घोड़ों का अर्ज़ीनामा - प्रेम शर्मा

हुज़ूरे आला,
पेशे ख़िदमत है
दरबारे आम में
हमारा यह अर्जीनामा -

कि हम थे कभी
जंगल के आजाद बछेरे.
किस्मत की मार
कि एक दिन
काफ़िले का सौदागर
हमें जंगल से पकड़ लाया.
उसके तबेले में
बंधे पाँव
कुछ दिन
हम रहे बेहद उदास.


रह-रह कर
याद आये हमें
नदी-नाले
जंगल-टीले-पहाड़,
रंगीन महकती वादियाँ,
हरे-भरे खेत
औ ' मैदान
वे सुनहरे दिन
वे रुपहली रातें
जब मौजो-मस्ती में
बेफ़िक्र हम
मीलों निकल जाते थे,
जब
धरती और आसमान के बीच
ज़िन्दगी हमारी
आज़ादी का
दूसरा नाम थी.
*
तो हुज़ूर
कैदे आज़ादी के एहसास से
कुछ कम जो हुई
आँखों कि नमी
तो भूख-प्यास जगी
जो भूख-प्यास जगी
तो मजबूरन
हमने
अपना आबो-दाना कुबूल किया.
फिर
सधाया गया हमें
सौदागरी अंदाज़ में,
सिखाई गयी चालें
हुनर और करतब,
घोड़ों की जमात में
अब
हम थे नस्ले-अव्वल
बेहतरीन-जाबाज़ घोड़े.

फिर
एक दिन
किया गया पेश
हमें
निज़ामे-शाही के दरबार में.
पुरानी मिस्लों में
दर्ज़ हो शायद
हमारी वह दास्तान
कि जब
सूरज गुरूब होने तक
बीस शाही घुड़सवार
लौटे थे नाकाम
हमें पकड़ पाने में
तो अगले रोज़
आला-हुज़ूर ने
सौ दीनार के बदले
हमें ख़रीदा था,
थपथपाई थी
हमारी पीठ.

उसके बाद
तो हुज़ूर
राहे-रंगत ही
बदल गयी
हमारी ज़िन्दगी की.
अब हम
आला-हुज़ूर की
सवारी के
खासुल-खास
घोड़े थे.
सैर हो कि शिकार
या कि मैदाने जंग,
दिलो-जान से
अंजाम दी हमने
अपनी हर खिदमत.
आला हुज़ूर का
एक इशारा पाते ही
हम
दुश्मन के
तीर-तलवारों
तोप-बंदूकों
बर्छी-भालों की
परवाह किये बिना
आग और खून के
दरिया को चीरते हुए
साफ़-बेबाक
निकल जाते थे.
गुस्ताखी मुआफ,
आला हुज़ूर के
आसमानी इरादों को
कामयाबी
और फतह का
सेहरा पहनाने में
हमारा भी
एक किरदार था
तवारीख के
सुनहरे हाशियों से अलग.

हुज़ूर
कभी-कभी हमें
याद आते हैं
वे शाही जश्नों-जलूस,
लाव-लश्कर,
राव-राजे,
शहजादे
फर्जी और प्यादे,
राग-रंग की
वे महफिलें,
वो इन्दरसभा
वो जलवागाह
कि जिस पर
फरिश्तें भी करें रश्क़.
क्या ज़माना था, हुज़ूर,
क्या रातबदाना था.
***
हुज़ूर
दौरे-जहाँ में
देखा है ज़माना हमने
वतनपरस्तों की
सरफरोशी का.
फिर
देखा है मंज़र
उस
सियासी आज़ादी का
जो
बंटवारे की कीमत पर
सदियों पुराने भाईचारे
और इंसानियत के
खून में नहाकर
आई थी.

फिर
देखी है शहादत
उस बूढ़े फ़कीर की
जिसके सीने को
चाक कर गयीं थीं
तीन गोलियां
मौजूद है जो
हमारे
क़ौमी अजायबघर में.

हुज़ूर,
सुनी हैं तकरीरें
हमने
साल-दर-साल
रहनुमाओं की,
देखें हैं ख्वाब
अमनपसंदी
और खुशहाली के
एक जलावतन
बादशाह की
लाल महराबों से.

हुज़ूर,
अस्तबल से ख़ारिज
हादसे-दर-हादसे
ज़िन्दगी हमारी
कुछ इस तरह गुज़री
कि फिलवक्त हम
मीरगंज की रेहड़ी में
जुते घोड़े हैं
ज़िन्दगी से बेज़ार
पीठ पर
चाबुक की मार
जिन्स और असबाब
सवारियाँ बेहिसाब,
भागम-भाग,
सड़ाप!
सड़ाप!!

हुज़ूर,
ज़िन्दगी औ'  ज़िल्लत में,
जुर्म औ' सियासत में,
अब
ज्यादा फर्क
नहीं रहा.

आखिरत
ये इल्तिजा है  हमारी
कि हमें
गोली से
उड़ा दिया जाये
ताकि हमारी
जवान होती नस्लें
देख सकें हश्र
हमारी
बिकी हुई आज़ादी का,
खिदमत गुजारी का.

हुज़ूर
बाद सुपुर्दे ख़ाक
लिखवा दिया जाए
एक पत्थर पर
दफ़्न हैं यहाँ
वे घोड़े
जो हवा थे
आसमान थे
हयाते दरिया की
रवानी में
मौत ज़िन्दगी का
मुकाम सही
ज़िन्दगी
मौत की गुलाम नहीं.



प्रेम शर्मा

काव्य संकलन : प्रेम शर्मा

nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
वह कलेक्टर था। वह प्रेम में थी। बिल उसने खुद चुकाया। | ग्रीन विलो – अनामिका अनु
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
कहानी: छोटे-छोटे ताजमहल - राजेन्द्र यादव | Rajendra Yadav's Kahani 'Chhote-Chhote Tajmahal'
मन्नू भंडारी की कहानी — 'रानी माँ का चबूतरा' | Manu Bhandari Short Story in Hindi - 'Rani Maa ka Chabutra'
'रक्षा-बन्धन' — विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक की कहानी | Rakshabandhan - Vishwambharnath Sharma Kaushik