जंगरइत ( लम्बी कहानी ) - कृष्ण बिहारी | Hindi Kahani 'Jangrait' by Krishna Bihari


जंगरइत… कृष्ण बिहारी की 'हंस अप्रैल 2015' में प्रकाशित  कहानी ‘जंगरइत’ में गाँव है, वो गाँव जो हर गाँव की तरह शहर बनना चाहते हुए क्या बन गया... पता नहीं। उसमें वो ‘सच्चे’ किरदार हैं जो अब कहानियों में ही मिलते हैं, लेकिन यहाँ जीवित मिलते हैं... हमारे सामने बैठ कर बात करते हैं और हम सर झुका के उनको सुनते हैं, इतनी हिम्मत नहीं पड़ती कि आँख मिला सकें... प्रेम है – अलौकिक प्रेम है, कई रूपों में, एक-ही कहानी में प्रेम को इतना सहज शायद ही कहीं पढ़ा हो मैंने। प्रेम को उसके सच्चे रूप में देखना, क्यों विस्मृत करता है? ऐसे-ऐसे सवाल उठ रहे हैं – प्रथम पाठ के बाद। कृष्ण बिहारी ने खूबसूरत कहानी कह डाली... बहुत लम्बी उम्र वाली कहानी हैं ‘जंगरइत’। और बहुत पढ़ी जाने वाली... दिल का आँख की नमी से रिश्ता बताने वाली कहानी है ये... 

जाने कृष्ण बिहारी को कहानी जल्दी खत्म करने की जल्दी थी या मुझे और जानने की... 

भरत तिवारी


जंगरइत ( लम्बी कहानी )  - कृष्ण बिहारी | Hindi Kahani 'Jangrait' by Krishna Bihari

जंगरइत ( लम्बी कहानी ) 

कृष्ण बिहारी

'कंहवां उड़ल चिरइया मोर... ' जगान के ओठ बुद-बुदाकर रह जाते हैं... उनकी दोनों आँखों से एक साथ आंसू की धार छूटती है... आंसू टप्प-टप्प ओठों के नीचे तक लकीर छोड़कर जाते हैं... जगान के उस मौन रुदन में किसी संगीत का राग नहीं था... एक अनुराग की आत्महत्या थी... उस एक बार के बाद जगान के ओठों ने अपनी चिरई को कभी बुदबुदाकर भी याद नहीं किया... उनकी आँखों से दुबारा जलधार नहीं बही... उनकी आँखों ने किसी और का सपना भी नहीं देखा... यह बात सत्तर-बहत्तर साल पहले से क्या कम होगी ! जगान तन और मन दोनों से बहुत मजबूत थे... आज सीमेंट की कंपनियों के जो बहुत सारे विज्ञापन दिखते हैं , जगान की मजबूती के आगे बौने हैं... जगान की देह और मन में जमीन की मिट्टी का ईंट और गारा है... किस्सा है तो इसे किस्से की तरह ही कहा जाए... किस्से की तरह ही सुना जाए... 

० ० ० 

मैं सुनता आया हूँ। बड़ा जांगर था जगान में... लोग कहते थे... नहीं , आज भी कहते हैं... अब , जबकि झोल खाई खटिया पर बिछी सुर्तियाई कथरी पर जगान लेटे हैं तो देह में अब हड्डी - हड्डी ही बची है। दधीचिकी हड्डियां। क्या इन हड्डियों की किस्मत में अभी कुछ और लिखा है ?क्या इनसे भी कोई वज्र बनना है या इन हड्डियों की कोई दुर्गति होनी है ? कमर में जो धोती बंधी है वह केवल बरायेनाम बंधी है। वह खुली हुई अधिक है। बंधी कम। इस उम्र में अब क्या बंधा और क्या खुला ? मैं जगान के पायताने बैठा हूँ । मुझे जगान से कुछ जानना है। जगान बताएँगे ? क्या पता... खटिया के चारो ओर उसकी परिधि में पत्तहिया सुरती की इतनी तेज गंध है कि नाक खुद-ब-खुद बंद होने को मजबूर है कि जैसे सांस रुक जायेगी या फिर छींक आने लगेगी। घुटन जैसी हौल भीतर फेफड़ों से उठ रही है... 

 जगान लेटे हैं या उठकर बैठ भी नहीं पा रहे यह कौन जाने ? शक्ति निचुड़ जाती है। आदमी अपनी असमर्थता पर आश्चर्य करता है। उसे अपना गुजरा ज़माना याद आता है। पचासी-नब्बे वर्षीय जगान मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं , " अब ठीक से लउकत नाई... " फिर भी दिखाई देता है। बताने पर स्मृति पर उन्होंने कुछ बल दिया। बरसों बाद मिल रहा हूँ। स्मृति ह्रास अभी नहीं हुआ है मगर कमजोरी बहुत है , बोले , "चाचा... जिनगी माटी रहल... माटी हो गइल... " रिश्ते में भतीजे जगान मुझसे पचीस साल से अधिक बड़े हैं। गाँव का रिश्ता है। ऐसे रिश्तों को समझना कम , जीना अधिक पड़ता है। मैंने जगान का हाथ अपने हाथ में ले लिया है। मेरी पकड़ में गर्मी है। ऊष्मा है। जगान की पकड़ में तो जैसे पूस की रात वाली ठण्डक है। क्या जगान को अपनी गर्मी बिलकुल भी याद नहीं ? अपनी ऊष्मा भी भूल गए जगान ! स्निग्धता दूर-दूर तक नहीं है... जीवन किसी पेड़ की तरह ठूंठ हो गया है... 

 क्या यही सबके अंत का अंतिम अध्याय है... सबका आगामी भविष्य... 

 जगान , अपने जमाने में जान थे सबकी... पूरे गाँव की जान जगान... जगान का पूरा नाम मुझे नहीं पता। किसी दूसरे को उन्हें पूरे नाम से पुकारते भी कभी नहीं सुना... गाँव में सभी उनको नोनो कहते थे। बचपन में मैं भी उनको नोनो ही जानता था। यह तो बाद में पता चला कि उनका नाम तो जगान है मगर यह नाम किसी और की जबान पर चढ़ा नहीं। बाल-वृद्ध , स्त्री-पुरुष सभी उन्हें नोनो ही जानते थे... केवल एक शख्स... चंद्रशेखर तिवारी , जो जिंदगी-भर नोनो को 'जगान' कहता रहा। जगान के बाप थे... 

 दृश्य हैं... दृश्य हैं , तो दिखेंगे भी... मैंने देखा है। मेरे ओसारे के सामने से गाँव का मुख्य रास्ता था। चन्द्रशेखर तिवारी आते-जाते दिखते थे। मेरे ओसारे पर ही गाँव भर की पंचाइत बैठती थी... मैं बहुत छोटा था। अपने ओसारे में बाबा की गोद में बैठता था और उस मुख्य रास्ते से गुजरने वाले लोगों को देखता था। नाम सुनते-सुनते लोगों को पहचानने लगा था... 

 चंद्रशेखर तिवारी पतले-दुबले-इकहरे। एक धोती में जिंदगी भर दिखे। सौ घरों के गाँव में सबसे बुद्धिमान। पंचाइत हो तो , गुनिया लगाना हो तो , कड़ी-जरीब का हिसाब हो तो , सबकी आँख में चंद्रशेखर तिवारी। कहीं आते-जाते दिखाई देते तो बावले-से लगते लेकिन जब कहीं किसी पंचाइत- बइठक में होते तो मारकीन की आधा बांह की बंडी डाले होते। बड़े गंभीर से। उस पंचाइत में जवार के बड़े-बड़े लोग होते। सुमेर यादव भी होते जो मकुना हाथी पर आते थे , बलभद्दर सिंह भी होते जो रैले सायकिल पर आते मगर लोग चंद्रशेखर तिवारी की जानकारी का लोहा मानते। पंचाइत में उन्हीं की बात पञ्च परमेश्वर की बात हो जाती। पहले ही कह देते थे कि कोई पक्ष पुलिस - थाने और कचहरी नहीं जाएगा। और , जाएगा तब ; जब वह पंचाइत के फैसले से असंतुष्ट हो। कोई पक्षधरता नहीं। न्याय प्रमुख। तो , कोई उनसे असंतुष्ट होकर थाना -पुलिस-कचहरी क्यों करता ? किसी की उनसे कोई दुश्मनी नहीं। सबकी खेती-बारी है। जमीन-जैजात है तो काम तो सबका पड़ता है न ! न जाने कब चंद्रशेखर तिवारी से काम पड जाए। मगर इससे क्या होता है ! चन्द्रशेखर तिवारी सत्यवादी। अपनी जानकारी में कभी किसी का नाजायज पक्ष नहीं लिया मगर उनकी दुश्मनी तो पूरे गाँव से है और उनका सबसे बड़ा दुश्मन उनका अपना खून जगान... अपने खून की वजह से उनकी दुश्मनी पूरे गाँव से , 'ई गाँव... एकरी बिटिया क... अ... ' बिटिया की गाली देना चंद्रशेखर तिवारी का तकियाकलाम है। उसने सुना है... लोग सुनाते जो हैं... इन्द्रजीत हैं... हीरा हैं... गोरख हैं... खदेरू हैं... जीत राज हैं... दगडू हैं... राधे हैं... और अभिलाख है... किसी को बैठा लूं... एक बार नोनो का जिक्र भर कर दूं तो कहानी में से कहानियां निकलने लगती हैं... गाँव में कौन है जिसके पास नोनो की सदाशयता के किस्से ऊपर किस्सा नहीं है... दगडू सुना रहे हैं और मैं चित्रलखित हूँ... लेकिन उस प्रश्न से बिंधा हूँ कि वह कौन थी जिसके नयना भाला थे... 

० ० ० 

सात बरस के जगान को कमीज और पायजामा पहनाया गया है... जगान रो रहे हैं अचरज में... 

पहली बार... इसके पहले तो पूरे नंगे या फिर भगई पहने ही दिखे थे। सिर में जम के कडू तेल चांपा है उनकी अम्मा ने। आँख में काजर भी और माथे पर ढिठौना भी खूब खींच के लगा है। दरवाजे पर , ओसारे में चंद्रशेखर तिवारी भी कमीज और धोती पहने बैठे हैं। पावों में चमरौधा है। कंधे पर लाल , चरखाने वाला गमछा... यह एक अवसर है... महत्त्वपूर्ण... 

 जगान घर में से निकलें तो उनका हाथ पकडकर चंद्रशेखर तिवारी उन्हें ले चलें। कोस भर पर स्कूल है। खोंपिया प्राथमिक पाठशाला। दूसरा स्कूल और दूर है , भरवलिया में। जगान का नाम लिखवाना है , और जगान हैं कि जोर-जोर से हबस-हबसकर रो रहे हैं। उनका भोंकारा अब बाहर तक सुनाई देने लगा है। चंद्रशेखर तिवारी का धैर्य जवाब देने लगा है , " एकरे बिटिया की... निकार... अ... सारे के... " इतनी जोर से बोलते हैं चंद्रशेखर तिवारी कि जगान की अम्मा का पेशाब निकलने को हो गया। जगान को घर में से बाहर उनकी अम्मा ने दरवाजे की चौखट के पार धकेल दिया है। अब जगान की बांह नहीं , पखुरा चंद्रशेखर तिवारी के कब्जे में है। पकड़ तगड़ी है। जगान हांफ रहे हैं। तेल 

खोपड़ी से धार की तरह बहते हुए माथे को नहला रहा है और कजरा... । उनके चेहरे पर कालिख पोत रहा है... 

"चोप्प... सारे ! चोप्प... " 

 बाप की दहाड़ पर जगान चुप। मगर ह्बसना जारी... गले की घांटी उठ-गिर रही है... 

 जगान असहाय हैं। घिरियाये हुए ले जाए जा रहे हैं खोंपिया... 

 स्कूल पहुँचते-पहुँचते जगान के साथ-साथ उनके बाप का भी नकदम निकल गया... 

 चंद्रशेखर तिवारी पूछ रहे हैं , " का है रे ! काहें मेहरारुन के तरियन रोवत हवे ?" 

"हम नाईं पढ़ब... " 

"काहें नाइ पढ़बे ?"

"कुमारो त नाइ पढ़त हवें... " कुमार , जगान के संहतिया हैं... 

"उ बैल बनी... तेहूँ बनबे ?"

"हाँ , बनब... मोटका... " 

 चंद्रशेखर तिवारी खोंपिया प्राथमिक पाठशाला के सामने से पहुंचकर भी वापस हो लिए। बाप का ह्रदय बेटे की मूरखता के आगे पसीज गया। उन्होंने मन में सोचा और तय किया कि किसी दूसरे दिन वे जगान को दुबारा नाम लिखाने के लिए ले आयेंगे , " चल... अ... तुहरी बिटिया की... " जगान को नहीं मालूम था कि उनकी बिटिया कहाँ है और उसके पास ऐसा क्या है जो उनके बाप को बार-बार याद आता है... बहरहाल , वह दूसरा दिन कि जगान खोंपिया प्राथमिक पाठशाला ले जाए जाते फिर कभी नहीं आया। जगान की पीठ पर जोधा थीं और जोधा की पीठ पर बलई। जब जगान ही स्कूल नहीं गए तो जोधा कहाँ से जाती। वैसे भी जोधा का पढना-लिखना उन दिनों समाज की दूरदृष्टि से बहुत दूर और गैरजरूरी था। उसकी दाहिनी कलाई पर गोदना गोदवा दिया गया। उसका नाम ताकि अपना नाम याद रखें और अगर मेले-ठेले में कहीं भूल जाएँ तो सामने वाले को कलाई दिखा दें। हो गई पढ़ाई पूरी। अंगूठा कैसे लगाया जाता है , यह सिखाने की अभी कोई आवश्यकता नहीं आई थी। हाँ , लेकिन जब बलई भी घिरियाकर पहली बार स्कूल ले जाए गए तो चंद्रशेखर तिवारी को उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी जितनी जगान को ले जाते हुए हुई थी। बलई खुद बोल पड़े , " बबुआ हम पढ़ब... हम मोटका नाइ बनब। "जब स्कूल ले जाए गए तो वहां रुक गए। उनका नाम लिखा गया। वह रुक गए ; माने , पढने लगे... 

 दो बैलों की खेती थी। दरवाजे पर ओसारे के नीचे जो दुआर था उसके दाहिने किनारे चरन थी। पांच नाद की। उस पर दोनों बैल , एक गाय और एक भैंस सानी-पानी पाते। पांचवे नाद में बछिया , पड़िया मुंह मारते। बैलों में एक का नाम मोटका और दूसरे का पतरका था... ये नाम जगान ने ही दिए थे उनको... 

 दोनों बैल जब डेढ़-दो वर्ष के बछड़े ही थे तब खलीलाबाद की बरदहिया बाजार से लाये गए थे। दोनों अभी दांते भी नहीं थे लेकिन देखते ही देखते छह महीने के अन्दर दोनों दो-दो दांत के हो गए। चंद्रशेखर तिवारी ने फिर भी इन बछड़ों को साल भर और खिलाया-पिलाया। खेत में नहीं उतारा। कन्धों पर जोठा नहीं रखा। पतरका बड़े पानी का था। पन्द्रह मुट्ठे के सोकन रंग के पतरके ने अपनी पीठ पर किसी को हाथ रखने का मौका कभी नहीं दिया। हरवाह की भी हिम्मत नहीं होती थी कि बिना डंडे के उसके पास जाए। एक चंद्रशेखर तिवारी ही थे जो उसे बिना डंडे के खोलते-बांधते। न जाने क्या रिश्ता था , पतरका उन्हें बहुत मानता था। उन्हें देखते ही न जाने क्यों वह पूर्ण संतुष्ट और शांत हो जाता था। यहाँ तक कि जब चंद्रशेखर तिवारी जाड़े के दिनों में उसे कच्चा अंडा पिलाते तो वह उनके हाथ में अंडा देखते ही मुंह खोल देता। जब किसी को उसके पास डंडा लिए जाते देखते तो बुदबुदाते , "लांड़े पर के सब ओके... मरकहा बना दिहलें... " बाकी सबको तो पास देखते ही वह फुंफकारता और अखडने लगता। पास से गुजरने वालों के रोयें सिहर उठते। जब खेत से छूटता तो हरवाह उसके पीछे पुकार लगाते हुए दौड़ता , " हटि जा... हटि जा सामने से... तिवारी बाबा क पतरका जात बा... " लोग रास्ते से हट जाते थे। पता नहीं किस बात की शान थी पतरका को या कि वह अपने को सबसे बेहतर समझता था , क्यों समझता था ? यह तो वही जानता रहा होगा। हर बात में उसकी अइठ थी। खर-खर था। सानी-पानी सब कुछ अच्छा मिलने पर भी वह अपने स्वभाव के अनुसार बेमन से खाता। चाहता कि उसे कुछ और अच्छा मिले। उसे मिलता भी था अलग से। लेकिन वह अपनी वाली से बाज नहीं आता था। बार-बार अपनी नांद से मुंह उठाकर दरवाजे की ओर देखता और जब जान जाता कि अब उसे कुछ भी अतिरिक्त नहीं मिलने वाला तो फिर किसी तरह खा लेता। लेकिन मोटका , वह जो कुछ अपनी नाद में पाता उसे आँख तक मुंह डुबाकर खा जाता और फिर अपने खूंटे पर आराम से पगुराता। वह इतना सीधा था कि जगान उसकी पीठ पर लोटते और वह पसर-पसर जाता। उसका रंग सुच्चा धवल था। दूध-सा सफ़ेद। उसके रोवें चमकते थे चांदी की तरह। साढेचौदह मुट्ठे का था। जब पतरका के साथ निकाला गया तो उसे बाएं नाधा गया। तभी से उसका नाम बवइयां और मोटका पड गया। उसका यह नाम भी जगान ने ही दिया था। रात को उसे बिना कौरा दिए क्या मजाल कि जगान सो जाएँ ? पतरका के पास जाने की हिम्मत भी कभी जगान की नहीं हुई... उन्हें मोटका पसंद था। अपनी तरह सीधा-सादा... इसलिए उन्होंने बड़ी सहजता से अपने बाप से कह दिया कि हम मोटका बनब... और , 

 दगडू नोनो के बारे में बता रहे थे कि इन्द्रजीत ने उन्हें रोका , "आगे हम बताइब... " और , आगे इन्द्रजीत बताने लगे... 

० ० ० 

 सात वर्ष के जगान का नाम स्कूल में नहीं लिखाया जा सका। जगान अनपढ़ रह गए... जबकि बलई ने मोटका बनने से इनकार किया। बलई अपने बबुआ की तरह जहीन थे मगर मिनमिनहा थे। खाने में मिन्न-मिन्न और पीने में पिन्न-पिन्न करते थे इसलिए कभी उनकी देह पर हेरा नईं चढ़ा। लेकिन , बलई पढ़ गए। पढने में उनका मन लगता था। दिए के धुंआते अंजोर में पढ़ते-पढ़ते बलई ने हाई स्कूल कर लिया। हाई स्कूल के बाद ही जिले के सरकारी विद्यालय में प्राथमिक शिक्षक के पद पर उनकी नियुक्ति भी बहुत जल्द हो गई। घर से दस -ग्यारह किलोमीटर पर स्कूल था। कुछ दिन पैदल गए फिर सेकेण्ड हैण्ड सायकिल खरीदी। सीखने में कई बार चोटहिल हुए। दूर-दूर तक उनके सायकिल से गिरने की चर्चा हुई मगर सीख गए और उसी से आते-जाते थे। उनको सायकिल पर देखना भी कुतूहल था। सयकिलिया पर एकतरफ लरके होते थे। लगता कि अब गिरे कि तब। खैर , दो साल बीतते न बीतते उनका स्थानान्तरण अपने ही गाँव के स्कूल में हो गया। वह ज़माना ही दूसरा था। गाँव में पहली सायकिल बलई के पास। चंद्रशेखर तिवारी का दुबला-पतला सीना भी बलई की उपलब्धि पर चौड़ा हो गया था... 

 जगान जिन्हें गाँव नोनो कहता , भले ही अनपढ़ रह गए हों लेकिन उनकी उमर तो उनके कंधे से ऊपर निकलती गई। कंधे चौड़े हो गए और पुट्ठे मजबूत। कलाई की हड्डियां भी चौड़ी और कड़ी हो गयीं। शरीर का रंग हल्का सावंला होते हुए भी झलकने लगा। नोनो की मसें भीगीं... ओठों के ऊपर हरी-हरी मसें... इन मसों का भीगना भी गज़ब ढाता है... रोयें-रोयें में जब गुलाबी गर्मी सरसराती है तब इन मसों के नीचे ओठ मुस्कराते और गुनगुनाते हैं... और , अकेले में शरमाते भी हैं... नोनो भी अकेले में शरमाते थे... लेकिन बइठक में शरमाते उन्हें किसी ने नहीं देखा... 

 अब हीरा ने इंद्रजीत को रोक दिया , "आगे हम बताइब... " और अब हीरा बता रहे हैं... मैं सुन रहा हूँ... 

० ० ० 

 नोनो कछार से आमी पंवर कर गाँव की ओर बढे आ रहे हैं। हाली-हाली। लगता है कि उनका एक पैर धरती पर पड़ते ही दूसरा उठ जाता है। और , उनके ओठों पर गीत है... 

 गोरी तोरे नयना... 

 गोरी तोरे नयना... 

 गोरी तोरे नयना चलावें छुरी - भाला... 

 राम कसम ! राम कसम ! जियरा पे... 

 जियरा पे... आरी चलि जाला... 

 गोरी तोरे नयना... 

 नोनो की मूछों में , ओठों पर एक हंसी है। सरल हंसी। जगत को यह हंसी बड़ी कुटिल लगती है। और , जगत की यह कुटिलता तो आज से नहीं है। दृग उरझत टूटत कुटुम... लेकिन नोनो ने तो कुटुंब को भी कभी टूटने नहीं दिया... जगत को तो उन्होंने पता ही नहीं चलने दिया कि कौन थी वह गोरी जिसके नयन के वाण से नोनो ऐसे बिंधे कि जिंदगी उसकी याद में ही गुजार दी... बाजी किसी ने प्यार की जीती या हार दी... जैसे गुजर सकी , बीते गम गुजार दी... 

 नोनो गुनगुनाते और जैसे ही किसी को अपने पास पाते एकदम से बदल जाते कि जैसे गीत तो उनकी जबान पर था ही नहीं। खुद में मुस्कियाते कि बच गए। मगर वह बात कि खैर - खून -खांसी -ख़ुशी , बैर -प्रीत -मधुपान... तो , नोनो मुस्करा देते अपने में... और अपनी जान बचा लेते... पता नहीं , नोनो अपनी जान बचाते कि अपनी गोरी की ? शायद दोनों की... मोहब्बत में कुर्बानी की कितनी जबरदस्त इच्छा होती है... नोनो कुर्बान थे अपनी मोहब्बत पर... 

 नोनो गाते -

 छइबे डीहवा पर मड़इया गोरिया तुह्कें लई के ना... 

 एक दिन दुनिया हम बसइबें गोरिया तुह्नके लई के ना... 

 आपन दुनिया हम बसइबें गोरिया... 

 छइबे डीहवा पर... 

 न जाने कौन थी वह गोरी ? वह गोरी जिसके नयना उनके जियरा पर छुरी-भाला-से लगते थे। कौन थी वह जो उन्हें अपना बनाए हुए थी जिसके लिए उन्होंने डीह पर एक मंडई छाकर उसी में अपनी एक अलग दुनिया बसा लेने का सपना संजो लिया था... किसी ने कभी नोनो से पूछा नहीं और... 

 नोनो ने कभी व्यक्त नहीं किया कि वह कौन थी ? एक सस्पेंस फिल्म में भी अंत तक आते-आते सब कुछ साफ़ हो जाता है मगर नोनो की प्रेम-कहानी का तो किसी को अता -पता तक नहीं... 

 हीरा चुपा गए... लगा कि कहीं खो गए... रूपमती और बाजबहादुर की प्रेमकथा जैसा कुछ। तो , जीत राज ने सबसे पूछा , " हम कुछ कहीं ?" और जबतक लोग अनुमति देते जीत राज ने एक दृश्य को सामने कर दिया... 

० ० ० 

 नोनो के शरीर पर एक धोती है। गले में पड़ा जनेव काला पड़ा हुआ है। कमर में एक सूती गमछा कसकर बंधा है। धोती घुटनों से जरा - सी नीचे है। पाँव में चमरौधा या चप्पल भी नहीं। एडियों से ऊपर तक धूल और गर्द की मोती तहें जमी हैं। बेवाई की साफ़ लकीरों में जमें खून की बूंदों का रंग सूखकर काला पड़ गया है। सिर से पाँव तक एक बलिष्ठ जिस्म है जो झाँवा हो गया है... नोनो मुन्ना बाबा के ओसारे में खम्हियाँ से पीठ टिकाये धोती की टेंट से सुरती की थैली और चुनौटी निकालकर चैतन्य चूर्ण को असरदार बनाने में ध्यानमग्न हैं। बिना मगन हुए कहीं सुरती बनती है ! बाएं हाथ की गदोली पर दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगूठे में जो लय और ताल है उसकी धमक सुरती में टनक भर रही है। बावन चुटकी तिरपन ताल... तब देखो सुरती का हाल... 

 मुन्ना बाबा न सुरती खाते हैं न सूंघते हैं। लेकिन अपने ओसारे में मुन्ना बाबा अकेले कहाँ हैं। उनके पास तो हमेशा एक मजमा मौजूद... मुन्ना बाबा ग्राम - सभा के कभी खजांची रहे थे तो उनके पास खजाने में भले ही कौड़ी न रही हो लेकिन फितरत के हिसाब से लोगों के जमावड़े का खजाना कभी कम नहीं हुआ। खजांची के पद से हटे ज़माना हुआ मगर खजांची ही जाने जाते रहे... 

" हे नोनो बाबू... । सुरतिया तनी हमहू के दीह... अ... " रामबली यादव ने ललचाई आवाज में इसतरह कहा कि नोनो सुन लें। । । 

 नोनो ने सुन लिया है , " काका , बना लेवे द... अ... न... " नोनो का पूरा ध्यान सुरती बनाने में लगा है। सिर पर घाम आ गया है। दुपहरिया का वक़्त है... 

 सुरती बन गई और फिर चार-पांच तालियों और तीन ताल के बाद गर्दा झाड़कर नोनो ने अपनी हथेली रामबली यादव के सामने की , " ल... अ... काका... " काका ने चुटकी से सुरती उठाई और बाकी बची सुरती को नोनो ने निचले ओठ और दांतों के बीच बइठाने ही जा रहे थे कि सिपाल बोले , मरदे , हमके नाइ देब का... ? नोनो ने उनकी ओर देखा। हथेली आगे बढ़ाई। सिपाल ने अपने मतलब भर की सुरती चुटकी में उठाई। सबने सुरती ओठों में दबाकर चुभलाने की कोशिश में जीभ की नोक से उसे ठीक जमीन दी... 

"बनल रह... अ... नोनो बाबू... " रामबली यादव ने नोनो को असीसा... 

" हाँ काका... अ... असीसले रह... अ... जिनगी कटी जाई... ई... " तो , नोनो की जिन्दगी कट रही थी। और , बहुत खूब कट रही थी... 

" बाबा... अब चलीं हम... अ... " नोनो मुन्ना बाबा से कह रहे हैं... 

 मुन्ना बाबा कुछ कहते कि उससे पहले ही... नोनो निकले और अपने घर की ओर जाते ही ठाकुर तिवारी के कुएं के पास सीतल दुबे से टकरा गए। सीतल दुबे के कंधे पर बोझ था। । । गोहूँ पिसाने जा रहे थे सीतल दुबे उनवल... कोस भर दूर था उनवल कस्बा। और चक्की , वह तो कस्बे के आखिरी छोर पर। पसीने से लथपथ। नोनो ने पूछा ," कहाँ जात हव... अ... दादा... एतना घामें में... ?" 

"नोनो बाबू... पिसान नाहीं बा... अ... घरे... "

"हमें द... अ... " और नोनो ने सीतल दुबे का बोझ अपने कंधे पर लाद लिया और उनवल कस्बे की ओर चल पड़े। सीतल दुबे ने असीसा , " नोनो बाबू... बनल रह... अ... " 

 दुपहरिया तिजहरिया में बदल गई थी जब कोस भर दूर से सीतल दुबे का बीस सेई गोहूँ पिसाकर लौटे तो दरवाजे पर ही मिल गए बाप चंद्रशेखर तिवारी , " कहाँ रहल... अ... सियावर रामचंदर... ? " 

 नोनो चुप। क्या बताएं कि उनवल क्यों चले गए थे ? चंद्रशेखर तिवारी की छेदती आँखें उन्हें छेदती ही रह गयीं। चन्द्र शेखर तिवारी जानते थे कि उनके जगान की सिधाई को किसी ने लूट लिया होगा। आगे कुछ नहीं बोले और नोनो चुपचाप दालान में गए। गगरा और उबहन उठाया। घर के सामने के कुंए पर जाकर चार गगरा ठंडा पानी जो देंह पर उंडेला तो पूरी देंह में झुरझुरी छा गई... 

 गोरख कहते हैं ," हमहूँ के बतावे द न... कि आगे का भइल... " सबके कान गोरख की आवाज से जुड़ गए हैं... 

० ० ० 

 पतरका और मोटका ग्यारह-बारह वर्ष तक रहे। पतरका बुढापे में खांग ( खुरों में लगने वाली बीमारी) गया और मोटका को लकवा मार गया। दोनों ने प्राण त्याग दिए और नोनो , दोनों की मौत पर भोंकर कर रोये... नोनो तब अठारह के रहे होंगे। उसके बाद न जाने कितनी बार बैलों की जोड़ी बदली मगर नोनो का उनमें से किसी के प्रति वह अनुराग नहीं हुआ जो मोटका के साथ था। उन्हीं दिनों की बात है जब वह बुदबुदाते हुए गाते थे , ' गोरी तोरे नयना चलावें छुरी भाला... ' जैसे ही उन्हें लगता कि उनकी आत्मविस्मृति तो अन्याय करा देगी तो तुरंत चुप हो जाते। कुछ तो कहीं था जो नोनो को बेचैन किये हुए था। अपनी बेचैनी में नोनो या तो उदास हो जाते या फिर उनमें एक अलग-सी छटपटाहट भर जाती और वह अपना पूरा बल किसी काम में खपा देते। कठिन श्रम ही होता था जो नोनो की बेचैनी को थाम लेता था वरना नोनो के पास था क्या ! उन्हें कोई लूटता क्या ! उनकी देंह में जांगर था। वही लुट रहा था। नोनो कोडिया करके लौट रहे होते और उन्हें कोई न कोई घर पहुँचने से पहले मिल जाता , " नोनो बाबू... "

"हाँ... काका... ?"

"बाबू... मनई नाईं मिलत हवें... कोडिया नाई होई त... "

"काका विहाने... कवन खेतवा कोड़े क बा ?"

"लमुहवा वाला... "

"हम चारी बजे पहुँचब... भिन्नहियें... पहुँच जइह... अ... "

"बनल रह... अ... नोनो बाबू... "

 सुबह-सवेरे चार बजता कि नोनो काका के लमुहवा वाले खेत पर होते। काका पहुँचते न पहुँचते , नोनो मुर्गा बोलने के पहले उनके खेत में पहुंचकर अपना जांगर लुटाते। चन्द्रशेखर तिवारी को यही अखरता कि लोग जगान को सरलता से ठग लेते हैं। उन्हें कहाँ मालूम था कि उनके जगान तो बिना दाम बिका गए हैं... 

 इधर साल भर से दुआर पर बरदेखुआ आने लगे थे। दो-तीन बार जब ऐसा हुआ तो नोनो ने अपनी अम्मा से कह दिया , " हम बियाह नाइ करब... "

"काहें... ?"

"पता नाइ काहें... लेकिन हम बियाह नाइ करब... बबुआ से कहि दे... " 

 नोनो ने जिद पकड़ ली। नहीं करेंगे शादी... और अगर बियाह हुआ तो... ? आगे कुछ कहते नहीं थे मगर उसमें एक धमकी साफ़ दिखती थी... 

 चन्द्र शेखर त्तिवारी कहते , " काहें नाइ करी ?" 

"हम्म नाइ जनतीं... " नोनो की अम्मा कहतीं। माँ का कलेजा डर से सहमा-सहमा रहता... 

"तब के जानीं ?"

"हमें नाइ पता... "

"सार... मुरहा हवे... "

 गाँव के लोग भी कहते ," नोनो बाबू... बियहवा कइ ल... अ... "

"नाही भइया... हमसे ई कुल नाइ होई... " नोनो का जवाब होता और एक पल के लिए उनकी आँखों में किसी का चेहरा कौंध जाता। अन्हरिया रात में भक्क से एक रौशनी होती। उस उजाले में उनकी आँखें चौंधिया जातीं। कुछ भी दिखना बंद हो जाता। वह चेहरा भी जो अचानक कौंधा होता , खो जाता। नोनो के ओठों पर भीतर ही भीतर अप्रयास एक पंक्ति उभरती , ' कंहवां उड़ल चिरइया मोर... ' और फिर सब कुछ तब तक के लिए शांत हो जाता जबतक दुबारा उनकी दुखती रग पर कोई हाथ न धर देता... 

 नोनो सन्यासी नहीं थे। नोनो असामाजिक नहीं थे। नोनो एकांतप्रिय नहीं थे। इसलिए उनपर यह आरोप भी नहीं लगता था कि नोनो औरत से दूर भागने वालों में से हैं या कि नोनो औरत के लायक नहीं हैं। नोनो घटिहा भी नहीं थे कि लोग कहते बहेल्ला हैं। नोनो मिलनसार थे। बइठक के आदमी थे। 

मुंहचोर नहीं थे... वक़्त गुजरता रहा... 

 बलई एकहर थे। पता ही नहीं चलता था कि अठारह के हैं कि बीस के। उधर जोधा की बाढ़ लौकी की तरह थी। बारह -तेरह की अवस्था में ही पंद्रह-सोलह की लगती। भारी देंह। घर के लिए जरूरी सामान लेने गाँव के साहु की दूकान की ओर दिन में कई बार आते-जाते दिखाई देती। लोग देखकर कुछ कहते इससे पहले चंद्रशेखर तिवारी ने जोधा का बियाह कोस भर दूर के गाँव में दुलारे मिसिर के बेटे से तय कर दिया। इधर तय हुआ कि उधर दन्न से बियाह भी हो गया। मगर बियाह इतना पास हुआ कि जोधा का जब मन होता , योद्धा की तरह अकेले ही नइहर चली आती। नोनो को बुरा लगता मगर क्या कहते। बहिन थी। हर साल एक बच्चे की माँ बन जाती और जितनी बार आती उसके बच्चों की संख्या बढ़ी हुई ही होती... किसी को टाँगे होती तो किसी को लटकाए और कोई पेट में उछलकूद कर रहा होता। 

 जोधा की शादी के बाद बलई की भी शादी हुई। उस जमाने में एक सौ एक रुपया तिलक चढी थी। कितना नाम हुआ था लेकिन कुछ दिन ही बीते कि दबी जबान से लोग खुस-पुस करने लगे कि बलई का नाम झुट्ठे बलई है और उनमें बल-वल हइये नहीं। बात बलई के कान तक पहुंची तो भिन्डी की जड़ से लेकर बरगद के दूध तक पहुंची और बलई देखते-देखते और कानाफूसी करते लोगों को ठेंगा दिखाते हुए एक नहीं तीन बच्चों के बाप बन गए... दो बेटे और एक बेटी... 

 नोनो की अपनी जिंदगी अपनी ही तरह चलती रही। उनके हिस्से सार्वजनिक सेवा का अपना ही लिया हुआ जबरिया का ठेका था... 

 और अब राधे हैं जिन्हें नोनो की जिंदगी के मानवीय पक्ष बहुत बांधते हैं। सुना रहे हैं... एक नहीं अनेक घटनाएं जो आज की जिंदगी में असामान्य लग सकती हैं... मैं हुंकारी पारते हुए सुन रहा हूँ... 

० ० ० 

 नोनो को मालूम पड़ गया है कि शिवकुमार बहू का हाल खराब है। बच्चा पेट में उलट गया है। जल्दी कुछ नहीं किया गया तो जान चली जायेगी। खटोला - बांस पर शिवकुमार बहू को लादे नोनो जिले के सदर अस्पताल भाग रहे हैं। चौबीस किलोमीटर दूर है अस्पताल। नौ बजे रात को खटोला लेकर चले नोनो ग्यारह बजते-बजते अस्पताल में। । । 

 जच्चा - बच्चा दोनों बच गए... 

 शिवकुमार की दोनों बांहों के बीच की मजबूत पकड़ में नोनो हैं। शिवकुमार बहू को बेटी हुई है। उस बेटी के चेहरे में नोनो को एक और चेहरा दिखता है... एक दूसरा चेहरा... नोनो की आँखों में चमक है कौंध नहीं... कुछ दिव्य-सा है। दीपावली के अनेक दीयों में से कोई एक दीया... 

० ० ० 

 गाँव में बरात आ रही है। राम उजियार की बडकी का बियाह है। नोनो कराहे पर हैं। धोती के ऊपर कमर पर गमछा कस के बंधा है। पीठ पर हल्दी से ताजा रंगा जनेव है। माथे पर पसीने की बूँदें छलछला रही हैं। अन्दर से मैदे की पूरियां बेलकर खांची में आ रही हैं और नोनो छनौटा लिए जुटे पड़े हैं। छनी पूडियां ढाके में रखी जा रही हैं। ऊपर साफ़ कपड़े से ढँक दिया गया है... 

 बरातियों के लिए खटिया , दरी , कालीन , जाजिम , दाल परोसने के लिए बाल्टी और डब्बू। सब का इंतजाम नोनो के जिम्में और नोनो दौड़ रहे हैं। घर-घर। पास के गाँवों तक। आखिर गाँव की बेटी का बियाह है। द्वार-चार से मिलनी तक नोनो। बिना नोनो बाबू के किसी का काम सपरता नहीं है। चंद्रशेखर तिवारी जल-भुन जाते हैं। गाँव दुश्मन है उनका। उनके जगान को चूस लेते हैं सब और उनका जगान है कि सबका हितू... 



० ० ० 

 मोलई ताड़ीवान सुबह-सुबह पलटू के बांझा पर चढ़ रहे थे। अभी पंद्रह फुट ही चढ़े थे कि छन्ना टूट गया और गिरे लद्द से। वहीं उसी रास्ते से नोनो फराकित होकर लौट रहे थे। देखा तो धूसे हुए मोलई आहि बाप , आहि माई कर रहे थे। कमर धसक गई है। उठा नहीं जा रहा। नोनो ने उन्हें घोंडता लादा और चल पड़े घुरहू पासी के दरवाजे पर। मोलई बोल रहे हैं , "बाबा उतार द... बड़ा पाप लगी... नरको में जगहि नाइ मिली हमके... "

"हे मोलई , अगर तुंहके हम एहिं मरे खाती छोड़ देब त हमके बड़ा पाप लगी... मानुष जनम बिरथा होई जाई... हमहूँ के नरक में जगहि नाइ मिली " पता नहीं क्यों लोग नरक में जगह पाने के लिए व्याकुल दिखते हैं। मोलई को पीठ पर लादे घुरहू पासी के दरवाजे पर नोनो हैं। घुरहू अपने काम में जुट गए हैं। कुछ देर बाद उन्होंने मोलई को खड़ा कर दिया है। मोलई नोनो बाबा के पैर पर झुक गए हैं ," बाबा , इ उपकार हम कब्बो नाइ भुलाब... "

० ० ० 

 नोनो दुपहरिया में नदी नहाकर लौट रहे हैं। नंगे पाँव। पांव तता रहा है। जेठ तप रहा है। पगडंडी पकड़े चले आ रहे हैं घर की ओर , और ; सामने से अधारे पंडित लुह से बचने की कोशिश में खोपड़ी पर गमछा बांधे चोखा बने खड़े हैं , " नोनो बाबू ऊंखिया जरि जाई... अकेल्ले कइसे सींची... ? "

"बाबा... चल... अ... अब्बे भरि देईं खेतवा... " नोनो और अधारे पंडित कुंए की ढेकुल चला रहे हैं। कुंवा सूख गया है और अधारे पंडित की ऊंख सिंचा गई है... 

 नोनो की जिंदगी में जाने कितनी जिंदगियां सिंची मगर अपनी जिंदगी कितनी सूख गयीं... 

० ० ० 

 सत्तर बरस के जियावन बाबा माघ की ठंडी नहीं झेल पाए। बीती रात चल दिए। दरवाजे पर नोनो हैं और टिकठी -बांस को मूंज से बाँध रहे हैं। लहास के पास का इंतजाम देख रहे हैं। सुबह के दस बजने वाले हैं। ठंडी का दिन है। सूरज नहीं दिख रहा। लोग धीरे-धीरे आ रहे हैं। रोना-धोना कबका बंद हो चुका। अब चलना चाहिए। गर्मी का दिन होता तो लहास अकड़ने लगती। अर्थी उठ रही है। राम-नाम सत्य है... सबकी यही गति है... राम-नाम सत्य है... नोनो का कन्धा सबसे आगे... सबकी यही गति है... कुछ पलों के लिए वैराग्य उपजता है... 

 चिता जोड़ दी गई। जियावन के छोटके ने दाघ दिया है। ठण्ड बहुत है। थोडा वक्त लगेगा। नोनो सुरती मलने लगे हैं। लोग उनके पास खिसक आये हैं। दुनिया-जहाँन की बातें शुरू हो गई हैं जो घूम-फिरकर जियावन बाबा के इर्द-गिर्द आ ही जाती हैं। दुनिया से जाने वाले का भी एक दिन होता है... सुरती ने सबके ओठों के बीच जगह बना ली है। चिराइन गंध के बीच सुरती की गमक है... 

 मैं सुनता आया हूँ उन सबको जो नोनो की जिंदगी के बारे में कुछ-कुछ जानते रहे लेकिन वह रहस्य मुझे नोनो के अलावा कौन बतायेगा... मेरी बेचैनी की दवा करो यारो। अब मैं देख रहा हूँ वक़्त का तमाशा , चली-चला का वक़्त हो गया है। इस तमाशे को तो वक़्त के ही साथ चलना होता है... अब मैं हूँ और नोनो हैं... और है वह सवाल... कि नोनो क्यों अकेले रह गए ? कौन थी वह ? जिसके लिए नोनो ने एक गाँठ बाँध ली और एक गाँठ खोल दी... खुली हुई गाँठ ही तो अबतक बंधी है... 

० ० ० 

 नोनो की जिन्दगी चलती रही। गाँव बदलता रहा। गाँव शहर की ओर भागता रहा। गाँव स्वभाव में शहर बनता रहा गाँव। लोग परदेसी होते गए। उनका गाँव - घर छूटता रहा। गाँव अकेला होता रहा। बियावान- सा। एक सन्नाटा गाँव के वातावरण को डंसता रहा धीरे-धीरे। घरों के ओसारे सूने होते गए। गाँव से निकलकर जो जहाँ गया वहीं बस गया। अब कहाँ फगुआ और कहाँ चइता। अब कहाँ रहे दूसरों के दुःख में दुखी होनेवाले और दूसरों के दुःख को अपना समझने वाले ! कच्चे घर गिर रहे हैं। पक्की चरनें सूनी हो गई हैं। पोरसा भर कांस उग आया है उन चरनों पर । पक्के कुंए भठ गए हैं। गाँव भुतहे हो गए हैं... 

 अब तो जो दुनिया है उसमें हर कोई अकेला है। नोनो की अम्मा को भी मरे तीस साल से अधिक हुए। बबुआ चंद्रशेखर तिवारी भी अपने जगान को गरियाते-गरियाते एक दिन आखिर हमेशा के लिए चुप हो गए... अब पचासी-नब्बे के नोनो , बलई के सहारे हैं। घर में अब बलई बहू , बलई और नोनो हैं। बलई के दोनों बेटे गाँव छोडकर अपनी-अपनी नौकरी की जगह पर ही बस गए हैं। एक पुलिस में है और दूसरा उत्तर प्रदेश सरकार के किसी कारखाने में फिटर है... बेटी का बियाह रामपुर में हुआ है... 

 बरसों बाद वह भी गाँव आया है... उसका नाता भी तो गाँव से लगभग न के बराबर ही रह गया है। 

 दरवाजे पर कुछ लोग मिलने आ गए हैं। नए-नए चेहरे। कुछ जाने कुछ अपहचाने। उत्सुक। वह सबका हाल पूछ रहा है। नोनो का भी। नोनो से मिलने का मन हुआ। मिलने से भी ज्यादा उत्सुकता इस बात की कि 'वह कौन थी ?' जानने की। वह नोनो के सामने आ बैठा है। नोनो का हाथ उसके हाथ में है। एक गर्म एहसास हथेलियों में और एक बुझा हुआ दीप ज्योति की लौ को स्मृतियों की खोह का अँधेरा मिटाने की कोशिश में। नोनो मुझे अच्छी तरह पहचान गए हैं , "... चाचा... " 

"हाँ बेटा... "

"आपन बताव... अ... हमार का... हम त जिनगी एक्केतार जियलीं... "

"नोनो बेटा , सब ठीक बा... लइके-बाले सब आपन-आपन देखत हवें... सब खुशहाल हवें... "

"सबके खुसी सुनि के जियरा जुडा जाला... चाचा , अब गांवे चलि आवा... आपन जन्मभूमि नाइ छोड़े के... अरे इहे माटी हवे जवन आपन है... "

"बतिया त सही है बेटा... लेकिन अब... "

"हाँ , चाचा... गाँव क जिनगी पहाड़ हवे... गाँव में कहाँ सुख... "

"नोनो बेटा , एक बाति पूँछी... ?"

"पूछ... अ... चाचा... "

"सही-सही बतइब... अ... ?"

"अब येहि उमिर में का सही और का गलत चाचा... "

"उ कवनि रहल... जेकरे खाती छइबे डीहवा पर मडइया गोरिया तुंह के लई के ना... " 

० ० ० 

 एक खामोशी पसर गई है मेरे सवाल पर। नोनो का चेहरा एकदम से जगमगाकर फिर एक ही पल में सपाट हो गया है। वह किसी अंतहीन गुफा में उतर गए हैं... वक़्त लग रहा है सहज होने में। मैं भी असहज हो उठा हूँ। यह पूछना क्या इतना जरूरी था। पल भारी हो गये हैं। यह क्या किया मैंने ? शांत झील में पत्थर फेंककर हलचल पैदा करना पानी में आग लगाना है। गलती हो गई मुझसे। मैं चुप हूँ... नोनो भी... 

"चाचा , तनी हमें उठा द... अ... " वह झोल खाई खटिया से उठने की कोशिश करते हैं। मैंने बांह पकड़कर नोनो को उठा दिया है। नोनो ने धोती को कमर से कसा और ओसारे में ही बनी एक कोठरी की ओर चल पड़े किसी स्वचालित यन्त्र से... 

 मैं उन्हें कोठरी की ओर जाते हुए देख रहा हूँ... 

 ओसारे की कोठरी में नोनो समा गए हैं... मैं एकटक कोठरी की ओर आँखें लगाए हूँ... नोनो कोठरी में हैं। क्या है उस कोठरी में ? नोनो और उनकी गोरिया की कौन-सी याद है जो उस कोठरी में कैद है ! एक-एक पल कितना बोझिल हो उठा है मेरे लिए... युग गुजर रहे हैं... क्या युग इतने भारी होते है ! 

 नोनो बाहर आ गए हैं... उनके हाथ में लाल कपड़े में बंधी बहुत छोटी-सी एक गठरी... गठरी नहीं , पुडिया... पुडिया भी नहीं... क्या नाम दूं उसे ? नोनो मुझे टक-टक देख रहे हैं... 

कृष्ण बिहारी
पो. बॉक्स - 52088. अबूधाबी, यू ए ई
email : krishnatbihari@yahoo.com
mobile : +971505429756, +971554561090

"चाचा... आजु ले केहू नाइ पुछ्लस... " मैंने उनकी हथेलियों को थाम लिया है। आँख पर कुहासे की परत जमने लगी है। जंगरइत का बल है जो आंसुओं को बाहर आने से रोक रहा है। यह कोशिश नाकाम हो रही है है और टप्प से मेरी हथेलियों में उनके आंसू की एक बूँद गिरी है। और फिर , टप -टप बरस गए गरम-गरम खारे आंसू। बरस गए नोनो के नयन। खामोशी बढ़ गई है। कुछ पलों के लिए वक़्त ठहर गया है। एक ताकत जुटा रहे हैं नोनो , " चाचा , गाँव क बेटी रहल... जात-कुजात अ नाम जानि के का होई... पते नाइ चलल कि कब ऊ हमके नीक लागे लगल। कब ऊ आंखी क पुतरी हो गइल... हमहीं ओसे एक दिन कहलीं कि तुहरे बिना हम नाइ जीयब... उ त लजा गइल... नेह पाप नाइ है चाचा लेकिन... उ रहल त गाँव क बिटियवे न ! बहिन भइल... बस , मन में पाप-पुण्य और प्रेम का झगरा शुरू भइल... हम कहलीं बस , अब एसे आगे नाइ... ओकर बियाह भइल... गवने से चार दिन पहिले हमें खोजत-खोजत घरे चलि आइल... एकद्म्में भोहर रहलि ऊ... जवन ऊ दे गइल हमके... आपन निसानी... हम नाइ दे पाइब... आपे बलई के दे जाइब... अब हम जादा नाइ जीयब... कहि देबें बलई से कि जब हमें दाघ दीहें त... अ... ओही में ई झोंकि दीहें... " उन्होंने पुडिया मुझे थमा दी है... 

 मैंने पुडिया या कि गठरी खोली है। उसमें तो कुंए की दूब के सूख गए चार कल्ले हैं... 

 नोनो मेरे सामने फिर उसी झोल खाई खटिया पर बैठ गए हैं। आँखें कुछ और फ़ैल गयीं हैं। दूर तक एक तलाश है। उस आदमी की जो उनकी गोरिया को भी एक मकाम तक पहुंचा दे। उनका बल उसे इसे इसी मकाम तक ला सका है... मुझे अब बलई को उनका धर्म समझाना है... 
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1 comments :

  1. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (06-04-2015) को "फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर" { चर्चा - 1939 } पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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