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यथार्थवाद और नवजागरण : व्यक्ति की महानता की त्रसद परिणति-कथा - अमिताभ राय

नव॰ 28, 2013

यथार्थवाद और नवजागरण : व्यक्ति की महानता की त्रसद परिणति-कथा

- अमिताभ राय


       

चंद्रधर शर्मा गुलेरी के अनुसार उनके समकालीन दो प्रकार की रचनाएँ लिखते हैं ‘‘एक तो उन विलक्षण और असंभव ऐयारियों और तिलिस्मों में गोते खिलाता है जो कभी न थीं और विज्ञान की चाहे कितनी ही उन्नति हो जाए, कभी भी संभव न होंगी । दूसरा गार्हस्थ और समाज के उन आदर्श चित्रों को दिखाता है जो वर्तमान समय में नहीं है या तो प्राचीन समय में थे, या उस समय भी कल्पना ही में थे ।’’ अर्थात् इनकी रचनाएँ कल्पना के स्थान पर यथार्थ को रेखांकित करती हैं । क्या इस यथार्थवाद का कथा साहित्य के संदर्भ में विशेष योगदान नहीं है ? तिलस्मी अय्यारी रचनाओं के संदर्भ में नए ज्ञान विज्ञान के आलोक में इनकी टिप्पणी पर आज नए तरीके से विचार करने की जरूरत है, परन्तु यहाँ ‘उसने कहा था’ के संदर्भ में इस नवीन यथार्थवादी दृष्टि के पड़ताल की सख्त आवश्यकता है । इस संदर्भ में गुलेरी जी ने खुद प्रश्न खड़ा किया है - ‘‘परन्तु क्या आपने कभी ख्याल किया है कि जगत् में क्या ऐसी सृष्टि है ?’’ और इसका उत्तर खुद ही दिया भी है - ‘‘मेरा सबसे प्रबल प्रयत्न यही होता है कि ऐसे उच्छृंखल और एकतरफा चित्र से किनारा कसूँ और मनुष्य और वस्तुओं का वैसा सच्चा चरित्र दूँ जैसा कि वे मेरे हृदय-काँच में अंकित हुए हैं । अवश्य ही कांच में दोष हैं, छाया भी धुंधली या बिगड़ी हुई है ।’’ अगर अभिव्यक्ति के संदर्भ में देखें तो ‘सुखमय जीवन’ और ‘बुद्धू का कांटा’ उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ नहीं हैं, ‘छाया भी धुधली है’ परन्तु क्या विद्वान आलोचक ‘उसने कहा था’ को जो प्रेम कथा कहते हैं, वह ठीक ज्ञात होता है ?

        गुलेरी जी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ के संदर्भ में सामान्यतया दो मत प्रचलित हैं । एक मत कहता है कि प्रेम की अथवा प्रेम पर बलिदान की कहानी है जबकि दूसरा मत इसे प्रेम कहानी नहीं मानता । पहले मत के पोषक हिन्दी के अधिकांश आलोचक हैं जबकि दूसरे मत के पोषक कम आलोचक हैं । दूसरे मत के पोषक रमेश उपाध्याय इसे युद्ध की कहानी मानते हैं । वे कहते हैं-स्पष्ट है कि गुलेरी जी का उद्देश्य प्रेम-कहानी लिखना नहीं, युद्ध की कहानी लिखना था । इस कहानी में प्रेम और युद्ध अंतर्विरोधी बनकर आये हैं ।

        प्रेम कथा मानने का प्रचलन आचार्य शुक्ल के इस कथन से होता है - ‘‘इसके पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है । घटना इसकी ऐसी है, जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झाँक रहा है - केवल झाँक रहा है निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है । कहानी भर में प्रेमी की निर्लज्जता, प्रगल्भता, वेदना की वीभत्स विवृति नहीं है । सुरुचि के सुकुमार से सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं पहुँचता । इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं पात्रों के बोलने की अपेक्षा ।’’ शुक्ल जी की इस टिप्पणी में जिन तथ्यों की ओर इशारा किया गया है, वह है - पक्का यथार्थवाद, सुरुचि की चरम मर्यादा, सुरुचि के सुकुमार से सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं, भावुकता का चरम उत्कर्ष, घटना ऐसी जैसी रोज हुआ करती है, प्रेम के स्वर्गीय स्वरूप का झाँकना, घटनाएँ बोल रही हैं पात्रों की अपेक्षा । शुक्ल जी के प्रति सम्मान के बावजूद यह मेरी समझ में नहीं आता कि पक्का यथार्थवाद और भावुकता का चरमोत्कर्ष एक साथ कैसे स्थापित हो सकता है ? संभवत: यह उनके ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ का अतिरेक हो । परन्तु ज्ञान और सभ्यता के विकास के कारण ऐसे अंतर्विरोधों उभरते हैं । इसके बावजूद शुक्ल जी की अंतर्दृष्टि विशिष्ट थी । पात्रों की अपेक्षा घटनाओं का बोलना सिर्फ शिल्प के चमत्कार का मसला नहीं है । इन बोलती घटनाओं के द्वारा ‘उसने कहा था’ में प्रेम के स्वर्गीय रूप की झलक कैसे मिलती है ? यह समझना मेरे लिए सदैव मुश्किल रहा है । इस कहानी को जब भी पढ़ता हूँ तो प्रेम या युद्ध की कहानी नहीं मान पाता ।

        यदि यह कहानी प्रेम कहानी होती तो घटनाक्रम में युद्ध के इतने ज्यादा प्रसंग न होते । साथ ही लहना सिंह सैनिक के रूप में कम, प्रेमी के रूप में ज्यादा दिखाई पड़ता । इसका मतलब यह नहीं है कि यह युद्ध की कहानी हो जाती है । युद्ध का चित्र युद्ध की महिमा या खंडन के लिए नहीं है, न ही युद्ध में लहना सिंह समेत अन्य भारतीय सैनिकों की वीरता का प्रदर्शन प्रस्तुत करना कहानी का लक्ष्य है । गुलेरी जी तो साफ-साफ कहते हैं कि ‘‘चीजे जैसी हैं, उससे अच्छी दिखाई दें, ऐसा प्रयत्न किए बिना अपनी सीधी कथा कहने में ही मैं संतुष्ट हूँ ।’’ तो प्रथम विश्वयुद्ध में अंगे्रजों के पक्ष से लड़ रहा भारतीय सैनिक क्या खुद उपनिवेशवादी नीतियों का समर्थन नहीं कर रहा था, जबकि विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों का युद्ध में भाग लेना एक ऐतिहासिक सच्चाई तो है ही । उपर्युक्त कथन इस ऐतिहासिक सच की स्वीकारोक्ति भी है । बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी इस युद्ध में अंग्रेजों का समर्थन इस उम्मीद में किया था कि लड़ाई के बाद उसे आजादी प्राप्त हो जाएगी । यह बड़ा अंतर्विरोध आज दिखायी देता है परन्तु यह सामाजिक ऐतिहासिक तथ्य है । यह अंतर्विरोध राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति के बीच द्वन्द्व के रूप में भारतेन्दु में भी था । उनकी भावना थी - अंगरेज राज सजै सब भारी । पै धन विदेस चली जात इहै अति ख्वारी । । ये तथ्य भारतेन्दु को पूर्ण रूप से राजभक्त नहीं रहने देते और जब अंग्रेजों को यह बात समझ आयी तो भारतेन्दु को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा । इसकी तुलना में ये सैनिक तो नौकरी कर रहे थे । अत: ये नौकरीपेशा भारतीय अंग्रजों का विरोध तो नहीं ही कर सकते थे । अर्थात् यह अंतर्विरोध और दुविधा विविध कारणों से भारतीय समाज में बनी हुई थी ।

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        यहाँ एक प्रश्न उभरता है कि फिर युद्ध का वर्णन इतना ज्यादा क्यों है ? और इस युद्ध के माध्यम से, युद्ध की घटनाओं के माध्यम से मानव चित्त की कौन सी अवस्था का ज्ञान होता है ? कहानी के युद्धभूमि में सम्पन्न होने के कारण इसे युद्ध की कहानी मान लेना इसे प्रेम कहानी मान लेने के समान ही दूसरा अतिरेक है । मैंने ऊपर कहा युद्ध उस समय की ऐतिहासिक सच्चाई थी । परन्तु उस समय की सामाजिक सच्चाई यह थी कि ये भारतीय सैनिक अभावग्रस्त भारतीय थे जो अंग्रजी सरकार में नौकरी कर रहे थे । अंग्रजों ने भारतीयों को गुलाम बनाया था । अत: परोक्ष रूप से ये सैनिक अंग्रेजों की उपनिवेशवादी नीतियों का समर्थन कर रहे थे । अगर ये फ्रांस की धरती पर अंग्रेजों के पक्ष से युद्ध न कर रहे होते, तो भारतीयों पर ही गोली चला रहे होते । इनके पास भौतिक और आर्थिक स्तर पर अपनी गरीबी और देशभक्ति के बीच चयन की वैसी स्वतंत्रता न थी जैसी आज दिखाई देती है । जैसा कि कहानी में फ्रांसीसी मेम कहती है - ‘तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आये हो ।’ फ्रांसीसी मेम जिस कोण से भारतीय सिपाहियों को राजा कहती है, क्या अंग्रेज भी इनको वैसे ही राजा कह सकते थे ? नहीं, क्योंकि ये अंग्रेज सरकार में नौकरी कर रहे थे और ये युद्ध में भारतीय नहीं अंग्रेजी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे । परन्तु यह भी एक सच्चाई है कि अंगे्रजों के समक्ष इन भारतीय सैनिकों को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता था । ये सैनिक दोहरी समस्या झेल रहे थे - एक ओर ये भारतीय समाज में अपनी गरिमा खो रहे थे और दूसरी ओर ये अंग्रेजों में भी संशय की दृष्टि से देखे जाते थे । जैसे-जैसे आजादी की लड़ाई तेज होती गयी इन सैनिकों की भारतीय समाज में गरिमा घटती गयी ।

        फिर प्रश्न उठता है कि ‘उसने कहा था’ कहानी की संवेदना का आधार क्या है ? वास्तव में यह यथार्थवाद और नवजागरण के संयुक्त प्रभाव में बन रहे व्यक्ति की महानता की त्रासद परिणति की कथा है । यहीं ठहरकर हमें विचार करना चाहिए कि शीर्षक ‘उसने कहा था’ का क्या तात्पर्य है ? सहज ही हमारे मन में प्रश्न कौंधता है - किसने कहा था, क्या कहा था, किससे कहा था - आदि उत्तर खोजे बिना भी ये प्रश्न व्यक्ति की केन्द्रीय उपस्थिति को रेखांकित करते हैं । व्यक्ति केन्द्र में है और वह व्यक्ति मध्यवर्ग का है । परन्तु यह व्यक्ति समाज, परिवार और धर्म आदि के मध्य विकसित हो रहा था । लहना सिंह कहता है कि ‘‘चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना सिंह इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है । उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए ।’’ यहाँ स्पष्ट है कि व्यक्ति लहना के साथ एक ओर नौकरी है तो दूसरी ओर गाँव और उसके रीति रिवाज हैं । गाँव भी कोई नहीं, स्पष्ट मांझा है । उसके ठीक पहले लहना कहता है - ‘‘आज मैंने बहुत बातें सीखीं । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं ।........’’ सिख का सिगरेट न पीना शुद्ध धार्मिक मसला है । मरते समय लहना अपने परिवार को याद करता है । लहना की इंडिविजुएलिटी परिवार, समाज और धर्म आदि संस्थाओं की कोख से फूटती है । जबकि इयान वॉट ने बताया है- ‘‘उनके लिए, जो नयी आर्थिक व्यवस्था से प्रभावित थे, वह प्रभाव-युक्त सत्ता, और सामाजिक व्यवस्थाओं का आधार न तो परिवार, न चर्च, न संघ, न शहरीपन और न ही कोई अन्य सामूहिक इकाई था, अपितु व्यक्ति था ।’’ बोधा, लपटन साहब, सूबेदार, उसकी पत्नी, वजीरा सिंह आदि से उसका संबंध नयी प्रवृत्तियों का द्योतक है । ये संबंध गाँव-घर, धर्म, परिवार विशेष आदि का होने के कारण नहीं बना है । यह नयी आर्थिक, सामाजिक प्रणाली की उपज है । यह संबंध नयी प्रवृत्तियों का द्योतक है । वास्तव में लहना का चरित्र नवजागरणकालीन उदार, उदात्त और महानता से सम्पन्न व्यक्ति का उदाहरण है । ज्ञानोदय और नवजागरण के परिणाम स्वरूप उदात्तता, उदारता और महानता के तत्व आधुनिक युग की प्रवृत्ति बनते हैं । समाज में ज्ञान-विज्ञान के विकास से जो नयी सामाजिक-आर्थिक संरचनाएँ बनती हैं, साहित्य, विभिन्न कला रूपों, सम्प्रेषण के तमाम रूपों पर उसका प्रभाव पड़ता है । भारत में नवजागरण यूरोप के काफी बाद आया और उसके स्वरूप को लेकर भी विद्वानों में काफी मतभेद है । उसमें अंग्रेजों की भूमिका को लेकर भी काफी मतभेद है । मतभेद लाजिमी भी है क्योंकि भारत में अंग्रेजों के कार्यों के पीछे उनकी उपनिवेशवादी प्रवृत्तियाँ काम कर रही थीं और इसने मध्यकाल से चले आते सौदागरी पूँजीवाद को पूरी तरह नष्ट कर दिया । इस तरह भारत जैसे उपनिवेशों में उसके अपने पूँजीवाद के सहज प्रवाह का मार्ग अवरुद्ध हो गया । अंग्रेज अपने औपनिवेशिक फायदों के लिए जिन साधनों का इस्तेमाल कर रहे थे, भारतीय समाज जो नयी संरचनाएँ बना रहे थे, उसका यहाँ के जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था । गुलेरी जी ने ‘उसने कहा था’ का जो पहला अनुच्छेद लिखा है वह इसका सशक्ततम उदाहरण है । पीयूष गुलेरी इसे भूमिका मानते हुए कहते हैं - ‘‘तीनों कहानियाँ भूमिका से प्रारंभ होती हैं । फलत: कहानियों का न केवल कलेवर बढ़ा है, बल्कि असंगतता और व्यर्थ विस्तार भी आ गया है ।’’ काश चीजें इतनी सरल होती! ये भूमिकाएँ नहीं हैं, ये कहानी के अंश हैं क्योंकि इस अनुच्छेद के बाद की पंक्तियाँ हैं - ‘‘ऐसे बम्बू-कार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चैक की दुकान पर आ मिले ।’’ और ऐसे बम्बू-कार्टवाले कौन हैं ? तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले, तंग चक्करदार गलियों में , हर एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर, सब्र का समुद्र उमड़ाकर, ‘बचो खालसा जी’, ‘हटो भाईजी’, ‘ठहरना माई‘, ‘आने दो लालाजी’, ‘हटो बाझा’ कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरांे और बतकों, गन्ने और खोमचे और भारे वाले के जंगल में से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि ‘जी’ और ‘साहब’ बिना सुने किसी को हटना पड़े । यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहींय चलती है, पर मीठी छुरी की तरह मार करती है ।’’ ये किनकी बिरादरी वाले हैं - ‘बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी’ वालों के जिनकी जबान के कोड़ों से पीठ छिलती है । क्या यह शहरीकरण, पूँजीवादी व्यवस्था के बाद की प्रक्रिया नहीं है ? शहर भी एक से नहीं, क्योंकि अमृतसर को गाँव के रूप चित्रित नहीं किया गया । अमृतसर भी शहर ही है, कुछ शहर उससे भी बडे़ हैं । मुझे नहीं लगता कि गुलेरी जी सिर्फ दो अलग-अलग शहर के ताँगेवालों की जबान का फर्क बताने के लिए अथवा अपनी विद्वता बताने के लिए कि देखिए साहब मैं यह भी जानता हूँ कि ताँगेवालों की जबान कैसी होती है, - इस अनुच्छेद को अपनी कहानी का हिस्सा बनाते हैं । इस अनुच्छेद से जो पहली बात उभरती है- वह है, लेखक का यथार्थवादी रूझान । छोटे-छोटे विवरणों में इसको देखा जा सकता है । शहर, बाजार और मानवता के उदात्त, उदार और आदर्शात्मक विवरण और उसी मानवता के लिए जीवन का उत्सर्ग कर देने की भावनाओं के प्रस्तुतिकरण के कारण ही इस कहानी में यथार्थवाद उभरकर आया है । ज्ञानोदय, नवजागरण और औद्योगिक क्रांति ने आधुनिक युग का मार्ग प्रशस्त किया था । आधुनिक युग में मध्ययुगीन ढ़ाँचा और उसकी संस्थाएँ टूटती हैं । यह यथार्थवादी रूझान ही है जो आरंभिक काल से लेकर प्राक् आधुनिक युग तक की कहानियों को आधुनिक युग की कहानियों से अलगाता है । इसकी ओर गुलेरी जी की टिप्पणियों से भी ध्यान जाता है । इसीकारण वे चीजें जैसी हैं, उसका ‘सच्चा चित्र’ देने की बात लेखक करता है । उसका उनके कथन में ‘मनुष्य’ और ‘वस्तुओं’ दोनों के लिए है । यह शुरुआती विवरण पुराने युग की कहानियों की विशेषता नहीं है । यह ‘एक था राजा, एक थी रानी’ वाली संरचना और विवरण को तोड़ती है । यहाँ एक और बात भी ध्यान देने की है । पंचतंत्र तथा पुरानी कहानियों अथवा पुराने समाजों की मानसिकता के अनुरूप, जहाँ अच्छा या बुरा होना एक स्वायत्त और स्वतंत्र तथ्य होता था, यहाँ ये स्वतंत्र तथ्य नहीं हैं । इस कहानी में एक का अच्छा होना दूसरे के सापेक्षिक है । सापेक्षिकता की अवधारणा खुद ही आधुनिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचायक है । इसके ठीक बाद बाजार का चित्र आता है । बाजार नए किस्म का है या नहीं, इसका बहुत विवरण नहीं है । उनको दही, पापड़ आदि खरीदते दिखाया गया है । गाँव की स्वायत्त संरचना वाली अर्थव्यवस्था में इन चीजों को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, यह खरीद फरोख्त शहर और उसके साथ जन्मे पूँजीवाद की विशेषता है । मार्क्स ने स्थापित किया है कि जब सामंती ढ़ाँचे वाली ग्रामीण व्यवस्था टूट रही होती है, उस समय पूँजीवाद अपने अपने समाज में खास प्रगतिशील भूमिका निभाता है । वह यथास्थितिवादी और शोषण पर आधारित सामंती व्यवस्था को तोड़ता है और नए आधुनिक समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है । इस संक्रमण के सूत्र इस कहानी में दिखायी पड़ते हैं । इसको बहुत ध्यान से पकड़े बिना हम कहानी की व्याख्या-पुनर्व्याख्या नहीं कर सकते हैं ।

        दूसरी बात यह है कि पूँजीवादी व्यवस्था के विकास और शहरीकरण की प्रक्रिया को मध्यवर्ग के उदय और विकास की पृष्ठभूमि के रूप में देखा जाता है । यह प्रथम अनुच्छेद शहरीकरण और पूँजीवादी व्यवस्था को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर देता है । नए उद्योग धंधों के विकास के साथ ही नए नौकरी पेशा, वेतनभोगी वर्ग का जन्म होता है । इसमें सैनिकों की संख्या काफी बड़ी थी । बिपन चंद्रा ने सैनिकों की जो संख्या बतायी है वह ध्यान देने योग्य है - ‘‘बहरहाल, कंपनी के 2 लाख 32 हजार 224 सिपाहियों में से करीब आधे सिपाहियों ने अपनी-अपनी रेजिमेंटों को छोड़ दिया’’ । साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ‘‘वास्तव में उस समय अवध में शायद ही कोई ऐसा परिवार रहा हो जिसका कोई सदस्य सेना में न रहा हो ।’’ अवध के अतिरिक्त पूरे उत्तर भारत में सेना में भर्ती होने वाले जवानों की संख्या काफी थी । मैं सेना की नौकरी के कारण उभरते नए मध्यम वर्ग को देखने की कोशिश कर रहा हूँ जिसकी एक नियत आय थी और इस कारण खेतिहर किसानों की अपेक्षा इनका जीवन ज्यादा आसान और सुविधापूर्ण था । यह संख्या काफी महत्वपूर्ण है ।

        लहना सिंह इसी नयी व्यवस्था की उपज है । मध्यवर्ग का विकास अपने साथ कई प्रकार के संदर्भ लाता है । इसमें सबसे प्रमुख यह है कि वह आचरण में उच्च और निम्न वर्ग की अपेक्षा अधिक स्थिर होता है । वह नियमों को मानता है, रुढ़ि की हद तक मानता है । वह आधुनिकता के साथ जो विचार आ रहे थे - महानता, उद्दात्ता, देशप्रेम, देश के लिए प्राणोत्सर्ग, मानवता के लिए उत्सर्ग आदि भावों को भी जीवन में सबसे जयादा स्वीकारता है । इस कहानी में लहना सिंह का चरित्र इस बात की गवाही देता है । जो लोग इसे प्रेम पर बलिदान की कहानी मानते हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि लहना सिंह से अपने पति और पुत्र के प्राणों की रक्षा की बात सूबेदारनी के अलावा कोई और स्त्री करती तो क्या लहना सिंह उसे मना कर देता ? लहना सिंह जैसे उदार-उदात्त चरित्र के साथ तो यह होना ही था । लहना सिंह दृढ़ चरित्र का व्यक्ति है । वह चाहता तो खंदक में लोगों को लड़ने के लिए छोड़ खुद सूबेदार को सूचना देने जा सकता था । परन्तु वजीरा जब उससे कहता है कि हुक्म तो यहीं रहने का मिला है तो यहाँ भी लहना आगे बढ़कर निर्णय लेता है - ‘‘ऐसी-तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम-जमादार लहना सिंह, जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है । मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ ।’’ लहना सिंह का चरित्र मध्यवर्गीय आचरणों के अनुकूल है । वह जीवन में उदारता, उदात्तता, धीरोदात्तता, दृढ़निश्चय, कर्तव्य परायणता और आगे बढ़कर जिम्मेवारी लेने के उसके उत्साह आदि गुणों को काफी महत्व देता है । बचपन में भी लहना सिंह ने छोटी बच्ची (जो बाद में सूबेदारनी बनती है) को अपनी जान पर खेल कर बचाया था । तब तो वह बच्ची उसकी कोई पहचान वाली नहीं थी । प्रेम कहानी मानने वालों के हिसाब से उसको देखते ही लहना सिंह को प्रेम हो गया होगा और वह अपने प्राणों पर खेल कर उसकी रक्षा करने को आमादा हो गया था ?! यह उत्सर्ग का भाव संभवत: आजादी की लड़ाई का भावात्मक रूपांतरण हो साहित्य में या गुलेरी जी के मानस में और वहीं से यह कहानी में भी अनकॉन्संशली आ रहा हो । वहाँ से न भी आया हो तो भी यह कहानी की केन्द्रीय विशेषता है । बचपन की घटना यह साबित करती है कि वह अनजान-से अनजान लोगों की भी रक्षा उसी चाव से करता । सूबेदारनी लहना सिंह के चरित्र का विकास ही गुलेरी जी ने नवजागरण के बाद उपजी विराटता, महानता आदि गुणों के आलोक में निर्मित किया है । ऐसे गुणों के कारण ही वह अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है । यह आज की उत्तर आधुनिक पीढ़ी को मूर्खता दीख सकती है । अपने लाभ-हानि वाले गणित के अनुसार वह सोच सकती है कि भला कोई ऐसा भी कर सकता है । इसी परिप्रेक्ष्य में लहना सिंह के बिल्कुल आखिर के इस संवाद और कार्य को भी देखा जा सकता है जब वह खुद अस्पताल की गाड़ी पर नहीं चढ़ता, अपने बदले बोधा और सूबेदार को भेज देता है - ‘‘फील्ड-अस्पताल नज़दीक था । सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जायेंगे, इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गयीं । सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही । पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायगा । बोधासिंह ज्वर से बर्रा रहा था । वह गाड़ी में लिटाया गया । लहना को छोड़ सूबेदार जाते नहीं थे । यह देख लहना ने कहा - तुम्हें बोधा की कसम है और सूबेदारनी जी की सौगन्ध है तो इस गाड़ी में न चले जाओ ।

        ‘‘और तुम ?’’

        ‘‘मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना । और जर्मन मुरदों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी । मेरा हाल बुरा नहीं है । देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ ? वजीरा मेरे पास है ही ।’’ यहाँ देखिए लहना सिंह अपने घाव छिपाकर सूबेदार को उसके पत्नी और बच्चे की कसम देकर भेजता है । यदि वह अपने घाव सूबेदार को दिखा देता, संभवत: सूबेदार भी किसी हालत में न जाता और अगर किसी हालत में चला जाता, तो उसका चरित्र स्खलित हो जाता । लहना और कहानीकार ने सूबेदार को भी बचा लिया । यह आदर्शवाद और नवजागरण की युगीन प्रवृति का ही साहित्यिक प्रतिफलन है । यहाँ प्रश्न तो यह भी उठता है कि दूसरी गाड़ी में और घायलों को ले जाने के बजाए लाशों को क्यों ले जाया गया ? क्या उस समय युद्ध में इंसान को बचाने से लाशों को हटाना ज्यादा जरूरी समझा जाता था । कहानी के शिल्प के स्तर पर यह एक संरचनात्मक भूल ही मुझे प्रतीत होती है । यह लेखक का जाना-पहचाना क्षेत्र नहीं था । लेखक ने इसे एक तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया है । लेखक की दृष्टि में प्राणोत्सर्ग महानता के लिए आवश्यक था । मैंने इसीलिए इसे महानता की त्रासद परिणति कहा है ।

        परन्तु अब यहाँ एक अन्य संदर्भ पर विचार करना होगा । दो-तीन प्रसंग हैं जिनके कारण विद्वान आलोचक इसे प्रेम या प्रेम पर बलिदान की कहानी मानते हैं ।

        पहला प्रसंग है - लहना सिंह सूबेदार को कहता है कि ‘सूबेदारनी होराँ के चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना । और जब घर जाओ तब कह देना कि मुझसे उन्होंने जो कहा था, वह मैंने कर दिया ।’

        दूसरा प्रसंग बिल्कुल प्रारंभ में है । जब लहना सिंह के बई बार पूछने पर कि ‘तेरी कुड़माई हो गयी’ आखिर में लड़की कहती है -‘हाँ, हो गयी ।’ इसकी लड़के पर यह प्रतिक्रिया होती है -‘‘रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोयी, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया । सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पायी । तब कहीं घर पहुँचा ।’’

        और तीसरा प्रसंग है - ‘‘लहनासिंह बारह वर्ष का था । अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है । दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है । जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गयी ? तब ‘धत्’ कहकर वह भाग जाती है । एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा-‘हाँ, कल हो गयी, देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू ?’ सुनते ही लहनासिंह को दु:ख हुआ । क्रोध हुआ । क्यों हुआ ?’’

        ऊपर मैंने प्रश्न किया था कि किसने कहा, क्या कहा, किससे कहा ? उसका प्रत्यक्ष उत्तर यहाँ पहले प्रसंग में मिलता है । सूबेदारनी ने कहा, लहना सिंह से कहा और कहा - ‘‘तुम्हें याद है, एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दूकान के पास बिगड़ गया था । तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे । आप घोड़े की लातों में चले गये थे । और मुझे उठाकर दूकान के तख्त पर खड़ा कर दिया था । ऐसे ही इन दोनों को बचाना । यह मेरी भिक्षा है । तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ ।’’ यह भिक्षा है, अधिकार या हक से माँगी गयी चीज नहीं है । वह किस अधिकार से यह माँग सकती थी ? अब यह लहना पर था कि वह सूबेदारनी की बात माने या नहीं । परन्तु लहना की चारित्रिक विशेषताएँ ऐसी हैं कि वह सूबेदारनी की बात मानता है । एक तथ्य की ओर और ध्यान देने की जरूरत है । इन पच्चीस वर्षों में लहना सिंह का अपना घर परिवार है । वह मरते हुए अपने पुत्र और भाई, गाँव-जमीन को याद करता है - ‘‘आधे घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला-

        ‘‘कौन ? कीरत सिंह ?’’

        वजीरा ने कुछ समझ कर कहा - ‘‘हाँ’’ ।

        ‘‘भइया, मुझे और ऊँचा कर ले । अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले ।’’

        वजीरा ने वैसा ही किया ।

        ‘‘हाँ, अब ठीक है । पानी पिला दे । बस । अबके हाड़ में यह आम खूब फलेगा । चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना । जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही यह आम है । जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने में मैंने इसे लगाया था ।’’ यह बात बहुत गौर करने लायक है । कुतर्की लोग यह कह सकते हैं कि वह पुत्र और भाई को तो याद करता है पर पत्नी को नहीं क्योंकि वह सूबेदारनी से ही जीवन भर प्यार करता रहा है । परन्तु आगे कहानी में आता है कि उसे याद भी नहीं कि सूबेदारनी उसे कभी मिली थी या नहीं । साथ ही अभी हाल तक यह हमारे सामाजिक संबंधों का अबोला नियमन था कि पुरुष प्रत्यक्षत: अपनी पत्नी और बच्चे का प्रेम प्रदर्शित नहीं करता था । वह उसके सामने कभी प्यार के दो बोल भी षायद ही बोलता था । और अगर लहना सिंह को अपने घर परिवार के स्थान पर केवल सूबेदारनी का आकर्षण मृत्यु वरण की प्रेरणा देता है तो वह निहायत ही शोहदा और ओझे चरित्र का व्यक्ति हो जाएगा । परन्तु महानता के सारे लक्षण तो गुलेरी जी ने अपने पात्रों में भरा है । अब अगर आप चाहे तो स्त्रीवाद की वर्तमान उग्र प्रतिक्रियाओं के तहत गुलेरी जी को पुरुषवादी कह सकते हैं ।

        दूसरा और तीसरा प्रसंग एक ही है, अलग-अलग काल और भावबोध में आया है । दूसरे प्रसंग के साथ जो प्रश्न उठता है, कथा नायक खुद ही आखिर में पूछता है कि दुख और क्रोध क्यों हुआ ? अर्थात् आखिर तक लहना सिंह को ज्ञात नहीं कि यह भाव कौन सा है ? तो आलोचकों को यह छूट मिल ही जाती है कि लड़के-लड़की के बीच प्रेम के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? यह वास्तव में मध्ययुगीन और सामंती बोध ही है जो स्त्री-पुरुष छोड़ बच्चे-बच्चियों तक के बीच भी केवल प्रेम ही देखता है । विपरीत लिंगी संबंधों के इतर भी स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका के बीच संबंध हो सकता है । दोस्ती हो सकती है, जान पहचान हो सकती है । दुकान पर मिलते-मिलते और थोड़ी-बहुत बातचीत करते-करते उनके बीच जान पहचान हो जाती है । यहाँ यह भी देखना चाहिए कि लड़का 12 वर्ष का है और लड़की केवल 8 वर्ष की है । इस उम्र में प्रेम ?! और यह भी ध्यान रखना होगा कि कहानी सन् 1915 की है न कि 2015 की । आज बच्चों को टी-वी-, कम्प्युटर के कारण ज्यादा एक्सपोजर है । परन्तु इस उम्र में प्रेम की परिकल्पना आज भी नहीं पचती है । फिर उस समय (सन् 1915) में तो यह निहायत असंभव सी बात लगती है । सन् 1930 के बाद महादेवी को परिपक्व उम्र में प्रेम के लिए अन्योक्ति का सहारा लेना पड़ा । अगर आलोचकों के एक वर्ग की यह मान्यता सही है कि उनके काव्य में वर्णित प्रेम सांसारिक है, किसी अन्य सत्ता का प्रेम नहीं है । तो प्रेम की सामाजिक स्वीकृति का स्तर देख सकते हैं । उस समय प्रेम केवल साहित्य की वस्तु थी, जीवन में उतारने योग्य मूल्य नहीं । पर वे आलोचक इन बच्चों को प्रेममय देख लेते हैं । अगर इनका प्रेम दिखलाना गुलेरी जी का लक्ष्य था, तो सम्मान के बावजूद और माफी के साथ कहना चाहूँगा कि गुलेरी जी बहुत सामंती, मध्ययुगीन और पुरुषवादी व्यक्ति थे । इन तर्कों के बावजूद तो प्रश्न तो वहीं-का-वहीं है कि उसे क्रोध या दुख क्यों हुआ ? इसके लिए बच्चे के अधिकार बोध को समझना होगा । उसमें भी पुरुष बालक के अधिकार बोध केा । बच्चियों की तुलना में बच्चों में अपने खिलौनों, अपने चीजों के लिए अधिकार की भावना ज्यादा रहती है । जब वे बार-बार मिले तो बच्ची पर लहना अपना अधिकार समझने लगता है । लड़की की उम्र ही आठ वर्ष है । जब आठ वर्ष की उम्र में उसकी कुड़माई हो जा रही है तो उसकी समझदारी की बात करना ही बेकार है । बच्चियों का कम उम्र में विवाह उस समय की आम समस्या थी । बच्चा उससे चार वर्ष बड़ा है । संभवत: वह थोड़ा समझदार हो । परन्तु उसमें भी भाव नहीं है । क्योंकि वह तो पहली बार मिलने पर ही पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गयी ? क्या उसको देखते ही लहनासिंह को उससे प्यार हो गया था ? इस प्रश्न की प्रतिक्रिया भी ध्यान देने योग्य है - ‘इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गयी और लड़का मुँह देखता रह गया ।’ लड़का मुँह देखता रह जाता है परन्तु यहाँ लेखक ने विस्मयादि बोधक चिह्व का प्रयोग नहीं किया है । वह मुँह देखता रह जाता है क्योंकि वह बहुत सहज होकर पूछता है और उसके अनुसार यह कोई भागने की बात ही नहीं है । इस घटना के बाद हम सीधे युद्ध भूमि में पहुँचते हैं और युद्ध के मार्फत 25 वर्ष बाद लहना युद्ध पर जाते हुए सूबेदारनी से मिलता है । पहले प्रसंग के बाद दूसरे प्रसंग में 25 वर्ष का अंतर है - ‘‘25 वर्ष बीत गये । अब लहनासिंह नम्बर 77 राइफल्स जमादार हो गया है । उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा । न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं ।’’ प्रेम के लिए स्मृति और आकांक्षा दोनों या दोनों में एक का होना अनिवार्य है । अगर दोनों ही गायब हो गए तो किस भाव या घटना से प्रेम को पहचाना जा सकता है । दोनों की अनुपस्थिति प्रेम की भी अनुपस्थिति को दर्शाता है । बाद में जब मृत्यु के समय स्मृतियों के साफ होने की बात रचनाकार करता है तब भी लहना सिंह यही कहता है कि पता नहीं क्रोध क्यों हुआ । लेखक ने यहाँ भी एक कारामात की है । पच्चीस बरस बाद जब बड़ी उम्र का लहना सूबेदारनी को नहीं पहचान पाता है तो उससे चार वर्ष छोटी सूबेदारनी उसे पहचान कैसे पाती है ? यह पहचान भी एक कथा युक्ति है कथा को निर्धारित लक्ष्य तब पहुँचाने की ।

        कुल मिलाकर इस कहानी का सौन्दर्य मानवता के प्रति इसके पात्रों की उदात्त, उदार और विराट दृष्टि में है । जबतक मानवता के प्रति और अपने समान दूसरे मनुष्यों के प्रति व्यक्तियों में त्याग, उत्सर्ग आदि की भावना रहेगी तबतक इस कहानी का सौन्दर्य भी अक्षुण्ण रहेगा ।

अमिताभ राय
ए–305 प्रियदर्शनी अपार्टमेंट,
17– इंद्रप्रस्थ प्रसार पटपड़गंजंज दिल्ली–92
मो०  09582502101

साभार लमही अक्टूबर-दिसम्बर 2013

       

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