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रोम की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 32 | Vinod Bhardwaj on Rome

जून 9, 2020

रोम की यादें 

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा


न जाने क्या बात है इटली की स्त्रियाँ बहुत आसानी से मेरी दोस्त बन जाती हैं, उन्होंने मुझे इटली के अद्भुत लैंडस्केप में इतना घुमाया है कि मुझे यह भ्रम होने लगता है कि पुनर्जन्म एक सच्चाई हो न हो पर मेरा इटली, ख़ास तौर पर रोम से कोई पुराना और गहरा रिश्ता है। 

पिछले साल जाड़ों में मैं आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में एक कला शिविर में सिर्फ़ पाँच दिन रहा, पर वहाँ इतालवी चितेरी सारा गुबेरती से इतनी जल्दी दोस्ती हो गयी कि वह लॉकडाउन की क़ैद में वट्सऐप पर क़रीब क़रीब रोज़ ही मेरा हाल पूछती है। वह ख़ुद मुंबई में फँसी हुई है। उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो ग़ज़ब का है। जब इटली में कोरोना का क़हर था, तो वह बोली, मुंबई लोकल में इटली की हूँ, यह कहते ही बढ़िया भीड़मुक्त सीट मिल जाती है। 

मेरे इटली प्रेम की शुरुआत गबरियेल्ला तावारनीसे से हुई, अस्सी के दशक में। उसे इतालवी और फ़्रेंच भाषा आती थी, अंग्रेज़ी उसने भारत आ कर सीखी। 1993 में मैं उसके साथ पहली बार रोम गया और शुरू से ही रोम रोम में रोम बस गया। उसका घर रोम के केंद्र में था, हर जगह, वैटिकन सिटी भी, आप पैदल जा सकते थे। उस ज़माने में गबरियेल्ला की सलाह पर भारत से गणेश छाप बीड़ी के पाँच बंडल रोम ले गया था और उन्हें गबरियेल्ला की दोस्त ने बेच कर मुझे पॉकेट मनी दिला दी, रोम की गलियों में अकेला घूमने के लिए। आजकल तो बीड़ी के दाम भी नहीं मिलते। 

उन दिनों रोम में आपको पुलिस के ठीक सामने जेब से लीरा निकाल लेने वाली जिप्सी लड़कियाँ भी मिल जाती थीं। कोई सुंदर लड़की आप की जेब में सरेआम हाथ डाल दे, तो शुरू में तो आप हैरान रह जाएँगे। वे झिझकती बिलकुल नहीं थीं। दिल्ली आ कर मैंने निर्मल वर्मा को यह बात बतायी, तो वे अपनी ख़ास शरारती मुस्कान में बोले, विनोद, तुम्हें तो सरेआम लुट कर अच्छा लगा होगा। 

फिर मैंने जिप्सी लड़कियों से आक्रामक हो कर अपने को बचाना सीख लिया। अब रोम में ये लड़कियाँ और गोद में बच्चा लिए आपकी सामने वाली जेब से पैसा निकालने वाली स्त्रियाँ नहीं मिलतीं। वैसे किसी इतालवी को यह बात बताओ, तो वह यही कहता था कि जिप्सी तो भारत से आए हैं। 

मेरे इटली प्रेम की शुरुआत फ़िल्मकार फ़ेलीनी की जादुई फ़िल्मों से हुई थी, गबरियेल्ला ने उसे वास्तविक बना दिया और फिर एक लंबी मित्र सूची बनती चली गयी। रोबेरतो, तमारा, मारियोल्ला, मार्ता, इजाबेल्ला, मिकेला, गबरी जी, एलिजाबेत्ता, स्टीफानो, चीचिलिया, सारा। इस सूची में सिर्फ़ दो पुरुष हैं। इतालवी स्त्रियाँ तो कमाल की हैं। 

गबरियेल्ला एक बहुत बड़े पुराने फ़्लैट में कई दोस्तों के साथ रहती थी।

गबरियेल्ला उस पीढ़ी की थीं, जो साठ के दशक के अंतिम बरसों में पेरिस, रोम के छात्र आंदोलन की पैदाइश थी। वे सब आज़ाद क़िस्म की ज़िंदगी के दीवाने थे। पेरिस में वह पत्रकार दिलीप पाडगांवकर की भी अच्छी दोस्त थी। 

गबरियेल्ला एक बहुत बड़े पुराने फ़्लैट में कई दोस्तों के साथ रहती थी। एक तरह की कॉम्यून लिविंग थी वो। गबरियेल्ला ने कभी शादी नहीं कराई, दस साल जिस दोस्त के रही वह शादी करा के भी अंत तक उसका दोस्त रहा। गबरियेल्ला को बंगाल के एक नक्सलवादी से प्यार हो गया, जिसने एक बंग सुंदरी से शादी करा के मध्यवर्गीय जीवन की सुख शांति अपना ली। बाद में उसे अपने से कम उम्र के एक बंगाली से प्रेम हो गया। पर मैंने देखा, वह अपने नए और पुराने प्रेमी के साथ सहज रहती थी। कोई ईर्ष्या नहीं होती थी सबके रिश्तों में। 

गबरियेल्ला जब अपने नक्सली दोस्त की यादों में आँसू बहा रही थी, तो मुझे भी बहुत थोड़े समय के लिए दिल्ली के पुराने क़िले में प्यार की छोटी सी पर मीठी झलक मिली। पर हम दोस्त हमेशा रहे, आज वह इस दुनिया में नहीं है पर उसका फ़ेस्बुक पेज जीवित है, उसकी सहेली तमारा उसे संभालती है। गबरियेल्ला भी कैन्सर ने छीन लिया। 

गबरियेल्ला से मैंने बहुत कुछ सीखा, सिर्फ़ पास्ता और छोले का फ़्यूज़न ही नहीं। वह बड़ी आसानी से बताती थी कि मैं जब उन्नीस की थी, तो बेहद हस्तमैथुन करती थी। भारतीय स्त्रियाँ यही कहती हैं, न न हमने ये सब कभी नहीं किया। इधर कुछ उनकी भी दुनिया बदली है। 

रोम में पहली बार जब मैं गया तो गबरियेल्ला के घर में  बाथरूम के दरवाज़े में छोटे छोटे शीशे लगे थे, कुछ को पेंट कर दिया गया था, कुछ को पारदर्शी छोड़ दिया गया था। मुझे शुरू में नहाने में संकोच होता था, फिर मुझे लगा फ़्लैट में रहने वाली स्त्रियों को संकोच नहीं, तो फिर मुझे क्यूँ कमबख़्त शर्म आती है। 

इस फ़्लैट के ठीक नीचे एक होटेल था जिसे शायद फ़िल्म स्टार 'तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़ुबान पर' फ़ेम मुमताज़ के परिवार वालों ने अब ख़रीद कर बिल्डिंग में ख़ूब तोड़ फोड़ कर दी है। विशाल खिड़कियों वाले उस बहुत बड़े फ़्लैट में मैं कई बार ठहरा था, पिछली बार रोम गया तो फ़्लैट टूटने से पहले उसकी कुछ तस्वीरें खींचीं। 

रोम में आप तीन तरह के समय में आसानी से आवाजाही कर सकते हैं। रोमन फ़ोरम के खंडहर शहर के बीच में जगह जगह पर हैं, मध्ययुग में भी आपको प्रवेश का मौक़ा मिलेगा और अत्याधुनिक समय में भी। जगह जगह कलात्मक मूर्तिशिल्प, चौराहे, पियात्सा, शेरों के मुँह से गिरता पीने वाला पानी, चर्च में घुस कर कारावेज्जियो जैसे महान चित्रकार के काम को आश्चर्य से देखना। चर्च में बेंच पर बैठ कर किसी मालदार टुरिस्ट का इंतज़ार, कि वह मशीन में युरो का खनकता सिक्का डाले, ख़ूब रोशनी हो और इस महान चित्रकार से ठीक से एक मीठी सी मुलाक़ात हो। 

एक फ़ैंटसी है मन में, कोरोना भागे, जमा पूँजी ले कर रोम के केंद्र में किसी सस्ते होटेल में लंबे समय तक रहूँ। शायद पियात्सा द नवोना या फोंताना द त्रेवी में गबरियेल्ला मिल जाए, पूछे, अरे भलेमानस तुम कहाँ थे। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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