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मास्टर मदन : भारतीय संगीत के दूसरे सहगल - सुनील दत्ता

जून 6, 2013
master madana shabdankan sunil dutta singer मास्टर मदन सुनील दत्ता शब्दांकन पूण्यतिथि यादें गायक
1. गोरी गोरी बईयाँ- भजन

2. मोरी बिनती मानो कान्हा रे- भजन

3. मन की मन- ग़ज़ल

4. चेतना है तो चेत ले- भजन

5. बांगा विच - पंजाबी गीत

6. रावी दे परले कंडे वे मितरा- पंजाबी गीत

7. यूँ न रह-रह कर हमें तरसाइये- ग़ज़ल

8. हैरत से तक रहा है- ग़ज़ल

भारतीय संगीत जगत में अपने सुरों से जादू बिखरने वाले और श्रोताओं को मदहोश करने वाले पाश्वर्गायक तो कई हुए और उनका जादू भी सिर चढ़कर बोला, लेकिन कुछ ऐसे गायक भी हुए जो गुमनामी के अँधेरे में खो गये और आज उन्हें कोई याद नही करता। उन्ही में से एक ऐसी ही प्रतिभा थे “ मास्टर मदन “ …

     28 दिसम्बर 1927 को पंजाब के जालन्धर में जन्मे मास्टर मदन एक बार सुने हुए गानों के लय को बारीकी से पकड़ लेते थे। उनकी संगीत की प्रतिभा से सहगल काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मास्टर मदन से पेशकश की - जब भी वह कोलकाता आये तो उनसे एक बार अवश्य मिले। मास्टर मदन ने अपना पहला प्रोग्राम महज साढ़े तीन साल की उम्र में धरमपुर में पेश किया था। गाने के बोल कुछ इस प्रकार थे “ हे शरद नमन करू“। कार्यक्रम में मास्टर मदन को सुनने वाले कुछ शास्त्रीय संगीतकार भी उपस्थित थे, जो उनकी संगीत प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए और कहा “इस बच्चे की प्रतिभा में जरुर कोई बात है और इसका संगीत ईश्वरीय देंन है”।

     मास्टर मदन अपने बड़े भाई के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लेने जाया करते थे। अपने शहर में हो रहे कार्यक्रम में हिस्सा लेने के एवज में मास्टर मदन को अस्सी रूपये मिला करते थे| जबकि शहर से बाहर हुए कार्यक्रम के लिए उन्हें दो सौ पचास रूपये पारिश्रमिक के रूप में मिलता था।

     मास्टर मदन की प्रतिभा से प्रख्यात कवि मैथलीशरण गुप्त भी अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने इसका वर्णन अपनी पुस्तक “ भारत भारती “ में किया है।

     मास्टर मदन ने श्रोताओं के बीच अपना अंतिम कार्यक्रम कलकत्ता में पेश किया था जहाँ उन्होंने “राग बागेश्वरी“ गाकर सुनाया।

     उनकी आवाज के माधुर्य से प्रभावित श्रोताओं ने उनसे एक बार फिर से गाने की गुजारिश की। लगभग दो घंटे तक मास्टर मदन ने अपनी आवाज के जादू से श्रोताओं को मदहोश करते रहे। श्रोताओं के बीच बैठा एक शख्स उनकी आवाज के जादू से इस कदर सम्मोहित हुआ कि उसने उनहें उपहार स्वरूप पांच रूपये भेट किये।

     कुछ समय बाद मास्टर मदन दिल्ली आ गये जहाँ वह अपनी बड़ी बहन और बहनोई के साथ रहने लगे। उनकी बहन उन्हें पुत्र के समान स्नेह किया करती थी। दिल्ली में मास्टर मदन दिल्ली रेडियो स्टेशन में अपना संगीत कार्यक्रम पेश करने लगे। शीघ्र ही उनकी प्रसिद्धि फिल्म उद्योग में भी फ़ैल गयी और वह दूसरे सहगल के नाम से मशहूर हो गये। एक बार एक फिल्म निर्माता ने उनके पिता से मास्टर मदन के काम करने की पेशकश भी की लेकिन उनके पिता ने निर्माता की पेशकश को यह कह के ठुकरा दिया कि फिल्म उद्योग में मास्टर मदन के गुणों का सदुपयोग नही हो पायेगा। दिल्ली में ही मदन की तबियत प्राय: खराब रहा करती थी। दवाओं से उनके स्वास्थ्य में सुधार नही हो पा रहा था। इसीलिए वह स्वास्थ्य में सुधार के लिए दिल्ली से शिमला आ गये। मगर उनके स्वास्थ्य में कुछ ख़ास असर नही हुआ। महज १५ वर्ष की अल्पायु में 5 जून 1942 को शिमला में मास्टर मदन ने इस दुनिया से चिर विदा हो लिए। मास्टर मदन ने अपने सम्पूर्ण जीवन में महज आठ गीत रिकार्ड कराए थे।


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