई। चिट्ठी का एक-एक शब्द पत्थर की तरह लग रहा था। सोनू ने अपनी टूटी-फूटी भाषा में जो चिट्ठी लिखी थी, वह हिला देने वाली थी।

फादर सांता क्लाज,

मुझे मालूम है कि आप नहीं आएँगे, क्योंकि मैं तो हिंदू हूँ। पर माँ-बाबा कहते हैं कि आप आएँगे, इसलिए यह चिट्ठी आपको लिख रहा हूँ। क्रिसमस पर मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे इस दिन भर की कयूं नाम की जेल से छुटकारा दे दो। मैं बाहर जाकर खेलना चाहता हूँ। पर माँ-बाबा पुलिस का डर बताकर मना कर देते हैं। आप कुछ देना चाहते हैं, तो माँ-बाबा का खुशी भरा चेहरा दे दो। इन डंडों से, इन पत्थरों से, इन बोतलों से छुटकारा दे दो।

-सोनू


मैं अवाक् खड़ा था। सांता क्लाज भी सिर झुकाए खड़े थे। मैं कर ही क्या सकता था। मैं, सांता क्लाज के हाथ अपने हाथों में लेकर बस इतना ही कह पाया, "गलती हमारी है फादर सांता क्लाज, हमें माफ कर दो।"



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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