भाग्य विधाता : इंदिरा दाँगी की कहानी

इंदिरा दाँगी की कहानी ‘भाग्य विधाता’ — शब्दांकन

इंदिरा दाँगी की रचनाओं में रफ़्तार होती है। ‘भाग्य विधाता’ में वह शिद्दत से मौजूद है और मुझ पाठक को अपने साथ दौड़ाती है। कहानी पढ़ते हुए मुझे लगा कि “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बाणी” के आगे कहीं ये तो नहीं होना था - “घर-घर बढ़ती जाती है, नार पे वार की कहानी।”

कहानी पढ़ियेगा!!

~ भरत तिवारी

भाग्य विधाता

इंदिरा दाँगी

दुल्हन भाभी का सूटकेस बेड पर खोलकर, ब्याह में आई सभी ननदें घेरा बनाकर बैठ गईं।

“अरे ! ये बैंगल बॉक्स तो कितना सुंदर है ! और कंगनों के सेट भी इसके अंदर जैसे बहुत खोजकर सजाए हैं। ये गुलाबी तो चूड़ियाँ हैं कि मोतियों की लड़ियाँ ??” मँझली बुआ सास की बेटी कहती है।

“ये मेरा अपनेआप को शादी का गिफ्ट है। इसे तैयार करने में बाज़ार के कितने चक्कर लगाने पड़े !”

“ये तो अब मेरा हुआ !” सगी ननद चंचल ने पूरा बॉक्स उठा लिया और बंद कर, बाँह के नीचे दबा लिया।

“अरे ! अरे ! कहाँ उड़ाये लिए जाती हो ? नज़र भर देखने तो दो !” छोटी बुआ श्रद्धा कहती हैं जो उम्र में विवाहित ननदों से कुछ ही बड़ी थीं और इसी गुट में डटी रहती थीं। चिढ़ने वाली पाहुनी मौसी सास सुबह ही कह रही थीं, “सींग कटा कर बछड़ों में शामिल !”

श्रद्धा बुआ टोकती ही रह गईं और चंचल ये जा वो जा ! वे कोई फड़कता हुआ व्यंग्य करतीं लेकिन तभी उनका ध्यान दुल्हन की दूसरी ब्याहता ननद कंचन पर गया जो सूटकेस को ऐसे उलट-पुलट रही थी जैसे चंचल का मुनाफा उसका नुकसान है। अब इससे भी ज़्यादा मुनाफा न हो तो लानत है उसकी चतुराई पर।

“ये सिंदूरी साड़ी मैं लूँगी !”

सूटकेस में जो सबसे मूल्यवान बनारसी साड़ी दिख रही थी, बड़ी ननद कंचन ने वो निकाल कर तुरंत अपने बैग में डाल दी। बगल में चचेरी-ममेरी-फुफेरी ननदें, दुल्हन को सुन-सुनाकर फुसफुसाती रहीं, “ये दोनों कितनी लालची हैं !”

“अरे ! अभी तो बस इनका ही रंग देखा है बहू ने; इनकी माँ का नहीं देखा !”

...और माँ वेणी वाकई बेटियों चंचल और कंचन से दो कदम आगे थी !

शाम को बहू से कहा,

“अरे, शादी में कितनी अंगूठियाँ मिली हैं जरा उतार कर दो तो; पाहुनियों को दिखानी हैं।”

बहू ने छह अंगूठियाँ उतार कर दे दीं। सास बाहर ले गई और थोड़ी देर बाद लौटा ले आई।

“लो पहन लो अपनी अगूठियाँ।”

बहू देख रही है; छह अंगूठियाँ लेकर गई थीं, पाँच लौटा रही हैं सो भी एक-एक को गौर से देखती-तोलती-सी।

क्या वो कह दे कि एक अंगूठी कम है ?? एकाएक चोरी का इल्जाम कैसे लगा दे ऐसे ! सोच रही थी कि रात में पति योगेश से बात करेगी।

लेकिन यहाँ तो ये हाल था कि लंका के छोटे वीर, वे भी उनचास हाथ के ! वही सोने की अंगूठी पतिदेव ने दीप्ति को घूँघट उठाते समय पहना दी।

...उसका दिल टूट गया !

कैसी धूर्त ससुराल मिली है ! लेकिन अब पैरों के नीचे की ज़मीन यही है; मायके में तो अम्मा ने कभी महसूस ही न होने दिया कि दोनों भाई-भाभियों के अलावा भी वो घर किसी का है ! शादी से बरस भर पहले जब बी.एड. की उसकी फीस का सवाल था तो उन्होंने साफ मना कर दिया था,

“इतना फिजूल पैसा नहीं है हमारे पास उड़ाने को ! मनु की नई नौकरी है। दिल्ली में उसकी गृहस्थी का सब खर्च उठाने में ही कमर टूटी जाती है। फिर प्रदीप की ठेकेदारी में भी अभी कुछ मुनाफा नहीं होता। अकेले पापा की वेतन में तुम्हारे बी.एड. के लिए गड्डियाँ कहाँ से लायें ! अगले साल तुम्हारी भी तो शादी करनी है। वो तो अच्छा हुआ शादी का मुहूर्त इस साल टल गया, मंगल दोष के कारण। मायके से बी.ए. पास करके जा रही हो; इतना भी बहुत है ! आगे और जो अरमान हों, अपने घर जाकर पूरे करना। और इस साल तो वैसे भी मेरा घुटने का ऑपरेशन है। तुम कॉलेज जाओगी तो घर का सब काम कौन करेगा ? बड़ी बहू दिल्ली में, छोटी अपने बच्चों में उलझी रहती है। ऐसा करो अब ये पढ़ाई-बढ़ाई बंद करो। और इस साल मन लगाकर घर-गृहस्थी सीखो ! हर समय हाथ में किताब लिए फिरती हो। रसोई में मन लगाओ ! कल को ससुराल जाओगी तो क्या हमारी नाक कटाओगी !”

लेकिन फिर भी दीप्ति ने बी.एड. की प्रवेश परीक्षा दी और उसे दाखिला भी मिल गया। पिता को किसी तरह मनाया। पिता यों माँ और बेटों के सामने कुछ न बोलते थे लेकिन घर में अगर कोई वाकई प्रगतिशील सोच का धनी था तो वे ही थे। और जब वे अपना निर्णय सुनाते तो सब बस कुड़बुड़ाते रह जाते। घर आखिर उनकी वेतन से जो चलता था। ...दीप्ति ने बी.एड. की पढ़ाई शुरू कर दी। वो घर के काम भी करती रही, कॉलेज भी जाती रही और भावी ससुराल जाने की तैयारियाँ भी साथ-साथ चलती रहीं। भाभियाँ आपस में कहतीं,

“कितनी चंट है ये लड़की ! अम्मा हज़ार काम बताती रहें, ये अपनी पढ़ाई-लिखाई, अपनी तरक्की नहीं छोड़ती !”

“हूँह ! लेकिन तरक्की का सब खर्चा अभी तो मायके वालों के सिर है सो दीप्ति बिन्नू की पौ बारह है ! बी.एड. के पहले साल के ये दोनों सेमिस्टर तो हो जाएंगे। अगली साल देखेंगे, ससुराल वाले फाइनल की फीस भरेंगे कि नहीं ! चालीस हज़ार कोई कम रकम तो नहीं होती !”

“फीस क्यों न भरेंगे ? पढ़ लिखकर बहूरानी नौकरी करेगी ! क्या ही पता, सरकारी नौकरी लग जाए ! सोने की मुर्गी को भला कौन नहीं चाहता !”

“अभी नहीं बनी सोने की मुर्गी; अभी तो चूज़ा है ! अभी तो खर्चा ही खर्चा है। और रुपये की जड़ कलेजे में होती है। पता नहीं, उन लोगों की मंशा क्या निकले ? वे आगे पढ़ाएंगे भी कि नहीं ? नौकरी तो बाद की बात है। सुनते हैं, होने वाली सास तो बहुत ही तेज़ है। ब्याहता ननदों का भी बड़ा दखल है घर में।”

शादी के समय दीप्ति को भी यही चिंता थी।

“आगे मेरी बी.एड. फाइनल की फीस का क्या होगा ?”

नवब्याहता दीप्ति मायके आई है तो सोच में डूबी, अपने में गुमसुम रहती है। ससुराल में पन्द्रह दिन रहकर ही वो जान गई कि वहाँ अभी बरसों-बरस तक उसकी स्थिति ऐसी रहने वाली है कि सभी की सेवा भी करनी है और सभी की डाँट भी खानी है। रहने-खाने के सहारे के बदले अपना सर्वस्व ससुराल वालों के चरणों में रखकर न चलेगी तो निभ न सकेगी। पर इसमें क्या नया है ? ससुराल वाले नई बहू से नौकरानी जैसा ही बर्ताव तो करते हैं। सोच ये रहती है कि शुरू में ही दबा लो फिर पूरी ज़िंदगी सुख से सेवा करवाओ। नहीं तो, जो शुरू में सिर पर चढ़ गई तो उम्र भर नाचेगी नहीं बल्कि नचाएगी ! दीप्ति लेकिन अपने लिए एक ऐसा भविष्य देखती है जो आसपास के माहौल से हटकर है। वो पति की साथी बनना चाहती है; बूढ़े सास-ससुर का सहारा। इसके अलावा, उसका अपना एक जीवन हो, पहचान हो, आत्म निर्भरता हो और सबसे बढ़कर सम्मान हो !

दीप्ति पीतल का टेबल लैम्प और गमले नींबू, राख और दही से साफ कर रही है। बैठक की हर चीज़ अब तक वो ही साफ करती रही थी। अपनी सोच में गुम है,

क्या अम्मा से बात करे या पापा से ही फिर कहे ! बड़े भैया को भी तो फोन कर सकती है दिल्ली। उनकी तो सरकारी नौकरी है फिर भी तो खर्च खेती और पापा की पेंशन से उठता है। क्या छोटी बहन को इतना भी न दे सकेंगे ? जब बी.एड. के बाद उसकी नौकरी लगेगी तो चुका देगी। ये बात तो वो प्रदीप भैया से भी कह सकती है। अभी ही तो भाभी दिखा रही थीं उसे अपना नया लॉकेट, जो कहने को तो वे अपने मायके से लाई हैं; लेकिन वो असलियत जानती है कि भैया ने उन्हें बनवा कर दिया है !

लैम्प और गमले सब धो-माँजकर उसने एक ओर टिका दिए धूप में, हमेशा की तरह; और बैठक में जाकर बल्ब, डोरी, प्लग लाने चली गई ताकि उसे लैम्प में फिर से फिट कर सके। लौटकर देखती है कि पीतल का सब सामान गायब !

“अरे अम्मा ! लैम्प, गमले सब कहाँ गए ?”

“तुम्हारी भाभी ले गई अपने कमरे में ?”

“क्यों ?”

“ले जाने दे; तू क्यों पूछती है ? क्या अपने घर ले जाने की मंशा थी ?”

ये इल्जाम !!! …दीप्ति का दिल फिर टूट गया।

आगे उसका यहाँ आना मेहमानों-सा रह गया। जब भी आती, अम्मा चिंतित-सी होकर पापा से पूछती,

“दीप्ति को कितने की विदाई देनी है ?”

ससुराल जाती ट्रेन में बैठी हज़ारों बातें सोचती है,

मेरा भी उतना ही अधिकार है पापा की संपत्ति पर, जितना दोनों भाइयों का है लेकिन अम्मा दो-पाँच हज़ार की विदाई देते कैसा मुँह बनाती हैं ! कितनी बातें सुना देती हैं ! भाभियों की कौन कहे, वे पराए घर से आई हैं, जब जन्म देने वाली माँ ही पराया मानती है।”

सोचती जाती है और आँसू बहते जाते हैं। पति ने टोका,

“ट्रेन में मत रोओ। सब देख रहे हैं। अच्छा, बताओ, विदाई कितने की मिली है ?”

शादी को एक साल हो चला। इस बीच एक बड़ा झगड़ा हुआ। सास वेणी एक शादी-समारोह में गई थी जहाँ बहू की बड़ी भाभी सुरेखा से भेंट हो गई। बातों-बातों में वेणी बोली,

“कानों में तो बड़े सुंदर झाले पहने हैं सुरेखा तुमने ! पुराना सोना जान पड़ता है।”

“हाँ ! ये मेरी मम्मी ने दिए थे।”

“बहुओं से भर-भर के दहेज लिया और बेटी को देते अंटी न खुली !”

“ऐसा क्यों कहती हैं आंटी जी ? क्या कमी रखी है हम लोगों ने ? क्या नहीं दिया जो अब तक माँगती हैं ?”

सुरेखा की बात सुन वेणी तिलमिला उठी।

“नाक-कान के जेवर तो मायके वाले ही देते हैं। आप लोगों ने अपनी बेटी को क्या दिया ? शादी से पहले के घिसे टॉप्स पकड़ा दिए। बहू वही पहने घूमती है। हम ही क्यों बनवाएं उसके लिए जब मायके वाले इतना भी न दे सके ? अपनी बेटियों को मैंने दो-दो जोड़ी बुँदे, झुमकियाँ बनवा कर दी थीं !”

“क्या बात करती हैं ? तोला भर सोने की झुमकियाँ बनवा कर दी थीं हमने विदाई में। दीप्ति दीदी ने बताया नहीं आपको ?”

“तोला भर सोने की झुमकियाँ ??”

सास के गुस्से का कोई आर-पार न रहा। घर आकर इतनी ऊँची आवाज में कलह किया कि पड़ोसी अपने-अपने फ्लैट्स के दरवाज़े खोलकर बाहर आ गए। ससुर रोकते जाते थे, बेटा रोकता जाता था लेकिन सास की आवाज़ आसमान तक बुलंध थी। लेकिन बहू एक चुप, हजार चुप !

‘योगेश, अब या तो तेरी बहू उन तोला भर सोने की झुमकियों का हिसाब दे या निकल जाए इस घर से !”

“बताती क्यों नहीं, कहाँ हैं झुमकियाँ ?” जब पति ही मारने को आगे बढ़ा तो दीप्ति ने मरी-मरी सी आवाज में कहा,

“खो गईं।”

“खो गईं ?? तोला भर सोने की झुमकियाँ खो गईं ? कहाँ खो गईं ? कैसे खो गईं ? क्या अपने पापा को वापिस दे आईं ?”

योगेश मारता उसे अगर बीच में ससुर न आ गए होते। सास का गुस्सा महीनों शांत न हुआ। ननदें फोन करतीं तो वो बहू को सुना-सुना कर हज़ार बातें सुना देती उसके मायके वालों को।

“नीयत ही खराब है सालों की। दुनिया को दिखाने के लिए तोला भर सोने की झुमकियाँ दीं। उस दिन इसकी भाभी कहती थी, क्या रह गया जो मांगती हैं ? मैं क्या भिखमँगी या माँगनी हूँ जो इन लोगों से माँगूँगी ? खोबा भर-भर के सोना दिया है मैंने अपनी बेटियों को - खोबा भर-भर के !”

सास की बड़बड़ चलती ही रहती, जब तक बीमार ससुर बिस्तर में से हुंकार न भरते,

“जेल जाना है तुझे लालचिन ?”

दीप्ति ने ननदों का समाधान तो निकाल लिया था। वे आतीं तो अपने काम में मगन रहती; उनकी दिलजोई न करती। और दोनों ही बहनोइयों से कभी मज़ाक में कह भी गई,

“आप अच्छे से नहीं रखते क्या हमारी दीदी को ? वहाँ अभी तक मन नहीं लगा जो पल-पल उन्हें मायका याद आता है !”

ननदों ने मायके में अपनी दखलंदाजी कम कर दी। लेकिन सास और पति का क्या करे ! यहाँ तो कुएं में ही भांग पड़ी है।

दीप्ति से खूब काम लिया जाता। घर के कामों से फारिग होती तो बाहर के कामों की सूची तैयार रहती। जब से शादी हुई, घर में योगेश ने इधर की सींक उठाकर उधर न रखी थी। दीप्ति ही बाजार, सौदा-सुलफ सब करती। कभी पलंबर को बुलाती, कभी कबाड़ी को रद्दी तुलाती।

लेकिन इस सब के बीच, उसके मन में पढ़ाई की लगन लगी रहती। सास वेणी देखती और कुढ़ती। एक रात सास की नींद खुली तो देखा ड्राइंग रूम की बत्ती जल रही है। रात के ग्यारह बजे थे। बहू हॉल में दीवान पर बैठी कुछ लिख रही थी।

“अरे ! अब तक जागती हो ? सवेरे फिर योगेश का टिफिन बनाने में आलस करोगी। जाओ सो जो।”

“नहीं। मैं बना दूँगी सब समय पर।”

“बना तो दोगी लेकिन भावर-भूतर। जब नींद ही पूरी न होगी तो काम कैसे होगा कल ! लाइट बंद करो और जाओ। इधर की बत्ती जलती है तो मुझे अपने कमरे में नींद नहीं आती।”

“लेकिन, मैं तो हमेशा यहीं पढ़ती हूँ; अभी तक तो आपने कभी नहीं कहा ऐसा !”

“तो अब कह रही हूँ, ये बत्ती न जलाया करो रात को।”

“तो रात को मैं कहाँ पढ़ूँ ? कमरे में टेबल लैम्प से भी इनकी नींद में खलल पड़ता है।”

बहू अपनेआप से कहती चली गई और रसोई में बत्ती जलाकर फिर लिखने लगी। वेणी को अब एक उपाय सूझता है।

वो रसोई में पहुँच गई,

“मुझे भूख लगी है। मेरे लिए मीठी पूड़ियाँ तल दो।”

“खाना अभी तो खाया था आपने घंटा भर पहले। और भी रखा है, गरम किए देती हूँ।”

“नहीं। मेरा मन मीठी पूड़ियाँ खाने का ही है। बंद करो अपने पोथी-पत्रा और बनाओ मीठी पूड़ियाँ। और हाँ, ज्यादा न बनाना वरना कल दिन भर तुम्हें ही खानी पड़ेंगी।”

सास हॉल में आकर लेट गई। दीप्ति समझ गई, आज ये पढ़ाई अब और न करने देंगी। पेन का ढक्कन लगाकर रजिस्टर में रखा और किताब का किनारा मोड़कर उसे एक ओर रख दिया। एक कुंजी खोलकर सामने रख ली। उसे देखती जाती ,कुछ याद करती जाती और मीठी पूरियाँ बनाती जाती।

उस दिन से दीप्ति ने हॉल या रसोई में पढ़ना बंद कर दिया। फ्लैट में हॉल के अलावा दो ही तो कमरे थे। अब कहाँ पढ़े ? वो रात को बाथरूम में बैठकर नोट्स बनाती; और दिन में किताब खोले घर के कामकाज के बीच कुछ-कुछ याद करती रहती। कभी कलाई पर, कभी हथेली पर, कुछ उतार लेती और मन में दोहराया करती। बी.एड. के साथ-ही-साथ वो शिक्षक पात्रता परीक्षा की भी तैयारी कर रही है। घर-गृहस्थी की मेहनत के बीच, हमेशा अपने भीतर की सुव्यवस्था में मगन रहती तो पता ही न चलता कि काम कब हो गया और उसे ज़रा थकान न होती। हमेशा प्रसन्न मुख, अपने में व्यस्त-मस्त रहती। सोचती, बी.एड. कर लेगी और अगले ही साल शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास कर लेगी तो सरकारी शिक्षक की नौकरी करने के योग्य हो जाएगी। अखबार में रोज़ ही आ रहा है कि राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बड़ी भारी कमी है। सरकार अगले बरस तक तो भर्ती ज़रूर ही निकालेगी। फिर वो इतनी मेहनत करेगी, इतनी इतनी कि पहले ही प्रयास में सरकारी शिक्षक की परीक्षा पास कर लेगी। नहीं, उसे करनी ही होगी। बार-बार थोड़े ही सरकारी भर्ती निकलेगी उसके लिए। लेकिन जैसे ही उसकी सरकारी नौकरी लगेगी तो पढ़ना नहीं छोड़ देगी। वो पढ़ती ही रहेगी और परीक्षाएं देती ही रहेगी; जब तक कि वो कोई ऊँची परीक्षा नहीं निकाल लेती। नानी कहती थीं, लिखना पढ़ना सीखे जोई, गाड़ी घोड़ा पावे सोई।

छह महीने बाद, तीसरे सेमिस्टर की परीक्षा का रिजल्ट आया जिसमें दीप्ति ने अपने कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया। उसकी अटेन्डेंस शॉर्ट न हुई, इसमें उसके सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने उसकी बड़ी मदद की, वरना ससुराल में तो ये हाल था कि जिस दिन वो कॉलेज जाती, लौटने पर क्लेश होता। गर्भवती हो गई थी तो भी स्कूटी चलाकर कॉलेज जाती रहती। अब एक नया प्रपंच घर में शुरू हो गया था कि उसके गर्भस्थ भ्रूण का टेस्ट करवाया जाए और अगर बेटी हो तो गिरवा दी जाए।

“मैं नहीं करवाऊँगी टेस्ट।”

“तो क्या लड़की पैदा करोगी ? हमारे घर को बदनाम करोगी ?” पति की नज़र में किसी तरह का कोई रहम नहीं।

“आपकी मम्मी ने दो-दो लड़कियाँ पैदा की; आपकी तीन बुआयें हुईं तो क्या उससे बदनाम हो गए आप लोग ?”

दीप्ति कहकर कॉलेज को निकल गई; क्या भरोसा, पति कहीं झापड़ ही न खींच दें।

पीछे से सास लाख बड़बड़ाती रही होगी; उसने नहीं सुना।

लेकिन अपने दिल भीतर, उसे हज़ार जानों से अपने अजन्मे शिशु की चिंता हो रही।

“अगर बेटी ही हुई तो इन लोगों से कैसे बचाऊँगी उसे ? जान न लेंगे तो भी भेदभाव तो करेंगे ही !”

उसे अपना बचपन याद आता है :

  • पढ़ रही होती और अम्मा आवाज़ लगातीं, भाई को चाय बनाकर दे आ पहले !
  • खेल प्रतियोगिता में अव्वल आती और टीम के साथ बाहर जाना चाहती तो भाई कहता, लड़कों के साथ बाहर जाना है, और कुछ नहीं !
  • कोई रिश्तेदार आ गया तो स्कूल जाने की मनाही। रात तक बर्तन माँजो और सवेरे से झाड़ू पोंछा करो घर का; और दौड़-दौड़कर हुकुम बजाओ सो अलग !

गर्भवती माँ अपने गर्भ पर हाथ फेरती है ...वो बदलेगी भाग्य, उसका भी ! अपना भी !

गर्भावस्था के पूरे दिन चल रहे हैं; और बी.एड. अंतिम वर्ष के फाइनल सेमिस्टर की परीक्षाएं भी। हर दिन मनाती है, बस परीक्षा पूरी हो जाए तब डिलीवरी हो ! लेकिन ...जो भाग्य बदलने निकलते हैं, उन्हें सबसे पहले अपनेआप से लड़ना पड़ता है !

रात से हल्का-हल्का दर्द हो रहा था लेकिन वो सब कामकाज करती रही और साथ में किताब भी खोले रही। कल तीन बजे उसका आखिरी पर्चा है। लेकिन सुबह होते-न-होते दर्द की लहर काबू से बाहर हो गई। सास के साथ ऑटो से वो सरकारी अस्पताल पहुंची और आधे ही घंटे में उसकी डिलीवरी हो गई।

आगे एक घंटा तो दिमाग कुछ न जानता था। तंद्रा-सी थी। बस अपनी बेटी को सीने से चिपटाए आँखें बंद किए पड़ी रही।

घंटे भर बाद, उसकी आँखें आधी खुलीं। सामने दीवार घड़ी दोपहर के बारह बजा रही है।

“मेरा पेपर है तीन बजे !”

“अब काये का पेपर ? अब इस लड़की को सम्हालो ! मैं घर जा रही हूँ; गुड़ बनाकर लाती हूँ। घर का खाना भी बनाना है। रात तक आ जाऊँगी या योगेश आ जाएगा सोने यहाँ। कल अपने मायके से बुला लो किसी को। अकेले मुझसे नहीं करते बनेगा सब।”

और सास बिना उसकी बात सुने, फोन लगाती हुई बाहर निकल गई।

“हाँ चंचल ! तुम बुआ बन गयीं ! और क्या होना था ! मैं तो पहले ही कहती थी, लड़की ही जनेगी ये !”

जाती हुई सास की बात दीप्ति के कानों में पड़ती है। वो सुनी-अनसुनी कर देती है। पति योगेश को किसी ने बताया है अथवा नहीं, दीप्ति को नहीं पता। उसने अपनी बेटी को निहारा, फिर घड़ी देखी।

—परीक्षा देनी है !

कक्ष में कोई नहीं ! सद्य प्रसूता पुकारती है, “कोई है ?”

कोई नहीं सुनता। उसने फिर अपनी ताकत जुटाकर पुकारा है, “कोई मदद कर दो !!”

भाग्य द्वार तक आया, लेकिन भीतर नहीं। एक नर्स झाँककर पूछती है,

“क्या बात है ? तुम्हारे साथ कोई नहीं? क्या कुछ खाने को चाहिए ?”

“मेरा बी.एड. का पेपर है तीन बजे से। क्या गाड़ी मिल जायेगी एग्जाम सेंटर तक जाने के लिए ?”

नर्स अवाक उसे देखती रह गई। हज़ारों जचगी इस अस्पताल में देखीं-करवाईं, ऐसी जनानी नहीं देखी !

वो निवेदन दोहराती है; नर्स क्या कहे !

“मैडम से पूछकर बताती हूँ।”

और नर्स डॉक्टर के सामने है।

“बिल्कुल नहीं ! अभी घंटे भर पहले ही डिलेवरी हुई है। मैंने ही तो करवाई है। अब 24 घंटे तो बिस्तर से उठने की अनुमति नहीं दे सकते !”

नई डॉक्टर अपने कागज़ों में उलझी, उत्तर देकर इस बात को भूल जाती लेकिन ... कोई है जो लड़ रहा है भाग्य से ! ... भाग्य विधाता से !

“मैडम जी प्लीज !” सामने एक अधमरी-सी आवाज़ है।

डॉक्टर नज़र उठाकर देखती है।

“मेरा पेपर है बी.एड. का। फिर नहीं कर पाऊँगी। न फिर फीस भर पाऊँगी। प्लीज मुझे एग्जाम सेंटर तक पहुँचा दीजिए।”

दरवाज़े से टिकी सद्य प्रसूता अपनी नवजात को लिए किसी तरह खड़ी है। या तो वो खुद ही गिर जाने वाली है या उसकी गोद से नवजात खिसकी जाती है।

उसकी गंभीर हालत देख डॉक्टर चिल्लाती है, “तुम पागल हो क्या !!”

जच्चा-बच्चा को वापिस बेड तक पहुँचाया गया। बड़े डॉक्टर साहब से बात की गई। गाड़ी तो अस्पताल में कोई मौजूद थी नहीं। एक गाड़ी बाहर गई हुई है। समय रहते लौट आई तो कुछ हो सकता है। नई डॉक्टर मदद के लिए दूसरे अस्पताल फोन लगा रही है।

गाड़ी की व्यवस्था होते-होते दो घंटे निकल गए। अस्पताल से एग्जाम सेंटर 35 किलोमीटर दूर है। गाड़ी में जच्चा-बच्चा को लिटाया गया और नर्स क्योंकि वैसे ही स्टाफ में कम हैं, वर्क लोड बहुत ज़्यादा। एक सफाईकर्मी दीदी को साथ कर दिया गया।

वे चलीं तो नई डॉक्टर पीछे से देखती, अपने मित्र ट्रेनी डॉक्टर को फोन करती कहती है, “अभी पता है क्या हुआ ?”

... किसी की मदद कर, वो इस पल अपनी ही नज़रों में हीरो है !

एग्जाम सेंटर तक वे पहुँची हैं। और सहायिका दीदी को नवजात दे, किसी तरह दीप्ति एग्जाम सेंटर के अंदर तक पहुँचती है। परीक्षा चालू हो चुकी है। सैकड़ों परीक्षार्थी परीक्षा दे रहे हैं। उसे देख चलते पेन रुक-रुक जा रहे हैं।

“सर ! मैडम ! मेरे पास प्रवेश पत्र नहीं है लेकिन मुझे अपना रोल नंबर याद है। और आप तो मेरे पिछले पेपर में भी ड्यूटी पर थीं। प्लीज मुझे पेपर देने दीजिए। क्या मैं बहुत लेट हो गई हूँ ?”

वो पन्द्रह मिनिट लेट हो चुकी है लेकिन उसे परीक्षा हॉल में प्रवेश करने दिया गया। उत्तर पुस्तिका और प्रश्न पत्र दिया गया। वो खड़े-खड़े ही किसी तरह उत्तर पुस्तिका पर लिखना शुरू करती है।

“बैठ कर लिख लो।” परीक्षक मैडम उससे कहती हैं।

“बैठ नहीं पाऊँगी। चार घंटे पहले डिलीवरी हुई है।”

“तो क्यों आईं परीक्षा देने ऐसे हाल में ? अपनी और इसकी जान को खतरे में डाल कर ?”

“जेवर बेचकर फीस भरी थी; छूट जाती पढ़ाई तो फिर नहीं कर पाती।”

परीक्षक उसे दो पल को देखती रहीं फिर केंद्र अध्यक्ष के कक्ष की ओर तेज़ कदमों से चली गईं। केंद्र अध्यक्ष ने सुना तो सन्नाटे में आ गए।

कोई नरम बिस्तर या आरामदायक खटिया तो नहीं थी लेकिन एक तख्त का इंतजाम कर दिया गया, एक खाली पड़े कक्ष में।

आधे घंटे बाद, अपनी उत्तर पुस्तिका, प्रश्न पत्र, सहायिका और नवजात के साथ सद्य प्रसूता को उस कक्ष में तख्त तक पहुंचा दिया गया।

कोई तकिया नहीं। एक परीक्षक ने अपना पर्स दे दिया है जिसे सिरहाने लगाए, सद्य प्रसूता उत्तर पुस्तिका लिखने में लीन है।

बीच-बीच में एग्जाम सेंटर के अन्य परीक्षक आ–आकर उसे देख जा रहे हैं। चार घंटे की डिलेवरी में एक परीक्षार्थी पेपर देने आई है !

बीच में, नवजात रोती है और माँ लिखना रोककर उसे स्तनपान कराती है। सद्य प्रसूता माँ फिर पेपर लिखने लगी है।

अब हिम्मत टूट रही है; माँ बीच-बीच में अपनी बेटी की ओर देखती जाती है। सहायिका दीदी की गोद में वो सो रही है। अंतिम-अंतिम उत्तर दीप्ति पूरे कर रही है। परीक्षक कह रही हैं कि वह कॉपी दे दे, समय पूरा हो रहा है।

वो उत्तर लिख रही है। उसे अब नींद आ रही है।


इंदिरा दाँगी : लेखक परिचय

जन्म: 13 फरवरी, 1980 (मध्य प्रदेश)

शिक्षा: पी-एच.डी.

अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित।

राष्ट्रीय पुरस्कार समेत अनेक राज्यों के पुरस्कार/सम्मान।

अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में कहानियाँ सम्मिलित।

अमेरिका एवं कनाडा में नाटकों का मंचन।

देश/विदेश की अनेक भाषाओं में कहानियों का अनुवाद।

इनके साहित्य पर अनेक शोध कार्य सम्पन्न हुए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इन पर प्रश्न पूछे जाते हैं।

सम्प्रति: मध्य प्रदेश के एक शासकीय महाविद्यालय में प्राचार्य हैं।

संपर्क: dangiindira4@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ