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Hindi Story: 'निसंग' — जयश्री रॉय की हिंदी कहानी


लाल साड़ी में लिपटी लड़कियाँ एक दहलीज पार कर किस अरण्य में हमेशा के लिए खो जाती है कोई जानना नहीं चाहता... कथा-कहानी सुनाने बैठी सयानी औरतें अक्सर कहती हैं, घर के बियाबान से कभी कोई स्त्री जीवित नहीं लौटी... 

निसंग

जयश्री रॉय की हिंदी कहानी  

सात दिन से लगातार बारिश हो रही है, आकाश में मटमैली कंक्रीट की-सी बादल की मोटी तहें बैठ गई हैं। जितनी दूर नज़र जाय। कहीं एक फांक उजाला नहीं! एक तो दिन में भी रात का-सा अंधेरा बना रहता है घर में और अभी बिजली को भी शाम की उतार पर जाना था... अपर्णा ने किचन कैबिनेट टटोला, जाने मोमबत्तियाँ कहाँ रख दी... कुछ ही देर में रात घिर आएगी... उसने बैल्कनी का दरवाजा खोला, एक धूसर स्लेटी रंग कमरे में खिंच आया। पड़ोस की खिड़की चमक रही, यानी बिजली सिर्फ उन्हीं की गई है। तब तो लाइन मैन को फोन करना चाहिए। रात हुई तो फिर कोई नहीं आयेगा। किशोर तो जाने कब आए, सुबह का निकला हुआ है...

वह बरसाती का दरवाजा खटखटाती है, कुछ संकोच के साथ — मिस्टर कुमार... जाने यह आदमी सारा दिन बंद कमरे में पड़ा क्या करता रहता है! आसपास के कोलाहल के बीच यह हर समय का बंद दरवाजा उसके जीवन के मौन को और गहरा देता है। वह उकताने लगी है—बंद दरवाजों से, पथरीले चेहरों से... कई बार जी चाहता है एक हथौड़ा उठा कर हर बंद किवाड़ तोड़ दे, खिड़कियाँ भड़भड़ाये, चीखे कि कोई है...! सीमा कहती है, पहले खुद को तोड़ो! अलीगढ़ का ताला बनी खुद पर जड़ी हो सो कभी ख़्याल आया?

कहानी  उसके वहाँ होने के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह जैसा कुछ। कितने दिन हो गए। लगभग साल भर। जिस दिन से आया है, इसी तरह से है। रह कर भी नहीं रहता। सुबह निकलता है, देर शाम लौटता है। लौटते ही अपने कमरे में बंद हो जाता है। ऐसे कि जैसे छिपना चाह रहा हो। कभी-कभी धीमी आवाज़ बजते पुराने गीतों के बोल बंद कपाटों से रिस आते हैं या देर रात लगातार खाँसने की आवाज़... इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा अजनबी आवाज़ों के कोलाज में वह चेहरे, दृश्य जोड़ती है, मगर कोई तस्वीर नहीं बन पाती। कुछ लोग फितरत से अजनबी होते हैं, ताउम्र जमाने से फरार रहते हैं...

सीमा ने कहा भी था, कोई छोटा परिवार रख लेती। औरत, बच्चे होते तो कुछ साथ बन जाता। यह अकेलापन तुझे खा जाएगा अपर्णा! सीमा की बातें उसे डराती है। वह उसे बहलाने के लिए कोई झूठ क्यों नहीं बोलती! पैसों की तंगी हुई तो बरसाती के दो कमरे किराये पर उठा दिये। नमित के दिये पैसे घर खर्च के लिए अब काफी नहीं होते। इधर किशोर के खर्च दिन पर दिन बढ़ते जा रहे। पढ़ाई पूरी नहीं हुई और प्रेमिका जुटा ली है। नौकरी से पहले शादी की प्लानिंग!

अपने में उलझी वह जाने कितनी देर वहाँ खड़ी रह गई थी। बिना कुछ कहे। फिर दरवाजे के पीछे से झाँकती आँखों में भर आई विरक्ति ने उसे कोंच कर जगाया था जैसे—जी, ज़रा लाइन मैन को फोन करना था। आपके पास नंबर होगा... बात पूरी होने से पहले ही एक छोटे-से ‘हूँ’ के साथ दरवाजा झटके से उसके चेहरे पर बंद हो गया था। उसे यह रवैया अपमानजनक लगा था। कैसा असामाजिक इंसान है! लगता है कभी किसी इंसानी बस्ती में नहीं रहा। हर बात का एक तरीका होता है! वह कौन-सा यहाँ गपियाने आई थी!

कमरे में आ कर वह भुनभुनाती हुई सोफ़े पर बैठ कर बिजली के आने का इंतज़ार करती रही थी। गहराती साँझ के साथ कमरे के स्याह कोने धीरे-धीरे आकार लेने लगे थे। मन में हौल उठ रहा था। अकेले घर में होने से हर चुप्पी आवाज़ बन जाती है, असबाब जीवित हो हिलने-डुलने लगते हैं। गनीमत है स्ट्रीट लाइट की थोड़ी-सी रोशनी कमरे के अंदर आ रही। उसे हमेशा अंधेरे से डर लगता है। अंधेरा, पानी और छोटी, बंद जगह से। ऊंचाई से भी! “जाने कितना डर और असुरक्षा भरा हुआ है तुझ में! फालतू ख्यालों का कवाड़ घर है पूरा! किसी साइक्रियाटिक को दिखा। मन के अंधे कुयेँ में अकबकाकर डूब मरेगी एक दिन...” सीमा उसे समझती है एक हद तक। बचपन की दोस्त है। अकेली! समय के साथ बार-बार हाथ छूटा मगर रही कहीं एकमात्र आश्वासन की तरह। जाती है मगर लौटने  की उम्मीद रख जाती है अपने पीछे। अब भी दिशाहारा क्षणों में उसी का नाम याद आता है। जानती है दिन के किसी भी समय उसे पुकारा जा सकता है। उस तक उसकी आवाज़ पहुँचती है।

उससे बिल्कुल अलग—मजबूत, निडर, आत्म निर्भर है वह! जीवन ने उसे वह हर मौके दिये जिससे वह वंचित रही। उसका कुम्हार समर्थ था। उसने उसकी कच्ची मिट्टी को सही, सुघढ़ आकार दिया। दूसरी तरफ वह... कुछ लोग बाढ़ में बह आए कूड़े-करकट की-सी किस्मत ले कर पैदा होते हैं... “फिर खुद पर तरस आने लगा?
ओ मीना कुमारी...”
सीमा के शब्द एकांत में आ कर भी उसे हर क़दम पर टोकते हैं। वह उस पर खूब गुस्सा करती है। क्योंकि वह उसे झेल लेती है। और तो कोई नहीं जो उसे ठहर कर सुने...

बेटे के पास कभी फुर्सत नहीं। फ़ाइनल इयर में फेल कर चुका। रीपिट कर रहा। कोई काम नहीं इसलिए दुनिया भर के काम! एक्टीविसस्ट—रॉक बैंड, ग्रीन पी मूवमेंट, पिटा... पर्यावरण की चिंता, प्रदूषण की चिंता, जल—जंगल—ज़मीन की चिंता... सड़क से कचरा बीनता चलता है, दिन-दिन भर दीवारों पर स्प्रे पेंट से नारे लिखता है। उन्हें इस दुनिया को सिरे से बदल देना है। काश कोई इन देश के होनहार युवाओं के कमरों में भी कभी झांक आता! खुद कूड़े के ढेर पर लोटते हुये स्वच्छता अभियान चला रहे हैं!

हर दूसरे दिन उसे थाने में जा कर उसकी जमानत करवानी पड़ती है, बदतमीज़ पुलिस वालों की डांट-फटकार सुनानी पड़ती है। स्कूल-कॉलेज तो सालों से जा रही। प्रिंसिपल, टीचरों के आगे वह बस क्षमा मांगती रहती। किशोर की हथेलियाँ रूलर से लाल होतीं, डांट से उसके कान। नमित की बातें अलग से। उसके लिए दुनिया की हर समस्या के लिए वही दायी है। उसे भी एक समय से ऐसा लगने लगा है। “मैं तो पैदा होने के लिए भी क्षमा मांग लूँ...” उसकी बात पर सीमा उसकी पीठ पर धौल जमा दिया करती है—
हमेशा शहीद बनी फिरती है! सफरिंग हीरो सिंड्रोम से ग्रसित है तू! खुद पर तरस खाना छोड़ हीरोइन!

उसने कब इंकार किया... जो चाहे उपाधि से लाद दे लोग! शादी के पच्चीस साल से तो यही सुना, कभी नमित, कभी माँजी, कभी किसी और से—‘कैसी माँ है! कैसी औरत!’ वह खुद भी कनफ्यूज़ रहती है, वह कैसी माँ है, कैसी औरत! सीमा कहती है, औरत इंसान ही होती है, दो टांग, दो हाथों वाली! उसे सबकी तरह गुस्सा आता है, भूख लगती है... उनके दस हाथ, तीन आँखें नहीं होतीं! देवी चाहिए तो मंदिर में जाओ, झाड़ूँ-बर्तन करने वालियों से क्या उम्मीद करते हो! वह बस धन, सुख, करुणा लुटाती रहे? जो कभी दिया नहीं उसे वह मांगते क्यों हो! भूसा भरे धान के कोठार से सोना नहीं निकलता, समझी!

मगर वह किसे दोष दे! बचपन में जन्म देने वाली माँ कहती थी, कैसी लड़की है! किसी बात का शऊर नहीं! माँ को दादी ऊपर से कोंचती, मेरा पूत इतना कमा कर लाता है, इसके वक़्त काहे कंजूसी कर गई, थोड़ा दूध-केसर खाती, काली माई जन कर बैठी है! अब दहेज का बोझा उठाओ...

मगर यह दहेज का बोझा भी ससुराल में हमेशा हल्का साबित हुआ। उसकी सास हर बात पर रोने बैठ जाती—मेरा कार्तिक-सा सुदर्शन बेटा! इत्ते-से दहेज के लिए किसको गले बांध दिया...

दहेज से बंधे अपने सुदर्शन पति के पीछे-पीछे वह घिसटती रही। रास्ते में वह हमेशा उससे दो क़दम आगे चलता। अटक-अटक कर परिचय देता, किसी अपराध के कंफेशन की तरह—यह मेरी पत्नी है! सुन कर चौक उठती नज़रों की वह आदि हो गई थी, मगर हर बार भीतर कुछ नए सिरे से दुख उठता था। कुछ मौतें एक बार में नहीं घटतीं...

हर बात में कंजूस नमित महीने में गोरेपन के कई क्रीम खरीद लाता उसके लिए। मिर्च-मसाले की गंध से लिथड़ी थकान से लस्त-पस्त उससे पूछता हर रात, क्रीम लगाया, बेसन-मलाई का उबटन? वह नींद से बोझिल मुंह धो कर किसी तरह चेहरे पर क्रीम पोत कर आती। नमित देखता और गहरी सांस ले कर करवट बदल लेता। उनके बीच के सालों में अधिकतर यही होना दर्ज़ था—चुपचाप सिंकती वह, उसका मौन संताप... प्रताड़ित क्या सिर्फ शाब्दिक, दैहिक हिंसा से किया जाता है! औरत को अबोल भी मार देता है। अपनों का अबोल! ठंडी आँखें, शिथिल स्पर्श, चेहरे के सामने दीवार-सी उठी पीठ... उसे अपनी रातों से आतंक हो गया है! वर्षों एक शव के बगल में लेटे रहने का त्रासद अनुभव उसके हाड़-मज्जे में धंसा है, हर वक़्त भीतर से श्मशान की चिरांध-सी उठती है...

जो आदमी रात को उसके बगल में लेटते ही मर जाता था वही दिन भर पराई देह की बू के पीछे प्रेतात्मा-सा डोलता फिरता था! बड़ी भाभी, दूर की सालियाँ, घर की मेड... वह सालों से देखती रही, अपने पति की आँखों में भरा लालच, प्रछन्न, कामातुर व्यवहार... सूखा ठूंठ-सा अनमन, विरक्त मर्द किस तरह पराई औरतों के सानिध्य में क्षण भर में हरिया उठता है! परिचित औरतों के सामने नमित का गुनगुनाना, बेमतलब की बातें, नर्वस मैनेरिज़्म... उसे नमित को देख अक्सर डिस्कवरी चैनल में दिखाये पशु-पक्षियों की अपनी मादा को रिझाने के लिए की गई अटपटी हरकतें याद आतीं। यकायक कितना वाचाल हो उठता था वह! और कुछ नहीं तो लगातार डकार ही लिए जाना। अंजान बन कर तौलिया लपेट कर बाथरूम से निकाल आना... यह सब कितना छोटा कर देता था उसे दूसरों के सामने! घर से निकलते हुये वह अपने पीछे कोलोन का बवंडर छोड़ जाता। आफ्टर सेव की खुशबू से तर हवा में वह सांस नहीं ले पाती! उसके कपड़ों के चटक रंगों ने जहां उसे वर्षों उदास रखा वही मैले कपड़ों से आती कोलोन की बासी गंध में देखे-अदेखे देह की गंध चिन्हते वह बार-बार आत्म ग्लानि से भर उठी है। रिश्ते में लोग कहाँ से शुरू हो कर कहाँ पहुँचते हैं! गिरने का कोई अंत नहीं होता। कुंठा में आत्मा तक लिथड़ जाती है! रिश्ते के नाम के बंधन इंसान को बंधुआ मजदूर बना कर रख देते है एक दिन।

कोई जाने या ना जाने, वह हमेशा से जानती है, यह सब उसका प्रेम नहीं था, आहत आत्म सम्मान था। प्रेम के बीज में जन्मने की सनातन चाह होती है। वह हमेशा उर्बर माटी की खोज में रहता है मगर उसका प्रेम कहाँ जन्मता? विवाह वेदी पर? जहां दहेज में मिले गहनों के खरेपन को जाँचने लड़के वालों की तरफ से एक सोनार बैठाया गया था या उस बिस्तर पर जिसमें वह संबंध के नाम पर पहली बार लहूलुहान हुई थी? शादी हो जाना नैसर्गिक रूप से प्रेम में हो जाना नहीं होता कि बस घर-समाज ने अनुमति दी और प्रेम के कल्ले फूट पड़े! प्रेम एक अलग ही ज़मीन पर अपने वक़्त पर उगता है, एक अलग मौसम, खाद-पानी से! सप्तपदी का गठजोड़ दो जिस्म के बीच होता है, बंधती देह से देह है। रस्सी से ढोर-डंगर बांधे जाते हैं, वह धागा और ही होता है जिसमें अदेह मन बंधता है... लोग अक्सर यह बात भूल जाते हैं। अधिकतर रिश्तों की यही त्रासदी होती है।

बिजली आई तो वह चाय बना लाई। ड्रेसिंग टेबल में खुद को देखते हुये धीरे-धीरे चुस्की लेती रही। आजकल यही करती है। आईने के सामने बैठ जाती है। लगता है, कोई है साथ में। बात भी करती है, खुद से! उस दिन दरवाजा खोलने में देर हुई तो किशोर भीतर आ कर इधर-उधर देखता रहा—किससे बात कर रही थी? दरवाज़ा खोलने में इतनी देर हुई! वह क्या जवाब देती! बातें जो सालों से जम गई हैं भीतर अब सतह फोड़ कर बाहर निकल आना चाहती हैं। वह अकबकाती रहती है। उस दिन फोन पर देर तक एक बैंक सेल्समैन से लोन के ऑफर पर बात करती रही। रात तरह-तरह की शिकायतें ले कर ऑन लाइन शॉपस के कस्टमर केयर वालों से चैट करती है, फेरी वालों से मोलाइ-तोलाई करती  है...। देख-देख कर किशोर झल्लाता रहता है। उस दिन रुना से फोन पर कह रहा था, माँ कुछ अजीब-सी हरकतें कर रहीं...

रुना ने घूमा-फिरा कर पूछा था, माँ! ठीक हो? अभी मुश्किल है, मगर जल्द आऊँगी तुमसे मिलने... बेटी की बात सुन कर उसे रोना आया था। उनका दर्द सांझे का है। वह उसके संत्रास की अगली कड़ी है। उन्नीस साल की उम्र में नमित और सास ने मिल कर उसकी शादी कर दी थी। वह बहुत लड़ी थी उसके लिए मगर हमेशा की तरह अंततः हार गई थी। कितना मन था रुना का आगे पढ़ने का! साल पूरा होते-होते पहली बेटी, फिर दूसरी... अभी अपनी सास के साथ मंदिर, दरगाहों के चक्कर लगा रही, किसी तरह एक बेटा हो जाय... उसकी देह पर पड़े दाग उसने देखे थे और ना देखने का भान करते बार-बार मरी थी। एक माँ का इससे बड़ा कोई दुख नहीं होता! वह क्षमा मांगती है उससे, तब जब वह कभी घर आती है और उसके बगल में निश्चिंत सोती है, अपने उघड गए दाग-धब्बों से भरे शरीर से बेपरवाह... वह चुपके से सहला कर देखती है उन्हें, यह निशान उसने दिये हैं उसे उत्तराधिकार में... सम्हाल रही है वह भी, शायद अपनी बेटियों के लिए... लज्जा की एक लंबी परंपरा की उत्तराधिकारिणी वह सब...

एक बार बहुत हिम्मत कर कहा था उसने उससे, चली आ यहाँ, मैं सम्हाल लूँगी! सुन कर वह हंसी थी—कहाँ चली आऊँ माँ? मायका माँ का कब होता है! बाबूजी कल फिर उस द्वार छोड़ आएंगे जिसके खूँटे से चार साल पहले बांध आए थे। यह भैया का घर है... तुम अचार, पापड़ बेच कर क्या कमा लेती हो! घर तो बाबूजी के दिये पैसों से ही चलता है... वह आगे क्या कहती। सच ही तो है, जिस घर को तिनका-तिनका जोड़ती है वह घर औरत का कब होता है। एक आश्रय मात्र! और कुछ नहीं! जो रोज़ उन्हें कमाना पड़ता है, दिहाड़ी मजदूरों की तरह! जो मर्द हर तरह से जलील कर एक दूसरी औरत के लिए उसे छोड़ गया, उसी के रहमो-करम पर आज भी जी रही। हर महीने उसके भेजे चेक की राह देखती है, वह आता है तो चुपचाप दरवाजा खोल कर खड़ी हो जाती है। एक जीने की कोशिश में कितनी मौतें, कितनी-कितनी बार...! किसको बताए वह कि निबाला बार-बार गले में क्यों अटकता है, क्यों हर कौर पर ऊबकाई आती है...

देर रात किशोर लौटता है तो खाना परोस कर वह उससे जाने क्या-क्या कहती रहती है। किशोर खाते हुये ‘हूँ’, ‘हाँ’ करता है। वह समझती है, किशोर उसकी कोई बात नहीं सुन रहा। एक समय के बाद अधिकांश लोग घर की औरतों की बात सुनना छोड़ देते हैं। औरतें घर-मुहल्ले की तुच्छ, बेमतलब की बातों में पड़ी रहती हैं—राशन, बिल, तीज-त्योहार... छोटी-छोटी सोचों का छोटा क्षितिज... घर से बाहर की विशाल दुनिया का उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं। मगर फिर भी वह कहती रहती है, कहना उसके लिए ज़रूरी है। चुप का खौफ उसे अपने भीतर ठहरने नहीं देता। संवाद के दूसरे सिरे पर उसके लिए अक्सर ही कोई नहीं होता मगर वह क्या करे कि वह है! किसी और के लिए ना हो कर भी...

राशन खत्म हो रहा, कई बिल भरने हैं, नमित का चेक नहीं आया... उसके पास चिंताओ की एक लंबी फेहरिस्त है जिसमें सोच-सोच कर वह हर समय कुछ नया जोड़ती जाती है। माँयेँ बड़बड़ाती रहती हैं... कई बार वह सुन चुकी है, बच्चों को अपने दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली के बीच कहते हुये। वह कहना चाहती है, वह भी निश्चिंत रहना चाहती है उन सब की तरह मगर क्या करे कि उसकी कोई बड़बड़ाने वाली माँ नहीं रहीं अब...

उठते हुये किशोर बताता है, कल चार दिन के लिए वह दिल्ली जा रहा। वीगन फेस्टीवल में हिस्सा लेने। भोजन की थाली से हिंसा को दूर रखना अपने जीवन का मिशन बना लिया है उसने। वह नेट छान-छान कर ऐसे खाने की रेसिपी ढूंढ लाता है जिसके मूल में किसी तरह की हिंसा ना हो। यह अहिंसक खाद्य पदार्थ बहुत महंगे होते हैं। अधिकतर विदेशों से आयातित। इसके लिए उसे पाँच हज़ार रुपये चाहिए होंगे। पाँच हज़ार रुपए की मांग ने उसे उतना परेशान नहीं किया था जितना चार दिन के लिए जाने की बात ने।

चार दिन! ड्राअर में रुपए टटोलते हुये उसकी सांस रुकने लगती है। यह सबसे बड़ी सज़ा है—अकेले होना! ताज्जुब है कि उसे अब तक इसकी आदत क्यों नहीं हो पायी! एक तिहाई जीवन तो निसंग ही बीता। देह से अधिक मन से। आसपास जो रहे भी परिस्थिति वश या विवशता में रहे। वह जानती है, कैसे कभी एक बिस्तर पर सालों दो अजनबी अगल-बगल सोते हैं, मीलों सफर करते हैं और एक ठिकाने की ओर बढ़ते हैं—साथ-साथ मगर अकेले-अकेले... यह साथ की निसंग यात्राएं बहुत थकाती है!

भोर पाँच बजे उठ कर किशोर दिल्ली के लिए निकल गया है। किशोर नहीं तो वह एकदम से खाली हो गई है। दिन भर उसकी जरूरतों के आगे-पीछे ही डोलती रहती है, उसका नाश्ता, कपड़े, खाना... अभी घर से निकलेगा, अभी लौटेगा... अब सूझ नहीं रहा खुद को ले कर क्या करे। सुबह से उठ कर बैलकनी में बैठी रही। अनमनी-सी। धारासार बारिश हो रही। गुलमोहर के बचे-खुचे फूल झड कर सामने पार्क की ज़मीन लाल हो गई है। कुछ रेनकोट में मुड़े बच्चे पानी में पैर छपछपाते हुये जा रहे... पड़ोस के मुंडेर पर दो भीगे हुये कौए बैठे हैं। वह देखती है और उनसे बतियाती है, अपनी उसी निज भाषा में जिसमें ना शब्द बचे है ना आवाज़, बस एक उत्कट चाह, हर अजिए को जी लेने की! क्या जीवन के लिए आज तक कोई मृत्यु बन पाई है...

दूधवाले ने आ कर दरवाजे की घंटी बजाई तो वह जैसे जागी। दूध का बोतल थमाते हुये दूध वाले ने उससे सहज पूछा था, यह आपके किरायेदार को कुछ हुआ है क्या? बार-बार खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खोला! सुन कर उसे अटपटा-सा लगा था। बिना कुछ कहे उसने उसका दूध का बोतल रख लिया था कि वह दे देगी। बाद में उसके भी ना जाने कितनी देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद मिस्टर कुमार ने दरवाज़ा खोला था। बुखार से लाल भभूका होता उनका चेहरा देख वह हैरान रह गई थी। दरवाजा किसी तरह खोल वह बिना कुछ कहे अपने बिस्तर पर जा कर निढाल-से पड़ गए थे। उसके हर सवाल के जवाब पर गहरी-गहरी सांस लेते हुये!

उसने झिझकते हुये उनका सर छुआ था। एक टुकड़ा सुलगा हुआ धातु! उन पर झुकते ही गरम सांस के भभाके ने उसका चेहरा घेर लिया था। उसने घबरा कर अपना हाथ पीछे खींच लिया था। इन हथेलियों को वर्षों किसी स्पर्श की आदत नहीं रही। देह अरसे से एक खाली मकान है, शून्य से भरा हुआ। आज एक असावधान क्षण में बारूद के बुरादे की तरह अनायास कुछ चिलक उठा था शिराओं में। उसे घबराहट हुई थी, कुछ वर्जित-सा घटा हो जैसे।

इसके बाद उसने उसे चाय के साथ क्रोसिन की गोली दी थी, डॉक्टर को बुलाया था। डॉक्टर ने दवाई के साथ मलेरिया का टेस्ट करवाने की हिदायत दी थी। कई घंटे तक वह उसी तरह बेसुध पड़ा रहा था। इस बीच वह उसे कई बार चुपचाप देख आई थी, दवाई दी थी, दलिया और सूप बना कर सरहाने रख आई थी।

यह सब करते हुये वह एक अजीब-सी मनःस्थिति से गुज़री थी। अर्से से जोगियों का डेरा बन गया मन एक वर्जित सुख और अबूझ ग्लानि से धीरे-धीरे भरता रहा था। एक नए सिरे से अपने होने का एहसास हुआ था। इतनी भी गैर ज़रूरी, अवांछित नहीं वह! किसी की जरूरत है, किसी काबिल है... नमित के बाद भीतर का एक हिस्सा अकही इच्छाओं के दंश से जाने कब से अवश पड़ा हुआ था। उसने उस तरफ अर्से से झांकना छोड़ दिया था।

निसंग रातों की निबिड चुप में उसकी औरत उसके भीतर मुंह पर हाथ रख निःशब्द रोती है। वह उसे किसी तरह चुप नहीं करा पाती। ऐसे समय उसे खुद से वितृष्णा होती है। क्यों एक आम औरत की तरह वह अपने कमज़ोर क्षणों में किसी का कंधा चाहती है! आईने में प्रतिबिम्बित अपना विधवाओं का-सा रूप उसे क्यों दहशत से भर देता है! चलते हुये अपने बगल के खालीपन का एहसास उसमें हरदम बना रहता है...। कौन था जिसे वहाँ होना था! किसका ना होना हमेशा से उसका होना बना हुआ है! सघन शून्य से भरे आप में अब भी किस साहचर्य की गुंजाइश बाकी है! क्यों जो खत्म हो गया हमेशा के लिए वह हर पल इस तरह जीवित है उसमें... मरने से पहले क्या वह कभी नहीं मर पायेगी! रात के सघन एकांत में ठूंठ जिस्म के रगो-रेश में आज भी कुछ वर्जित-सा तीली-तीली सुलगता है, बंद मुंह भट्टी-सी अपने भीतर धुआँती वह अधजली पड़ी रहती है। बिस्तर का वनवास काटे नहीं कटता...

दूसरों की खिड़की पर चमकती खुशरंग परछाइयाँ, टुकड़ा-टुकड़ा तैर आती हंसी की आवाज़, तीज-त्योहारों में सुहागिनों का साज-शृङ्गार... वह सब कुछ देखती-सुनती चुप रहती है। चुप रहना सह जाना नहीं होता। बल्कि कई बार ठीक इसके उल्टा भी होता है। कोई निर्वाक खड़े खंडहरों की दीवारों से कान लगा कर सुने कभी... उसके अकहे की भाषा सबके लिए अबूझ है मगर वह तो समझती है अपनी बोली... परितयक्त देह की यह भाषा उसे आतंकित करती है! जो निसिद्ध है वही इतना दुर्वार क्यों है! उसके पास खुद के इन अराजक प्रश्नों का कोई जवाब नहीं। भागती फिरती है बस...

एक समय बाद मिस्टर कुमार का बुखार उतरा था। ‘अब कैसा लग रहा’ के जवाब में बस मुस्करा कर रह गए थे। गहरे साँवले चेहरे पर एक उजली मुस्कराहट! उसने पहली बार गौर किया था। निहायत साधारण मगर आकर्षक व्यक्तित्व। लंबा क़द, घनी बरौनियों से ढँकी-सी आँखें, कनपटियों पर अधपके बाल... वह झिझकते हुये उसकी चाय के साथ अपनी चाय का कप भी उस दिन उनके कमरे में ले आई थी। अजीब लगा था अर्से बाद किसी के साथ बैठ कर इस तरह चाय पीना। मिस्टर कुमार ने धीमी आवाज़ में कुमार गंधर्व का गीत बजा रखा था। दोनों ने चुपचाप चाय पी थी।

उसने गौर किया था, मिस्टर कुमार बहुत कम बोलते थे। बस ज़रूरत भर की बातें। वर्ना अक्सर बस ‘हाँ’, ‘हूँ’ में सर हिला देते। परिवार के प्रश्न पर बस इतना ही कहा था, नहीं है! बिस्तर के साइड टेबल पर रखी एक बेहद खूबसूरत महिला की तस्वीर बार-बार उसका ध्यान खींचती रही थी मगर उसने इससे आगे कुछ नहीं पूछा था। उसने महसूस किया था, उसके आसपास एक अदृश्य दीवार है जिसे पार नहीं किया जा सकता। बेहद तो उसने भी कुछ नहीं चाहा था मगर परिचय का दायरा इतना भी संकरा नहीं होता। एक समय से लगभग असामाजिक जीवन जीते हुये भी उसमें सम्बन्धों की गर्माहट की कुछ स्मृति शेष है। रिश्तों में शब्दों और अभिव्यक्ति की ऐसी भी कृपणता नहीं होती। मगर यह फिर कोई संबंध भी कहाँ... उसने खुद को याद दिलाया था।

तीसरे दिन उसने कुछ हैरत के साथ देखा था, मिस्टर कुमार के एक स्केच बुक में अपनी कुछ पेंसिल स्केचेज़। फर्श पर पड़ी हुई बुक उठाते हुये उसकी नज़र उन तस्वीरों पर अनायास पड़ गई थी—बैलकनी में बैठी रास्ता तकती हुई, किताब पढ़ती हुई वह... ऊपर शीर्षक था ‘अकेली’! उसने प्रश्न भरी आँखों से उन्हें देखा था। उन्होंने अपनी आँखें दूसरी तरफ फेर ली थी—बस कभी-कभार शौकिया कर लेता हूँ, कुछ इंटरेस्टिंग नज़र आया तो... आप अक्सर बैलकनी में अकेली बैठी रहती हैं...

ना जाने अचानक से क्या घटा था उसके भीतर। वह उठ कर चुपचाप अपने कमरे में चली आई थी। मिस्टर कुमार ने पीछे से उसे पुकारा था शायद।... अपने नितांत निसंग क्षणों में वह एकदम अकेली नहीं थी! किसी की नज़र में थी वह। सिर्फ आकृति नहीं, चेहरा नहीं, पूरे वजूद के साथ। उसका अकेलापन, उसकी उदासी कितनी मुखर थी उन तस्वीरों में! जैसे बोल रही हो। किसी ने उसे डूब कर देखा-महसूसा और अपने एकांत में सिरजा... एक सुख का स्वाद उसके पूरे वजूद में शहद की तरह बूंद-बूंद फैला था उस दिन और वह उसमें डूबी देर तक पड़ी रही थी। उन तस्वीरों में उसकी आँखें ठीक वैसी थीं जैसी कभी हुआ करती थीं—कम उम्र की उम्मीद और सपनों से भरी आँखें! उन आँखों का पता मिस्टर कुमार को कहाँ से मिला! वह तो कब की गुम गई थीं...

जीवन के पन्नों से दिन ब दिन लापता होते हुये कितनी बार उसने चाहा था, कोई उसका पता पूछते हुये आए, उसे ढूंढ निकाले! सबकी नज़रों के सामने वह युगों अदृश्य रही, छीजते हुये शून्य हो गई मगर किसी को इस बात ने कभी परेशान नहीं किया। लाल साड़ी में लिपटी लड़कियाँ एक दहलीज पार कर किस अरण्य में हमेशा के लिए खो जाती है कोई जानना नहीं चाहता... कथा-कहानी सुनाने बैठी सयानी औरतें अक्सर कहती हैं, घर के बियाबान से कभी कोई स्त्री जीवित नहीं लौटी... यह कहानी, कहानी नहीं उसकी तरह अनगिन औरतों के लिए उनका अकेला सच है! युग हुये, वह अपने घर के जंगल में भटक रहीं, सपाट दीवारों में खिड़की तलाश रहीं... आकाश के संधान में निकली स्त्रियाँ ज़मीन के आखिरी छोर पर पहुँच बार-बार समझी हैं, हर रास्ता वही पहुंचता है जहां से शुरू होता है! चूल्हे-चौके, भांडे-बासन की एक गोल-गोल घूमती दुनिया है जिसके चाक पर वह आजीवन चढ़ी कहीं उतर नहीं पातीं। 

किसी चिट्ठी, निमंत्रण पत्र, बिल पर उसका नाम नहीं होता। जिस घर को छोड़ते हुये नमित ने एक बार मुड़ कर नहीं देखा, उसके दरवाजे पर आज भी उसी के नाम की पट्टी जड़ी है। इस विडम्बना को कौन समझे कि आज भी हर कागज पर उसे उसी की पत्नी बन कर दस्तख़त करना पड़ता है। परित्यक्त सब के लिए एक शब्द मात्र है मगर उसके लिए एक ऐसा सलीब जिस पर वह एक जमाने से सैकड़ों कीलों से ठूंकी जीवित टंगी ना जी पा रही ना मर पा रही। वह किसी जमात में नहीं अब। ना सधवा है ना विधवा...

सीमा की बातें बहुत निष्ठुर होती हैं मगर वह उनका प्रतिवाद नहीं कर पाती—रात-दिन एक कर जो घर बनाते हैं वह घर मजदूरों का नहीं होता। उसके दो हाथ उम्र भर किराये पर उठे होते हैं। उसी का ताउम्र खाते-जीते हैं! एक घर के नाम पूरा जीवन जीने वाली अधिकतर औरतें अंततः बेघर मरती है...

उस दिन की शाम बहुत घनी और उदास थी। आकाश लगातार झड़ रहा था। कॉलोनी की सड़के नदियों की तरह बह रही थी। घर छोटे-छोटे टापुओं में तब्दील हो गए थे जैसे। बिजली भी घंटों से गुल!

उसे लग रहा था, आज का दिन वह काट नहीं पाएगी। बुखार-सा आया हुआ था। सांसें गरम और बोझिल! बार-बार किशोर को फोन लगाया, बेटी को भी। सभी व्यस्त। बेटी किसी बाबा के थान पर बैठी है, किशोर फूड फेस्टीबल में व्यस्त। तेज़ बजते संगीत के बीच अधैर्य आवाज़ में जल्दी-जल्दी जाने क्या कह कर फोन रख दिया था। वह उसे बताना चाहती थी, नमित आया था। मगर बता नहीं पाई।

कैसे बताती कि वह ऊपर नहीं आया, नीचे कार में बैठा रहा। अपनी नई पत्नी के हाथों रुपये भेजा। उसके हाथ से रुपये लेते हुये उसका क़द जैसे ज़मीन से जा लगा। नई दुल्हन के माथे का दपदपाता सिंदूर, हाथ की ताज़ा मेहंदी, सुहाग गर्व से दिपता चेहरा... देखते हुये उसके भीतर का बचा-खुचा सव्र ढह गया। उस दिन हरितालिका तीज था। समझ सकती है, नमित ने उसे टॉर्चर करने का यह नया हथकंडा खोज निकाला है मगर फिर भी खुद को चाहते हुये भी बचा कहाँ पाई! कच्ची दीवार-सा मन बेआवाज बैठ गया...

सीमा किसी रिश्तेदार के यहाँ शादी में गई हुई है। उसने अपने चारों ओर देखा, कहीं कोई नहीं। कुछ देर पहले पड़ोसन के वहाँ भी जा आई। उनके घर शायद कोई पार्टी चल रही। अंदर जाने को झिझक महसूस हुई। खिड़की पर अविराम झड़ते आकाश को तकती वह बैठी रही। कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई। जिस अंधेरे से डर लगता था आज उस अंधेरे ने उसे निगल लिया था। भीतर भी कोई तटबंध टूट गया हो जैसे। मन बाढ़ चढ़ी नदी-सा हो रहा।

दिन की आखिरी रोशनी कब आकाश में सिमटी, शाम गिर कर गहराई और रात बनी, उसे पता ही नहीं चला। बस पाने-खोने का हिसाब लिए एक अजीब ज़िद्द में बैठी रही। इसमें हमेशा कमजोर हो कर भी वह देख सकती है, पाने का घर एकदम शून्य! जो दिया कभी लौट कर नहीं आया। मन, देह अकाल का रिक्त कोठार, हर मौसम में! उसे अपना जन्म भर का इंतज़ार याद आया, सबकी अवज्ञा और अपना बूंद-बूंद रिसना याद आया। वह धीरे-धीरे बिना खाद-पानी के उलंग, कुरूप ठूंठ होती गई मगर अभिशप्त यक्ष-सा यह मन जाने क्यों जीवित रहा... वह कब मरेगी! वह मर क्यों नहीं जाती... वह रोती रही थी। आज किसने उसे जगा दिया! उसे तो अपनी ज़िंदगी की आदत हो गई थी। वह अकेली है, परितयक्त है... सब ठीक तो था! कोई क्यों उसकी भुली हुई आँखें ढूंढ लाया… आँखों के कोर फट कर आंसूँ उतरे थे—फिर से मरने में कितना वक़्त लगेगा!

रात गहराते-गहराते उसे सचमुच बुखार चढ़ आया था। आँखें गुड़हल-सी लाल! रात के दो पहर जाने कितने युग-से बीते। घिसट-घिसट कर। वह सन्निपात की रोगी-सी अपनी दुर्बोध्य भाषा में जाने क्या-क्या बड़बड़ाती रही थी। अंधकार के दैत्य उसके आसपास खड़े उसे घूर रहे थे और वह काजल काले जल के विशाल ताल में डूबती-उतराती छटपटा रही थी। ओह! उससे सांस नहीं ली जा रही। ऐसे तो वह सचमुच मर जाएगी... कोई है!

उसने सामने बिछे अंधकार में अपने हाथ पसारे थे... एक स्थिर शून्य के सिवा कहीं कुछ नहीं था। उसने घबरा कर अपने चारों तरफ टटोला, वही काला, अंतहीन शून्य! जैसे वह किसी अंधे कुएं में धँसे जा रही या किसी ने उसे पहाड़ की चोटी से यकायक धक्का दे दिया है और वह सपाट दीवार से नीचे की ओर तेज़ी से फिसली जा रही। उसकी हथेली, पाँव के पंजे एकदम ठंडे, अवश, फेफड़ों में बर्फ के बुरादे ठूँसे हुये... उसने अपने नाखूनों से दीवार खंखोर दिये, गलफड़े खोल हाँफती हुई मछली की तरह सांस के लिए छटपटायी—ओह! उसे कितना डर लग रहा! कोई है! घिग्घी बंधी हुई आवाज़ में उसने एक बार फिर पुकारने की कोशिश की—माँ! किशोर! रुना...! अंधेरे में गिरती-पड़ती, टटोलती हुई जाने कब वह मिस्टर कुमार के दरवाज़े से जा लगी थी। दरवाजा निःशब्द खुल गया था!

सुबह कमरे के बाहर पूरा मुहल्ला इकट्ठा था। किशोर ने पीट-पीटकर दरवाजा तोड़ डाला था। दूध वाला कह रहा था, हमको तो कई दिन से खटका लगा हुआ था किशोर बाबू! मुंह अंधेरे चाय, गाना-बजाना... पड़ोसन हाथ लहरा-लहरा कर धिक्कार में फटी पड़ रही थी—मैंने तो खुद अपनी आँखों से कितनी बार देखा कमरे में आते-जाते! तीमारदारी, नित नये पकवानो की खुशबू, हंसी... किशोर अपने पापा को फोन लगा रहा था—पापा! बस आप जल्दी चले आइये...

सुनते हुये वह पत्थर बन गई थी। भीतर ना कोई प्रतिक्रिया ना शर्म, ना ग्लानि। बस एक गहरा आश्चर्य और विस्मय—सालों रोती रही किसी को पता ना चला, पहली बार होंठों पर एक छोटी-सी हंसी खिली, सबने सुन लिया! जाने कितने अरसे बाद उसे कल रात के अंधेरे ने नहीं डराया था। वह दो बाँहों की सुरक्षा में निश्चिंत सोई थी। मगर अब उसे इस दिन के उजाले में डर लग रहा। ओह! कितनी हिकारत से भरी आँखें, विष बुझी आवाज़ साँप की तरह फन काढ़े इस आवाज़, टिटकारी, भर्त्सना के ठांठे मारते समंदर में हिशाहिशा रही... सबको पता चल गया है, उसने अपना ही जीवन कुछ देर के लिए जी लिया है! यह वर्जित है, उसे पता नहीं! पूरी दुनिया इसकी सज़ा मुकर्रर करने के लिए उसके दहलीज पर आ जुटी है!


जयश्री रॉय
तीन माड मायना सिओलिम वारडेज़ गोवा 4034517
ईमेल jaishreeroy@ymail.com

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1 टिप्पणियां

  1. मन को बहुत अच्छी तरह पढ़ती हैं आप और अव्यक्त को अभिव्यक्ति कमाल की देती हैं।....फुरा के आंसू भी आप ही की है न। हमने बुकमार्क कर रखी है।

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