द्विशताब्दी: वाजिद अली शाह की वाजिब विरासत — दुष्‍यंत


वाजिद अली शाह: एक लखनवी - एक हिंदुस्तानी

— दुष्‍यंत

इश्क़ मिज़ाज, संगीत और नृत्‍य आदि कई वाजिब वजहों से वाजिद अली शाह को याद किया जाता है, वे वजहें अब जनश्रुतियों में शामिल हैं, उनके दोहराव से बचने की कोशिश की जाए

दुष्यंत (ट्विटर: @dushyantlive)

यह वाजिद अली शाह का द्विशताब्दी वर्ष है। तीस जुलाई उनका जन्‍म दिन है, व्‍यवहारिक रूप से, वे नज़ाकत और नफासत के लिए मशहूर अवध के आख़िरी नवाब थे। लगभग, उसी तरह जैसे बहादुर शाह जफ़र आख़िरी मुग़ल बादशाह और रणजीत सिंह आखिरी सिख सम्राट।  कहने को अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह के बेटे (और आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की पोती महताब आरा के पति) बिरजिस क़ादिर को मां बेगम हज़रत महल की रिजेंसी में अवध का नवाब घोषित किया था, पर यह नाममात्र की सत्ता थी। क्योंकि अवध के आख़िरी सम्प्रभु तो वाजिद अली शाह ही थे। दूसरे शब्‍दों में ‘मटियाबुर्ज का आख़िरी नवाब’ वाजिद अली शाह हिंदुस्तान की उस रवायत का आख़िरी शाही चिराग है, जिसे लखनऊ की गंगा-जमनी तहज़ीब कहा जाता है। 

अवध के राजा, वाजिद अली शाह, उनकी रानी और संतान (लखनऊ पर कब्ज़े के बाद दरबार के एक फोटोग्राफर के घर से मिली तस्वीर) 

अवध के नवाब की पदवी को अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह के पूर्वज गाजीउद्दीन हैदर के ज़माने में ही ‘राजा अवध’ कर दिया था। यही वजह है कि वाजिद अली शाह लखनऊ से कलकत्ते 'एक्स किंग ऑफ अवध' होकर गए।  लखनऊ के सबसे ज़हीन इतिहासकारों में से एक अब्दुल हलीम 'शरर' कहते हैं कि दिल्ली के बादशाह का ग़ुरूर तोड़ने के लिए कि मुल्‍क में अब नए किंगमेकर आ चुके हैं, अवध नवाब की पदवी में बदलाव किया गया। यह बात यकीनी तौर पर अवध की अहमियत का भी दस्तावेज़ है।

लखनऊ भारत के कंपनीराज के चार बड़े शहरों में से एक था

प्रसंगवश, अवध और लखनऊ का जो वैभव वाजिद अली शाह के वक़्त था, उसकी बात किए बिना वाजिद अली शाह को याद करना वाजिब नहीं है। ‘शरर’ साहब तो उसकी तुलना पेरिस से करते हैं, कोई बेबीलोन से करता है। विलय के बाद लखनऊ भारत के कंपनीराज के चार बड़े शहरों में से एक था, तीन बाकी शहर थे बनारस, कलकत्‍ता और बंबई। ब्रिटिश यात्रा लेखिका एमी रॉबर्ट्स लखनऊ में अरबी उपन्‍यासों का शहर देखती है। अवध के नवाब नसीरूद्दीन हैदर पर ‘प्राइवेट लाइफ ऑफ एन इस्‍टर्न किंग’ नामक किताब के लेखक विलियम नाइटन को लखनऊ की गलियों, सड़कों को देखकर मास्‍को, ग्रैंड कैरो जैसे शहरों की याद आती रही। वहीं, 1858 में लंदन के ‘द टाइम्‍स‘ अखबार के पत्रकार विलियम रसेल ग़दर को रिपोर्ट करने हिंदुस्‍तान आते है तो लखनऊ के लिए कहते है कि इस शहर ने खूबसूरती में रोम, एथेंस, कुस्‍तुंतुनिया जैसे शहरों को पीछे छोड़ दिया है।    

छत्‍तर मंजिल पैलेस, लखनऊ, दांयी तरफ: मछली के आकार वाली नवाब की नाव. 

अंग्रेजों के हाथों अवध के विलय, पराभव ने आधुनिक भारत के इतिहास की बड़ी घटना को प्रभावित किया, बंगाल आर्मी में सूबेदार सीताराम पांडे की अवधी किताब का अंग्रेजी अनुवाद 'सिपॉय टू सूबेदार'  अपनी तरह का अकेला अकाउंट है जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारतीय फौजी अफसर ने लिखा है। रायबरेली के एक गांव के सीताराम ने 50 साल अंग्रेजों की बंगाल आर्मी को दिए थे। यह किताब बताती है कि अवध के विलय ने कैसे 1857 की चिंगारी भड़काई, बैरकपुर से मेरठ होते हुए कैसे अंग्रेजों को उन्नीसवीं सदी में पूरे विश्व में साम्राज्यवाद को सबसे बड़ी चुनौती मिली। 

दिलकुशा कोठी, लखनऊ

1857 की क्रांति के लिए भले ही अवध और उसके विलय को इस तरह याद किया जाना चाहिए, वाजिद अली शाह को प्रेमपत्रों के लिए भी याद करना चाहिए, आधुनिक भारत के इतिहास में उनके जैसा विरला ही कोई शासक होगा जो इस तरह से प्रेम मे भीगे ख़त लिखता होगा। कलकत्ते से लखनऊ आने वाले खतों का मज़मून देखिए, उनमें बेगम अकलिल महल को लिखे ख़त काबिले उदाहरण है जो उनकी ब्रिटिश लाइब्रेरी में उपलब्ध किताब 'तारीख- ए- मुमताज़'  में मिलते है, कुल जमा कोई 29 ख़त होंगे। कुछ ख़त जवाबी हैं, यानी बेगम के ख़तों  का जवाब। अवध में प्रेमपत्रों की रवायत पहले भी थी, वाजिद अली शाह के पुरखे नसीरुद्दीन हैदर और उनकी बेगम मलिका जमाली के बीच पत्र व्‍यवहार में मलिका के प्रेमपत्र तो इतने खूबसूरत माने जाते हैं कि कवियों के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं। 

कलकत्ते में एक छोटा लखनऊ

इश्क़ मिज़ाज, संगीत और नृत्‍य आदि कई वाजिब वजहों से वाजिद अली शाह को याद किया जाता है, वे वजहें अब जनश्रुतियों में शामिल हैं, उनके दोहराव से बचने की कोशिश की जाए, शायद वाजिद अली शाह को एक बात के लिए सबसे कम याद किया जाता है, वह है कलकत्ते में एक छोटा लखनऊ बसा देना। उनकी नवाबी या राजा होने तक जो वैभव लखनऊ का था, इतिहास में  कम शहरों को नसीब होता है, उनके निर्वासन के बाद जैसे लखनऊ ने अपना प्रेमी, अपना दोस्त, अपना संरक्षक खोया, तो वाजिद अली शाह ने भी अपना महबूब शहर खोया, जो उनके जेहनोदिल में बसा रहा, उसी का नतीजा था कि अंग्रेजों ने कलकत्ते में कुछ वक्‍त फोर्ट विलियम में कैद रखने के बाद हुगली के किनारे, गार्डन रीच इलाके में उन्हें बसाया, उसे वाजिद अली शाह टुकड़ों-टुकड़ों में लखनऊ का मिनिएचर बनाने में लगे रहे। और उन्हें उसी इलाके के हिस्‍से के नाम से 'मटियाबुर्ज का आख़िरी नवाब' कहा गया। उनके इस प्रवासी जीवन पर कलकत्ते के पत्रकार निखिल सरकार उर्फ श्रीपंथ ने बंगाली में  'मेटियाबुर्जेर नबाब' नाम से बहुत सुंदर किताब लिखी। इस तरह से लखनऊ का कलकत्ते से यह जो रिश्ता बनता है, इस पर बौद्धिकों ने  कम नज़रे इनायत की है, और हावड़ा के पुल सरीखा सम्बन्ध सेतु वाजिद अली शाह ही थे। 

मछली: अवध की मोहर, राज्य चिन्ह, सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा, मटियाबुर्ज, कलकत्ता
(फोटो: http://double-dolphin.blogspot.com)

सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा, मटियाबुर्ज, कलकत्ता
(फोटो: http://double-dolphin.blogspot.com)

वाजिद अली शाह एक लखनवी 

सियासी या तंत्र के नज़रिए से देश बदला है, अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। पुराने प्रतीकों को याद करने में कई बार राजतन्त्र या सामन्तवाद को महिमामंडन की गन्ध आ सकती है, पर इस देश के बाशिंदों के रूप में उनके कामो  को देख पाएं, निंदा, महिमा की बजाय लोकतंत्र में भविष्य के लिए कोई पाठ ले पाएं तो ही इतिहास की अहमियत है। वाजिद अली शाह को नवाब या राजा की बजाय एक लखनवी या हिंदुस्तानी के रूप में याद करें, उसके ऐसे कारनामों को देखना चाहिए जो मनुष्य के रूप में उन्हें दर्ज करते हों, तहजीब और बौद्धिक उपलब्धियों के नज़रिए से वाजिद अली शाह को उनके जन्म के दो सौ साला मौके पर  समझने की कोशिश होनी चाहिए।

उनसे हमारी तार्किक शिकायत हो सकती है, कि अंग्रेजों के सामने उतनी ताक़त से खड़े नहीं  हुए, जितना होना चाहिए था, पर यह निर्णय हम तत्कालीन ऐतिहासिक स्थितियों को नज़रअंदाज़ करके ही दे सकते हैं। भारत जैसे महादेश के नए संप्रभु के रूप में अंग्रेज जैसे उभर रहे थे, जितने ज़ालिम थे, वाजिद अली शाह जैसे कलाप्रेमी, कोमल हृदय  व्यक्ति के लिए विकल्पों की सीमा थी, या कहा जाए, लगभग विकल्प हीनता का ही समय आ गया था।  
(साभार: नवभारत टाइम्स)

 (ये लेखक के अपने विचार हैं।)


छत्‍तर मंजिल पैलेस, लखनऊ

ला मार्टिनियर, लखनऊ

रूमी दरवाजा, लखनऊ

बड़ा इमामबाड़ा, लखनऊ


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