सपना सिंह की कहानी - अफसर कथा | Sapna Singh ki Kahani - Afsar Katha

पढ़िए सपना सिंह की सच बतलाती, भुलवाती रोचक कहानी 'अफसर कथा' — क्योंकि यही तो दुनिया है और यही है माया । ~ सं० 


Sapna Singh ki Kahani - Afsar Katha

सपना सिंह, एम.ए. (इतिहास, हिन्‍दी) बी.एड.। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान के किशोर कालमों सें लेखन की शुरूआत, पहली कहानी 1993 के सितंबर हंस में प्रकाशित. लम्बे अंतराल के बाद पुन: लेखन की शुरूआत हंस, कथादेश’, परिकथा,  इत्यादि में दो दर्जन से अधिक कहानियॉं प्रकाशित। आकशवाणी से कहानियों का निरतंर प्रसारण। प्रतिलिपि, सत्याग्रह, शब्दाकंन, हस्ताक्षर, पहलीबार, मेराकी ,नॉटनाल वेब पत्रिकाओं में कहानियां। उपन्यास: तपते जेठ में गुलमोहर जैसा, वार्ड नंबर सोलह इलाहाबाद रोड , धर्महत्या। कहानी संग्रह़: उम्र जितना लम्बा प्यार, चाकर राखो जी, बनते बिगड़ते तिलिस्म, अपनी सी रंग दीन्ही। संपादन: देह धरे को दण्ड (वर्जित संबंधो की कहानियाँ 
संपर्क: द्वारा प्रो. संजय सिंह परिहार, म.नं. 10/1467, अरूण नगर रीवा (म.प्र.) मो० 09425833407 ईमेल: sapnasingh21june@gmail.com


अफसर कथा

सपना सिंह


डिस्क्लेमर: 'इस कहानी का किसी 'कांड' (स्कैंडल) से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। न ही किसी परीचित अपरीचित व्यक्ति से कोई सम्बन्ध है '! 


अफसरशाही का एक अलिखित नियम है आप जबतक पकड़े नहीं गये जबतक बेदाग हैं। जबतक आपके कागज पत्तर सही हैं तबतक कोई आपको पकड़ नहीं सकता। सिस्टम इसी तरह काम करता है। आप अपने ऊपर और नीचे वालों का ध्यान रखिए। बस, काम होते रहेंगे, सरकार चलती रहेगी, देश चलता रहेगा। कहावत भी है, ' देश सरकारें नहीं चलातीं, ब्यूरोक्रेट्स चलाते हैं !' 

तो, इसी सिस्टम के ऐसे ही एक सरकारी अफसर अचानक ही ख़बर बन गये। देश के मुख्य समाचार पत्रों से लेकर न्यूज चैनलों तक में प्रमुखता से ये ख़बर छायी थी और एक बड़े स्कैंडल के रूप में इसकी धमक देश की राजधानी तक पहुंच चुकी थी। ऐसा माना जा रहा था कि इस स्कैंडल की जद में प्रदेश के कई ब्यूरोक्रेट्स, बड़े नेता और बिजनेसमैन भी आ रहे हैं। 

प्रथम दृष्टया मामला ख़रीद-फ़रोख़्त का था। तुमने बेचा हमने ख़रीदा। सीधी-सी बात। पर बात इतनी सीधी होती तो स्कैंडल किस बात का... ब्रेकिंग न्यूज किस बात की। ख़रीद बेच आलू टमाटर की थोड़े थी, जिस्मों की थी। आदमी को पैसे और सेक्स का नशा होता है। पैसा अपने साथ पावर लाता है। और ये पावर आदमी को किसी भी सीमा को क्रास करने की हिम्मत देता है। सीमाओं की भी एक सीमा होती है, उससे परे जाना सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है। हालांकि पुरुषों की दुनिया में चरित्रहीनता के ये मापदंड काम नहीं करते। ज़्यादा से ज़्यादा औरतों के साथ सोना और बड़ा से बड़ा पद प्राप्त करना जिसमें घूसखोरी की अनंत संभावनाएं हों, ज़्यादातर पुरुषों की फैंटेसी होती है। अपने किसी जानने वाले को इन दोनों फैंटेसी को साकार करते देख वे भले ही सामने उसकी थू-थू करें पर मन के भीतरी तहों में वे उस पुरुष से घनघोर ईर्ष्या पाले हुए होते हैं। 

अपवाद स्वरूप एक-पत्नीव्रता पुरुष भी होते हैं इस दुनियां में। उनमें भी आधे ही सच्चे होते बाकि आधे डरपोक। 

तो ये एक सनसनीखेज़ मामला था। एक उच्च अधिकारी ने ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट करवायी थी। शहर की पॉश कॉलोनी में स्थित एक शानदार घर में रहने वाली एक स्त्री उनसे तीन करोड़ रुपये की मांग कर रही है... न देने की स्थिति में उनके कुछ आपत्तिजनक वीडियो उनके परिवार वालों को भेजने और वायरल कर देने की धमकी दे रही। मामला गंभीर था। शिकायतकर्ता सम्मानित उच्च अधिकारी थे। जिस थाने पर शिकायत करने पहुंचे थे, वहां का इंचार्ज उन्हें जानता था। जिसके विरुद्ध शिकायत की जा रही थी, उसे भी अच्छे से जानता था। भाई प्रोफाइल मामला था। शासन प्रशासन हर जगह हड़कंप मचा ही था। 

ऐसी खबरें हर घर के ड्राइंगरूम से लेकर गली मुहल्ले के नुक्कड़ पर चर्चा का विषय बनती हैं। लोग नैतिकता की दुहाई देते हैं, फंसे हुए लोगों की लानत-मलामत की जाती है, कुछ दिन बाद ऐसा ही कोई और स्कैंडल अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जगह पाता है, कोई और ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ बनती है। इस ख़बर ने बहुत दिनों तक शासन प्रशासन में हड़कंप मचाया। बहुत से रसूखदार उच्चाधिकारियों, नेताओं और सफेदपोश नागरिकों पर तलवार लटकती नज़र आ रही थी। नग्न वीडियो वायरल हो रहे थे जो आमलोग अपने दोस्तों परीचितों से प्राप्त कर रहे थे और निस्वार्थ भाव से आगे प्रेषित किये दे रहे थे। 

कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ता दिखाई देने लगा। जिस अफसर ने ब्लैकमेलिंग की शिकायत की रिपोर्ट लिखवाई थी, उन्हें नैतिक आधार पर तत्काल सस्पेंड कर दिया गया। वो अपने सस्पेंशन के ख़िलाफ़ कोर्ट में लड़ते रहे। पर लड़ाई अदृश्य-सी उनके चारों तरफ भी लड़ी जा रही थी जो प्रत्यक्षत: दिखाई तो नहीं देती थी पर महसूस शिद्दत से होती थी ! ये कहानी उन्हीं की है। सुनिए! 

यही मुन्नू भैया, मुन्नू दादा, मुन्नू यानि 'मनजीत सिंह मुन्नू ' इसी नाम से वो अपने जानने वालों में जाने जाते हैं। 

प्रदेश के एक पूर्वी जिले में उनका जनम-करम, माता-पिता, पढ़ाई-लिखाई दोस्त-यार शिक्षक सभी थे। इंजीनियरिंग करते ही सरकारी नौकरी लग गई थी। बहुत ख़ूबसूरत लड़की से शादी भी हो गई। समय से दो बच्चों के माता-पिता भी बन गए। जीवन में सब ठीक ही था। जहां भी रहे उनसे मातहत अफसर सभी खुश। समयानुसार पदोन्नति भी पाते रहे और कालान्तर में अपने विभाग के कमिश्नर हुए। यार-बाज़ थे। पुराने दोस्तों से जब मिलते, ठहाकों का समां बंध जाता। गाने के शौकीन थे। एक दोस्त ने आर्केस्ट्रा बना रखा था। जब अपने पैतृक नगर में होते तो जहां कहीं दोस्त का आर्केस्ट्रा प्रोग्राम होता वहीं सारे दोस्तों के साथ बिना अपने पद और कद की परवाह किए पहुंच जाते। फिर तो मंच पर समां बंध जाता। जिसके घर पर कार्यक्रम में आर्केस्ट्रा रहता वो गर्व से गदगद हुआ रहता। आखिर मनजीत सिंह मुन्नू उनके घर के कार्यक्रम में गाने गाए, ये तो ख़ास बात हुई ही। बाद में उनके पीछे लोग बातें करते — जरा भी नहीं बदले मुन्नू... राजा आदमी हैं मुन्नू भईया। 

जब सोशल मीडिया के तमाम प्लैटफॉर्म से लेकर लोगों के वाट्सेप तक पर इन्ही मुन्नू भैया की रंगरेलियां नितांत अपरीचितों से लेकर बेहद क़रीबी लोगों तक वीडियो और समाचार के माध्यम से पहुंचने लगे तो ज़ाहिर-सी बात थी एकाएक उनके आभामंडल की रौशनी धूमिल हो गई। उनके एक जिगरी दोस्त जो बचपन से उनके साथ पढ़े थे, साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फिर एक निजी कंपनी में नौकरी की। मुन्नू हमेशा अपने उस दोस्त को राजा आदमी कहते थे। अचानक बिमारी में उस दोस्त की मृत्यु हो गई थी। मुन्नू अक्सर उस परिवार की मदद के लिए तत्पर रहते। दोस्त की पत्नी उनके लिए आदरणीय रहीं। दो बेटियां भी थीं उनके। बड़ी बेटी के विवाह में भी मदद की उन्होंने। छोटी के लिए स्वयं अपने बेटे के बारे में सोचा था उन्होंने। जब भी पति पत्नी या वो अकेले ही, पैत्रिक शहर जाते, उनसे मिलने ज़रूर जाते। अब मुन्नू थी के इस स्कैंडल से वो भी सहम गयीं और कहती सुनी जाने लगीं — हे भगवान, अब मुन्नू भैया दूर ही रहें। घर आ गये तो मना भी नहीं कर सकते... जवान लड़की का घर है, अगल बगल सब देखें तो जाने क्या सोचेंगे? बेचारी लाली ( मुन्नू जी की पत्नी ) उसपर क्या बीत रही होगी... बड़े बड़े बच्चे हैं, उन तक भी बात पहुंची होगी। च च च... आदमी साले कुकुरे होत हैं... 

मुन्नू जी के एक और दोस्त की पत्नी, अपनी किटी पार्टी की सहेलियों से कह रहीं थीं, "ऐसे लगते नहीं थे मुन्नू भैया... कितनी ही बार बात करते करते कंधे पर हाथ रख देते थे 'और परजाई की गल है' कहते हुए। कभी कुछ गलत नहीं लगा।"

"सुना है यहीं आ गए हैं... बेटा यहीं कोई होटल खोल रहा..." एक और औरत, जो मुन्नू जी के परिवार की परीचित थी ने बताया। 

"अरे, लाली ने फोन भी नहीं किया, पहले तो जब कभी आती थी, आते ही फोन करके मिलने की योजना बनाती..." 

"बेचारी झिझकती होगी, यहां सबका सामना करने में।"

"हां, बात तो पूरे में फ़ैल गई है..." 

"वैसे मेरे हसबैंड कह रहे थे, मुन्नू भैया की ही हिम्मत थी जो इतने बड़े स्कैंडल का पर्दा फाश हुआ... " 

"लेकिन बेचारे फंसे भी तो वही, और किसी का तो नाम ही नहीं आ रहा। सब लीपापोती हो गई।" 

"क्या ज़रूरत थी उन्हें पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की... कुछ फायदा तो हुआ नहीं, उपर से सारी फजीहत भी इन्हीं की हुई... " 

" अरे तो क्या सारी ज़िंदगी की कमाई उन वेश्याओं को दे देते? कुत्तियों ने सुरसा जैसा मुंह फाड़ा था, अच्छा हुआ पकड़ी गईं... " 

" कुछ न होना हवाना इनका... चार दिन में छूट जानी ये। पुलिस विभाग में ही जाने कितने क्लाइंट होंगे इनके। " 

" च च च, बेचारे मुन्नू भैया बलि के बकरा बन गये !" 

बातें हैं, बातों का क्या? 

जितने मुंह उतनी बातें ! 

मुन्नू भैया के गृहनगर के एक पुराने जानकार ने उनके एक घरेलू प्रकरण की भी जानकारी चौराहे का चौधरी बनने के चक्कर में चार लोगों के बीच फुसफुसा दी। उसके अनुसार बरसों पहले मुन्नू भैया की भतीजी ने उनपर सेक्सुअल हरासमेंट का बाक़ायदा केस कर दिया था। केस अबतक चल रहा है। उसी की पेशी में तो आते हैं मुन्नू भैया यहां। अबतक तो सभी यही समझते थे कि वो मैटर प्रॉपर्टी का था और भतीजी ने उनपर झूठा केस किया था। पर अब इस नए स्कैंडल ने उस पुराने केस की भी नयी फुसफुसाहट शुरू कर दी थी। हो सकता है भतीजी ने सही केस दर्ज किया हो। यूं ही ऐसे घरेलू हादसे लड़कियों के साथ उनके करीबियों द्वारा किए ही जाते हैं। अक्सर पारीवारिक दबाव में लड़कियों को चुप करा दिया जाता है। यहां लड़की साहसी निकली थी, उसने मुन्नू भैया को कोर्ट में घसीटा। पर हर तरफ कहा सुना यही गया कि, कि ये प्रकरण प्रापर्टी का था। 

कालान्तर में वो प्रकरण उनके अपने शहर में किसी की याद की डायरी में दर्ज नहीं हुआ। मनजीत सिंह अपने शहर में यार-बाज़, मिलनसार, मददगार बड़े दिलवाले प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में ही जाने जाते रहे। पर अब उस मामले में भी मुन्नू भैया संदेह के घेरे में आ गए थे। इस नए मामले ने पुराने मामले को उघाड़ दिया था। 

एक और महाशय मुन्नू भैया के परिवार की हिस्ट्री-ज्योग्राफी खोलकर बैठ गये — भाई इनके तो पिताजी भी बड़े वाले छुपे रुस्तम थे। उनकी करतूत तो उनके मरने के बाद उजागर हुई जब उनकी कथित दूसरी पत्नी अपने दो बच्चों के साथ रोती पीटती दिवगंत चाचाजी के शरीर पर पछाड़े खाने लगी। सब अवाक् ! चाचाजी ने इसी शहर में एक और परिवार बना रखा था, ये किसी को कानों-कान ख़बर नहीं थी। चाईजी बेचारी तो ऐसा सदमा खाईं कि, मरने तक उबर न सकीं। पति की बेवफाई ने उन्हें काठ कर दिया था। 

बेचारे मनजीत सिंह मुन्नू ! 


नेम और फेम दोनों पर्याप्त थे उनके पास। फिर जीवन के सांध्य बेला में ऐसा स्खलन क्यों कर संभव हुआ? सेवानिवृत्ति से महज आठ महीने पहले ये स्कैंडल! उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा की धज्जियां उड़ रही थीं। किसी को उनकी हिम्मत नहीं दिख रही थी। अकेले उन्हें ही तो ब्लैकमेल नहीं किया जा रहा था। करीब पच्चीस लोगों को तो वो ख़ुद जानते थे जो इस सबमें इनवाल्व है। उसका ही जिगरी यार राजेश, पीडब्ल्यूडी में उच्चाधिकारी इस समय अपने विभाग के मंत्रीजी का दाहिना हाथ... कितनी ही बार शहर के बाहर, बड़े बिजनेसमैनो के रिसॉर्ट या फॉर्म हाउस में लड़कियों को बुलाया है। अब किसी का कोई नाम नहीं। कमीनियों ने नेताओं मंत्रियों को ब्लैकमेल करने की हिम्मत भी तो नहीं की होगी। अच्छी तरह जानती होंगी कि उनपर हाथ डालने का मतलब होता रातों-रात उन्हें गायब करवा दिया जाता। फिर उनकी पड़ी हुई लाश किसी गटर में मिलती। 

सरकारी अफसर आसान शिकार थे। इन्हीं की बदौलत तो उनकी सारी शान-पट्टी थी। शहर के सबसे पॉश कॉलोनी में डुप्लेक्स। पजेरो और फॉर्च्यूनर गाड़ियां, जिनमें वो रहती और चलती हैं, सब इन अफसरों की बदौलत है। अलग-अलग विभागों ने उन्हें अलग-अलग फायदे दिए हैं। कई आइएएस अधिकारी भी उनके क्लाइंट रहे हैं। पर अब सब बे-दाग़ हैं। हर अधिकारी, अपने साथ के दूसरे अधिकारी के बारे में सच जानता है। कौन चरित्र का खरा है और कौन खोटा, किसे हर रात एक नयी अंकशायिनी चाहिए और कौन किसी से भी कैसी से भी काम चला लेगा, ये बातें हर विभाग में कार्यरत अफसर मातहत को पता होता था। कुछ ही अपने काम से काम रखने वाले घरेलू स्वभाव के नादान होते थे जिन्हें कुछ नहीं पता होता था। और कुछ तो इतने घाघ होते थे कि, सबकुछ पता होते हुए भी कुछ न पता होने का दिखावा करते थे। 

पुरुषों की दुनिया में ये सब आदिकाल से मान्यता प्राप्त दुर्गुण था। बहुत से पुरुष इस दुर्गुण के साथ ऐश्वर्य का जीवन जीते हुए एक दिन मर जाते हैं... उनके बारे में कहीं कोई बात नहीं होती, सिवाय इसके कि, उन्होंने ख़ूब धन कमाया... शानदार घर बनवाया, बेटा बेटी को विदेश में पढ़ाया, बड़े धूमधाम से उनकी शादी की, नाती पोतों को बढ़ते देखा और समय आने पर आराम से हार्ट फेल होने या फिर किसी बड़ी बीमारी की बेआरामी से गुज़रकर दुनिया छोड़ दिया। 

इस अफसरी कहानी में अपवाद स्वरूप कुछ अलग प्रकार के लोग, कहानी को दूसरे ढंग से ख़त्म करने में यकीन करते थे। ये वो लोग थे जिन्हें सरकारी विभागों में खिसका हुआ मान लिया जाता था। इनसे विभाग के बड़े छोटे सभी दूर रहते थे। ये न खायेंगे न खाने देंगे प्रजाति के थे। ईमानदारी के कीड़े के काटे हुए। इनकी भी कारगुजारियां अख़बारों में जगह पाती थीं। कई बार ये अपनी कर्तव्यनिष्ठा के कारण सस्पेंड होते, अदालतों के चक्कर काटते, कभी नौकरी तो कभी जान से जाते। कभी कुंडली में ग्रह दशाये ठीक रहतीं और शासन का रास्ता इन्होंने बेकायदे से काटा नहीं होता, तो इन्हें इनाम इकराम भी मिलते और ये शासन प्रशासन द्वारा सम्मानित भी कर दिए जाते। 

अफसर अनंत अफसरशाही कथा अनंता !


बहरहाल, हमारे कथा अनायक मनजीत सिंह मन्नू तो बुरी तरह फंस गए थे। पर करते ही क्या? कोई और विकल्प था भी तो नहीं। तीन करोड़ कोई मामूली रकम तो नहीं थी। लाख दो लाख तो ऐसे ही देते रहते थे वे उसे। उससे लगाव-सा भी होने लगा था कुछ कुछ। ख़ूबसूरत, छरहरी यत्न से संवारी हुई उसकी काया लुभावनी थी। सिर्फ स्खलित होने भर का नाता नहीं रह गया था उससे। वह उनके दिमाग में अपनी जगह दर्ज कर चुकी थी। कितने तो मंहगे गिफ्ट दिये थे उसे। उसकी तय कीमत से अलग बहुत कुछ देते रहते थे उसे। वो भी उनकी हर कॉल पर उपलब्ध रहती। कभी बहाने नहीं की। कहीं और अप्वाइंटमेंट होने की बात नहीं की। पर... 

कैसे, कैसे वो इस सब में फंसते गये। और कैसी मति मारी गई थी उनकी कि, उस कमीनी पर विश्वास कर बैठे। इस तरह की औरतें किसकी सगी होती हैं? सिर्फ पैसा ही इनका ईमान होता है। ईमान? कितना सुन्दर शब्द है। पर कैसे वो किसी और के ईमान पर उंगली उठा सकते हैं। ख़ुद वो कब किस जगह ईमानदार रहे? न अपने रिश्तों में न अपने प्रोफेशन में। जैसे-जैसे जीवन में पावर की आमद हुई ईमान कोने में खिसकता गया। नौकरी में हमेशा कोशिश रही, ऐसी जगह मिले जहां दोनों हाथों भर-भर कमाई हो। इंजीनियर बनना और फिर सरकारी नौकरी पाना उनका मनचाहा था। वो नौकरी करते, पैसे कमाते रहे। समयानुसार पदोन्नति होती रही, सामर्थ्य और वैभव में वृद्धि भी होती रही। पैसा अपने साथ जो-जो सगुण लाता है वो सब आते गए। ससुराल से मिले फर्नीचर बदल गये... रसोई के बरतन से लेकर साज-सज्जा बदल कर मॉड्यूलर हो गया। टू बीएचके से फोर बीएचके फिर डूप्लेक्स, और फिर पेंटहाउस तक के कागज़ात लाकरों की शोभा बढ़ाते रहे। सोने के गहने अब हॉलमार्क होने के साथ-साथ हीरे के ब्रांडेड जूलरी पत्नी के शरीर पर मांस के परतों के साथ बढ़ते रहे। पत्नी का बेडौल वजूद देख अक्सर उन्हें वो परी-सी लड़की याद आ जाती जिसपर फिदा होकर वो बिना दान दहेज के सिर्फ दो कपड़ों में उसे ब्याह लाये थे। मोहम्मद रफी के जाने कितने गीत उन्होंने अपनी पत्नी को देख देखकर महफिलों में गाए और दाद बटोरी। 

जीवन का मध्यकाल अभी आया भी नहीं था कि, वो बीमार और मुरझाई रहने लगी। जबकि वह स्वयं स्लीम-ट्रीम थे। सेहत और एनर्जी से भरपूर। पत्नी को कैंसर डायग्नोस हुआ। बीच भंवर में गृहस्थी थी। बच्चे अभी स्कूल कॉलेज में ही थे। कैसी मायूसी और मनहूसियत का समय था वो। पत्नी को लेकर मुंबई टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का आना-जाना। ट्रीटमेंट के कष्ट साध्य तरीकों से गुज़रती हुई पत्नी की तकलीफ़ उन्हें भी भीतर से तोड़ रही थी। अपनों का कष्ट कहां देखा जाता है। भगवान की कृपा थी, इलाज काम कर रहा था। पत्नी धीरे-धीरे ठीक हो रही थी। बीमारी शरीर से बाहर जाते हुए शरीर का बहुत कुछ ले जाती है। 

उम्र, वैसे भी स्त्रियों को कई स्तरों पर प्रभावित करती है और अगर शरीर बीमार हो तो इसका प्रभाव सिर्फ शारीरिक नहीं मानसिक भी पड़ता है। पुरुष के लिए तो 'साठा तो पाठा' कहावत ही बना दी गई है। बीमारी भले उनकी शारीरिक क्षमताओं को सीमित कर दे, उम्र का कोई बंधन न उनके शरीर मानता न मन। पौराणिक आख्यानों ने उनको और प्रोत्साहित भी किया था। देवताओं ने वृद्ध ॠषि गौतम को इनाम स्वरूप किशोरी कन्या अहल्या से विवाह करने की अनुमति दी थी। सिर्फ पुराणों में ही नहीं आसपास हजारों ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। 

तो बात बस इतनी-सी थी कि, मनजीत सिंह मन्नू के शरीर और मन दोनों में हसरतें जवान थीं और जब अपने आसपास के उच्च पदस्थ अधिकारियों, मंत्रियों, छुटभैय्ए नेताओं सबको इस खेल में शामिल पाया तो उनका दिल हिलोरें क्यों न मारता। पद, पैसा किस चीज में कमतर थे वो? फिर वर्जित फल चखने के मजे से वो क्यों वंचित रखें ख़ुद को। शुरुआती झिझक ने उनको भी किंतु परंतु के फेर में लपेटा। 

ये शुरुआती झिझक इंसान नाम के जन्तु को किसी भी क्रिया को करने से पहले एक बार सरगोशी की आवाज से उसे रोकती तो है ही। किसी बलात्कारी के पहले बलात्कार, किसी हत्यारे की पहली हत्या, किसी भ्रष्टाचारी का पहला भ्रष्टाचार, किसी की पहली घूसखोरी, किसी का पहला झूठ, किसी पहली बेवफाई, किसी का पहला व्यभिचार, सिर्फ इन अपराधिक या नैतिक मापदंडों पर निकृष्ट कृत्यों पर ही नहीं जीवन के बहुत सुंदर लम्हों का पहला कदम झिझक से भरा ही होता है। किसी बच्चे के चलने को उठा हुआ पहला कदम, किसी प्रेमी जोड़े का पहला चुम्बन, किसी पति पत्नी का पहला साहचर्य... !

इस झिझक ने परस्त्री गमन के रास्ते पर जाते मनजीत सिंह मुन्नू के कदमों को भी एकबारगी ठिठका तो दिया पर अपने आसपास बहुत से लोगों को उन्होंने इस वर्जित फल का स्वाद लेते देखा तो धड़कते दिल से उस ओर कदम बढ़ा ही दिये। वो अनुभव आज भी याद है... उसी तरह जैसे जीवन में पहली बार किया हुआ सेक्स, जैसे पत्नी के साथ की पहली रात की जद्दोजहद। वैसे ही व्यभिचार का वो पहला अनुभव भी दिमाग में दर्ज है अच्छे से। 

शुरुआत तो एक परीचित अधिकारी के माध्यम से हुआ था। मंत्रालय में वो उस अधिकारी से मिलने ही गये थे अपने किसी काम से। वहीं उनके कमरे में सोफे पर धंसी बड़ी लापरवाही से सिगरेट के कश लगाती औरत मंजरी माथुर पर नज़र पड़ी थीं । उसका ठसकेदार रवैया देखकर उन्होंने उसे भी कोई अधिकारी भी समझा और कर्टसी में हैलो किया, उसने सिर को अदा से ख़म दिया, मुंह से कुछ न बोली। उन्हें उसका ये एटीट्यूड अच्छा लगा था और उस औरत में उनकी दिलचस्पी बढ़ गई थी। शायद उनके साथी अधिकारी ने उनकी इस दिलचस्पी भांप लिया था। तुरंत परिचय कराया। 

" इनसे मिलो मनजीत, ये हैं मंजरी माथुर ! मेरी दोस्त हैं। तुम्हारे ही शहर से आई हैं भाई। " 

" अरे मंजरी, इनसे मिलो, ये मनजीत तुम्हारा काम चुटकियों में करा देगा... मुझे तो ध्यान ही नहीं था। ये तो वहीं है, उसी विभाग में। तुम बेकार परेशान हुई... तुम्हारा काम तो वहीं हो जाता। मनजीत करवा देगा। " 

" जरुर, क्यों नहीं? काम क्या है?" 

" कोई ठेका है, इनके भाई ने भी टेंडर डाला है। थोड़ा देख लेना... तुम्हारे ही विभाग से सम्बंधित है। " 

" मैं समझ गया। मैडम आप निश्चिंत होकर जाएं... ये मेरा कार्ड रखिए। " 

मैडम मंजरी ने बड़ी अदा और सौहार्द पूर्ण मुस्कान के साथ कार्ड लेकर अपने पर्स के हवाले किया। उसने मनजीत सिंह की उपयोगिता का अंदाजा इस पहली मुलाकात में ही लगा दिया था। अधिकारी के कमरे से दोनों लगभग साथ ही निकले। शिष्टाचार वश मनजीत सिंह ने मैडम मंजरी को पूछा — चलिए, जहां कहिए छोड़ दूंगा। पर मैडम ने उनके लपलपाते ऑफर को रिफ्यूज कर दिया ये कहकर कि, उनके पास गाड़ी है। दोनों साथ ही पार्किंग में पहुंचे। अपनी ब्रेजा की ओर बढ़ते और कार चाभी में फिट आटोमेटिक लॉक का बटन दबाते हुए उन्होंने दूसरी तरफ जाती मैडम के हाथ को भी बटन दबाते और जिस गाड़ी का लॉक खुलने की आवाज सुनी एकबारगी विश्वास नहीं हुआ कि वो गाड़ी ऑडी थी। 'गजब' भाई ! मन में वो सोच ही रहे थे कि बगल से मैडम ने सर्र से अपनी ऑडी निकालते हुए उन्हें हाथ हिलाया, उन्होंने भी मुस्कुरा कर उनका अभिवादन किया और उनके व्यक्तित्व की औरा से अभिभूत अपनी कार को बैक कर निकलने के रास्ते पर ले आए। 

उस दिन आफिस में बहुत काम था। कोई सरकारी टेंडर पास होने वाला था जिसकी तैयारी में वह फाइल में उलझे थे कि, चपरासी ने आकर उन्हें सूचित किया कोई मैडम मंजरी मिलना चाहती हैं... 

एकबारगी उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कौन मंजरी? फिर स्मृति में वो संक्षिप्त-सी मुलाकात कौंध गई और तुरन्त उन्होंने चपरासी को उन्हें अंदर भेजने का हुक्म दिया और स्वयं अपनी अस्त-व्यस्तता को ठीक करने लगे। टेबल के फैलेपन को सहेजने और कुर्सी पर अभी स्मार्टली बैठने के उपक्रम में लगे ही थे कि, दरवाजा खोल मैडम मंजरी प्रकट हो गयीं। भीनीं खुशबू का झोंका-सा आया जो पूरे कमरे में छा गया। जेंटलमैन सौजन्यता से वह खड़े हो गये। 

" आइये" कहते हुए कमरे में ही एक तरफ रखें सोफे की तरफ बढ़ गये, "कहिए क्या सेवा करूं आपकी?" 

" भई मिस्टर सिंह... आज मैं आपसे एक फेवर से लेने आई हूं... " मंजरी ने अपनी चिरपरिचित दोस्ताना अदा से कहा जो अक्सर औरतों में दुर्लभ होती है। मनजीत सिंह का साबका बहनजी, भाभीजी टाइप औरतों से पड़ा था, जिनसे एक सम्मानजनक दूरी बरतते हुए शालीनता से बातचीत करनी होती थी। मंजरी मैडम के इस बिंदास दोस्ताना व्यवहार ने उन्हें कायल कर दिया और उन्होंने दोस्ती के उस बढ़े हाथ को थाम लिया था। 

आग और फूस में कैसी दोस्ती? औरत और मर्द आग और फूस ही तो होते हैं ऐसा पुरनिया लोग कहते ही हैं फिर मंजरी मैडम तो उनके पास आई ही थीं अपने मतलब से। दोनों की ये दोस्ती ख़ूब जमी। मंजरी मैडम मर्दों की नस-नस से वाकिफ थीं। कौन लगोंट का कितना ढीला है, कौन तुरंत शीशे में उतर जाएगा, कौन किसी के साथ ही सोने से परहेज नहीं करता और किसकी पसंद सोफिस्टिकेटेड है... ये सब वह अपने लम्बे अनुभव से जानती थीं। जल्दी ही मनजीत सिंह भी मंजरी मैडम के शीशे पूरी तरह उतर गये। पहली बार आशा त्यागी को भेजा था मंजरी ने उनके पास। 

वो पूरी तरह माहिर थी अपने काम में। पहले पहल उसे देख उन्हें निराशा हुई थी। पैंतीस के ऊपर ही की रही होगी वो। सांवली बड़ी बड़ी आंखें और अनुपातिक शरीर। शिफॉन साडी और बिना बाहों का ब्लाउज। ध्यान से देखने पर वो ख़ूबसूरत और मादक लगने लगी। बिल्कुल साउथ की हीरोइनों जैसी। फिर तो जब एक बार नैतिक बाधा की लाइन क्रास कर दी तो फिर कोई सीमा न रही। सिर्फ साउथ की भी नहीं, कभी बंगालन ख़ूबसूरती तो कभी मराठन डाला सभी तरह की लड़कियों औरतों जो कभी फैंटेसी का हिस्सा होती थीं, उनकी अंकशायिनी बनी। 

मंजरी मैडम का जब कोई बड़ा काम वो करवा देते तो खुश होकर मैडम उनके पास बिल्कुल फ्रेश चीज भेजतीं — आज तुम खुश हो जाओगे दोस्त! और वो सचमुच खुश हो जाते जब होटेल के बुक्ड कमरे में कॉलेज गोइंग कमसिन कन्या उनका इंतज़ार करती मिलती। मंजरी मैडम के सौजन्य से उन्होंने हर तरह की लड़कियों का भोग किया। मंजरी मैडम के खजाने में तरह तरह के रत्न थे। सिर्फ भारत ही नहीं विदेशी रत्न भी उनके खजाने में थे। घर से दूर रहकर पढ़ने और जॉब करने वाली बहुत-सी लड़कियों ने भी हाई फाई लाइफ स्टाइल के लालच में उनके लिए काम करने को स्वैच्छा से हामी भरी थी। वो किसी को मजबूर नहीं करती थीं। जब, जो लड़की ये सब छोड़कर जाना चाहे, था सकती थी। एक जाती थी, दूसरी आती थी... कारोबार बदस्तूर चल रहा था लम्बे समय से। लम्बे समय तक चलता ही रहता, पर इंसान का दिमाग कब फिर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। 

सबकुछ ठीकठाक ही चल रहा था, पर मैडम मंजरी के दिमाग में खलल पड़ गई। उम्र बढ़ रही थी। उनके ठसकेदार अदाओं में भोथरापन आता जा रहा था। आशा त्यागी का असर बढ़ रहा था। उन्हें अपना रिटायरमेंट करीब आता दिख रहा था। बुढ़ापे की चिंता सताने लगी थी। समय कम बचा था। कम समय में ज़्यादा कमाई का एक ही रास्ता सामने था। उन्होंने उसी पर अमल किया। अब होटल के बुक्ड कमरों में की जा रही रंगरेलियों को हिडन कैमरों से रिकार्ड किया जाने लगा। ब्लैकमेलिंग का नया धंधा शुरू हो गया। 

डर का एक अलग ही कारोबार होता है। इस कारोबार में मैडम ने कुछ नये साथी बनाये। गली के गुंडों से लेकर पुलिस महकमे के छोटे से बड़े अधिकारी तक की सेवाएं कभी डराकर कभी पुचकार कर लीं गई। इस नए खेल में मैडम मंजरी दोस्ती यारी सब ताक पर रख चुकी थीं। एक दिन मनजीत सिंह मन्नू के मोबाइल पर मैडम मंजरी ने वाट्सेप किया "तीन करोड़ रुपए भेजिए !" 

मनजीत सिंह मन्नू को हंसी आ गई, "मजाक कर रही " 

तुरंत मंजरी का फोन आ गया — जनाब, अपने फलां फलां दिन इस इस होटेल के इस इस कमरे में अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के साथ जो जो किया है उसकी पूरी वीडियो रिकार्डिंग हमारे पास मौजूद है, पैसे न मिलने की स्थिति में आप समझ सकते हैं... ये कहां कहां न पहुंचेंगे ! 

मनजीत सिंह मन्नू के तो होश गुम हो गये। हकलाते हुए अपनी दस साल पुरानी दोस्ती का वास्ता देने लगे। पर मैडम मंजरी को पैसे रूपी खून का स्वाद लग चुका था। वो कैसे भी मानने को तैयार नहीं। बेचारे मनजीत सिंह अजब बवाल में फंस गए थे। कितनी दगाबाज औरत निकली ये मंजरी। उन्होंने क्या-क्या नहीं किया था उसके लिए। जो भी उनके बस में था वो सब फायदा दिया उसे। किसी बात का लिहाज़ नहीं किया उसने। दोस्ती की दुहाई देती थी। मनजीत तेरे साथ मेरा दिल का रिश्ता है कहते मुंह नहीं थकता था उसका, और अब देखो कैसे रूडली बात कर रही। 

उस दिन वह उससे बात करने, उसके घर भी गये थे। कितनी बद्तमीजी से बात की उसने। उन्होंने कहा भी कि इतना पैसा इकट्ठा नहीं है उनके पास। वो इंस्टालमेंट में ले देंगे। पर वो जिद्द पर अड़ गई। पूरा पैसा अभी चाहिए एक बार में। उनका पारा चढ़ गया। कुतिया तुझे एक पैसा नहीं दूंगा... अब पुलिस देगी तुझे जो देना है। 

उसी गुस्से में उन्होंने खड़ा पीछा सोचे बिना सीधे पुलिस स्टेशन का रुख किया। उनके रिपोर्ट लिखवाते ही हड़कंप मच गया और एक बड़ा स्कैंडल सामने आया। मैडम मंजरी गिरफ्तार हुई। इस स्कैंडल के रोज नए खुलासों से अखबारों के चटपटे पन को उछाल मिला। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चली। बहुत से मंत्री, संतरी, ब्यूरोक्रेट्स, उद्योगपति इस सब में लिप्त थे ऐसी खबरें आतीं पर किसी का भी नाम नहीं आता। नाम सिर्फ मनजीत सिंह मन्नू का लिया जा रहा था। उनके रंगीन वीडियो वायरल हो रहे थे। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था। मामला उच्च स्तरीय जांच कमेटी के सुपुर्द था। जांच हो रही थी। खबरें धीरे धीरे मुख्य पृष्ठ से खिसक कर मध्य पृष्ठों से होते हुए अंतिम पृष्ठ तक पंहुचने के रास्ते पर थीं। 



किस्सा मुख्तसर - 
ताज़ा समचारों के मार्फत मैडम मंजरी और उनकी दो साथी महिलाओं को कुल बाइस महीने बाद भाई कोर्ट से जमानत मिल गई है। कोर्ट के अनुसार ये सभी है कि आरोपियों ने अनैतिक और अपमानजनक कार्य किया है लेकिन इसके लिए इन्हें पूरी तरह जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कोर्ट की कार्यवाही में लम्बा समय लगता है और आरोपितों पर आरोप तक तो नहीं है इसलिए उन्हें जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए। 

शिकायतकर्ता मनजीत सिंह मन्नू सस्पेंड होकर अपने गृहनगर में अटैच हुए और वहीं से रिटायर हो गए। समय बड़ी से बड़ी बातों को पचा लेता है। जिस प्रकरण पर हाय हाय मची थी वहां सतह पर सब शांत है। मनजीत सिंह पहले की तरह अपने जानने वालों में आते जाते हैं, हंसते ठहाके (बल्कि पहले से ज़्यादा जोर से) लगाते हैं... बेटे के लिए रेस्टोरेंट खोल रहे हैं बेटी की शादी ढूंढ़ रहे हैं। यदा कदा सोचते ही हैं - काश मति न मारी गई होती, पुलिस में न गये होते। आखिर और सब नेता अधिकारी तो उनके कंधे पर बंदूक रखकर अपना मतलब साध गये। किसी एक आदमी का भी नाम सामने नहीं आया। 

फिर दूसरे ही क्षण ख़ुद को बरजते हैं, पुलिस में न जाते तो क्या करते? सुरसा के मुंह जैसी मांग थी, कहां से लाते इतना पैसा? खैर अब जो हुआ सो हुआ... मलाल बस एक ही है, वो साली कुतिया जमानत का पा गयी। फिर अपना धंधा जमा लेगी, फिर उन जैसा कोई फंसेगा, बलि का बकरा बनेगा। 










(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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