कहानी - पैमाने: इंदिरा दाँगी | Kahani 'Paimane' by Indira Dangi


ये साहित्य वाले बड़े पहुँचे हुए पीर होते हैं — सामने लाख गले लगायें अपने साथ वालों को, पीठ पीछे अमूमन उतारेंगे ही उनकी... इंदिरा दाँगी (कहानी - पैमाने)

राजनीति की काली-अँधेरी घुसपैठ से कुछ अछूता नहीं है. हमारी चर्चाओं का विषय भी इन्ही के इर्दगिर्द होता है.... ये राजनीतियाँ जितनी ज्यादा अँधेरी होती हैं उतनी ही ज्यादा इनकी गहराई... और उनकी थाह ढूंढते हम - बम्बई की लोकल ट्रेन हो या दिल्ली की मेट्रो, कलकत्ता का 'अड्डा' हो या भोपाल की कोई महफ़िल, . बहरहाल...

साहित्य अपना कर्तव्य निभाता है  और ऐसी तमाम बातें जो किसी पत्र-पत्रिका-अखबार में अपने काले-अँधेरे-चोर-चोर-मौसेरे-भाईपने के चलते नहीं छप पातीं, उन्हें हम तक पहुंचा देता है. 
                      साहित्य....!!! अब यहाँ का संसार भला कैसे इन अंधेरों से बचा रह सकता है? लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे जब बिल्ले-बिल्लियाँ ही ज्यादा हों? 
इंदिरा दाँगी की कहानी ''पैमाने'' पढ़ने के बाद आपको भी शायद मेरी तरह सुकून आये - कि घंटी बाँधने वाले भी हैं....

आपका 
भरत तिवारी

कहानी - पैमाने  

इंदिरा दाँगी

हिदी साहित्य की राजनीति पर इंदिरा दाँगी की कहानी Indira Dangi ki Kahani


भीतर मीटिंग से पहले वाली मीटिंग चल रही है:

स्याह रेशम परदों वाले नेपथ्य ने रक्त— लाल रंग की सोफ़ा कुर्सियों की चमक कुछ और गहरा दी है।

बड़े अधिकारी श्रीवास्तव ने छोटे अधिकारी मल्होत्रा से कहा,


‘‘मल्होत्रा, ये लिस्ट है, ‘दीप कौन जलायेगा’ से लेकर ‘आभार कौन व्यक्त करेगा’ तक।’’

‘‘लेकिन सर, ये तो आज की इस मीटिंग में तय होना था। लेखकों के सलाहकार मंडल ने रचना पाठ कार्यक्रम के लिए जो नाम भेजे हैं, उन पर चर्चा...’’

‘‘वो भी कर लेंगे, पर फ़ायनल लिस्ट यही है; सुपर बॉस के घर से आई है।’’

‘‘घर से??’’

‘‘तुम भी न मल्होत्रा, एकदम ही कोरे हो! ...मेरे भतीजे के साले न होते तो मैं भी तुम्हें ये सब न समझा रहा होता। परीक्षा पास करके अभी— अभी अधिकारी बने हो ना, अधिकारीपन सीखने में समय लगेगा!’’
‘‘मैं समझा नहीं सर!’’
‘‘यही तो चीज़ है अधिकारीपन कि हम सबकी समझें, हमको कोई समझने न पाये!’’


‘‘हाँ, तो और नहीं! तुम्हें पता नहीं हमारे सर कितने बड़े वाले साहित्यकार हैं। सबेरे मुझे घर बुलाया था, लुंगी-बनियान में बैठकर उन्होंने ये लिस्ट बनाई है। जो-जो पत्रिकायें उनकी रचनायें छापती हैं, जो-जो संस्थायें उन्हें अवार्ड— रिवार्ड देती हैं, जो-जो राइटर, एडीटर उनके ग्रुप के हैं...’’

‘‘फिर सर, बचा ही क्या मीटिंग करने को! अब ज़रा दिखाईये तो, बिग बॉस ने क्या कार्यक्रम बना डाला है! मुख्य अतिथि क्या ख़ुद ही बन गये हैं?’’

‘‘तुम भी न मल्होत्रा, एकदम ही कोरे हो! ...मेरे भतीजे के साले न होते तो मैं भी तुम्हें ये सब न समझा रहा होता। परीक्षा पास करके अभी— अभी अधिकारी बने हो ना, अधिकारीपन सीखने में समय लगेगा!’’

‘‘मैं समझा नहीं सर!’’

‘‘यही तो चीज़ है अधिकारीपन कि हम सबकी समझें, हमको कोई समझने न पाये!’’

‘‘मतलब इस कार्यक्रम में सुपर बॉस का नाम नहीं है?’’

‘‘है भी और नहीं भी!’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब ये कि सुपर बॉस कार्यक्रम के अंत में बोलेंगे — आउट ऑफ़ रिकार्ड! इस बात का ध्यान रखना मल्होत्रा कि बाक़ी सब वक्ताओं को जल्दी-जल्दी उतारना पड़ेगा माइक से ताकि सुपर बॉस को तसल्ली से वक़्त मिल सके। आजकल वे उसी स्पीच की तैयारी कर रहे हैं। मुझे कुछ रफ़ लिखा हुआ दिखाया भी था।’’


13 फ़रवरी, 1980 को जन्मीं इंदिरा दाँगी ने वर्तमान हिंदी कथाजगत से उस युवा कहानीकार की कमी पूरी की है जिसका लेखन न सिर्फ़ रोचक है बल्कि विषयों को अपने ख़ास-तरीके से पेश भी करता है। भोपाल में रह रही, दतिया, (म.प्र.) की इंदिरा दाँगी में एक अच्छी बात और दिखने में आती है कि वो अपनी कहानियों में जल्दबाज़ी करती नहीं दिखतीं। हिन्दी साहित्य में एम.ए., इंदिरा को यह समझ है कि उत्कृष्ट-लेखन उत्कृष्ट-समय मांगता है और उनका इस बात को समझना - पाठक को लम्बे अरसे तक उनके अच्छे उपन्यास, कहानियाँ आदि पढ़ने मिलने की उम्मीद देता है।  

इंदिरा की तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं 1. एक सौ पचास प्रेमिकाएं (कथासंग्रह, राजकमल प्रकाशन, वर्ष 2013) 2. हवेली सनातनपुर (उपन्यास, भारतीय ज्ञानपीठ, 2014) और 3.शुक्रिया इमरान साहब (कथासंग्रह, सामयिक प्रकाशन, 2015) उनकी कहानियों का अंग्रेज़ी, उर्दू, मलयालम, उड़िया, तेलगू संथाली, कन्नड़ एवं मराठी में अनुवाद भी हो चुका है।

भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन अनुशंसा-पुरस्कार (2013), वागीश्वरी पुरस्कार (2013), कलमकार कहानी पुरस्कार (2014), रमाकांत स्मृति पुरस्कार (2013), रामजी महाजन राज्य सेवा पुरस्कार (2010), सावित्री बाई फुले राज्य सेवा पुरस्कार (2011) एवं अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित इंदिरा आजकल अपने उपन्यास ‘रपटीले राजपथ’ को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं.

सम्पर्क
इंदिरा दांगी
खेड़ापति हनुमान मंदिर के पास,
लाऊखेड़ी, एयरपोर्ट रोड,
भोपाल म.प्र.462030
ईमेल: indiradangi13@gmail.com
मोबाईल: 08109352499

‘‘बोलेंगे ही तो फिर नाम ही क्यों नहीं डाल देते डिस्पले पर?’’

‘‘ऐसे कैसे? मीडिया वाली पारदर्शी इमेज पर असर न पड़ जायेगा! न हुआ मानदेय, बाक़ी तो सब ज्यों का त्यों है।’’

‘‘फिर आज की मीटिंग में हमें क्या करना है?’’

‘‘करना क्या है — मीटिंग, और क्या?’’

दोनों सम्मिलित हँसे।

‘‘करना सब क़ायदे से ही है मल्होत्रा। सबकी बात पूरे सम्मान से सुननी है; बीच— बीच में कुछ नोट भी करते जाना है। और हाँ, ज्यूरी के सब राइटर लोगों से बाद में पर्सनली पूछ लेना है कि फ्रेशर्स में किस— किस को बुलाना है, पाठ के लिए। हर एक से एक-एक नाम ले लेना, पर इतनी गोपनीयता बरतना कि उन्हें एक— दूसरे के दिए नामों की ख़बर न हो; ये साहित्य वाले बड़े पहुँचे हुए पीर होते हैं — सामने लाख गले लगायें अपने साथ वालों को, पीठ पीछे अमूमन उतारेंगे ही उनकी।’’

‘‘पर सर, इतना भी करने की क्या ज़रूरत है, पूरा कार्यक्रम तो तैयार हो चुका।’’

‘‘ये ज़रा-ज़रा लालीपॉप्स नहीं पकड़ायेंगे ना तो बाद में...’’

‘‘फ़ोटो दीर्घा में सबसे प्रमुख वक्ता के तौर पर अपना फ़ोटो कैसे पिन करवा पायेंगे सुपर बॉस! ...मेरी मानिए सर, आप भी लिखने-उखने जैसा कुछ करने लगिये। इस विभाग में और कुछ धरा नहीं है। — अलबत्ता लेखक ज़रूर अंतर्राष्ट्रीय बना जा सकता है।’’

वे फिर हँसे।

‘‘अरे, मज़ाक नहीं; अभी पिछले हफ़्ते ही मेरी पहली कविता छपी है। मैं तुम्हें बताना भूल गया, एडीटर साहब ने ख़ुद फ़ोन करके बधाई दी मुझे। कह रहे थे कि मैं आपकी तारीफ़ इसलिए नहीं कर रहा हूँ क्योंकि आप इतनी महत्वपूर्ण जगह बैठे हैं; आप वाकई बहुत बढ़िया कवि हैं। आज जो भी लोग लिख रहे हैं, उनके बीच एक अलग तरह का क्राफ़्ट हैं आप! — एक स्पार्क है आपकी कविता में!’’ 

— श्रीवास्तव साहब संपादक के शब्दों को दोहराते आत्मरति में खो गये जैसे।

‘‘तो सर आपके इन एडीटर साहब का नाम लिख लें ना —वो लघु पत्रिकाओं वाले सम्मेलन के लिए ?’’

‘‘मल्होत्रा, तुम बहुत बड़े अफ़सर बनोगे किसी रोज़ !’’

अधिकारियों के चेहरों पर मीटिंग सम्पन्न कर देने वाली विजयी मुस्कान है — मीटिंग शुरू होने से पहले ही।

रेल्वे स्टेशन के बाहर से बस पकड़कर वो सीधा ही चला आ रहा है:

हिन्दुस्तान हाउस !

साहित्यवालों का मक्का ! कितनी ही राष्ट्रीय— अन्तर्राष्ट्रीय गौरव— गर्व उपलब्धियाँ छपा करती हैं अख़बारों में इसकी। असल-नकल, अफ़सर-भुख़मरा, गृहशोभा—यायावर, इस मुल्क का कौन ऐसा साहित्यकार है जो यहाँ रचना-पाठ कर धन्य न हुआ फिरे! फ़ेसबुक वालों ने फ़ेसबुक पर, ट्विटर वालों ने ट्विटर पर; और आधुनिकता में ना— कुछ वालों ने अपने बैठकखानों में, पाठ में खिंची अपनी तस्वीर येऽऽ बड़ी करवाकर सजा रखी है, जिस पर बाद में बेटे-पोते माला-धूप करेंगे और बहुओं-नतबहुओं की महरियाँ जब झाड़न का फटका मारेंगी तो वे पीढ़ीगत् गर्व से टोकेंगे,

‘‘सम्हाल के! हिन्दुस्तान हाउस में पाठ करने की फ़ोटू है!’’

तेईस साला नौजवान लेखक गोवर्धन का रोयाँ-रोयाँ रोमांच से अभिभूत है — विशाल प्रांगण में कलाकृति-सी इमारत जैसे अनंत समुद्र तट पर सुदर्षन पटनायक ने रेत का कॉसिल रच दिया हो। लेखक लड़के ने मुख्य लौह-फ़ाटक के सामने की धूल उँगलियों से छूकर माथे पर लगा ली — जैसे भभूत!

बगल सुरक्षा-कोठरी का एक गार्ड तिरछा मुस्कुराया,

‘‘नये-नये साहित्यकार हो क्या भाई?’’

गोवर्धन उत्साह से उधर को लपका; जैसे उस गार्ड का भी कोई सिफ़ारिशी महत्व हो!

‘‘हमारा नाम गोवर्धन गजभिए है। ग्राम सनातनपुर ज़िला दतिया से आये हैं। कहानीकार हैं। ये आवेदन देना है; यहाँ रचनापाठ में आना चाहते हैं। हमें तीन अवार्ड...’’

‘‘फिर जल्दी जाओ; अभी बड़े साहब सीट पर हैं।’’

हथेली पर खैनी फटकते वर्दीधारी गार्ड ने कहा तो अध-निकला आवेदन झोले में वापिस रखता नौजवान आगे बढ़ गया,

‘‘लौटकर तुम लोगों को चाय पिलवायेंगे भईया।’’

पीछे से, गार्ड्स मुस्कुराये — उसके आवेदन और भोलेपन दोनों पर।

लेखक लड़के के पैर जैसे ज़मीन पर नहीं, स्वर्ग की सीढ़ियों पर हैं:


— कितना सुंदर हिन्दुस्तान हाउस !!

— कितने रंग-रौनकदार अंग्रेज़ी फूल !

— कैसे अजब-अजब तराशे पत्थर शिल्प!

— कैसी शीतल-शांत हवा: कैसा विनम्र मौसम! — जैसे बाअदब हो इस कला निकेतन की शान में !

मुग्ध लड़के को तभी ध्यान आया — बड़े अधिकारी अभी सीट पर हैं! 

उसने सीधी राह कार्यालय की पकड़ी।

‘‘ऐ, किधर जाना है?’’ — चपरासी ने उसकी कुर्ता-पायजामा-झोला वेषभूशा और चेहरे के गँवई सीधेपन को देख रोब-दाब से पूछा।

‘‘हमें बड़े अधिकारी साहब से मिलना है, हम गोवर्धन गजभिए, कहानी लिखते हैं। ग्राम सनातनपुर ज़िला दतिया से आये हैं। यहाँ रचना पाठ...’’

‘‘उधर!’’ — चपरासी ने उँगली टेड़ी की,

‘‘छोटे सर उधर बैठते हैं; बड़े सर सबसे नहीं मिलते।’’

छोटे सर के केबिन में अपने नाम को काग़ज़ के पुरज़े पर लिख भेजने के पैंतीस मिनिट बाद तक वो अपने को बुलाये जाने का इन्तज़ार कर रहा है,

‘‘बड़ी व्यस्तता है यहाँ! सही बात है, इत्ता नामी संस्थान चलाना कोई हँसी थोड़े ही है!’’

उसने सामने वाले केबिन के चपरासी की ओर देखकर कहा; पर चपरासी का ध्यान न जाने किस ओर था।

अब उसे केबिन में जाने की आज्ञा हुई।

क्या चपरासी ने अपने मन से ही उसे बुला भेजा भीतर; छोटे अधिकारी साहब तो दीवार पर चिपकी टी.वी. पर मैच देख रहे हैं।

— दिल ने ख़ुद को मज़बूत किया!

‘‘नमस्ते सर। हमारा नाम...’’

हाथ जोड़े नमन कर रहे लेखक को अनदेखे, इशारे से चुप कराते छोटे सर कुर्सी पर आराम-मुद्रा में मैच-लीन हैं,

‘‘वाह! वाह! क्या शॉट मारा है! जियो मास्टर ब्लास्टर!’’

वो एक ओर को खड़ा हो गया। 

ये तो कल के मैच की हाईलाइट्स हैं!!

— दिल तो भी विनम्र रहा।

दस मिनिट बाद जब अगला कार्यक्रम चल पड़ा, छोटे अधिकारी की रिवाल्विंग कुर्सी का रुख सीधा हुआ। वो अपने बदन में सावधान-सा तन गया। चेहरे पर राई भर भी आहत भाव नहीं ...अभिनय सिर्फ़ मंचों पर नहीं होता!

आवेदन अधिकारी के सामने रख वो ऐसे बोलने लगा जैसा मासूम बच्चा अपनी सर्वश्रेष्ठ कविता सुना रहा हो,

‘‘नमस्ते सर। हम गोवर्धन गजभिए, ग्राम सनातनपुर ज़िला दतिया से आये हैं। कहानीकार हैं सर। कहानी के लिए ज़िला लेखक संघ से हमें अवार्ड मिला है — कोंपल कहानी पुरस्कार। दूसरा अवार्ड कॉलेज की तरफ़ से इंटरस्टेट स्टोरी राइटिंग कॉम्प्टीशन में प्रथम...’’

बमुश्किल आधा मिनिट! ...आधा मिनिट भर देखा-सुना अधिकारी ने उसे और उसके आवेदन को; फिर एक मोटी फ़ाइल अपने आगे कर ली,

‘‘हम सिर्फ़ बड़े साहित्यकारों को ही पाठ के लिए आमंत्रित करते हैं।’’

अब दिल उसका दरकने लगा; पिताजी से रेल-किराये के रुपये माँगे थे तो यक़ीन दिलाकर — हिन्दुस्तान हाउस को रक्षक-माली संस्थान समझिए बाऊजी, जो नन्हे प्रतिभाशाली पौधों को दोनों हथेलियाँ लगाकर बढ़ने का मौक़ा देता है। बस, एक बार जाकर मिलने की देर है। एक बड़े रचनाकार के इंटरव्यू में छपा है कि उन्होंने अपनी तीसरी ही कहानी हिन्दुस्तान हाउस में पढ़ी थी जिससे आगे उनके कॅरियर की राह रोशन हुई।

लेखक लड़के का दिल टूट रहा है ...कोंपल पर उँगली उठाता माली!

नहीं ! इतनी जल्दबाज़ी नहीं — न कहानी में, न ज़िन्दगी में! वो और दो मिनिट चुपचाप खड़ा रहा — कुछ बेहतर की आस में।

अंततः अधिकारी ने फ़ाइल पर से नज़र ऊँची कर कहा,

‘‘देखो लड़के, तुम अपने गाँव-क़स्बे में ज़रूर होओगे साहित्यकार लेकिन यहाँ रचनापाठ करने के लिए साहित्यकार का नाम बड़ा होना चाहिए। हिन्दुस्तान हाउस के मंच पर रचना पढ़ना तुम्हारे इन कस्बाती-कॉलेजी अवार्डों से बहुत-बहुत ऊँची बात है!’’

‘‘लेकिन सर, हमने तो सुना है कि यहाँ नवोदित रचनाकारों को भी अवसर, प्रोत्साहन...’’

‘‘वो पहले के स्टाफ़ के समय प्रावधान रहा होगा, अब नहीं है।’’

‘‘जी सर, पर एक निवेदन...’’

फिर चल गई टी.वी. की ऊँची आवाज़ में, अपनी टूट गई बात और लौटा दिये गये आवेदन को समेट वो बाहर निकल आया,

‘‘बैठने तक को नहीं कहा!’’

नम पड़ते दिल को उसने भरसक आपे में रखा। इस महान परिसर में पहला आगमन है; दिल की नमी आँखों तक न आने पाये।

                                   

कुछ देर इधर-उधर घूमा: ...अंग्रेज़ी फूल-पौधे, ...पेंटिग्स, ...किताबें, ...साहित्यकारों के धरोहरी दस्तावेज़। बुझे दिल को सम्हालता जब वो लौटकर जाने लगा, झोले में से फ़ोटो कैमरा निकालकर गार्ड से ख़ुद की एक फ़ोटो खिंचवाई, हिन्दुस्तान हाउस की परिचय पट्टिका के पास मुस्कुराते हुए।

और चाय के लिए दस का नोट देते हुए कहा,

‘‘तुम लोग भाग्यशाली हो भईया!’’

रेल-सफ़र में एक नदी-पुल पर से उसने आवेदन के टुकड़े हवा में विसर्जित कर दिए। दिमाग़ में छोटे अधिकारी के शब्द हैं 

— सिर्फ़ बड़े साहित्यकार!

पाँच बरस बीत गए हैं।

तेईस का गोवर्धन अब अट्ठाईस का हो चुका — एम.ए., पी.एच.डी. डॉ. गोवर्धन गजभिए।

‘‘प्रायवेट कॉलेज में ही पढ़ाना मिल रहा है तो यहीं दतिया में ही पढ़ा लो; इत्ते दूर शहर क्यों जाना बेटा?’’

बाऊजी ने कहा था; पर वो अपने बीवी-बच्चे लिए मँहगे राजधानी-शहर को निकल चला,

— वहाँ हिन्दुस्तान हाउस है ना!

इस दफ़ा हाथ में झोला-आवेदन नहीं; उपलब्धि-कतरनों की मोटी फ़ाइल है।

सिर्फ़ बड़े साहित्यकार! — वाक्यांश उसे सदैव याद रहा और पिछले इतने सालों में मामूली-से-मामूली से लेकर मुख्य-से-मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में उसकी रचनायें छपी हैं — सब हिसाब हाथ में है। फिर हिसाब की बात क्या है; अरे, इतना नाम तो कमा ही लिया है; अब कुर्सी-चाय की तो ज़रूर ही पूछेंगे अधिकारी साहब लोग!

छोटे अधिकारी साहब अपने केबिन में नहीं मिले। बडे़ साहब के केबिन में बैठे हैं। पाँच साल में कमाया साहित्यिक सुयश सरकारी कार्यालय की धूल में मिल गया लगा उसे; जब चपरासी ने उसे उधर को जाने नहीं दिया। असिस्टेंट प्रोफ़ेसर गजभिए ने ज़ेब से पचास का नोट निकाला जिसने पाँच साला साहित्यिक प्रतिष्ठा के मुक़ाबिल कहीं ज़्यादा प्रभावित किया सरकारी चपरासी को।

‘‘देखो भाई, आज बड़ी मीटिंग होनी है यहाँ; छोटे सर और बड़े सर उसी की तैयारी कर रहे हैं भीतर। तुम भले ही बाहर बैठ कर इन्तज़ार कर लो मगर बड़े सर के पास तुमसे मिलने की फुर्सत होगी भी या नहीं, ये तुम्हारा भाग्य!’’

और अपने भाग्य के साथ, बड़े अधिकारी के केबिन-दरवाज़े के किनारे बैंच पर आ बैठा है वो। भीतर ऊँचे कहकहे हैं जो खिड़की के ब्लाइण्ड्स से छनकर बाहर तक आ रहे हैं। 

भीतर मीटिंग से पहले वाली मीटिंग चल रही है:

उध्र्वकर्ण हो सुना; कोई दिलचस्प वार्तालाप लगता है:

‘‘इस कवियत्री के पिछले फ़ोटो को देखकर तुम क्या तो कह रहे थे उस दिन कष्यप?’’ — बड़े अधिकारी चौहान ने एक साहित्यिक पन्ने पर दूर से उचटती-सी नजर डालते हुए बहुत संयमित आवाज़ में चर्चा छेड़ी छोटे अधिकारी कष्यप से।

कष्यप ने उतने ही आनंदित स्वर में उत्तर दिया, 

‘‘फ़ोटो में तो पूरी हीरोइन लगती है। हर कविता के साथ नया फ़ोटो-सद्यस्नाता से लेकर दुल्हन जैसी तक!

विद्यापति की पंक्तियाँ सुना रहा था मैं उस दिन,

कामिनी करए सनाने,

हेरति हृदय हनय पच बाने !’’

‘‘क्या बात है! अगर तुम्हारे विद्यापति आज होते तो हम उन्हें भी पाठ में बुला लेते!’’ अधिकारी साहब एक विशिष्ट अर्थ में मुस्कुराये।

‘‘अरे सर, विद्यापति न सही, ये कवियत्री तो हैं; बिल्कुल बुलाये लेते हैं लेकिन मेरा दावा मानिये, निकलेगी ये इन फ़ोटुओं से पाँच-आठ साल बूढ़ी ही!’’

‘‘सो कैसे दावा कर रहे हो?’’

‘‘सर, आप तो यहाँ से पहले मवेशी विभाग के हेड थे। लिट्रेचर वालों से वहाँ कहाँ वास्ता रहा होगा आपका! — जो साहित्यकारायें अपनी उम्र वाला सन् नहीं लिखतीं ना परिचय में... अरे सर, बड़े दिनों से मैं यहाँ हूँ। सिवाय लेखक-लेखिकाओं के यहाँ आता ही कौन हैं।’’

‘‘तो भी बुरी नहीं होगी तुम्हारी ये कवियत्री! क्या तो लिखती है — ग़ज़ब! मैं कल मंत्रालय गया था; बिग बॉस ने भी पढ़ रखी है इसकी वो बड़ी चर्चित कविता। क्या तो शीर्षक है उसका...’’

‘‘बिस्तर!’’ 

‘‘हाँआँ, ऐसा ही कुछ! ...कष्यप, इसे अगले महीने होने वाले राष्ट्रीय युवा पाठ में बुला ही लो।’’

‘‘जी सर।’’

‘‘और हाँ, बिग बॉस ने बोला है मार्च से पहले पूरा बजट ख़त्म करना है। इस कार्यक्रम में कितना ख़र्च हो सकता है?’’

‘‘जितना आप कहें सर! कहें तो पूरा ही! हम सब मशहूर हस्तियों को बुलाये लेते हैं। लिस्ट मैं घर से बनाकर ले आया हूँ; पद्मश्री और पद्म भूषण वाले ही तो देख लीजिए कितने नाम हैं! होटल तो वही है अपना हर बार का — शानदार। आपकी वाली कवियत्री को पाँच सितारा में रुका देंगे!’’

‘‘कष्यप!!’’

‘‘सॉरी सर, मेरा मतलब था आमंत्रित सभी लेखकों को अबकी पाँच सितारा में रुका देंगे।’’

‘‘बस, यही कार्यक्रम रहेगा कुल?’’ 

‘‘अरे सर, राइटरों को भ्रमण पर भी तो ले जायेंगे। इस बार तीन दिन की ट्रिप बनाये लेते हैं।’’ 

‘‘तुम्हारी यही बात अच्छी लगती है कष्यप! बिना बताये ही सब सही-सही कर देते हो!’’

‘‘क्योंकि सब अधिकारियों के मन एक ही जैसे होते हैं सर! वैसेऽ एक बात है सर...!’’

‘‘हाँ हाँ, ज़रूर कहो! तैयारियों में कोई कसर नहीं रह जानी चाहिए।’’

‘‘सर, इन कवियत्री मैडम से पहले ही पूछना पड़ेगा कि ये कहीं अपने पति-परिवार को तो साथ नहीं लिये आ रही हैं?’’

‘‘हैं ?? ऐसा भी होता है?’’

‘‘साहित्य में कैसा-कैसा नहीं होता सर? ख़ैर, उसकी कोई चिंता नहीं है; एक नई लेखिका भी है; आजकल मेन स्ट्रीम की पत्रिकाओं में छाई हुई है। और यहाँ आने के लिए तो ये समझिए कि मरी जा रही है!’’

‘‘वो भी सपरिवार...?’’

‘‘ना सर! अभी पिछले दिनों संस्कृति मंत्रालय के एक कार्यक्रम में मैंने उसे देखा था; क्या तो दिखती है सर!’’

‘‘अच्छा!!’’ — अधिकारी ने कहा कम, चुप रहा ज़्यादा। मातहत के समक्ष उनका मौन भी बोल था जैसे। 

आवाज़ें आनी बंद हो गयीं; भीतर मीटिंग सम्पन्न हो चुकी है — मीटिंग शुरू होने से पहले ही।

— तो अगले महीने राष्ट्रीय युवा पाठ है!

खिड़की की तरफ़ कान लगाये युवा लेखक के दिल में एक विश्वास फिर रोशन हुआ — एक पुराना विश्वास,

‘‘हिन्दुस्तान हाउस को रक्षक-माली समझिए बाऊजी!’’

छोटा अधिकारी बाहर निकला तो युवा लेखक पीछे हो लिया।

‘‘नमस्ते सर। मैं असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डाक्टर गोवर्धन गजभिए — आपने नाम सुना होगा मेरा!...’’

हूँ हूँ की अस्फुट— सी ध्वनि में सिर हिलाता, सुनता-न-सुनता छोटा अधिकारी तेज़ चाल में बाहर की ओर चला जा रहा है और युवक साहित्यकार उसके पीछे लगभग दौड़ता हुआ, साथ चलता अपनी बात कहता रहा था,

‘‘सर, मुझे पिछले साल यहीं की एक साहित्यिक संस्था ने अवार्ड भी दिया है — मेरी पहली किताब पर ही।’’

‘‘अब साहित्यिक संस्थाओं की कुछ न कहिए! वे लोग इतना तो अनुदान बगाड़ लेते हैं सरकार से; स्मारिका के लिए जनसम्पर्क से विज्ञापन अलग! यों फ़ण्ड पर उनका मेन फ़ोकस रहता है; बाक़ी अवार्डों-ऊवार्डों की क्या है, दो-एक सेलेब्स नामों को तो बुलाना ही पड़ता है, और बाक़ी खानापूर्ति के लिए लोकल साहित्यकारों के बुला लेते हैं; ख़र्चा बच जाता है ना। ’’

छोटा अधिकारी परिसर से बाहर आ चुका है, अपनी सेडॉन कार के ड्राइवर— गेट तक।

‘‘सर, मैं अगले महीने होने वाले राष्ट्रीय युवा पाठ में मौक़ा चाहता हूँ।’’

आख़िरी तौर पर उसने अपनी बात कह दी।

‘‘देखिए, ऐसा है असिस्टेंट प्रोफ़ेसर साहब कि इतने सारे लेखक हैं हिन्दी के कि समझिए अनगिनत; और वे सब सालों-साल इन्तज़ार में रहते हैं लेकिन हम उन्हें बुला नहीं पाते।’’

कार स्टार्ट की किरकिराहट-ध्वनि और स्याह धुँए से माहौल भर गया।

‘‘लेकिन सर, कई साहित्यकारों को तो आपने साल में तीन बार तक बुलाया है; मैं तो यहाँ के बारे में छपा हर समाचार ज़रूर पढ़ता...’’

कार चली गई और युवक लेखक अपनी टूटी बात, अस्वीकृत प्रतिष्ठा के साथ खड़ा रह गया। अब पलटकर बड़े अधिकारी से मिलने जाने का हौसला कहाँ?

दिल बैठ गया; पाँच साल की मेहनत— तरक़्क़ी के बाद भी हिन्दुस्तान हाउस में आज भी वो जैसे वहीं-का-वहीं खड़ा है:

— गोवर्धन गजभिए, ग्राम सनातनपुर ज़िला दतिया — यहाँ कहानी पढ़ना चाहते हैं!

...वही नवजात कोंपल! ...वही कर्तव्यच्युत माली!

और बीत गये ये अगले पाँच साल।

 डॉ. गोवर्धन गजभिए युनीवर्सिटी में हिन्दी के एसोसियेट प्रोफेसर हैं। दो कथा संग्रह, दो उपन्यास, एक यात्रा संस्मरण किताब और इधर-उधर के अनेक सम्मान-पुरस्कार। हिन्दुस्तान हाउस के तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में उपस्थित — बहैसियत दर्शक भर!

इस साल का राष्ट्रीय युवा पाठ है। कार्यक्रम से ऐन पहले परिसर में इधर-उधर छोटे समूहों में बतियाती-गपियाती लेखक बिरादरी।

बूढ़े उस्ताद के हाथ में फ़ीकी चाय की प्याली है,

‘‘गजभिए, अभी दो महीने पहले तक तो तुम्हारा नाम एक तरह से फ़ायनल ही था यहाँ के लिए। तुम्हारे वाम वाले अध्यक्ष तो दावा कर रहे थे कि... फिर क्या बदल गया?’’

‘‘सरकार बदल गई सर!’’ — लेखक ने सामने की पत्थर दीवार पर सजे विराट होर्डिंग्स की ओर निरीह आँखों से देखते हुए कहा जिसमें एक पद्मश्री लेखक के साथ यहाँ के नये प्रमुख--मंत्रि-की फ़ोटो थी — राष्ट्रवादी चेहरा!

‘‘देअर आर मैनी स्लिप्स बिटबीन कप एण्ड द लिप्स!’’ अनुभवों के आचार्य ने कहा; फिर ख़ुद ही माहौल हल्का करते हुए बोले,

‘‘तो गजभिए, तुमने उस नये लड़के कहानीकार जय शर्मा को अभी तक नहीं देखा; दो कहानियाँ लिखकर ही हिन्दुस्तान हाउस में रचनापाठ का मौक़़ा पा गया! ...यहाँ क़ाबिलियत के अलग ही पैमाने हैं।’’

‘‘काश, हम भी शर्मा सरनेम लेकर पैदा हुए होते; साला, किसी पैमाने में तो पड़े रहते!’’ — फ़क्कड़, प्रौढ़ आलोचक अटल ने कहा और व्यर्थ हँस दिए — जैसे अपनी ही बात का मखौल उड़ा दिया हो; फिर मीठी चाय का आख़िरी घूँट भरकर बोले,

‘‘ये फ़्लेक्स होर्डिंग पर दूसरा नाम कौन कवि है सर जी — शिखरचंद! साहित्य में पहले नहीं सुना!’’

‘‘ये ऊँचे अफ़सर साहब हैं — इतने ऊँचे कि यहाँ के अफ़सरों का भाग्य भी बना— बिगाड़ सकते हैं।’’

‘‘कवि हैं?’’ — चाय का दूसरा कप उठाते समीक्षक ने पूछा।

‘‘अब कविता पाठ के लिए बुलाये गये हैं, तो कविनुमा भी कुछ होंगे ही!’’

‘‘दूसरा पैमाना!’’ — यायावर समीक्षक मीठी चाय पीता हुआ कड़वा मुस्कुराया।

‘‘पैमानों पर शोध कर रहे हो तो इसमें तुम्हें अपने दोस्त गजभिए से ख़ासी मदद मिल सकती है!’’ 

बूढ़े उस्ताद ने अपने साहित्यिक बच्चे का पसीजता चेहरा देखा; और बातों का रुख फिर बदल दिया,

‘‘तुमने ये बहुत अच्छा किया कि पिछले महीनों चली उस इंटरनेटी मुहिम में हिस्सा नहीं लिया। सरकारी कर्मचारियों को इन सब ईमानदारियों से दूर ही रहना चाहिए। वे लेखक जो तानाशाही, लालफीताशाही और न जाने किन-किन शाहियों का आरोप लगा रहे थे हिन्दुस्तान हाउस के प्रशासन पर, अब देखना, उनका क्या हश्र होता है! — उस्ताद ने दूर खड़े, छोटे-बड़े अधिकारी को अतिथि लेखक-लेखिकाओं से गर्वित मेजबान के तौर पर बतियाते देखकर कहा।

‘‘कुछ हुआ है क्या उन लोगों के साथ?’’

‘‘न! अरे इतना गर्म कभी नहीं निगलते शासक कि तालू जले। मामले को ज़रा ठंडा होने दो फिर इनकी प्लेट में पड़ी मछली की तरह देखना उन सूत्रधार लेखकों को।’’

प्रौढ़ लेखक गजभिए का दिल राख तले दबे अंगारे— सा आँच करता हुआ बोला,

‘‘ज़्यादा-से-ज़्यादा क्या बुरा होगा; यही ना कि यहाँ के अधिकारी उन्हें ब्लैक लिस्टेड कर देंगे? तो अभी उन्हें कौन बुलाया ही जाता था?? — वर्ना उन्हें आवाज़ उठाने की ज़रूरत ही क्या थी?’’

‘‘तो आवाज़ उठाकर कौन इन्क़लाब ला दिया उन लोगों ने? न उठाते न्याय का झंडा तो एक उम्मीद तो बाक़ी थी। उनमें से एक सरकारी कर्मचारी है माने इन्हीं के पानी की मछली! दूसरा सरकारी सेवा से बिल्कुल अभी रिटायर हुआ है; पेंशन तक चालू नहीं हुई अब तक उसकी — अब पता नहीं होगी भी या नहीं!’’

दो पल को तीनों मौन रह गये।

कुछ दूरी पर, मेहमान लेखक-लेखिकाओं और मेजबान अधिकारियों — बड़े अधिकारी शर्मा और छोटे अधिकारी गुप्ता —  ने किसी बात पर सम्मिलित ठहाका लगाया है — पल को, माहौल एक ऊँची हँसी से थर्रा गया जैसे।

‘‘यार गजभिए, ये बात समझ नहीं आती; आख़िर ये लोग तुम्हें बुलाते क्यों नहीं?’’

समीक्षक दोस्त की बात का उत्तर उस्ताद ने दिया,

‘‘तुम्हारे गजभिए ने कौन इनके घरों के गेहूँ पिसवाये हैं जो ये बुलाने लगे इसे?’’

वे तीनों रस्म-सा हँसे; पैने सच की धार को सहनीय बना रहे हों जैसे।

‘‘मेरे बच्चे!’’ — उस्ताद ने अपने क़ाबिल शार्गिद के कंधे पर हाथ रखा,

‘‘निरा साहित्यकार तो मरने के बाद ही ऐसी सरकारी जगहों पर जगह पाता है; हाँ, मगर जीते जी इनसे दूसरा कुछ बहुत पाता है। ये संस्थायें, अधिकारी, बेईमानियाँ — ये पाठ हैं जीवन के! बड़ा बनाने वाले सबक! गाँठ बाँध लेने योग्य ज्ञान!’’

प्रौढ़ लेखक और फक्कड़ समीक्षक के बुझे दिल रोशनी पाने की-सी उम्मीद से उस्ताद की ओर ताक रहे हैं।

सामने ऊँची दीवार पर जड़ाऊ सरकारी फ्रेम में सजी निराला की तस्वीर को नीचे से देखते उस्ताद साहित्यकार ने अपनी आवाज़ में जीवन का निचोड़ भरकर आगे कहा,

‘‘...क्योंकि ज़िन्दगी ने जिसमें जितने ज़्यादा धक्के मारे हैं — वो उतना ही आगे बढ़ा है!’’
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2 comments :

  1. श्री राम नवमी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-03-2015) को "प्रभू पंख दे देना सुन्दर" {चर्चा - 1932} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. श्री राम नवमी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-03-2015) को "प्रभू पंख दे देना सुन्दर" {चर्चा - 1932} पर भी होगी!
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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