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सिगिरिया श्रीलंका तस्वीरें : रावण का वास वहां नहीं तो फिर कहाँ है? | Photos Sigiriya Hills in Sri Lanka where Ravana lived

जन॰ 24, 2020


सिगिरिया श्रीलंका: रावण का वास वहां नहीं तो फिर कहाँ है?

— अंकिता जैन

कौन जाने कि इतिहासकारों के लिखे जिस वर्तमान इतिहास को हम पढ़ रहे हैं उससे पहले भी कोई इतिहासकार इस महल के असल राजा का इतिहास गढ़ गया हो जो अब हमारे लिए कहीं उपलब्ध नहीं. पर क्या लिखे गए कुछ पन्नों के मिटा दिए जाने से भी कभी इतिहास मरता है? 
आप को यहीं बैठे बैठे अगर श्रीलंका में वह जगह घूमने का मन हो जहाँ कभी रावण रहता था, अंकिता जैन का यह सजीव यात्रा वृतांत आप के लिए ... भरत एस तिवारी
 
“श्रीलंका”, विदेशी पर्यटकों के लिए होगा यह एक और वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स से भरा साउथ एशियन देश, मगर भारतीयों के लिए यह हमेशा से ही राम के शत्रु रावण की नगरी रही है. बचपन से दशहरे में रावण को जलता देखते हैं तो रावण और उसकी लंका की कहानियों से कैसे अनभिग्य रह सकते हैं? कैसे यह नहीं मान सकते कि समंदर में कोई राम सेतु नहीं? श्रीलंका में कोई सोने का महल नहीं? कोई अशोक वाटिका नहीं?


सिगिरिया के मुख्य पहाड़ पर चढ़ने से पहले बने सिंह के पैर, जो पहाड़ के पत्थर से ही बने जान पड़ते हैं।

ये सवाल, ये कौतुहल मेरे मन को तब और उत्साहित कर देते हैं जब मैं भारत-भ्रमण के दौरान राम और सीता से जुड़े कई स्थानों पर जाती हूँ. वहां की कहावतों, कहानियों और किस्सों में उनके अस्तित्व पाती हूँ. खैर, यहाँ हम भारत के राम की नहीं, लंका के रावण की बात कर रहे हैं. उसमें भी सिगिरिया की. उस स्थान की जो शायद रावण का घर था. उसका महल था.
अंकिता जैन
अंकिता जैन

यदि ऐसा न हुआ तो? इस पर कितना कुछ टिका होता है. यदि रावण ने सीता का अपहरण न किया होता तो? तो शायद श्रीलंका आज भारतीयों के लिए भी मात्र एक पड़ोसी देश होता. या बोद्ध मतों के अस्तित्व से जुड़ी कोई ऐतिहासिक जगह. मगर ऐसा नहीं है. इतिहासकार भले अपने तर्कों या शौधकर्ता अपनी खोजों से यह कहें कि श्रीलंका के मध्य स्थित “सिगिरिया” को राजा कश्यप ने अपने राजकाल यानि 477 से 495 सेंचुरी में बनवाया था. पर जब आप सुन्दर काण्ड में यह पढ़ेंगे कि रावण का महल त्रिकुट पर्वत पर स्थित था. महल के चारों ओर घना जंगल था. उसके महल तक पहुँचना आसान नहीं था. तब आप पहली नज़र में सिगिरिया को ही रावण का महल मान बैठेंगे. और कौन जाने यह सच भी हो? कौन जाने कि इतिहासकारों के लिखे जिस वर्तमान इतिहास को हम पढ़ रहे हैं उससे पहले भी कोई इतिहासकार इस महल के असल राजा का इतिहास गढ़ गया हो जो अब हमारे लिए कहीं उपलब्ध नहीं. या क्या पता रामचरित मानस रचने वाले कोई घुमक्कड़ ही रहे हों जिन्होंने इन स्थानों को कथाओं से जोड़ दिया? सच सबके पास अपने-अपने हैं.
वे लाल ईंट की दीवारें जिन्हें हरी काई और कत्थई मिट्टी ने अपनी बाँहों में समेट लिया क्या कोई कहानी नहीं कहती होंगी? मैं चाहती थी कि मैं हर एक दीवार को छूकर देख लूँ. वे मुझे आकर्षित कर रही थीं. उनकी बनावट इतनी सुनियोजित थी कि मिट्टी में दबने के बाद भी उनकी सुन्दरता छुप नहीं पा रही थी. 
वैसे वर्तमान में फिर से कई इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता यह साक्ष्य जुटाने में सफ़ल हुए हैं कि सिगिरिया ही वह स्थान है जहाँ रावण रहता था. मिरांडा ओबेसकेरे ने पुरात्तात्विक साक्ष्य को आधार बताते हुए अपनी किताब “रावना, किंग ऑफ़ लंका” में यह लिखा है कि, “यूँ तो रावण का साम्राज्य मध्य श्रीलंका में, बदुल्ला, अनुराधापुरा, केंडी, पोलोन्नुरुवा और नुवारा एलिया तक फैला हुआ था मगर, रावण ख़ुद सिगिरिया में रहता था.” उनका मानना है कि पचास सदी पहले रावण के सौतेले भाई कुबेर ने सिगिरिया पर महल बनवाया था.

गुफा के भीतर बनी पुरातन कलाकृतियां

तो फिर मैं सिगिरिया के “लायन रॉक” और उसके शिखर पर बने किसी महल की कहानी आपको शुरू से सुनाती हूँ. कहते हैं कि लंका में बसे सोने के महल को रावण ने नहीं बल्कि शंकर ने पार्वती के लिए बनवाया था. पार्वती की विशेष चाहत को पूरा करते हुए शिव ने लंका के शिखर पर एक सुन्दर सोने के महल का निर्माण किया. अब नया घर बना था तो गृहपूजा के लिए पंडित को बुलवाया गया. वे पंडित थे रावण के पिता. शंकर उनकी पूजा और भक्ति से प्रसन्न हुए तो वरदान मांगने को कहा. रावण के पिता ने तो सिर्फ प्रभु(शिव) दर्शन को ही अपना वरदान मान लिया, मगर रावण की माता के मन में लालच आ गया और तब उन्होंने वह महल ही वरदान में माँग लिया.


इसे एक काल्पनिक कहानी मानकर यदि यह मान भी लें कि रावण को सोने का महल उपहार में मिला था, तब भी महल का अस्तित्व तो है ही ना. तब भी लंका है ही. तब भी सिगिरिया है ही. तब भी घने जंगलों के बीच पीठ अकड़ाए एक पहाड़ के ऊपर कुछ ऐसे निशान हैं ही जो वहां रावण के महल होने के अंदेशे देते हैं.

पर्वत के शिखर से नीचे का दृश्य


यूँ तो कई जगह बौद्ध इतिहास में यह भी लिखा गया है कि सिगिरिया में कभी कहीं कोई महल था ही नहीं. ना रावण का न कश्यप का. तो फिर वर्तमान में जो हमें वहां दीखता है, वह संरचना जो सुरक्षा की दृष्टि से बड़ी ही कड़क बनी है, वह क्या सिर्फ बौध भिक्षुओं के लिए थी?

नहीं, वह तो राजा कश्यप ने अपने सौतेले भाई मोग्गालाना से बचने के लिए बनाई थी. पांचवीं सदी में श्रीलंका की राजधानी अनुराधापुरा थी. राज था राजा धातुसेन का. उन्हीं के पुत्र राजकुमार कश्यप को जब लगा कि पिता धातुसेन उन्हें नहीं बल्कि उनके सौतेले भाई मोग्गालाना को राजा बना देंगे तो कश्यप ने अपने पिता का वध करके नई राजधानी सिगिरिया ने बना दी. घने जंगल में बीच पहाड़ पर १२१४ फीट ऊंचा यह किला कौन फतह करता? कश्यप ने अपने जिस सुन्दर महल को सात वर्षों में तैयार किया, कड़ी सुरक्षा की तैयारी की उसे अंततः मोग्गालाना ने जीत ही लिया. मोग्गालाना को यह दुःख रहा है कि वह अपने शत्रु अपने सौतेले भाई को मार नहीं पाया क्योंकि कश्यप ने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए शत्रु के हाथों मर जाने की जगह आत्महत्या का चुनाव किया.

पर्वत की खड़ी चढ़ाई जो उसके बाहरी हिस्से पर लोहे की सीढ़ियां लगाकर बनाई गई है


मोग्गालाना के बाद सिगिरिया को बौद्ध मत के एक मठ के रूप में प्रयुक्त किया गया. सिगिरिया की सुन्दरता ही मात्र आकर्षक नहीं थी बल्कि इसकी कठिन पहुँच ने कॅंडीयन सरकार को भी आकर्षित किया जिससे यह सुन्दरतम स्थान सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में स्थल कॅंडीयन राज्य के लिए सैनिक अड्डा भी रहा. बस सिगिरिया की जीवित कथा इतनी ही है. उसके बाद सिगिरिया शनैः शनैः  खंडर होता गया और अब पर्यटन स्थल है.

यह सब तो मात्र जानकारी है. जिससे उस स्थान पर जाने का लोभ पैदा नहीं होता. लोभ तो सिर्फ पैदा होता है रावण के महल को, शेर के उन पंजों को देख लेने में जो हजारों साल पुराने हैं. और उस दंतकथा को सत्य साबित करते हैं जिसके अनुसार रावण के महल में प्रवेश करने के लिए शेर के मुँह से होकर गुज़रना पड़ता था.

बस यही वो कौतुहल था जिसे मिटाने मैं वहां उस पर्वत के सम्मोहन में उसतक खिंची चली गई. सिगिरिया मेरी ग्यारह दिन की श्रीलंका यात्रा का तीसरा पड़ाव था.

महलों के अवशेष

पोल्लोन्नुरुवा से चलकर सिगिरिया पहुँचने से पहले हमें बस उसका नाम पता था. जिला मताले, जिसके अंतर्गत सिगिरिया आता है, पार करके जब हमारा ड्राईवर हमें घने जंगलों के बीच ले जाने लगा तो हम कुछ डर गये. कार में हम तीन लोग थे. मैं, मेरे पति और ड्राईवर. ड्राईवर के अलावा बाकी हम दोनों के पास मात्र गूगल मैप्स ही सहारा था यह जानने का कि हम कहाँ हैं. कुछ देर बाद मुख्य सड़क से तकरीबन ग्यारह किलोमीटर अन्दर हम एक रिसोर्ट में पहुँच गए. कुछ और टूरिस्ट को देखकर जान में जान आई.

अगली सुबह रिसोर्ट से सिगिरिया तक के सफ़र ने मंजिल को और भी रोमांचक बना दिया. 30 किलोमीटर का वह रास्ता घने जंगल से होकर गुज़रता है. सघनता इतनी की सूरज की रोशनी धरती से मिलने को तरसे. फिर भी न जाने क्यों वे जंगल डराते नहीं थे.


सिगिरिया पहुँचने के बाद वहां केवल एक रीढ़ सीधे किए, तना हुआ कोई पर्वत नहीं दीखता बल्कि उस तक पहुँचने से पहले आप उसकी तलहटी में बसे एक सुन्दर नगर के अवशेषों में भी खो सकते हैं. सिगिरिया नगर यदि आज जीवित होता तो उसके भीतर प्रवेश क्या इतना आसान होता? प्रवेश से पहले नगर के चारों को वृत्ताकार में फ़ैली है एक चौड़ी नहर. कहते हैं यह नहर भयानक विशालकाय मगरमच्छों का गढ़ हुआ करती थी. आज भी यदि नहर के भीतरी हिस्से में कोई उतरे तो घात लगाए मगरमच्छ मिल जाएंगे. यह नहर हरे पानी की कोई छोटी सी नदी ही जान पड़ती है. अब तो इसे पार करने के लिए बाकायदा पुल हैं, पर राजा ने इसे पार करने के लिए भीतरी सुरंगे बनवाई थीं. जिसके रास्ते केवल राजा और उसके गुप्तचर ही जानते थे.

रास्ते में पड़ती दो शिलाओं का जोड़ जिन्हें ऊपर से देखने पर लगता है वे कालांतर में कटकर अलग हुई हैं।
नगर के चारों ओर बिखरी ज़मीन में धंस चुकी दीवारें पांचवी सदी में बने उस नगर की निशानी हैं. वे लाल ईंट की दीवारें जिन्हें हरी काई और कत्थई मिट्टी ने अपनी बाँहों में समेट लिया क्या कोई कहानी नहीं कहती होंगी? मैं चाहती थी कि मैं हर एक दीवार को छूकर देख लूँ. वे मुझे आकर्षित कर रही थीं. उनकी बनावट इतनी सुनियोजित थी कि मिट्टी में दबने के बाद भी उनकी सुन्दरता छुप नहीं पा रही थी.

कुछ और कदम चली तो तकनीकि ने एक आवाज़ लगाई, कहकर कि वह उस समय में आज से कितनी अडवांस थी. राजा कश्यप के उस नगर में प्राकृतिक फब्बारे थे. जो बारिश में आज भी काम करते हैं. ज़मीन में दबे दिखने वाले वे छोटे-छोटे कुंड जिनकी सतह पर यदि फूंक मारो तो पानी हटते ही छोटे-छोटे छेद दीख जाएं. ये छेद किसलिए थे?. ये फब्बारे थे. मैं कुछ पल ठहरकर आँखें मूंदे उन फब्बारों के चलित रूप की कल्पना करने लगी. कितना मनोरम दीखता होगा वह दृश्य.

कुछ और आगे बढ़ने पर ज़मीन में धंसी ईंटों से बना एक गुफानुमा दरवाज़ा दिखा. अब तो वह मॉनिटर छिपकलियों या मिनी ड्रेगन का घर है पर पहले वहां क्या था? ज़मीन के भीतर कोई सुरंग? या कोई तहख़ाना? चारों ओर हरियाली से घिरी वह कत्थई गुफ़ा ज्यादा देर निहारे जाने पर पुकार लेती है. मगर उसके भीतर जाने का कोई रास्ता नहीं. बस ललचाती है. क्या जाने इतिहास के कितने किस्से अपने भीतर छुपाए होगी?

अब तक पेड़ों के झुरमुट छट चुके होते हैं और नाक की सीध में नज़र आती है बारह सौ फीट ऊँची वह चट्टान जो अनंत वृक्षों और घेरा बनाए पर्वतों के बीच सीना ताने, नाक चढ़ाए एक दम अटेंशन की मुद्रा में खड़ी है.

चट्टान तक पहुँचाने वाली सीढ़ियों पर चढ़ना शुरू करने से पहले जल-उद्यान के कई ऐसे खंदक, जल-कुंड आदि मिलते हैं जिनकी संरचना बहुत ही प्रभावशाली एवं लुभावनी है. दीवारों के बीच से होकर गुजरने वाला रास्ता बहुत ही संकरा और दोनों तरफ से पत्थरों से बना है. वह इतना संकरा लगता है जितना किसी राजा के चलने भर के लिए कालीन बिछाने की जगह छोड़ी जाती है.

कुछ और आगे बढ़ती हूँ तो एक छोटी सी चट्टान पर कुछ नन्ही-नन्ही सीढ़ियाँ दिखाई देती हैं. याद करती हूँ कि इन सीढ़ियों के बारे में तो सिगिरिया से जुड़े किसी भी आलेख में कुछ व्याख्या नहीं मिली. तो फिर क्या ये सीढ़ियाँ नहीं हैं? तो फिर क्या हैं? वहां आस-पास उपस्थित लगभग हर चट्टान पर एक पर्टिकुलर बनावट में बनी ये सीढ़ियाँ जिनके दोनों ओर नालीनुमा कटाई है, यह क्या है? क्या ये उस समय में तकनीकि का इस्तेमाल करके बनाई गई कोई लिफ्ट थी जिससे इतनी ऊँची चट्टान के शिखर पर पहुँचा जाता था? या ये सीढ़ियाँ ही थीं? कौन जाने? इसका असल ढूँढने की बात मन से कहकर आगे बढ़ती हूँ तो बाएँ हाथ की तरफ एक षट्कोणीय जलकुंड दिखाई देता है.

इसके बाद दीखता है चट्टान पर चढ़ने वाली सीढ़ियों का द्वार. जब उस द्वार को देखा तो वे दो चट्टानें आपस में द्वार के आकर में जुड़ी हुई थीं. कुछ सीढ़ियाँ ऊपर चढ़ने के बाद द्वारनुमा उन चट्टानों की ऊपरी सतह को देखा तो दोनों एक ही चट्टान से टूटने के बाद दो टुकड़ों में बंटी हुई मालूम होती हैं. दोनों पर बहुत ही ज़्यादा समानुपात में वैसी ही सीढ़ियाँ और नालियाँ गुदी दिखती हैं जिन्हें मैं थोड़ी देर पहले नीचे किसी छोटी चट्टान पर छोड़ आई हूँ. यह अब भी मेरे लिए कौतुहल का विषय है कि सिगिरिया से जुड़े किसी भी आलेख में इन सीढ़ियों का कोई वर्णन क्यों नहीं? क्या ये मात्र पहाड़ की कोई प्राकृतिक संरचना है? मेरा मन स्वीकार नहीं करता. खैर

अब है चट्टान के ऊपरी हिस्से तक की चढ़ाई. जिसमें से कुछ हिस्से में ईंट और पत्थर की सीढ़ियाँ बनी हैं. और कुछ हिस्से तक, जैसे कि चट्टान के ऊपरी हिस्से पर बाहर की तरफ बनी एक गुफ़ा, तक पहुँचने के लिए लोहे की सीढ़ियाँ बनाई गई हैं. उस गुफ़ा की दीवारों पर गुदे हैं कई भित्ति चित्र. यूँ तो ऐसे ही कुछ चित्र नीचे एक चट्टान की ऊपरी सतह पर भी दीखते हैं. पर वे अब लगभग मिट गए हैं. ऊपर गुफ़ा में यह अब भी साफ़ दिखाई देते हैं. ये स्त्रियों की आकृतियाँ हैं. जैसे स्वर्ग की अप्सराओं की तस्वीरें बनाई हों. यह भी कहते हैं कि राज कश्यप की पाँच सौ पत्नियाँ थीं. उन्हीं के चित्र उसने अपने महल की दीवारों पर गुदवाये थे. ये स्त्रियाँ देखने में अलग-अलग रूप की दिखाई देती हैं. तकरीबन दस-बाहर चित्र वहां साफ़ दीखते हैं जिनमें से सभी के चेहरे प्रांतीय विलक्षणता दिखाते हैं. जैसे वे अलग-अलग देश की स्त्रियों की तस्वीरें हों. इन सभी तस्वीरों में स्त्रियों ने धोती पहनी है मगर अंगिया नहीं. उनकी नग्न छातियाँ मात्र आभूषणों से सज्जित हैं. ये आकृतियाँ मात्र लाल, हरे एवं पीले रंग से बनाई गई मालूम होती हैं. इसके अलावा वहां किसी और रंग की छाप नहीं दीखती. ये आकृतियाँ जीवट हैं. इनके हाथों में कमल पुष्प एवं सजा हुआ थाल यह आभास देता है कि वे किसी पूजा के लिए जाती स्त्रियों हैं.

इस गुफ़ा ने निकलकर जब ऊपर की तरफ बढ़ते हैं तो एक “ग्लास वाल” दिखती है. वह दीवार किसी विशेष लेप से बनाई गई थी जो दर्पण की तरह प्रतीत होता थी. शायद राजा कश्यप इसी में अपना प्रतिबिम्ब देखते हों. वह दीवार शायद नीचे से ऊपर तक थी जिसका अब कुछ ही भाग बाकी है.

सिगिरिया पर्वत का दृश्य
कुछ और सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद मैं उस जगह पर पहुँच जाती हूँ जिसे देखकर भीतर तक रोमांचित हो उठती हूँ. उस पर्वत खंड के एक भाग पर बना वह सिंह द्वार अब पूरा जीवित नहीं. मगर शेर के पंजे अब भी विशालकाय सिंह का आभास दिलाते हैं. वे शायद उसी चट्टान को काटकर बनाए गए होंगे. उस पर्वत खंड पर उन पंजों के अलावा अब कुछ शेष नहीं. उन पंजों के बीच से जाती हैं सीढ़ियाँ जो शिला के ऊपरी भाग तक ले जाती हैं. ये सीढ़ियाँ भी ईंट-पत्थर की बस कुछ ही दूर हैं फिर ऊपर तक जाने के लिए लोहे की सीढ़ियाँ बनाई गई हैं. कौन जाने यही वह विशालकाय शेर रहा है जिसके मुँह से होते हुए रावण महल तक पहुँचने की बात कही गई है. शेर के उन पंजों के बीच से होते हुए जब ऊपर चलते जाते हैं तो लगता है जैसे धरती को छोड़ स्वर्ग की ओर बढ़ रहे हैं. जहाँ तक नज़र जाती है वहां तक ज़मीन पर घने जंगल, पहाड़, ताल और ऊपर बस आसमान. चारों ओर और किसी चीज़ का कोई अस्तित्व नहीं.

शिला के शिखर पर पहुंचकर एक बार फिर लाल-ईंटों और पत्थरों की मिली जुली दीवारें, कुंड आदि वहां किसी राजा के महल के अवशेष लगते हैं. पर सच कहूँ तो उस ऊंचाई पर पहुंचकर जब चारों तरफ से प्रकृति का अप्रीतम रूप दीखता है तो उन अवशेषों को देखने में दिलचस्पी ख़त्म हो जाती है जिनके लिए वहां तक गए थे. एक अलग ही आकर्षण है उस शिखर के चारों ओर की वादियों में. उस हवा में. उस आसमान में जिसे देख लगता है अभी पंजों पर उठकर हाथ बढ़ाकर छू लेंगे.

दीवारों के उन्हीं अवशेषों में किसी एक पर बैठकर मैं बस दूर तलक देखती हुई बस यही सोचती हूँ कि क्या वाक़ई यहीं रावण ने अपने लिए महल बनाया होगा? ये पेड़ जिन्हें अभी मैं देख रही हूँ क्या तब वे और भी सघन होते होंगे? या और भी ऊंचे? ये पर्वत जिन्होंने अपनी हथेलियाँ जोड़कर एक गोल घेरे में इस पर्वत-खंड को घेर लिया है क्या वे तब भी इतने ही वीरान रहे होंगे? इतने ही शांत और इतने ही दूर? या वे समय के साथ इस शिला से दूर खिसकते गए क्योंकि उन्हें अब इस शिला पर कोई जीवन नज़र नहीं आता.

उस स्थान पर कुछ घंटे बिताने के बाद मैं इसी ख्वाहिश में वापस लौट आती हूँ कि यह स्थान एक बार में देख लेने, जान लेने और पा लेने जैसा नहीं है. मैं फिर-फिर वहां जाना चाहती हूँ. उस स्थान पर खड़े होकर आवाजें सुनना चाहती हूँ. वे आवाजें जो शायद कभी रावण ने अपनी गर्जना में लगाई हों. क्या पता वे आज भी पहाड़ों के उस घेरे में टकराकर वहीं भटक रही हों.

[सभी तस्वीरें (c) अंकिता जैन]

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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