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रेणु हुसैन की कहानी - आला जी | Hindi Story by Renu Hussain



समाज सेवा से जुड़ीं  कवियित्री रेणु हुसैन पेशे से सरकारी स्कूल नेताजी नगर सर्वोदय विद्यालय में अंग्रेजी की शिक्षिका हैं । रेणु हुसैन के दो कविता संग्रह “पानी प्यार” एवं “जैसे” और एक कहानी संग्रह “गुण्टी”  प्रकाशित हैं ।उनके आगामी काव्य संग्रह का नाम ‘घर की औरतें और चाँद‘ है। आजकल उनका रुझान ग़ज़ल लिखने की ओर है और उनकी लिखी ग़ज़लें तरन्नुम में सुनी जा रही हैं। उनकी ‘आला जी’ कहानी पढ़कर यह अहसास होता रहा कि समाज को असामाजिक नहीं होने देना समाज की, आपकी जिम्मेदारी है।  

शब्दांकन संपादक

आला जी

— रेणु हुसैन

घर में राहत का माहौल काफ़ी लम्बे अरसे बाद बना था। दरअसल बहुत दिनों बल्कि महीनों बाद रसोईया अलाउद्दीन अपने गांव से लौट रहा था। उसे उपनाम “आला” जी कहकर पुकारा जाता था। 


अब रसोई का नीरस वातावरण फिर संगीतमयी हो जाएगा, आला जी खाना बनाते हुए नात गाया करते थे ना, वे गाते भी डूबकर थे। कहते थे खुदा के नाम से खाना स्वादिष्ट बनता है और खाना बनता भी लाजवाब था। लोग उंगलियां चाटते रह जाते। सुनीति यानि घर की स्वामिनी के ऑफिस तक आला जी के बनाए खाने के चर्चे थे। सुनीति का टिफ़िन जब खुलता तो खुशबू ही बता देती कि आला जी लौट आए हैं...पूरे ऑफिस में खुशी की लहर दौड़ उठती...सुनीति की कलिग्स कहतीं,

“तो आ गए आला जी...अब तो मज़े आएंगे लंच में,” और कभी, “यार सुनीति बैंगन का भरता  कैसे बनाते हैं आला जी, इतना लाल रंग और स्वाद तो कभी हमारे भरते में नहीं आया...!! और सुनीति कहती, “अरे भरता क्या भरवां करेले, राजमा, छोले, भिंडी सबकी रेसिपी ले लो... क्या अच्छा नहीं बनाते ये पूछो...!” और ऑफिस ठहाकों से गूंज  उठता। आला जी का दिल भी बड़ा था। खाना भर-भरकर भेजते थे। उनके भेजे बनाए खाने में बड़ी बरकत होती थी। अब तो स्टाफ के लोग उनसे अपनी फ़रमाइश भी करने लगे थे। ये अलग बात है कि कभी-कभी खाना नियत समय से बहुत देर में मिलता था। 


आला जी जब भी छुट्टी पर जाते दो चार महीने तो लगा ही देते थे मगर फिर भी उन्हें काम से हटाया नहीं जाता था बल्कि छुट्टी के दिनों की तनख़्वाह दी जाती थी। ये सब उनके स्वादिष्ट खाना बनाने की वजह से होता था। साथ ही उनके विनम्र व्यवहार की वजह से भी। जितना लजीज़ खाना बनाते उतना ही रस उनकी बातों में टपकता था...कहते, “इंसान का आचरण बात विचार अच्छा होना भी सुन्नत है। पूछा गया है कि अल्लाह को कौन सा इंसान पसंद आएगा तो फ़रमाया गया है नमाज़ रोजा जकात की पाबंदी करने वाले के बराबर ही अखलाकमंद इंसान की भी बख्शाइश होगी...” और वे कुरानशरीफ की किसी आयत का हवाला दे देते। वे हर हिदयत या सीख या जीने के तौर तरीके के लिए आयतों का जिक्र करते। जो सुनीति और उसके बच्चों की समझ से परे होता। मगर मायने समझ में आ जाते थे। 


उनके जाने के बाद कई रसोईयों से खाना पकवा कर देखा जाता था मगर उनकी तोड़ का कोई रसोईया मिल ही नहीं पाता था। सो घर के सदस्य उनका इंतजार दिन गिन-गिनकर करते। उनके जाने के बाद किसी-किसी तरह से मुंह बनाकर, उदास मुद्राओं में खाना खाया पकाया जाता था।


घर के सदस्यों के साथ घर के बाकी कर्मचारियों जैसे दो सफ़ाईवाले, तीन ड्राईवर, गेट-गार्ड, आया, ऑफिस बॉय आदि भी आला जी को याद करते और उनके आने का समय फ़ोन करके पूछते रहते थे। स्टाफ़ के सदस्य उन्हें मम्मा कहकर बुलाते...’मम्मा’!! नाम सुनकर सुनीति चौंकी थी! उसके जवाब में बस सबकी झुकी नज़रें और मंद सी मुस्कुराहट ही आ पाई थी, पर सुनीति मैडम समझ गई कि आला जी का किरदार इन सबों के बीच मां जैसा है। आला जी की चाल में भी औरतों-सी लचक थी। मुस्कुराने और बात करने का तरीका भी औरतों-सा था। पर मम्मा के नाम पर पूरा उतरना इस बात पर निर्भर था कि खाना वो मां की तरह परोसते ही नहीं थे बल्कि ड्राईवरों के नखरे भी सहते थे। भी थे। अक्सर देर से आने वाले के लिए जागकर इंतज़ार करते और खाना गरम करके खिलाते थे।


इतना ही नहीं पूरे घर में या स्टाॅफ के परिवार का कुशल मंगल पूछते, किसी का बच्चा बीमार होने पर बुजुर्ग सास या मां की तरह बतो कि नज़र लग गई होगी, आंखें देखो चढ़ी हुई हैं क्या, नमक-मिर्च-निम्बू से नज़र उतार दो और जान माल का सद़का यानि कुछ पैसे या अनाज दान कर दो। किसी को सर्दी को या बदन में दर्द हर मर्ज़ का चलता-फिरता नुस्ख़ा थे आला जी, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, लौंग, जावित्री, सौंफ, काली मिर्च, पुदीना, अजवाइन, हींग के अनेकों प्रयोग और फ़ायदे इस्तेमाल में लाते थे, सुनीति को भी हिदायत देते रहते थे।


इतना ही नहीं उनके पास इन सबों के लिए ढ़ेरों किस्से थे जिसे वे रस ले ले कर सुनाते थें। उनकी किस्सा गोई की तो महफ़िल ही जम जाया करती थी। कभी-कभी गप्प बाज़ी में इतने मग्न हो जाते कि खाना बनने में भी देर हो जाती थी, पर इससे आला जी खासे परेशान नहीं होते थे और गप्प ख़त्म करने के बाद फुर्ती से हाथ चलाने लगते। जब पूछा जाता तो कहते, 

“अभी तैयार हो रहा है, “या अभी तो मैं पनीर लाया हूं”, या “अभी तो आलू उबल रहे हैं परांठे बनने में आधा घंटा लगेगा,” आदि-आदि...और तो और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने की भी आदत थी, जब हंसते तो दिल खोल कर, खिलखिलाकर...अपना गोल मटोल पेट हिला हिलाकर...इतना कि दूर से जाता आदमी भी रूककर पूछना चाहे और उनकी ख़ुशी में शामिल होना चाह ले। कुल मिलाकर सर्वंट क्वाॅटर्ज में बिना टीवी के भी मनोरंजन का पूरा इंतज़ाम होता था। उस पर उनकी काया ही कुछ ऐसी थी मध्यम कद, मोटे गोल मटोल और सांवला पक्का रंग, नाक नक़्श तराशा हुआ था जो कि उनके सांवले रंग में लगभग छुप ही जाता था। आला जी अक्सर हल्के रंग के पठानी सूट यानि सलवार जम्पर पहनते थे जिन्हें पहन-पहन कर घिस दिया करते थे। उनके कपड़े बुरी तरह से छिज जाते थे। जब उन्हें उन जोड़ों को त्यागने के लिए कहा जाता तो कहते कि इनमें आराम मिलता है, गर्मी नहीं लगती जबकि उन्हें पसीने बहुत आते थे। जब रसोई में होते तो पसीने से तरबतर ही रहते। इसी कारण खाना उनसे बनवाना सबको मंजूर था पर खाना लगाने उठाने के लिए किसी और लड़के को ही रखा जाता था।


...तो आला जी आख़िर पहुंच ही गए। सुबह से ही दालान में चहल कदमी की आवाज़ें आने लगी... मालूम हुआ कि इस बार उनकी बीवी और बच्चे भी आये हैं यानि बीवी और तीन बेटियां, बेटा ज़ीशान घर पर गांव में ही रूक गया है बूढ़े मां बाप को देखने के लिए। उनकी बीवी उनसे विपरीत दुबली पतली मध्यम कद की महिला थी। बीबीजी अर्थात् सुनीति ने सर्वंट क्वाॅर्टर मे आला जी को एक कमरा दे रखा था। अब उसमें वे अकेले रहें या उनका परिवार सुनीति मैडम को फर्क नहीं पड़ता था। उनके इसी स्वभाव के कारण कभी-कभी तो आला जी की सालियां भी सपरिवार आ जाती थीं दिल्ली घूमने या सरकारी अस्पताल में ईलाज करवाने। 


सुनीति और उसके बच्चों के लिए आला जी किसी अपने से कम नहीं थे। सुनीति उन्हे बेझिझक घर अलमारी की चाभियां दे घूम आती थी। जाते समय जब ध्यान रखने को कहती तो आला जी मुंह में कुछ पढ़ते और कहते, “जी मैडम जी अब मेरी ज़िम्मेदारी पे घर है... घर अब अल्लाह के हिफ़्जो अमान में हुआ... अब न जान पर न माल पर कोई आंच आएगी, अगर ऐ छड़ भी यहां से वहां हुई तो मुझे अल्लाह के घर में जवाब देना होगा...तौबा-तौबा अल्लाह ऐसा काला दिन न दिखाए...”और आला जी दोनों हाथ खोल आसमान की ओर देख कुछ बुदबुदाने लगते। आला जी पांचों वक्त नमाज़ी थे, रोज़ेदार, तिलावतों में खाली वक्त बिताने वाले एक सच्चे मुसलमान थे, कहते,

“मुसलमान का अर्थ है मुसल्लम यानि पूरे ईमान वाला...वो कोई भी हो सकता है जिसका ईमान यानि ईश्वर पे विश्वास पक्का हो। बेईमान की कोई जगह नहीं, ना इस दुनिया में न उस दुनिया में।” सुनीति जब भी घर की रखवाली उनपर सौंपकर जाती वो बाहर से ताला लगाए घर के बाहर बैठे मिलते। 


सुनीति ने फिर उनसे कहा था कि आप बाहर क्यूं बैठे रहे कम से कम रसोई में ही बैठे रहते या आराम कर लेते!! बच्चों के साथ बैठकर भी आला जी खूब गप्प किया करते थे, कहते,

“पानी बैठकर पीजिए घुटनों में दर्द नहीं होगा, तीन घूंट में पीजिए हाज़मा सही रहेगा, ईश्वर का नाम लेकर और पानी को देखकर पीजिए...पानी और पानी देनेवाले का आदर होगा...पानी भी एक नेमत है...और तो और सबको नमस्ते करने से दस नेकियां मिलती हैं।” गुनाह से बचाती है नमाज़ और सबाब अलग, ”बच्चों को ये बातें पूरी तरह समझ नहीं आती थी वे वहां से कनखियों में इशारा कर खिसक लेते थे मगर उनकी ना ख़त्म होने वाली हिदायतें चलती रहतीं।


सुनीति बहुत उत्सुक थी आला जी को ये बताने के लिए कि उसने उनकी गैरहाज़िरी में बहुत अच्छा खाना बनाना सीख लिया है, उनके रसोई में आते ही चहक कर उसने अपने हुनर की इत्तिला दी। आला जी ने भी हंसते हुए अदब से नज़रें झुकाकर कहा, “जी, मैंने तो तफ़सील से ये बात सुन ली है, सभी ड्राईवर और स्टाॅफ तारीफ़ कर रहे हैं आपके बनाए खाने की।” वो मैडम या साहब जी से ऐसे ही नज़र झुका के जी या जी ना में बात करते थे। 


सुनीति ने पूछा,

“और बताइए आपका मकान कहां तक पहुंचा?” यही कहकर छुट्टी गए थे इस बार आला जी...और जब भी दस पन्द्रह दिन के लिए जाते वहां से फ़ोन करते कि अभी काम बाकी है, कभी पिताजी बीमार है, कभी मां और कभी बीवी को दिल की बीमारी है...और इस तरह दो महीने बीत जाते थे। कहने लगे,

“जी मैडम...दीवारें तो खड़ी हो गई हैं...छत की ढ़लाई बाकी है...मैं तो जल्दी आ जाता पर अब्बा हज़ूर की तबियत काफी बिगड़ गई थी...उन्हें लेकर दरभंगा अस्पताल जाना पड़ा...बहुत ज़ईफ हो गए हैं, कुछ सूझता भी नहीं...वैसे तो वो ठीक ही थे मगर वजू करने कल (हैंडपम्प को कहा जाता है) पर गए तो फिसल गए और जानती हैं नाली में बह निकले...अब वो नाली पोखर में गिरती है...पोखर क्या है पूरा तालाब बन जाता है और बरसात में तो नदी...”उनकी बात इसी तरह से तूल पकड़ती थी, “सुनीति ने बीच में बात काटकर उत्सुकतावश पूछा,”वो तो ठीक है पर फिर पिताजी का क्या हुआ? बह गए...?

“नहीं मैडम, थोड़ा बह कर अटक गए...वो नाली कुछ ढ़लान पर थी...और ढ़लान के बाद पोखर...वो जिस पड़ोसी के आंगन में ज़ीशान के साथ सोते थे, क्योंकि छत ढलईया नहीं हुई है न, उन्ही पड़ोसियों ने अपनी ज़मीन का घेराव बांस से कर रखा है...बस उन्हीं बांसों की बाड़ में फंस गए...जब चापाकल पर कोई और पानी भरने गया तो बताया कि ज़िशान के दादा गिर पड़े हैं...हम लोग दौडे़...गांव का डाक्टर बोला हड्डी टूटी लगती है...दरभंगा ले जाओ... बस इसी सब में देर हो गई।” सुनीति ने राहत की सांस ली और पूछा,

“तो अब कौन देख रहा आपके अब्बा जी को?” “ज़िशान को अल्लाह रखे, बड़ी उमर करे, वहीं श्रवण कुमार की तरह दादा-दादी को देखता है, उसकी मां तो अक्सर बीमार ही रहती हैं...दिल का मर्ज़ है ना, तीन तीन बेटियां हैं...बेचारी परेशान रहती है, अब उसका ईलाज कराने यहां ले आया हूं...बच्चियों को कहां छोड़ता सो उन्हें भी लाना पड़ा, मैडम जी, जानती हैं मैं भी तीन बहनों का एक भाई हूं और मेरे अब्बा जी भी एक ही भाई रहें हैं...”आला जी नज़रें झुकाकर मुस्कुरा रहे थे...उनकी बातें अभी खत्म होने वाली नहीं थीं...सुनीति समझ चुकी थी और सुनीति ने बातों का सिरा सफ़ाईवाले को पकड़ा दिया और चलती बनी।


मगर कुछ दिन बाद ही बरसात शुरू होने पर आला जी को अपने घर की छत डलवाने की चिंता सताने लगी और वे मैडम के मार्फ़त साहब तक अपनी फ़रियाद भिजवाते रहे। कुछ मदद हुई और कुछ मदद के वादे से उनका काम बैलगाड़ी की रफ़्तार पे चल निकला। उनकी बीवी और ज़ीशान उनकी गैरहाज़िरी में फ़ोन के आदेशों पे छत बंधवाने लगे। उन्होंने अपनी बीवी की छिपी जमापूंजी के बीस हजार भी छत में लगवा दिए जिसका तकाज़ा उनकी बीवी पहले दिन से ही करती रही और आला जी आहिस्ते स्वरों में सुनीति मैडम से।


अभी दो महीने ही बीते थे आला जी को वापस आए, सुनीति ऑफिस से लौटी तो मालूम हुआ आला जी सामान बांध रहे हैं, पता लगा उनके बेटे का ऐक्सीडेंट हो गया है...बेटा साईकिल से जा रहा था ट्रैक्टर से टक्कर हुई है... बेटा बहुत गंभीर अवस्था में है...सुनीति के आने से पहले उन्हें विदा करने का इंतजाम हो चुका था...आला जी की आंखों में आंसू थे। सुनीति ने कुछ पैसे और सांत्वना देकर उन्हें विदा किया और कहा कि फिक्र ना करें पैसा दिया जाएगा बच्चे को बचाना है...और वे भारी मन से चले गए। सुनीति ने मन ही मन उनके अच्छे के लिए आंख बंद कर हाथ जोड़ प्रार्थना की।


उनके निकलते ही सुनीति को पता चला कि उनका बेटा दम तोड़ चुका है। उसे बचाया नहीं जा सका। अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में उसने अंतिम सांस ली। सारा घर अफ़सोस में था। सुनीति सोच रही थी। हे ईश्वर ये क्या किया!! एक भले आदमी की ऐसी कठिन परीक्षा...!! क्या बीतेगा आला जी पर...पहाड़ ही टूट गया है आला जी पर...एक ही बेटा था...


...अभी कल रात ही बता रहे थे ”सत्रह बरस का हो गया है जी़शान पर है बहुत दुबला। मुझपे तो बिल्कुल नहीं है, अपनी मां पर ही है। तीखा नाक, पतले होंठ...चलिए... हड्डी रही तो बदन पर गोश्त भी आ जाएगा। अल्लाह रखे। अपने साथ काम पर लगाऊंगा तो छत ढ़लवा लूंगा...फिर बेटियों की शादियां भी आराम से हो जाएंगी। जैसे मैंने अपनी बहनों की की हैं। ज़ीशान अपनी बहनों की करेगा...” मैडम जी कहता है तीन बेटियों की शादी पर एक हज का सबाब मिलता है, जिसे आप लोग गंगा नहाना कहते हैं ना...कहता है आप ही लेना हज का सबाब, मैं तो इंशा अल्लाह हज करूंगा और मां-बाप को करवाऊंगा भी... बूढ़े मां-बाप कितने दिन के हैं। बीवी भी बीमार रहती है...और देर रात तक जाने क्या-क्या कहते गए थे। जैसे सत्रह का ज़ीशान नहीं वे खुद हो गए हैं...उस रात उनकी आंखों में चमक थी और सांवले चेहरे पर गुलाबी रंगत जाने कैसे दिख रही थी। ओफ़...कितने सपने कितने अरमान होंगे, होते ही हैं...सब चूर हो गए। जीवन भी कभी-कभी कितना निष्ठुर हो जाता है। 


वहां पहुंचकर आला जी को सदमा लगना निश्चित ही था, उनकी बीमार बीवी बार-बार मूर्छित हो जाती थी। बूढे मां-बाप ज़ीशान ज़ीशान आदतन पुकारते थे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। वे भूल जाते थे और उनकी आंखों की बीनाई भी बहुत कम थी। जब उनकी पुकार का कोई जवाब नहीं आता तो चुप हो जाते और किसी शून्य में खो जाते...। “रे अब तक बउआ न लौटा है क्या? बहुत देर हो गईल...!!” कूण काम गेले है।


ज़ीशान ही दादा को नित्यकर्म के लिए ले जाता था। वह कभी-कभी दोनों को बच्चों की तरह गोद में उठा लिया करता था। चापाकल से बाल्टियां भर-भर लाना, सब्जी तरकारी, हाट बाज़ार करना उसी का काम था। उस दिन भी वह दादा-दादी की दवा लेने सरकारी अस्पताल जो किसी और गांव में था, गया था। उसे साईकिल से 3-4 गांव पार करने थे। ये सब उसके लिए या उसके जैसों के लिए सामान्य बात थी। वह साईकिल पर कोई नात गुनगुनाते हुए चल पड़ा था। वह ऐसा ही करता था। फिल्मी गाने वह नहीं सुनता था। उसने कुछ नई नातें भी लिख डाली थी। ऐसा आला जी ने बताया था। वह अक्सर महफ़िल लगाया करता था जिसे सत्संग ही कहा जाए तो बेहतर होगा क्योंकि अल्लाह की बातों और ज़िक्र के अलावा वह ज्यादा जानता नहीं था। दुनियादारी की बू अभी उसे नहीं लगी थी। उसके रास्ते में एक गांव का बाज़ार पड़ा था जहां उसकी साईकिल के आगे एक छोटा बच्चा आ गया था। उसने साईकिल रोक कर उसे गोद में उठा लिया और दुकान वाले से पूछा कि किसका बच्चा है? छोटा है...बच्चे को सड़क पर क्यूं खेलने छोड़ा है और दुकान पर ही उसकी मां आ गई थी। अपने बच्चे के कपड़ों पर से धूल पोंछकर दुलार करती हुई लौट गई। ज़ीशान आगे बढ़ा। दवा ली। वह खुश था कि उसे गोल्ड कार्ड मिल गया है। अब दवा और भी सस्ती बल्कि लगभग बिन पैसों के आएगी। उसने घर के लिए रस और फैन का एक-एक पैकेट लिया और लौट चला।


वह नहीं जानता था मौत उसका इंतजार कर रही है। वह अपनी धुन मे बढ़ रहा था। फिर उसी गांव उसी सड़क से लौट रहा था जहां बच्चा उसकी साईकिल के आगे आ गया था। वहां सड़क पर कुछ शोर था। लोग एकत्रित थे। उसे आता देख कर कुछ लोग उसे पहचान गए और चिल्लाए यही है वो लड़का...!! ज़ीशान उन्हें अपनी ओर आता देख साईकिल से उतरा। साईकिल पेड़ के तने से लगाई। इतने में लोग आकर उससे हाथापाई करने लगे। वह समझ नहीं पा रहा था वे लोग ऐसा क्यूं कर रहे हैं। वह पूछता जा रहा था और उसे मारा जा रहा था। उसे पास की दुकाननुमा कमरे में ले जाया गया और फिर मारा गया। उसे सुनाई दे रहा था इसी ने हमारे बच्चे को मारने की कोशिश की है। गुंडा समझता है खुद को...!! मासूम को मारेगा। यहां से बचेगा तब ना, और ना जाने क्या क्या। वह अपनी सफ़ाई देता रहा मगर उसकी सुनने वाला था कौन। उसके हाथ, मुंह, कान, नाक से खून बह रहा था। दुबला-पतला तो था ही। भारी भरकम बलिष्ठ आदमियों में कहां टिक पाया होगा। उसे अधमरा करके सड़क पर फेंक दिया। ट्रैक्टर की तो बस झूठी कहानी बनाई गई थी। दरअसल ये गांव ही गुंडों का गांव कहलाता था। ये लोग लट्ठबाज थे। इनसे चुनावी दिनों में राजनीतिक पार्टियां उनपर उल्लू सीधा करने के लिए पैसे के दम पर काम लेती रही थीं जबकि ये किसी पार्टी के नहीं केवल पैसे के भक्त थे। उच्च समाज में अपना कोई वजूद ना होते हुए भी अपनी बस्ती गांव समाज में ये ख़ासा रौबदाब रखते थे। किसी को भी मार गिरा देना और अपने दम ख़म का पदर्शन ये शौंकिया, अभ्यासवश समय व्यतीत करने और मनोरंजनवश भी करते थे। ज़ीशान उनके किस उद्देश्य में पूरा उतरा पता नहीं...अब तक वहां भीड़ इक्ट्ठी हो गई थी। उस भीड़ में आला जी के ही गांव का एक व्यक्ति उत्सुकतावश घायल को देखने बढ़ा तो ज़ीशान को देख दंग रह गया...खबर आग की तरह फैल गई...अब ज़ीशान को बचाने लोग आने लगे...यह देख उपद्रवी फ़रार हो गए.. पर यहां भी देर हो चुकी थी...ज़ीशान की मां को जल्द ही मोटरसाईकिल पर घटनास्थल पर लाया गया। कुछ लोग ज़ीशान को अस्पताल ले जाने निकल चुके थे पर उसने कुछ दूरी पर दम तोड़ दिया था। 


ये सारी बातें आला जी ने फ़ोन पर बताई थीं। आलाजी ने कहा, “मैडम जी...शहीद की मौत हुई है मेरे बेटे की, “वो कैसे?” “क्यूंकि मैंने जब उसे दफ़नाने से पहले नहलाया उसके नाक और कान में खून जमा था। ...पाक दामन मौत हुई है, इसे शहीद की मौत कहते हैं। जन्नत मिली है उसे...”


“हां...वैसे भी कोई पाप उसे छू तक नहीं गया था। “सुनीति ने कहा।?” जी मैडम जी बड़ा होनहार ख़िदमतगुज़र अल्लाह का नेक बंदा था...सबका दोस्त अमन पसंद था वो, किसी से उसकी दुश्मनी नहीं थी, जानती हैं उसे अपनी मौत का अहसास हो गया था। कहता था सपने में सफ़ेदपोश लोग उसे बुलाते हैं कि हमारे साथ चल। आखिर चला गया वह...अल्लाह को भी साफ़ सुथरे लोगों की ज़रूरत होती है...खैर जिसकी चीज़ थी उसने वापिस ले ली...मिट्टी की चीज़ मिट्टी में मिल गई...हमारा हक़ ही कहां है किसी पर,” सुनीति चुपचाप सुन रही थी, एक देहाती अनपढ़ में पते की समझ थी, जीवन के निर्मम सत्य का अनूठा ज्ञान था उसके पास। वह एक साधु संत की तरह बोल रहा था। 


वह फिर बोला, 


“मैडम जी”


“हां कहो...”


“कुछ पैसे भिजवा देतीं। केस करना है वो लोग गुंडे हैं, पावर वाले हैं...क्या करोगे।”


हां मैडम हम गरीब लोग हैं और मेरा बेटा भी अब नहीं लौटेगा और उसकी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी...बहुत अमन पसंद बच्चा था वह...उन लोगों के गुस्से और घमंड का शिकार हुआ है वह, गुस्सा तो हराम है मैडम जी, घमंड जब रावण का नहीं रहा तो इनका क्या रहेगा पर फिर किसी और गरीब का निर्दोष इकलौता बच्चा ना मारा जाए। आवाज़ तो उठानी होगी। रोक तो लगानी होगी।


“पर इतने पैसे?”


“मैडम जी आप थोड़े कर दीजिए...बाकी हम तो नमक रोटी खाकर भी लड़ेंगे...खेत बेचकर भी।”


सुनीति ने कुछ पैसे भिजवा दिए। कुछ महीनों बाद आला जी के अब्बा जी चल बसे। वे अक्सर रातों को उठकर ज़ीशान को ढूंढ़ने चापाकल तक पहुंच जाया करते थे। बड़ी पोती उनका हाथ पकड़कर अंदर ले आती और कहती, “क्यूं पुकारते हो दादा...भाई नहीं है।”


“सठिया गए हो का? अब कौन सहारा है।” हमरी उमर थी जाने की...मेरे ज़िगर का टुकड़ा चला गया।” अल्लाह रहम न किया हम पर। हम बीमार बूढ़ा-बूढ़ी का उठा लेते। मेरे घर का चिराग़ ही बुता दिया मेरा लाल छीन लिया। मेरी आंख का मोतिया बिन का इलाज कराने चला था। मेरी आंख का रोशनी छीन लीहिस...अभाग देके चैल गेल... “दादी महीन आवाज़ में रेंघाते हुए रोती और कराहती रहती और अब्बा जी की फौत के कुछ महीनों बाद उनकी अम्मी भी चल बसी।


आला जी की बीवी अब भी बिस्तर पकड़े हुए हैं...अब उसे मुर्छित होने की बीमारी लग गई है...आला जी केस की फाईल लेकर घूमते रहते हैं और हर अदालत, हर थाने में बताते हैं कि ट्रैक्टर से टक्कर हुई ही नहीं। साईकिल तो पेड़ के तने से लगी मिली। एक भी खरोंच नहीं है साईकिल पर। यहां तक कि रस और फैन तक नहीं टूटे। साबुत अनछुए रह गए हैं।



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